श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 301–310

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310

पृष्ठ 301

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* बालकाण्ड * २९९ सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी ( चन्द्रमाके समान मुखवाली ) और सभी मृगलोचनी ( हरिणकी -सी आँखोंवाली ) हैं और सभी अपने शरीरकी शोभासे रतिके गर्वको छुड़ानेवाली हैं । रंग-रंगकी सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीरपर सब आभूषण सजे हुए हैं ॥१ ॥

सकल सुमंगल अंग बनाएँ । करहिं गान कलकंठि लजाएँ ॥

कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं I। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं ॥

समस्त अङ्गोंको सुन्दर मङ्गल पदार्थोंसे सजाये हुए वे कोयलको भी लजाती हुई [ मधुर स्वरसे ] गान कर रही हैं । कंगन, करधनी और नूपुर बज रहे हैं । स्त्रियोंकी चाल देखकर कामदेवके हाथी भी लजा जाते हैं ॥ २ ॥

बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा । नभ अरु नगर सुमंगलचारा ॥

सची सारदा रमा भवानी । जे सुरतिय सुचि सहज सयानी ॥

अनेक प्रकारके बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानोंमें सुन्दर मङ्गलाचार हो रहे हैं । शची ( इन्द्राणी ), सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और जो स्वभावसे ही पवित्र और सयानी देवाङ्गनाएँ थीं, ॥ ३ ॥

कपट नारि बर बेष बनाई I। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई ॥

करहिं गान कल मंगल बानीं । हरष बिबस सब काहुँ न जानीं ॥

वे सब कपटसे सुन्दर स्त्रीका वेष बनाकर रनिवासमें जा मिलीं और मनोहर वाणीसे मङ्गलगान करने लगीं । सब कोई हर्षके विशेष वश थे, अतः किसीने उन्हें पहचाना नहीं ॥४ ॥

छं० – को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्म बर परिछन चली ।

कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली ॥

आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई ।

अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई ॥

कौन किसे जाने - पहिचाने! आनन्दके वश हुई सब दूलह बने हुए ब्रह्मका परछन करने चलीं । मनोहर गान हो रहा है । मधुर मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है । आनन्दकन्द दूलहको देखकर सब स्त्रियाँ हृदयमें हर्षित हुईं । उनके कमल- सरीखे नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल उमड़ आया और सुन्दर अङ्गोंमें पुलकावली छा गयी ।

दो० -– जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु ।

सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु ॥ ३ ९ ८ ॥

श्रीरामचन्द्रजीका वरवेष देखकर सीताजीकी माता सुनयनाजीके मनमें जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पोंमें भी नहीं कह सकते [अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पोंमें भी नहीं कह सकते ] ॥ ३१८ ॥

पृष्ठ 302

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* *३०० रामचरितमानस

नयन नीरु हटि मंगल जानी । परिछनि करहिं मुदित मन रानी ॥

बेद बिहित अरु कुल आचारू । कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू ॥

मङ्गल - अवसर जानकर नेत्रोंके जलको रोके हुए रानी प्रसन्न मनसे परछन कर रही हैं । वेदोंमें कहे हुए तथा कुलाचारके अनुसार सभी व्यवहार रानीने भलीभाँति किये ॥१ ॥

पंच सबद धुनि मंगल गाना । पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना ॥

करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा । राम गमनु मंडप तब कीन्हा ॥

पञ्चशब्द ( तन्त्री, ताल, झाँझ, नगारा और तुरही - इन पाँच प्रकारके बाजोंके शब्द ), पञ्चध्वनि ( वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शङ्खध्वनि और हुलूध्वनि ) और मङ्गलगान हो रहे हैं । नाना प्रकारके वस्त्रोंके पाँवड़े पड़ रहे हैं । उन्होंने ( रानीने ) आरती करके अर्घ्य दिया, तब श्रीरामजीने मण्डपमें गमन किया ॥२ ॥

दसरथु सहित समाज बिराजे । बिभव बिलोकि लोकपति लाजे ॥

समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला । सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला ॥

