श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 641–650
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650
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* अरण्यकाण्ड * ६३ ९ पक्षी और पशुओंके समूह आनन्दित रहते हैं और भौरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं । जहाँ प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वनका वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते ॥२ ॥
एक बार प्रभु सुख आसीना । लछिमन बचन कहे छलहीना ॥
सुर नर मुनि सचराचर साईं । मैं पूछउँ निज प्रभु की नाईं ॥
एक बार प्रभु श्रीरामजी सुखसे बैठे हुए थे । उस समय लक्ष्मणजीने उनसे छलरहित ( सरल ) वचन कहे — हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचरके स्वामी! मैं अपने प्रभुकी तरह ( अपना स्वामी समझकर ) आपसे पूछता हूँ॥३ ॥
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा । सब तजि करौं चरन रज सेवा ॥
कहहु ग्यान बिराग अरु माया । कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया ॥
हे देव! मुझे समझाकर वही कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरजकी ही सेवा करूँ । ज्ञान, वैराग्य और मायाका वर्णन कीजिये, और उस भक्तिको कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं ॥४ ॥
दो० - ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ ।
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ ॥१४ ॥
हे प्रभो! ईश्वर और जीवका भेद भी सब समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणोंमें मेरी प्रीति हो और शोक, मोह तथा भ्रम नष्ट हो जायँ ॥ १४ ॥
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई । सुनहु तात मति मन चित लाई ॥
मैं अरु मोर तोर तैं माया । जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया ॥
( श्रीरामजीने कहा— ) हे तात! मैं थोड़ेहीमें सब समझाकर कहे देता हूँ । तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो । मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवोंको वशमें कर रखा है ॥१ ॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई । सो सब माया जानेहु भाई ॥
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ । बिद्या अपर अबिद्या दोऊ ॥
इन्द्रियोंके विषयोंको और जहाँतक मन जाता है, हे भाई! उस सबको माया जानना । उसके भी-एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदोंको तुम सुनो- ॥२ ॥
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा । जा बस जीव परा भवकूपा ॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें । प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें ॥
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* *६४० रामचरितमानस एक ( अविद्या ) दुष्ट ( दोषयुक्त ) है और अत्यन्त दुःखरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूपी कुएँमें पड़ा हुआ है । और एक ( विद्या ) जिसके वशमें गुण है और जो जगत्की रचना करती है, वह प्रभुसे ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है ॥३ ॥
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं । देख ब्रह्म समान सब माहीं ॥
कहिअ तात सो परम बिरागी । तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी ॥
ज्ञान वह है जहाँ ( जिसमें ) मान आदि एक भी [दोष ] नहीं है और जो सबमें समानरूपसे ब्रह्मको देखता है । हे तात! उसीको परम वैराग्यवान् कहना चाहिये जो सारी सिद्धियोंको और तीनों गुणोंको तिनकेके समान त्याग चुका हो ॥ ४ ॥
[जिसमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढ़ापन, आचार्यसेवाका अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मनका निगृहीत न होना, इन्द्रियोंके विषयमें आसक्ति, अहंकार, जन्म - मृत्यु -जरा- व्याधिमय जगत्में सुखबुद्धि, स्त्री- पुत्र -घर आदिमें आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिमें हर्ष- शोक, भक्तिका अभाव, एकान्तमें मन न लगना, विषयी मनुष्योंके संगमें प्रेम- ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म ( आत्मा ) में स्थिति तथा तत्त्वज्ञानके अर्थ ( तत्त्वज्ञानके द्वारा जाननेयोग्य ) परमात्माका नित्य दर्शन हो, वही ज्ञान कहलाता है । देखिये गीता अध्याय १३ । ७ से ११ ]
