श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 51–60

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60

पृष्ठ 51

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* बालकाण्ड * ४९ ऐसे कराल ( कलियुगके ) कालमें तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके सब जंजालोंको नाश कर देनेवाला है । कलियुगमें यह रामनाम मनोवाञ्छित फल देनेवाला है, परलोकका परम हितैषी और इस लोकका माता- पिता है ( अर्थात् परलोकमें भगवान्‌का परमधाम देता है और इस लोकमें माता-पिताके समान सब प्रकारसे पालन और रक्षण करता है ) ॥ ३ ॥

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥

कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ हनुमानू॥

कलियुगमें न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है; रामनाम ही एक आधार है । कपटकी खान कलियुगरूपी कालनेमिके [ मारनेके ] लिये रामनाम ही बुद्धिमान् और समर्थ श्रीहनुमान्जी हैं ॥४ ॥

दो० – राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल ।

जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल ॥ २७ ॥

रामनाम श्रीनृसिंह भगवान् है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करनेवाले जन प्रह्लादके समान हैं; यह रामनाम देवताओंके शत्रु ( कलियुगरूपी दैत्य ) को मारकर जप करनेवालोंकी रक्षा करेगा ॥ २७ ॥

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥

अच्छे भाव ( प्रेम ) से, बुरे भाव ( वैर ) से, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है । उसी ( परम कल्याणकारी ) रामनामका स्मरण करके और श्रीरघुनाथजीको मस्तक नवाकर मैं रामजीके गुणोंका वर्णन करता हूँ॥ १ ॥

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती ॥

राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो । निज दिसि देखि दयानिधि पोसो ॥

वे ( श्रीरामजी ) मेरी [बिगड़ी ] सब तरहसे सुधार लेंगे; जिनकी कृपा कृपा करनेसे नहीं अघाती । राम- से उत्तम स्वामी और मुझ-सरीखा बुरा सेवक! इतनेपर भी उन दयानिधिने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है ॥ २ ॥

लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती । बिनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥

गनी गरीब ग्राम नर नागर । पंडित मूढ़ मलीन उजागर ॥

लोक और वेदमें भी अच्छे स्वामीकी यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेमको पहचान लेता है । अमीर- गरीब, गँवार- नगरनिवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम - यशस्वी, ॥ ३ ॥

सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी । नृपहि सराहत सब नर नारी ॥

साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस अंस भव परम कृपाला ॥

पृष्ठ 52

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* * ५० रामचरितमानस सुकवि- कुकवि, सभी नर-नारी अपनी- अपनी बुद्धिके अनुसार राजाकी सराहना करते हैं । और साधु, बुद्धिमान्, सुशील, ईश्वरके अंशसे उत्पन्न कृपालु राजा—॥४ ॥

सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी । भनिति भगति नति गति पहिचानी ॥

यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ । जान सिरोमनि कोसलराऊ ॥

सबकी सुनकर और उनकी वाणी, भक्ति, विनय और चालको पहचानकर सुन्दर ( मीठी ) वाणीसे सबका यथायोग्य सम्मान करते हैं । यह स्वभाव तो संसारी राजाओंका है, कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी तो चतुरशिरोमणि हैं ॥५ ॥

रीझत रामराम सनेह निसोतें । को जग मंद मलिनमति मोतें ॥

श्रीरामजी तो विशुद्ध प्रेमसे ही रीझते हैं, पर जगत्में मुझसे बढ़कर मूर्ख और मलिनबुद्धि और कौन होगा? ॥६ ॥

दो० – सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु ।

उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ॥ २८ ( क ) ॥

तथापि कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुझ दुष्ट सेवककी प्रीति और रुचिको अवश्य रखेंगे, जिन्होंने पत्थरोंको जहाज और बन्दर- भालुओंको बुद्धिमान् मन्त्री बना लिया ॥ २८ ( क ) ॥

हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास ।

साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास॥ २८ (ख ) ॥

सब लोग मुझे श्रीरामजीका सेवक कहते हैं और मैं भी [बिना लज्जा-संकोचके ] कहलाता हूँ ( कहनेवालोंका विरोध नहीं करता); कृपालु श्रीरामजी इस निन्दाको सहते हैं कि श्रीसीतानाथजी - जैसे स्वामीका तुलसीदास-सा सेवक है । २८ (ख) ॥

