श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 261–270
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270
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* बालकाण्ड * २५ ९ परशुरामजीका भयानक वेष देखकर सब राजा भयसे व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पितासहित अपना नाम कह - कहकर सब दण्डवत् प्रणाम करने लगे ॥१ ॥
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी । सो जानइ जनु आइ खुटानी ॥
जनक बहोरि आइ सिरु नावा । सीय बोलाइ प्रनामु करावा ॥
परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गयी । फिर जनकजीने आकर सिर नवाया और सीताजीको बुलाकर प्रणाम कराया ॥२ ॥
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं । निज समाज लै गईं सयानीं ॥
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई । पद सरोज मेले दोउ भाई ॥
परशुरामजीने सीताजीको आशीर्वाद दिया । सखियाँ हर्षित हुईं और [ वहाँ अब अधिक देर ठहरना ठीक न समझकर ] वे सयानी सखियाँ उनको अपनी मण्डलीमें ले गयीं । फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयोंको उनके चरणकमलोंपर गिराया ॥३ ॥
रामु लखनु दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा ॥
रामहि चितड़ रहे कि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन ॥
[ विश्वामित्रजीने कहा- ] ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथके पुत्र हैं । उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर परशुरामजीने आशीर्वाद दिया । कामदेवके भी मदको छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रजीके अपार रूपको देखकर उनके नेत्र थकित ( स्तम्भित) हो रहे ॥४ ॥
दो० – बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर ।
पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर ॥ २६ ९ ॥
फिर सब देखकर, जानते हुए भी अनजानकी तरह जनकजीसे पूछते हैं कि कहो, यह बड़ी भारी भीड़ कैसी है? उनके शरीरमें क्रोध छा गया ॥२६९ ॥
समाचार कहि जनक सुनाए । जेहि कारन महीप सब आए ॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चापखंड महि डारे ॥
जिस कारण सब राजा आये थे, राजा जनकने वे सब समाचार कह सुनाये । जनकके वचन सुनकर परशुरामजीने फिरकर दूसरी ओर देखा तो धनुषके टुकड़े पृथ्वीपर पड़े हुए दिखायी दिये ॥ १ ॥
अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा ॥
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू ॥
अत्यन्त क्रोधमें भरकर वे कठोर वचन बोले-रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँतक तेरा राज्य है, वहाँतककी पृथ्वी उलट दूँगा ॥ २ ॥
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* *२६० रामचरितमानस
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं । कुटिल भूप हरषे मन माहीं ॥
सुर मुनि नाग नगर नर नारी । सोचहिं सकल त्रास उर भारी ॥
राजाको अत्यन्त डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं देते । यह देखकर कुटिल राजा मनमें बड़े प्रसन्न हुए । देवता, मुनि, नाग और नगरके स्त्री-पुरुष सभी सोच करने लगे, सबके हृदयमें बड़ा भय है ॥ ३ ॥
मन पछिताति सीय महतारी । बिधि अब सँवरी बात बिगारी ॥
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध निमेष कलप सम बीता ॥
सीताजीकी माता मनमें पछता रही हैं कि हाय! विधाताने अब बनी- बनायी बात बिगाड़ दी ।
परशुरामजीका स्वभाव सुनकर सीताजीको आधा क्षण भी कल्पके समान बीतने लगा ॥४ ॥
दो० – सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु ।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु ॥ २७० ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी सब लोगोंको भयभीत देखकर और सीताजीको डरी हुई जानकर बोले— उनके हृदयमें न कुछ हर्ष था, न विषाद— ॥ २७० ॥
मासपारायण, नवाँ विश्राम
नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा ॥
आयसु काह कहिअ किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही ॥
हे नाथ! शिवजीके धनुषको तोड़नेवाला आपका कोई एक दास ही होगा । क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि रिसाकर बोले— ॥१ ॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई । अरि करनी करि करिअ लराई ॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा । सहसबाहु सम सो रिपु मोरा ॥
सेवक वह है जो सेवाका काम करे । शत्रुका काम करके तो लड़ाई ही करनी चाहिये । हे राम! सुनो, जिसने शिवजीके धनुषको तोड़ा है, वह सहस्रबाहुके समान मेरा शत्रु है ॥ २ ॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा । न त मारे जैहहिं सब राजा ॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने । बोले परसुधरहि अपमाने ॥
वह इस समाजको छोड़कर अलग हो जाय, नहीं तो सभी राजा मारे जायँगे । मुनिके वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकराये और परशुरामजीका अपमान करते हुए बोले— ॥३ ॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं । कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं ।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू ॥
