श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 751–760

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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* * सुन्दरकाण्ड ७४९ रावणके लिये भी वही सहायता ( संयोग ) आ बनी है । मन्त्री उसे सुना - सुनाकर ( मुँहपर ) स्तुति करते हैं । [ इसी समय ] अवसर जानकर विभीषणजी आये । उन्होंने बड़े भाईके चरणोंमें सिर नवाया ॥१ ॥

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन । बोला बचन पाइ अनुसासन ॥

जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता । मति अनुरूप कहउँ हित ताता ॥

फिर वे सिर नवाकर अपने आसनपर बैठ गये और आज्ञा पाकर ये वचन बोले – हे कृपालु! जब आपने मुझसे बात ( राय ) पूछी ही है तो हे तात! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार आपके हितकी बात कहता हूँ— ॥२ ॥

। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना ॥जो आपन चाहै कल्याना

सो परनारि लिलार गोसाईं । तजउ चउथि के चंद कि नाईं ॥

जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकारके सुख चाहता हो, वह हे स्वामी! परस्त्रीके ललाटको चौथके चन्द्रमाकी तरह त्याग दे ( अर्थात् जैसे लोग चौथके चन्द्रमाको नहीं देखते, उसी प्रकार परस्त्रीका मुख ही न देखे) ॥ ३ ॥

चौदह भुवन एक पति होई । भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई ॥

गुन सागर नागर नर जोऊ । अलप लोभ भल कहइ न कोऊ ॥

चौदहों भुवनोंका एक ही स्वामी हो, वह भी जीवोंसे वैर करके ठहर नहीं सकता ( नष्ट हो जाता है) । जो मनुष्य गुणोंका समुद्र और चतुर हो, उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यों न हो, तो भी कोई भला नहीं कहता ॥४ ॥

दो० – काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ ।

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ॥ ३८ ॥

हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ–ये सब नरकके रास्ते हैं । इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत ( सत्पुरुष ) भजते हैं ॥ ३८ ॥

तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥

ब्रह्म अनामय अज भगवंता । ब्यापक अजित अनादि अनंता ॥

हे तात! राम मनुष्योंके ही राजा नहीं हैं । वे समस्त लोकोंके स्वामी और कालके भी काल हैं । वे [ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, यश, श्री, धर्म, वैराग्य एवं ज्ञानके भण्डार] भगवान् हैं; वे निरामय ( विकाररहित), अजन्मा, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म हैं ॥१ ॥

गो द्विज धेनु देव हितकारी । कृपा सिंधु मानुष तनुधारी ॥

जन रंजन भंजन खल ब्राता । बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥

पृष्ठ 752

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* *७५० रामचरितमानस उन कृपाके समुद्र भगवान्ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गौ और देवताओंका हित करनेके लिये ही मनुष्य- शरीर धारण किया है । हे भाई! सुनिये, वे सेवकोंको आनन्द देनेवाले, दुष्टोंके समूहका नाश करनेवाले और वेद तथा धर्मकी रक्षा करनेवाले हैं ॥ २ ॥

ताहि बरु तजि नाइअ माथा । प्रनतारति भंजन रघुनाथा ॥

देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही । भजहु राम बिनु हेतु सनेही ॥

वैर त्यागकर उन्हें मस्तक नवाइये । वे श्रीरघुनाथजी शरणागतका दुःख नाश करनेवाले हैं । हे नाथ! उन प्रभु ( सर्वेश्वर ) को जानकीजी दे दीजिये और बिना ही कारण स्नेह करनेवाले श्रीरामजीको भजिये ॥३ ॥

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा । बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा ॥

जासु नाम त्रय ताप नसावन । सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ॥

जिसे सम्पूर्ण जगत्से द्रोह करनेका पाप लगा है, शरण जानेपर प्रभु उसका भी त्याग नहीं करते । जिनका नाम तीनों तापोंका नाश करनेवाला है, वे ही प्रभु ( भगवान्) मनुष्यरूपमें प्रकट हुए हैं । हे रावण! हृदयमें यह समझ लीजिये ॥ ४ ॥

