श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 1021–1030
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1021–1030
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* उत्तरकाण्ड * १०१ ९
पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥
लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥
बिना पुण्यके क्या पवित्र यश [ प्राप्त ] हो सकता है? बिना पापके भी क्या कोई अपयश पा सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते हैं उस हरि- भक्तिके समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है? ॥४ ॥
हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥
अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥
हे भाई! जगत्में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्यका शरीर पाकर भी श्रीरामजीका भजन न किया जाय? चुगलखोरीके समान क्या कोई दूसरा पाप है? और हे गरुड़जी! दयाके समान क्या कोई दूसरा धर्म है? ॥ ५ ॥
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा । तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा ॥
इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मनमें विचारता था और आदरके साथ मुनिका उपदेश नहीं सुनता था । जब मैंने बार- बार सगुणका पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोधयुक्त वचन बोले—॥६ ॥
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि । उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥
सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही ॥
अरे मूढ़! मैं तुझे सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ, तो भी तू उसे नहीं मानता और बहुत - से उत्तर- प्रत्युत्तर ( दलीलें) लाकर रखता है । मेरे सत्य वचनपर विश्वास नहीं करता! कौएकी भाँति सभीसे डरता है ॥७ ॥
सठ स्वपच्छ तव हृदयँ बिसाला । सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई । नहिं कछु भय न दीनता आई ॥
अरे मूर्ख! तेरे हृदयमें अपने पक्षका बड़ा भारी हठ है, अतः तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी ( कौआ ) हो जा । मैंने आनन्दके साथ मुनिके शापको सिरपर चढ़ा लिया । उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आयी ॥ ८ ॥
दो० – तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाई ॥ ११२ ( क ) ॥
तब मैं तुरंत ही कौआ हो गया । फिर मुनिके चरणोंमें सिर नवाकर और रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीका स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला ॥ ११२ ( क ) ॥
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* *१०२० रामचरितमानस
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥ ११२ ( ख ) ॥
[शिवजी कहते हैं - ] हे उमा! जो श्रीरामजीके चरणोंके प्रेमी हैं और काम, अभिमान तथा क्रोधसे रहित हैं, वे जगत्को अपने प्रभुसे भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें? ॥ ११२ ( ख) ॥
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन । उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी ॥ लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी ॥
[ काकभुशुण्डिजीने कहा- ] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये, इसमें ऋषिका कुछ भी दोष नहीं था । रघुवंशके विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदयमें प्रेरणा करनेवाले हैं । कृपासागर प्रभुने मुनिकी बुद्धिको भोली करके ( भुलावा देकर ) मेरे प्रेमकी परीक्षा ली ॥१ ॥
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना । मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥
रिषि मम महत सीलता देखी । राम चरन बिस्वास बिसेषी ॥
मन, वचन और कर्मसे जब प्रभुने मुझे अपना दास जान लिया, तब भगवान्ने मुनिकी बुद्धि फिर पलट दी । ऋषिने मेरा महान् पुरुषोंका-सा स्वभाव ( धैर्य, अक्रोध, विनय आदि ) और श्रीरामजीके चरणोंमें विशेष विश्वास देखा, ॥ २ ॥
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥
मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा । हरषित राममंत्र तब दीन्हा ॥
तब मुनिने बहुत दुःखके साथ बार-बार पछताकर मुझे आदरपूर्वक बुला लिया । उन्होंने अनेकों प्रकारसे मेरा सन्तोष किया और तब हर्षित होकर मुझे राममन्त्र दिया ॥ ३ ॥
बालकरूप राम कर ध्याना । कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥
सुंदर सुखद मोहि अति भावा । सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा ॥
कृपानिधान मुनिने मुझे बालकरूप श्रीरामजीका ध्यान ( ध्यानकी विधि) बतलाया । सुन्दर और सुख देनेवाला यह ध्यान मुझे बहुत ही अच्छा लगा । वह ध्यान मैं आपको पहले ही सुना
चुकामुनि हूँमोहि॥४ ॥ कछुक काल तहँ राखा । रामचरितमानस तब भाषा ॥
सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥
मुनिने कुछ समयतक मुझको वहाँ ( अपने पास) रखा । तब उन्होंने रामचरितमानस वर्णन किया । आदरपूर्वक मुझे यह कथा सुनाकर फिर मुनि मुझसे सुन्दर वाणी बोले —॥५ ॥
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* उत्तरकाण्ड * १०२१
रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ॥
तोहि निज भगत राम कर जानी । ताते मैं सब कहेउँ बखानी ॥
हे तात! यह सुन्दर और गुप्त रामचरितमानस मैंने शिवजीकी कृपासे पाया था । तुम्हें श्रीरामजीका ‘ निज भक्त ' जाना, इसीसे मैंने तुमसे सब चरित्र विस्तारके साथ कहा ॥६ ॥
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं ॥
मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा । मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा ॥
हे तात! जिनके हृदयमें श्रीरामजीकी भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये । मुनिने मुझे बहुत प्रकारसे समझाया । तब मैंने प्रेमके साथ मुनिके चरणोंमें सिर नवाया ॥ ७ ॥
निज कर कमल परसि मम सीसा । हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा ॥
राम भगति अबिरल उर तोरें । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें ॥
मुनीश्वरने अपने कर- कमलोंसे मेरा सिर स्पर्श करके हर्षित होकर आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपासे तेरे हृदयमें सदा प्रगाढ़ रामभक्ति बसेगी ॥८ ॥
दो० – सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान ।
कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान ॥ ११३ ( क ) ॥
तुम सदा श्रीरामजीको प्रिय होओ और कल्याणरूप गुणोंके धाम, मानरहित इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, इच्छामृत्यु ( जिसकी शरीर छोड़नेकी इच्छा करनेपर ही मृत्यु हो, बिना इच्छाके मृत्यु न हो ), एवं ज्ञान और वैराग्यके भण्डार होओ ॥ ११३ ( क ) ॥
जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत ।
ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत ॥ ११३ ( ख ) ॥
इतना ही नहीं, श्रीभगवान्को स्मरण करते हुए तुम जिस आश्रममें निवास करोगे वहाँ एक योजन ( चार कोस ) तक अविद्या ( माया-मोह) नहीं व्यापेगी ॥ ११३ ( ख ) ॥
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ । कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥
राम रहस्य ललित बिधि नाना । गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥
काल, कर्म, गुण, दोष और स्वभावसे उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा । अनेकों प्रकारके सुन्दर श्रीरामजीके रहस्य ( गुप्त मर्मके चरित्र और गुण), जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं ( वर्णित और लक्षित हैं ) ॥ १ ॥
बिनु श्रम तुम्हे जानब सब सोऊ । नित नव नेह राम पद होऊ ॥
जो इच्छा करिहहु मन माहीं । हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं ॥
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* *१०२२ रामचरितमानस तुम उन सबको भी बिना ही परिश्रम जान जाओगे । श्रीरामजीके चरणोंमें तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो । अपने मनमें तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरिकी कृपासे उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी ॥२ ॥
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा । ब्रह्मगिरा भइ गगन गंभीरा ॥
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी । यह मम भगत कर्म मन बानी ॥
हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, मुनिका आशीर्वाद सुनकर आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि! तुम्हारा वचन ऐसा ही ( सत्य) हो । यह कर्म, मन और वचनसे मेरा भक्त है ॥ ३ ॥
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ । प्रेम मगन सब संसय गयऊ ॥
करि बिनती मुनि आयसु पाई । पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई ॥
आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ । मैं प्रेममें मग्न हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा । तदनन्तर मुनिकी विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरणकमलोंमें बार-बार सिर नवाकर- ॥ ४ ॥
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ । प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ ॥
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा । बीते कलप सात अरु बीसा ॥
मैं हर्षसहित इस आश्रममें आया । प्रभु श्रीरामजीकी कृपासे मैंने दुर्लभ वर पा लिया । हे पक्षिराज! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गये ॥५ ॥
करउँ सदा रघुपति गुन गाना । सादर सुनहिं बिहंग सुजाना ॥
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा । धरहिं भगत हित मनुज सरीरा ॥
मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजीके गुणोंका गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं । अयोध्यापुरीमें जब-जब श्रीरघुवीर भक्तोंके [ हितके ] लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं,॥ ६ ॥
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ । सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ ॥
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा । निज आश्रम आवउँ खगभूपा ॥
तब- तब मैं जाकर श्रीरामजीकी नगरीमें रहता हूँ और प्रभुकी शिशुलीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ । फिर हे पक्षिराज! श्रीरामजीके शिशुरूपको हृदयमें रखकर मैं अपने आश्रममें आ जाता हूँ॥७ ॥
