श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 741–750
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 741–750
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* * सुन्दरकाण्ड ७३९
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु ॥
मास दिवस महुँ नाथु न आवा । तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा ॥
हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्तकी कथा ( घटना ) सुनाना और प्रभुको उनके बाणका प्रताप समझाना [ स्मरण कराना ] । यदि महीनेभरमें नाथ न आये तो फिर मुझे जीती न पायेंगे ॥३ ॥
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना । तुम्हहू तात कहत अब जाना ॥
तोहि देखि सीतलि भइ छाती । पुनि मो कहूँ सोइ दिनु सो राती ॥
हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जानेको कह रहे हो । तुमको
देखकर छाती ठंडी हुई थी । फिर मुझे वही दिन और वही रात! ॥ ४ ॥
दो० - जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह ।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह ॥ २७ ॥
हनुमान्जीने जानकीजीको समझाकर बहुत प्रकारसे धीरज दिया और उनके चरणकमलोंमें सिर नवाकर श्रीरामजीके पास गमन किया ॥२७ ॥
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी । गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी ॥
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा । सबद किलिकिला कपिन्ह सुनावा ॥
चलते समय उन्होंने महाध्वनिसे भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिरने लगे । समुद्र लाँघकर वे इस पार आये और उन्होंने वानरोंको किलकिला शब्द ( हर्षध्वनि) सुनाया ॥१ ॥
हरषे सब बिलोकि हनुमाना । नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना ॥
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा । कीन्हेसि रामचंद्र कर काजा ॥
हनुमान्जीको देखकर सब हर्षित हो गये और तब वानरोंने अपना नया जन्म समझा । हनुमान्जीका मुख प्रसन्न है और शरीरमें तेज विराजमान है, [जिससे उन्होंने समझ लिया कि ] ये श्रीरामचन्द्रजीका कार्य कर आये हैं ॥२ ॥
मिले सकल अति भए सुखारी । तलफत मीन पाव जिमि बारी ॥
चले हरषि रघुनायक पासा । पूँछत कहत नवल इतिहासा ॥
सब हनुमान्जीसे मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछलीको जल मिल गया हो । सब हर्षित होकर नये-नये इतिहास ( वृत्तान्त ) पूछते- कहते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥३ ॥
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* *७४० रामचरितमानस
तब मधुबन भीतर सब आए । अंगद संमत मधु फल खाए ॥
रखवारे जब बरजन लागे । मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥
तब सब लोग मधुवनके भीतर आये और अंगदकी सम्मतिसे सबने मधुर फल [या मधु और फल ] खाये । जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसोंकी मार मारते ही सब रखवाले भाग छूटे ॥४ ॥
दो० –जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज ।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज ॥ २८ ॥
उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे हैं । यह सुनकर सुग्रीव हर्षित हुए कि वानर प्रभुका कार्य कर आये हैं ॥ २८ ॥
जौं न होति सीता सुधि पाई । मधुबन के फल सकहिं कि खाई ॥
एहि बिधि मन बिचार कर राजा । आइ गए कपि सहित समाजा ॥
यदि सीताजीकी खबर न पायी होती तो क्या वे मधुवनके फल खा सकते थे? इस प्रकार राजा सुग्रीव मनमें विचार कर ही रहे थे कि समाज-सहित वानर आ गये ॥१ ॥
आइ सबन्हि नावा पद सीसा । मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा ॥
पूँछी कुसल कुसल पद देखी । राम कृपाँ भा काजु बिसेषी ॥
सबने आकर सुग्रीवके चरणोंमें सिर नवाया । कपिराज सुग्रीव सभीसे बड़े प्रेमके साथ मिले । उन्होंने कुशल पूछी, [ तब वानरोंने उत्तर दिया- ] आपके चरणोंके दर्शनसे सब कुशल है । श्रीरामजीकी कृपासे विशेष कार्य हुआ ( कार्यमें विशेष सफलता हुई है ) ॥ २ ॥
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना । राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ । कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ ॥
हे नाथ! हनुमान्ने ही सब कार्य किया और सब वानरोंके प्राण बचा लिये । यह सुनकर सुग्रीवजी हनुमान्जीसे फिर मिले और सब वानरोंसमेत श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥३ ॥
राम कपिन्ह जब आवत देखा । किएँ काजु मन हरष बिसेषा ॥
