श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 331–340
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
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* बालकाण्ड * ३२ ९
सावन घन घमंडु जनु ठयऊ ॥ धूप धूम नभु मेचक भयऊ ।
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं । मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं ॥
धूपके धूएँसे आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावनके बादल घुमड़- घुमड़कर छा गये हों । देवता कल्पवृक्षके फूलोंकी मालाएँ बरसा रहे हैं । वे ऐसी लगती हैं मानो बगुलोंकी पाँति मनको [ अपनी ओर] खींच रही हो ॥ १ ॥
मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे ॥मंजुल मनिमय बंदनिवारे ।
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि । चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि ॥
सुन्दर मणियोंसे बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाये हों । अटारियोंपर सुन्दर और चपल स्त्रियाँ प्रकट होती और छिप जाती हैं ( आती -जाती हैं ); वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजलियाँ चमक रही हों ॥ २ ॥
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा । जाचक चातक दादुर मोरा ॥
सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी । सुखी सकल ससि पुर नर नारी ॥
नगाड़ोंकी ध्वनि मानो बादलोंकी घोर गर्जना है । याचकगण पपीहे, मेढक और मोर हैं । देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे खेतीके समान नगरके सब स्त्री- पुरुष सुखी हो रहे हैं ॥ ३ ॥
समउ जानि गुर आयसु दीन्हा । पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा ॥
सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा । मुदित महीपति सहित समाजा ॥
[ प्रवेशका ] समय जानकर गुरु वसिष्ठजीने आज्ञा दी । तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजीने शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजीका स्मरण करके समाजसहित आनन्दित होकर नगरमें प्रवेश किया ॥४ ॥
दो० – होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ ।
बिबुध बधू नाहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ ॥ ३४७ ॥
शकुन हो रहे हैं, देवता दुन्दुभी बजा- बजाकर फूल बरसा रहे हैं । देवताओंकी स्त्रियाँ आनन्दित होकर सुन्दर मङ्गलगीत गा-गाकर नाच रही हैं ॥३४७ ॥
मागध सूत बंदि नट नागर । गावहिं जसु तिहु लोक उजागर ॥
जय धुनि बिमल बेद बर बानी । दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी ॥
मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकोंके उजागर ( सबको प्रकाश देनेवाले, परम प्रकाशस्वरूप ) श्रीरामचन्द्रजीका यश गा रहे हैं । जयध्वनि तथा वेदकी निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मङ्गलसे सनी हुई दसों दिशाओंमें सुनायी पड़ रही है ॥१ ॥
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* *३३० रामचरितमानस
बिपुल बाजने बाजन लागे । नभ सुर नगर लोग अनुरागे ॥
बने बराती बरनि न जाहीं । महा मुदित मन सुख न समाहीं ॥
बहुत -से बाजे बजने लगे । आकाशमें देवता और नगरमें लोग सब प्रेममें मग्न हैं । बराती ऐसे बने - ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता । परम आनन्दित हैं, सुख उनके मनमें समाता नहीं है ॥२ ॥
पुरबासिह तब राय जोहारे ॥ देखत रामहि भए सुखारे ॥
करहिं निछावरि मनिगन चीरा । बारि बिलोचन पुलक सरीरा ॥
तब अयोध्यावासियोंने राजाको जोहार ( वन्दना ) की । श्रीरामचन्द्रजीको देखते ही वे सुखी हो गये । सब मणियाँ और वस्त्र निछावर कर रहे हैं । नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका ] जल भरा है और शरीर पुलकित हैं ॥३ ॥