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई । काग देह जेहिं कारन पाई ॥
कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी । राम भगति महिमा अति भारी ॥
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* उत्तरकाण्ड * १०२३ जिस कारणसे मैंने कौएकी देह पायी, वह सारी कथा आपको सुना दी । हे तात! मैंने आपके
सब प्रश्नोंके उत्तर कहे । अहा! रामभक्तिकी बड़ी भारी महिमा है ॥८ ॥
दो० - ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह ।
निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह ॥ ११४ ( क ) ॥
मुझे अपना यह काकशरीर इसीलिये प्रिय है कि इसमें मुझे श्रीरामजीके चरणोंका प्रेम प्राप्त हुआ । इसी शरीरसे मैंने अपने प्रभुके दर्शन पाये और मेरे सब सन्देह जाते रहे ( दूर हुए) ॥ ११४ ( क) । मासपारायण, उनतीसवाँ विश्राम
भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप ।
मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप ॥। ११४ ( ख ) ॥
मैं हठ करके भक्तिपक्षपर अड़ा रहा, जिससे महर्षि लोमशने मुझे शाप दिया; परन्तु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियोंको भी दुर्लभ है, वह वरदान मैंने पाया । भजनका प्रताप तो देखिये!॥ ११४ ( ख) ॥
जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥
जो भक्तिकी ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञानके लिये श्रम ( साधन ) करते हैं, वे मूर्ख घरपर खड़ी हुई कामधेनुको छोड़कर दूधके लिये मदारके पेड़को खोजते फिरते हैं ॥ १ ॥
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥
हे पक्षिराज! सुनिये, जो लोग श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर दूसरे उपायोंसे सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले ( अभागे ) बिना ही जहाजके तैरकर महासमुद्रके पार जाना चाहते हैं ॥ २ ॥
सुनि भसुंड के बचन भवानी । बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं । संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥
[शिवजी कहते हैं— ] हे भवानी! भुशुण्डिके वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणीसे बोले— हे प्रभो! आपके प्रसादसे मेरे हृदयमें अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया ॥ ३ ॥
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा । तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥
एक बात प्रभु पूँछउँ तोही । कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
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* *१०२४ रामचरितमानस मैंने आपकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीके पवित्र गुणसमूहोंको सुना और शान्ति प्राप्त की । हे प्रभो!
अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ । हे कृपासागर! मुझे समझाकर कहिये ॥४ ॥
कहहिं संत मुनि बेद पुराना । नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥
सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं । नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥
संत, मुनि, वेद और पुराण यह कहते हैं कि ज्ञानके समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है । हे गोसाईं! वही ज्ञान मुनिने आपसे कहा, परन्तु आपने भक्तिके समान उसका आदर नहीं किया ॥ ५ ॥
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता । सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥
सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेउ काग सुजाना ॥
हे कृपाके धाम! हे प्रभो! ज्ञान और भक्तिमें कितना अन्तर है? यह सब मुझसे कहिये ।
गरुड़जीके वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीने सुख माना और आदरके साथ कहा- ॥ ६ ॥
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥
भक्ति और ज्ञानमें कुछ भी भेद नहीं है । दोनों ही संसारसे उत्पन्न क्लेशोंको हर लेते हैं । हे नाथ! मुनीश्वर इनमें कुछ अन्तर बतलाते हैं । हे पक्षिश्रेष्ठ! उसे सावधान होकर सुनिये ॥७ ॥
ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥
हे हरिवाहन! सुनिये; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान – ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकारसे प्रबल होता है । अबला ( माया ) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति ( जन्म ) से ही जड़ ( मूर्ख ) होती है ॥८ ॥
दो० - पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ।
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥। ११५ ( क ) ॥
परन्तु जो वैराग्यवान् और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्रीको त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष, जो विषयोंके वशमें हैं ( उनके गुलाम हैं ) और श्रीरघुवीरके चरणोंसे विमुख हैं ॥ ११५ ( क ) ॥
सो०– सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि ।
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥ ११५ ( ख ) ॥
वे ज्ञानके भण्डार मुनि भी मृगनयनी ( युवती स्त्री) के चन्द्रमुखको देखकर विवश ( उसके अधीन ) हो जाते हैं । हे गरुड़जी! साक्षात् भगवान् विष्णुकी माया ही स्त्रीरूपसे प्रकट है ॥ ११५ ( ख) ॥
