श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 61–70
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70
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* बालकाण्ड * ५९ सगुण लीलाका जो विस्तारसे वर्णन करते हैं, वही राम- सुयशरूपी जलकी निर्मलता है, जो मलका नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जलकी मधुरता और सुन्दर शीतलता है ॥३ ॥
सो जल सुकृत सालि हित होई । राम भगत जन जीवन सोई ॥
मेधा महि गत सो जल पावन । सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन ॥
भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ॥
वह ( राम- सुयशरूपी ) जल सत्कर्मरूपी धानके लिये हितकर है और श्रीरामजीके भक्तोंका तो जीवन ही है । वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वीपर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्गसे चला और मानस ( हृदय ) रूपी श्रेष्ठ स्थानमें भरकर वहीं स्थिर हो गया । वही पुराना होकर सुन्दर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो गया ॥ ४-५ ॥
दो० - सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि ॥
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥ ३६ ॥
इस कथामें बुद्धिसे विचारकर जो चार अत्यन्त सुन्दर और उत्तम संवाद ( भुशुण्डि- गरुड़, शिव- पार्वती, याज्ञवल्क्य - भरद्वाज और तुलसीदास और संत) रचे हैं, वही इस पवित्र और सुन्दर सरोवरके चार मनोहर घाट हैं ॥ ३६ ॥
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना । ग्यान नयन निरखत मन माना ॥
रघुपति महिमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बारि अगाधा ॥
सात काण्ड ही इस मानस सरोवरकी सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञानरूपी नेत्रोंसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है । श्रीरघुनाथजीकी निर्गुण ( प्राकृतिक गुणोंसे अतीत) और निर्बाध ( एकरस ) महिमाका जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जलकी अथाह गहराई है ॥१ ॥
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ॥
पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीका यश अमृतके समान जल है । इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरङ्गोंका मनोहर विलास है । सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन ( कमलिनी ) हैं और कविताकी युक्तियाँ सुन्दर मणि ( मोती ) उत्पन्न करनेवाली सुहावनी सीपियाँ हैं ॥२ ॥
सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा ॥छंद सोरठा सुंदर दोहा ।
अरथ अनूप सुभाव सुभासा । सोइ पराग मकरंद सुबासा ॥
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* * ६० रामचरितमानस जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलोंके समूह सुशोभित हैं । अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही पराग ( पुष्परज ), मकरन्द ( पुष्परस ) और सुगन्ध हैं ॥३ ॥
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला । ग्यान बिराग बिचार मराला ॥
धुनि अवरेब कबित गुन जाती । मीन मनोहर ते बहुभाँती ॥
सत्कर्मों ( पुण्यों ) के पुञ्ज भौंरोंकी सुन्दर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं । कविताकी ध्वनि वक्रोक्ति, गुण और जाति ही अनेकों प्रकारकी मनोहर मछलियाँ हैं ॥४ ॥
अरथ धरम कामादिक चारी । कहब ग्यान बिग्यान बिचारी ॥
नव रस जप तप जोग बिरागा I। ते सब जलचर चारु तड़ागा ॥
अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष- ये चारों, ज्ञान-विज्ञानका विचारके कहना, काव्यके नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्यके प्रसंग– ये सब इस सरोवरके सुन्दर जलचर जीव हैं ॥५ ॥
सुकृती साधु नाम गुन गाना । ते बिचित्र जलबिहग समाना ॥
संतसभा चहुँ दिसि अवँराई । श्रद्धा रितु बसंत सम गाई ॥
सुकृती ( पुण्यात्मा ) जनोंके, साधुओंके और श्रीरामनामके गुणोंका गान ही विचित्र जल-पक्षियोंके समान है । संतोंकी सभा ही इस सरोवरके चारों ओरकी अमराई ( आमकी बगीचियाँ) हैं और श्रद्धा वसन्त ऋतुके समान कही गयी है ॥६ ॥
भगति निरूपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥
सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पद रति रस बेद बखाना ॥
नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम ( इन्द्रियनिग्रह ) लताओंके मण्डप हैं । मनका निग्रह, यम ( अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ), नियम ( शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान ) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम
ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है । ऐसा वेदोंने कहा है ॥७ ॥
औरउ कथा अनेक प्रसंगा । तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा ॥
इस ( रामचरितमानस ) में और भी जो अनेक प्रसङ्गोंकी कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग- बिरंगे पक्षी हैं ॥ ८ ॥
दो० - पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु ।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु ॥ ३७ ॥