आरति करहिं मुदित पुर नारी । हरषहिं निरखि कुअर बर चारी ॥
सिबिका सुभग ओहार उघारी । देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी ॥
नगरकी स्त्रियाँ आनन्दित होकर आरती कर रही हैं और सुन्दर चारों कुमारोंको देखकर हर्षित हो रही हैं । पालकियोंके सुन्दर परदे हटा-हटाकर वे दुलहिनोंको देखकर सुखी होती हैं ॥४ ॥
दो० –एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर ।
मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार ॥ ३४८ ॥
इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वारपर आये । माताएँ आनन्दित होकर बहुओंसहित कुमारोंका परछन कर रही हैं ॥ ३४८ ॥
करहिं आरती बारहिं बारा । प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा ॥
भूषन मनि पट नाना जाती । करहिं निछावरि अगनित भाँती ॥
वे बार- बार आरती कर रही हैं । उस प्रेम और महान् आनन्दको कौन कह सकता है! अनेकों प्रकारके आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगणित प्रकारकी अन्य वस्तुएँ निछावर कर रही हैं ॥१ ॥
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी । परमानंद मगन महतारी ॥
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी । मुदित सफल जग जीवन लेखी ॥
बहुओंसहित चारों पुत्रोंको देखकर माताएँ परमानन्दमें मग्न हो गयीं । सीताजी और श्रीरामजीकी छबिको बार - बार देखकर वे जगत्में अपने जीवनको सफल मानकर आनन्दित हो रही हैं ॥२ ॥
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* बालकाण्ड * ३३१
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही । गान करहिं निज सुकृत सराही ॥
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा । नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा ॥
सखियाँ सीताजीके मुखको बार- बार देखकर अपने पुण्योंकी सराहना करती हुई गान कर रही हैं । देवता क्षण- क्षणमें फूल बरसाते, नाचते, गाते तथा अपनी-अपनी सेवा समर्पण करते हैं ॥ ३ ॥
देखि मनोहर चारिउ जोरीं । सारद उपमा सकल ढँढोरीं ॥
देत न बनहिं निपट लघु लागीं । एकटक रहीं रूप अनुरागीं ॥
चारों मनोहर जोड़ियोंको देखकर सरस्वतीने सारी उपमाओंको खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि उन्हें सभी बिलकुल तुच्छ जान पड़ीं । तब हारकर वे भी श्रीरामजीके रूपमें अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गयीं ॥ ४ ॥
दो० – निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत ।
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत ॥ ३४ ९ ॥
वेदकी विधि और कुलकी रीति करके अर्घ्य- पाँवड़े देती हुई बहुओंसमेत सब पुत्रोंको परछन करके माताएँ महलमें लिवा चलीं ॥ ३४ ९ ॥
चारि सिंघासन सहज सुहाए । जनु मनोज निज हाथ बनाए ॥
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे । सादर पाय पुनीत पखारे ॥
स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेवने ही अपने हाथसे बनाये थे । उनपर माताओंने राजकुमारियों और राजकुमारोंको बैठाया और आदरके साथ उनके पवित्र चरण धोये ॥१ ॥
धूप दीप नैबेद बेद बिधि । पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि ॥
बारहिं बार आरती करहीं । ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं ॥
फिर वेदकी विधिके अनुसार मङ्गलोंके निधान दूलह और दुलहिनोंकी धूप, दीप और नैवेद्य आदिके द्वारा पूजा की । माताएँ बारंबार आरती कर रही हैं और वर- वधुओंके सिरोंपर सुन्दर पंखे तथा चँवर ढल रहे हैं ॥२ ॥
बस्तु अनेक निछावर होहीं । भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं ॥
पावा परम तत्व जनु जोगीं । अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं ॥