दो० – माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव ।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव ॥ १५ ॥
जो मायाको, ईश्वरको और अपने स्वरूपको नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये । जो [ कर्मानुसार ] बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और मायाका प्रेरक है वह ईश्वर है ॥ १५ ॥
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना । ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ॥
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई । सो मम भगति भगत सुखदाई ॥
धर्म ( के आचरण ) से वैराग्य और योगसे ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्षका देनेवाला है- ऐसा वेदोंने वर्णन किया है । और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ, वह मेरी भक्ति है जो भक्तोंको सुख देनेवाली है ॥ १ ॥
सो सुतंत्र अवलंब न आना । तेहि आधीन ग्यान बिग्याना ॥
भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ॥
वह भक्ति स्वतन्त्र है, उसको ( ज्ञान-विज्ञान आदि किसी ) दूसरे साधनका सहारा ( अपेक्षा ) नहीं है । ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं । हे तात! भक्ति अनुपम एवं सुखकी मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल ( प्रसन्न ) होते हैं ॥२ ॥
भगति कि साधन कहउँ बखानी । सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ॥
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती । निज निज कर्म निरत श्रुति रीती ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६४१ अब मैं भक्तिके साधन विस्तारसे कहता हूँ-यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं । पहले तो ब्राह्मणोंके चरणोंमें अत्यन्त प्रीति हो और वेदकी रीतिके अनुसार अपने-अपने [ वर्णाश्रमके ] कर्मोंमें लगा रहे ॥ ३ ॥
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा । तब मम धर्म उपज अनुरागा ॥
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं । मम लीला रति अति मन माहीं ॥
इसका फल, फिर विषयोंसे वैराग्य होगा । तब ( वैराग्य होनेपर ) मेरे धर्म ( भागवतधर्म ) में प्रेम उत्पन्न होगा । तब श्रवण आदि नौ प्रकारकी भक्तियाँ दृढ़ होंगी और मनमें मेरी लीलाओंके प्रति अत्यन्त प्रेम होगा ॥ ४ ॥
संत चरन पंकज अति प्रेमा । मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा । सब मोहि कहँ जानै दृढ़दृढ़ सेवा ॥
जिसका संतोंके चरणकमलोंमें अत्यन्त प्रेम हो; मन, वचन और कर्मसे भजनका दृढ़ नियम हो और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवामें दृढ़ हो; ॥५ ॥
मम गुन गावत पुलक सरीरा । गदगद गिरा नयन बह नीरा ॥
काम आदि मद दंभ न जाकें । तात निरंतर बस मैं ताकें ॥
मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद हो जाय और नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, हे भाई! मैं सदा उसके वशमें रहता हूँ॥६ ॥
दो० – बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम ।
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम ॥ १६ ॥
जिनको कर्म, वचन और मनसे मेरी ही गति है; और जो निष्काम भावसे मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय- कमलमें मैं सदा विश्राम किया करता हूँ॥ १६ ॥
भगति जोग सुनि अति सुख पावा । लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती । कहत बिराग ग्यान गुन नीती ॥
इस भक्तियोगको सुनकर लक्ष्मणजीने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें सिर नवाया । इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये ॥१ ॥
सूपनखा रावन कै बहिनी ॥ दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी ॥
पंचबटी सो गई एक बारा । देखि बिकल भइ जुगल कुमारा ॥
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* *६४२ रामचरितमानस शूर्पणखा नामक रावणकी एक बहिन थी, जो नागिनके समान भयानक और दुष्ट हृदयकी थी । वह एक बार पञ्चवटीमें गयी और दोनों राजकुमारोंको देखकर विकल ( कामसे पीड़ित) हो गयी ॥२ ॥
भ्राता पिता पुत्र उरगारी । पुरुष मनोहर निरखत नारी ॥
होइ बिकल सक मनहि न रोकी । जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी ॥
