श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 621–630

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 621–630

पृष्ठ 621

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 621 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस तृतीय सोपान अरण्यकाण्ड

श्लोक

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वः सम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्॥ ११ ॥॥

धर्मरूपी वृक्षके मूल, विवेकरूपी समुद्रको आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमलके [ विकसित करनेवाले ] सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकारको निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापोंको हरनेवाले, मोहरूपी बादलोंके समूहको छिन्न-भिन्न करनेकी विधि (क्रिया ) - में आकाशसे उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्माजीके वंशज ( आत्मज ) तथा कलङ्कनाशक महाराज श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय श्रीशङ्करजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥१ ॥

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् । राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥२ ॥

पृष्ठ 622

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 622 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *६२० रामचरितमानस जिनका शरीर जलयुक्त मेघोंके समान सुन्दर ( श्यामवर्ण ) एवं आनन्दघन है, जो सुन्दर [ वल्कलका ] पीतवस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथोंमें बाण और धनुष हैं, कमर उत्तम तरकसके भारसे सुशोभित है, कमलके समान विशाल नेत्र हैं और मस्तकपर जटाजूट धारण किये हैं, उन अत्यन्त शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित मार्गमें चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ॥२ ॥

सो० -उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति ।

पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति ॥

हे पार्वती! श्रीरामजीके गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं । परन्तु जो भगवान्से विमुख हैं और जिनका धर्ममें प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ [ उन्हें सुनकर] मोहको प्राप्त होते हैं ।

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई । मति अनुरूप अनूप सुहाई ॥

अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन । करत जे बन सुर नर मुनि भावन ॥

पुरवासियोंके और भरतजीके अनुपम और सुन्दर प्रेमका मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार गान किया । अब देवता, मनुष्य और मुनियोंके मनको भानेवाले प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वे अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो, जिन्हें वे वनमें कर रहे हैं ॥ १ ॥

एक बार चुनि कुसुम सुहाए । निज कर भूषन राम बनाए ॥

सीतहि पहिराए प्रभु सादर । बैठे फटिक सिला पर सुंदर ॥

एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजीने अपने हाथोंसे भाँति - भाँतिके गहने बनाये और सुन्दर स्फटिकशिलापर बैठे हुए प्रभुने आदरके साथ वे गहने श्रीसीताजीको पहनाये ॥२ ॥

सुरपति सुत धरि बायस बेषा । सठ चाहत रघुपति बल देखा ॥

जिमि पिपीलिका सागर थाहा । महा मंदमति पावन चाहा ॥

देवराज इन्द्रका मूर्ख पुत्र जयन्त कौएका रूप धरकर श्रीरघुनाथजीका बल देखना चाहता है । जैसे महान् मन्दबुद्धि चींटी समुद्रका थाह पाना चाहती हो ॥३ ॥

सीता चरन चोंच हति भागा । मूढ़ मंदमति कारन कागा ॥

चला रुधिर रघुनायक जाना । सींक धनुष सायक संधाना ॥

वह मूढ़, मन्दबुद्धि कारणसे ( भगवान्‌के बलकी परीक्षा करनेके लिये ) बना हुआ कौआ सीताजीके चरणोंमें चोंच मारकर भागा । जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजीने जाना और धनुषपर सींक ( सरकंडे ) का बाण सन्धान किया ॥४ ॥

दो० – अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह ।

ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह ॥ १ ॥

पृष्ठ 623

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 623 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* अरण्यकाण्ड * ६२१ श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनोंपर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणोंके घर मूर्ख जयन्तने आकर छल| किया ॥१ ॥प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा चला भाजि बायस भय पावा ॥

धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं । राम बिमुख राखा तेहि नाहीं ॥

मन्त्रसे प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा । कौआ भयभीत होकर भाग चला । वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्रके पास गया, पर श्रीरामजीका विरोधी जानकर इन्द्रने उसको नहीं रखा ॥१ ॥

भा निरास उपजी मन त्रासा । जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥

ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका । फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका ॥

तब वह निराश हो गया, उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया; जैसे दुर्वासा ऋषिको चक्रसे भय हुआ था । वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकोंमें थका हुआ और भय- शोकसे व्याकुल होकर भागता फिरा ॥२ ॥

काहूँ बैठन कहा न ओही । राखि को सकइ राम कर द्रोही ॥

मातु मृत्यु पितु समन समाना । सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना ॥

[ पर रखना तो दूर रहा] किसीने उसे बैठनेतकके लिये नहीं कहा । श्रीरामजीके द्रोहीको कौन रख सकता है? [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं- ] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्युके समान, पिता यमराजके समान और अमृत विषके समान हो जाता है ॥३ ॥