अनेकों वस्तुएँ निछावर हो रही हैं; सभी माताएँ आनन्दसे भरी हुई ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगीने परम तत्त्वको प्राप्त कर लिया । सदाके रोगीने मानो अमृत पा लिया, ॥३ ॥
जनम रंक जनु पारस पावा । अंधहि लोचन लाभु सुहावा ॥
मूक बदन जनु सारद छाई । मानहुँ समर सूर जय पाई ॥
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* *३३२ रामचरितमानस जन्मका दरिद्री मानो पारस पा गया । अंधेको सुन्दर नेत्रोंका लाभ हुआ । गूँगेके मुखमें मानो सरस्वती आ विराजीं और शूरवीरने मानो युद्धमें विजय पा ली ॥४ ॥
दो० – एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु ।
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु ॥ ३५० ( क ) ॥
इन सुखोंसे भी सौ करोड़ गुना बढ़कर आनन्द माताएँ पा रही हैं । क्योंकि रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामजी विवाह करके भाइयोंसहित घर आये हैं ॥ ३५० ( क ) ॥
लोक रीति जननीं करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं ।
मोदु बिनोद बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसुकाहिं ॥ ३५० ( ख ) ॥
माताएँ लोकरीति करती हैं और दूलह- दुलहिनें सकुचाते हैं । इस महान् आनन्द और विनोदको देखकर श्रीरामचन्द्रजी मन ही मन मुसकरा रहे हैं ॥ ३५० ( ख ) ॥
देव पितर पूजे बिधि नीकी । पूजीं सकल बासना जी की ॥
सबहि बंदि मागहिं बरदाना । भाइन्ह सहित राम कल्याना ॥
मनकी सभी वासनाएँ पूरी हुई जानकर देवता और पितरोंका भलीभाँति पूजन किया । सबकी वन्दना करके माताएँ यही वरदान माँगती हैं कि भाइयोंसहित श्रीरामजीका कल्याण हो ॥१ ॥
अंतरहित सुर आसिष देहीं ॥ मुदित मातु अंचल भरि लेहीं ॥ भूपति बोलि बराती लीन्हे ॥ जान बसन मनि भूषन दीन्हे ॥ देवता छिपे हुए [ अन्तरिक्षसे ] आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएँ आनन्दित हो आँचल भरकर ले रही हैं । तदनन्तर राजाने बरातियोंको बुलवा लिया और उन्हें सवारियाँ, वस्त्र, मणि ( रत्न ) और आभूषणादि दिये ॥ २ ॥
आयसु पाइ राखि उर रामहि । मुदित गए सब निज निज धामहि ॥
पुर नर नारि सकल पहिराए । घर घर बाजन लगे बधाए ॥
आज्ञा पाकर, श्रीरामजीको हृदयमें रखकर वे सब आनन्दित होकर अपने -अपने घर गये । नगरके समस्त स्त्री- पुरुषोंको राजाने कपड़े और गहने पहनाये । घर- घर बधावे बजने लगे ॥३ ॥
जाचक जन जाचहिं जोइ जोई । प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई ॥
सेवक सकल बजनिआ नाना । पूरन किए दान सनमाना ॥
याचक लोग जो - जो माँगते हैं, विशेष प्रसन्न होकर राजा उन्हें वही- वही देते हैं । सम्पूर्ण सेवकों और बाजेवालोंको राजाने नाना प्रकारके दान और सम्मानसे सन्तुष्ट किया ॥४ ॥
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* बालकाण्ड * ३३३
दो० –- देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ ।
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ ॥ ३५१ ॥
सब जोहार ( वन्दन ) करके आशिष देते हैं और गुणसमूहोंकी कथा गाते हैं । तब गुरु और ब्राह्मणोंसहित राजा दशरथजीने महलमें गमन किया ॥ ३५ ९ ॥
जो बसिष्ट अनुसासन दीन्ही । लोक बेद बिधि सादर कीन्ही ॥
भूसुर भीर देखि सब रानी । सादर उठीं भाग्य बड़ जानी ॥
वसिष्ठजीने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेदकी विधिके अनुसार राजाने आदरपूर्वक किया ।
ब्राह्मणोंकी भीड़ देखकर अपना बड़ा भाग्य जानकर सब रानियाँ आदरके साथ उठीं ॥१ ॥
पाय पखारि सकल अन्हवाए । पूजि भली बिधि भूप जेवाँए ॥
आदर दान प्रेम परिपोषे । देत असीस चले मन तोषे ॥
चरण धोकर उन्होंने सबको स्नान कराया और राजाने भलीभाँति पूजन करके उन्हें भोजन कराया । आदर, दान और प्रेमसे पुष्ट हुए वे सन्तुष्ट मनसे आशीर्वाद देते हुए चले ॥२ ॥