( काकभुशुण्डिजी कहते हैं — ) हे गरुड़जी! ( शूर्पणखा-जैसी राक्षसी, धर्मज्ञानशून्य कामान्ध ) स्त्री मनोहर पुरुषको देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मनको नहीं रोक सकती । जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्यको देखकर द्रवित हो जाती है ( ज्वालासे पिघल जाती है ) ॥३ ॥
रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई । बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी । यह सँजोग बिधि रचा बिचारी ॥
वह सुन्दर रूप धरकर प्रभुके पास जाकर और बहुत मुसकराकर वचन बोली—न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री! विधाताने यह संयोग ( जोड़ा) बहुत विचारकर रचा है ॥४ ॥
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं । देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं ॥
तातें अब लगि रहिउँ कुमारी । मनु माना कछु तुम्हहि निहारी ॥
मेरे योग्य पुरुष ( वर ) जगत्भरमें नहीं है, मैंने तीनों लोकोंको खोज देखा । इसीसे मैं अबतक
कुमारी ( अविवाहित ) रही । अब तुमको देखकर कुछ मन माना (चित्त ठहरा ) है ॥५ ॥
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता । अहइ कुआर मोर लघु भ्राता ॥
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी । प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी ॥
सीताजीकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है । तब वह लक्ष्मणजीके पास गयी । लक्ष्मणजी उसे शत्रुकी बहिन समझकर और प्रभुकी ओर देखकर कोमल वाणीसे बोले —॥६ ॥
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा । पराधीन नहिं तोर सुपासा ॥
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा । जो कछु करहिं उनहि सब छाजा ॥
हे सुन्दरी! सुन, मैं तो उनका दास हूँ । मैं पराधीन हूँ, अतः तुम्हें सुभीता ( सुख ) न होगा । प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुरके राजा हैं, वे जो कुछ करें, उन्हें सब फबता है ॥७ ॥
सेवक सुख चह मान भिखारी । ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी ॥
लोभी जसु चह चार गुमानी । नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६४३ सेवक सुख चाहे, भिखारी सम्मान चाहे, व्यसनी (जिसे जूए, शराब आदिका व्यसन हो ) धन और व्यभिचारी शुभगति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाशको दुहकर दूध लेना चाहते हैं ( अर्थात् असम्भव बातको सम्भव करना चाहते हैं ) ॥ ८ ॥
पुनि फिरि राम निकट सो आई । प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई । जो तृन तोरि लाज परिहरई ॥
वह लौटकर फिर श्रीरामजीके पास आयी । प्रभुने फिर उसे लक्ष्मणजीके पास भेज दिया । लक्ष्मणजीने कहा--तुम्हें वही बरेगा जो लज्जाको तृण तोड़कर ( अर्थात् प्रतिज्ञा करके ) त्याग देगा ( अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा) ॥ ९ ॥
तब खिसिआनि राम पहिं गई । रूप भयंकर प्रगटत भई ॥
सीतहि सभय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सयन बुझाई ॥
तब वह खिसियायी हुई ( क्रुद्ध होकर) श्रीरामजीके पास गयी और उसने अपना भयङ्कर रूप प्रकट किया । सीताजीको भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजीने लक्ष्मणजीको इशारा देकर कहा ॥ १० ॥
दो० – लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि ।
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि ॥१७ ॥
लक्ष्मणजीने बड़ी फुर्तीसे उसको बिना नाक कानकी कर दिया । मानो उसके हाथ रावणको चुनौती दी हो! ॥ १७ ॥
नाक कान बिनु भइ बिकरारा । जनु स्रव सैल गेरु कै धारा ॥
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता । धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥
बिना नाक -कान वह विकराल हो गयी । [उसके शरीरसे रक्त इस प्रकार बहने लगा ] मानो [ काले ] पर्वतसे गेरूकी धारा बह रही हो । वह विलाप करती हुई खर- दूषणके पास गयी । [ और बोली— ] हे भाई! तुम्हारे पौरुष ( वीरता) को धिक्कार है, तुम्हारे बलको धिक्कार है ॥ १ ॥
तेहिं पूछा सब कहेसि बुझाई ॥ जातुधान सुनि सेन बनाई ॥
धाए निसिचर निकर बरूथा । जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा ॥
उन्होंने पूछा, तब शूर्पणखाने सब समझाकर कहा । सब सुनकर राक्षसोंने सेना तैयार की ।
