श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 231–240
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240
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* बालकाण्ड * २२ ९
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे । सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे ॥
नख सिख देखि राम कै सोभा । सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा ॥
तब सीताजीने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुलके दोनों सिंहोंको अपने सामने [ खड़े ] देखा । नखसे शिखातक श्रीरामजीकी शोभा देखकर और फिर पिताका प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया ॥२ ॥
परबस सखिन्ह लखी जब सीता । भयउ गहरु सब कहहिं सभीता ॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली । अस कहि मन बिहसी एक आली ॥
जब सखियोंने सीताजीको परवश (प्रेमके वश ) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं-बड़ी देर हो गयी [ अब चलना चाहिये ] | कल इसी समय फिर आयेंगी, ऐसा कहकर एक सखी मनमें हँसी ॥३ ॥
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी । भयउ बिलंबु मातु भय मानी ॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने । फिरी अपनप पितुबस जाने ॥
सखीकी यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं । देर हो गयी जान उन्हें माताका भय लगा । बहुत धीरज धरकर वे श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें ले आयीं, और [ उनका ध्यान करती हुई ] अपनेको पिताके अधीन जानकर लौट चलीं ॥४ ॥
दो० – देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि ।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़ प्रीति न थोरि॥ २३४ ॥
मृग, पक्षी और वृक्षोंको देखनेके बहाने सीताजी बार- बार घूम जाती हैं और श्रीरामजीकी छबि देख - देखकर उनका प्रेम कम नहीं बढ़ रहा है ( अर्थात् बहुत ही बढ़ता जाता है ) ॥२३४ ॥
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति । चली राखि उर स्यामल मूरति ॥
प्रभु जब जात जानकी जानी । सुख सनेह सोभा गुन खानी ॥
शिवजीके धनुषको कठोर जानकर वे विसूरती ( मनमें विलाप करती ) हुई हृदयमें श्रीरामजीकी साँवली मूर्तिको रखकर चलीं । ( शिवजीके धनुषकी कठोरताका स्मरण आनेसे उन्हें चिन्ता होती थी कि ये सुकुमार रघुनाथजी उसे कैसे तोड़ेंगे, पिताके प्रणकी स्मृतिसे उनके हृदयमें क्षोभ था ही, इसलिये मनमें विलाप करने लगीं । प्रेमवश ऐश्वर्यकी विस्मृति हो जानेसे ही ऐसा हुआ; फिर भगवान्के बलका स्मरण आते ही वे हर्षित हो गयीं और साँवली छबिको हृदयमें धारण करके चलीं । ) प्रभु श्रीरामजीने जब सुख, स्नेह, शोभा और गुणोंकी खान श्रीजानकीजीको जाती हुई जाना, ॥ १ ॥
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही । चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही ॥
गई भवानी भवन बहोरी । बंदि चरन बोली कर जोरी ॥
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* *२३० रामचरितमानस तब परमप्रेमकी कोमल स्याही बनाकर उनके स्वरूपको अपने सुन्दर चित्तरूपी भित्तिपर चित्रित कर लिया । सीताजी पुनः भवानीजीके मन्दिरमें गयीं और उनके चरणोंकी वन्दना करके हाथ जोड़कर बोलीं- ॥२ ॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी । जय महेस मुख चंद चकोरी ॥
जय गजबदन षडानन माता । जगत जननि दामिनि दुति गाता ॥
हे श्रेष्ठ पर्वतोंके राजा हिमाचलकी पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो; हे महादेवजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी [ ओर टकटकी लगाकर देखनेवाली ] चकोरी! आपकी जय हो; हे हाथीके मुखवाले गणेशजी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकजीकी माता! हे जगज्जननी! हे बिजलीकी - सी कान्तियुक्त शरीरवाली! आपकी जय हो! ॥ ३ ॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है । आपके असीम प्रभावको वेद भी नहीं जानते । आप संसारको उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली हैं । विश्वको मोहित करनेवाली और स्वतन्त्ररूपसे विहार करनेवाली हैं ॥४ ॥
दो० – पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख ।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ॥ २३५ ॥
