श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 241–250

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 241 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * २३ ९

एक बार कालउ किन होऊ । सिय हित समर जितब हम सोऊ ॥

यह सुनि अवर महिप मुसुकाने । धरमसील हरिभगत सयाने ॥

काल ही क्यों न हो, एक बार तो सीताके लिये उसे भी हम युद्धमें जीत लेंगे । यह घमण्डकी बात सुनकर दूसरे राजा, जो धर्मात्मा, हरिभक्त और सयाने थे, मुसकराये ॥ ४ ॥

सो० - सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के I।

जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे ॥ २४५ ॥

[ उन्होंने कहा— ] राजाओंके गर्व दूर करके (जो धनुष किसीसे नहीं टूट सकेगा उसे तोड़कर ) श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको ब्याहेंगे । [ रही युद्धकी बात, सो ] महाराज दशरथके रणमें बाँके पुत्रोंको युद्धमें तो जीत ही कौन सकता है ॥ २४५ ॥

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई । मन मोदकन्हि कि भूख बुताई ॥

सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता ॥

गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो । मनके लड्डुओंसे भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र ( निष्कपट ) सीखको सुनकर सीताजीको अपने जीमें साक्षात् जगज्जननी समझो ( उन्हें पत्नीरूपमें पानेकी आशा एवं लालसा छोड़ दो ),॥ १ ॥

जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥

सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥

और श्रीरघुनाथजीको जगत्‌का पिता ( परमेश्वर ) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ ऐसा अवसर बार - बार नहीं मिलेगा] । सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणोंकी राशि ये दोनों भाई शिवजीके हृदयमें बसनेवाले हैं ( स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदयमें छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रोंके सामने आ गये हैं ) ॥२ ॥

सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ॥

करहु जाई जा कहुँ जोइ भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा ॥

समीप आये हुए ( भगवद्दर्शनरूप ) अमृतके समुद्रको छोड़कर तुम [ जगज्जननी जानकीको पत्नीरूपमें पानेकी दुराशारूप मिथ्या ] मृगजलको देखकर दौड़कर क्यों मरते हो? फिर [ भाई! ] जिसको जो अच्छा लगे वही जाकर करो । हमने तो [ श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन करके ] आज जन्म लेनेका फल पा लिया ( जीवन और जन्मको सफल कर लिया) ॥३ ॥

अस कहि भले भूप अनुरागे । रूप अनूप बिलोकन लागे ॥

देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना । बरषहिं सुमन करहिं कल गाना ॥

पृष्ठ 242

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 242 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *२४० रामचरितमानस ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेममग्न होकर श्रीरामजीका अनुपम रूप देखने लगे । [ मनुष्योंकी तो बात ही क्या ] देवता लोग भी आकाशसे विमानोंपर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुन्दर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं ॥४ ॥

दो० – जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाइ ।

चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाइ ॥ २४६ ॥

तब सुअवसर जानकर जनकजीने सीताजीको बुला भेजा । सब चतुर और सुन्दर सखियाँ आदरपूर्वक उन्हें लिवा चलीं ॥ २४६ ॥

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी । जगदंबिका रूप गुन खानी ॥

उपमा सकल मोहि लघु लागीं ॥ प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ॥

रूप और गुणोंकी खान जगज्जननी जानकीजीकी शोभाका वर्णन नहीं हो सकता । उनके लिये मुझे [काव्यकी ] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियोंके अंगोंसे अनुराग रखनेवाली हैं ( अर्थात् वे जगत्की स्त्रियोंके अंगोंको दी जाती हैं ) । [ काव्यकी उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत्से ली गयी हैं, उन्हें भगवान्‌की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजीके अप्राकृत, चिन्मय अंगोंके लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपनेको उपहासास्पद बनाना है] ॥१ ॥