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* बालकाण्ड * २६१ हे गोसाईं! लड़कपनमें हमने बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डालीं । किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया । इसी धनुषपर इतनी ममता किस कारणसे है? यह सुनकर भृगुवंशकी ध्वजास्वरूप परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे- ॥ ४ ॥
दो० –- रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार ।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार ॥ २७ ९ ॥
अरे राजपुत्र! कालके वश होनेसे तुझे बोलनेमें कुछ भी होश नहीं है । सारे संसारमें विख्यात शिवजीका यह धनुष क्या धनुहीके समान है? ॥ २७१ ॥
लखन कहा हँसि हमरें जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ॥
का छति लाभु जून धनु तोरें ॥ देखा राम नयन के भोरें ॥
लक्ष्मणजीने हँसकर कहा– हे देव! सुनिये, हमारे जानमें तो सभी धनुष एक- से ही हैं । पुराने धनुषके तोड़नेमें क्या हानि-लाभ! श्रीरामचन्द्रजीने तो इसे नवीनके धोखेसे देखा था ॥१ ॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू । मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ॥
बोले चितइ परसु की ओरा । रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ॥
फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजीका भी कोई दोष नहीं है । मुनि! आप बिना ही कारण किसलिये क्रोध करते हैं? परशुरामजी अपने फरसेकी ओर देखकर बोले- अरे दुष्ट! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना ॥ २ ॥
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही । केवल मुनि जड़ जानहि मोही ॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्व बिदित छत्रियकुलद्रोही ॥
मैं तुझे बालक जानकर नहीं मारता हूँ । अरे मूर्ख! क्या तू मुझे निरा मुनि ही जानता है? मैं बालब्रह्मचारी और अत्यन्त क्रोधी हूँ । क्षत्रियकुलका शत्रु तो विश्वभरमें विख्यात हूँ॥३ ॥
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही ॥
सहसबाहु भुज छेदनिहारा । परसु बिलोकु महीपकुमारा ॥
अपनी भुजाओंके बलसे मैंने पृथ्वीको राजाओंसे रहित कर दिया और बहुत बार उसे ब्राह्मणोंको दे डाला । हे राजकुमार! सहस्रबाहुकी भुजाओंको काटनेवाले मेरे इस फरसेको देख! ॥४ ॥
दो० - मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर ।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर ॥ २७२ ॥
अरे राजाके बालक! तू अपने माता- पिताको सोचके वश न कर । मेरा फरसा बड़ा भयानक है, यह गर्भोंके बच्चोंका भी नाश करनेवाला है ॥ २७२ ॥
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* *२६२ रामचरितमानस
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी । अहो मुनीसु महा भटमानी ॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू । चहत उड़ावन फूँकि पहारू ॥
लक्ष्मणजी हँसकर कोमल वाणीसे बोले — अहो, मुनीश्वर तो अपनेको बड़ा भारी योद्धा समझते
हैं । बार- बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हैं । फूँकसे पहाड़ उड़ाना चाहते हैं ॥१ ॥
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥
देखि कुठारु सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना ॥
यहाँ कोई कुम्हड़ेकी बतिया ( छोटा कच्चा फल ) नहीं है, जो तर्जनी ( सबसे आगेकी ) उँगलीको देखते ही मर जाती हैं । कुठार और धनुष - बाण देखकर ही मैंने कुछ अभिमानसहित कहा था ॥ २ ॥
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई ॥
भृगुवंशी समझकर और यज्ञोपवीत देखकर तो जो कुछ आप कहते हैं, उसे मैं क्रोधको रोककर सह लेता हूँ । देवता, ब्राह्मण, भगवान्के भक्त और गौ– इनपर हमारे कुलमें वीरता नहीं दिखायी जाती ॥ ३ ॥
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें ॥
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥
क्योंकि इन्हें मारनेसे पाप लगता है और इनसे हार जानेपर अपकीर्ति होती है । इसलिये आप मारें तो भी आपके पैर ही पड़ना चाहिये । आपका एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रोंके समान है । धनुष-बाण और कुठार तो आप व्यर्थ ही धारण करते हैं ॥४ ॥
दो० –जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर ।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर ॥ २७३ ॥
इन्हें ( धनुष - बाण और कुठारको) देखकर मैंने कुछ अनुचित कहा हो, तो उसे हे धीर महामुनि! क्षमा कीजिये । यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोधके साथ गम्भीर वाणी बोले— ॥ २७३ ॥
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु । कुटिल कालबस निज कुल घालकु ॥
भानु बंस राकेस कलंकू । निपट निरंकुस अबुध असंकू ॥
हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, कालके वश होकर यह अपने कुलका घातक बन रहा है । यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्रका कलङ्क है । यह बिलकुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है ॥१ ॥
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* बालकाण्ड * २६३
काल कवलु होइहि छन माहीं । कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं ॥
तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा । कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा ॥