राक्षससमूह झुंड- के -झुंड दौड़े । मानो पंखधारी काजलके पर्वतोंका झुंड हो ॥२ ॥
नाना बाहन नानाकारा । नानायुध धर घोर अपारा ॥
सूपनखा आगें करि लीनी । असुभ रूप श्रुति नासा हीनी ॥
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* *६४४ रामचरितमानस वे अनेकों प्रकारकी सवारियोंपर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार ( सूरतों ) के हैं । वे अपार हैं और अनेकों प्रकारके असंख्य भयानक हथियार धारण किये हुए हैं । उन्होंने नाक- कान कटी हुई अमङ्गलरूपिणी शूर्पणखाको आगे कर लिया ॥३ ॥
असगुन अमित होहिं भयकारी । गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी ॥
गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं । देखि कटकु भट अति हरषाहीं ॥
अनगिनत भयङ्कर अशकुन हो रहे हैं । परन्तु मृत्युके वश होनेके कारण वे सब - के - सब उनको कुछ गिनते ही नहीं । गरजते हैं, ललकारते हैं और आकाशमें उड़ते हैं । सेना देखकर योद्धालोग बहुत ही हर्षित होते हैं ॥४ ॥
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई । धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई ॥
धूरि पूरि नभ मंडल रहा । राम बोलाइ अनुज सन कहा ॥
कोई कहता है दोनों भाइयोंको जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्रीको छीन
लो । आकाशमण्डल धूलसे भर गया । तब श्रीरामजीने लक्ष्मणजीको बुलाकर उनसे कहा- ॥ ५ ॥
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर । आवा निसिचर कटकु भयंकर ॥
रहे सजग सुनि प्रभु कै बानी । चले सहित श्री सर धनु पानी ॥
राक्षसोंकी भयानक सेना आ गयी है । जानकीजीको लेकर तुम पर्वतकी कन्दरामें चले जाओ । सावधान रहना । प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर लक्ष्मणजी हाथमें धनुष - बाण लिये श्रीसीताजीसहित चले ॥ ६ ॥
देखि राम रिपुदल चलि आवा । बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा ॥
शत्रुओंकी सेना [ समीप ] चली आयी है, यह देखकर श्रीरामजीने हँसकर कठिन धनुषको चढ़ाया ॥७ ॥
छं० – कोदंड कठिन चढ़ाई सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों ।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों ॥
कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै ।
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै ॥
कठिन धनुष चढ़ाकर सिरपर जटाका जूड़ा बाँधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि ( पन्ने ) के पर्वतपर करोड़ों बिजलियोंसे दो साँप लड़ रहे हों । कमरमें तरकस कसकर, विशाल भुजाओंमें धनुष लेकर और बाण सुधारकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंकी ओर देख रहे हैं । मानो मतवाले हाथियोंके समूहको [ आता ] देखकर सिंह [ उनकी ओर ] ताक रहा हो ।
सो० - आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुट ।
जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज ॥ १८ ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६४५ ‘ पकड़ो - पकड़ो ' पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर ( बड़ी तेजीसे ) दौड़े हुए आये [ और उन्होंने श्रीरामजीको चारों ओरसे घेर लिया ], जैसे बालसूर्य ( उदयकालीन सूर्य ) को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं ॥ १८ ॥
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी । थकित भई रजनीचर धारी ॥
सचिव बोलि बोले खर दूषन । यह कोउ नृपबालक नर भूषन ॥
[ सौन्दर्य - माधुर्यनिधि ] प्रभु श्रीरामजीको देखकर राक्षसोंकी सेना थकित रह गयी । वे उनपर बाण नहीं छोड़ सके । मन्त्रीको बुलाकर खर--दूषणने कहा- यह राजकुमार कोई मनुष्योंका भूषण है ॥ १ ॥
नाग असुर सुर नर मुनि जेते । देखे जिते हते हम केते ॥
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई ॥ देखी नहिं असि सुंदरताई ॥
जितने भी नाग, असुर, देवता, मनुष्य और मुनि हैं, उनमेंसे हमने न जाने कितने ही देखे, जीते और मार डाले हैं । पर हे सब भाइयो! सुनो, हमने जन्मभरमें ऐसी सुन्दरता कहीं नहीं देखी ॥२ ॥
जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा । बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥
देहु तुरत निज नारि दुराई । जीअत भवन जाहु द्वौ भाई ॥