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी । सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी ॥

समुझि सहम मोहि अपडर अपनें । सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें ॥

यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पापको सुनकर नरकने भी नाक सिकोड़ ली है ( अर्थात् नरकमें भी मेरे लिये ठौर नहीं है ) । यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डरसे डर हो रहा है, किंतु भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने तो स्वप्नमें भी इसपर ( मेरी इस ढिठाई और दोषपर ) ध्यान नहीं दिया ॥१ ॥

सुनि अवलोकि सुचित चख चाही । भगति मोरि मति स्वामि सराही ॥

कहत नसाइ होइ हियँ नीकी । रीझत राम जानि जन जी की ॥

पृष्ठ 53

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* बालकाण्ड * ५१ वरं मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने तो इस बातको सुनकर, देखकर और अपने सुचित्तरूपी चक्षुसे निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धिकी [ उलटे ] सराहना की । क्योंकि कहनेमें चाहे बिगड़ जाय ( अर्थात् मैं चाहे अपनेको भगवान्‌का सेवक कहता-कहलाता रहूँ ), परंतु हृदयमें अच्छापन होना चाहिये । ( हृदयमें तो अपनेको उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है । ) श्रीरामचन्द्रजी भी दासके हृदयकी [ अच्छी ] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं ॥२ ॥

रहति न प्रभु चित चूक किए की । करत सुरति सय बार हिए की ॥

जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली । फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली ॥

प्रभुके चित्तमें अपने भक्तोंकी की हुई भूल- चूक याद नहीं रहती ( वे उसे भूल जाते हैं ) और उनके हृदय [ की अच्छाई- नीकी ] को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं । जिस पापके कारण उन्होंने बालिको व्याधकी तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीवने चली ॥ ३ ॥

सोइ करतूति बिभीषन केरी ॥ सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी ॥

ते भरतहि भेंटत सनमाने । राजसभाँ रघुबीर बखाने ॥

वही करनी विभीषणकी थी, परन्तु श्रीरामचन्द्रजीने स्वप्नमें भी उसका मनमें विचार नहीं किया । उलटे भरतजीसे मिलनेके समय श्रीरघुनाथजीने उनका सम्मान किया और राजसभामें भी उनके गुणोंका बखान किया ॥४ ॥

दो० – प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आप समान ।

तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥ २ ९ ( क ) ॥

प्रभु ( श्रीरामचन्द्रजी ) तो वृक्षके नीचे और बंदर डालीपर ( अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ोंकी शाखाओंपर कूदनेवाले बंदर ) । परन्तु ऐसे बंदरोंको भी उन्होंने अपने समान बना लिया । तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं ॥ २ ९ ( क) ॥

राम निकाईं रावरी है सबही को नीक ।

जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥ २ ९ ( ख ) ॥

हे श्रीरामजी! आपकी अच्छाईसे सभीका भला है ( अर्थात् आपका कल्याणमय स्वभाव सभीका कल्याण करनेवाला है ) । यदि यह बात सच है तो तुलसीदासका भी सदा कल्याण ही होगा ॥ २ ९ ( ख ) ॥

एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ ।

बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ ॥ २ ९ ( ग ) ॥

पृष्ठ 54

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* * ५२ रामचरितमानस इस प्रकार अपने गुण-दोषोंको कहकर और सबको फिर सिर नवाकर मैं श्रीरघुनाथजीका निर्मल यश वर्णन करता हूँ जिसके सुननेसे कलियुगके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ९ ( ग ) ॥

जागबलिक जो कथा सुहाई । भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई ॥

कहिहउँ सोइ संबाद बखानी । सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी ॥

मुनि याज्ञवल्क्यजीने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीको सुनायी थी, उसी संवादको मैं बखानकर कहूँगा; सब सज्जन सुखका अनुभव करते हुए उसे सुनें ॥ १ ॥

संभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥

सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा । राम भगत अधिकारी चीन्हा ॥

शिवजीने पहले इस सुहावने चरित्रको रचा, फिर कृपा करके पार्वतीजीको सुनाया । वही चरित्र शिवजीने काकभुशुण्डिजीको रामभक्त और अधिकारी पहचानकर दिया ॥२ ॥

