श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 611–620
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 611–620
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* * अयोध्याकाण्ड ६० ९
दो० –- मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ ।
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ ॥ ३१६ ॥
भरतजीने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया । इधर कुटिल इन्द्रने बुरा मौका पाकर लोगोंका उच्चाटन कर दिया ॥३१६ ॥
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी । अवधि आस सम जीवनि जी की ॥
नतरु लखन सिय राम बियोगा । हहरि मरत सब लोग कुरोगा ॥
वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी । अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये संजीवनी हो गयी । नहीं तो (उच्चाटन न होता तो ) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर ( हाय-हाय करके ) मर ही
जातेरामकृपाँ॥ १ ॥ अवरेब सुधारी । बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ॥
भेंट भुज भरि भाइ भरत सो । राम प्रेम रसु कहि न परत सो ॥
श्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी । देवताओंकी सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक ( हितकारी ) और रक्षक बन गयी । श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल रहे हैं । श्रीरामजीके प्रेमका वह रस ( आनन्द ) कहते नहीं बनता ॥२ ॥
तन मन बचन उमग अनुरागा ॥ धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ॥
बारिज लोचन मोचत बारी । देखि दसा सुर सभा दुखारी ॥
तन, मन और वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा । धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीने भी धीरज त्याग दिया । वे कमलसदृश नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका ] जल बहाने लगे । उनकी यह दशा देखकर देवताओंकी सभा ( समाज) दुःखी हो गयी ॥ ३ ॥
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से । ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥
जे बिरंचि निरलेप उपाए । पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥
मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी- सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्निमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निर्लेप ही रचा और जो जगत्रूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह ही ( जगत् में रहते हुए भी जगत्से अनासक्त) पैदा हुए, ॥ ४ ॥
दो० - तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार ।
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार ॥ ३१७ ॥
वे भी श्रीरामजी और भरतजीके उपमारहित अपार प्रेमको देखकर वैराग्य और विवेकसहित तन, मन, वचनसे उस प्रेममें मग्न हो गये ॥३१७ ॥
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* *६१० रामचरितमानस
जहाँ जनक गुर गति मति भोरी । प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥
बरनत रघुबर भरत बियोगू । सुनि कठोर कबि जानिहि लोग ॥
जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत ( लौकिक ) कहनेमें बड़ा दोष है । श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहृदय समझेंगे ॥१ ॥
सो सकोच रसु अकथ सुबानी । समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ॥
भेंटि भरतु रघुबर समुझाए । पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ॥
वह संकोच-रस-र अकथनीय है । अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी । भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया । फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया ॥२ ॥
सेवक सचिव भरत रुख पाई । निज निज काज लगे सब जाई ॥
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा । लगे चलन के साजन साजा ॥
सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने - अपने काममें जा लगे । यह सुनकर दोनों
समाजोंमें दारुण दुःख छा गया । वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे ॥३ ॥
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई । चले सीस धरि राम रजाई ॥
मुनि तापस बनदेव निहोरी । सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥
प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर भरत- शत्रुघ्न दोनों भाई चले । मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की ॥४ ॥
दो० – लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि ।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ॥ ३१८ ॥
फिर लक्ष्मणजीको क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको सिरपर धारण करके और समस्त मङ्गलोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले ॥३१८ ॥
सानुज राम नृपहि सिर नाई । कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ॥
देव दया बस बड़ दुखु पायउ । सहित समाज काननहिं आयउ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे विनती और बड़ाई की [ और कहा— ] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया । आप समाजसहित वनमें आये ॥१ ॥
पुर पगु धारिअ देइ असीसा । कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ॥
मुनि महिदेव साधु सनमाने । बिदा किए हरि हर सम जाने ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ६११ अब आशीर्वाद देकर नगरको पधारिये । यह सुन राजा जनकजीने धीरज धरकर गमन किया । फिर श्रीरामचन्द्रजीने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु और शिवके समान जानकर सम्मान करके उनको विदा किया ॥२ ॥
सासु समीप गए दोउ भाई । फिरे बंदि पग आसिष पाई ॥
कौसिक बामदेव जाबाली । पुरजन परिजन सचिव सुचाली ॥