दशरथजी अपनी मण्डलीसहित विराजमान हुए । उनके वैभवको देखकर लोकपाल भी लजा गये । समय- समयपर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्ति- पाठ करते हैं ॥३ ॥

नभ अरु नगर कोलाहल होई । आपनि पर कछु सुनइ न कोई ॥

एहि बिधि रामु मंडपहिं आए । अरघु देइ आसन बैठाए ॥

आकाश और नगरमें शोर मच रहा है । अपनी- परायी कोई कुछ भी नहीं सुनता । इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी मण्डपमें आये और अर्घ्य देकर आसनपर बैठाये गये ॥४ ॥

छं० – बैठारि आसन आरती कर निरखि बरु सुखु पावहीं ।

मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं ॥

ब्रह्मादि सुरबर बि बेष बनाइ कौतुक देखहीं ।

अवलोकिरघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं ॥

आसनपर बैठाकर, आरती करके दूलहको देखकर स्त्रियाँ सुख पा रही हैं । वे ढेर- के - ढेर मणि, वस्त्र और गहने निछावर करके मङ्गल गा रही हैं । ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मणका वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं । वे रघुकुलरूपी कमलके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर अपना जीवन सफल जान रहे हैं ।

पृष्ठ 303

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* बालकाण्ड * ३०१

दो० – नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ ।

मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ ॥ ३१ ९ ॥

नाई, बारी, भाट और नट श्रीरामचन्द्रजीकी निछावर पाकर आनन्दित हो सिर नवाकर आशिष देते हैं; उनके हृदयमें हर्ष समाता नहीं है ॥ ३१ ९ ॥

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं । करि बैदिक लौकिक सब रीतीं ॥

मिलत महा दोउ राज बिराजे । उपमा खोजि खोजि कबि लाजे ॥

वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेमसे मिले । दोनों महाराज मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिये उपमा खोज-खोजकर लजा गये ॥ १ ॥

लही न कतहुँ हारि हियँ मानी । इन्ह सम एइ उपमा उर आनी ॥

सामध देखि देव अनुरागे । सुमन बरषि जसु गावन लागे ॥

जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदयमें हार मानकर उन्होंने मनमें यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं । समधियोंका मिलाप या परस्पर सम्बन्ध देखकर देवता अनुरक्त हो गये और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे ॥२ ॥

जग बिरंचि उपजावा जब तें । देखे सुने ब्याह बहु तब तें ॥

सकल भाँति सम साजु समाजू । सम समधी देखे हम आजू॥

[ वे कहने लगे— ] जबसे ब्रह्माजीने जगत्‌को उत्पन्न किया, तबसे हमने बहुत विवाह देखे - सुने; परन्तु सब प्रकारसे समान साज-समाज और बराबरीके ( पूर्ण समतायुक्त) समधी तो आज ही देखे ॥ ३ ॥

देव गिरा सुनि सुंदर साँची । प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची ॥

देत पाँवड़े अरघु सुहाए । सादर जनकु मंडपहिं ल्याए ॥

देवताओंकी सुन्दर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गयी । सुन्दर पाँवड़े और अर्घ्य देते हुए जनकजी दशरथजीको आदरपूर्वक मण्डपमें ले आये ॥४ ॥

छं० - मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे ।

निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे ॥

कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही ।

कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही ॥

मण्डपको देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरतासे मुनियोंके मन भी हरे गये ( मोहित हो गये ) । सुजान जनकजीने अपने हाथोंसे ला-लाकर सबके लिये सिंहासन रखे । उन्होंने अपने कुलके इष्टदेवताके समान वसिष्ठजीकी पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया । विश्वामित्रजीकी पूजा करते समयकी परम प्रीतिकी रीति तो कहते ही नहीं बनती ।

पृष्ठ 304

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* *३०२ रामचरितमानस

दो० –- बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस ।

दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस ॥ ३२० ॥

राजाने वामदेव आदि ऋषियोंकी प्रसन्न मनसे पूजा की । सभीको दिव्य आसन दिये और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया ॥ ३२० ॥