दो० - बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस ।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥ ३ ९ ( क ) ॥

हे दशशीश! मैं बार- बार आपके चरणों लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मदको त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजीका भजन कीजिये ॥ ३ ९ ( क ) ॥

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात ।

तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ॥ ३ ९ ( ख ) ॥

मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके हाथ यह बात कहला भेजी है । हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु ( आप ) से कह दी ॥ ३ ९ ( ख ) ॥

माल्यवंत अति सचिव सयाना । तासु बचन सुनि अति सुख माना ॥

तात अनुज तव नीति बिभूषन । सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥

माल्यवान् नामका एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था । उसने उन ( विभीषण ) के वचन सुनकर बहुत सुख माना [ और कहा- ] हे तात! आपके छोटे भाई नीतिविभूषण ( नीतिको भूषणरूपमें धारण करनेवाले अर्थात् नीतिमान् ) हैं । विभीषण जो कुछ कह रहे हैं उसे हृदयमें धारण कर लीजिये ॥ १ ॥

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ । दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ ॥

माल्यवंत गृह गयउ बहोरी । कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ॥

पृष्ठ 753

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* * सुन्दरकाण्ड ७५१ [ रावणने कहा— ] ये दोनों मूर्ख शत्रुकी महिमा बखान रहे हैं । यहाँ कोई है? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान् तो घर लौट गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे- ॥२ ॥

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं । नाथ पुरान निगम अस कहहीं ॥

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना । जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ॥

हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि ( अच्छी बुद्धि ) और कुबुद्धि ( खोटी बुद्धि ) सबके हृदयमें रहती हैं, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ ( सुखकी स्थिति ) रहती हैं और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति ( दुःख ) रहती है ॥३ ॥

तव उर कुमति बसी बिपरीता । हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥

कालराति निसिचर कुल केरी I। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥

आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है । इसीसे आप हितको अहित और शत्रुको मित्र मान रहे हैं । जो राक्षसकुलके लिये कालरात्रि [ के समान ] हैं, उन सीतापर आपकी बड़ी प्रीति है ॥४ ॥

दो० – तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार ।

सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ॥ ४० ॥

हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ ( विनती करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिये ( मुझ बालकके आग्रहको स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिये) । श्रीरामजीको सीताजी दे दीजिये, जिसमें आपका अहित न हो ॥ ४० ॥

बुध पुरान श्रुति संमत बानी । कही बिभीषन नीति बखानी ॥

सुनत दसानन उठा रिसाई । खल तोहि निकट मृत्यु अब आई ॥

विभीषणने पण्डितों, पुराणों और वेदोंद्वारा सम्मत ( अनुमोदित ) वाणीसे नीति बखानकर कही । पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ गयी है! ॥१ ॥

जिअसि सदा सठ मोरजिआवा । रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा ॥

कहसि न खल अस को जग माहीं । भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं ॥

अरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ ( अर्थात् मेरे ही अन्नसे पल रहा है ), पर हे मूढ! पक्ष तुझे शत्रुका ही अच्छा लगता है । अरे दुष्ट! बता न, जगत्‌में ऐसा कौन है जिसे मैंने अपनी भुजाओंके बलसे न जीता हो? ॥ २ ॥

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती । सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती ॥

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा । अनुज गहे पद बारहिं बारा ॥

पृष्ठ 754

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* *७५२ रामचरितमानस मेरे नगरमें रहकर प्रेम करता है तपस्वियोंपर । मूर्ख! उन्हींसे जा मिल और उन्हींको नीति बता । ऐसा कहकर रावणने उन्हें लात मारी । परन्तु छोटे भाई विभीषणने ( मारनेपर भी ) बार- बार उसके चरण ही पकड़े ॥३ ॥

उमा संत कइ इहड़ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ॥

तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा । रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ॥

