श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 271–280
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280
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* बालकाण्ड * २६ ९
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारू आगें यह सीसा ॥
जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी । मोहि जानिअ आपन अनुगामी ॥
श्रीरामचन्द्रजीने [ प्रकट] कहा-हे मुनीश्वर! क्रोध छोड़िये । आपके हाथमें कुठार है और मेरा यह सिर आगे है । जिस प्रकार आपका क्रोध जाय, हे स्वामी! वही कीजिये । मुझे अपना अनुचर ( दास ) जानिये ॥४ ॥
दो० – प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु ।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु ॥ २८१ ॥
स्वामी और सेवकमें युद्ध कैसा? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! क्रोधका त्याग कीजिये । आपका [ वीरोंका- सा ] वेष देखकर ही बालकने कुछ कह डाला था; वास्तवमें उसका भी कोई दोष नहीं है ॥ २८१ ॥
देखि कुठार बान धनु धारी । भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी ॥
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा । बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा ॥
आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किये देखकर और वीर समझकर बालकको क्रोध आ गया । वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं । अपने वंश ( रघुवंश) के स्वभावके अनुसार उसने उत्तर दिया ॥ १ ॥
जौं तुम्ह तेहु मुनि की नाईं । पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं ॥
छमहु चूक अनजानत केरी । चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी ॥
यदि आप मुनिकी तरह आते, तो हे स्वामी! बालक आपके चरणोंकी धूलि सिरपर रखता । अनजानेकी भूलको क्षमा कर दीजिये । ब्राह्मणोंके हृदयमें बहुत अधिक दया होनी चाहिये ॥ २ ॥
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा । कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा ॥
राम मात्र लघु नाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा ॥
हे नाथ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी? कहिये न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक! कहाँ मेरा राममात्र छोटा- सा नाम और कहाँ आपका परशुसहित बड़ा नाम ॥ ३ ॥
देव एकु गुनु धनुष हमारें । नव गुन परम पुनीत तुम्हारें ॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे ॥
हे देव! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके परम पवित्र [ शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता– ये ] नौ गुण हैं । हम तो सब प्रकारसे आपसे हारे हैं । हे विप्र! हमारे अपराधोंको क्षमा कीजिये ॥४ ॥
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* *२७० रामचरितमानस
दो० - बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम ।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहँ बंधु सम बाम ॥ २८२ ॥
श्रीरामचन्द्रजीने परशुरामजीको बार- बार ' मुनि ' और ' विप्रवर ' कहा । तब भृगुपति ( परशुरामजी ) कुपित होकर [ अथवा क्रोधकी हँसी हँसकर ] बोले- तू भी अपने भाईके समान ही टेढ़ा है ॥ २८२ ॥
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही । मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही ॥
चाप स्रुवा सर आहुति जानू । कोपु मोर अति घोर कृसानू॥
तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ । धनुषको स्रुवा, बाणको आहुति और मेरे क्रोधको अत्यन्त भयङ्कर अग्नि जान ॥१ ॥
समिधि सेन चतुरंग सुहाई । महा महीप भए पसु आई ॥
मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे । समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे ॥
चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ ( यज्ञमें जलायी जानेवाली लकड़ियाँ ) हैं । बड़े - बड़े राजा उसमें आकर बलिके पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसेसे काटकर बलि दिया है । ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किये हैं ( अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक ' स्वाहा ' शब्दके साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार- पुकारकर राजाओंकी बलि दी है ) ॥२ ॥