पतिको इष्टदेव माननेवाली श्रेष्ठ नारियोंमें हे माता! आपकी प्रथम गणना है । आपकी अपार महिमाको हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते ॥ २३५ ॥
सेवत तोहि सुलभ फल चारी । बरदायनी पुरारिपुरारि पिआरी ॥
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥
हे [ भक्तोंको मुँहमाँगा ] वर देनेवाली! हे त्रिपुरके शत्रु शिवजीकी प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करनेसे चारों फल सुलभ हो जाते हैं । हे देवि! आपके चरणकमलोंकी पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं ॥१ ॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें । बसहु सदा उर पुर सबही कें ॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेहीं ॥
मेरे मनोरथको आप भलीभाँति जानती हैं; क्योंकि आप सदा सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करती हैं । इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया । ऐसा कहकर जानकीजीने उनके चरण पकड़ लिये ॥२ ॥
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* बालकाण्ड * २३१
बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥
सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥
गिरिजाजी सीताजीके विनय और प्रेमके वशमें हो गयीं । उन ( के गले ) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी । सीताजीने आदरपूर्वक उस प्रसाद ( माला ) को सिरपर धारण किया । गौरीजीका हृदय हर्षसे भर गया और वे बोलीं – ॥३ ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन कामना तुम्हारी ॥
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥
हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मन:कामना पूरी होगी । नारदजीका वचन सदा पवित्र ( संशय, भ्रम आदि दोषोंसे रहित ) और सत्य है । जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा ॥४ ॥
छं० – मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥
जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभावसे ही सुन्दर साँवला वर ( श्रीरामचन्द्रजी ) तुमको मिलेगा । वह दयाका खजाना और सुजान ( सर्वज्ञ ) है, तुम्हारे शील और स्नेहको जानता है । इस प्रकार श्रीगौरीजीका आशीर्वाद सुनकर जानकीजीसमेत सब सखियाँ हृदयमें हर्षित हुईं । तुलसीदासजी कहते हैं — भवानीजीको बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मनसे राजमहलको लौट चलीं ।
सो० –- जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥२३६ ॥
गौरीजीको अनुकूल जानकर सीताजीके हृदयको जो हर्ष हुआ वह कहा नहीं जा सकता । सुन्दर मङ्गलोंके मूल उनके बायें अंग फड़कने लगे ॥ २३६ ॥
हृदयँ सराहत सीय लोनाई । गुर समीप गवने दोउ भाई ॥
राम कहा सबु कौसिक पाहीं । सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ॥
हृदयमें सीताजीके सौन्दर्यकी सराहना करते हुए दोनों भाई गुरुजीके पास गये । श्रीरामचन्द्रजीने विश्वामित्रजीसे सब कुछ कह दिया । क्योंकि उनका सरल स्वभाव है, छल तो उसे छूता भी नहीं है ॥१ ॥
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही । पुनि असीस दुहु भाइह दीन्ही ॥
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे । रामु लखनु सुनि भए सुखारे ॥
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* *२३२ रामचरितमानस फूल पाकर मुनिने पूजा की । फिर दोनों भाइयोंको आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों । यह सुनकर श्रीराम-लक्ष्मण सुखी हुए ॥ २ ॥
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी । लगे कहन कछु कथा पुरानी ॥
बिगत दिवस गुरु आयसु पाई । संध्या करन चले दोउ भाई ॥
श्रेष्ठ विज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी भोजन करके कुछ प्राचीन कथाएँ कहने लगे । [ इतनेमें ] दिन बीत गया और गुरुकी आज्ञा पाकर दोनों भाई सन्ध्या करने चले ॥ ३ ॥
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा । सिय मुख सरिस देखि सुख पावा ॥
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं । सीय बदन सम हिमकर नाहीं ॥
[ उधर] पूर्व दिशामें सुन्दर चन्द्रमा उदय हुआ । श्रीरामचन्द्रजीने उसे सीताके मुखके समान देखकर सुख पाया । फिर मनमें विचार किया कि यह चन्द्रमा सीताजीके मुखके समान नहीं है ॥४ ॥
दो० -जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक ।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक ॥ २३७ ॥
