श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 651–660

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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* अरण्यकाण्ड * ६४९ सब [' यही राम है, इसे मारो ' इस प्रकार ] राम-राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण ( मोक्ष ) पद पाते हैं । कृपानिधान श्रीरामजीने यह उपाय करके क्षणभरमें शत्रुओंको मार डाला ॥ २० ( क ) ॥

हरषित बरषहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान ।

अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान ॥ २० ( ख ) ॥

देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं । फिर वे सब स्तुति कर-करके अनेकों विमानोंपर सुशोभित हुए चले गये ॥ २० ( ख ) ॥

जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते ॥

तब लछिमन सीतहि लै आए । प्रभु पद परत हरषि उर लाए ॥

जब श्रीरघुनाथजीने युद्धमें शत्रुओंको जीत लिया तथा देवता, मनुष्य और मुनि सबके भय नष्ट हो गये, तब लक्ष्मणजी सीताजीको ले आये । चरणोंमें पड़ते हुए उनको प्रभुने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदयसे लगा लिया ॥१ ॥

सीता चितव स्याम मृदु गाता । परम प्रेम लोचन न अघाता ॥

पंचबटीं बसि श्रीरघुनायक । करत चरित सुर मुनि सुखदायक ॥

सीताजी श्रीरामजीके श्याम और कोमल शरीरको परम प्रेमके साथ देख रही हैं, नेत्र अघाते नहीं हैं । इस प्रकार पञ्चवटीमें बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियोंको सुख देनेवाले चरित्र करने लगे ॥२ ॥

धुआँ देखि खरदूषन केरा । जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा ॥

बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस कै सुरति बिसारी ॥

खर- दूषणका विध्वंस देखकर शूर्पणखाने जाकर रावणको भड़काया । वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली– तूने देश और खजानेकी सुधि ही भुला दी ॥ ३ ॥

करसि पान सोवसि दिनु राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ॥

राजनीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा ॥

बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ । श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ ॥

संग तें जती कुमंत्र ते राजा । मान ते ग्यान पान तें लाजा ॥

शराब पी लेता है और दिन-रात पड़ा सोता रहता है । तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिरपर खड़ा है? नीतिके बिना राज्य और धर्मके बिना धन प्राप्त करनेसे, भगवान्‌को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करनेसे और विवेक उत्पन्न किये बिना विद्या पढ़नेसे परिणाममें श्रम ही हाथ लगता है । विषयोंके सङ्गसे संन्यासी, बुरी सलाहसे राजा, मानसे ज्ञान, मदिरापानसे लज्जा, ॥ ४-५ ॥

पृष्ठ 652

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* *६५० रामचरितमानस

प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥

नम्रताके बिना ( नम्रता न होनेसे ) प्रीति और मद ( अहङ्कार ) से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है ॥६ ॥

सो० - रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि ।

अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन ॥ २१ ( क ) ॥

शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्पको छोटा करके नहीं समझना चाहिये । ऐसा कहकर शूर्पणखा अनेक प्रकारसे विलाप करके रोने लगी ॥२१ ( क ) ॥

दो० – सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ ॥

तोहिजिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ ॥ २१ ( ख ) ॥

[ रावणकी ] सभाके बीच वह व्याकुल होकर पड़ी हुई बहुत प्रकारसे रो -रोकर कह रही है कि अरे दशग्रीव! तेरे जीते-जी मेरी क्या ऐसी दशा होनी चाहिये? ॥ २१ ( ख ) ॥

सुनत सभासद उठे अकुलाई । समुझाई गहि बाँह उठाई ॥

कह लंकेस कहसि निज बाता । केइँ तव नासा कान निपाता ॥

शूर्पणखाके वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे । उन्होंने शूर्पणखाकी बाँह पकड़कर उसे उठाया और समझाया । लङ्कापति रावणने कहा– अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक-कान काट लिये? ॥ १ ॥

अवध नृपति दसरथ के जाए । पुरुष सिंघ बन खेलन आए ॥

समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी । रहित निसाचर करिहहिं धरनी ॥

[ वह बोली– ] अयोध्याके राजा दशरथके पुत्र, जो पुरुषोंमें सिंहके समान हैं, वनमें शिकार खेलने आये हैं । मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वीको राक्षसोंसे रहित कर देंगे ॥२ ॥

जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन । अभय भए बिचरत मुनि कानन ॥

