श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 291–300
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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* बालकाण्ड * २८ ९
जानी सियँ बरात पुर आई । कछु निज महिमा प्रगटि जनाई ॥
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई । भूप पहुनईपहुनई करन पठाई ॥
सीताजीने बारात जनकपुरमें आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलायी । हृदयमें स्मरणकर सब सिद्धियोंको बुलाया और उन्हें राजा दशरथजीकी मेहमानी करनेके लिये भेजा ॥ ४ ॥
दो० - सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास ।
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास ॥ ३०६ ॥
सीताजीकी आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुरीके भोग- विलासको लिये हुए गयीं ॥ ३०६ ॥
निज निज बास बिलोकि बराती । सुरसुख सकल सुलभ सब भाँती ॥
बिभव भेद कछु कोउ न जाना । सकल जनक कर करहिं बखाना ॥
बरातियोंने अपने - अपने ठहरनेके स्थान देखे तो वहाँ देवताओंके सब सुखोंको सब प्रकारसे सुलभ पाया । इस ऐश्वर्यका कुछ भी भेद कोई जान न सका । सब जनकजीकी बड़ाई कर रहे हैं ॥ १ ॥
सिय महिमा रघुनायक जानी । हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी ॥
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई । हृदयँ न अति आनंदु अमाई ॥
श्रीरघुनाथजी यह सब सीताजीकी महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदयमें हर्षित हुए । पिता दशरथजीके आनेका समाचार सुनकर दोनों भाइयोंके हृदयमें महान् आनन्द समाता न था ॥२ ॥
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं । पितु दरसन लालचु मन माहीं ॥
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी । उपजा उर संतोषु बिसेषी ॥
संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजीसे कह नहीं सकते थे; परन्तु मनमें पिताजीके दर्शनोंकी लालसा थी । विश्वामित्रजीने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदयमें बहुत सन्तोष उत्पन्न हुआ ॥३ ॥
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए । पुलक अंग अंबक जल छाए ॥
चले जहाँ दसरथु जनवासे । मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे ॥
प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयोंको हृदयसे लगा लिया । उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भर आया । वे उस जनवासेको चले, जहाँ दशरथजी थे । मानो सरोवर प्यासेकी ओर लक्ष्य करके चला हो ॥४ ॥
दो० – भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत ।
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत ॥ ३०७ ॥
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* *२९ ० रामचरितमानस जब राजा दशरथजीने पुत्रोंसहित मुनिको आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुखके समुद्रमें थाह-सी लेते हुए चले ॥३०७ ॥
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा । बार बार पद रज धरि सीसा ॥
कौसिक राउ लिए उर लाई । कहि असीस पूछी कुसलाई ॥
पृथ्वीपति दशरथजीने मुनिकी चरणधूलिको बारंबार सिरपर चढ़ाकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया । विश्वामित्रजीने राजाको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी ॥ १ ॥
पुनि दंडवत करत दोउ भाई । देखि नृपति उर सुखु न समाई ॥
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे । मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे ॥
फिर दोनों भाइयोंको दण्डवत् प्रणाम करते देखकर राजाके हृदयमें सुख समाया नहीं । पुत्रोंको [ उठाकर ] हृदयसे लगाकर उन्होंने अपने [ वियोगजनित] दुःसह दुःखको मिटाया । मानो मृतक शरीरको प्राण मिल गये हों ॥ २ ॥
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए । प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए ॥
बिप्र बूंद बंदे दुहुँ भाईं । मनभावती असीसें पाईं ॥
फिर उन्होंने वसिष्ठजीके चरणोंमें सिर नवाया । मुनिश्रेष्ठने प्रेमके आनन्दमें उन्हें हृदयसे लगा लिया । दोनों भाइयोंने सब ब्राह्मणोंकी वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये ॥३ ॥
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा । लिए उठाइ लाइ उर रामा ॥
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता । मिले प्रेम परिपूरित गाता ॥