कथामें जो रोमाञ्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियोंका विहार है । निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जलसे सुन्दर नेत्रोंद्वारा उनको सींचता है ॥ ३७ ॥
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* बालकाण्ड * ६१
जे गावहिं यह चरित सँभारे । तेइ एहि ताल चतुर रखवारे ॥
सदा सुनहिं सादर नर नारी । तेइ सुरबर मानस अधिकारी ॥
जो लोग इस चरित्रको सावधानीसे गाते हैं, वे ही इस तालाबके चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री-1- पुरुष सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे ही इस सुन्दर मानसके अधिकारी उत्तम देवता हैं ॥१ ॥
अति खल जे बिषई बग कागा । एहि सर निकट न जाहिं अभागा ॥
संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न बिषय कथा रस नाना ॥
जो अति दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं, जो इस सरोवरके समीप नहीं जाते । क्योंकि यहाँ ( इस मानस सरोवरमें ) घोंघे, मेढक और सेवारके समान विषय-रसकी नाना कथाएँ नहीं हैं ॥२ ॥
तेहि कारन आवत हियँ हारे । कामी काक बलाक बिचारे ॥
आवत एहिं सर अति कठिनाई । राम कृपा बिनु आइ न जाई ॥
इसी कारण बेचारे कौवे और बगुलेरूपी विषयी लोग यहाँ आते हुए हृदयमें हार मान जाते हैं । क्योंकि इस सरोवरतक आनेमें कठिनाइयाँ बहुत हैं । श्रीरामजीकी कृपा बिना यहाँ नहीं आया जाता ॥ ३ ॥
कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥
गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥
घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियोंके वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं । घरके काम- काज और गृहस्थीके भाँति- भाँतिके जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े - बड़े पहाड़ हैं ॥४ ॥
बन बहु बिषम मोह मद माना । नदीं कुतर्क भयंकर नाना ॥
मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकारके कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं ॥५ ॥
दो० - जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ ।
तिन्ह कहुँ मानस अगम अतिजिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥ ३८ ॥
जिनके पास श्रद्धारूपी राह -खर्च नहीं है और संतोंका साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त ही अगम है । ( अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेमके बिना कोई इसको नहीं पा सकता) ॥ ३८ ॥
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई । जातहिं नीद जुड़ाई होई ॥
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा । गएहुँ न मज्जन पाव अभागा ॥
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* * ६२ रामचरितमानस यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँतक पहुँच भी जाय, तो वहाँ जाते ही उसे नींदरूपी जूड़ी आ जाती है । हृदयमें मूर्खतारूपी बड़ा कड़ा जाड़ा लगने लगता है, जिससे वहाँ जाकर भी वह अभागा स्नान नहीं कर पाता ॥ १ ॥
करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना ॥
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥
उससे उस सरोवरमें स्नान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमानसहित लौट आता है । फिर यदि कोई उससे [ वहाँका हाल ] पूछने आता है, तो वह [ अपने अभाग्यकी बात न कहकर] सरोवरकी निन्दा करके उसे समझाता है ॥२ ॥
सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही । राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही ॥
सोइ सादर सर मज्जनु करई । महा घोर त्रयताप न जरई ॥
ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते ( बाधा नहीं देते ) जिसे श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर कृपाकी दृष्टिसे देखते हैं । वही आदरपूर्वक इस सरोवरमें स्नान करता है और महान् भयानक त्रितापसे ( आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तापोंसे ) नहीं जलता ॥ ३ ॥
ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ ॥
जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥
जिनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवरको कभी नहीं छोड़ते । हे भाई! जो इस सरोवरमें स्नान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे ॥४ ॥
अस मानस मानस चख चाही । भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही ॥
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू ॥
ऐसे मानस सरोवरको हृदयके नेत्रोंसे देखकर और उसमें गोता लगाकर कविकी बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदयमें आनन्द और उत्साह भर गया और प्रेम तथा आनन्दका प्रवाह उमड़ आया ॥५ ॥
चली सुभग कबिता सरिता सो । राम बिमल जस जल भरिता सो ॥
सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला ॥
उससे वह सुन्दर कवितारूपी नदी बह निकली, जिसमें श्रीरामजीका निर्मल यशरूपी जल भरा है । इस ( कवितारूपिणी नदी ) का नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंकी जड़ है । लोकमत और वेदमत इसके दो सुन्दर किनारे हैं ॥ ६ ॥
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि । कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि ॥