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें । बोलसि निदरि बिप्र के भोरें ॥
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा । अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा ॥
मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसीसे तू ब्राह्मणके धोखे मेरा निरादर करके बोल रहा है । धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमंड बहुत बढ़ गया है । ऐसा अहंकार है, मानो संसारको जीतकर खड़ा है ॥ ३ ॥
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना । मैं केहि हेतु करौं अभिमाना ॥
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—हे मुनि! विचारकर बोलिये । आपका क्रोध बहुत बड़ा है । और मेरी भूल बहुत छोटी है । पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया । मैं किस कारण अभिमान करूँ? ॥४ ॥
दो० –- जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ ॥ २८३ ॥
हे भृगुनाथ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिये, फिर संसारमें ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे मस्तक नवायें? ॥ २८३ ॥
देव दनुज भूपति भट नाना । समबल अधिक होउ बलवाना ॥
जौं रन हमहि पचारै कोऊ । लरहिं सुखेन कालु किन होऊ ॥
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* बालकाण्ड * २७१ देवता, दैत्य, राजा या और बहुत-से योद्धा, वे चाहे बलमें हमारे बराबर हों, चाहे अधिक बलवान् हों, यदि रणमें हमें कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो? ॥१ ॥
छत्रिय तनु धरि समर सकाना । कुल कलंकु तेहिं पावँर आना ॥
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिं न रन रघुबंसी ॥
क्षत्रियका शरीर धरकर जो युद्धमें डर गया, उस नीचने अपने कुलपर कलङ्क लगा दिया । मैं स्वभावसे ही कहता हूँ, कुलकी प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रणमें कालसे भी नहीं डरते ॥ २ ॥
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई । अभय होइ जो तुम्हहि डेराई ॥
सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के । उघरे पटल परसुधर मति के ॥
ब्राह्मणवंशकी ऐसी ही प्रभुता ( महिमा ) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [ अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है ] । श्रीरघुनाथजीके कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजीकी बुद्धिके परदे खुल गये ॥३ ॥
राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू ॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ । परसुराम मन बिसमय भयऊ ॥
[ परशुरामजीने कहा— ] हे राम! हे लक्ष्मीपति! धनुषको हाथमें [ अथवा लक्ष्मीपति विष्णुका धनुष ] लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा सन्देह मिट जाय । परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही चला गया । तब परशुरामजीके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ४ ॥
दो० –जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात ।
जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात ॥ २८४ ॥
तब उन्होंने श्रीरामजीका प्रभाव जाना, [जिसके कारण ] उनका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया । वे हाथ जोड़कर वचन बोले- प्रेम उनके हृदयमें समाता न था—॥२८४ ॥
जय रघुबंस बनज बन भानू । गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी । जय मद मोह कोह भ्रम हारी ॥
हे रघुकुलरूपी कमलवनके सूर्य! हे राक्षसोंके कुलरूपी घने जंगलको जलानेवाले अग्नि! आपकी जय हो! हे देवता, ब्राह्मण और गौका हित करनेवाले! आपकी जय हो । हे मद, मोह, क्रोध और भ्रमके हरनेवाले! आपकी जय हो ॥१ ॥
बिनय सील करुना गुन सागर । जयति बचन रचना अति नागर ॥
सेवक सुखद सुभग सब अंगा । जय सरीर छबि कोटि अनंगा ॥
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* *२७२ रामचरितमानस हे विनय, शील, कृपा आदि गुणोंके समुद्र और वचनोंकी रचनामें अत्यन्त चतुर! आपकी जय हो । हे सेवकोंको सुख देनेवाले, सब अङ्गोंसे सुन्दर और शरीरमें करोड़ों कामदेवोंकी छबि धारण करनेवाले! आपकी जय हो ॥२ ॥
करौं काह मुख एक प्रसंसा । जय महेस मन मानस हंसा ॥
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता ॥ छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता ॥