भरतजीने छोटे भाई शत्रुघ्नसहित श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम किया । श्रीरामजीने उन्हें उठाकर हृदयसे लगा लिया । लक्ष्मणजी दोनों भाइयोंको देखकर हर्षित हुए और प्रेमसे परिपूर्ण हुए शरीरसे उनसे मिले ॥ ४ ॥
दो० - पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत ।
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत ॥ ३०८ ॥
तदनन्तर परम कृपालु और विनयी श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जातिके लोगों, याचकों, मन्त्रियों और मित्रों - सभीसे यथायोग्य मिले ॥३०८ ॥
रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति बखानी ॥
नृप समीप सोहहिं सुत चारी । जनु धन धरमादिक तनुधारी ॥
श्रीरामचन्द्रजीको देखकर बारात शीतल हुई ( रामके वियोगमें सबके हृदयमें जो आग जल रही थी, वह शान्त हो गयी ) । प्रीतिकी रीतिका बखान नहीं हो सकता । राजाके पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किये हुए हों॥१ ॥
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* बालकाण्ड * २९ १
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी । मुदित नगर नर नारि बिसेषी ॥
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना । नाकनटीं नाचहिं करि गाना ॥
पुत्रोंसहित दशरथजीको देखकर नगरके स्त्री- पुरुष बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं । [ आकाशमें] देवता फूलोंकी वर्षा करके नगाड़े बजा रहे हैं और अप्सराएँ गा- गाकर नाच रही हैं ॥२ ॥
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन । मागध सूत बिदुष बंदीजन ॥
सहित बरात राउ सनमाना । आयसु मागि फिरे अगवाना ॥
अगवानीमें आये हुए शतानन्दजी, अन्य ब्राह्मण, मन्त्रीगण, मागध, सूत, विद्वान् और भाटोंने
बारातसहित राजा दशरथजीका आदर-सत्कार किया । फिर आज्ञा लेकर वे वापस लौटे ॥३ ॥
प्रथम बरात लगन तें आई । तातें पुर प्रमोदु अधिकाई ॥
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं । बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं ॥
बारात लग्नके दिनसे पहले आ गयी है, इससे जनकपुरमें अधिक आनन्द छा रहा है । सब लोग ब्रह्मानन्द प्राप्त कर रहे हैं और विधातासे मनाकर कहते हैं कि दिन-रात बढ़ जायँ ( बड़े हो जायँ) ॥४ ॥
दो० - रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज ।
जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज ॥ ३० ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी सुन्दरताकी सीमा हैं और दोनों राजा पुण्यकी सीमा हैं, जहाँ -तहाँ जनकपुरवासी स्त्री-पुरुषोंके समूह इकट्ठे हो-होकर यही कह रहे हैं ॥३० ९ ॥
जनक सुकृत मूरति बैदेही । दसरथ सुकृत रामु धरें देही ॥
इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे । काहुँ न इन्ह समान फल लाधे ॥
जनकजीके सुकृत ( पुण्य ) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजीके सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं । इन [दोनों राजाओं ] के समान किसीने शिवजीकी आराधना नहीं की; और न इनके समान किसीने फल ही पाये ॥ १ ॥
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं । है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं ॥
हम सब सकल सुकृत कै रासी । भए जग जनमि जनकपुर बासी ॥
इनके समान जगत्में न कोई हुआ, न कहीं है, न होनेका ही है । हम सब भी सम्पूर्ण पुण्योंकी राशि हैं, जो जगत्में जन्म लेकर जनकपुरके निवासी हुए, ॥ २ ॥
जिन्ह जानकी राम छबि देखी । को सुकृती हम सरिस बिसेषी ॥
पुनि देखब रघुबीर बिआहू I। लेब भली बिधि लोचन लाहू ॥
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* *२९ २ रामचरितमानस और जिन्होंने जानकीजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखी है । हमारे- सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा! और अब हम श्रीरघुनाथजीका विवाह देखेंगे और भलीभाँति नेत्रोंका लाभ लेंगे ॥ ३ ॥
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं । एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं ॥
बड़ें भाग बिधि बात बनाई । नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई ॥
कोयलके समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ आपसमें कहती हैं कि हे सुन्दर नेत्रोंवाली! इस विवाहमें बड़ा लाभ है । बड़े भाग्यसे विधाताने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रोंके अतिथि हुआ करेंगे ॥ ४ ॥