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा । नाथ मोहि सम धन्य न दूजा ॥
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी । रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी ॥
राजाने गाधि- पुत्र विश्वामित्रजीकी बहुत तरहसे पूजा की और कहा- हे नाथ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है । राजाने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियोंसहित उनकी चरणधूलिको ग्रहण किया ॥ ३ ॥
भीतर भवन दीन्ह बर बासू । मन जोगवत रह नृपु रनिवासू॥
पूजे गुर पद कमल बहोरी । कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी ॥
उन्हें महलके भीतर ठहरनेको उत्तम स्थान दिया, जिसमें राजा और सब रनिवास उनका मन जोहता रहे ( अर्थात् जिसमें राजा और महलकी सारी रानियाँ स्वयं उनके इच्छानुसार उनके आरामकी ओर दृष्टि रख सकें ), फिर राजाने गुरु वसिष्ठजीके चरणकमलोंकी पूजा और विनती की । उनके हृदयमें कम प्रीति न थी ( अर्थात् बहुत प्रीति थी ) ॥ ४ ॥
दो० - बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु ।
पुनि पुनि बंदत गुरचरन देत असीस मुनीसु ॥ ३५२ ॥
बहुओंसहित सब राजकुमार और सब रानियोंसमेत राजा बार- बार गुरुजीके चरणोंकी वन्दना करते हैं और मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं ॥ ३५२ ॥
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें । सुत संपदा राखि सब आगें ॥
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा । आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा ॥
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* * ३३४ रामचरितमानस राजाने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे पुत्रोंको और सारी सम्पत्तिको सामने रखकर [ उन्हें स्वीकार करनेके लिये ] विनती की । परन्तु मुनिराजने [ पुरोहितके नाते ] केवल अपना नेग माँग लिया और बहुत तरहसे आशीर्वाद दिया ॥१ ॥
उर धरि रामहि सीय समेता । हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता ॥
बिप्रबधू सब भूप बोलाईं । चैल चारु भूषन पहिराईं ॥
फिर सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर गुरु वसिष्ठजी हर्षित होकर अपने स्थानको गये । राजाने सब ब्राह्मणोंकी स्त्रियोंको बुलवाया और उन्हें सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनाये ॥ २ ॥
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं । रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं ॥
नेगी नेग जोग सब लेहीं । रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं ॥
फिर सब सुआसिनियोंको ( नगरभरकी सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदिको ) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर [उसीके अनुसार ] उन्हें पहिरावनी दी । नेगी लोग सब अपना- अपना नेग-जोग लेते और राजाओंके शिरोमणि दशरथजी उनकी इच्छाके अनुसार देते हैं ॥३ ॥
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने । भूपति भली भाँति सनमाने ॥
देव देखि रघुबीर बिबाहू । बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू ॥
जिन मेहमानोंको प्रिय और पूजनीय जाना, उनका राजाने भलीभाँति सम्मान किया । देवगण श्रीरघुनाथजीका विवाह देखकर, उत्सवकी प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए–॥४ ॥
दो० – चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ ।
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ ॥ ३५३ ॥
नगाड़े बजाकर और [ परम ] सुख प्राप्त कर अपने-अपने लोकोंको चले । वे एक- दूसरेसे
श्रीरामजीका यश कहते जाते हैं । हृदयमें प्रेम समाता नहीं है ॥ ३५३ ॥