तब श्रीराम- लक्ष्मण दोनों भाई सास ( सुनयनाजी ) के पास गये और उनके चरणोंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आये । फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरणवाले कुटुम्बी, नगरनिवासी और मन्त्री- ॥३ ॥
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा । बिदा किए सब सानुज रामा ॥
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे । सब सनमानि कृपानिधि फेरे ॥
सबको छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया । कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने छोटे, मध्यम ( मझले ) और बड़े सभी श्रेणीके स्त्री - पुरुषोंका सम्मान करके उनको लौटाया ॥४ ॥
दो० – भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंट ।
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि ॥ ३१ ९ ॥
भरतकी माता कैकेयीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने पवित्र ( निश्छल ) प्रेमके साथ उनसे मिल- भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोचको मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया ॥ ३१ ९ ॥
परिजन मातु पितहि मिलि सीता । फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता ॥
करि प्रनामु भेंटीं सब सासू । प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू ॥
प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजीके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहरके कुटुम्बियोंसे तथा माता - पितासे मिलकर लौट आयीं । फिर प्रणाम करके सब सासुओंसे गले लगकर मिलीं । उनके प्रेमका वर्णन करनेके लिये कविके हृदयमें हुलास ( उत्साह ) नहीं होता ॥१ ॥
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई । रही सीय दुहु प्रीति समाई ॥
रघुपति पटु पालकीं मगाईं । करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाईं ॥
उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता- पिता दोनों ओरकी प्रीतिमें समायी ( बहुत देरतक निमग्न) रहीं! [ तब ] श्रीरघुनाथजीने सुन्दर पालकियाँ मँगवायीं और सब माताओंको आश्वासन देकर उनपर चढ़ाया ॥२ ॥
बार बार हिलि मिलि दुहु भाईं । सम सनेहँ जननीं पहुँचाईं ॥
साजि बाजि गज बाहन नाना । भरत भूप दल कीन्ह पयाना ॥
दोनों भाइयोंने माताओंसे समान प्रेमसे बार-बार मिल- जुलकर उनको पहुँचाया । भरतजी और राजा जनकजीके दलोंने घोड़े, हाथी और अनेकों तरहकी सवारियाँ सजाकर प्रस्थान किया ॥ ३ ॥
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* *६१२ रामचरितमानस
हृदयँ रामु सिय लखन समेता । चले जाहिं सब लोग अचेता ॥
बसह बाजि गज पसु हियँ हारें । चले जाहिं परबस मन मारें ॥
सीताजी एवं लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर सब लोग बेसुध हुए चले जा रहे हैं । बैल, घोड़े, हाथी आदि पशु हृदयमें हारे ( शिथिल) हुए परवश मनमारे चले जा रहे हैं ॥ ४ ॥
दो० - गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत ।
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत ॥ ३२० ॥
गुरु वसिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विषादके साथ लौटकर पर्णकुटीपर आये ॥ ३२० ॥
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू । चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥
कोल किरात भिल्ल बनचारी । फेरे फिरे जोहारि जोहारी ॥
फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया । वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदयमें विरहका बड़ा भारी विषाद था । फिर श्रीरामजीने कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगोंको लौटाया । वे सब जोहार-जोहारकर ( वन्दना कर- करके ) लौटे ॥ १ ॥
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं । प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं ॥
भरत सनेह सुभाउ सुबानी । प्रिया अनुज सन कहत बखानी ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़की छायामें बैठकर प्रियजन एवं परिवारके वियोगसे दुखी हो रहे हैं । भरतजीके स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणीको बखान-बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसे कहने लगे ॥ २ ॥
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी । श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी ॥
तेहि अवसर खग मृग जल मीना । चित्रकूट चर अचर मलीना ॥
श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमके वश होकर भरतजीके वचन, मन, कर्मकी प्रीति तथा विश्वासका अपने श्रीमुखसे वर्णन किया । उस समय पक्षी, पशु और जलकी मछलियाँ, चित्रकूटके सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये ॥३ ॥
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की । बरषि सुमन कहि गति घर घर की ॥
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो । चले मुदित मन डर न खरो सो ॥
श्रीरघुनाथजीकी दशा देखकर देवताओंने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर- घरकी दशा कही (दुखड़ा सुनाया) । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया । तब वे प्रसन्न होकर चले, मनमें जरा -सा भी डर न रहा ॥ ४ ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ६१३
दो० –- सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर ।
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर ॥ ३२१ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसमेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों ॥ ३२१ ॥
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू । राम बिरहँ सबु साजु बिहालू ॥
प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं । सब चुपचाप चले मग जाहीं ॥
मुनि, ब्राह्मण, गुरु वसिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी-सारा समाज श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें विह्वल है । प्रभुके गुणसमूहोंका मनमें स्मरण करते हुए सब लोग मार्गमें चुपचाप चले जा रहे हैं ॥१ ॥