मैं एक मुखसे आपकी क्या प्रशंसा करूँ? हे महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस! आपकी जय हो । मैंने अनजानमें आपको बहुत-से अनुचित वचन कहे । हे क्षमाके मन्दिर दोनों भाई! मुझे क्षमा कीजिये ॥३ ॥
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥
अपभयँ कुटिल महीप डेराने । जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने ॥
हे रघुकुलके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो । ऐसा कहकर परशुरामजी तपके लिये वनको चले गये । [ यह देखकर ] दुष्ट राजालोग बिना ही कारणके ( मनःकल्पित ) डरसे ( रामचन्द्रजीसे तो परशुरामजी भी हार गये, हमने इनका अपमान किया था, अब कहीं ये उसका बदला न लें, इस व्यर्थके डरसे ) डर गये, वे कायर चुपकेसे जहाँ-तहाँ भाग गये ॥४ ॥
दो० – देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल ।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल ॥ २८५ ॥
देवताओंने नगाड़े बजाये, वे प्रभुके ऊपर फूल बरसाने लगे । जनकपुरके स्त्री - पुरुष सब हर्षित हो गये । उनका मोहमय ( अज्ञानसे उत्पन्न) शूल मिट गया ॥ २८५ ॥
अति गहगहे बाजने बाजे । सबहिं मनोहर मंगल साजे ॥
जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं । करहिं गान कल कोकिलबयनीं ॥
खूब जोरसे बाजे बजने लगे । सभीने मनोहर मङ्गल- साज सजे । सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली तथा कोयलके समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ झुंड-की- झुंड मिलकर सुन्दर गान करने लगीं ॥ १ ॥
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई । जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई ॥
बिगत त्रास भइ सीय सुखारी । जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी ॥
जनकजीके सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता; मानो जन्मका दरिद्री धनका खजाना पा गया हो! सीताजीका भय जाता रहा; वे ऐसी सुखी हुईं जैसे चन्द्रमाके उदय होनेसे चकोरकी कन्या सुखी होती है ॥२ ॥
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* बालकाण्ड * २७३
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा । प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा ॥
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं । अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं ॥
जनकजीने विश्वामित्रजीको प्रणाम किया [ और कहा- ] प्रभुहीकी कृपासे श्रीरामचन्द्रजीने धनुष तोड़ा है । दोनों भाइयोंने मुझे कृतार्थ कर दिया । हे स्वामी! अब जो उचित हो सो कहिये ॥ ३ ॥
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना । रहा बिबाहु चाप आधीना ॥
टूटतीं धनु भयउ बिबाहू । सुर नर नाग बिदित सब काहू ॥
मुनिने कहा– हे चतुर नरेश! सुनो, यों तो विवाह धनुषके अधीन था; धनुषके टूटते ही विवाह हो गया । देवता, मनुष्य और नाग सब किसीको यह मालूम है ॥४ ॥
दो० - तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु ।
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु ॥ २८६ ॥
तथापि तुम जाकर अपने कुलका जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुलके बूढ़ों और गुरुओंसे पूछकर और वेदोंमें वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो ॥ २८६ ॥
दूत अवधपुर पठवहु जाई । आनहिं नृप दसरथहि बोलाई ॥
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला । पठए दूत बोलि तेहि काला ॥
जाकर अयोध्याको दूत भेजो, जो राजा दशरथको बुला लावें । राजाने प्रसन्न होकर कहा— हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतोंको बुलाकर भेज दिया ॥१ ॥
बहुरि महाजन सकल बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिर ना ॥
हाट बाट मंदिर सुरबासा । नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा ॥
फिर सब महाजनोंको बुलाया और सबने आकर राजाको आदरपूर्वक सिर नवाया । [ राजाने कहा— ] बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगरको चारों ओरसे सजाओ ॥ २ ॥
हरषि चले निज निज गृह आए । पुनि परिचारक बोलि पठाए ॥
रचहु बिचित्र बितान बनाई । सिर धरि बचन चले सचु पाई ॥
महाजन प्रसन्न होकर चले और अपने - अपने घर आये । फिर राजाने नौकरोंको बुला भेजा [ और उन्हें आज्ञा दी कि ] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो । यह सुनकर वे सब राजाके वचन सिरपर धरकर और सुख पाकर चले ॥३ ॥
