श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 321–330
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330
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* बालकाण्ड * ३१ ९
सास, ससुर और गुरुकी सेवा करना । पतिका रुख देखकर उनकी आज्ञाका पालन करना ।
सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेहके वश कोमल वाणीसे स्त्रियोंके धर्म सिखलाती हैं ॥३ ॥
सादर सकल कुअँरि समुझाईं । रानिन्ह बार बार उर लाईं ॥
बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं । कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं ॥
आदरके साथ सब पुत्रियोंको [ स्त्रियोंके धर्म ] समझाकर रानियोंने बार- बार उन्हें हृदयसे लगाया । माताएँ फिर - फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्माने स्त्रीजातिको क्यों रचा ॥४ ॥
दो० – तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु ।
चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु ॥ ३३४ ॥
उसी समय सूर्यवंशके पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयोंसहित प्रसन्न होकर विदा करानेके लिये जनकजीके महलको चले ॥ ३३४ ॥
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए । नगर नारि नर देखन धाए ॥
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू । कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥
स्वभावसे ही सुन्दर चारों भाइयोंको देखनेके लिये नगरके स्त्री- पुरुष दौड़े । कोई कहता है—
आज ये जाना चाहते हैं । विदेहने विदाईका सब सामान तैयार कर लिया है ॥ १ ॥
लेहु नयन भरि रूप निहारी । प्रिय पाहुने भूप सुत चारी ॥
को जानै केहिं सुकृत सयानी । नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी ॥
राजाके चारों पुत्र, इन प्यारे मेहमानोंके [ मनोहर ] रूपको नेत्र भरकर देख लो । हे सयानी! कौन जाने, किस पुण्यसे विधाताने इन्हें यहाँ लाकर हमारे नेत्रोंका अतिथि किया है ॥२ ॥
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा । सुरतरु लहै जनम कर भूखा ॥
पाव नारकी हरिपदु जैसें । इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें ॥
मरनेवाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्मका भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरकमें रहनेवाला ( या नरकके योग्य ) जीव जैसे भगवान्के परमपदको प्राप्त हो जाय, हमारे लिये इनके दर्शन वैसे ही हैं ॥ ३ ॥
निरखि राम सोभा उर धरहू । निज मन फनि मूरति मनि करहू ॥
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता । गए कुअँर सब राज निकेता ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी शोभाको निरखकर हृदयमें धर लो । अपने मनको साँप और इनकी मूर्तिको मणि बना लो । इस प्रकार सबको नेत्रोंका फल देते हुए सब राजकुमार राजमहलमें गये ॥ ४ ॥
१- रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु ।
करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु ॥ ३३५ ॥
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* *३२० रामचरितमानस रूपके समुद्र सब भाइयोंको देखकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा । सासुएँ महान् प्रसन्न मनसे निछावर और आरती करती हैं ॥ ३३५ ॥
देखि राम छबि अति अनुरागीं । प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं ॥
रही न लाज प्रीति उर छाई । सहज सनेहु बरनि किमि जाई ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखकर वे प्रेममें अत्यन्त मग्न हो गयीं और प्रेमके विशेष वश होकर बार- बार चरणों लगीं । हृदयमें प्रीति छा गयी, इससे लज्जा नहीं रह गयी । उनके स्वाभाविक स्नेहका वर्णन किस तरह किया जा सकता है ॥१ ॥
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए । छरस असन अति हेतु जेवाँए ॥
बोले रामु सुअवसरु जानी । सील सनेह सकुचमय बानी ॥
उन्होंने भाइयोंसहित श्रीरामजीको उबटन करके स्नान कराया और बड़े प्रेमसे षट्स भोजन कराया । सुअवसर जानकर श्रीरामचन्द्रजी शील, स्नेह और संकोचभरी वाणी बोले- ॥ २ ॥
राउ अवधपुर चहत सिधाए । बिदा होन हम इहाँ पठाए ॥
मातु मुदित मन आयसु देहू । बालक जानि करब नित नेहू ॥