देखत बालक काल समाना । परम धीर धन्वी गुन नाना ॥

जिनकी भुजाओंका बल पाकर हे दशमुख! मुनिलोग वनमें निर्भय होकर विचरने लगे हैं । वे देखनेमें तो बालक हैं, पर हैं कालके समान । वे परम धीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणोंसे युक्त हैं ॥३ ॥

अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता । खल बध रत सुर मुनि सुखदाता ॥

सोभा धाम राम अस नामा । तिन्ह के संग नारि एक स्यामा ॥

पृष्ठ 653

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* अरण्यकाण्ड * ६५१ दोनों भाइयोंका बल और प्रताप अतुलनीय है । वे दुष्टोंके वध करनेमें लगे हैं और देवता तथा मुनियोंको सुख देनेवाले हैं । वे शोभाके धाम हैं, ' राम ' ऐसा उनका नाम है । उनके साथ एक तरुणी सुन्दरी स्त्री है ॥४ ॥

रूप रासि बिधि नारि सँवारी । रति सत कोटि तासु बलिहारी ॥

तासु अनुज काटे श्रुति नासा । सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा ॥

विधाताने उस स्त्रीको ऐसी रूपकी राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति ( कामदेवकी स्त्री ) उसपर निछावर हैं । उन्हींके छोटे भाईने मेरे नाक-कान काट डाले । मैं तेरी बहिन हूँ, यह सुनकर वे मेरी हँसी करने लगे ॥५ ॥

खर दूषन सुनि लगे पुकारा । छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा ॥

खर दूषन तिसिरा कर घाता । सुनि दससीस जरे सब गाता ॥

मेरी पुकार सुनकर खर- दूषण सहायता करने आये । पर उन्होंने क्षणभरमें सारी सेनाको मार डाला । खर- दूषण और त्रिशिराका वध सुनकर रावणके सारे अङ्ग जल उठे ॥६ ॥

दो० - सूपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति ।

गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति ॥२२ ॥

उसने शूर्पणखाको समझाकर बहुत प्रकारसे अपने बलका बखान किया, किन्तु [ मनमें ] वह अत्यन्त चिन्तावश होकर अपने महलमें गया, उसे रातभर नींद नहीं पड़ी ॥ २२ ॥

सुर नर असुर नाग खग माहीं । मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं ॥

खर दूषन मोहि सम बलवंता । तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता ॥

[ वह मन-ही- मन विचार करने लगा- ] देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियोंमें कोई ऐसा नहीं जो मेरे सेवकको भी पा सके । खर- दूषण तो मेरे ही समान बलवान् थे । उन्हें भगवान्‌के सिवा और कौन मार सकता है? ॥१ ॥

सुर रंजन भंजन महि भारा । जौं भगवंत लीन्ह अवतारा ॥

तौ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ । प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ॥

देवताओंको आनन्द देनेवाले और पृथ्वीका भार हरण करनेवाले भगवान्ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूँगा और प्रभुके बाण [ के आघात ] से प्राण छोड़कर भवसागरसे तर जाऊँगा ॥२ ॥

होइहि भजनु न तामस देहा । मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा ॥

जौं नररूप भूपसुत कोऊ । हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ ॥

पृष्ठ 654

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*:*६५२ रामचरितमानस इस तामस शरीरसे भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्मसे यही दृढ़ निश्चय है । और यदि वे मनुष्यरूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनोंको रणमें जीतकर उनकी स्त्रीको हर लूँगा ॥३ ॥

चला अकेल जान चढ़ि तहवाँ । बस मारीच सिंधु तट जहवाँ ॥

इहाँ राम जसि जुगुति बनाई । सुनहु उमा सो कथा सुहाई ॥

[ यों विचारकर ] रावण रथपर चढ़कर अकेला ही वहाँ चला, जहाँ समुद्रके तटपर मारीच रहता था । [ शिवजी कहते हैं कि- ] हे पार्वती! यहाँ श्रीरामचन्द्रजीने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो ॥४ ॥

दो० – लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद ।

जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद ॥ २३ ॥

लक्ष्मणजी जब कन्द - मूल-फल लेनेके लिये वनमें गये, तब [ अकेलेमें ] कृपा और सुखके समूह श्रीरामचन्द्रजी हँसकर जानकीजीसे बोले—॥२३ ॥

सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला । मैं कछु करबि ललित नरलीला ॥

तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा । जौ लगि करौं निसाचर नासा ॥

हे प्रिये! हे सुन्दर पातिव्रत धर्मका पालन करनेवाली सुशीले! सुनो! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूँगा । इसलिये जबतक मैं राक्षसोंका नाश करूँ, तबतक तुम अग्निमें निवास करो ॥१ ॥

जबहिं राम सब कहा बखानी । प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी ॥

निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता । तैसइ सील रूप सुबिनीता ॥

श्रीरामजीने ज्यों ही सब समझाकर कहा, त्यों ही श्रीसीताजी प्रभुके चरणोंको हृदयमें धरकर अग्निमें समा गयीं । सीताजीने अपनी ही छायामूर्ति वहाँ रख दी, जो उनके -जैसे ही शील - स्वभाव और रूपवाली तथा वैसे ही विनम्र थी ॥२ ॥

लछिमनहूँ यह मरमु न जाना । जो कछु चरित रचा भगवाना ॥

दसमुख गयउ जहाँ मारीचा । नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥

भगवान्ने जो कुछ लीला रची, इस रहस्यको लक्ष्मणजीने भी नहीं जाना । स्वार्थपरायण और नीच रावण वहाँ गया जहाँ मारीच था और उसको सिर नवाया ॥३ ॥

नवनि नीच कै अति दुखदाई । जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई ॥

भयदायक खल कै प्रिय बानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥

पृष्ठ 655

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* अरण्यकाण्ड * ६५३ नीचका झुकना ( नम्रता) भी अत्यन्त दुःखदायी होता है । जैसे अङ्कुश, धनुष, साँप और बिल्लीका झुकना । हे भवानी! दुष्टकी मीठी वाणी भी [ उसी प्रकार] भय देनेवाली होती है, जैसे बिना ऋतुके फूल! ॥४ ॥

दो०- करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात ।

कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात ॥ २४ ॥

तब मारीचने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी- हे तात! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं? ॥२४ ॥

दसमुख सकल कथा तेहि आगें । कही सहित अभिमान अभागें ॥

होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी । जेहि बिधि हरि आनौं नृपनारी ॥

भाग्यहीन रावणने सारी कथा अभिमानसहित उसके सामने कही [ और फिर कहा- ] तुम छल करनेवाले कपट- मृग बनो, जिस उपायसे मैं उस राजवधूको हर लाऊँ॥१ ॥

तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा । ते नररूप चराचर ईसा ॥

तासों तात बयरु नहिं कीजै । मारें मरिअ जिआएँ जीजै ॥

तब उसने ( मारीचने ) कहा- हे दशशीश! सुनिये । वे मनुष्यरूपमें चराचरके ईश्वर हैं । हे तात! उनसे वैर न कीजिये । उन्हींके मारनेसे मरना और उनके जिलानेसे जीना होता है ( सबका जीवन-मरण उन्हींके अधीन है ) ॥ २ ॥

मुनि मख राखन गयउ कुमारा । बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥

सत जोजन आयउँ छन माहीं । तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं ॥

यही राजकुमार मुनि विश्वामित्रके यज्ञकी रक्षाके लिये गये थे । उस समय श्रीरघुनाथजीने बिना फलका बाण मुझे मारा था, जिससे मैं क्षणभरमें सौ योजनपर आ गिरा । उनसे वैर करनेमें भलाई नहीं है ॥ ३ ॥

भइ मम कीट भृंग की नाई । जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई ॥

जौं नर तात तदपि अति सूरा । तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा । मेरी दशा तो भृङ्गीके कीड़ेकी-सी हो गयी है । अब मैं जहाँ-तहाँ श्रीराम- लक्ष्मण दोनों भाइयोंको ही देखता हूँ । और हे तात! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं । उनसे विरोध करनेमें पूरा न पड़ेगा ( सफलता नहीं मिलेगी) ॥ ४ ॥

दो० – जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड ।

खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड ॥ २५ ॥

जिसने ताड़का और सुबाहुको मारकर शिवजीका धनुष तोड़ दिया और खर, दूषण और त्रिशिराका वध कर डाला, ऐसा प्रचण्ड बली भी कहीं मनुष्य हो सकता है? ॥२५ ॥

पृष्ठ 656

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*:*६५४ रामचरितमानस

जाहु भवन कुल कुसल बिचारी । सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी ॥

गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा । कहु जग मोहि समान को जोधा ॥