यद्यपि इन्होंने हमारी बहिनको कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं । ‘ छिपायी हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते-जी घर लौट जाओ'॥३ ॥
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु । तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥
दूतन्ह कहा राम सन जाई । सुनत राम बोले मुसुकाई ॥
मेरा यह कथन तुमलोग उसे सुनाओ और उसका वचन ( उत्तर ) सुनकर शीघ्र आओ । दूतोंने जाकर यह सन्देश श्रीरामचन्द्रजीसे कहा । उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुसकराकर बोले-॥४ ॥
हम छत्री मृगया बन करहीं । तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं ॥
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं । एक बार कालहु सन लरहीं ॥
हम क्षत्रिय हैं, वनमें शिकार करते हैं और तुम्हारे- सरीखे दुष्ट पशुओंको तो ढूँढ़ते ही फिरते हैं । हम बलवान् शत्रुको देखकर नहीं डरते । [ लड़नेको आवे तो ] एक बार तो हम कालसे भी लड़ सकते हैं ॥५ ॥
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक । मुनि पालक खल सालक बालक ॥
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू । समर बिमुख मैं हतउँ न काहू ॥
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* *६४६ रामचरितमानस यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्यकुलका नाश करनेवाले और मुनियोंकी रक्षा करनेवाले हैं, हम बालक हैं, परन्तु हैं दुष्टोंको दण्ड देनेवाले । यदि बल न हो तो घर लौट जाओ । संग्राममें पीठ दिखानेवाले किसीको मैं नहीं मारता ॥ ६ ॥
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई । रिपु पर कृपा परम कदराई ॥
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ । सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ ॥
रणमें चढ़ आकर कपट-ट- चतुराई करना और शत्रुपर कृपा करना ( दया दिखाना ) तो बड़ी भारी कायरता है । दूतोंने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं, जिन्हें सुनकर खर- दूषणका हृदय अत्यन्त जल उठा ॥७ ॥
छं० –उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा ।
सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा ॥
प्रभु कीन्हि धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा । भए बधिर ब्याकुल जातुधान न ग्यान तेहि अवसर रहा । [ खर- दूषणका ] हृदय जल उठा । तब उन्होंने कहा- पकड़ लो (कैद कर लो ) । [ यह सुनकर ] भयानक राक्षस योद्धा बाण, धनुष, तोमर, शक्ति ( साँग), शूल ( बरछी ), कृपाण ( कटार ), परिघ और फरसा धारण किये हुए दौड़ पड़े । प्रभु श्रीरामजीने पहले धनुषका बड़ा कठोर, घोर और भयानक टङ्कार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गये । उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा ।
दो० – सावधान होइ धाए जानि सबल आराति ।
लागे बरषन राम पर अस्त्र सस्त्र बहुभाँति ॥ १ ९ ( क ) ॥
फिर वे शत्रुको बलवान् जानकर सावधान होकर दौड़े और श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर बहुत प्रकारके अस्त्र- शस्त्र बरसाने लगे ॥ १ ९ ( क ) ॥
तिन्ह के आयुध तिल सम करि काटे रघुबीर ।
तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छाँड़े निज तीर ॥। १ ९ ( ख) ॥
श्रीरघुवीरजीने उनके हथियारोंको तिलके समान ( टुकड़े -टुकड़े ) करके काट डाला । फिर धनुषको कानतक तानकर अपने तीर छोड़े ॥ १ ९ ( ख ) ॥
छं० – तब चले बान कराल । फुंकरत जनु बहु ब्याल ॥
कोपेउ समर श्रीराम । चले बिसिख निसित निकाम ॥
तब भयानक बाण ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत-से सर्प जा रहे हैं । श्रीरामचन्द्रजी संग्राममें क्रुद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले ॥१ ॥
अवलोकि खरतर तीर । मुरि चले निसिचर बीर ॥
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ । जो भागि रन ते जाइ ॥
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* अरण्यकाण्ड * ६४७ अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंको देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चले । तब खर, दूषण और त्रिशिरा तीनों भाई क्रुद्ध होकर बोले-जो रणसे भागकर जायगा ॥ २ ॥
तेहि बधब हम निज पानि । फिरे मरन मन महुँ ठानि ॥
आयुध अनेक प्रकार । सनमुख ते करहिं प्रहार ॥