अभी क्षणभरमें यह कालका ग्रास हो जायगा । मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है । यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो ॥ २ ॥
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा । तुम्हहि अछत को बरनै पारा ॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी । बार अनेक भाँति बहु बरनी ॥
लक्ष्मणजीने कहा- हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है? आपने अपने ही मुँहसे अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकारसे वर्णन की है ॥३ ॥
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू । जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू ॥
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा । गारी देत न पावहु सोभा ॥
इतनेपर भी सन्तोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये । क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये । आप वीरताका व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं । गाली देते शोभा नहीं पाते ॥४ ॥
दो० - सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ॥ २७४ ॥
शूरवीर तो युद्धमें करनी ( शूरवीरताका कार्य ) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जनाते । शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं ॥ २७४ ॥
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा । बार बार मोहि लागि बोलावा ॥
सुनत लखन के बचन कठोरा । परसु सुधारि धरेउ कर घोरा ॥
आप तो मानो कालको हाँक लगाकर बार- बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं । लक्ष्मणजीके कठोर वचन सुनते ही परशुरामजीने अपने भयानक |फरसेको सुधारकर हाथमें ले लिया ॥१ ॥अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू कटुबादी बालकु बधजोगू ॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब यहु मरनिहार भा साँचा ॥
[ और बोले— ] अब लोग मुझे दोष न दें । यह कडुआ बोलनेवाला बालक मारे जानेके ही योग्य है । इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरनेको ही आ गया है ॥२ ॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥
खर कुठार मैं अकरुन कोही । आगें अपराधी गुरुद्रोही ॥
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* * २६४ रामचरितमानस विश्वामित्रजीने कहा — अपराध क्षमा कीजिये । बालकोंके दोष और गुणको साधुलोग नहीं गिनते । [ परशुरामजी बोले— ] तीखी धारका कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने — ॥३ ॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें । केवल कौसिक सील तुम्हारें ॥
न त एहि काटि कुठार कठोरें । गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें ॥
उत्तर दे रहा है । इतनेपर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे शील ( प्रेम ) से । नहीं तो इसे इस कठोर कुठारसे काटकर थोड़े ही परिश्रमसे गुरुसे उऋण हो जाता ॥४ ॥
दो० – गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ ।
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ ॥ २७५ ॥
विश्वामित्रजीने हृदयमें हँसकर कहा- मुनिको हरा -ही-हरा सूझ रहा है ( अर्थात् सर्वत्र विजयी होनेके कारण ये श्रीराम- लक्ष्मणको भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं ) । किन्तु यह लोहमयी ( केवल फौलादकी बनी हुई) खाँड़ ( खाँड़ा - खड्ग ) है, ऊखकी ( रसकी ) खाँड़ नहीं है [ जो मुँहमें लेते ही गल जाय । खेद है, ] मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभावको नहीं समझ रहे हैं ॥ २७५ ॥
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा । को नहिं जान बिदित संसारा ॥
माता पितहि उरिन भए नीकें । गुर रिनु रहा सोचु बड़ जी कें ॥
लक्ष्मणजीने कहा- हे मुनि! आपके शीलको कौन नहीं जानता? वह संसारभरमें प्रसिद्ध है । आप माता - पितासे तो अच्छी तरह उऋण हो ही गये, अब गुरुका ऋण रहा, जिसका जीमें बड़ा सोच लगा है ॥१ ॥
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा ॥
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली ॥
वह मानो हमारे ही मत्थे काढ़ा था । बहुत दिन बीत गये, इससे ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा । अब किसी हिसाब करनेवालेको बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ॥२ ॥
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ॥
भृगुबर परसु देखावहु मोही । बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही ॥
लक्ष्मणजीके कडुवे वचन सुनकर परशुरामजीने कुठार सँभाला । सारी सभा हाय! हाय! करके पुकार उठी । [ लक्ष्मणजीने कहा- ] हे भृगुश्रेष्ठ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं? पर हे राजाओंके शत्रु! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ ( तरह दे रहा हूँ) ॥ ३ ॥
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* बालकाण्ड * २६५
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े । द्विज देवता घरहि के बाढ़े ॥
अनुचित कहि सब लोग पुकारे । रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे ॥