मित्र करइ सत रिपु कै करनी । ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥

सब जगु ताहि अनलहु ते ताता । जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥

मित्र सैकड़ों शत्रुओंकी-सी करनी करने लगता है । देवनदी गङ्गाजी उसके लिये वैतरणी ( यमपुरीकी नदी ) हो जाती है । हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजीके विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्निसे भी अधिक गरम ( जलानेवाला ) हो जाता है ॥४ ॥

नारद देखा बिकल जयंता ॥ लागि दया कोमल चित संता ॥

पठवा तुरत राम पहिं ताही । कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥

नारदजीने जयन्तको व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतोंका चित्त बड़ा कोमल होता है । उन्होंने उसे [ समझाकर ] तुरंत श्रीरामजीके पास भेज दिया । उसने [जाकर ] पुकारकर कहा- हे शरणागतके हितकारी! मेरी रक्षा कीजिये ॥ ५ ॥

आतुर सभय गहेसि पद जाई ॥ त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥

अतुलित बल अतुलित प्रभुताई । मैं मतिमंद जानि नहिं पाई ॥

पृष्ठ 624

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 624 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *६२२ रामचरितमानस आतुर और भयभीत जयन्तने जाकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये [ और कहा— ] हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये । आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य ) -को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था ॥६ ॥

निज कृत कर्म जनित फल पायउँ । अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ ॥

सुनि कृपाल अति आरत बानी । एकनयन करि तजा भवानी ॥

अपने किये हुए कर्मसे उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया । अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिये । मैं आपकी शरण तककर आया हूँ । [शिवजी कहते हैं- ] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजीने उसकी अत्यन्त आर्त्त [ दुःखभरी ] वाणी सुनकर उसे एक आँखका काना करके छोड़ दिया ॥७ ॥

सो० – कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित ।

प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥ २ ॥

उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभुने कृपा करके उसे छोड़ दिया । श्रीरामजीके समान कृपालु और कौन होगा? ॥ २ ॥

रघुपति चित्रकूट बसि नाना । चरित किए श्रुति सुधा समाना ॥

बहुरि राम अस मन अनुमाना । होइहि भीर सबहिं मोहि जाना ॥

चित्रकूटमें बसकर श्रीरघुनाथजीने बहुत-से चरित्र किये, जो कानोंको अमृतके समान [ प्रिय ] हैं । फिर ( कुछ समय पश्चात्) श्रीरामजीने मनमें ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे [ यहाँ ] बड़ी भीड़ हो जायगी ॥ १ ॥

सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई । सीता सहित चले द्वौ भाई ॥

अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ । सुनत महामुनि हरषित भयऊ ॥

[इसलिये ] सब मुनियोंसे विदा लेकर सीताजीसहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजीके आश्रममें गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये ॥२ ॥

पुलकित गात अत्रि उठि धाए । देखि रामु आतुर चलि आए ।

करत दंडवत मुनि उर लाए । प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए ॥

शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े । उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रतासे चले आये । दण्डवत् करते हुए ही श्रीरामजीको [ उठाकर ] मुनिने हृदयसे लगा लिया और प्रेमाश्रुओंके जलसे दोनों जनोंको ( दोनों भाइयोंको ) नहला दिया ॥३ ॥

देखि राम छबि नयन जुड़ाने । सादर निज आश्रम तब आने ॥

करि पूजा कहि बचन सुहाए । दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥

पृष्ठ 625

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 625 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* अरण्यकाण्ड * ६२३ श्रीरामजीकी छबि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये । तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रममें ले आये । पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनिने मूल और फल दिये, जो प्रभुके मनको बहुत रुचे ॥४ ॥

सो०- प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि ।

मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत ॥ ३ ॥

प्रभु आसनपर विराजमान हैं । नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे— ॥३ ॥

छं० – नमामि भक्त वत्सलं । कृपालु शील कोमलं ।

भजामि ते पदांबुजं । अकामिनां स्वधामदं ॥ १ ॥ हे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाववाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । निष्काम

पुरुषोंको अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलोंको मैं भजता हूँ॥१ ॥

निकाम श्याम सुंदरं । भवांबुनाथ मंदरं । प्रफुल्ल कंज लोचनं । मदादि दोष मोचनं ॥ २ ॥

आप नितान्त सुन्दर श्याम, संसार [ आवागमन] रूपी समुद्रको मथनेके लिये मन्दराचलरूप, फूले हुए कमलके समान नेत्रोंवाले और मद आदि दोषोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥२ ॥