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू । रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू ॥
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे । सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे ॥
सब प्रकारसे सबका प्रेमपूर्वक भलीभाँति आदर-सत्कार कर लेनेपर राजा दशरथजीके हृदयमें पूर्ण उत्साह ( आनन्द ) भर गया । जहाँ रनिवास था, वे वहाँ पधारे और बहुओंसमेत उन्होंने कुमारोंको देखा॥१ ॥
लिए गोद करि मोद समेता । को कहि सकइ भयउ सुखु जेता ॥
बधू सप्रेम गोद बैठारीं । बार बार हियँ हरषि दुलारीं ॥
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* बालकाण्ड * ३३५ राजाने आनन्दसहित पुत्रोंको गोदमें ले लिया । उस समय राजाको जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है? फिर पुत्रवधुओंको प्रेमसहित गोदीमें बैठाकर, बार- बार हृदयमें हर्षित होकर उन्होंने उनका दुलार ( लाड़ -चाव) किया ॥ २ ॥
देखि समाजु मुदित रनिवासू । सब कें उर अनंद कियो बासू॥
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू । सुनि सुनि हरषु होत सब काहू॥
यह समाज ( समारोह ) देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया । सबके हृदयमें आनन्दने निवास कर लिया । तब राजाने जिस तरह विवाह हुआ था वह सब कहा । उसे सुन- सुनकर सब किसीको हर्ष होता है ॥ ३ ॥
जनक राज गुन सीलु बड़ाई ॥ प्रीति रीति संपदा सुहाई ॥
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी । रानी सब प्रमुदित सुनि करनी ॥
राजा जनकके गुण, शील, महत्त्व, प्रीतिकी रीति और सुहावनी सम्पत्तिका वर्णन राजाने भाटकी तरह बहुत प्रकारसे किया । जनकजीकी करनी सुनकर सब रानियाँ बहुत प्रसन्न हुईं ॥ ४ ॥
दो० - सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति ।
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति ॥ ३५४ ॥
पुत्रोंसहित स्नान करके राजाने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियोंको बुलाकर अनेक प्रकारके भोजन किये । [ यह सब करते- करते ] पाँच घड़ी रात बीत गयी ॥ ३५४ ॥
मंगलगान करहिं बर भामिनि । भै सुखमूल मनोहर जामिनि ॥
अँचइ पान सब काहूँ पाए । स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए ॥
सुन्दर स्त्रियाँ मङ्गलगान कर रही हैं । वह रात्रि सुखकी मूल और मनोहारिणी हो गयी । सबने आचमन करके पान खाये और फूलोंकी माला, सुगन्धित द्रव्य आदिसे विभूषित होकर सब शोभासे छा गये ॥ १ ॥
रामहि देखि रजायसु पाई । निज निज भवन चले सिर नाई ॥
प्रेम प्रमोदु बिनोद बड़ाई । समउ समाजु मनोहरताई ॥
श्रीरामचन्द्रजीको देखकर और आज्ञा पाकर सब सिर नवाकर अपने - अपने घरको चले । वहाँके प्रेम, आनन्द, विनोद, महत्त्व, समय, समाज और मनोहरताको— ॥ २ ॥
कहि न सकहिं सत सारद सेसू । बेद बिरंचि महेस गनेसू॥
सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी । भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी ॥
सैकड़ों सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेवजी और गणेशजी भी नहीं कह सकते । फिर भला मैं उसे किस प्रकारसे बखानकर कहूँ? कहीं केंचुआ भी धरतीको सिरपर ले सकता है! ॥ ३ ॥
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* *३३६ रामचरितमानस
नृप सब भाँति सबहि सनमानी । कहि मृदु बचन बोलाईं रानी ॥
बधू लरिकनीं पर घर आईं । राखेहु नयन पलक की नाईं ॥
राजाने सबका सब प्रकारसे सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियोंको बुलाया और कहा— बहुएँ अभी बच्ची हैं, पराये घर आयी हैं । इनको इस तरहसे रखना जैसे नेत्रोंको पलकें रखती हैं (जैसे पलकें नेत्रोंकी सब प्रकारसे रक्षा करती हैं और उन्हें सुख पहुँचाती हैं, वैसे ही इनको सुख पहुँचाना ) ॥४ ॥