यह सुन्दर मानस- सरोवरकी कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुगके [ छोटे - बड़े ] पापरूपी तिनकों और वृक्षोंको जड़से उखाड़ फेंकनेवाली है ॥७ ॥
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* बालकाण्ड * ६३
दो० –- श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल ।
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल ॥ ३ ९ ॥
तीनों प्रकारके श्रोताओंका समाज ही इस नदीके दोनों किनारोंपर बसे हुए पुरवे, गाँव और नगर हैं; और संतोंकी सभा ही सब सुन्दर मङ्गलोंकी जड़ अनुपम अयोध्याजी है ॥३ ९ ॥ रामभगत सुरसरितहि जाई ॥ मिली सुकीरति सरजु सुहाई ॥
सानुज राम समर जसु पावन । मिलेउ महानदु सोन सुहावन ॥
सुन्दर कीर्तिरूपी सुहावनी सरयूजी रामभक्तिरूपी गङ्गाजीमें जा मिलीं । छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामजीके युद्धका पवित्र यशरूपी सुहावना महानद सोन उसमें आ मिला ॥१ ॥
जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥
त्रिविध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरूप सिंधु समुहानी ॥
दोनोंके बीचमें भक्तिरूपी गङ्गाजीकी धारा ज्ञान और वैराग्यके सहित शोभित हो रही है । ऐसी तीनों तापोंको डरानेवाली यह तिमुहानी नदी रामस्वरूपरूपी समुद्रकी ओर जा रही है ॥२ ॥
मानस मूल मिली सुरसरिही । सुनत सुजन मन पावन करिही ॥
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ॥
इस ( कीर्तिरूपी सरयू) का मूल मानस ( श्रीरामचरित ) है और यह [ रामभक्तिरूपी ] गङ्गाजीमें मिली है, इसलिये यह सुननेवाले सज्जनोंके मनको पवित्र कर देगी । इसके बीच - बीचमें जो भिन्न- भिन्न प्रकारकी विचित्र कथाएँ हैं वे ही मानो नदीतटके आस -पासके वन और बाग हैं ॥ ३ ॥
उमा महेस बिबाह बराती । ते जलचर अगनित बहुभाँती ॥
रघुबर जनम अनंद बधाई । भवँर तरंग मनोहरताई ॥
श्रीपार्वतीजी और शिवजीके विवाहके बराती इस नदीमें बहुत प्रकारके असंख्य जलचर जीव हैं । श्रीरघुनाथजीके जन्मकी आनन्द-बधाइयाँ ही इस नदीके भँवर और तरंगोंकी मनोहरता है ॥ ४ ॥
दो० – बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग ॥
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग ॥ ४० ॥
चारों भाइयोंके जो बालचरित हैं, वे ही इसमें खिले हुए रंग-बिरंगे बहुत-से कमल हैं । महाराज श्रीदशरथजी तथा उनकी रानियों और कुटुम्बियोंके सत्कर्म ( पुण्य ) ही भ्रमर और जल- पक्षी हैं ॥ ४० ॥
सीय स्वयंबर कथा सुहाई । सरित सुहावन सो छबि छाई ॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उतर सबिबेका ॥
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* * ६४ रामचरितमानस श्रीसीताजीके स्वयंवरकी जो सुन्दर कथा है, वही इस नदीमें सुहावनी छबि छा रही है । अनेकों सुन्दर विचारपूर्ण प्रश्न ही इस नदीकी नावें हैं और उनके विवेकयुक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं ॥ १ ॥
सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई ॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥
इस कथाको सुनकर पीछे जो आपसमें चर्चा होती है, वही इस नदीके सहारे– सहारे चलनेवाले यात्रियोंका समाज शोभा पा रहा है । परशुरामजीका क्रोध इस नदीकी भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजीके श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं ॥२ ॥
सानुज राम बिबाह उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥
भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके विवाहका उत्साह ही इस कथा- नदीकी कल्याणकारिणी बाढ़ है, जो सभीको सुख देनेवाली है । इसके कहने - सुननेमें जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मनसे इस नदीमें नहाते हैं ॥३ ॥
राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥
काई कुमति केकई केरी । परी जासु फल बिपति घनेरी ॥
श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलकके लिये जो मङ्गल-साज सजाया गया, वही मानो पर्वके समय इस नदीपर यात्रियोंके समूह इकट्ठे हुए हैं । कैकेयीकी कुबुद्धि ही इस नदीमें काई है, जिसके फलस्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी ॥ ४ ॥
दो० – समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग ।
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग ॥ ४१ ॥
सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातोंको शान्त करनेवाला भरतजीका चरित्र नदी- तटपर किया जानेवाला जपयज्ञ है । कलियुगके पापों और दुष्टोंके अवगुणोंके जो वर्णन हैं वे ही इस नदीके जलका कीचड़ और बगुले - कौए हैं ॥ ४१ ॥
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी । समय सुहावनि पावनि भूरी ॥
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू । सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू ॥
यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओंमें सुन्दर है । सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है । इसमें शिव -पार्वतीका विवाह हेमन्त ऋतु है । श्रीरामचन्द्रजीके जन्मका उत्सव सुखदायी शिशिर ऋतु है ॥१ ॥
बरनब राम बिबाह समाजू । सो मुद मंगलमय रितुराजू ॥