खारे समुद्रमें तो इसका जन्म, फिर [ उसी समुद्रसे उत्पन्न होनेके कारण ] विष इसका भाई; दिनमें यह मलिन ( शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलङ्की ( काले दागसे युक्त ) है । बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजीके मुखकी बराबरी कैसे पा सकता है? ॥२३७ ॥
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई । ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई ॥
कोक सोकप्रद पंकज द्रोही । अवगुन बहुत चंद्रमा तोही ॥
फिर यह घटता- बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियोंको दुःख देनेवाला है; राहु अपनी सन्धिमें पाकर इसे ग्रस लेता है । चकवेको [ चकवीके वियोगका ] शोक देनेवाला और कमलका वैरी ( उसे मुरझा देनेवाला ) है । हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत -से अवगुण हैं [जो सीताजीमें नहीं हैं ] ॥१ ॥
बैदेही मुख पटतर दीन्हे । होइ दोषु बड़ अनुचित कीन्हे ॥
सिय मुखछबि बिधु ब्याज बखानी । गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी ॥
अत: जानकीजीके मुखकी तुझे उपमा देनेमें बड़ा अनुचित कर्म करनेका दोष लगेगा । इस प्रकार चन्द्रमाके बहाने सीताजीके मुखकी छबिका वर्णन करके, बड़ी रात हो गयी जान, वे गुरुजीके पास चले ॥२ ॥
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा । आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा ॥
बिगत निसा रघुनायक जागे । बंधु बिलोकि कहन अस लागे ॥
मुनिके चरणकमलोंमें प्रणाम करके, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया; रात बीतनेपर श्रीरघुनाथजी जागे और भाईको देखकर ऐसा कहने लगे- ॥३ ॥
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* बालकाण्ड * २३३
उयउ अरुन अवलोकहु ताता । पंकज कोक लोक सुखदाता ॥
बोले लखनु जोरि जुग पानी । प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी ॥
हे तात! देखो, कमल, चक्रवाक और समस्त संसारको सुख देनेवाला अरुणोदय हुआ है । लक्ष्मणजी दोनों हाथ जोड़कर प्रभुके प्रभावको सूचित करनेवाली कोमल वाणी बोले—॥४ ॥
दो० – अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन ।
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन ॥ २३८ ॥
अरुणोदय होनेसे कुमुदिनी सकुचा गयी और तारागणोंका प्रकाश फीका पड़ गया, जिस प्रकार आपका आना सुनकर सब राजा बलहीन हो गये हैं ॥२३८ ॥
नृप सब नखत करहिं उजिआरी । टारि न सकहिं चाप तम भारी ॥
कमल कोक मधुकर खग नाना । हरषे सकल निसा अवसाना ॥
सब राजारूपी तारे उजाला ( मन्द प्रकाश ) करते हैं, पर वे धनुषरूपी महान् अन्धकारको हटा नहीं सकते । रात्रिका अन्त होनेसे जैसे कमल, चकवे, भौरे और नाना प्रकारके पक्षी हर्षित हो रहे हैं ॥१ ॥
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे ॥ होइहहिं टूटें धनुष सुखारे ॥
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा । दुरे नखत जग तेजु प्रकासा ॥
वैसे ही हे प्रभो! आपके सब भक्त धनुष टूटनेपर सुखी होंगे । सूर्य उदय हुआ, बिना ही परिश्रम अन्धकार नष्ट हो गया । तारे छिप गये, संसारमें तेजका प्रकाश हो गया ॥२ ॥
रबि निज उदय ब्याज रघुराया । प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया ॥
तव भुज बल महिमा उदघाटी । प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी ॥
हे रघुनाथजी! सूर्यने अपने उदयके बहाने सब राजाओंको प्रभु ( आप ) का प्रताप दिखलाया है । आपकी भुजाओंके बलकी महिमाको उद्घाटित करने ( खोलकर दिखाने ) के लिये ही धनुष तोड़नेकी यह पद्धति प्रकट हुई है ॥ ३ ॥
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने । होइ सुचि सहज पुनीत नहाने ॥
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए । चरन सरोज सुभग सिर नाए ॥
भाईके वचन सुनकर प्रभु मुसकराये । फिर स्वभावसे ही पवित्र श्रीरामजीने शौचसे निवृत्त होकर स्नान किया और नित्यकर्म करके वे गुरुजीके पास आये । आकर उन्होंने गुरुजीके सुन्दर चरणकमलोंमें सिर नवाया ॥४ ॥
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* *२३४ रामचरितमानस
सतानंदु तब जनक बोलाए । कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए ॥
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई । हरषे बोलि लिए दोउ भाई ॥