महाराज अयोध्यापुरीको चलना चाहते हैं, उन्होंने हमें विदा होनेके लिये यहाँ भेजा है । हे माता! प्रसन्न मनसे आज्ञा दीजिये और हमें अपने बालक जानकर सदा स्नेह बनाये रखियेगा ॥३ ॥
सुनत बचन बिलखेड रनिवासू । बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू॥
हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही । पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही ॥
इन वचनोंको सुनते ही रनिवास उदास हो गया । सासुएँ प्रेमवश बोल नहीं सकतीं । उन्होंने सब कुमारियोंको हृदयसे लगा लिया और उनके पतियोंको सौंपकर बहुत विनती की ॥ ४ ॥
छं० – करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै ।
बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै ॥
परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी ।
तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी ॥
विनती करके उन्होंने सीताजीको श्रीरामचन्द्रजीको समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार- बार कहा — हे तात! हे सुजान! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति ( हाल ) मालूम है । परिवारको, पुरवासियोंको, मुझको और राजाको सीता प्राणोंके समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा । हे तुलसी स्वामी! इसके शील और स्नेहको देखकर इसे अपनी दासी करके मानियेगा ।
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* बालकाण्ड * ३२१
सो० – तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय ।
जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन ॥ ३३६ ॥
तुम पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो ( तुम्हें प्रेम प्यारा है ) । हे राम! तुम भक्तोंके गुणोंको ग्रहण करनेवाले, दोषोंको नाश करनेवाले और दयाके धाम हो ॥३३६ ॥
अस कहि रही चरन गहि रानी । प्रेम पंक जनु गिरा समानी ॥
सुनि सनेहसानी बर बानी । बहुबिधि राम सासु सनमानी ॥
ऐसा कहकर रानी चरणोंको पकड़कर[ चुप ] रह गयीं । मानो उनकी वाणी प्रेमरूपी दलदलमें समा गयी हो । स्नेहसे सनी हुई श्रेष्ठ वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने सासका बहुत प्रकारसे सम्मान किया ॥१ ॥
राम बिदा मागत कर जोरी । कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी ॥
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई । भाइन्ह सहित चले रघुराई ॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड़कर विदा माँगते हुए बार-बार प्रणाम किया । आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयोंसहित श्रीरघुनाथजी चले ॥२ ॥
मंजु मधुर मूरति उर आनी । भईं सनेह सिथिल सब रानी ॥
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारीं । बार बार भेटहिं महतारीं ॥
श्रीरामजीकी सुन्दर मधुर मूर्तिको हृदयमें लाकर सब रानियाँ स्नेहसे शिथिल हो गयीं । फिर धीरज धारण करके कुमारियोंको बुलाकर माताएँ बारंबार उन्हें [ गले लगाकर ] भेंटने लगीं ॥३ ॥
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी । बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी ॥
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई । बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई ॥
पुत्रियोंको पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं । परस्परमें कुछ थोड़ी प्रीति नहीं बढ़ी ( अर्थात् बहुत प्रीति बढ़ी) । बार-बार मिलती हुई माताओंको सखियोंने अलग कर दिया । जैसे हालकी ब्यायी हुई गायको कोई उसके बालक बछड़े [ या बछिया ] से अलग कर दे ॥४ ॥
दो० – प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु ।
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु ॥ ३३७ ॥
सब स्त्री-पुरुष और सखियोंसहित सारा रनिवास प्रेमके विशेष वश हो रहा है । [ऐसा लगता है ] मानो जनकपुरमें करुणा और विरहने डेरा डाल दिया है ॥ ३३७ ॥
सुक सारिका जानकी ज्याए । कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए ॥
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही । सुनि धीरजु परिहरइ न केही ॥
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* *३२२ रामचरितमानस जानकीने जिन तोता और मैनाको पाल-पोसकर बड़ा किया था और सोनेके पिंजड़ोंमें रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर कह रहे हैं- वैदेही कहाँ हैं । उनके ऐसे वचनोंको सुनकर धीरज किसको नहीं त्याग देगा ( अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा ) ॥ १ ॥