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥

ते श्रोता बकता समसीला । सवँदरसी जानहिं हरिलीला ॥

उन काकभुशुण्डिजीसे फिर याज्ञवल्क्यजीने पाया और उन्होंने फिर उसे भरद्वाजजीको गाकर सुनाया । वे दोनों वक्ता और श्रोता ( याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) समान शीलवाले और समदर्शी हैं और श्रीहरिकी लीलाको जानते हैं ॥ ३ ॥

जानहिं तीनि काल निज ग्याना । करतल गत आमलक समाना ॥

औरउ जे हरिभगत सुजाना । कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना ॥

वे अपने ज्ञानसे तीनों कालोंकी बातोंको हथेलीपर रखे हुए आँवलेके समान ( प्रत्यक्ष ) जानते हैं । और भी जो सुजान ( भगवान्‌की लीलाओंका रहस्य जाननेवाले ) हरिभक्त हैं, वे इस चरित्रको नाना प्रकारसे कहते, सुनते और समझते हैं ॥ ४ ॥

दो० – मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत ।

समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत ॥ ३० ( क ) ॥

फिर वही कथा मैंने वाराह- क्षेत्रमें अपने गुरुजीसे सुनी; परन्तु उस समय मैं लड़कपनके कारण बहुत बेसमझ था, इससे उसको उस प्रकार ( अच्छी तरह समझा नहीं ॥ ३० ( क ) ॥

श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़ ।

किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़ ॥ ३० ( ख ) ॥

श्रीरामजीकी गूढ़ कथाके वक्ता ( कहनेवाले ) और श्रोता ( सुननेवाले ) दोनों ज्ञानके खजाने ( पूरे ज्ञानी ) होते हैं । मैं कलियुगके पापोंसे ग्रसा हुआ महामूढ़ जड़ जीव भला उसको कैसे समझ सकता था? ॥ ३० ( ख ) ॥

पृष्ठ 55

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* बालकाण्ड * ५३

तदपि कही गुर बारहिं बारा । समुझि परी कछु मति अनुसारा ॥

भाषाबद्ध करबि मैं सोई । मोरें मन प्रबोध जेहिं होई ॥

तो भी गुरुजीने जब बार- बार कथा कही, तब बुद्धिके अनुसार कुछ समझमें आयी । वही अब मेरे द्वारा भाषामें रची जायगी, जिससे मेरे मनको सन्तोष हो ॥१ ॥

जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें । तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें ॥

निज संदेह मोह भ्रम हरनी । करउँ कथा भव सरिता तरनी ॥

जैसा कुछ मुझमें बुद्धि और विवेकका बल है, मैं हृदयमें हरिकी प्रेरणासे उसीके अनुसार कहूँगा । मैं अपने सन्देह, अज्ञान और भ्रमको हरनेवाली कथा रचता हूँ, जो संसाररूपी नदीके पार करनेके लिये नाव है ॥२ ॥

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥

रामकथा कलि पंनग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥

रामकथा पण्डितोंको विश्राम देनेवाली, सब मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाली और कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली है । रामकथा कलियुगरूपी साँपके लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्निके प्रकट करनेके लिये अरणि ( मन्थन की जानेवाली लकड़ी ) है, ( अर्थात् इस कथासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है ) ॥३ ॥

रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ॥

सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि । भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि ॥

रामकथा कलियुगमें सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु गौ है और सज्जनोंके लिये सुन्दर सञ्जीवनी जड़ी है । पृथ्वीपर यही अमृतकी नदी है, जन्म- मरणरूपी भयका नाश करनेवाली और भ्रमरूपी मेढकोंको खानेके लिये सर्पिणी है ॥ ४ ॥

असुर सेन सम नरक निकंदिनि । साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि ॥

संत समाज पयोधि रमा सी । बिस्व भार भर अचल छमा सी ॥

यह रामकथा असुरोंकी सेनाके समान नरकोंका नाश करनेवाली और साधुरूप देवताओंके कुलका हित करनेवाली पार्वती ( दुर्गा ) है । यह संत-समाजरूपी क्षीरसमुद्रके लिये लक्ष्मीजीके समान है और सम्पूर्ण विश्वका भार उठानेमें अचल पृथ्वीके समान है ॥ ५ ॥

जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी । जीवन मुकुति हेतु जनु कासी ॥

रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी ॥

पृष्ठ 56

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* * ५४ रामचरितमानस यमदूतोंके मुखपर कालिख लगानेके लिये यह जगत्में यमुनाजीके समान है और जीवोंको मुक्ति देनेके लिये मानो काशी ही है । यह श्रीरामजीको पवित्र तुलसीके समान प्रिय है और तुलसीदासके लिये हुलसी ( तुलसीदासजीकी माता ) के समान हृदयसे हित करनेवाली है ॥६ ॥

सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी । सकल सिद्धि सुख संपति रासी ॥

सदगुन सुरगन अंब अदिति सी । रघुबर भगति प्रेम परमिति सी ॥

यह रामकथा शिवजीको नर्मदाजीके समान प्यारी है, यह सब सिद्धियोंकी तथा सुख-सम्पत्तिकी राशि है । सद्गुणरूपी देवताओंके उत्पन्न और पालन-पोषण करनेके लिये माता अदितिके समान है । श्रीरघुनाथजीकी भक्ति और प्रेमकी परम सीमा-सी है ॥७ ॥

दो० - रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।

तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥ ३१ ॥

तुलसीदासजी कहते हैं कि रामकथा मन्दाकिनी नदी है, सुन्दर ( निर्मल ) चित्त चित्रकूट है, और सुन्दर स्नेह ही वन है, जिसमें श्रीसीतारामजी विहार करते हैं ॥ ३१ ॥

रामचरित चिंतामनि चारू ।। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ॥

जग मंगल गुनग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥

श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र सुन्दर चिन्तामणि है और संतोंकी सुबुद्धिरूपी स्त्रीका सुन्दर शृङ्गार है । श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूह जगत्का कल्याण करनेवाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधामके देनेवाले हैं ॥१ ॥

सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥

जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥

ज्ञान, वैराग्य और योगके लिये सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोगका नाश करनेके लिये देवताओंके वैद्य ( अश्विनीकुमार ) के समान हैं । ये श्रीसीतारामजीके प्रेमके उत्पन्न करनेके लिये माता - पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमोंके बीज हैं ॥२ ॥

समन पाप संताप सोक के । प्रिय पालक परलोक लोक के ॥

सचिव सुभट भूपति बिचार के । कुंभज लोभ उदधि अपार के ॥

पाप, सन्ताप और शोकका नाश करनेवाले तथा इस लोक और परलोकके प्रिय पालन करनेवाले हैं । विचार ( ज्ञान ) रूपी राजाके शूरवीर मन्त्री और लोभरूपी अपार समुद्रके सोखनेके लिये अगस्त्य मुनि हैं ॥३ ॥

काम कोह कलिमल करिगन के । केहरि सावक जन मन बन के ॥

अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद घन दारिद दवारि के ॥

पृष्ठ 57

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* बालकाण्ड * ५५ भक्तोंके मनरूपी वनमें बसनेवाले काम, क्रोध और कलियुगके पापरूपी हाथियोंके मारनेके लिये सिंहके बच्चे हैं । शिवजीके पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं और दरिद्रतारूपी दावानलके बुझानेके लिये कामना पूर्ण करनेवाले मेघ हैं ॥ ४ ॥

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

विषयरूपी साँपका जहर उतारनेके लिये मन्त्र और महामणि हैं । ये ललाटपर लिखे हुए कठिनतासे मिटनेवाले बुरे लेखों ( मन्द प्रारब्ध ) को मिटा देनेवाले हैं । अज्ञानरूपी अन्धकारके हरण करनेके लिये सूर्यकिरणोंके समान और सेवकरूपी धानके पालन करनेमें मेघके समान हैं ॥५ ॥

अभिमत दानि देवतरु बर से । सेवत सुलभ सुखद हरि हर से ॥

सुकबि सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥

मनोवाञ्छित वस्तु देनेमें श्रेष्ठ कल्पवृक्षके समान हैं और सेवा करनेमें हरि- हरके समान सुलभ और सुख देनेवाले हैं । सुकविरूपी शरद् ऋतुके मनरूपी आकाशको सुशोभित करनेके लिये तारागणके समान और श्रीरामजीके भक्तोंके तो जीवनधन ही हैं ॥६ ॥