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना । जे बितान बिधि कुसल सुजाना ॥
बिधि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा । बिरचे कनक कदलि के खंभा ॥
उन्होंने अनेक कारीगरोंको बुला भेजा, जो मण्डप बनानेमें कुशल और चतुर थे । उन्होंने ब्रह्माकी वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [ पहले ] सोनेके केलेके खंभे बनाये ॥४ ॥
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* *२७४ रामचरितमानस
दो० –- हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल ।
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल ॥ २८७ ॥
हरी - हरी मणियों ( पन्ने) के पत्ते और फल बनाये तथा पद्मराग मणियों ( माणिक ) के फूल बनाये । मण्डपकी अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्माका मन भी भूल गया ॥ २८७ ॥
बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे । सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे ॥
कनक कलित अहिबेलि बनाई । लखि नहिं परइ सपरन सुहाई ॥
बाँस सब हरी - हरी मणियों ( पन्ने ) के सीधे और गाँठोंसे युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [ कि मणियोंके हैं या साधारण ] | सोनेकी सुन्दर नागबेलि ( पानकी लता ) बनायी, जो पत्तोंसहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी ॥१ ॥
तेहि के रचि पचि बंध बनाए । बिच बिच मुकुता दाम सुहाए ॥
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा । चीरि कोरि पचि रचे सरोजा ॥
उसी नागबेलिके रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन ( बाँधनेकी रस्सी ) बनाये । बीच- बीचमें मोतियोंकी सुन्दर झालरें हैं । माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नोंको चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [ लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंगके ] कमल बनाये ॥२ ॥
किए भृंग बहुरंग बिहंगा । गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा ॥
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं । मंगल द्रव्य लिएँ सब ठाढ़ीं ॥
भौंरे और बहुत रंगोंके पक्षी बनाये, जो हवाके सहारे गूँजते और कूजते थे । खंभोंपर देवताओंकी मूर्तियाँ गढ़कर निकालीं, जो सब मङ्गलद्रव्य लिये खड़ी थीं ॥३ ॥
चौकें भाँति अनेक पुराईं । सिंधुर मनिमय सहज सुहाई ॥॥
गजमुक्ताओंके सहज ही सुहावने अनेकों तरहके चौक पुराये ॥ ४ ॥
दो० - सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि ।
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥ २८८ ॥
नीलमणिको कोरकर अत्यन्त सुन्दर आमके पत्ते बनाये | सोनेके बौर ( आमके फूल ) और रेशमकी डोरीसे बँधे हुए पन्नेके बने फलोंके गुच्छे सुशोभित हैं ॥ २८८ ॥
रचे रुचिर बर बंदनिवारे । मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे ॥
मंगल कलस अनेक बनाए । ध्वज पताक पट चमर सुहाए ॥
ऐसे सुन्दर और उत्तम बंदनवार बनाये मानो कामदेवने फंदे सजाये हों । अनेकों मङ्गल-कलश और सुन्दर ध्वजा, पताका, परदे और चँवर बनाये ॥१ ॥
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* बालकाण्ड * २७५
दीप मनोहर मनिमय नाना । जाइ न बरनि बिचित्र बिताना ॥
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही । सो बरनै असि मति कबि केही ॥
जिसमें मणियोंके अनेकों सुन्दर दीपक हैं, उस विचित्र मण्डपका तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता । जिस मण्डपमें श्रीजानकीजी दुलहिन होंगी, किस कविकी ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके ॥ २ ॥
दूलहु रामु रूप गुन सागर । सो बितानु तिहुँ लोक उजागर ॥
जनक भवन कै सोभा जैसी । गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी ॥
जिस मण्डपमें रूप और गुणोंके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध होना ही चाहिये । जनकजीके महलकी जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगरके प्रत्येक घरकी दिखायी देती है ॥ ३ ॥
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी । तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी ॥
जो संपदा नीच गृह सोहा । सो बिलोकि सुरनायक मोहा ॥
उस समय जिसने तिरहुतको देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े । जनकपुरमें नीचके घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता था ॥ ४ ॥