सिय बरनिअ तेइ उपमा देई । कुकबि कहाइ अजसु को लेई ॥

जौं पटतरिअ तीय सम सीया । जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥

सीताजीके वर्णनमें उन्हीं उपमाओंको देकर कौन कुकवि कहलाये और अपयशका भागी बने ( अर्थात् सीताजीके लिये उन उपमाओंका प्रयोग करना सुकविके पदसे च्युत होना और अपकीर्ति मोल लेना है, कोई भी सुकवि ऐसी नादानी एवं अनुचित कार्य नहीं करेगा । ) यदि किसी स्त्रीके साथ सीताजीकी तुलना की जाय तो जगत्‌में ऐसी सुन्दर युवती है ही कहाँ [ जिसकी उपमा उन्हें दी जाय ] ॥२ ॥

गिरा मुखर तन अरध भवानी । रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥

बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही । कहिअ रमासम किमि बैदेही ॥

[ पृथ्वीकी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या, देवताओंकी स्त्रियोंको भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें ] सरस्वती तो बहुत बोलनेवाली हैं; पार्वती अर्द्धांगिनी हैं ( अर्थात् अर्द्ध- नारीनटेश्वरके रूपमें उनका आधा ही अंग स्त्रीका है, शेष आधा अंग पुरुष- शिवजीका है ), कामदेवकी स्त्री रति पतिको बिना शरीरका ( अनंग ) जानकर बहुत दुखी रहती है और जिनके विष और मद्य-जैसे [ समुद्रसे उत्पन्न होनेके नाते ] प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मीके समान तो जानकीजीको कहा ही कैसे जाय ॥ ३ ॥

पृष्ठ 243

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 243 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * २४१

जौं छबि सुधा पयोनिधि होई । परम रूपमय कच्छपु सोई ॥

सोभा रजु मंदरु सिंगारू । मथै पानि पंकज निज मारू ॥

[जिन लक्ष्मीजीकी बात ऊपर कही गयी है वे निकली थीं खारे समुद्रसे, जिसको मथनेके लिये भगवान्ने अति कर्कश पीठवाले कच्छपका रूप धारण किया, रस्सी बनायी गयी महान् विषधर वासुकि नागकी, मथानीका कार्य किया अतिशय कठोर मन्दराचल पर्वतने और उसे मथा सारे देवताओं और दैत्योंने मिलकर | जिन लक्ष्मीको अतिशय शोभाकी खान और अनुपम सुन्दरी कहते हैं, उनको प्रकट करनेमें हेतु बने ये सब असुन्दर एवं स्वाभाविक ही कठोर उपकरण । ऐसे उपकरणोंसे प्रकट हुई लक्ष्मी श्रीजानकीजीकी समताको कैसे पा सकती हैं । हाँ, इसके विपरीत ] यदि छबिरूपी अमृतका समुद्र हो, परम रूपमय कच्छप हो, शोभारूप रस्सी हो, श्रृंगार [ रस ] पर्वत हो और [ उस छबिके समुद्रको ] स्वयं कामदेव अपने ही करकमलसे मथे, ॥ ४ ॥

दो० –एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल ।

तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल ॥ २४७ ॥

इस प्रकार ( का संयोग होनेसे ) जब सुन्दरता और सुखकी मूल लक्ष्मी उत्पन्न हो, तो भी कवि लोग उसे ( बहुत) संकोचके साथ सीताजीके समान कहेंगे ॥ २४७ ॥