[ शिवजी कहते हैं— ] हे उमा! संतकी यही बड़ाई ( महिमा ) है कि वे बुराई करनेपर भी [ बुराई करनेवालेकी ] भलाई ही करते हैं । [ विभीषणजीने कहा- ] आप मेरे पिताके समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ! आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है ॥४ ॥

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ । सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ॥

[इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर आकाशमार्गमें गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे—॥५ ॥

दो० – रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि ।

मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ॥ ४१ ॥

श्रीरामजी सत्यसंकल्प एवं [ सर्वसमर्थ ] प्रभु हैं और [ हे रावण! ] तुम्हारी सभा कालके वश है । अतः मैं अब श्रीरघुवीरकी शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना ॥ ४१ ॥

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं । आयूहीन भए सब तबहीं ॥

साधु अवग्या तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥

ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गये ( उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी ) । [ शिवजी कहते हैं - ] हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण कल्याणकी हानि ( नाश ) कर देता है ॥१ ॥

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा । भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा ॥

चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं । करत मनोरथ बहु मन माहीं ॥

रावणने जिस क्षण विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा वैभव (ऐश्वर्य ) से हीन हो गया । विभीषणजी हर्षित होकर मनमें अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ २ ॥

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता । अरुन मृदुल सेवक सुखदाता ॥

जे पद परसि तरी रिषिनारी । दंडक कानन पावनकारी ॥

[ वे सोचते जाते थे— ] मैं जाकर भगवान्‌के कोमल और लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं ॥ ३ ॥

पृष्ठ 755

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* * सुन्दरकाण्ड ७५३

जे पद जनकसुताँ उर लाए । कपट कुरंग संग धर धाए ॥

हर उर सर सरोज पद जेई । अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥

जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें धारण कर रखा है, जो कपटमृगके साथ पृथ्वीपर [ उसे पकड़नेको ] दौड़े थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें विराजते हैं, मेरा अहोभाग्य है कि उन्हींको आज मैं देखूँगा ॥ ४ ॥

दो० — जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ ।

ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥ ४२ ॥

जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे देखूँगा ॥४२ ॥

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा । आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा ॥

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा । जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा ॥

इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्रके इस पार (जिधर श्रीरामचन्द्रजीकी सेना थी ) आ गये । वानरोंने विभीषणको आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रुका कोई खास दूत है ॥ १ ॥

ताहि राखि कपीस पहिं आए । समाचार सब ताहि सुनाए ॥

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । आवा मिलन दसानन भाई ॥

उन्हें [ पहरेपर ] ठहराकर वे सुग्रीवके पास आये और उनको सब समाचार कह सुनाये । सुग्रीवने [ श्रीरामजीके पास जाकर ] कहा- हे रघुनाथजी! सुनिये, रावणका भाई [ आपसे ] मिलने आया है ॥२ ॥

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा । कहइ कपीस सुनहु नरनाहा ॥

जानि न जाइ निसाचर माया । कामरूप केहि कारन आया ॥

प्रभु श्रीरामजीने कहा — हे मित्र! तुम क्या समझते हो ( तुम्हारी क्या राय है )? वानरराज सुग्रीवने कहा- हे महाराज! सुनिये, राक्षसोंकी माया जानी नहीं जाती । यह इच्छानुसार रूप बदलनेवाला (छली ) न जाने किस कारण आया है ॥ ३ ॥

भेद हमार लेन सठ आवा । राखिअ बाँधि मोहि अस भावा ॥

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी । मम पन सरनागत भयहारी ॥

[ जान पड़ता है ] यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है । इसलिये मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इसे बाँध रखा जाय । [ श्रीरामजीने कहा- ] हे मित्र! तुमने नीति तो अच्छी विचारी । परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागतके भयको हर लेना! ॥४ ॥

पृष्ठ 756

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* *७५४ रामचरितमानस

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना । सरनागत बच्छल भगवाना ॥

प्रभुके वचन सुनकर हनुमान्जी हर्षित हुए [और मन-ही-मन कहने लगे कि ] भगवान् कैसे शरणागतवत्सल ( शरणमें आये हुएपर पिताकी भाँति प्रेम करनेवाले ) हैं ॥ ५ ॥