दो० - लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ ।
अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ ॥ ३५५ ॥
लड़के थके हुए नींदके वश हो रहे हैं, इन्हें ले जाकर शयन कराओ । ऐसा कहकर राजा श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें मन लगाकर विश्रामभवनमें चले गये ॥ ३५५ ॥
भूप बचन सुनि सहज सुहाए । जरित कनक मनि पलँग डसाए ॥
सुभग सुरभि पय फेन समाना । कोमल कलित सुपेतीं नाना ॥
राजाके स्वभावसे ही सुन्दर वचन सुनकर [ रानियोंने ] मणियोंसे जड़े सुवर्णके पलँग बिछवाये । [ गद्दोंपर] गौके दूधके फेनके समान सुन्दर एवं कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछायीं ॥१ ॥
उपबरहन बर बरनि न जाहीं । स्स्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं ॥
रतनदीप सुठि चारु चंदोवा । कहत न बनइ जान जेहिं जोवा ॥
सुन्दर तकियोंका वर्णन नहीं किया जा सकता । मणियोंके मन्दिरमें फूलोंकी मालाएँ और सुगन्ध द्रव्य सजे हैं । सुन्दर रत्नोंके दीपकों और सुन्दर चँदोवेकी शोभा कहते नहीं बनती । जिसने उन्हें देखा हो, वही जान सकता है ॥२ ॥
सेज रुचिर रचि रामु उठाए । प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए ॥
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही । निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही ॥
इस प्रकार सुन्दर शय्या सजाकर [माताओंने ] श्रीरामचन्द्रजीको उठाया और प्रेमसहित पलँगपर पौढ़ाया । श्रीरामजीने बार- बार भाइयोंको आज्ञा दी । तब वे भी अपनी-अपनी शय्याओंपर सो गये ॥३ ॥
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता । कहहिं सप्रेम बचन सब माता ॥
मारग जात भयावनि भारी । केहि बिधि तात ताड़का मारी ॥
श्रीरामजीके साँवले सुन्दर कोमल अङ्गोंको देखकर सब माताएँ प्रेमसहित वचन कह रही हैं—- हे तात! मार्गमें जाते हुए तुमने बड़ी भयावनी ताड़का राक्षसीको किस प्रकारसे मारा? ॥ ४ ॥
दो० – घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु ।
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु ॥ ३५६ ॥
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* बालकाण्ड * ३३७ बड़े भयानक राक्षस, जो विकट योद्धा थे और जो युद्धमें किसीको कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहुको सहायकोंसहित तुमने कैसे मारा? ॥३५६ ॥
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी । ईस अनेक करवरें टारी ॥
मख रखवारी करि दुहुँ भाईं । गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥
हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, मुनिकी कृपासे ही ईश्वरने तुम्हारी बहुत -सी बलाओंको टाल दिया । दोनों भाइयोंने यज्ञकी रखवाली करके गुरुजीके प्रसादसे सब विद्याएँ पायीं ॥ १ ॥
मुनितिय तरी लगत पग धूरी । कीरति रही भुवन भरि पूरी ॥
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा । नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा ॥
चरणोंकी धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या तर गयी । विश्वभरमें यह कीर्ति पूर्णरीतिसे व्याप्त हो गयी । कच्छपकी पीठ, वज्र और पर्वतसे भी कठोर शिवजीके धनुषको राजाओंके समाजमें तुमने तोड़ दिया ॥ २ ॥
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई । आए भवन ब्याहि सब भाई ॥
सकल अमानुष करम तुम्हारे । केवल कौसिक कृपाँ सुधारे ॥
विश्वविजयके यश और जानकीको पाया और सब भाइयोंको ब्याहकर घर आये । तुम्हारे सभी कर्म अमानुषी हैं ( मनुष्यकी शक्तिके बाहर हैं ), जिन्हें केवल विश्वामित्रजीकी कृपाने सुधारा है ( सम्पन्न किया है ) ॥ ३ ॥
आजु सुफल जग जनमु हमारा । देखि तात बिधुबदन तुम्हारा ॥