तब जनकजीने शतानन्दजीको बुलाया और उन्हें तुरंत ही विश्वामित्र मुनिके पास भेजा । उन्होंने आकर जनकजीकी विनती सुनायी । विश्वामित्रजीने हर्षित होकर दोनों भाइयोंको बुलाया ॥५ ॥
दो० –- सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ ।
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ ॥ २३ ९ ॥
शतानन्दजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गुरुजीके पास जा बैठे । तब मुनिने कहा-हे तात! चलो, जनकजीने बुला भेजा है ॥ २३ ९ ॥ मासपारायण, आठवाँ विश्राम नवाह्नपारायण, दूसरा विश्राम
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई । ईसु काहि धौं देइ बड़ाई ॥
लखन कहा जस भाजनु सोई । नाथ कृपा तव जापर होई ॥
चलकर सीताजीके स्वयंवरको देखना चाहिये । देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं । लक्ष्मणजीने कहा— हे नाथ! जिसपर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाईका पात्र होगा ( धनुष तोड़नेका श्रेय उसीको प्राप्त होगा) ॥ १ ॥
हर मुनि सब सुनि बर बानी । दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी ॥
पुनि मुनिबूंद समेत कृपाला । देखन चले धनुषमख साला ॥
इस श्रेष्ठ वाणीको सुनकर सब मुनि प्रसन्न हुए । सभीने सुख मानकर आशीर्वाद दिया । फिर मुनियोंके समूहसहित कृपालु श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञशाला देखने चले ॥२ ॥
रंगभूमि आए दोउ भाई । असि सुधि सब पुरबासिह पाई ॥
चले सकल गृह काज बिसारी । बाल जुबान जरठ नर नारी ॥
दोनों भाई रंगभूमिमें आये हैं, ऐसी खबर जब सब नगरनिवासियोंने पायी, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और काम-काजको भुलाकर चल दिये ॥ ३ ॥
देखी जनक भीर भै भारी । सुचि सेवक सब लिए हँकारी ॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू । आसन उचित देहु सब काहू ॥
जब जनकजीने देखा कि बड़ी भीड़ हो गयी है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकोंको बुलवा लिया और कहा--तुमलोग तुरंत सब लोगोंके पास जाओ और सब किसीको यथायोग्य आसन दो ॥४ ॥
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* बालकाण्ड * २३५
दो० – कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि ।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि ॥ २४० ॥
उन सेवकोंने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु ( सभी श्रेणीके ) स्त्री-पुरुषोंको अपने- अपने योग्य स्थानपर बैठाया ॥ २४० ॥
राजकुअँर तेहि अवसर आए । मनहुँ मनोहरता तन छाए ॥
गुन सागर नागर बर बीरा । सुंदर स्यामल गौर सरीरा ॥
उसी समय राजकुमार ( राम और लक्ष्मण ) वहाँ आये । [ वे ऐसे सुन्दर हैं ] मानो साक्षात् मनोहरता ही उनके शरीरोंपर छा रही हो । सुन्दर साँवला और गोरा उनका शरीर है । वे गुणोंके समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं ॥१ ॥
राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे ॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी ॥
वे राजाओंके समाजमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणोंके बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों । जिनकी जैसी भावना थी, प्रभुकी मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी ॥२ ॥
देखहिं रूप महा रनधीरा । मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा ॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी । मनहुँ भयानक मूरति भारी ॥
महान् रणधीर ( राजालोग ) श्रीरामचन्द्रजीके रूपको ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर -रस शरीर धारण किये हुए हो । कुटिल राजा प्रभुको देखकर डर गये, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो ॥३ ॥
रहे असुर छल छोनिप बेषा । तिन्ह प्रभु प्रगट काल सम देखा ॥
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई । नरभूषन लोचन सुखदाई ॥
छलसे जो राक्षस वहाँ राजाओंके वेषमें [ बैठे ] थे, उन्होंने प्रभुको प्रत्यक्ष कालके समान देखा । नगरनिवासियोंने दोनों भाइयोंको मनुष्योंके भूषणरूप और नेत्रोंको सुख देनेवाला देखा ॥४ ॥
दो० - नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप ।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप ॥ २४१ ॥
स्त्रियाँ हृदयमें हर्षित होकर अपनी- अपनी रुचिके अनुसार उन्हें देख रही हैं । मानो शृंगार-रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किये सुशोभित हो रहा हो ॥ २४१ ॥