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई । परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥
श्रीरामजीने जब वानरोंको कार्य किये हुए आते देखा तब उनके मनमें विशेष हर्ष
हुआ । दोनों भाई स्फटिक शिलापर बैठे थे । सब वानर जाकर उनके चरणोंपर गिर पड़े ॥ ४ ॥
दो० -प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज ।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज ॥२ ९ ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७४१ दयाकी राशि श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेमसहित गले लगकर मिले और कुशल पूछी । [ वानरोंने कहा— ] हे नाथ! आपके चरणकमलोंके दर्शन पानेसे अब कुशल है ॥२ ९ ॥
जामवंत कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥
जाम्बवान्ने कहा— हे रघुनाथजी! सुनिये । हे नाथ! जिसपर आप दया करते हैं, उसे सदा कल्याण और निरन्तर कुशल है । देवता, मनुष्य और मुनि सभी उसपर प्रसन्न रहते हैं ॥ १ ॥
सोइ बिजई बिनई गुन सागर । तासु सुजसु त्रैलोक उजागर ॥
प्रभु की कृपा भयउ सबु काजू । जन्म हमार सुफल भा आजू॥
वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणोंका समुद्र बन जाता है । उसीका सुन्दर यश तीनों लोकोंमें प्रकाशित होता है । प्रभुकी कृपासे सब कार्य हुआ । आज हमारा जन्म सफल हो गया ॥ २ ॥
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी । सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥
पवनतनय के चरित सुहाए । जामवंत रघुपतिहि सुनाए ॥
हे नाथ! पवनपुत्र हनुमान्ने जो करनी की, उसका हजार मुखोंसे भी वर्णन नहीं किया जा सकता । तब जाम्बवान्ने हनुमान्जीके सुन्दर चरित्र ( कार्य ) श्रीरघुनाथजीको सुनाये ॥३ ॥
सुनत कृपानिधि मन अति भाए । पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए ॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी । रहति करति रच्छा स्वप्रान की ॥
[ वे चरित्र] सुननेपर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे । उन्होंने हर्षित होकर हनुमान्जीको फिर हृदयसे लगा लिया और कहा- हे तात! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणोंकी रक्षा करती हैं? ॥ ४ ॥
दो० – नाम पाहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट ॥ ३० ॥
( हनुमान्जीने कहा— ) आपका नाम रात -दिन पहरा देनेवाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है । नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये रहती हैं, यही ताला लगा है; फिर प्राण जायँ तो किस मार्गसे? ॥ ३० ॥
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही । रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी । बचन कहे कछु जनककुमारी ॥
चलते समय उन्होंने मुझे चूड़ामणि [ उतारकर ] दी । श्रीरघुनाथजीने उसे लेकर हृदयसे लगा लिया । [ हनुमान्जीने फिर कहा- ] हे नाथ! दोनों नेत्रोंमें जल भरकर जानकीजीने मुझसे कुछ वचन कहे– ॥१ ॥
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*:*७४२ रामचरितमानस अनुज समेत गहु प्रभु चरना ॥ दीन बंधु प्रनतारति हरना ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागी । केहिं अपराध नाथ हौं त्यागी ॥
छोटे भाईसमेत प्रभुके चरण पकड़ना [ और कहना कि ] आप दीनबन्धु हैं, शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले हैं और मैं मन, वचन और कर्मसे आपके चरणोंकी अनुरागिणी हूँ । फिर स्वामी ( आप ) ने मुझे किस अपराधसे त्याग दिया? ॥ २ ॥
अवगुन एक मोर मैं माना । बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा । निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥
[ हाँ] एक दोष मैं अपना [ अवश्य ] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये । किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं ॥ ३ ॥
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा । स्वास जरइ छन माहिं सरीरा ॥
नयन स्त्रवहिं जलु निज हित लागी । जरैं न पाव देह बिरहागी ॥
विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्वास पवन है; इस प्रकार [अग्नि और पवनका संयोग होनेसे ] यह शरीर क्षणमात्रमें जल सकता है । परन्तु नेत्र अपने हितके लिये ( प्रभुका स्वरूप देखकर सुखी होनेके लिये ) जल ( आँसू) बरसाते हैं, जिससे विरहकी आगसे भी देह जलने नहीं पाती ॥४ ॥
सीता कै अति बिपति बिसाला । बिनहिं कहें भलि दीनदयाला ॥
सीताजीकी विपत्ति बहुत बड़ी है । हे दीनदयालु! वह बिना कही ही अच्छी है ( कहनेसे आपको बड़ा क्लेश होगा) ॥ ५ ॥
दो० – निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति ।