दो० – सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि ।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ॥ ४३ ॥

[ श्रीरामजी फिर बोले— ] जो मनुष्य अपने अहितका अनुमान करके शरणमें आये हुएका त्याग कर देते हैं, वे पामर ( क्षुद्र ) हैं, पापमय हैं; उन्हें देखनेमें भी हानि है ( पाप लगता है ) ॥ ४३ ॥

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू । आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू ॥

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं । जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ॥

जिसे करोड़ों ब्राह्मणोंकी हत्या लगी हो, शरणमें आनेपर मैं उसे भी नहीं त्यागता । जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसके करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥१ ॥

पापवंत कर सहज सुभाऊ । भजनु मोर तेहि भाव न काऊ ॥

जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ॥

पापीका यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नहीं सुहाता । यदि वह ( रावणका भाई ) निश्चय ही दुष्ट हृदयका होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था? ॥२ ॥

निर्मल मन जन सो मोहि पावा । मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥

भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा ॥

जो मनुष्य निर्मल मनका होता है, वही मुझे पाता है । मुझे कपट और छल छिद्र नहीं सुहाते । यदि उसे रावणने भेद लेनेको भेजा है, तब भी हे सुग्रीव! अपनेको कुछ भी भय या हानि नहीं है ॥३ ॥

जग महुँ सखा निसाचर जेते । लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते ॥

जौं सभीत आवा सरनाईं । रखिहउँ ताहि प्रान की नाईं ॥

क्योंकि हे सखे! जगत्में जितने भी राक्षस हैं, लक्ष्मण क्षणभरमें उन सबको मार सकते हैं और यदि वह भयभीत होकर मेरे शरण आया है तो मैं उसे प्राणोंकी तरह रखूँगा ॥ ४ ॥

दो० — उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत ।

जय कृपाल कहि कपि चले अंगद हनू समेत ॥४४ ॥

कृपाके धाम श्रीरामजीने हँसकर कहा-दोनों ही स्थितियोंमें उसे ले आओ । तब अंगद और हनुमान्सहित सुग्रीवजी ' कृपालु श्रीरामकी जय हो' कहते हुए चले ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 757

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* * सुन्दरकाण्ड ७५५

सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥

दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता । नयनानंद दान के दाता ॥

विभीषणजीको आदरसहित आगे करके वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करुणाकी खान श्रीरघुनाथजी थे । नेत्रोंको आनन्दका दान देनेवाले ( अत्यन्त सुखद ) दोनों भाइयोंको विभीषणजीने दूरहीसे देखा ॥१ ॥

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी । रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥

भुज प्रलंब कंजारुन लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥

फिर शोभाके धाम श्रीरामजीको देखकर वे पलक [ मारना ] रोककर ठिठककर ( स्तब्ध होकर ) एकटक देखते ही रह गये । भगवान्‌की विशाल भुजाएँ हैं, लाल कमलके समान नेत्र हैं और शरणागतके भयका नाश करनेवाला साँवला शरीर है ॥ २ ॥

सिंघ कंध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ॥

नयन नीर पुलकित अति गाता । मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥

सिंहके - से कंधे हैं, विशाल वक्ष: स्थल ( चौड़ी छाती) अत्यन्त शोभा दे रहा है । असंख्य कामदेवोंके मनको मोहित करनेवाला मुख है । भगवान्के स्वरूपको देखकर विभीषणजीके नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया और शरीर अत्यन्त पुलकित हो गया । फिर मनमें धीरज धरकर उन्होंने कोमल वचन कहे ॥३ ॥

नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥

सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥

हे नाथ! मैं दशमुख रावणका भाई हूँ । हे देवताओंके रक्षक! मेरा जन्म राक्षसकुलमें हुआ है । मेरा तामसी शरीर है, स्वभावसे ही मुझे पाप प्रिय हैं, जैसे उल्लूको अन्धकारपर सहज स्नेह होता है ॥४ ॥