[जिस सुन्दरताके समुद्रको कामदेव मथेगा वह सुन्दरता भी प्राकृत, लौकिक सुन्दरता ही होगी; क्योंकि कामदेव स्वयं भी त्रिगुणमयी प्रकृतिका ही विकार है । अतः उस सुन्दरताको मथकर प्रकट की हुई लक्ष्मी भी उपर्युक्त लक्ष्मीकी अपेक्षा कहीं अधिक सुन्दर और दिव्य होनेपर भी होगी प्राकृत ही, अतः उसके साथ भी जानकीजीकी तुलना करना कविके लिये बड़े संकोचकी बात होगी । जिस सुन्दरतासे जानकीजीका दिव्यातिदिव्य परम दिव्य विग्रह बना है वह सुन्दरता उपर्युक्त सुन्दरतासे भिन्न अप्राकृत है - वस्तुतः लक्ष्मीजीका अप्राकृत रूप भी यही है । वह कामदेवके मथनेमें नहीं आ सकती और वह जानकीजीका स्वरूप ही है, अतः उनसे भिन्न नहीं, और उपमा दी जाती है भिन्न वस्तुके साथ | इसके अतिरिक्त जानकीजी प्रकट हुई हैं स्वयं अपनी महिमासे, उन्हें प्रकट करनेके लिये किसी भिन्न उपकरणकी अपेक्षा नहीं है । अर्थात् शक्ति शक्तिमान्से अभिन्न, अद्वैत-तत्त्व है, अतएव अनुपमेय है, यही गूढ़ दार्शनिक तत्त्व भक्तशिरोमणि कविने इस अभूतोपमालङ्कारके द्वारा बड़ी सुन्दरतासे व्यक्त किया है । ]

चलीं संग लै सखीं सयानी । गावत गीत मनोहर बानी ॥

सोह नवल तनु सुंदर सारी । जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥

पृष्ठ 244

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 244 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *२४२ रामचरितमानस सयानी सखियाँ सीताजीको साथ लेकर मनोहर वाणीसे गीत गाती हुई चलीं । सीताजीके नवल

शरीरपर सुन्दर साड़ी सुशोभित है । जगज्जननीकी महान् छबि अतुलनीय है ॥१ ॥

भूषन सकल सुदेस सुहाए । अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए ॥

रंगभूमि जब सिय पगु धारी । देखि रूप मोहे नर नारी ॥

सब आभूषण अपनी-अपनी जगहपर शोभित हैं, जिन्हें सखियोंने अंग-अंगमें भलीभाँति सजाकर पहनाया है । जब सीताजीने रंगभूमिमें पैर रखा, तब उनका [ दिव्य ] रूप देखकर स्त्री- पुरुष – सभी मोहित हो गये ॥२ ॥

हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं । बरषि प्रसून अपछरा गाईं ॥

पानि सरोज सोह जयमाला । अवचट चितए सकल भुआला ॥

देवताओंने हर्षित होकर नगाड़े बजाये और पुष्प बरसाकर अप्सराएँ गाने लगीं । सीताजीके करकमलोंमें जयमाला सुशोभित है । सब राजा चकित होकर अचानक उनकी ओर देखने लगे ॥३ ॥

सीय चकित चित रामहि चाहा । भए मोहबस सब नरनाहा ॥

मुनि समीप देखे दोउ भाई । लगे ललकि लोचन निधि पाई ॥

सीताजी चकित चित्तसे श्रीरामजीको देखने लगीं, तब सब राजालोग मोहके वश हो गये । सीताजीने मुनिके पास [बैठे हुए ] दोनों भाइयोंको देखा तो उनके नेत्र अपना खजाना पाकर ललचाकर वहीं ( श्रीरामजीमें ) जा लगे ( स्थिर हो गये ) ॥ ४ ॥

दो ० – गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि ।

लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि ॥ २४८ ॥

परन्तु गुरुजनोंकी लाजसे तथा बहुत बड़े समाजको देखकर सीताजी सकुचा गयीं । वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें लाकर सखियोंकी ओर देखने लगीं ॥ २४८ ॥

राम रूपु अरु सिय छबि देखें । नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें ॥

सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं । बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं ॥

श्रीरामचन्द्रजीका रूप और सीताजीकी छबि देखकर स्त्री- पुरुषोंने पलक मारना छोड़ दिया ( सब एकटक उन्हींको देखने लगे ) । सभी अपने मनमें सोचते हैं, पर कहते सकुचाते हैं । मन-ही -मन वे विधातासे विनय करते हैं- ॥ १ ॥

हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई । मति हमार असि देहि सुहाई ॥

बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू । सीय राम कर करै बिबाहू ॥