बेगि चलिअ प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ॥ ३१ ॥
हे करुणानिधान! उनका एक-एक पल कल्पके समान बीतता है । अतः हे प्रभु! तुरंत चलिये और अपनी भुजाओंके बलसे दुष्टोंके दलको जीतकर सीताजीको ले आइये ॥३१ ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना । भरि आए जल राजिव नयना ॥
बचन कायँ मन मम गति जाही । सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥
सीताजीका दुःख सुनकर सुखके धाम प्रभुके कमलनेत्रोंमें जल भर आया [ और वे बोले- ] मन, वचन और शरीरसे जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय ) है, उसे क्या स्वप्नमें भी विपत्ति हो सकती है? ॥१ ॥
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तव सुमिरन भजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७४३ हनुमान्जीने कहा — हे प्रभो! विपत्ति तो वही ( तभी ) है जब आपका भजन-स्मरण न हो । हे प्रभो! राक्षसोंकी बात ही कितनी है? आप शत्रुको जीतकर जानकीजीको ले आवेंगे ॥२ ॥
सुनु कपि तोहि समान उपकारी । नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी ॥
प्रति उपकार करौं का तोरा । सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥
[ भगवान् कहने लगे— ] हे हनुमान्! सुन; तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है । मैं तेरा प्रत्युपकार ( बदलेमें उपकार) तो क्या करूँ, मेरा मन भी तेरे सामने नहीं हो सकता ॥ ३ ॥
सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं । देखेउँ करि बिचार मन माहीं ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता । लोचन नीर पुलक अति गाता ॥
हे पुत्र! सुन; मैंने मनमें [खूब ] विचार करके देख लिया कि मैं तुझसे उऋण नहीं हो सकता । देवताओंके रक्षक प्रभु बार- बार हनुमान्जीको देख रहे हैं । नेत्रोंमें प्रेमाश्रुओंका जल भरा है और शरीर अत्यन्त पुलकित है ॥४ ॥
दो० - सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत ।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत॥ ३२ ॥
प्रभुके वचन सुनकर और उनके [ प्रसन्न ] मुख तथा [ पुलकित ] अंगोंको देखकर हनुमान्जी हर्षित हो गये और प्रेममें विकल होकर ' हे भगवन्! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ' कहते हुए श्रीरामजीके चरणोंमें गिर पड़े ॥३२ ॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा । प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ॥
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा । सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥
प्रभु उनको बार- बार उठाना चाहते हैं, परन्तु प्रेममें डूबे हुए हनुमान्जीको चरणोंसे उठना सुहाता नहीं । प्रभुका कर-कमल हनुमान्जीके सिरपर है । उस स्थितिका स्मरण करके शिवजी प्रेममग्न हो गये ॥१ ॥
सावधान मन करि पुनि संकर । लागे कहन कथा अति सुंदर ॥
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा । कर गहि परम निकट बैठावा ॥
फिर मनको सावधान करके शङ्करजी अत्यन्त सुन्दर कथा कहने लगे- हनुमान्जीको उठाकर प्रभुने हृदयसे लगाया और हाथ पकड़कर अत्यन्त निकट बैठा लिया ॥२ ॥
कहु कपि रावन पालित लंका । केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका ॥
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना । बोला बचन बिगत अभिमाना ॥
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७४४ * रामचरितमानस * हे हनुमान्! बताओ तो, रावणके द्वारा सुरक्षित लङ्का और उसके बड़े बाँके किलेको तुमने किस तरह जलाया? हनुमानजीने प्रभुको प्रसन्न जाना और वे अभिमानरहित वचन बोले—॥३ ॥
साखामृग कै बड़ि मनुसाई । साखा तें साखा पर जाई ॥
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा । निसिचर गन बधि बिपिन उजारा ॥
बंदरका बस, यही बड़ा पुरुषार्थ है कि वह एक डालसे दूसरी डालपर चला जाता है । मैंने जो समुद्र लाँघकर सोनेका नगर जलाया और राक्षसगणको मारकर अशोकवनको उजाड़ डाला, ॥४ ॥
सो सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥
यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी! आपहीका प्रताप है । हे नाथ! इसमें मेरी प्रभुता ( बड़ाई ) कुछ भी नहीं है ॥५ ॥
दो० – ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल ।
तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल ॥ ३३ ॥
हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है । आपके प्रभावसे रूई [जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है ] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है ( अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है ) ॥ ३३ ॥