आपको कभी रणधीर बलवान् वीर नहीं मिले । हे ब्राह्मण देवता! आप घरहीमें बड़े हैं । यह सुनकर ‘ अनुचित है, अनुचित है ' कहकर सब लोग पुकार उठे । तब श्रीरघुनाथजीने इशारेसे लक्ष्मणजीको रोक दिया ॥४ ॥
दो० – लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु ।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु ॥ २७६ ॥
लक्ष्मणजीके उत्तरसे, जो आहुतिके समान थे, परशुरामजीके क्रोधरूपी अग्निको बढ़ते देखकर रघुकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रजी जलके समान ( शान्त करनेवाले ) वचन बोले —॥२७६ ॥
नाथ करहु बालक पर छोहू । सूध दूधमुख करिअ न कोहू ॥
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करत अयाना ॥
हे नाथ! बालकपर कृपा कीजिये । इस सीधे और दुधमुँहे बच्चेपर क्रोध न कीजिये । यदि यह प्रभुका ( आपका ) कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता? ॥१ ॥
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं । गुर पितु मातु मोद मन भरहीं ॥
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी ॥
बालक यदि कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, पिता और माता मनमें आनन्दसे भर जाते हैं । अतः इसे छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा कीजिये । आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ज्ञानी मुनि हैं ॥२ ॥
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने । कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने ॥
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी । राम तोर भ्राता बड़ पापी ॥
श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े । इतनेमें लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुसकरा दिये । उनको हँसते देखकर परशुरामजीके नखसे शिखातक ( सारे शरीरमें ) क्रोध छा गया । उन्होंने कहा— हे राम! तेरा भाई बड़ा पापी है ॥ ३ ॥
गौर सरीर स्याम मन माहीं । कालकूटमुख पयमुख नाहीं ॥
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही । नीचु मीचु सम देख न मोही ॥
यह शरीरसे गोरा, पर हृदयका बड़ा काला है । यह विषमुख है, दुधमुँहा नहीं । स्वभावसे ही टेढ़ा है, तेरा अनुसरण नहीं करता ( तेरे जैसा शीलवान् नहीं है ) । यह नीच मुझे कालके समान नहीं देखता ॥४ ॥
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* *२६६ रामचरितमानस
दो० – लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल ।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल ॥ २७७ ॥
लक्ष्मणजीने हँसकर कहा– हे मुनि! सुनिये, क्रोध पापका मूल है, जिसके वशमें होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभरके प्रतिकूल चलते ( सबका अहित करते) हैं ॥ २७७ ॥
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया । परिहरि कोपु करिअ अब दाया ॥
टूट चाप नहिं जुरिहि रिसाने । बैठिअ होइहिं पाय पिराने ॥
हे मुनिराज! मैं आपका दास हूँ । अब क्रोध त्यागकर दया कीजिये । टूटा हुआ धनुष क्रोध
करनेसे जुड़ नहीं जायगा । खड़े-खड़े पैर दुखने लगे होंगे, बैठ जाइये ॥ १ ॥
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई । जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई ॥
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं ॥
यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी ( कारीगर ) को बुलाकर जुड़वा दिया जाय । लक्ष्मणजीके बोलनेसे जनकजी डर जाते हैं और कहते है - बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं ॥२ ॥
थर थर काँपहिं पुर नर नारी । छोट कुमार खोट बड़ भारी ॥
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी । रिस तन जरइ होइ बल हानी ॥
जनकपुरके स्त्री- पुरुष थर- थर काँप रहे हैं [ और मन ही मन कह रहे हैं कि ] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है । लक्ष्मणजीकी निर्भय वाणी सुन- सुनकर परशुरामजीका शरीर क्रोधसे जला जा रहा है और उनके बलकी हानि हो रही है ( उनका बल घट रहा है ) ॥ ३ ॥
। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा ॥बोले रामहि देइ निहोरा ।
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें । बिष रस भरा कनक घटु जैसें ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीपर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले- तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ । यह मनका मैला और शरीरका कैसा सुन्दर है, जैसे विषके रससे भरा हुआ सोनेका घड़ा! ॥४ ॥
दो० – सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम ।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम ॥ २७८ ॥
यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे । तब श्रीरामचन्द्रजीने तिरछी नजरसे उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजीके पास चले गये ॥२७८ ॥
अति बिनीत मृदु सीतल बानी । बोले रामु जोरि जुग पानी ॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । बालक बचनु करिअ नहिं काना ॥
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* बालकाण्ड * २६७ श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनयके साथ कोमल और शीतल वाणी बोले-हे नाथ! सुनिये, आप तो स्वभावसे ही सुजान हैं । आप बालकके वचनपर कान न कीजिये ( उसे सुना-अनसुना कर दीजिये ) ॥ १ ॥