बहरि कीन्हि कोसलपति पूजा । जानि ईस सम भाउ न दूजा ॥

कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई । कहि निज भाग्य बिभव बहुताई ॥

फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजीकी पूजा उन्हें ईश ( महादेवजी ) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था । तदनन्तर [ उनके सम्बन्धसे ] अपने भाग्य और वैभवके विस्तारकी सराहना करके हाथ जोड़कर विनती और बड़ाई की ॥ १ ॥

पूजे भूपति सकल बराती । समधी सम सादर सब भाँती ॥

आसन उचित दिए सब काहू । कहौं काह मुख एक उछाहू ॥

राजा जनकजीने सब बरातियोंका समधी दशरथजीके समान ही सब प्रकारसे आदरपूर्वक पूजन किया और सब किसीको उचित आसन दिये । मैं एक मुखसे उस उत्साहका क्या वर्णन करूँ॥ २ ॥

सकल बरात जनक सनमानी । दान मान बिनती बर बानी ॥

बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ । जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ ॥

राजा जनकने दान, मान-सम्मान, विनय और उत्तम वाणीसे सारी बारातका सम्मान किया ।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य जो श्रीरघुनाथजीका प्रभाव जानते हैं, ॥३ ॥

कपट बिप्र बर बेष बनाएँ । कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ ॥

पूजे जनक देव सम जानें । दिए सुआसन बिनु पहिचानें ॥

वे कपटसे ब्राह्मणोंका सुन्दर वेष बनाये बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे । जनकजीने उनको देवताओंके समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहचाने भी उन्हें सुन्दर आसन दिये ॥ ४ ॥

छं० — पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई ।

आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई ॥

सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए ।

अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए ॥

पृष्ठ 305

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* बालकाण्ड * ३०३ कौन किसको जाने- पहिचाने! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है । आनन्दकन्द दूलहको देखकर दोनों ओर आनन्दमयी स्थिति हो रही है । सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामचन्द्रजीने देवताओंको पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिये । प्रभुका शील-स्वभाव देखकर देवगण मनमें बहुत आनन्दित हुए ।

दो० - रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर ।

करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर ॥ ३२१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी छबिको सभीके सुन्दर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनन्द कम नहीं है ( अर्थात् बहुत है ) ॥ ३२१ ॥

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए । सादर सतानंदु सुनि आए ।

बेगि कुरि अब आनहु जाई । चले मुदित मुनि आयसु पाई ॥

समय देखकर वसिष्ठजीने शतानन्दजीको आदरपूर्वक बुलाया । वे सुनकर आदरके साथ आये । वसिष्ठजीने कहा— अब जाकर राजकुमारीको शीघ्र ले आइये । मुनिकी आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले ॥१ ॥

रानी सुनि उपरोहित बानी । प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी ॥

बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाईं । करि कुलरीति सुमंगल गाईं ॥

बुद्धिमती रानी पुरोहितकी वाणी सुनकर सखियोंसमेत बड़ी प्रसन्न हुईं । ब्राह्मणोंकी स्त्रियों और कुलकी बूढ़ी स्त्रियोंको बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुन्दर मङ्गलगीत गाये ॥२ ॥

नारि बेष जे सुर बर बामा । सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा ॥

तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं । बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं ॥

श्रेष्ठ देवाङ्गनाएँ, जो सुन्दर मनुष्य- स्त्रियोंके वेषमें हैं, सभी स्वभावसे ही सुन्दरी और श्यामा ( सोलह वर्षकी अवस्थावाली ) हैं । उनको देखकर रनिवासकी स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचानके ही वे सबको प्राणोंसे भी प्यारी हो रही हैं ॥ ३ ॥

बार बार सनमानहिं रानी । उमा रमा सारद सम जानी ॥

सीय सँवारि समाजु बनाई । मुदितमुदित मंडपहिंमंडपहिं चलीं लवाई ॥

उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वतीके समान जानकर रानी बार- बार उनका सम्मान करती हैं । [ रनिवासकी स्त्रियाँ और सखियाँ ] सीताजीका शृंगार करके, मण्डली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें मण्डपमें लिवा चलीं ॥४ ॥