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* उत्तरकाण्ड * १०२५
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ । बेद पुरान संत मत भाषउँ ॥
मोह न नारि नारि कें रूपा । पन्नगारि यहयह रीतिरीति अनूपा ॥
यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता । वेद, पुराण और संतोंका मत (सिद्धान्त ) ही कहता हूँ । हे गरुड़जी! यह अनुपम ( विलक्षण) रीति है कि एक स्त्रीके रूपपर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती ॥ १ ॥
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ । नारि बर्ग जानइ सब कोऊ ॥
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी । माया खलु नर्तकी बिचारी ॥
आप सुनिये, माया और भक्ति-ये दोनों ही स्त्रीवर्गकी हैं, यह सब कोई जानते हैं । फिर श्रीरघुवीरको भक्ति प्यारी है । माया बेचारी तो निश्चय ही नाचनेवाली ( नटिनीमात्र) है ॥२ ॥
भगतिहि सानुकूल रघुराया । ताते तेहि डरपति अति माया ॥
राम भगति निरुपम निरुपाधी । बस जासु उर सदा अबाधी ॥
श्रीरघुनाथजी भक्तिके विशेष अनुकूल रहते हैं । इसीसे माया उससे अत्यन्त डरती रहती है । जिसके हृदयमें उपमारहित और उपाधिरहित ( विशुद्ध ) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा ( रोक-टोक ) के बसती है; ॥ ३ ॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥
अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी । जाचहिं भगति सकल सुख खानी ॥
उसे देखकर माया सकुचा जाती है । उसपर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर ( चला ) सकती । ऐसा विचारकर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे भी सब सुखोंकी खानि भक्तिकी ही याचना करते हैं ॥४ ॥
दो० – यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ ।
जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥ ११६ ( क ) ॥
श्रीरघुनाथजीका यह रहस्य ( गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता । श्रीरघुनाथजीकी कृपासे जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्नमें भी मोह नहीं होता ॥ ११६ ( क ) ॥
औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन ।
जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन ॥ ११६ ( ख ) ॥
हे सुचतुर गरुड़जी! ज्ञान और भक्तिका और भी भेद सुनिये, जिसके सुननेसे श्रीरामजीके चरणोंमें सदा अविच्छिन्न ( एकतार) प्रेम हो जाता है ॥ ११६ ( ख) ॥
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥
ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥
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* *१०२६ रामचरितमानस हे तात! यह अकथनीय कहानी ( वार्ता ) सुनिये । यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती । जीव ईश्वरका अंश है । [ अतएव ] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभावसे ही सुखकी राशि है ॥१ ॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं । बँध्यो कीर मरकट की नाईं ॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई ॥
हे गोसाईं! वह मायाके वशीभूत होकर तोते और वानरकी भाँति अपने - आप ही बँध गया । इस प्रकार जड़ और चेतनमें ग्रन्थि ( गाँठ ) पड़ गयी । यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटनेमें कठिनता है ॥२ ॥
तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥
तभीसे जीव संसारी ( जन्मने - मरनेवाला ) हो गया । अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है । वेदों और पुराणोंने बहुत से उपाय बतलाये हैं । पर वह ( ग्रन्थि ) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है ॥ ३ ॥
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी । ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी ॥
अस संजोग ईस जब करई । तबहुँ कदाचित सो निरुअरई ॥
जीवके हृदयमें अज्ञानरूपी अन्धकार विशेषरूपसे छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग ( जैसा आगे कहा जाता है ) उपस्थित कर देते हैं तब भी कदाचित् ही वह (ग्रन्थि) छूट पाती है ॥४ ॥
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई । जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥
जप तप ब्रत जम नियम अपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥
श्रीहरिकी कृपासे यदि सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घरमें आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार ( आचरण ), जो श्रुतियोंने कहे हैं, ॥ ५ ॥
तेइ तृन हरित चरै जब गाई । भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा ॥
उन्हीं [ धर्माचाररूपी ] हरे तृणों ( घास ) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़ेको पाकर वह पेन्हावे । निवृत्ति ( सांसारिक विषयोंसे और प्रपञ्चसे हटना ) नोई ( गौके दूहते समय पिछले पैर बाँधनेकी रस्सी ) है, विश्वास [ दूध दूहनेका ] बरतन है, निर्मल ( निष्पाप ) मन जो स्वयं अपना दास है ( अपने वशमें है ), दुहनेवाला अहीर है ॥ ६ ॥
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* उत्तरकाण्ड * १०२७