अतः अपने कुलकी कुशल विचारकर आप घर लौट जाइये । यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत-सी गालियाँ दीं ( दुर्वचन कहे ) । [ कहा– ] अरे मूर्ख! तू गुरुकी तरह मुझे ज्ञान सिखाता है? बता तो, संसारमें मेरे समान योद्धा कौन है? ॥१ ॥

तब मारीच हृदयँ अनुमाना । नवहि बिरोधें नहिं कल्याना ॥

सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी । बैद बंदि कबि भानस गुनी ॥

तब मारीचने हृदयमें अनुमान किया कि शस्त्री ( शस्त्रधारी ), मर्मी ( भेद जाननेवाला ), समर्थ स्वामी, मूर्ख, धनवान्, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया- इन नौ व्यक्तियोंसे विरोध ( वैर ) करनेमें कल्याण ( कुशल ) नहीं होता ॥२ ॥

उभय भाँति देखा निज मरना । तब ताकिसि रघुनायक सरना ॥

उतरु देत मोहि बधब अभागें । कस न मरौं रघुपति सर लागें ॥

जब मारीचने दोनों प्रकारसे अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजीकी शरण तकी ( अर्थात् उनकी शरण जानेमें ही कल्याण समझा) । [ सोचा कि] उत्तर देते ही ( नाहीं करते ही ) यह अभागा मुझे मार डालेगा । फिर श्रीरघुनाथजीके बाण लगनेसे ही क्यों न मरूँ? ॥ ३ ॥

अस जियँ जानि दसानन संगा । चला राम पद प्रेम अभंगा ॥

मन अति हरष जनाव न तेही । आजु देखिहउँ परम सनेही ॥

हृदयमें ऐसा समझकर वह रावणके साथ चला । श्रीरामजीके चरणोंमें उसका अखण्ड प्रेम है । उसके मनमें इस बातका अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजीको देखूँगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावणको नहीं जनाया ॥४ ॥

छं० – निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं ।

श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं ॥

निर्बान दायक क्रोध जा कर भगति अबसहि बसकरी ।

निज पानि सर संधानि सो मोहि बधिहि सुखसागर हरी ॥

[ वह मन- ही - मन सोचने लगा ] अपने परम प्रियतमको देखकर नेत्रोंको सफल करके सुख पाऊँगा । जानकीजीसहित और छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत कृपानिधान श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाऊँगा । जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश ( किसीके वशमें न होनेवाले स्वतन्त्र भगवान् ) को भी वशमें करनेवाली है, अहा! वे ही आनन्दके समुद्र श्रीहरि अपने हाथोंसे बाण सन्धानकर मेरा वध करेंगे!

पृष्ठ 657

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* अरण्यकाण्ड * ६५५

दो० – मम पाछें धर धावत धरें सरासन बान ।

फिरिफिरि प्रभुहि बिलोकिहउँ धन्य न मो सम आन ॥ २६ ॥

धनुष- बाण धारण किये मेरे पीछे -पीछे पृथ्वीपर ( पकड़नेके लिये ) दौड़ते हुए प्रभुको मैं फिर-फिरकर देखूँगा । मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है ॥२६ ॥

तेहि बन निकट दसानन गयऊ । तब मारीच कपटमृग भयऊ ॥

अति बिचित्र कछु बरनि न जाई । कनक देह मनि रचित बनाई ॥

जब रावण उस वनके ( जिस वनमें श्रीरघुनाथजी रहते थे ) निकट पहुँचा, तब मारीच कपटमृग बन गया । वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ वर्णन नहीं किया जा सकता । सोनेका शरीर मणियोंसे जड़कर बनाया था ॥१ ॥

सीता परम रुचिर मृग देखा । अंग अंग सुमनोहर बेषा ॥

सुनहु देव रघुबीर कृपाला । एहि मृग कर अति सुंदर छाला ॥

सीताजीने उस परम सुन्दर हिरनको देखा, जिसके अङ्ग अङ्गकी छटा अत्यन्त मनोहर थी । [ वे कहने लगीं- ] हे देव! हे कृपालु रघुवीर! सुनिये । इस मृगकी छाल बहुत ही सुन्दर है ॥२ ॥