प्रलंब बाहु विक्रमं । प्रभोऽप्रमेय वैभवं । निषंग चाप सायकं । धरं त्रिलोकत्रिलोक नायकं ॥ ३ ॥

हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओंका पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय ( बुद्धिके परे अथवा असीम ) हैदिनेश। आप तरकसवंशऔर धनुषमंडनं- बाण धारण। महेशकरनेवाले तीनोंचापलोकोंके स्वामीखंडनं, ॥३। ॥

मुनींद्र संत रंजनं । सुरारिसुरारि वृंद भंजनं ॥ ४ ॥

सूर्यवंशके भूषण, महादेवजीके धनुषको तोड़नेवाले, मुनिराजों और संतोंको आनन्द देनेवाले तथा देवताओंके शत्रु असुरोंके समूहका नाश करनेवाले हैं ॥४ ॥

मनोज वैरि वंदितं । अजादि देव सेवितं । आप विशुद्धकामदेवके शत्रुबोधमहादेवजीकेविग्रहंद्वारा वन्दित। समस्त, ब्रह्मा आदि देवताओंसेदूषणापहंसेवित, विशुद्ध॥ ज्ञानमय५ ॥ विग्रह और समस्त दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं ॥५ ॥

नमामि इंदिरा पतिंपतिं ॥ सुखाकरंसुखाकरं सतां गतिं ।

भजे सशक्ति सानुजं । शची पति प्रियानुजं ॥ ६ ॥

पृष्ठ 626

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 626 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *६२४ रामचरितमानस हे लक्ष्मीपते! हे सुखोंकी खान और सत्पुरुषोंकी एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे शचीपति ( इन्द्र ) के प्रिय छोटे भाई ( वामनजी )! स्वरूपा - शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित आपको मैं भजता हूँ ॥ ६ ॥

त्वदंघ्रि मूल ये नराः । भजंति हीन मत्सराः ।

पतंति नो भवार्णवे । वितर्क वीचि संकुले ॥ ७ ॥

जो मनुष्य मत्सर ( डाह ) रहित होकर आपके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, वे तर्क -वितर्क ((अनेक प्रकारके सन्देह ) रूपी तरङ्गोंसे पूर्ण संसाररूपी समुद्रमें नहीं गिरते ( आवागमनके चक्करमें नहीं पड़ते) ॥ ७ ॥

विविक्त वासिनः सदा । भजंति मुक्तये मुदा ।

निरस्य इंद्रियादिकं । प्रयांति ते गतिं स्वकं ॥ ८ ॥

जो एकान्तवासी पुरुष मुक्तिके लिये, इन्द्रियादिका निग्रह करके ( उन्हें विषयोंसे हटाकर ) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गतिको ( अपने स्वरूपको) प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥

तमेकमद्भुतं प्रभुं । निरीहमीश्वरं विभुं । उन ( जगद्गुरुंआप ) को जो एकच( अद्वितीयशाश्वतं), अद्भुत। तुरीयमेव( मायिक जगत्से विलक्षणकेवलं), प्रभु ( ॥सर्वसमर्थ९ )॥, इच्छारहित, ईश्वर ( सबके स्वामी ), व्यापक, जगद्गुरु, सनातन ( नित्य), तुरीय ( तीनों गुणोंसे सर्वथा स्वरूपमें ॥९ ॥

परे ) और भजामि केवल ( अपनेभाव वल्लभं स्थित ) हैं । कुयोगिनां सुदुर्लभं । स्वभक्त कल्प [ तथा ] जो भावप्रिय, कुयोगियों पादपं( विषयी ।पुरुषोंसमं) के लिये अत्यन्तसुसेव्यमन्वहंदुर्लभ, अपने भक्तोंके॥ १०लिये॥ कल्पवृक्ष ( अर्थात् उनकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले ), सम ( पक्षपातरहित ) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ ॥१० ॥

अनूप रूप भूपतिं । नतोऽहमुर्विजा पतिं ।

प्रसीद में नमामि ते । पदाब्ज भक्ति देहि मे ॥ ११ ॥

हे अनुपम सुन्दर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ । मुझपर प्रसन्न होइये, मैं पठंतिआपको नमस्कारये स्तवंकरता हूँ । मुझेइदं अपने। नरादरेणचरणकमलोंकी भक्तिते दीजियेपदं॥११। ॥

व्रजंति नात्र संशयं । त्वदीय भक्ति संयुताः ॥ १२ ॥

जो मनुष्य इस स्तुतिको आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्तिसे युक्त होकर आपके परमपदको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ॥ १२ ॥

पृष्ठ 627

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 627 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* अरण्यकाण्ड * ६२५