दो० – बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु ।
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु ॥ २८ ९ ॥
जिस नगरमें साक्षात् लक्ष्मीजी कपटसे स्त्रीका सुन्दर वेष बनाकर बसती हैं, उस पुरकी शोभाका वर्णन करनेमें सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं ॥ २८ ९ ॥
पहुँचे दूत राम पुर पावन । हरषे नगर बिलोकि सुहावन ॥
भूप द्वार तिन्ह खबर जनाई । दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई ॥
जनकजीके दूत श्रीरामचन्द्रजीकी पवित्र पुरी अयोध्यामें पहुँचे । सुन्दर नगर देखकर वे हर्षित हुए । राजद्वारपर जाकर उन्होंने खबर भेजी; राजा दशरथजीने सुनकर उन्हें बुला लिया ॥१ ॥
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही । मुदित महीप आपु उठि लीन्ही ॥
बारि बिलोचन बाँचत पाती । पुलक गात आई भरि छाती ॥
दूतोंने प्रणाम करके चिट्ठी दी । प्रसन्न होकर राजाने स्वयं उठकर उसे लिया । चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रोंमें जल ( प्रेम और आनन्दके आँसू) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी ॥२ ॥
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* *२७६ रामचरितमानस
रामु लखनु उर कर बर चीठी । रहि गए कहत न खाटी मीठी ॥
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची । हरषी सभा बात सुनि साँची ॥
हृदयमें राम और लक्ष्मण हैं, हाथमें सुन्दर चिट्ठी है, राजा उसे हाथमें लिये ही रह गये, खट्टी- मीठी कुछ भी कह न सके । फिर धीरज धरकर उन्होंने पत्रिका पढ़ी । सारी सभा सच्ची बात सुनकर हर्षित हो गयी ॥ ३ ॥
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई । आए भरतु सहित हित भाई ॥
पूछत अति सनेहँ सकुचाई । तात कहाँ तें पाती आई ॥
भरतजी अपने मित्रों और भाई शत्रुघ्नके साथ जहाँ खेलते थे, वहीं समाचार पाकर वे आ गये । बहुत प्रेमसे सकुचाते हुए पूछते हैं - पिताजी! चिट्ठी कहाँसे आयी है? ॥४ ॥
दो० – कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस ।
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस ॥ २ ९ ० ॥
हमारे प्राणोंसे प्यारे दोनों भाई, कहिये सकुशल तो हैं और वे किस देशमें हैं? स्नेहसे सने ये वचन सुनकर राजाने फिरसे चिट्ठी पढ़ी ॥ २९ ० ॥
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता । अधिक सनेहु समात न गाता ॥
प्रीति पुनीत भरत कै देखी । सकल सभाँ सुख लहेउ बिसेषी ॥
चिट्ठी सुनकर दोनों भाई पुलकित हो गये । स्नेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीरमें समाता नहीं । भरतजीका पवित्र प्रेम देखकर सारी सभाने विशेष सुख पाया ॥ १ ॥
तब नृप दूत निकट बैठारे । मधुर मनोहर बचन उचारे ॥
भैआ कहहु कुसल दोउ बारे । तुम्ह नीकें निज नयन निहारे ॥
तब राजा दूतोंको पास बैठाकर मनको हरनेवाले मीठे वचन बोले- भैया! कहो, दोनों बच्चे कुशलसे तो हैं? तुमने अपनी आँखोंसे उन्हें अच्छी तरह देखा है न? ॥२ ॥
स्यामल गौर धरें धनु भाथा । बय किसोर कौसिक मुनि साथा ॥
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ । प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ ॥
साँवले और गोरे शरीरवाले वे धनुष और तरकस धारण किये रहते हैं, किशोर अवस्था है, विश्वामित्र मुनिके साथ हैं । तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ । राजा प्रेमके विशेष वश होनेसे बार- बार इस प्रकार कह ( पूछ ) रहे हैं ॥ ३ ॥
जा दिन तें मुनि गए लवाई । तब तें आजु साँचि सुधि पाई ॥
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने । सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने ॥
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* बालकाण्ड * २७७ [ भैया! ] जिस दिनसे मुनि उन्हें लिवा ले गये, तबसे आज ही हमने सच्ची खबर पायी है । कहो तो महाराज जनकने उन्हें कैसे पहचाना ये प्रिय ( प्रेमभरे ) वचन सुनकर दूत मुसकराये ॥ ४ ॥
दो० - सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ ।
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ ॥ २ ९९ ॥
[ दूतोंने कहा— ] हे राजाओंके मुकुटमणि! सुनिये, आपके समान धन्य और कोई नहीं है, जिनके राम - लक्ष्मण-जैसे पुत्र हैं, जो दोनों विश्वके विभूषण हैं ॥ २ ९९ ॥