नाथ भगति अति सुखदायनी । देहु कृपा करि अनपायनी ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥
हे नाथ! मुझे अत्यन्त सुख देनेवाली अपनी निश्चल भक्ति कृपा करके दीजिये । हनुमान्जीकी अत्यन्त सरल वाणी सुनकर, हे भवानी! तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने ' एवमस्तु ' ( ऐसा ही हो ) कहा ॥ १ ॥
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना । ताहि भजनु तजि भाव न आना ॥
यह संबाद जासु उर आवा । रघुपति चरन भगति सोइ पावा ॥
हे उमा! जिसने श्रीरामजीका स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नहीं सुहाती! यह स्वामी- सेवकका संवाद जिसके हृदयमें आ गया, वही श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी भक्ति पा गया ॥ २ ॥
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा । जय जय जय कृपाल सुखकंदा ॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा । कहा चल कर करहु बनावा ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७४५ प्रभुके वचन सुनकर वानरगण कहने लगे- कृपालु आनन्दकन्द श्रीरामजीकी जय हो, जय हो, जय हो! तब श्रीरघुनाथजीने कपिराज सुग्रीवको बुलाया और कहा– चलनेकी तैयारी करो ॥३ ॥
अब बिलंबु केहि कारन कीजे । तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी । नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥
अब विलम्ब किस कारण किया जाय? वानरोंको तुरंत आज्ञा दो । [ भगवान्की ] यह लीला ( रावणवधकी तैयारी ) देखकर, बहुत-से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाशसे अपने-अपने लोकको चले ॥४ ॥
दो० – कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ ॥ ३४ ॥
वानरराज सुग्रीवने शीघ्र ही वानरोंको बुलाया, सेनापतियोंके समूह आ गये । वानर- भालुओंके झुंड अनेक रंगोंके हैं और उनमें अतुलनीय बल है ॥ ३४ ॥
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा । गर्जहिं भालु महाबल कीसा ॥
देखी राम सकल कपि सेना । चितड़ कृपा करि राजिव नैना ॥
वे प्रभुके चरणकमलोंमें सिर नवाते हैं । महान् बलवान् रीछ और वानर गरज रहे हैं । श्रीरामजीने
वानरोंकी सारी सेना देखी । तब कमलनेत्रोंसे कृपापूर्वक उनकी ओर दृष्टि डाली ॥१ ॥
राम कृपा बल पाइ कपिंदा । भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भए सुंदर सुभ नाना ॥
रामकृपाका बल पाकर श्रेष्ठ वानर मानो पंखवाले बड़े पर्वत हो गये । तब श्रीरामजीने हर्षित
होकर प्रस्थान ( कूच ) किया । अनेक सुन्दर और शुभ शकुन हुए ॥ २ ॥
जासु सकल मंगलमय कीती । तासु पयान सगुन यह नीती ॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ॥
जिनकी कीर्ति सब मङ्गलोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय शकुन होना, यह नीति है ( लीलाकी मर्यादा है ) । प्रभुका प्रस्थान जानकीजीने भी जान लिया । उनके बायें अङ्ग फड़क-फड़ककर मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं ] ॥ ३ ॥
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई । असगुन भयउ रावनहि सोई ॥
चला कटकु को बरनैं पारा । गर्जहिं बानर भालु अपारा ॥
जानकीजीको जो- जो शकुन होते थे, वही- वही रावणके लिये अपशकुन हुए । सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं ॥४ ॥
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*:*७४६ रामचरितमानस
नख आयुध गिरि पादपधारी । चले गगन महि इच्छाचारी ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं । डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ॥
नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार ( सर्वत्र बेरोक -टोक ) चलनेवाले रीछ- वानर पर्वतों और वृक्षोंको धारण किये कोई आकाशमार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं । वे सिंहके समान गर्जना कर रहे हैं । [उनके चलने और गर्जनेसे ] दिशाओंके हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं ॥५ ॥
छं० – चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे ।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं ।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥
दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चञ्चल हो गये ( काँपने लगे ) और समुद्र खलबला उठे । गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब-के - सब मनमें हर्षित हुए कि [ अब ] हमारे दुःख टल गये । अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं । ‘ प्रबलप्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो ' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणसमूहोंको गा रहे हैं ॥१ ॥