जमुना उतरि पार सबु भयऊ । सो बासरु बिनु भोजन गयऊ ॥
उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
[ पहले दिन ] सब लोग यमुनाजी उतरकर पार हुए । वह दिन बिना भोजनके ही बीत गया । दूसरा मुकाम गङ्गाजी उतरकर ( गङ्गापार शृङ्गवेरपुरमें) हुआ । वहाँ रामसखा निषादराजने सब सुप्रबन्ध कर दिया ॥ २ ॥
सई उतरि गोमतीं नहाए । चौथें दिवस अवधपुर आए ॥
जनकु रहे पुर बासर चारी । राज काज सब साज सँभारी ॥
फिर सई उतरकर गोमतीजीमें स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी जा पहुँचे । जनकजी चार दिन अयोध्याजीमें रहे और राजकाज एवं सब साज-सामानको सँभालकर, ॥३ ॥
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू । तेरहुति चले साजि सबु साजू॥
नगर नारि नर गुर सिख मानी । बसे सुखेन राम रजधानी ॥
तथा मन्त्री, गुरुजी तथा भरतजीको राज्य सौंपकर सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुतको चले | नगरके स्त्री- पुरुष गुरुजीकी शिक्षा मानकर श्रीरामजीकी राजधानी अयोध्याजीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ४ ॥
दो० - राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास ।
तजितजि भूषन भोग सुखजिअत अवधि कीं आस ॥ ३२२ ॥
सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और उपवास करने लगे । वे भूषण और भोग- सुखोंको छोड़- छाड़कर अवधिकी आशापर जी रहे हैं ॥३२२ ॥
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे । निज निज काज पाइ सिख ओधे ॥
पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई । सौंपी सकल मातु सेवकाई ॥
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* *६१४ रामचरितमानस भरतजीने मन्त्रियों और विश्वासी सेवकोंको समझाकर उद्यत किया । वे सब सीख पाकर अपने- अपने काममें लग गये । फिर छोटे भाई शत्रुघ्रजीको बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओंकी सेवा उनको सौंपी ॥१ ॥
भूसुर बोलि भरत कर जोरे । करि प्रनाम बय बिनय निहोरे ॥
ऊँच नीच कारजु भल पोचू । आयसु देब न करब सँकोचू॥
ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतजीने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्थाके अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊँचा- नीचा ( छोटा- बड़ा ), अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये
आज्ञा दीजियेगा । संकोच न कीजियेगा ॥२ ॥
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए । समाधानु करि सुबस बसाए ॥
सानुज गे गुर गेहँ बहोरी । करि दंडवत कहत कर जोरी ॥
भरतजीने फिर परिवारके लोगोंको, नागरिकोंको तथा अन्य प्रजाको बुलाकर, उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया । फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजीसहित वे गुरुजीके घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले– ॥३ ॥
आयसु होइ त रहौं सनेमा । बोले मुनि तन पुलकि सपेमा ॥
समुझब कहब करब तुम्ह जोई । धरम सारु जग होइहि सोई ॥
आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ! मुनि वसिष्ठजी पुलकितशरीर हो प्रेमके साथ बोले — हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत्में धर्मका सार होगा ॥४ ॥
दो० - सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि ।
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि ॥ ३२३ ॥
भरतजीने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियोंको बुलाया और दिन ( अच्छा मुहूर्त ) साधकर प्रभुकी चरणपादुकाओंको निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासनपर विराजित कराया ॥ ३२३ ॥
राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ॥
नंदिगावँ करि परन कुटीरा । कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा ॥
फिर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी और गुरुजीके चरणोंमें सिर नवाकर और प्रभुकी चरणपादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मकी धुरी धारण करनेमें धीर भरतजीने नन्दिग्राममें पर्णकुटी बनाकर उसीमें निवास किया ॥१ ॥
जटाजूट सिर मुनिपट धारी । महि खनि कुस साँथरी सँवारी ॥
असन बसन बासन ब्रत नेमा । करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ॥
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* * अयोध्याकाण्ड ६१५ सिरपर जटाजूट और शरीरमें मुनियोंके [ वल्कल ] वस्त्र धारण कर, पृथ्वीको खोदकर उसके अंदर कुशकी आसनी बिछायी । भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत, नियम- सभी बातोंमें वे ऋषियोंके कठिन धर्मका प्रेमसहित आचरण करने लगे ॥ २ ॥
भूषन बसन भोग सुख भूरी । मन तन बचन तजे तिन तूरी ॥
अवध राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥
गहने - कपड़े और अनेकों प्रकारके भोग- सुखोंको मन, तन और वचनसे तृण तोड़कर ( प्रतिज्ञा करके ) त्याग दिया । जिस अयोध्याके राज्यको देवराज इन्द्र सिहाते थे और [जहाँके राजा ] दशरथजीकी सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे, ॥३ ॥
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥
रमा बिलासु राम अनुरागी । तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥
उसी अयोध्यापुरीमें भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पाके बागमें भौंरा । श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मीके विलास [ भोगैश्वर्य ] को वमनकी भाँति त्याग देते हैं ( फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं) ॥४ ॥
दो० – राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ।
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥ ३२४ ॥
फिर भरतजी तो [ स्वयं ] श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके पात्र हैं । वे इस ( भोगैश्वर्यत्यागरूप ) करनीसे बड़े नहीं हुए ( अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है ) । [ पृथ्वीपरका जल न पीनेकी ] टेकसे चातककी और नीर- क्षीर- विवेककी विभूति ( शक्ति ) से हंसकी भी सराहना होती है ॥ ३२४ ॥