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा । बहु मुख कर पग लोचन सीसा ॥
जनक जाति अवलोकहिं कैसें । सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें ॥
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* *२३६ रामचरितमानस विद्वानोंको प्रभु विराट्रूपमें दिखायी दिये, जिसके बहुत-से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं । जनकजीके सजातीय ( कुटुम्बी ) प्रभुको किस तरह ( कैसे प्रिय रूपमें ) देख रहे हैं, जैसे सगे सजन ( सम्बन्धी ) प्रिय लगते हैं ॥१ ॥
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी । सिसु सम प्रीति न जाति बखानी ॥
जोगिन्ह परम तत्त्वमय भासा । सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा ॥
जनकसमेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चेके समान देख रही हैं, उनकी प्रीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता । योगियोंको वे शान्त, शुद्ध, सम और स्वतः प्रकाश परम तत्त्वके रूपमें दीखे ॥२ ॥
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता । इष्टदेव इव सब सुख दाता ॥
रामहि चितव भायँ जेहि सीया । सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया ॥
हरिभक्तोंने दोनों भाइयोंको सब सुखोंके देनेवाले इष्टदेवके समान देखा । सीताजी जिस भावसे श्रीरामचन्द्रजीको देख रही हैं, वह स्नेह और सुख तो कहनेमें ही नहीं आता ॥३ ॥
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ । कवन प्रकार कहै कबि कोऊ ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ । तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ ॥
उस ( स्नेह और सुख ) का वे हृदयमें अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं । फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है । इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजीको वैसा ही देखा ॥४ ॥
दो० – राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर ।
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर ॥ २४२ ॥
सुन्दर साँवले और गोरे शरीरवाले तथा विश्वभरके नेत्रोंको चुरानेवाले कोसलाधीशके कुमार राजसमाजमें [ इस प्रकार ] सुशोभित हो रहे हैं ॥ २४२ ॥
कोटि काम उपमा लघु सोऊ ॥सहज मनोहर मूरति दोऊ ।
सरद चंद निंदक मुख नीके । नीरज नयन भावते जी के ॥
दोनों मूर्तियाँ स्वभावसे ही ( बिना किसी बनाव- शृंगारके ) मनको हरनेवाली हैं । करोड़ों कामदेवोंकी उपमा भी उनके लिये तुच्छ है । उनके सुन्दर मुख शरद् [ पूर्णिमा ] के चन्द्रमाकी भी निन्दा करनेवाले ( उसे नीचा दिखानेवाले ) हैं और कमलके समान नेत्र मनको बहुत ही भाते हैं ॥१ ॥
चितवनि चारु मार मनु हरनी । भावति हृदय जाति नहिं बरनी ॥
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला । चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला ॥
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* बालकाण्ड * २३७ सुन्दर चितवन [सारे संसारके मनको हरनेवाले ] कामदेवके भी मनको हरनेवाली है । वह हृदयको बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । सुन्दर गाल हैं, कानोंमें चञ्चल (झूमते हुए) कुण्डल हैं । ठोड़ी और अधर ( ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी हैं ॥ २ ॥
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा । भृकुटी बिकट मनोहर नासा ॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं । कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं ॥
हँसी चन्द्रमाकी किरणोंका तिरस्कार करनेवाली है । भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है । [ ऊँचे ] चौड़े ललाटपर तिलक झलक रहे हैं ( दीप्तिमान् हो रहे हैं ) । [ काले घुँघराले ] बालोंको देखकर भौंरोंकी पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं ॥ ३ ॥
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं । कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं ॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ ॥
पीली चौकोनी टोपियाँ सिरोंपर सुशोभित हैं, जिनके बीच- बीचमें फूलोंकी कलियाँ बनायी ( काढ़ी ) हुई हैं । शङ्खके समान सुन्दर ( गोल ) गलेमें मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकोंकी सुन्दरताकी सीमा [को बता रही ] हैं ॥ ४ ॥