पृष्ठ 245

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 245 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * २४३ हे विधाता! जनककी मूढ़ताको शीघ्र हर लीजिये और हमारी ही ऐसी सुन्दर बुद्धि उन्हें दीजिये कि जिससे बिना ही विचार किये राजा अपना प्रण छोड़कर सीताजीका विवाह रामजीसे कर दें ॥ २ ॥

जगु भल कहिहि भाव सब काहू । हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू ॥

एहिं लालसाँ मगन सब लोगू । बरु साँवरो जानकी जोगू॥

संसार उन्हें भला कहेगा, क्योंकि यह बात सब किसीको अच्छी लगती है । हठ करनेसे अन्तमें भी हृदय जलेगा । सब लोग इसी लालसामें मग्न हो रहे हैं कि जानकीजीके योग्य वर तो यह साँवला ही है ॥ ३ ॥

तब बंदीजन जनक बोलाए । बिरिदावली कहत चलि आए ॥

कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा । चले भाट हियँ हरषु न थोरा ॥

तब राजा जनकने बंदीजनों ( भाटों ) को बुलाया । वे विरुदावली ( वंशकी कीर्ति) गाते हुए चले आये । राजाने कहा —जाकर मेरा प्रण सबसे कहो । भाट चले, उनके हृदयमें कम आनन्द न था ॥४ ॥

दो० – बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल ।

पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ॥ २४ ९ ॥

भाटोंने श्रेष्ठ वचन कहा- हे पृथ्वीकी पालना करनेवाले सब राजागण! सुनिये । हम अपनी भुजा उठाकर जनकजीका विशाल प्रण कहते हैं ॥२४ ९ ॥

नृप भुजबलु बिधु सिवधनु राहू । गरुअ कठोर बिदित सब काहू ॥

रावनु बानु महाभट भारे । देखि सरासन गवँहिं सिधारे ॥

राजाओंकी भुजाओंका बल चन्द्रमा है, शिवजीका धनुष राहु है, वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है । बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुषको देखकर गौंसे ( चुपके- से ) चलते बने ( उसे उठाना तो दूर रहा, छूनेतककी हिम्मत न हुई) ॥ १ ॥

सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा । राज समाज आजु जोइ तोरा ॥

त्रिभुवन जय समेत बैदेही । बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही ॥

उसी शिवजीके कठोर धनुषको आज इस राजसमाजमें जो भी तोड़ेगा, तीनों लोकोंकी विजयके साथ ही उसको जानकीजी बिना किसी विचारके हठपूर्वक वरण करेंगी ॥२ ॥

सुनि पन सकल भूप अभिलाषे । भटमानी अतिसय मन माखे ॥

परिकर बाँधि उठे अकुलाई । चले इष्टदेवन्ह सिर नाई ॥

प्रण सुनकर सब राजा ललचा उठे । जो वीरताके अभिमानी थे, वे मनमें बहुत ही तमतमाये ।

कमर कसकर अकुलाकर उठे और अपने इष्टदेवोंको सिर नवाकर चले ॥३ ॥

पृष्ठ 246

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 246 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *२४४ रामचरितमानस

तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं । उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं ॥

जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं । चाप समीप महीप न जाहीं ॥

वे तमककर ( बड़े तावसे ) शिवजीके धनुषकी ओर देखते हैं और फिर निगाह जमाकर उसे पकड़ते हैं, करोड़ों भाँतिसे जोर लगाते हैं, पर वह उठता ही नहीं । जिन राजाओंके मनमें कुछ विवेक है, वे धनुषके पास ही नहीं जाते ॥ ४ ॥

दो० - तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ ।

मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ ॥ २५० ॥

वे मूर्ख राजा तमककर ( किटकिटाकर ) धनुषको पकड़ते हैं, परन्तु जब नहीं उठता तो लजाकर चले जाते हैं, मानो वीरोंकी भुजाओंका बल पाकर वह धनुष अधिक - अधिक भारी होता जाता है ॥ २५० ॥