सकल सुकृत फल भूरि भोग से । जग हित निरुपधि साधु लोग से ॥

सेवक मन मानस मराल से । पावन गंग तरंग माल से ॥

सम्पूर्ण पुण्योंके फल महान् भोगोंके समान हैं । जगत्का छलरहित ( यथार्थ ) हित करनेमें साधु- संतोंके समान हैं । सेवकोंके मनरूपी मानसरोवरके लिये हंसके समान और पवित्र करनेमें गङ्गाजीकी तरङ्गमालाओंके समान हैं ॥७ ॥

दो० – कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।

दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड ॥३२ ( क ) ॥

श्रीरामजीके गुणोंके समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुगके कपट, दम्भ और पाखण्डके जलानेके लिये वैसे ही हैं जैसे ईंधनके लिये प्रचण्ड अग्नि ॥ ३२ ( क) ॥

रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।

सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥३२ ( ख ) ॥

रामचरित्र पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान सभीको सुख देनेवाले हैं, परन्तु सज्जनरूपी कुमुदिनी और चकोरके चित्तके लिये तो विशेष हितकारी और महान् लाभदायक हैं ॥ ३२ ( ख ) ॥

कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि बिधि संकर कहा बखानी ॥

सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथा प्रबंध बिचित्र बनाई ॥

पृष्ठ 58

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* * ५६ रामचरितमानस जिस प्रकार श्रीपार्वतीजीने श्रीशिवजीसे प्रश्न किया और जिस प्रकारसे श्रीशिवजीने विस्तारसे उसका उत्तर कहा, वह सब कारण मैं विचित्र कथाकी रचना करके गाकर कहूँगा ॥ १ ॥

जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करै सुनि सोई ॥

कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी ॥

रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ॥

नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥

जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह इसे सुनकर आश्चर्य न करे । जो ज्ञानी इस विचित्र कथाको सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि संसारमें रामकथाकी कोई सीमा नहीं है ( रामकथा अनन्त है ) । उनके मनमें ऐसा विश्वास रहता है । नाना प्रकारसे श्रीरामचन्द्रजीके अवतार हुए हैं और सौ करोड़ तथा अपार रामायण हैं ॥ २-३ ॥

कलपभेद हरिचरित सुहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए ॥

करिअ न संसय अस उर आनी । सुनिअ कथा सादर रति मानी ॥

कल्पभेदके अनुसार श्रीहरिके सुन्दर चरित्रोंको मुनीश्वरोंने अनेकों प्रकारसे गाया है । हृदयमें ऐसा विचारकर संदेह न कीजिये और आदरसहित प्रेमसे इस कथाको सुनिये ॥४ ॥

दो० – राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार ।

सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार ॥ ३३ ॥

श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उनके गुण भी अनन्त हैं और उनकी कथाओंका विस्तार भी असीम है । अतएव जिनके विचार निर्मल हैं, वे इस कथाको सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे ॥३३ ॥

एहि बिधि सब संसय करि दूरी । सिर धरि गुर पद पंकज धूरी ॥

पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी । करत कथा जेहिं लाग न खोरी ॥

इस प्रकार सब संदेहोंको दूर करके और श्रीगुरुजीके चरणकमलोंकी रजको सिरपर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथाकी रचनामें कोई दोष स्पर्श न करने पावे ॥१ ॥

सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा ॥

संबत सोरह सै एकतीसा ॥ करउँ कथा हरि पद धरि सीसा ॥

अब मैं आदरपूर्वक श्रीशिवजीको सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी निर्मल कथा कहता हूँ । श्रीहरिके चरणोंपर सिर रखकर संवत् १६३१ में इस कथाका आरम्भ करता हूँ ॥२ ॥

नौमी भौम बार मधुमासा । अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥

पृष्ठ 59

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* बालकाण्ड * ५७ चैत्र मासकी नवमी तिथि मंगलवारको श्री अयोध्याजीमें यह चरित्र प्रकाशित हुआ । जिस दिन श्रीरामजीका जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ ( श्रीअयोध्याजीमें) चले आते हैं ॥ ३ ॥