सत्यसंध प्रभु बधि करि एही । आनहु चर्म कहति बैदेही ॥

तब रघुपति जानत सब कारन । उठे हरषि सुर काजु सँवारन ॥

जानकीजीने कहा— हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये । तब श्रीरघुनाथजी [ मारीचके कपटमृग बननेका ] सब कारण जानते हुए भी, देवताओंका कार्य बनाने लिये हर्षित होकर उठे ॥३ ॥

मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा । करतल चाप रुचिर सर साँधा ॥

प्रभु लछिमनहि कहा समुझाई । फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई ॥

हिरनको देखकर श्रीरामजीने कमरमें फेंटा बाँधा और हाथमें धनुष लेकर उसपर सुन्दर ( दिव्य ) बाण चढ़ाया । फिर प्रभुने लक्ष्मणजीको समझाकर कहा–हे भाई! वनमें बहुत-से राक्षस फिरते हैं ॥४ ॥

सीता केरि करेहु रखवारी । बुधि बिबेक बल समय बिचारी ॥

प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी । धाए रामुरामु सरासन साजी ॥

तुम बुद्धि और विवेकके द्वारा बल और समयका विचार करके सीताकी रखवाली करना ।

प्रभुको देखकर मृग भाग चला । श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े ॥ ५ ॥

पृष्ठ 658

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* *६५६ रामचरितमानस

निगम नेति सिव ध्यान न पावा । मायामृग पाछें सो धावा ॥

कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई । कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई ॥

वेद जिनके विषयमें ' नेति नेति ' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यानमें नहीं पाते ( अर्थात् जो मन और वाणीसे नितान्त परे हैं ), वे ही श्रीरामजी मायासे बने हुए मृगके पीछे दौड़ रहे हैं । वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है । कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है ॥ ६ ॥

प्रगटत दुरत करत छल भूरी । एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी ॥

तब तकि राम कठिन सर मारा । धरनि परेउ करि घोर पुकारा ॥

इस प्रकार प्रकट होता और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभुको दूर ले गया । तब श्रीरामचन्द्रजीने तककर ( निशाना साधकर ) कठोर बाण मारा, [जिसके लगते ही ] वह घोर शब्द करके पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ७ ॥

लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा । पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा ॥

प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा । सुमिरेसि रामु समेत सनेहा ॥

पहले लक्ष्मणजीका नाम लेकर उसने पीछे मनमें श्रीरामजीका स्मरण किया । प्राण त्याग करते समय उसने अपना ( राक्षसी ) शरीर प्रकट किया और प्रेमसहित श्रीरामजीका स्मरण किया ॥ ८ ॥

अंतर प्रेम तासु पहिचाना । मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना ॥ ९ ॥

सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामजीने उसके हृदयके प्रेमको पहचानकर उसे वह गति ( अपना परमपद ) दी जो मुनियोंको भी दुर्लभ है ॥ ९ ॥

दो०- बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ ।

निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ ॥ २७ ॥

देवता बहुत-से फूल बरसा रहे हैं और प्रभुके गुणोंकी गाथाएँ ( स्तुतियाँ ) गा रहे हैं [ कि ] श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबन्धु हैं कि उन्होंने असुरको भी अपना परम पद दे दिया ॥ २७ ॥

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा । सोह चाप कर कटि तूनीरा ॥

आरत गिरा सुनी जब सीता । कह लछिमन सन परम सभीता ॥

दुष्ट मारीचको मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े । हाथमें धनुष और कमरमें तरकस शोभा दे रहा है । इधर जब सीताजीने दुःखभरी वाणी ( मरते समय मारीचकी ' हा लक्ष्मण ' की आवाज ) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजीसे कहने लगीं —॥१ ॥

पृष्ठ 659

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* अरण्यकाण्ड * ६५७

बेगि संकट अति भ्राता । लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ॥

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । सपनेहुँ संकट परइ कि सोई ॥

तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकटमें हैं । लक्ष्मणजीने हँसकर कहा– हे माता! सुनो, जिनके भ्रुकुटिविलास ( भौंके इशारे ) मात्रसे सारी सृष्टिका लय ( प्रलय ) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्नमें भी संकटमें पड़ सकते हैं? ॥ २ ॥

मरम बचन जब सीता बोला । हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ॥

बन दिसि देव सौंपि सब काहू । चले जहाँ रावन ससि राहू ॥

इसपर जब सीताजी कुछ मर्म-वचन ( हृदयमें चुभनेवाले वचन ) कहने लगीं, तब भगवान्‌की प्रेरणासे लक्ष्मणजीका मन भी चञ्चल हो उठा । वे श्रीसीताजीको वन और दिशाओंके देवताओंको सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावणरूपी चन्द्रमाके लिये राहुरूप श्रीरामजी थे ॥ ३ ॥