छं० – चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं ।

नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं ॥

कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं ।

मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं ॥

पृष्ठ 306

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* *३०४ रामचरितमानस सुन्दर मङ्गलका साज सजकर [रनिवासकी ] स्त्रियाँ और सखियाँ आदरसहित सीताजीको लिवा चलीं । सभी सुन्दरियाँ सोलहों श्रृंगार किये हुए मतवाले हाथियोंकी चालसे चलनेवाली हैं । उनके मनोहर गानको सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेवकी कोयलें भी लजा जाती हैं । पायजेब, पैंजनी और सुन्दर कंकण तालकी गतिपर बड़े सुन्दर बज रहे हैं ।

दो० – सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय ।

छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय ॥ ३२२ ॥

सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रियोंके समूहमें इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छबिरूपी ललनाओंके समूहके बीच साक्षात् परम मनोहर शोभारूपी स्त्री सुशोभित हो ॥३२२ ॥

सिय सुंदरता बरनि न जाई । लघु मति बहुत मनोहरताई ॥

आवत दीखि बरातिन्ह सीता । रूप रासि सब भाँति पुनीता ॥

सीताजीकी सुन्दरताका वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी है और मनोहरता बहुत बड़ी है । रूपकी राशि और सब प्रकारसे पवित्र सीताजीको बरातियोंने आते देखा ॥ १ ॥

सबहि मनहिं मन किए प्रनामा ॥ देखि राम भए पूरनकामा ॥

हरषे दसरथ सुतन्ह समेता । कहि न जाइ उर आनँदु जेता ॥

सभीने उन्हें मन - ही - मन प्रणाम किया । श्रीरामचन्द्रजीको देखकर तो सभी पूर्णकाम ( कृतकृत्य ) हो गये । राजा दशरथजी पुत्रोंसहित हर्षित हुए । उनके हृदयमें जितना आनन्द था, वह कहा नहीं जा सकता ॥ २ ॥

सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला । मुनि असीस धुनि मंगल मूला ॥

गान निसान कोलाहलु भारी । प्रेम प्रमोद मगन नर नारी ॥

देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं । मङ्गलोंकी मूल मुनियोंके आशीर्वादोंकी ध्वनि हो रही है । गानों और नगाड़ोंके शब्दसे बड़ा शोर मच रहा है । सभी नर-नारी प्रेम और आनन्दमें मग्न हैं ॥ ३ ॥

एहि बिधि सीय मंडपहिं आई । प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई ॥

तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू । दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू ॥

इस प्रकार सीताजी मण्डपमें आयीं । मुनिराज बहुत ही आनन्दित होकर शान्तिपाठ पढ़ रहे हैं । उस अवसरकी सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओंने किये ॥४ ॥

छं० - आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावीं ।

सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुख पावहीं ॥

मधुपर्क मंगल द्रव्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं । भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं ।

पृष्ठ 307

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* बालकाण्ड * ३०५ कुलाचार करके गुरुजी प्रसन्न होकर गौरीजी, गणेशजी और ब्राह्मणोंकी पूजा करा रहे हैं [ अथवा ब्राह्मणोंके द्वारा गौरी और गणेशकी पूजा करवा रहे हैं ] । देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यन्त सुख पा रहे हैं । मधुपर्क आदि जिस किसी भी माङ्गलिक पदार्थकी मुनि जिस समय भी मनमें चाहमात्र करते हैं, सेवकगण उसी समय सोनेकी परातोंमें और कलशोंमें भरकर उन पदार्थोंको लिये तैयार रहते हैं ॥ १ ॥

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो । एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासन दियो ।

सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहु न लखि परै ।

मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै ॥

स्वयं सूर्यदेव प्रेमसहित अपने कुलकी सब रीतियाँ बता देते हैं और वे सब आदरपूर्वक की जा रही हैं । इस प्रकार देवताओंकी पूजा कराके मुनियोंने सीताजीको सुंदर सिंहासन दिया । श्रीसीताजी और श्रीरामजीका आपसमें एक- दूसरेको देखना तथा उनका परस्परका प्रेम किसीको लख नहीं पड़ रहा है । जो बात श्रेष्ठ मन, बुद्धि और वाणीसे भी परे है, उसे कवि क्योंकर प्रकट करे? ॥२ ॥