भए बिकल खग मृग एहि भाँती । मनुज दसा कैसें कहि जाती ॥
बंधु समेत जनकु तब आए । प्रेम उमगि लोचन जल छाए ॥
जब पक्षी और पशुतक इस तरह विकल हो गये, तब मनुष्योंकी दशा कैसे कही जा सकती है! तब भाईसहित जनकजी वहाँ आये । प्रेमसे उमड़कर उनके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया ॥२ ॥
सीय बिलोकि धीरता भागी । रहे कहावत परम बिरागी ॥
लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी । मिटी महामरजाद ग्यान की ॥
वे परम वैराग्यवान् कहलाते थे; पर सीताजीको देखकर उनका भी धीरज भाग गया । राजाने जानकीजीको हृदयसे लगा लिया । [ प्रेमके प्रभावसे ] ज्ञानकी महान् मर्यादा मिट गयी ( ज्ञानका बाँध टूट गया ) ॥३ ॥
समुझावत सब सचिव सयाने । कीन्ह बिचारु न अवसर जाने ॥
बारहिं बार सुता उर लाईं । सजि सुंदर पालकीं मगाईं ॥
सब बुद्धिमान् मन्त्री उन्हें समझाते हैं । तब राजाने विषाद करनेका समय न जानकर विचार किया । बारंबार पुत्रियोंको हृदयसे लगाकर सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवायी ॥४ ॥
दो० – प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस ।
कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस ॥ ३३८ ॥
सारा परिवार प्रेममें विवश है । राजाने सुन्दर मुहूर्त जानकर सिद्धिसहित गणेशजीका स्मरण करके कन्याओंको पालकियोंपर चढ़ाया ॥ ३३८ ॥
बहुबिधि भूप सुता समुझाईं । नारिधरमु कुलरीति सिखाईं ॥
दासीं दास दिए बहुतेरे । सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे ॥
राजाने पुत्रियोंको बहुत प्रकारसे समझाया और उन्हें स्त्रियोंका धर्म और कुलकी रीति सिखायी । बहुत - से दासी- दास दिये, जो सीताजीके प्रिय और विश्वासपात्र सेवक थे ॥१ ॥
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी । होहिं सगुन सुभ मंगल रासी ॥
भूसुर सचिव समेत समाजा । संग चले पहुँचावन राजा ॥
सीताजीके चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो गये । मङ्गलकी राशि शुभ शकुन हो रहे हैं ।
ब्राह्मण और मन्त्रियोंके समाजसहित राजा जनकजी उन्हें पहुँचानेके लिये साथ चले ॥२ ॥
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* बालकाण्ड * ३२३
समय बिलोकि बाजने बाजे । रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे ॥
दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे । दान मान परिपूरन कीन्हे ॥
समय देखकर बाजे बजने लगे । बरातियोंने रथ, हाथी और घोड़े सजाये । दशरथजीने सब ब्राह्मणोंको बुला लिया और उन्हें दान और सम्मानसे परिपूर्ण कर दिया ॥३ ॥
चरन सरोज धूरि धरि सीसा । मुदित महीपति पाइ असीसा ॥
सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना । मंगलमूल सगुन भए नाना ॥
उनके चरणकमलोंकी धूलि सिरपर धरकर और आशिष पाकर राजा आनन्दित हुए और गणेशजीका स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया । मङ्गलोंके मूल अनेकों शकुन हुए ॥४ ॥
दो० – सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान ।
चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान ॥ ३३ ९ ॥
देवता हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं और अप्सराएँ गान कर रही हैं । अवधपति दशरथजी नगाड़े बजाकर आनन्दपूर्वक अयोध्यापुरीको चले ॥ ३३ ९ ॥
नृप करि बिनय महाजन फेरे । सादर सकल मागने टेरे ॥
भूषन बसन बाजि गज दीन्हे । प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे ॥
राजा दशरथजीने विनती करके प्रतिष्ठित जनोंको लौटाया और आदरके साथ सब मंगनोंको बुलवाया । उनको गहने -कपड़े, घोड़े -हाथी दिये और प्रेमसे पुष्ट करके सबको सम्पन्न अर्थात् बलयुक्त कर दिया ॥१ ॥
बार बार बिरिदावलि भाषी । फिरे सकल रामहि उर राखी ॥
बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं । जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं ॥
वे सब बारंबार विरुदावली ( कुलकीर्ति ) बखानकर और श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर लौटे । कोसलाधीश दशरथजी बार-बार लौटनेको कहते हैं, परन्तु जनकजी प्रेमवश लौटना नहीं चाहते ॥ २ ॥
पुनि कह भूपति बचन सुहाए । फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए ॥