दो० - बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि ।

चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥४ ॥

मुनिने [ इस प्रकार ] विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा- हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलोंको कभी न छोड़े ॥ ४ ॥

अनुसुइया के पद गहि सीता । मिली बहोरि सुसील बिनीता ॥

रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई । आसिष देइ निकट बैठाई ॥

फिर परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी [अत्रिजीकी पत्नी ] अनसूयाजीके चरण पकड़कर उनसे मिलीं । ऋषिपत्नीके मनमें बड़ा सुख हुआ । उन्होंने आशिष देकर सीताजीको पास बैठा लिया ॥ १ ॥

दिब्य बसन भूषन पहिराए । जे नित नूतन अमल सुहाए ॥

कह रिषिबधू सरस मृदु बानी । नारिधर्म कछु ब्याज बखानी ॥

और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य- नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं । फिर ऋषिपत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणीसे स्त्रियोंके कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं ॥२ ॥

मातु पिता भ्राता हितकारी । मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥

अमित दानि भर्ता बयदेही । अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥

हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमातक ही [ सुख ] देनेवाले हैं । परन्तु हे जानकी! पति तो [ मोक्षरूप ] असीम [ सुख ] देनेवाला है । वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पतिकी सेवा नहीं करती ॥३ ॥

धीरज धर्म मित्र अरु नारी । आपद काल परिखिअहिं चारी ॥

बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना । अंध बधिर क्रोधी अति दीना ॥

धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री- इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है । वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन— ॥४ ॥

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना । नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥

एकइ धर्म एक ब्रत नेमा । कायँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥

ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति- भाँतिके दुःख पाती है । शरीर, वचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है ॥५ ॥

पृष्ठ 628

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 628 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* *६२६ रामचरितमानस

जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं । बेद पुरान संत सब कहहीं ॥

उत्तम के अस बस मन माहीं । सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं ॥

जगत्में चार प्रकारकी पतिव्रताएँ हैं वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणीकी पतिव्रताके मनमें ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत्में [ मेरे पतिको छोड़कर] दूसरा पुरुष स्वप्नमें भी नहीं है ॥६ ॥

मध्यम परपति देखइ कैसें । भ्राता पिता पुत्र निज जैसें ॥

धर्म बिचारि समुझि कुल रहई । सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई ॥

मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता पराये पतिको कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो । ( अर्थात् समान अवस्थावालेको वह भाईके रूपमें देखती है, बड़ेको पिताके रूपमें और छोटेको पुत्रके रूपमें देखती है । ) जो धर्मको विचारकर और अपने कुलकी मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट ( निम्नश्रेणीकी ) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं ॥ ७ ॥

बिनु अवसर भय तें रह जोई । जानेहु अधम नारि जग सोई ॥

पति बंचक परपति रति करई । रौरव नरक कल्प सत परई ॥

और जो स्त्री मौका न मिलनेसे या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत्में उसे अधम स्त्री जानना । पतिको धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पतिसे रति करती है, वह तो सौ कल्पतक रौरव नरकमें पड़ी रहती है ॥८ ॥

छन सुख लागि जनम सत कोटी । दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥

बिनु श्रम नारि परम गति लहई । पतिव्रत धर्म छाड़ि छल गई ॥

क्षणभरके सुखके लिये जो सौ करोड़ ( असंख्य ) जन्मोंके दुःखको नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी । जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत - धर्मको ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गतिको प्राप्त करती है॥९॥

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई । बिधवा होइ पाइ तरुनाई ॥

किन्तु जो पतिके प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर ( भरी जवानीमें ) विधवा हो जाती है ॥ १० ॥

सो० – सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ ।

जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय ॥ ५ ( क ) ॥

स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किन्तु पतिकी सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है । [ पातिव्रतधर्मके कारण ही ] आज भी ' तुलसीजी ' भगवान्‌को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं ॥ ५ ( क ) ॥

पृष्ठ 629

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 629 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* अरण्यकाण्ड * ६२७

सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारि पतिब्रत करहिं ।

तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित ॥ ५ ( ख ) ॥

हे सीता! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले- लेकर स्त्रियाँ पातिव्रतधर्मका पालन करेंगी । तुम्हें तो श्रीरामजी प्राणोंके समान प्रिय हैं, यह ( पातिव्रतधर्मकी ) कथा तो मैंने संसारके हितके लिये कही है ॥५ (ख ) ॥

सुनि जानकी परम सुखु पावा । सादर तासु चरन सिरु नावा ॥

तब मुनि सन कह कृपानिधाना । आयसु होइ जाउँ बन आना ॥

जानकीजीने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणोंमें सिर नवाया । तब कृपाकी खान श्रीरामजीने मुनिसे कहा- आज्ञा हो तो अब दूसरे वनमें जाऊँ ॥ १ ॥