दो० - श्रवन सुजसु सुनि आयउ प्रभु भंजन भव भीर ।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ॥ ४५ ॥

मैं कानोंसे आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु भव ( जन्म- मरण ) के भयका नाश करनेवाले हैं । हे दुखियोंके दुःख दूर करनेवाले और शरणागतको सुख देनेवाले श्रीरघुवीर! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये ॥ ४५ ॥

अस कहि करत दंडवत देखा । तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा ॥

दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा । भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ॥

पृष्ठ 758

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* *७५६ रामचरितमानस प्रभुने उन्हें ऐसा कहकर दण्डवत् करते देखा तो वे अत्यन्त हर्षित होकर तुरंत उठे । विभीषणजीके दीन वचन सुननेपर प्रभुके मनको बहुत ही भाये । उन्होंने अपनी विशाल भुजाओंसे पकड़कर उनको हृदयसे लगा लिया ॥ १ ॥

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी । बोले बचन भगत भयहारी ॥

कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥

छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामजी भक्तोंके भयको हरनेवाले वचन बोले- हे लंकेश! परिवारसहित अपनी कुशल कहो । तुम्हारा निवास बुरी जगहपर है ॥२ ॥

खल मंडली बसहु दिनु राती । सखा धरम निबहइ केहि भाँती ॥

मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती । अति नय निपुन न भाव अनीती ॥

दिन - रात दुष्टोंकी मण्डलीमें बसते हो । [ ऐसी दशामें ] हे सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति ( आचार- व्यवहार ) जानता हूँ । तुम अत्यन्त नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती ॥३ ॥

बरु भल बास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देइ बिधाता ॥

अब पद देखि कुसल रघुराया । जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥

हे तात! नरकमें रहना वरं अच्छा है, परन्तु विधाता दुष्टका संग [ कभी ] न दे । [ विभीषणजीने कहा— ] हे रघुनाथजी! अब आपके चरणोंका दर्शन कर कुशलसे हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझपर दया की है ॥ ४ ॥

दो० – तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम ।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ॥ ४६ ॥

तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्नमें भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम ( विषय- कामना) को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता ॥ ४६ ॥

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना । लोभ मोह मच्छर मद माना ॥

जब लगि उर न बसत रघुनाथा । धरें चाप सायक कटि भाथा ॥

लोभ, मोह, मत्सर ( डाह ), मद और मान आदि अनेकों दुष्ट तभीतक हृदयमें बसते हैं, जबतक कि धनुष- बाण और कमरमें तरकस धारण किये हुए श्रीरघुनाथजी हृदयमें नहीं बसते ॥१ ॥

ममता तरुन तमी अँधिआरी । राग द्वेष उलूक सुखकारी ॥

तब लगि बसति जीव मन माहीं । जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ॥

पृष्ठ 759

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* * सुन्दरकाण्ड ७५७ ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेषरूपी उल्लुओंको सुख देनेवाली है । वह ( ममतारूपी रात्रि) तभीतक जीवके मनमें बसती है, जबतक प्रभु ( आप ) का प्रतापरूपी सूर्य उदय नहीं होता ॥२ ॥

अब मैं कुसल मिटे भय भारे । देखि राम पद कमल तुम्हारे ॥

तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला । ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ॥

हे श्रीरामजी! आपके चरणारविन्दके दर्शन कर अब मैं कुशलसे हूँ, मेरे भारी भय मिट गये । हे कृपालु! आप जिसपर अनुकूल होते हैं, उसे तीनों प्रकारके भवशूल ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप ) नहीं व्यापते ॥ ३ ॥

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ । सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ ॥

जासु रूप मुनि ध्यान न आवा । तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ॥

मैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ । मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया । जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभुने स्वयं हर्षित होकर मुझे हृदयसे लगा लिया ॥ ४ ॥

दो० – अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज ।

देखेउँ नयन बिरंचि सिव सेब्य जुगल पद कंज ॥ ४७ ॥

हे कृपा और सुखके पुञ्ज श्रीरामजी! मेरा अत्यन्त असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजीके द्वारा सेवित युगल चरणकमलोंको अपने नेत्रोंसे देखा ॥ ४७ ॥