दो० - होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं ।

fayde र बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं ॥ ३२३ ॥

हवनके समय अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े ही सुखसे आहुति ग्रहण करते हैं और सारे वेद ब्राह्मणका वेष धरकर विवाहकी विधियाँ बताये देते हैं ॥ ३२३ ॥

जनक पाटमहिषी जग जानी । सीय मातु किमि जाड़ बखानी ॥

सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई । सब समेटि बिधि रची बनाई ॥

जनकजीकी जगद्विख्यात पटरानी और सीताजीकी माताका बखान तो हो ही कैसे सकता है । सुयश, सुकृत ( पुण्य ), सुख और सुन्दरता सबको बटोरकर विधाताने उन्हें सँवारकर तैयार किया है ॥१ ॥

समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं । सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं ॥

जनक बाम दिसि सोह सुनयना । हिमगिरि संग बनी जनु मयना ॥

समय जानकर श्रेष्ठ मुनियोंने उनको बुलवाया । यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदरपूर्वक ले आयीं । सुनयनाजी ( जनकजीकी पटरानी ) जनकजीकी बायीं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचलके साथ मैनाजी शोभित हों ॥ २ ॥

पृष्ठ 308

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*:*३०६ रामचरितमानस

कनक कलस मनि कोपर रूरे । सुचि सुगंध मंगल जल पूरे ॥

निज कर मुदित रायँ अरु रानी । धरे राम के आगें आनी ॥

पवित्र, सुगन्धित और मङ्गल जलसे भरे सोनेके कलश और मणियोंकी सुन्दर परातें राजा और रानीने आनन्दित होकर अपने हाथोंसे लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रखीं ॥३ ॥

पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी । गगन सुमन झरि अवसरु जानी ॥

बरु बिलोकि दंपति अनुरागे । पाय पुनीत पखारन लागे ॥

मुनि मङ्गलवाणीसे वेद पढ़ रहे हैं । सुअवसर जानकर आकाशसे फूलोंकी झड़ी लग गयी है ।

दूलहको देखकर राजा- रानी प्रेममग्न हो गये और उनके पवित्र चरणोंको पखारने लगे ॥४ ॥

छं० – लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली ।

नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली ॥

जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं ।

जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं ॥

वे श्रीरामजीके चरणकमलोंको पखारने लगे, प्रेमसे उनके शरीरमें पुलकावली छा रही है । आकाश और नगरमें होनेवाली गान, नगाड़े और जय- जयकारकी ध्वनि मानो चारों दिशाओंमें उमड़ चली । जो चरणकमल कामदेवके शत्रु श्रीशिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करनेसे मनमें निर्मलता आ जाती है और कलियुगके सारे पाप भाग जाते हैं, ॥१ ॥

जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई ।

मकरंद जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई ॥

करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं ।

ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं ॥

जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनिकी स्त्री अहल्याने, जो पापमयी थी, परमगति पायी, जिन चरणकमलोंका मकरन्दरस ( गङ्गाजी ) शिवजीके मस्तकपर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रताकी सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मनको भौंरा बनाकर जिन चरणकमलोंका सेवन करके मनोवाञ्छित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणोंको भाग्यके पात्र ( बड़भागी ) जनकजी धो रहे हैं; यह देखकर सब जय -जयकार कर रहे हैं ॥२ ॥

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करें ।

भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरें ॥

पृष्ठ 309

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* बालकाण्ड * ३०७

सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो ।

करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो ॥

दोनों कुलोंके गुरु वर और कन्याकी हथेलियोंको मिलाकर शाखोच्चार करने लगे । पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्दमें भर गये । सुखके मूल दूलहको देखकर राजा - रानीका शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनन्दसे उमँग उठा । राजाओंके अलङ्कारस्वरूप महाराज जनकजीने लोक और वेदकी रीतिको करके कन्यादान किया ॥३ ॥