दो० - बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय ।
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय ॥ ३१० ॥
जनकजी स्नेहवश बार- बार सीताजीको बुलावेंगे, और करोड़ों कामदेवोंके समान सुन्दर दोनों भाई सीताजीको लेने ( विदा कराने ) आया करेंगे ॥ ३१० ॥
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई । प्रिय न काहि अस सासुर माई ॥
तब तब राम लखनहि निहारी । होइहहिं सब पुर लोग सुखारी ॥
तब उनकी अनेकों प्रकारसे पहुनाई होगी । सखी! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब-तब हम सब नगरनिवासी श्रीराम- लक्ष्मणको देख-देखकर सुखी होंगे ॥१ ॥
सखि जस राम लखन कर जोटा । तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा ॥
स्याम गौर सब अंग सुहाए । ते सब कहहिं देखि जे आए ॥
हे सखी! जैसा श्रीराम-लक्ष्मणका जोड़ा है, वैसे ही दो कुमार राजाके साथ और भी हैं । वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्णके हैं । उनके भी सब अङ्ग बहुत सुन्दर हैं । जो लोग उन्हें देख आये हैं, वे सब यही कहते हैं ॥ २ ॥
कहा एक मैं आजु निहारे । जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे ॥
भरतु रामही की अनुहारी । सहसा लखि न सकहिं नर नारी ॥
एकने कहा- मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुन्दर हैं, मानो ब्रह्माजीने उन्हें अपने हाथों सँवारा है । भरत तो श्रीरामचन्द्रजीकी ही शकल-सूरतके हैं । स्त्री -पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते ॥ ३ ॥
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा । नख सिख ते सब अंग अनूपा ॥
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं । उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं ॥
लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनोंका एक रूप है । दोनोंके नखसे शिखातक सभी अङ्ग अनुपम हैं । मनको बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुखसे उनका वर्णन नहीं हो सकता । उनकी उपमाके योग्य तीनों लोकोंमें कोई नहीं है ॥४ ॥
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* बालकाण्ड * २९ ३
छं० - उपमान कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं ।
बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं ।
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं ।
ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं ॥
दास तुलसी कहता है कवि और कोविद ( विद्वान्) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है । बल, विनय, विद्या, शील और शोभाके समुद्र इनके समान ये ही हैं । जनकपुरकी सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाताको यह वचन ( विनती ) सुनाती हैं कि चारों भाइयोंका विवाह इसी नगरमें हो और हम सब सुन्दर मङ्गल गावें ।
सो० — कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन ।
सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ ॥ ३११ ॥
नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भरकर पुलकित शरीरसे स्त्रियाँ आपसमें कह रही हैं कि हे सखी! दोनों राजा पुण्यके समुद्र हैं, त्रिपुरारि शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे ॥ ३११ ॥
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं । आनँद उमगि उमगि उर भरहीं ॥
जे नृप सीय स्वयंबर आए । देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए ॥
इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदयको उमँग- उमँगकर ( उत्साहपूर्वक ) आनन्दसे भर रही हैं । सीताजीके स्वयंवरमें जो राजा आये थे, उन्होंने भी चारों भाइयोंको देखकर सुख पाया ॥ १ ॥
कहत राम जसु बिसद बिसाला । निज निज भवन गए महिपाला ॥
गए बीति कछु दिन एहि भाँती । प्रमुदित पुरजन सकल बराती ॥
श्रीरामचन्द्रजीका निर्मल और महान् यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गये । इस प्रकार कुछ दिन बीत गये । जनकपुरनिवासी और बराती सभी बड़े आनन्दित हैं ॥२ ॥
मंगल मूल लगन दिनु आवा । हिम रितु अगहनु मासु सुहावा ॥
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू । लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू ॥
मङ्गलोंका मूल लग्नका दिन आ गया । हेमन्त ऋतु और सुहावना अगहनका महीना था । ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे । लग्न ( मुहूर्त ) शोधकर ब्रह्माजीने उसपर विचार किया, ॥ ३ ॥
पठै दीन्हि नारद सन सोई । गनी जनक के गनकन्ह जोई ॥