भूप सहस दस एकहि बारा । लगे उठावन टरइ न टारा ॥

डगइ न संभु सरासनु कैसें । कामी बचन सती मनु जैसें ॥

तब दस हजार राजा एक ही बार धनुषको उठाने लगे, तो भी वह उनके टाले नहीं टलता । शिवजीका वह धनुष कैसे नहीं डिगता था, जैसे कामी पुरुषके वचनोंसे सतीका मन ( कभी ) चलायमान नहीं होता ॥ १ ॥

सब नृप भए जोगु उपहासी । जैसें बिनु बिराग संन्यासी ॥

कीरति बिजय बीरता भारी । चले चाप कर बरबस हारी ॥

सब राजा उपहासके योग्य हो गये । जैसे वैराग्यके बिना संन्यासी उपहासके योग्य हो जाता है । कीर्ति, विजय, बड़ी वीरता- इन सबको वे धनुषके हाथों बरबस हारकर चले गये ॥ २ ॥

श्रीहत भए हारि हियँ राजा । बैठे निज निज जाइ समाजा ॥

नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने । बोले बचन रोष जनु साने ॥

राजालोग हृदयसे हारकर श्रीहीन ( हतप्रभ ) हो गये और अपने -अपने समाजमें जा बैठे । राजाओंको ( असफल ) देखकर जनक अकुला उठे और ऐसे वचन बोले जो मानो क्रोधमें सने हुए थे ॥ ३ ॥

दीप दीप के भूपति नाना । आए सुनि हम जो पनु ठाना ॥

देव दनुज धरि मनुज सरीरा । बिपुल बीर आए रनधीरा ॥

मैंने जो प्रण ठाना था, उसे सुनकर द्वीप-द्वीपके अनेकों राजा आये । देवता और दैत्य भी मनुष्यका शरीर धारण करके आये तथा और भी बहुत-से रणधीर वीर आये ॥४ ॥

पृष्ठ 247

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 247 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * २४५

दो० - कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय ।

पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय ॥ २५१ ॥

परन्तु धनुषको तोड़कर मनोहर कन्या, बड़ी विजय और अत्यन्त सुन्दर कीर्तिको पानेवाला मानो ब्रह्माने किसीको रचा ही नहीं ॥ २५१ ॥

कहहु काहि यहु लाभु न भावा । काहुँ न संकर चाप चढ़ावा ॥

रहउ चढ़ाउब तोरब भाई । तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई ॥

कहिये, यह लाभ किसको अच्छा नहीं लगता । परन्तु किसीने भी शङ्करजीका धनुष नहीं चढ़ाया । अरे भाई! चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा, कोई तिलभर भूमि भी छुड़ा न सका ॥१ ॥

अब जनि कोउ माखै भट मानी । बीर बिहीन मही मैं जानी ॥

तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ॥

अब कोई वीरताका अभिमानी नाराज न हो । मैंने जान लिया, पृथ्वी वीरोंसे खाली हो गयी ।

अब आशा छोड़कर अपने - अपने घर जाओ; ब्रह्माने सीताका विवाह लिखा ही नहीं ॥ २ ॥

सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ । कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ ॥

जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई । तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई ॥

यदि प्रण छोड़ता हूँ तो पुण्य जाता है; इसलिये क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे । यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरोंसे शून्य है, तो प्रण करके उपहासका पात्र न बनता ॥३ ॥

जनक बचन सुनि सब नर नारी । देखि जानकिहि भए दुखारी ॥

माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें । रदपट फरकत नयन रिसौंहें ॥

जनकके वचन सुनकर सभी स्त्री- पुरुष जानकीजीकी ओर देखकर दुःखी हुए, परन्तु लक्ष्मणजी तमतमा उठे, उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं, ओठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोधसे लाल हो गये ॥४ ॥

दो० – कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान ।

नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान ॥ २५२ ॥

श्रीरघुवीरजीके डरसे कुछ कह तो सकते नहीं, पर जनकके वचन उन्हें बाण- से लगे । [ जब न रह सके तब ] श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें सिर नवाकर वे यथार्थ वचन बोले— ॥ २५२ ॥