संतत मो पर कृपा करेहू । सेवक जानि तजेहु जनि नेहू ॥

धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी । सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी ॥

मुझपर निरन्तर कृपा करते रहियेगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़ियेगा । धर्मधुरन्धर प्रभु श्रीरामजीके वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले—॥२ ॥

जासु कृपा अज सिव सनकादी । चहत सकल परमारथ बादी ॥

ते तुम्ह राम अकाम पिआरे । दीन बंधु मृदु बचन उचारे ॥

ब्रह्मा, शिव और सनकादि सभी परमार्थवादी ( तत्त्ववेत्ता ) जिनकी कृपा चाहते हैं, हे रामजी! आप वही निष्काम पुरुषोंके भी प्रिय और दीनोंके बन्धु भगवान् हैं, जो इस प्रकार कोमल वचन बोल रहे हैं ॥३ ॥

अब जानी मैं श्री चतुराई । भजी तुम्हहि सब देव बिहाई ॥

जेहि समान अतिसय नहिं कोई । ता कर सील कस न अस होई ॥

अब मैंने लक्ष्मीजीकी चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओंको छोड़कर आपहीको भजा । जिसके समान [ सब बातोंमें ] अत्यन्त बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला, ऐसा क्यों न होगा? ॥४ ॥

केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी । कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी ॥

अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा । लोचन जल बह पुलक सरीरा ॥

मैं किस प्रकार कहूँ कि हे स्वामी! आप अब जाइये? हे नाथ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिये । ऐसा कहकर धीर मुनि प्रभुको देखने लगे । मुनिके नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बह रहा है और शरीर पुलकित है ॥५ ॥

पृष्ठ 630

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 630 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

*:*६२८ रामचरितमानस

छं० – तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए ।

मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए ॥

जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई ।

रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई ॥

मुनि अत्यन्त प्रेमसे पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रोंको श्रीरामजीके मुखकमलमें लगाये हुए हैं । [ मनमें विचार रहे हैं कि ] मैंने ऐसे कौन-से जप-तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियोंसे परे प्रभुके दर्शन पाये । जप, योग और धर्म-समूहसे मनुष्य अनुपम भक्तिको पाता है । श्रीरघुवीरके पवित्र चरित्रको तुलसीदास रात-दिन गाता है ।

दो० – कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल ।

सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल ॥ ६ ( क ) ॥

श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर यश कलियुगके पापोंका नाश करनेवाला, मनको दमन करनेवाला और सुखका मूल है । जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उनपर श्रीरामजी प्रसन्न रहते हैं ॥ ६ ( क ) ॥

सो० – कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप ।

परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर ॥ ६ ( ख ) ॥

यह कठिन कलिकाल पापोंका खजाना है; इसमें न धर्म है, न ज्ञान है और न योग तथा जप ही है । इसमें तो जो लोग सब भरोसोंको छोड़कर श्रीरामजीको ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं ॥ ६ ( ख) ॥

मुनि पद कमल नाइ करि सीसा । चले बनहि सुर नर मुनि ईसा ॥

आगें राम अनुज पुनि पाछें । मुनि बर बेष बने अति काछें ॥

मुनिके चरणकमलोंमें सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियोंके स्वामी श्रीरामजी वनको चले । आगे श्रीरामजी हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मणजी हैं । दोनों ही मुनियोंका सुन्दर वेष बनाये अत्यन्त सुशोभित हैं ॥ १ ॥

उभय बीच श्री सोहइ कैसी । ब्रह्म जीव बिच माया जैसी ॥

सरिता बन गिरि अवघट घाटा । पति पहिचानि देहिं बर बाटा ॥

दोनोंके बीचमें श्रीजानकीजी कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीवके बीच माया हो । नदी, वन, पर्वत और दुर्गम घाटियाँ, सभी अपने स्वामीको पहचानकर सुन्दर रास्ता दे देते हैं ॥२ ॥

जहँ जहँ जाहिं देव रघुराया । करहिं मेघ तहँ तहँ नभ छाया ॥

मिला असुर बिराध मग जाता । आवतहीं रघुबीर निपाता ॥॥

जहाँ- जहाँ देव श्रीरघुनाथजी जाते हैं, वहाँ- वहाँ बादल आकाशमें छाया करते जाते हैं । रास्तेमें

जाते हुए विराध राक्षस मिला । सामने आते ही श्रीरघुनाथजीने उसे मार डाला ॥३ ॥