सून बीच दसकंधर देखा । आवा निकट जती कें बेषा ॥

जाकें डर सुर असुर डेराहीं । निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं ॥

रावण सूना मौका देखकर यति ( संन्यासी ) के वेषमें श्रीसीताजीके समीप आया । जिसके डरसे देवता और दैत्यतक इतना डरते हैं कि रातको नींद नहीं आती और दिनमें [ भरपेट ] अन्न नहीं खाते—॥४ ॥

सो दससीस स्वान की नाईं । इत उत चितइ चला भड़िहाईं ॥

इमि कुपंथ पग देत खगेसा । रह न तेज तन बुधि बल लेसा ॥

वही दस सिरवाला रावण कुत्तेकी तरह इधर- उधर ताकता हुआ भड़िहाई* ( चोरी ) के लिये चला । [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं— ] हे गरुड़जी! इस प्रकार कुमार्गपर पैर रखते ही शरीरमें तेज तथा बुद्धि एवं बलका लेश भी नहीं रह जाता ॥५ ॥

* सूना पाकर कुत्ता चुपके से बर्तन- भाड़ोंमें मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है उसे, ‘ भड़िहाई ’

कहते हैं ।

नाना बिधि करि कथा सुहाई । राजनीति भय प्रीति देखाई ॥

कह सीता सुनु जती गोसाईं । बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ॥

रावणने अनेकों प्रकारकी सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजीको राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया । सीताजीने कहा-हे यति गोसाईं! सुनो, तुमने तो दुष्टकी तरह वचन कहे ॥ ६ ॥

तब रावन निज रूप देखावा । भई सभय जब नाम सुनावा ॥

कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा । आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ॥

पृष्ठ 660

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* * ६५८ रामचरितमानस तब रावणने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं । उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा-' अरे दुष्ट! खड़ा तो रह, प्रभु आ गये'॥७ ॥

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा । भएसि कालबस निसिचर नाहा ॥

सुनत बचन दससीस रिसाना । मन महुँ चरन बंदि सुख माना ॥

जैसे सिंहकी स्त्रीको तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज! तू [ मेरी चाह करके ] कालके वश हुआ है । ये वचन सुनते ही रावणको क्रोध आ गया, परन्तु मनमें उसने सीताजीके चरणोंकी वन्दना करके सुख माना ॥८ ॥

दो० – क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ ।

चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ ॥ २८ ॥

फिर क्रोधमें भरकर रावणने सीताजीको रथपर बैठा लिया और वह बड़ी उतावलीके साथ आकाशमार्गसे चला; किन्तु डरके मारे उससे रथ हाँका नहीं जाता था ॥२८ ॥

हा जग एक बीर रघुराया । केहिं अपराध बिसारेहु दाया ॥

आरति हरन सरन सुखदायक । हा रघुकुल सरोज दिननायक ॥

[ सीताजी विलाप कर रही थीं- ] हा जगत्के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी! आपने किस अपराधसे मुझपर दया भुला दी । हे दुःखोंके हरनेवाले, हे शरणागतको सुख देनेवाले, हा रघुकुलरूपी कमलके सूर्य! ॥१ ॥

हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा । सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा ॥

बिबिध बिलाप करति बैदेही । भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही ॥

हा लक्ष्मण! तुम्हारा दोष नहीं है । मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया । श्रीजानकीजी बहुत प्रकारसे विलाप कर रही हैं - [ हाय! ] प्रभुकी कृपा तो बहुत है, परन्तु वे स्नेही प्रभु बहुत दूर रह गये हैं ॥२ ॥

बिपति मोरिको प्रभुहि सुनावा । पुरोडास चह रासभ खावा ॥

सीता कै बिलाप सुनि भारी । भए चराचर जीव दुखारी ॥

प्रभुको मेरी यह विपत्ति कौन सुनावे? यज्ञके अन्नको गदहा खाना चाहता है । सीताजीका भारी विलाप सुनकर जड़ - चेतन सभी जीव दुखी हो गये ॥३ ॥

गीधराज सुनि आरत बानी । रघुकुलतिलक नारि पहिचानी ॥

अधम निसाचर लीन्हें जाई । जिमि मलेछ बस कपिला गाई ॥