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े । प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े ॥
दशरथजीने फिर सुहावने वचन कहे -हे राजन्! बहुत दूर आ गये, अब लौटिये । फिर राजा दशरथजी रथसे उतरकर खड़े हो गये । उनके नेत्रोंमें प्रेमका प्रवाह बढ़ आया ( प्रेमाश्रुओंकी धारा बह चली ) ॥३ ॥
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* *३२४ रामचरितमानस
तब बिदेह बोले कर जोरी । बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी ॥
करौं कवन बिधि बिनय बनाई । महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई ॥
तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्नेहरूपी अमृतमें डुबोकर वचन बोले- मैं किस तरह बनाकर
( किन शब्दोंमें ) विनती करूँ । हे महाराज! आपने मुझे बड़ी बड़ाई दी है ॥४ ॥
दो० - कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति ।
मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति ॥ ३४० ॥
अयोध्यानाथ दशरथजीने अपने स्वजन समधीका सब प्रकारसे सम्मान किया । उनके आपसके मिलनेमें अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदयमें समाती न थी ॥ ३४० ॥
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा । आसिरबादु सबहि सन पावा ॥
सादर पुनि भेंटे जामाता । रूप सील गुन निधि सब भ्राता ॥
जनकजीने मुनिमण्डलीको सिर नवाया और सभीसे आशीर्वाद पाया । फिर आदरके साथ वे रूप, शील और गुणोंके निधान सब भाइयोंसे- अपने दामादोंसे मिले;॥ १ ॥
जोरि पंकरुह पानि सुहाए । बोले बचन प्रेम जनु जाए ॥
राम करौं केहि भाँति प्रसंसा । मुनि महेस मन मानस हंसा ॥
और सुन्दर कमलके समान हाथोंको जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेमसे ही जन्मे हों । हे रामजी! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूँ! आप मुनियों और महादेवजीके मनरूपी मानसरोवरके हंस हैं ॥२ ॥
करहिं जोग जोगी जेहि लागी । कोहु मोहु ममता मदु त्यागी ॥
ब्यापकु ब्रह्म अलखु अबिनासी । चिदानंदु निरगुन गुनरासी ॥
योगी लोग जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मदको त्यागकर योगसाधन करते हैं, जो सर्वव्यापक, ब्रह्म, अव्यक्त, अविनाशी, चिदानन्द, निर्गुण और गुणोंकी राशि हैं, ॥ ३ ॥
मन समेत जेहि जान न बानी । तरकि न सकहिं सकल अनुमानी ॥
महिमा निगम नेति कहि कहई । जो तिहुँ काल एकरस रहई ॥
जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्कना नहीं कर सकते; जिनकी महिमाको वेद ' नेति' कहकर वर्णन करता है और जो [सच्चिदानन्द ] तीनों कालोंमें एकरस ( सर्वदा और सर्वथा निर्विकार) रहते हैं; ॥ ४ ॥
दो० – नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल ।
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल ॥ ३४१ ॥
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* बालकाण्ड * ३२५ वे ही समस्त सुखोंके मूल [ आप ] मेरे नेत्रोंके विषय हुए । ईश्वरके अनुकूल होनेपर जगत्में जीवको सब लाभ- ही-लाभ है ॥ ३४१ ॥
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई । निज जन जानि लीन्ह अपनाई ॥
होहिं सहस दस सारद सेषा । करहिं कलप कोटिक भरि लेखा ॥
आपने मुझे सभी प्रकारसे बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया । यदि दस हजार सरस्वती और शेष हों और करोड़ों कल्पोंतक गणना करते रहें ॥ १ ॥
मोर भाग्य राउर गुन गाथा । कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा ॥
मैं कछु कहउँ एक बल मोरें । तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें ॥
तो भी हे रघुनाथजी! सुनिये, मेरे सौभाग्य और आपके गुणोंकी कथा कहकर समाप्त नहीं की जा सकती । जो कुछ कह रहा हूँ, वह अपने इस एक ही बलपर कि आप अत्यन्त थोड़े प्रेमसे प्रसन्न हो जाते हैं ॥२ ॥
बार बार मागउँ कर जोरें । मनु परिहरै चरन जनि भोरें ॥
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे । पूरनकाम रामु परितोषे ॥
मैं बार - बार हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणोंको न छोड़े । जनकजीके श्रेष्ठ वचनोंको सुनकर, जो मानो प्रेमसे पुष्ट किये हुए थे, पूर्णकाम श्रीरामचन्द्रजी सन्तुष्ट हुए ॥३ ॥
करि बर बिनय ससुर सनमाने । पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने ॥