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई ।

तिमिजनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई ॥

क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं ।

करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं ॥

जैसे हिमवान्ने शिवजीको पार्वतीजी और सागरने भगवान् विष्णुको लक्ष्मीजी दी थीं, वैसे ही जनकजीने श्रीरामचन्द्रजीको सीताजी समर्पित कीं, जिससे विश्वमें सुन्दर नवीन कीर्ति छा गयी । विदेह ( जनकजी ) कैसे विनती करें! उस साँवली मूर्तिने तो उन्हें सचमुच विदेह ( देहकी सुध- बुधसे रहित ) ही कर दिया । विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गयी और भाँवरें होने लगीं ॥४ ॥

दो० - जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान ।

सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान ॥ ३२४ ॥

जयध्वनि, वन्दीध्वनि, वेदध्वनि, मङ्गलगान और नगाड़ोंकी ध्वनि सुनकर चतुर देवगण हर्षित हो रहे हैं और कल्पवृक्षके फूलोंको बरसा रहे हैं ॥ ३२४ ॥

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं । नयन लाभु सब सादर लेहीं ॥

जाइ न बरनि मनोहर जोरी I। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी ॥

वर और कन्या सुन्दर भाँवरें दे रहे हैं । सब लोग आदरपूर्वक [ उन्हें देखकर ] नेत्रोंका परम लाभ ले रहे हैं । मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा कहूँ वही थोड़ी होगी ॥ १ ॥

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं । जगमगात मनि खंभन माहीं ॥

मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा । देखत राम बिआहु अनूपा ॥

श्रीरामजी और श्रीसीताजीकी सुन्दर परछाहीं मणियोंके खम्भोंमें जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत- से रूप धारण करके श्रीरामजीके अनुपम विवाहको देख रहे हैं ॥२ ॥

दरस लालसा सकुच न थोरी । प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी ॥

भए मगन सब देखनिहारे । जनक समान अपान बिसारे ॥

पृष्ठ 310

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* *३०८ रामचरितमानस उन्हें ( कामदेव और रतिको ) दर्शनकी लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं ( अर्थात् बहुत हैं ); इसीलिये वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं । सब देखनेवाले आनन्दमग्न हो गये और जनकजीकी भाँति सभी अपनी सुध भूल गये ॥३ ॥

प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरीं । नेगसहित सब रीति निबेरीं ॥

राम सीय सिर सेंदुर देहीं । सोभा कहि न जाति बिधि केहीं ॥

मुनियोंने आनन्दपूर्वक भाँवरें फिरायीं और नेगसहित सब रीतियोंको पूरा किया । श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके सिरमें सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती ॥४॥

अरुन पराग जलजु भरि नीकें I। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें ॥

बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन । बरु दुलहिनि बैठे एक आसन ॥

मानो कमलको लाल परागसे अच्छी तरह भरकर अमृतके लोभसे साँप चन्द्रमाको भूषित कर रहा है । [ यहाँ श्रीरामके हाथको कमलकी, सेंदुरको परागकी, श्रीरामकी श्याम भुजाको साँपकी और सीताजीके मुखको चन्द्रमाकी उपमा दी गयी है ] फिर वसिष्ठजीने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसनपर बैठे ॥५ ॥

छं० – बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए ।

तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए ॥

भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा ।

केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा ॥

श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसनपर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मनमें बहुत आनन्दित हुए । अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्षमें नये फल [ आये ] देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है । चौदहों भुवनोंमें उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजीका विवाह हो गया । जीभ एक है और यह मङ्गल महान् है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है! ॥१ ॥

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै ।

मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लई हँकारि कै ॥

कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई ।

सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई ॥

तब वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर जनकजीने विवाहका सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी— इन तीनों राजकुमारियोंको बुला लिया । कुशध्वजकी बड़ी कन्या माण्डवीजीको, जो गुण, शील, सुख और शोभाकी रूप ही थीं, राजा जनकने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजीको ब्याह दिया ॥२ ॥