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥

कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुलमनि जानी ॥

रघुवंशियोंमें कोई भी जहाँ होता है, उस समाजमें ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीको उपस्थित जानते हुए भी जनकजीने कहे हैं ॥१ ॥

पृष्ठ 248

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 248 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *२४६ रामचरितमानस

सुनहु भानुकुल पंकज भानू । कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ॥

जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं । कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ॥

हे सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य! सुनिये, मैं स्वभावहीसे कहता हूँ, कुछ अभिमान करके नहीं, यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं ब्रह्माण्डको गेंदकी तरह उठा लूँ ॥ २ ॥

काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ॥

तव प्रताप महिमा भगवाना । को बापुरो पिनाक पुराना ॥

और उसे कच्चे घड़ेकी तरह फोड़ डालूँ । मैं सुमेरु पर्वतको मूलीकी तरह तोड़ सकता हूँ, हे भगवन्! आपके प्रतापकी महिमासे यह बेचारा पुराना धनुष तो कौन चीज है ॥३ ॥

नाथ जानि अस आयसु होऊ । कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ ॥

कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं । जोजन सत प्रमान लै धावौं ॥

ऐसा जानकर हे नाथ! आज्ञा हो तो कुछ खेल करूँ, उसे भी देखिये । धनुषको कमलकी डंडीकी तरह चढ़ाकर उसे सौ योजनतक दौड़ा लिये चला जाऊँ ॥४ ॥

दो० –- तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ ।

जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ ॥ २५३ ॥

हे नाथ! आपके प्रतापके बलसे धनुषको कुकुरमुत्ते ( बरसाती छत्ते) की तरह तोड़ दूँ । यदि ऐसा न करूँ तो प्रभुके चरणोंकी शपथ है, फिर मैं धनुष और तरकसको कभी हाथमें भी न लूँगा ॥ २५३ ॥

लखन सकोप बचन जे बोले । डगमगानि महि दिग्गज डोले ॥

सकल लोग सब भूप डेराने । सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने ॥

ज्यों ही लक्ष्मणजी क्रोधभरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओंके हाथी काँप गये ।

सभी लोग और सब राजा डर गये । सीताजीके हृदयमें हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गये ॥१ ॥

गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं । मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं ॥

सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे । प्रेम समेत निकट बैठारे ॥

गुरु विश्वामित्रजी, श्रीरघुनाथजी और सब मुनि मनमें प्रसन्न हुए और बार- बार पुलकित होने लगे । श्रीरामचन्द्रजीने इशारेसे लक्ष्मणको मना किया और प्रेमसहित अपने पास बैठा लिया ॥२ ॥

बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी ॥

उठहु राम भंजहु भवचापा । मेटहु तात जनक परितापा ॥

विश्वामित्रजी शुभ समय जानकर अत्यन्त प्रेमभरी वाणी बोले- हे राम! उठो, शिवजीका धनुष तोड़ो और हे तात! जनकका सन्ताप मिटाओ ॥ ३ ॥

पृष्ठ 249

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 249 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * २४७

सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा । हरषु बिषादु न कछु उर आवा ॥

ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ । ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ ॥

गुरुके वचन सुनकर श्रीरामजीने चरणोंमें सिर नवाया । उनके मनमें न हर्ष हुआ, न विषाद; और वे अपनी ऐंड़ ( खड़े होनेकी शान ) से जवान सिंहको भी लजाते हुए सहज स्वभावसे ही उठ खड़े हुए ॥४ ॥

दो० – उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग ।

बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग ॥ २५४ ॥

मञ्चरूपी उदयाचलपर रघुनाथजीरूपी बालसूर्यके उदय होते ही सब संतरूपी कमल खिल उठे और नेत्ररूपी भौरे हर्षित हो गये ॥ २५४ ॥

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी ॥

मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ॥

राजाओंकी आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी । उनके वचनरूपी तारोंके समूहका चमकना बंद हो गया ( वे मौन हो गये ) । अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये ॥ १ ॥

भए बिसोक कोक मुनि देवा । बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा ॥