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही । मिलि सप्रेम पुनि आसिष दीन्ही ॥
उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथजी, गुरु विश्वामित्रजी और कुलगुरु वसिष्ठजीके समान जानकर ससुर जनकजीका सम्मान किया । फिर जनकजीने भरतजीसे विनती की और प्रेमके साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया ॥४ ॥
दो० – मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस ।
भए परसपर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस ॥ ३४२ ॥
फिर राजाने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजीसे मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया । वे परस्पर प्रेमके वश होकर बार- बार आपसमें सिर नवाने लगे ॥३४२ ॥
बार बार करि बिनय बड़ाई । रघुपति चले संग सब भाई ॥
जनक गहे कौसिक पद जाई । चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई ॥
जनकजीकी बार - बार विनती और बड़ाई करके श्रीरघुनाथजी सब भाइयोंके साथ चले I। जनकजीने जाकर विश्वामित्रजीके चरण पकड़ लिये और उनके चरणोंकी रजको सिर और नेत्रोंमें लगाया ॥१ ॥
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* *३२६ रामचरितमानस
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें । अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें ॥
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं । करत मनोरथ सकुचत अहहीं ॥
[ उन्होंने कहा— ] हे मुनीश्वर! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शनसे कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मनमें ऐसा विश्वास है । जो सुख और सुयश लोकपाल चाहते हैं; परन्तु [ असम्भव समझकर ] जिसका मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं, ॥२ ॥
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी । सब सिधि तव दरसन अनुगामी ॥
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई ॥ फिरे महीसु आसिषा पाई ॥
हे स्वामी! वही सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियाँ आपके दर्शनोंकी अनुगामिनी अर्थात् पीछे - पीछे चलनेवाली हैं । इस प्रकार बार- बार विनती की और सिर नवाकर तथा उनसे आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे ॥३ ॥
चली बरात निसान बजाई । मुदित छोट बड़ सब समुदाई ॥
रामहि निरखि ग्राम नर नारी । पाइ नयन फलु होहिं सुखारी ॥
डंका बजाकर बारात चली । छोटे- बड़े सभी समुदाय प्रसन्न हैं । [ रास्तेके ] गाँवोंके स्त्री- पुरुष श्रीरामचन्द्रजीको देखकर नेत्रोंका फल पाकर सुखी होते हैं ॥ ४ ॥
दो० – बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत ।
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत ॥ ३४३ ॥
बीच - बीचमें सुन्दर मुकाम करती हुई तथा मार्गके लोगोंको सुख देती हुई वह बारात पवित्र दिनमें अयोध्यापुरीके समीप आ पहुँची ॥ ३४३ ॥
हने निसान पनव बर बाजे । भेरि संख धुनि हय गय गाजे ॥
झाँझि बिरव डिंडिमी सुहाई । सरस राग बाजहिं सहनाई ॥
नगाड़ोंपर चोटें पड़ने लगीं; सुन्दर ढोल बजने लगे । भेरी और शङ्खकी बड़ी आवाज हो रही है; हाथी - घोड़े गरज रहे हैं । विशेष शब्द करनेवाली झाँझें, सुहावनी डफलियाँ तथा रसीले रागसे शहनाइयाँ बज रही हैं ॥१ ॥
पुर जन आवत अकनि बराता । मुदित सकल पुलकावलि गाता ॥
निज निज सुंदर सदन सँवारे । हाट बाट चौहट पुर द्वारे ॥
बारातको आती हुई सुनकर नगरनिवासी प्रसन्न हो गये । सबके शरीरोंपर पुलकावली छा गयी । सबने अपने - अपने सुन्दर घरों, बाजारों, गलियों, चौराहों और नगरके द्वारोंको सजाया ॥ २ ॥
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* बालकाण्ड * ३२७
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाईं । जहँ तहँ चौकें चारु पुराईं ॥
बना बजारु न जाइ बखाना । तोरन केतु पताक बिताना ॥
सारी गलियाँ अरगजेसे सिंचायी गयीं, जहाँ-तहाँ सुन्दर चौक पुराये गये । तोरणों, ध्वजा- पताकाओं और मण्डपोंसे बाजार ऐसा सजा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥३ ॥
सफल पूगफल कदलि रसाला । रोपे बकुल कदंब तमाला ॥
लगे सुभग तरु परसत धरनी । मनिमय आलबाल कल करनी ॥