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू ॥ पंथकथा खर आतप पवनू॥
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* बालकाण्ड * ६५ श्रीरामचन्द्रजीके विवाह समाजका वर्णन ही आनन्द- मङ्गलमय ऋतुराज वसंत है । श्रीरामजीका वनगमन दुःसह ग्रीष्म-ऋतु है और मार्गकी कथा ही कड़ी धूप और लू है ॥२ ॥
बरषा घोर निसाचर रारी । सुरकुल सालि सुमंगलकारी ॥
राम राज सुख बिनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई ॥
राक्षसोंके साथ घोर युद्ध ही वर्षा ऋतु है, जो देवकुलरूपी धानके लिये सुन्दर कल्याण करनेवाली है । रामचन्द्रजीके राज्यकालका जो सुख, विनम्रता और बड़ाई है वही निर्मल सुख देनेवाली सुहावनी शरद्- ऋतु है ॥३ ॥
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा । सोइ गुन अमल अनूपम पाथा ॥
भरत सुभाउ सुसीतलताई । सदा एकरस बरनि न जाई ॥
सती- शिरोमणि श्रीसीताजीके गुणोंकी जो कथा है, वही इस जलका निर्मल और अनुपम गुण है । श्रीभरतजीका स्वभाव इस नदीकी सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता ॥४ ॥
दो० - अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास ।
भाप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास ॥ ४२ ॥
चारों भाइयोंका परस्पर देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरेसे प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपन इस जलकी मधुरता और सुगन्ध हैं ॥ ४२ ॥
आरति बिनय दीनता मोरी । लघुता ललित सुबारि न थोरी ॥
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी । आस पिआस मनोमल हारी । मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जलका कम हलकापन नहीं है ( अर्थात् अत्यन्त हलकापन है ) । यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुननेसे ही गुण करता है और आशारूपी प्यासको और मनके मैलको दूर कर देता है ॥१ ॥
राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानी ॥
भव श्रम सोषक तोषक तोषा । समन दुरित दुख दारिद दोषा ॥
यह जल श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर प्रेमको पुष्ट करता है, कलियुगके समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानिको हर लेता है । संसारके ( जन्म- मृत्युरूप ) श्रमको सोख लेता है, सन्तोषको भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषोंको नष्ट कर देता है ॥२ ॥
काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥
सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥
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* * ६६ रामचरितमानस यह जल काम, क्रोध, मद और मोहका नाश करनेवाला और निर्मल ज्ञान और वैराग्यका बढ़ानेवाला है । इसमें आदरपूर्वक स्नान करनेसे और इसे पीनेसे हृदयमें रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं ॥३ ॥
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए । ते कायर कलिकाल बिगोए ॥
तृषित निरखि रब कर भव बारी । फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी ॥
जिन्होंने इस ( राम- सुयशरूपी ) जलसे अपने हृदयको नहीं धोया, वे कायर कलिकालके द्वारा ठगे गये । जैसे प्यासा हिरन सूर्यकी किरणोंके रेतपर पड़नेसे उत्पन्न हुए जलके भ्रमको वास्तविक जल समझकर पीनेको दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे ( कलियुगसे ठगे हुए ) जीव भी [ विषयोंके पीछे भटककर ] दु:खी होंगे ॥४ ॥
दो० – मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ ।
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाई ॥ ४३ ( क ) ॥
अपनी बुद्धिके अनुसार इस सुन्दर जलके गुणोंको विचारकर, उसमें अपने मनको स्नान कराकर और श्रीभवानी - शङ्करको स्मरण करके कवि ( तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है ॥४३ ( क) ।
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद ॥ ४३ (ख) ॥
मैं अब श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारणकर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियोंके मिलनका सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ ॥ ४३ ( ख) ॥
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा । तिन्हहि राम पद अति अनुरागा ॥
तापस सम दम दया निधाना । परमारथ पथ परम सुजाना ॥
भरद्वाज मुनि प्रयागमें बसते हैं, उनका श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम है । वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दयाके निधान और परमार्थके मार्गमें बड़े ही चतुर हैं ॥ १ ॥
माघ मकरगत रबि जब होई । तीरथपतिहिं आव सब कोई ॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं । सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं ॥
माघमें जब सूर्य मकर राशिपर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयागको आते हैं । देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्योंके समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणीमें स्नान करते हैं ॥२ ॥
पूजहिं माधव पद जलजाता । परसि अखय बटु हरषहिं गाता ॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन । परम रम्य मुनिबर मन भावन ॥