परम धर्ममय पय दुहि भाई । अवटै अनल अकाम बनाई ॥
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै । धृति सम जावनु देइ जमावै ॥
हे भाई! इस प्रकार ( धर्माचारमें प्रवृत्त सात्त्विकी श्रद्धारूपी गौसे भाव, निवृत्ति और वशमें किये हुए निर्मल मनकी सहायतासे ) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्निपर भलीभाँति औटावे । फिर क्षमा और संतोषरूपी हवासे उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम ( मनका निग्रह ) -रूपी जामन देकर उसे जमावे ॥ ७ ॥
मुदिताँ मथै बिचार मथानी । दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता । बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥
तब मुदिता ( प्रसन्नता ) रूपी कमोरीमें तत्त्वविचाररूपी मथानीसे दम ( इन्द्रिय- दमन ) के आधारपर ( दमरूपी खंभे आदिके सहारे ) सत्य और सुन्दर वाणीरूपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमेंसे निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र वैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले ॥ ८ ॥
दो० – जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ ।
बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥ ११७ ( क ) ॥
तब योगरूपी अग्नि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे ( सब कर्मोंको योगरूपी अग्निमें भस्म कर दे ) । जब [ वैराग्यरूपी मक्खनका ] ममतारूपी मल जल जाय, तब [ बचे हुए ] ज्ञानरूपी घीको [निश्चयात्मिका ] बुद्धिसे ठंढा करे ॥ ११७ ( क ) ॥
तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ ।
चित्तदिआ भरि धेरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥ ११७ ( ख) ॥
तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस [ ज्ञानरूपी ] निर्मल घीको पाकर उससे चित्तरूपी दियेको भरकर, समताकी दीवट बनाकर, उसपर उसे दृढ़तापूर्वक ( जमाकर ) रखे । ११७ (ख ) ॥
तीनि अवस्था तीन गुन तेहि कपास तें काढ़ि ।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि । ११७ ( ग ) ॥
[ जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति ] तीनों अवस्थाएँ और [ सत्त्व, रज और तम ] तीनों गुणरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रूईको निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावे ॥ ११७ ( ग ) ॥
सो० –- एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय ।
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥ ११७ ( घ ) ॥
इस प्रकार तेजकी राशि विज्ञानमय दीपकको जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायँ ॥११७ ( घ ) ॥
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*:*१०२८ रामचरितमानस
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥
‘ सोऽहमस्मि ' ( वह ब्रह्म मैं हूँ) यह जो अखण्ड ( तैलधारावत् कभी न टूटनेवाली ) वृत्ति है वही [ उस ज्ञानदीपककी ] परम प्रचण्ड दीपशिखा ( लौ ) है । [ इस प्रकार ] जब आत्मानुभवके सुखका सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसारके मूल भेदरूपी भ्रमका नाश हो जाता है, ॥ १ ॥
प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥
और महान् बलवती अविद्याके परिवार मोह आदिका अपार अन्धकार मिट जाता है । तब वही ( विज्ञानरूपिणी ) बुद्धि [ आत्मानुभवरूप ] प्रकाशको पाकर हृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़-चेतनकी गाँठको खोलती है ॥२ ॥
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई । तब यह जीव कृतारथ होई ॥
छोरत ग्रंथि जानि खगराया । बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥
यदि वह ( विज्ञानरूपिणी बुद्धि ) उस गाँठको खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो । परन्तु हे पक्षिराज गरुड़जी! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विघ्न करती है ॥३ ॥
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई ॥
कल बल छल करि जाहिं समीपा I। अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥
हे भाई! वह बहुत -सी ऋद्धि-सिद्धियोंको भेजती है, जो आकर बुद्धिको लोभ दिखाती हैं । और वे ऋद्धि- सिद्धियाँ कल ( कला ), बल और छल करके समीप जाती और आँचलकी वायुसे उस ज्ञानरूपी दीपकको बुझा देती हैं ॥ ४ ॥
होइ बुद्धि जौं परम सयानी । तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥
तेहि बुद्धि नहिं बाधी । तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥ यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई, तो वह उन (ऋद्धि -सिद्धियों ) को अहितकर ( हानिकर ) समझकर उनकी ओर ताकती नहीं । इस प्रकार यदि मायाके विघ्नोंसे बुद्धिको बाधा न हुई, तो फिर देवता उपाधि ( विघ्न ) करते हैं ॥ ५ ॥
इंद्री द्वार झरोखा नाना । तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥
आवत देखहिं बिषय बयारी । ते हठि देहिं कपाट उघारी ॥
इन्द्रियोंके द्वार हृदयरूपी घरके अनेकों झरोखे हैं । वहाँ-वहाँ ( प्रत्येक झरोखेपर ) देवता थाना किये ( अड्डा जमाकर ) बैठे हैं । ज्यों ही वे विषयरूपी हवाको आते देखते हैं त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं ॥६ ॥