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता । कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता ॥
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* *२ ९४ रामचरितमानस और उस ( लग्नपत्रिका) को नारदजीके हाथ [जनकजीके यहाँ ] भेज दिया । जनकजीके ज्योतिषियोंने भी वही गणना कर रखी थी । जब सब लोगोंने यह बात सुनी तब वे कहने लगे- यहाँके ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं ॥ ४ ॥
दो० - धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल ।
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल ॥ ३१२ ॥
निर्मल और सभी सुन्दर मङ्गलोंकी मूल गोधूलिकी पवित्र वेला आ गयी और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणोंने जनकजीसे कहा ॥३१२ ॥
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा । अब बिलंब कर कारनु काहा ॥
सतानंद तब सचिव बोलाए । मंगल सकल साजि सब ल्याए ॥
तब राजा जनकने पुरोहित शतानन्दजीसे कहा कि अब देरका क्या कारण है । तब शतानन्दजीने
मन्त्रियोंको बुलाया । वे सब मङ्गलका सामान सजाकर ले आये ॥१ ॥
संख निसान पनव बहु बाजे । मंगल कलस सगुन सुभ साजे ॥
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता । करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता ॥
शङ्ख, नगाड़े, ढोल और बहुत- से बाजे बजने लगे तथा मङ्गल- कलश और शुभ शकुनकी वस्तुएँ ( दधि, दूर्वा आदि ) सजायी गयीं । सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेदकी ध्वनि कर रहे हैं ॥ २ ॥
लेन चले सादर एहि भाँती । गए जहाँ जनवास बराती ॥
कोसलपति कर देखि समाजू । अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥
सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारातको लेने चले और जहाँ बरातियोंका जनवासा था, वहाँ गये । अवधपति दशरथजीका समाज ( वैभव ) देखकर उनको देवराज इन्द्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे ॥ ३ ॥
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ । यह सुनि परा निसानहिं घाऊ ॥
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा । चले संग मुनि साधु समाजा ॥
[ उन्होंने जाकर विनती की- ] समय हो गया, अब पधारिये । यह सुनते ही नगाड़ोंपर चोट पड़ी । गुरु वसिष्ठजीसे पूछकर और कुलकी सब रीतियोंको करके राजा दशरथजी मुनियों और साधुओंके समाजको साथ लेकर चले ॥४ ॥
दो० – भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि ।
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि ॥ ३१३ ॥
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* बालकाण्ड * २ ९५ अवधनरेश दशरथजीका भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्माजी आदि देवता हजारों मुखोंसे उसकी सराहना करने लगे ॥३१३ ॥
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना । बरषहिं सुमन बजाइ निसाना ॥
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा । चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा ॥
देवगण सुन्दर मङ्गलका अवसर जानकर, नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं । शिवजी, ब्रह्माजी आदि देववृन्द यूथ ( टोलियाँ) बना- बनाकर विमानोंपर जा चढ़े ॥ १ ॥
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू । चले बिलोकन राम बिआहू ॥
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे । निज निज लोक सबहिं लघु लागे ॥
और प्रेमसे पुलकित- शरीर हो तथा हृदयमें उत्साह भरकर श्रीरामचन्द्रजीका विवाह देखने चले जनकपुरको देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गये कि उन सबको अपने - अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे ॥२ ॥
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना । रचना सकल अलौकिक नाना ॥
नगर नारि नर रूप निधाना । सुघर सुधरम सुसील सुजाना ॥
विचित्र मण्डपको तथा नाना प्रकारकी सब अलौकिक रचनाओंको वे चकित होकर देख रहे हैं । नगरके स्त्री- पुरुष रूपके भण्डार, सुघड़, श्रेष्ठ धर्मात्मा, सुशील और सुजान हैं ॥ ३ ॥
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं । भए नखत जनु बिधु उजिआरीं ॥
बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी । निज करनी कछु कतहुँ न देखी ॥
उन्हें देखकर सब देवता और देवाङ्गनाएँ ऐसे प्रभाहीन हो गये जैसे चन्द्रमाके उजियालेमें तारागण फीके पड़ जाते हैं । ब्रह्माजीको विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी (रचना ) तो कहीं देखी ही नहीं ॥ ४ ॥