श्रीवेणीमाधवजीके चरणकमलोंको पूजते हैं और अक्षयवटका स्पर्शकर उनके शरीर पुलकित होते हैं । भरद्वाजजीका आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियोंके मनको भानेवाला है ॥३ ॥
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* बालकाण्ड * ६७
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा । जाहिं जे मज्जन तीरथराजा ॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा । कहहिं परसपर हरि गुन गाहा ॥
तीर्थराज प्रयागमें जो स्नान करने जाते हैं उन ऋषि-मुनियोंका समाज वहाँ ( भरद्वाजके आश्रममें ) जुटता है । प्रात: काल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर भगवान्के गुणोंकी कथाएँ कहते हैं ॥ ४ ॥
दो० - ब्रह्मनिरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग ।
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग ॥ ४४ ॥
ब्रह्मका निरूपण, धर्मका विधान और तत्त्वोंके विभागका वर्णन करते हैं तथा ज्ञान -वैराग्यसे युक्त भगवान्की भक्तिका कथन करते हैं ॥ ४४ ॥
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं । पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं ॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा । मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा ॥
इसी प्रकार माघके महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने -अपने आश्रमोंको चले जाते हैं । हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है । मकरमें स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं ॥ १ ॥
एक बार भरि मकर नहाए । सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए ॥
जागबलिक मुनि परम बिबेकी । भरद्वाज राखे पद टेकी ॥
एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने -अपने आश्रमोंको लौट गये । परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको चरण पकड़कर भरद्वाजजीने रख लिया ॥२ ॥
सादर चरन सरोज पखारे । अति पुनीत आसन बैठारे ॥
करि पूजा मुनि सुजसु बखानी । बोले अति पुनीत मृदु बानी ॥
आदरपूर्वक उनके चरणकमल धोये और बड़े ही पवित्र आसनपर उन्हें बैठाया । पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजीके सुयशका वर्णन किया और फिर अत्यन्त पवित्र और कोमल वाणीसे बोले—॥३ ॥
नाथ एक संसउ बड़ मोरें । करगत बेदतत्त्व सबु तोरें ॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥
हे नाथ! मेरे मनमें एक बड़ा सन्देह है; वेदोंका तत्त्व सब आपकी मुट्ठीमें है ( अर्थात् आप ही वेदका तत्त्व जाननेवाले होनेके कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं ) पर उस सन्देहको कहते मुझे भय और लाज आती है [ भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अबतक ज्ञान न हुआ ] और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [ क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ] ॥४ ॥
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* * ६८ रामचरितमानस
दो० – संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव ।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव ॥ ४५ ॥
हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और वेद, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरुके साथ छिपाव करनेसे हृदयमें निर्मल ज्ञान नहीं होता ॥४५ ॥
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥
राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ॥
यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ । हे नाथ! सेवकपर कृपा करके इस अज्ञानका नाश कीजिये । संतों, पुराणों और उपनिषदोंने रामनामके असीम प्रभावका गान किया है ॥१ ॥
संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥
आकर चारि जीव जग अहहीं । कासीं मरत परम पद लहहीं ॥
कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणोंकी राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनामका जप करते रहते हैं । संसारमें चार जातिके जीव हैं, काशीमें मरनेसे सभी परमपदको प्राप्त करते हैं ॥२ ॥
सोपि राम महिमा मुनिराया । सिव उपदेसु करत करि दाया ॥
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
हे मुनिराज! वह भी राम [ नाम] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [ काशीमें मरनेवाले जीवको ] रामनामका ही उपदेश करते हैं [इसीसे उनको परमपद मिलता है ] । हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिये ॥३ ॥
एक राम अवधेस कुमारा । तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा । भयउ रोषु रन रावनु मारा ॥
एक राम तो अवधनरेश दशरथजीके कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है । उन्होंने स्त्रीके विरहमें अपार दुःख उठाया और क्रोध आनेपर युद्धमें रावणको मार डाला ॥४ ॥
दो० - प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि ।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि ॥ ४६ ॥
हे प्रभो! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं? आप सत्यके धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचारकर कहिये ॥४६ ॥