उसका हम अपने हाथों वध करेंगे । तब मनमें मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और सामने होकर वे अनेकों प्रकारके हथियारोंसे श्रीरामजीपर प्रहार करने लगे ॥ ३ ॥
रिपु परम कोपे जानि । प्रभु धनुष सर संधानि ॥
छाँड़े बिपुल नाराच । लगे कटन बिकट पिसाच ॥
शत्रुको अत्यन्त कुपित जानकर प्रभुने धनुषपर बाण चढ़ाकर बहुत-से बाण छोड़े, जिनसे भयानक राक्षस कटने लगे ॥४ ॥
उर सीस भुज कर चरन । जहँ तहँ लगे महि परन ॥
चिक्करत लागत बान । धर परत कुधर समान ॥
उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहाँ - तहाँ पृथ्वीपर गिरने लगे । बाण लगते ही वे
हाथीकी तरह चिग्घाड़ते हैं । उनके पहाड़के समान धड़ कट- कटकर गिर रहे हैं ॥५ ॥
भट कटत तन सत खंड । पुनि उठत करि पाषंड ॥
नभ उड़त बहु भुज मुंड ॥ बिनु मौलि धावत रुंड ॥
योद्धाओंके शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं । वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं । आकाशमें बहुत - सी भुजाएँ और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिरके धड़ दौड़ रहे हैं ॥ ६ ॥
खग कंक काक सृगाल । कटकटहिं कठिन कराल ॥
चील [या क्रौंच], कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयङ्कर कट - कट शब्द कर रहे हैं ॥७ ॥
छं० – कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं ।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं ॥
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा । जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा । सियार कटकटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियाँ बटोर रहे हैं [ अथवा खप्पर भर रहे हैं ] । वीर- वैताल खोपड़ियोंपर ताल दे रहे हैं और योगिनियाँ नाच रही हैं । श्रीरघुवीरके प्रचण्ड बाण योद्धाओंके वक्षःस्थल, भुजा और सिरोंके टुकड़े -टुकड़े कर डालते हैं । उनके धड़ जहाँ-तहाँ गिर पड़ते हैं । फिर उठते और लड़ते हैं और ' पकड़ो - पकड़ो ' का भयङ्कर शब्द करते हैं ॥१ ॥
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* *६४८ रामचरितमानस
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं ।
संग्रामपुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं ॥
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे ।
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे ॥ २ ॥
अँतड़ियोंके एक छोरको पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हींका दूसरा छोर हाथसे पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्रामरूपी नगरके निवासी बहुत-से बालक पतंग उड़ा रहे हों । अनेकों योद्धा मारे और पछाड़े गये । बहुत- से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं । अपनी सेनाको व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर- दूषण आदि योद्धा श्रीरामजीकी ओर मुड़े ॥२ ॥
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं ।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं ॥
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका ।
दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका ॥ ३ ॥
अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बारमें श्रीरघुवीरपर छोड़ने लगे । प्रभुने पलभरमें शत्रुओंके बाणोंको काटकर, ललकारकर उनपर अपने बाण छोड़े । सब राक्षस- सेनापतियोंके हृदयमें दस-दस बाण मारे ॥ ३ ॥
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी ।
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी ॥
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक करयो ।
देखहिं परसपर राम करि संग्राम रिपु दल लरि मरयो ॥ ४ ॥
योद्धा पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं । मरते नहीं, बहुत प्रकारकी अतिशय माया रचते हैं । देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत [राक्षस ] चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्रीरामजी अकेले हैं । देवता और मुनियोंको भयभीत देखकर मायाके स्वामी प्रभुने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओंकी सेना एक- दूसरेको रामरूप देखने लगी और आपसमें ही युद्ध करके लड़ मरी ॥४ ॥
दो० – राम राम कहि तनु तजहिं पावहिं पद निर्बान ।
करि उपाय रिपु मारे छन महुँ कृपानिधान ॥ २० ( क ) ॥