बररै बालकु एकु सुभाऊ । इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ ॥
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा । अपराधी मैंमैं नाथ तुम्हारा ॥
रैं और बालकका एक स्वभाव है । संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते । फिर उसने ( लक्ष्मणने ) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ! आपका अपराधी तो मैं हूँ ॥२ ॥
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं । मो पर करिअ दास की नाईं ॥
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई । मुनिनायक सोइ करौं उपाई ॥
अतः हे स्वामी! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दासकी तरह ( अर्थात् दास समझकर ) मुझपर कीजिये । जिस प्रकारसे शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज! बताइये, मैं वही उपाय करूँ ॥ ३ ॥
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें । अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें ॥
एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा । तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा ॥
मुनिने कहा — हे राम! क्रोध कैसे जाय; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है । इसकी गर्दनपर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या? ॥ ४ ॥
दो० – गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर ।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर ॥ २७९ ॥
मेरे जिस कुठारकी घोर करनी सुनकर राजाओंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसेके रहते मैं इस शत्रु राजपुत्रको जीवित देख रहा हूँ॥ २७९ ॥
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती । भा कुठारु कुंठित नृपघाती ॥
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ । मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ ॥
हाथ चलता नहीं, क्रोधसे छाती जली जाती है । [ हाय! ] राजाओंका घातक यह कुठार भी कुण्ठित हो गया । विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदयमें किसी समय भी कृपा कैसी? ॥ १ ॥
आजु दया दुखु दुसह सहावा । सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा ॥
बाउ कृपा मूरति अनुकूला । बोलत बचन झरत जनु फूला ॥
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* *२६८ रामचरितमानस आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है । यह सुनकर लक्ष्मणजीने मुसकराकर सिर नवाया [ और कहा— ] आपकी कृपारूपी वायु भी आपकी मूर्तिके अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं, मानो फूल झड़ रहे हैं! ॥ २ ॥
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता । क्रोध भएँ तनु राख बिधाता ॥
देखु जनक हठि बालकु एहू । कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू॥
हे मुनि! यदि कृपा करनेसे आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होनेपर तो शरीरकी रक्षा विधाता ही करेंगे । [ परशुरामजीने कहा- ] हे जनक! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरीमें घर ( निवास ) करना चाहता है ॥ ३ ॥
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा । देखत छोट खोट नृपु ढोटा ॥
बिहसे लखनु कहा मन माहीं । मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं ॥
इसको शीघ्र ही आँखोंकी ओट क्यों नहीं करते? यह राजपुत्र देखनेमें छोटा है, पर है बड़ा खोटा । लक्ष्मणजीने हँसकर मन ही मन कहा-आँख मूँद लेनेपर कहीं कोई नहीं है ॥४ ॥
दो० – परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु ।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु ॥ २८० ॥
तब परशुरामजी हृदयमें अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजीसे बोले- अरे शठ! तू शिवजीका धनुष तोड़कर उलटा हमींको ज्ञान सिखाता है! ॥ २८० ॥
बंधु कहइ कटु संमत तोरें । तू छल बिनय करसि कर जोरें ॥
करु परितोषु मोर संग्रामा । नाहिं त छाड़ कहाउब रामा ॥
तेरा यह भाई तेरी ही सम्मतिसे कटु वचन बोलता है और तू छलसे हाथ जोड़कर विनय करता है । या तो युद्धमें मेरा सन्तोष कर, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे ॥ १ ॥
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही । बंधु सहित न त मारउँ तोही ॥
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ । मन मुसुकाहिं रामु सिर नाएँ ॥
अरे शिवद्रोही! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर । नहीं तो भाईसहित तुझे मार डालूँगा । इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाये बक रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाये मन-ही - मन मुसकरा रहे हैं ॥ २ ॥
गुनह लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥
टेढ़ जानि सब बंद काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥
[ श्रीरामचन्द्रजीने मन-ही-मन कहा- ] गुनाह ( दोष ) तो लक्ष्मणका और क्रोध मुझपर करते हैं! कहीं- कहीं सीधेपनमें भी बड़ा दोष होता है । टेढ़ा जानकर सब लोग किसीकी भी वन्दना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमाको राहु भी नहीं ग्रसता ॥ ३ ॥