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे । पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे ॥
जिन्ह के जस प्रताप के आगे । ससि मलीन रबि सीतल लागे ॥
आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं । वे पुरुषसिंह तीनों लोकोंके प्रकाशस्वरूप हैं । जिनके यशके आगे चन्द्रमा मलिन और प्रतापके आगे सूर्य शीतल लगता है, ॥१ ॥
तिन्ह कहँ कहि नाथ किमि चीन्हे । देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे ॥
सीय स्वयंबर भूप अनेका । समिटे सुभट एक तें एका ॥
हे नाथ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना! क्या सूर्यको हाथमें दीपक लेकर देखा जाता है? सीताजीके स्वयंवरमें अनेकों राजा और एक-से- एक बढ़कर योद्धाएकत्र हुए थे, ॥ २ ॥
संभु सरासनु काहुँ न टारा । हारे सकल बीर बरिआरा ॥
तीन लोक महँ जे भटमानी । सभ कै सकति संभु धनु भानी ॥
परन्तु शिवजीके धनुषको कोई भी नहीं हटा सका । सारे बलवान् वीर हार गये । तीनों लोकोंमें जो वीरताके अभिमानी थे, शिवजीके धनुषने सबकी शक्ति तोड़ दी ॥ ३ ॥
सकइ उठाइ सरासुर मेरू । सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू ॥
जेहिं कौतुक सिवसैलु उठावा । सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा ॥
बाणासुर, जो सुमेरुको भी उठा सकता था, वह भी हृदयमें हारकर परिक्रमा करके चला गया; और जिसने खेलसे ही कैलासको उठा लिया था, वह रावण भी उस सभामें पराजयको प्राप्त हुआ ॥४ ॥
दो० - तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल ।
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल ॥ २ ९ २ ॥
हे महाराज! सुनिये, वहाँ (जहाँ ऐसे- ऐसे योद्धा हार मान गये ) रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने बिना ही प्रयास शिवजीके धनुषको वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमलकी डंडीको तोड़ डालता है!॥ २ ९ २ ॥
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* *२७८ रामचरितमानस
सुनि सरोष भृगुनायकु आए । बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए ॥
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा । करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा ॥
धनुष टूटनेकी बात सुनकर परशुरामजी क्रोधभरे आये और उन्होंने बहुत प्रकारसे आँखें दिखलायीं । अन्तमें उन्होंने भी श्रीरामचन्द्रजीका बल देखकर उन्हें अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकारसे विनती करके वनको गमन किया ॥१ ॥
तेज निधान लखनु पुनि तैसें ॥राजन रामु अतुलबल जैसें ।
कंपहिं भूप बिलोकत जाकें । जिमि गज हरि किसोर के ताकें ॥
हे राजन्! जैसे श्रीरामचन्द्रजी अतुलनीय बली हैं, वैसे ही तेजनिधान फिर लक्ष्मणजी भी हैं, जिनके देखनेमात्रसे राजालोग ऐसे काँप उठते थे, जैसे हाथी सिंहके बच्चेके ताकनेसे काँप उठते हैं ॥२ ॥
देव देखि तव बालक दोऊ । अब न आँखि तर आवत कोऊ ॥
दूत बचन रचना प्रिय लागी । प्रेम प्रताप बीर रस पागी ॥
हे देव! आपके दोनों बालकोंको देखनेके बाद अब आँखोंके नीचे कोई आता ही नहीं ( हमारी दृष्टिपर कोई चढ़ता ही नहीं ) । प्रेम, प्रताप और वीर-रसमें पगी हुई दूतोंकी वचनरचना सबको बहुत प्रिय लगी ॥ ३ ॥
सभा समेत राउ अनुरागे । दूतन्ह देन निछावरि लागे ॥
कहि अनीति ते मूदहिं काना । धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना ॥
सभासहित राजा प्रेममें मग्न हो गये और दूतोंको निछावर देने लगे । [ उन्हें निछावर देते देखकर ] यह नीतिविरुद्ध है, ऐसा कहकर दूत अपने हाथोंसे कान मूँदने लगे । धर्मको विचारकर ( उनका धर्मयुक्त बर्ताव देखकर) सभीने सुख माना ॥४ ॥
दो० – तब उठि भूप बसिष्ट कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ ।
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ ॥ २ ९ ३ ॥
तब राजाने उठकर वसिष्ठजीके पास जाकर उन्हें पत्रिका दी और आदरपूर्वक दूतोंको बुलाकर सारी कथा गुरुजीको सुना दी ॥२ ९ ३ ॥
सुन बोले गुर अति सुखु पाई । पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई ॥॥
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं । जद्यपि ताहि कामना नाहीं ॥
सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले– पुण्यात्मा पुरुषके लिये पृथ्वी सुखोंसे छायी हुई है । जैसे नदियाँ समुद्रमें जाती हैं, यद्यपि समुद्रको नदीकी कामना नहीं होती ॥१ ॥