दो० - सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु ।
हृदयँ बिचार धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु ॥ ३१४ ॥
तब शिवजीने सब देवताओंको समझाया कि तुमलोग आश्चर्यमें मत भूलो । हृदयमें धीरज धरकर विचार तो करो कि यह [भगवान्की महामहिमामयी निजशक्ति] श्रीसीताजीका और [ अखिल ब्रह्माण्डोंके परम ईश्वर साक्षात् भगवान्] श्रीरामचन्द्रजीका विवाह है ॥३१४ ॥
जिन्ह कर नाम लेत जग माहीं । सकल अमंगल मूल नसाहीं ॥
करतल होहिं पदारथ चारी । तेइ सिय रामु कहेउ कामारी ॥
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*• *२ ९ ६ रामचरितमानस जिनका नाम लेते ही जगत्में सारे अमङ्गलोंकी जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) मुट्ठीमें आ जाते हैं, ये वही [ जगत्के माता- पिता ] श्रीसीतारामजी हैं; कामके शत्रु शिवजीने ऐसा कहा ॥१ ॥
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा । पुनि आगें बर बसह चलावा ॥
देवन्ह देखे दसरथु जाता । महामोद मन पुलकित गाता ॥
इस प्रकार शिवजीने देवताओंको समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल नन्दीश्वरको आगे बढ़ाया । देवताओंने देखा कि दशरथजी मनमें बड़े ही प्रसन्न और शरीरसे पुलकित हुए चले जा रहे हैं ॥ २ ॥
साधु समाज संग महिदेवा । जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा ॥
सोहत साथ सुभग सुत चारी । जनु अपबरग सकल तनुधारी ॥
उनके साथ [ परम हर्षयुक्त ] साधुओं और ब्राह्मणोंकी मण्डली ऐसी शोभा दे रही है, मानो समस्त सुख शरीर धारण करके उनकी सेवा कर रहे हों । चारों सुन्दर पुत्र साथमें ऐसे सुशोभित हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष ( सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य ) शरीर धारण किये हुए हों ॥३ ॥
मरकत कनक बरन बर जोरी । देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी ॥
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे । नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे ॥
मरकतमणि और सुवर्णके रंगकी सुन्दर जोड़ियोंको देखकर देवताओंको कम प्रीति नहीं हुई ( अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई) । फिर श्रीरामचन्द्रजीको देखकर वे हृदयमें ( अत्यन्त ) हर्षित हुए और राजाकी सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये ॥४ ॥
दो० – राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि ।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि ॥ ३१५ ॥
नखसे शिखातक श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर रूपको बार-बार देखते हुए पार्वतीजीसहित श्रीशिवजीका शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र [ प्रेमाश्रुओंके ] जलसे भर गये ॥३१५ ॥
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा । तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा ॥
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए । मंगल सब सब भाँति सुहाए ॥
रामजीका मोरके कण्ठकी-सी कान्तिवाला [ हरिताभ ] श्याम शरीर है । बिजलीका अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर [ पीत ] रंगके वस्त्र हैं । सब मङ्गलरूप और सब प्रकारसे सुन्दर भाँति - भाँतिके विवाहके आभूषण शरीरपर सजाये हुए हैं ॥१ ॥
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन । नयन नवल राजीव लजावन ॥
सकल अलौकिक सुंदरताई । कहि न जाइ मनहीं मन भाई ॥
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* बालकाण्ड * २ ९७ उनका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमाके निर्मल चन्द्रमाके समान और [ मनोहर ] नेत्र नवीन कमलको लजानेवाले हैं । सारी सुन्दरता अलौकिक है । ( मायाकी बनी नहीं है, दिव्य सच्चिदानन्दमयी है ) वह कही नहीं जा सकती, मन-ही-मन बहुत प्रिय लगती है ॥२ ॥
बंधु मनोहर सोहहिं संगा । जात नचावत चपल तुरंगा ॥
राजकुअर बर बाजि देखावहिं । बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं ॥
साथमें मनोहर भाई शोभित हैं, जो चञ्चल घोड़ोंको नचाते हुए चले जा रहे हैं । राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ोंको ( उनकी चालको ) दिखला रहे हैं और वंशकी प्रशंसा करनेवाले ( मागध- भाट ) विरुदावली सुना रहे हैं ॥ ३ ॥
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे । गति बिलोकि खगनायकु लाजे ॥