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ । जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ॥

जौं नर होइ चराचर द्रोही । आवै सभय सरन तकि मोही ॥

[ श्रीरामजीने कहा— ] हे सखा! सुनो, मैं तुम्हें अपना स्वभाव कहता हूँ, जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वतीजी भी जानती हैं । कोई मनुष्य [ सम्पूर्ण ] जड - चेतन जगत्का द्रोही हो, यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण तककर आ जाय, ॥ १ ॥

तजि मद मोह कपट छल नाना । करउँ सद्य तेहि साधु समाना ॥

जननी जनक बंधु सुत दारा । तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ॥

और मद, मोह तथा नाना प्रकारके छल-कपट त्याग दे तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधुके समान कर देता हूँ । माता, पिता, भाई, पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार— ॥२ ॥

सब कै ममता ताग बटोरी । मम पद मनहि बाँध बरि डोरी ॥

समदरसी इच्छा कछु नाहीं । हरष सोक भय नहिं मन माहीं ॥

इन सबके ममत्वरूपी तागोंको बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बटकर उसके द्वारा जो अपने मनको मेरे चरणोंमें बाँध देता है (सारे सांसारिक सम्बन्धोंका केन्द्र मुझे बना लेता है ), जो समदर्शी है, जिसे कुछ इच्छा नहीं है और जिसके मनमें हर्ष, शोक और भय नहीं है ॥३ ॥

पृष्ठ 760

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*:*७५८ रामचरितमानस

अस सज्जन मम उर बस कैसें । लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें ॥

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें । धरउँ देह नहिं आन निहोरें ॥

ऐसा सज्जन मेरे हृदयमें कैसे बसता है, जैसे लोभीके हृदयमें धन बसा करता है । तुम-सरीखे संत ही मुझे प्रिय हैं । मैं और किसीके निहोरेसे ( कृतज्ञतावश ) देह धारण नहीं करता ॥ ४ ॥

दो० – सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम ।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ॥ ४८ ॥

जो सगुण ( साकार ) भगवान्‌के उपासक हैं, दूसरेके हितमें लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान हैं ॥ ४८ ॥

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥

राम बचन सुनि बानर जूथा । सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ॥

हे लङ्कापति! सुनो, तुम्हारे अंदर उपर्युक्त सब गुण हैं । इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय हो । श्रीरामजीके वचन सुनकर सब वानरोंके समूह कहने लगे- कृपाके समूह श्रीरामजीकी जय हो! ॥१ ॥

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी । नहिं अघात श्रवनामृत जानी ॥

पद अंबुज गहि बारहिं बारा । हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥

प्रभुकी वाणी सुनते हैं और उसे कानोंके लिये अमृत जानकर विभीषणजी अघाते नहीं हैं । वे बार - बार श्रीरामजीके चरणकमलोंको पकड़ते हैं । अपार प्रेम है, हृदयमें समाता नहीं है ॥ २ ॥

सुनहु देव सचराचर स्वामी । प्रनतपाल उर अंतरजामी ॥

उर कछु प्रथम बासना रही । प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ॥

[ विभीषणजीने कहा— ] हे देव! हे चराचर जगत्के स्वामी! हे शरणागतके रक्षक! हे सबके हृदयके भीतरकी जाननेवाले! सुनिये, मेरे हृदयमें पहले कुछ वासना थी, वह प्रभुके चरणोंकी प्रीतिरूपी नदीमें बह गयी ॥३ ॥

अब कृपाल निज भगति पावनी । देहु सदा सिव मन भावनी ॥

एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिंधु कर नीरा ॥

अब तो हे कृपालु! शिवजीके मनको सदैव प्रिय लगनेवाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिये । ' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामजीने तुरंत ही समुद्रका जल माँगा ॥४ ॥

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं । मोर दरसु अमोघ जग माहीं ॥

अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ॥