असुर नाग खग नर मुनि देवा । आइ करहिं रघुनायक सेवा ॥

जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना । करहिं राम कल कीरति गाना ॥

असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब अयोध्याजीमें आकर श्रीरघुनाथजीकी सेवा करते हैं । बुद्धिमान् लोग जन्मका महोत्सव मनाते हैं और श्रीरामजीकी सुन्दर कीर्तिका गान करते हैं ॥४ ॥

दो० – मज्जहिं सज्जन बूंद बहु पावन सरजू नीर ।

जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर ॥ ३४ ॥

सज्जनोंके बहुत -से समूह उस दिन श्रीसरयूजीके पवित्र जलमें स्नान करते हैं और हृदयमें सुन्दर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजीका ध्यान करके उनके नामका जप करते हैं ॥३४ ॥

दरस परस मज्जन अरु पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥

नदी पुनीत अमित महिमा अति । कहि न सकइ सारदा बिमल मति ॥

वेद - पुराण कहते हैं कि श्रीसरयूजीका दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापोंको हरता है । यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनन्त है, जिसे विमल बुद्धिवाली सरस्वतीजी भी नहीं कह सकतीं ॥१ ॥

राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥

चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजें तनु नहिं संसारा ॥

यह शोभायमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजीके परमधामकी देनेवाली है, सब लोकोंमें प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है । जगत्में [ अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज ] चार खानि ( प्रकार ) के अनन्त जीव हैं, इनमेंसे जो कोई भी अयोध्याजीमें शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसारमें नहीं आते (जन्म--मृत्युके चक्करसे छूटकर भगवान्के परमधाममें निवास करते हैं ) ॥ २ ॥

सब बिधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥

बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा । सुनत नसाहिं काम मद दंभा ॥

इस अयोध्यापुरीको सब प्रकारसे मनोहर, सब सिद्धियोंकी देनेवाली और कल्याणकी खान समझकर मैंने इस निर्मल कथाका आरम्भ किया, जिसके सुननेसे काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥

रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ॥

मन करि बिषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौं एहिं सर परई ॥

इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानोंसे सुनते ही शान्ति मिलती है । मनरूपी हाथी विषय- रूपी दावानलमें जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानसरूपी सरोवरमें आ पड़े तो सुखी हो जाय ॥४ ॥

पृष्ठ 60

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* * ५८ रामचरितमानस

रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ॥

त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन । कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ॥

यह रामचरितमानस मुनियोंका प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानसकी शिवजीने रचना की । यह तीनों प्रकारके दोषों, दुःखों और दरिद्रताको तथा कलियुगकी कुचालों और सब पापोंका नाश करनेवाला है ॥५ ॥

रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥

तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥

श्रीमहादेवजीने इसको रचकर अपने मनमें रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजीसे कहा । इसीसे शिवजीने इसको अपने हृदयमें देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुन्दर ' रामचरितमानस ' नाम रखा ॥ ६ ॥

कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई । सादर सुनहु सुजन मन लाई ॥

मैं उसी सुख देनेवाली सुहावनी रामकथाको कहता हूँ, हे सज्जनो! आदरपूर्वक मन लगाकर इसे सुनिये ॥७ ॥

दो० –- जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु ।

अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु ॥ ३५ ॥

यह रामचरितमानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतुसे जगत्में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्रीउमा महेश्वरका स्मरण करके कहता हूँ ॥ ३५ ॥

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी । रामचरितमानस कबि तुलसी ॥

करइ मनोहर मति अनुहारी । सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी ॥

श्रीशिवजीकी कृपासे उसके हृदयमें सुन्दर बुद्धिका विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्रीरामचरितमानसका कवि हुआ । अपनी बुद्धिके अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है । किंतु फिर भी हे सज्जनो! सुन्दर चित्तसे सुनकर इसे आप सुधार लीजिये ॥ १ ॥

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू॥

बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी ॥

सुन्दर ( सात्त्विकी ) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद- पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं । वे ( साधुरूपी मेघ ) श्रीरामजीके सुयशरूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और मङ्गलकारी जलकी वर्षा करते हैं ॥२ ॥

लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