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें । ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें ॥
हे तात! तुम्हारा चन्द्रमुख देखकर आज हमारा जगत्में जन्म लेना सफल हुआ । तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उनको ब्रह्मा गिनतीमें न लावें ( हमारी आयुमें शामिल न करें) ॥ ४ ॥
दो० - राम प्रतोष मातु सब कहि बिनीत बर बैन ।
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन ॥ ३५७ ॥
विनयभरे उत्तम वचन कहकर श्रीरामचन्द्रजीने सब माताओंको संतुष्ट किया । फिर शिवजी, गुरु और ब्राह्मणोंके चरणोंका स्मरण कर नेत्रोंको नींदके वश किया ( अर्थात् वे सो रहे ) ॥ ३५७ ॥
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना । मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना ॥
घर घर करहिं जागरन नारीं । देहिं परसपर मंगल गारीं ॥
नींदमें भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो सन्ध्याके समयका लाल कमल सोह रहा हो । स्त्रियाँ घर- घर जागरण कर रही हैं और आपसमें ( एक- दूसरीको ) मङ्गलमयी गालियाँ दे रही हैं ॥ १ ॥
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* *३३८ रामचरितमानस
पुरी बिराजति राजति रजनी । रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी ॥
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं । फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं ॥
रानियाँ कहती हैं — हे सजनी! देखो, [ आज ] रात्रिकी कैसी शोभा है, जिससे अयोध्यापुरी विशेष शोभित हो रही है! [ यों कहती हुई ] सासुएँ सुन्दर बहुओंको लेकर सो गयीं, मानो सर्पोंने अपने सिरकी मणियोंको हृदयमें छिपा लिया है ॥२ ॥
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे । अरुनचूड़ बर बोलन लागे ॥
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए । पुरजन द्वार जोहारन आए ॥
प्रात: काल पवित्र ब्राह्ममुहूर्तमें प्रभु जागे । मुर्गे सुन्दर बोलने लगे । भाट और मागधोंने गुणोंका गान किया तथा नगरके लोग द्वारपर जोहार करनेको आये ॥ ३ ॥
बंदिबिप्र सुर गुरपितु माता । पाइ असीस मुदित सब भ्राता ॥
जननिन्ह सादर बदन निहारे । भूपति संग द्वार पगु धारे ॥
ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए । माताओंने आदरके साथ उनके मुखोंको देखा । फिर वे राजाके साथ दरवाजे ( बाहर ) पधारे ॥४ ॥
दो०- कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ ।
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ ॥ ३५८ ॥
स्वभावसे ही पवित्र चारों भाइयोंने सब शौचादिसे निवृत्त होकर पवित्र सरयू नदीमें स्नान किया और प्रातः क्रिया ( सन्ध्या- वन्दनादि) करके वे पिताके पास आये ॥ ३५८ ॥
नवाह्नपारायण, तीसरा विश्राम
भूप बिलोकि लिए उर लाई । बैठे हरषि रजायसु पाई ॥
देखि रामु सब सभा जुड़ानी । लोचन लाभ अवधि अनुमानी ॥
राजाने देखते ही उन्हें हृदयसे लगा लिया । तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गये । श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर और नेत्रोंके लाभकी बस यही सीमा है, ऐसा अनुमानकर सारी सभा शीतल हो गयी ( अर्थात् सबके तीनों प्रकारके ताप सदाके लिये मिट गये ) ॥१ ॥
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिकु आए । सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए ॥
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे । निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे ॥
फिर मुनि वसिष्ठजी और विश्वामित्रजी आये । राजाने उनको सुन्दर आसनोंपर बैठाया और पुत्रों- समेत उनकी पूजा करके उनके चरणों लगे । दोनों गुरु श्रीरामजीको देखकर प्रेममें मुग्ध हो गये ॥२ ॥