गुर पद बंदि सहित अनुरागा । राम मुनिन्ह सन आयसु मागा ॥

मुनि और देवतारूपी चकवे शोकरहित हो गये । वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट कर रहे हैं । प्रेमसहित गुरुके चरणोंकी वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे आज्ञा माँगी ॥ २ ॥

सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी ॥

चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरि तन भए सुखारी ॥

समस्त जगत्के स्वामी श्रीरामजी सुन्दर मतवाले श्रेष्ठ हाथीकी-सी चालसे स्वाभाविक ही चले । श्रीरामचन्द्रजीके चलते ही नगरभरके सब स्त्री- पुरुष सुखी हो गये और उनके शरीर रोमाञ्चसे भर गये ॥३ ॥

बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ॥

तौ सिवधनु मृनाल की नाईं ॥ तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं ॥

उन्होंने पितर और देवताओंकी वन्दना करके अपने पुण्योंका स्मरण किया । यदि हमारे पुण्योंका कुछ भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं! रामचन्द्रजी शिवजीके धनुषको कमलकी डंडीकी भाँति तोड़ डालें ॥४ ॥

पृष्ठ 250

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 250 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *२४८ रामचरितमानस

दो० – -रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ ।

सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ ॥ २५५ ॥

श्रीरामचन्द्रजीको [ वात्सल्य ] प्रेमके साथ देखकर और सखियोंको समीप बुलाकर सीताजीकी माता स्नेहवश विलखकर ( विलाप करती हुई-सी ) ये वचन बोलीं- ॥ २५५ ॥

सखि सब कौतुक देखनिहारे । जेउ कहावत हितू हमारे ॥

कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं ॥

हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखनेवाले हैं । कोई भी [ इनके ] गुरु विश्वामित्रजीको समझाकर नहीं कहता कि ये ( रामजी ) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं । [ जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरोंके हिलाये न हिल सका, उसे तोड़नेके लिये मुनि विश्वामित्रजीका रामजीको आज्ञा देना और रामजीका उसे तोड़नेके लिये चल देना रानीको हठ जान पड़ा, इसलिये वे कहने लगीं कि गुरु विश्वामित्रजीको कोई समझाता भी नहीं । ] ॥ १ ॥

रावन बान छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा ॥

सो धनु राजकुअँर कर देहीं । बाल मराल कि मंदर लेहीं ॥

रावण और बाणासुरने जिस धनुषको छुआतक नहीं और सब राजा घमंड करके हार गये, वही धनुष इस सुकुमार राजकुमारके हाथमें दे रहे हैं I। हंसके बच्चे भी कहीं मन्दराचल पहाड़ उठा सकते हैं? ॥२ ॥

भूप सयानप सकल सिरानी । सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ॥

बोली चतुर सखी मृदु बानी । तेजवंत लघु गनिअ न रानी ॥

[ और तो कोई समझाकर कहे या नहीं, राजा तो बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरुको समझानेकी चेष्टा करनी चाहिये थी, परन्तु मालूम होता है ] राजाका भी सारा सयानापन समाप्त हो गया । हे सखी! विधाताकी गति कुछ जाननेमें नहीं आती [ यों कहकर रानी चुप हो रहीं ] । तब एक चतुर ( रामजीके महत्त्वको जाननेवाली ) सखी कोमल वाणीसे बोली- हे रानी! तेजवान्को [ देखनेमें छोटा होनेपर भी ] छोटा नहीं गिनना चाहिये ॥ ३ ॥

कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा । सोषेउ सुजसु सकल संसारा ॥

रबि मंडल देखत लघु लागा । उदयँ तासु तिभुवन तम भागा ॥

कहाँ घड़ेसे उत्पन्न होनेवाले [ छोटे- से ] मुनि अगस्त्य और कहाँ अपार समुद्र? किन्तु उन्होंने उसे सोख लिया, जिसका सुयश सारे संसारमें छाया हुआ है । सूर्यमण्डल देखनेमें छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही तीनों लोकोंका अन्धकार भाग जाता है ॥४ ॥