दो० – कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल ।
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल ॥ २४३ ॥
हृदयोंपर गजमुक्ताओंके सुन्दर कण्ठे और तुलसीकी मालाएँ सुशोभित हैं । उनके कंधे बैलोंके कंधेकी तरह [ ऊँचे तथा पुष्ट ] हैं, ऐंड़ ( खड़े होनेकी शान) सिंहकी - सी है और भुजाएँ विशाल एवं बलकी भण्डार हैं ॥ २४३ ॥
कटि तूनीर पीत पट बाँधें । कर सर धनुष बाम बर काँधे ॥
पीत जग्य उपबीत सुहाए । नख सिख मंजु महाछबि छाए ॥
कमरमें तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं । [ दाहिने ] हाथोंमें बाण और बायें सुन्दर कंधोंपर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत ( जनेऊ) सुशोभित हैं । नखसे लेकर शिखातक सब अंग सुन्दर हैं, उनपर महान् शोभा छायी हुई है ॥ १ ॥
देखि लोग सब भए सुखारे । एकटक लोचन चलत न तारे ॥
हरषे जनकु देखि दोउ भाई । मुनि पद कमल गहे तब जाई ॥
उन्हें देखकर सब लोग सुखी हुए । नेत्र एकटक ( निमेषशून्य ) हैं और तारे ( पुतलियाँ ) भी नहीं चलते । जनकजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए । तब उन्होंने जाकर मुनिके चरणकमल पकड़ लिये ॥२ ॥
करि बिनती निज कथा सुनाई । रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ॥
जहँ जहँ जाहिं कुअर बर दोऊ । तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ॥
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* *२३८ रामचरितमानस विनती करके अपनी कथा सुनायी और मुनिको सारी रंगभूमि ( यज्ञशाला ) दिखलायी । [ मुनिके साथ ] दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ- जहाँ जाते हैं, वहाँ -वहाँ सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं ॥ ३ ॥
निज निज रुख रामहि सबु देखा । कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा ॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ । राजाँ मुदित महासुख लहेऊ ॥
सबने रामजीको अपनी - अपनी ओर ही मुख किये हुए देखा; परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका । मुनिने राजासे कहा - रंगभूमिकी रचना बड़ी सुन्दर है । [ विश्वामित्र-जैसे नि: स्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनिसे रचनाकी प्रशंसा सुनकर ] राजा प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ४ ॥
दो० – सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल ।
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल ॥ २४४ ॥
सब मञ्चोंसे एक मञ्च अधिक सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल था । [ स्वयं ] राजाने मुनिसहित दोनों भाइयोंको उसपर बैठाया ॥२४४ ॥
प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे । जनु राकेस उदय भएँ तारे ॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं । राम चाप तोरब सक नाहीं ॥
प्रभुको देखकर सब राजा हृदयमें ऐसे हार गये ( निराश एवं उत्साहहीन हो गये ) जैसे पूर्ण चन्द्रमाके उदय होनेपर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं । [उनके तेजको देखकर ] सबके मनमें ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुषको तोड़ेंगे, इसमें सन्देह नहीं ॥ १ ॥
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला । मेलिहि सीय राम उर माला ॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई । जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई ॥
[ इधर उनके रूपको देखकर सबके मनमें यह निश्चय हो गया कि] शिवजीके विशाल धनुषको [ जो सम्भव है न टूट सके ] बिना तोड़े भी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीके ही गलेमें जयमाल डालेंगी ( अर्थात् दोनों तरहसे ही हमारी हार होगी और विजय श्रीरामचन्द्रजीके हाथ रहेगी ) । [ यों सोचकर वे कहने लगे- ] हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलो ॥२ ॥
बिहसे अपर भूप सुनि बानी । जे अबिबेक अंध अभिमानी ॥
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा । बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा ॥
दूसरे राजा, जो अविवेकसे अंधे हो रहे थे और अभिमानी थे, यह बात सुनकर बहुत हँसे । [ उन्होंने कहा— ] धनुष तोड़नेपर भी विवाह होना कठिन है ( अर्थात् सहजहीमें हम जानकीको हाथसे जाने नहीं देंगे ), फिर बिना तोड़े तो राजकुमारीको ब्याह ही कौन सकता है ॥ ३ ॥