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥
नित नव राम प्रेम पनु पीना । बढ़त धरम दलु मनु न मलीना ॥
भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है । तेज ( अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद* ) घट रहा है । बल और मुखछबि ( मुखकी कान्ति अथवा शोभा ) वैसी ही बनी हुई है । रामप्रेमका प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है ( अर्थात् प्रसन्न है ) ॥ १ ॥
* संस्कृत- कोषमें ' तेज ' का अर्थ मेद मिलता है और यह अर्थ लेनेसे ' घटइ ' के अर्थमें भी
किसी प्रकारकी खींच-तान नहीं करनी पड़ती ।
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे । बिलसत बेतस बनज बिकासे ॥
सम दम संजम नियम उपासा । नखत भरत हिय बिमल अकासा ॥
जैसे शरद् ऋतुके प्रकाश [ विकास] से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं । शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजीके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र ( तारागण ) हैं ॥ २ ॥
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* *६१६ रामचरितमानस
ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी । स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी ॥
राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ॥
विश्वास ही [ उस आकाशमें ] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि [ का ध्यान ] पूर्णिमाके समान है और स्वामी श्रीरामजीकी सुरति ( स्मृति) आकाशगङ्गा- सरीखी प्रकाशित है । रामप्रेम ही अचल ( सदा रहनेवाला ) और कलङ्करहित चन्द्रमा है । वह अपने समाज ( नक्षत्रों ) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है ॥ ३ ॥
भरत रहनि समुझनि करतूती । भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥
बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं । सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥
भरतजीकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्यका वर्णन करनेमें सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [ औरोंकी तो बात ही क्या ] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है ॥४ ॥
दो० - नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति ।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति ॥ ३२५ ॥
वे नित्यप्रति प्रभुकी पादुकाओंका पूजन करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं है । पादुकाओंसे आज्ञा माँग- माँगकर वे बहुत प्रकार ( सब प्रकारके ) राज- काज करते हैं ॥ ३२५ ॥
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू । जीह नामु जप लोचन नीरू ॥
लखन राम सिय कानन बसहीं । भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ॥
शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता- रामजी हैं । जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रोंमें प्रेमका जल भरा है । लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं, परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं ॥ १ ॥
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू । सब बिधि भरत सराहन जोगू॥
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं । देखि दसा मुनिराज लजाहीं ॥
दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकारसे सराहने योग्य हैं । उनके व्रत और नियमोंको सुनकर साधु - संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं ॥२ ॥
परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥
भरतजीका परम पवित्र आचरण ( चरित्र ) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मङ्गलोंका करनेवाला है । कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है । महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है ॥३ ॥
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* ** अयोध्याकाण्ड ६१७
पाप पुंज कुंजर मृगराजू । समन सकल संताप समाजू ॥
जन रंजन भंजन भव भारू । राम सनेह सुधाकर सारू ॥
पापसमूहरूपी हाथीके लिये सिंह है । सारे सन्तापोंके दलका नाश करनेवाला है । भक्तोंको आनन्द देनेवाला और भवके भार ( संसारके दुःख) -का भञ्जन करनेवाला तथा श्रीरामप्रेमरूपी चन्द्रमाका सार ( अमृत) है ॥४ ॥
छं० - सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को
मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को ॥
दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को ।
कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥
श्रीसीतारामजीके प्रेमरूपी अमृतसे परिपूर्ण भरतजीका जन्म यदि न होता तो मुनियोंके मनको भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतोंका आचरण कौन करता? दुःख, सन्ताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषोंको अपने सुयशके बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकालमें तुलसीदास- जैसे शठोंको हठपूर्वक कौन श्रीरामजीके सम्मुख करता?
सो० - भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं ।
सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ॥ ३२६ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं -जो कोई भरतजीके चरित्रको नियमसे आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-रससे वैराग्य होगा ॥ ३२६ ॥
मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः । कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह दूसरा सोपान समाप्त हुआ । ( अयोध्याकाण्ड समाप्त )
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अत्रिके अतिथि
- पूजा कहि बचन सुहाए । दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