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा । बाजि बेषु जनु काम बनावा ॥
जिस घोड़ेपर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी [तेज ] चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं । उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकारसे सुन्दर है । मानो कामदेवने ही घोड़ेका वेष धारण कर लिया हो ॥ ४ ॥
छं० - जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई ।
आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई ।
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे ।
किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे ॥
मानो श्रीरामचन्द्रजीके लिये कामदेव घोड़ेका वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है । वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चालसे समस्त लोकोंको मोहित कर रहा है । सुन्दर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योतिसे जगमगा रहा है । उसकी सुन्दर घुँघरू लगी ललित लगामको देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं ।
दो० - प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव ।
भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव ॥३१६ ॥
प्रभुकी इच्छामें अपने मनको लीन किये चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है । मानो तारागण तथा बिजलीसे अलङ्कृत मेघ सुन्दर मोरको नचा रहा हो ॥३१६ ॥
जेहिं बर बाजि रामु असवारा । तेहि सारदउ न बरनै पारा ॥
संकरु राम रूप अनुरागे । नयन पंचदस अति प्रिय लागे ॥
जिस श्रेष्ठ घोड़ेपर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं । शङ्करजी श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे ॥ १ ॥
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२९८ * रामचरितमानस *
हरि हित सहित रामु जब जोहे । रमा समेत रमापति मोहे ॥
निरख राम छबि बिधि हरषाने । आठ नयन जानि पछिताने ॥
भगवान् विष्णुने जब प्रेमसहित श्रीरामको देखा, तब वे [ रमणीयताकी मूर्ति ] श्रीलक्ष्मीजीके पति श्रीलक्ष्मीजीसहित मोहित हो गये । श्रीरामचन्द्रजीकी शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे ॥ २ ॥
सुर सेनप उर बहुत उछाहू । बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥
रामहि चितव सुरेस सुजाना । गौतम श्रापु परम हित माना ॥
देवताओंके सेनापति स्वामिकार्तिकके हृदयमें बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजीसे ड्योढ़े अर्थात् बारह नेत्रोंसे रामदर्शनका सुन्दर लाभ उठा रहे हैं । सुजान इन्द्र [अपने हजार नेत्रोंसे ] श्रीरामचन्द्रजीको देख रहे हैं और गौतमजीके शापको अपने लिये परम हितकर मान रहे हैं ॥ ३ ॥
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं । आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं ॥
मुदित देवगन रामहि देखी । नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी ॥
सभी देवता देवराज इन्द्रसे ईर्ष्या कर रहे हैं [और कह रहे हैं ] कि आज इन्द्रके समान भाग्यवान् दूसरा कोई नहीं है । श्रीरामचन्द्रजीको देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओंके समाजमें विशेष हर्ष छा रहा है ॥४ ॥
छं० – अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी ।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी ॥
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं ।
रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं ॥
दोनों ओरसे राजसमाजमें अत्यन्त हर्ष है और बड़े जोरसे नगाड़े बज रहे हैं । देवता प्रसन्न होकर और ‘ रघुकुलमणि श्रीरामकी जय हो, जय हो, जय हो ' कहकर फूल बरसा रहे हैं । इस प्रकार बारातको आती हुई जानकर बहुत प्रकारके बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियोंको बुलाकर परछनके लिये मङ्गलद्रव्य सजाने लगीं ।
दो० - सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि ।
चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि ॥ ३१७ ॥
अनेक प्रकारसे आरती सजकर और समस्त मङ्गलद्रव्योंको यथायोग्य सजाकर गजगामिनी ( हाथीकी- सी चालवाली ) उत्तम स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक परछनके लिये चलीं ॥ ३१७ ॥
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि । सब निज तन छबि रति मदु मोचनि ॥
पहिरें बरन बरन बर चीरा । सकल बिभूषन सजें सरीरा ॥