फलसहित सुपारी, केला, आम, मौलसिरी, कदम्ब और तमालके वृक्ष लगाये गये । वे लगे हुए सुन्दर वृक्ष [ फलोंके भारसे ] पृथ्वीको छू रहे हैं । उनके मणियोंके थाले बड़ी सुन्दर कारीगरीसे बनाये गये हैं ॥४ ॥
दो० – बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि ।
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि ॥ ३४४ ॥
अनेक प्रकारके मङ्गल- कलश घर- घर सजाकर बनाये गये हैं । श्रीरघुनाथजीकी पुरी ( अयोध्या ) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते हैं ॥ ३४४ ॥
भूप भवनु तेहि अवसर सोहा । रचना देखि मदन मनु मोहा ॥
रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई ॥मंगल सगुन मनोहरताई । उस समय राजमहल [अत्यन्त ] शोभित हो रहा था । उसकी रचना देखकर कामदेवका भी मन मोहित हो जाता था । मङ्गल शकुन, मनोहरता, ऋद्धि- सिद्धि, सुख, सुहावनी सम्पत्ति ॥१ ॥
जनु उछाह सब सहज सुहाए । तनु धरि धरि दसरथ गृहँ छाए ॥
कहहु लालसा होहि न केही ॥देखन हेतु राम बैदेही । और सब प्रकारके उत्साह ( आनन्द) मानो सहज सुन्दर शरीर धर- धरकर दशरथजीके घरमें छा गये हैं । श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीके दर्शनोंके लिये भला कहिये किसे लालसा न होगी? ॥ २ ॥
जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि । निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि ॥
सकल सुमंगल सजें आरती । गावहिं जनु बहु बेष भारती ॥
सुहागिनी स्त्रियाँ झुंड-की- झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छबिसे कामदेवकी स्त्री रतिका भी निरादर कर रही हैं । सभी सुन्दर मङ्गलद्रव्य एवं आरती सजाये हुए गा रही हैं, मानो सरस्वतीजी ही बहुत-से वेष धारण किये गा रही हों ॥३ ॥
भूपति भवन कोलाहलु होई । जाइ न बरनि समउ सुखु सोई ॥
कौसल्यादि राम महतारीं । प्रेमबिबस तन दसा बिसारीं ॥
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* *३२८ रामचरितमानस राजमहलमें [ आनन्दके मारे] शोर मच रहा है । उस समयका और सुखका वर्णन नहीं किया जा सकता । कौसल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजीकी सब माताएँ प्रेमके विशेष वश होनेसे शरीरकी सुध भूल गयीं ॥ ४ ॥
दो० – दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि ।
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि ॥ ३४५ ॥
गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणोंको बहुत -सा दान दिया । वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं, मानो अत्यन्त दरिद्री चारों पदार्थ पा गया हो ॥ ३४५ ॥
मोद प्रमोद बिबस सब माता । चलहिं न चरन सिथिल भए गाता ॥
राम दरस हित अति अनुरागीं । परिछनि साजु सजन सब लागीं ॥
सुख और महान् आनन्दसे विवश होनेके कारण सब माताओंके शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं । श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनोंके लिये वे अत्यन्त अनुरागमें भरकर परछनका सब सामान सजाने लगीं ॥१ ॥
बिबिध बिधान बाजने बाजे । मंगल मुदित सुमित्राँ साजे ॥
हरद दूब दधि पल्लव मूला ॥ फूला । पान पूगफल मंगल अनेकों प्रकारके बाजे बजते थे । सुमित्राजीने आनन्दपूर्वक मङ्गल साज सजाये । हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मङ्गलकी मूल वस्तुएँ, ॥२ ॥
अच्छत अंकुर लोचन लाजा । मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा ॥
छुहे पुरट घट सहज सुहाए । मदन सकुन जनु नीड़ बनाए ॥
तथा अक्षत ( चावल ), अँखुए, गोरोचन, लावा और तुलसीकी सुन्दर मंजरियाँ सुशोभित हैं । नाना रंगोंसे चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्णके कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेवके पक्षियोंने घोंसले बनाये हों ॥३ ॥
सगुन सुगंध न जाहिं बखानी । मंगल सकल सजहिं सब रानी ॥
रचीं आरतीं बहुत बिधाना । मुदित करहिं कल मंगल गाना ॥
शकुनकी सुगन्धित वस्तुएँ बखानी नहीं जा सकतीं । सब रानियाँ सम्पूर्ण मङ्गल साज सज रही हैं । बहुत प्रकारकी आरती बनाकर वे आनन्दित हुईं सुन्दर मङ्गलगान कर रही हैं ॥ ४ ॥
दो० – कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात ।
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात ॥ ३४६ ॥
सोनेके थालोंको माङ्गलिक वस्तुओंसे भरकर अपने कमलके समान ( कोमल ) हाथोंमें लिये
हुए माताएँ आनन्दित होकर परछन करने चलीं । उनके शरीर पुलकावलीसे छा गये हैं ॥३४६ ॥