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई । गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई ।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी ।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥
उदार ( परम श्रेष्ठ एवं महान् ) सर्पराज शेषजी भी सेनाका बोझ नहीं सह सकते, वे बार - बार मोहित हो जाते ( घबड़ा जाते ) हैं और पुनः -पुनः कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे पकड़ते हैं । ऐसा करते ( अर्थात् बार - बार दाँतोंको गड़ाकर कच्छपकी पीठपर लकीर-सी खींचते हुए ) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दर प्रस्थानयात्राको परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथाको सर्पराज शेषजी कच्छपकी पीठपर लिख रहे हों ॥२ ॥
दो० – एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर ।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर ॥ ३५ ॥
इस प्रकार कृपानिधान श्रीरामजी समुद्रतटपर जा उतरे । अनेकों रीछ-वानर वीर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे ॥ ३५ ॥
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* * सुन्दरकाण्ड ७४७
उहाँ निसार रहहिं ससंका । जब तें जारि गयउ कपि लंका ॥
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा । नहिं निसिचर कुल केर उबारा ॥
वहाँ ( लङ्कामें ) जबसे हनुमान्जी लङ्काको जलाकर गये, तबसे राक्षस भयभीत रहने लगे । अपने - अपने घरोंमें सब विचार करते हैं कि अब राक्षसकुलकी रक्षा [ का कोई उपाय ] नहीं है ॥ १ ॥
जासु दूत बल बरनि न जाई । तेहि आएँ पुर कवन भलाई ॥
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी । मंदोदरी अधिक अकुलानी ॥
जिसके दूतका बल वर्णन नहीं किया जा सकता, उसके स्वयं नगरमें आनेपर कौन भलाई है ( हमलोगोंकी बड़ी बुरी दशा होगी )? दूतियोंसे नगरनिवासियोंके वचन सुनकर मन्दोदरी बहुत ही व्याकुल हो गयी ॥२ ॥
रहसि जोर कर पति पग लागी । बोली बचन नीति रस पागी ॥
कंत करष हरि सन परिहरहू । मोर कहा अति हित हियँ धरहू ॥
वह एकान्तमें हाथ जोड़कर पति ( रावण ) के चरणों लगी और नीतिरसमें पगी हुई वाणी बोली— हे प्रियतम! श्रीहरिसे विरोध छोड़ दीजिये । मेरे कहनेको अत्यन्त ही हितकर जानकर हृदयमें धारण कीजिये ॥ ३ ॥
समुझत जासु दूत कइ करनी । स्रवहिं गर्भ रजनीचर घरनी ॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई । पठवहु कंत जो चहहु भलाई ॥
जिनके दूतकी करनीका विचार करते ही ( स्मरण आते ही ) राक्षसोंकी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते हैं, हे प्यारे स्वामी! यदि भला चाहते हैं, तो अपने मन्त्रीको बुलाकर उसके साथ उनकी स्त्रीको भेज दीजिये ॥४ ॥
तव कुल कमल बिपिन दुखदाई । सीता सीत निसा सम आई ॥
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें । हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें ॥
सीता आपके कुलरूपी कमलोंके वनको दुःख देनेवाली जाड़ेकी रात्रिके समान आयी है । हे नाथ! सुनिये, सीताको दिये ( लौटाये ) बिना शम्भु और ब्रह्माके किये भी आपका भला नहीं हो सकता ॥५ ॥
दो० - राम बान अहि गन सरिस निकर निसार भेक ।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक ॥ ३६ ॥
श्रीरामजीके बाण सर्पोंके समूहके समान हैं और राक्षसोंके समूह मेढकके समान । जबतक वे इन्हें ग्रस नहीं लेते ( निगल नहीं जाते ) तबतक हठ छोड़कर उपाय कर लीजिये ॥ ३६ ॥
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*:*७४८ रामचरितमानस
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी । बिहसा जगत बिदित अभिमानी ॥
सभय सुभाउ नारि कर साचा । मंगल महुँ भय मन अति काचा ॥
मूर्ख और जगत्प्रसिद्ध अभिमानी रावण कानोंसे उसकी वाणी सुनकर खूब हँसा [ और बोला— ] स्त्रियोंका स्वभाव सचमुच ही बहुत डरपोक होता है । मङ्गलमें भी भय करती हो! तुम्हारा मन ( हृदय ) बहुत ही कच्चा ( कमजोर ) है ॥१ ॥
जौं आवइ मर्कट कटकाई । जिअहिं बिचारे निसिचर खाई ॥
कंपहिं लोकप जाकीं त्रासा । तासु नारि सभीत बड़ि हासा ॥
यदि वानरोंकी सेना आवेगी तो बेचारे राक्षस उसे खाकर अपना जीवननिर्वाह करेंगे । लोकपाल भी जिसके डरसे काँपते हैं, उसकी स्त्री डरती हो, यह बड़ी हँसीकी बात है ॥ २ ॥
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई । चलेउ सभाँ ममता अधिकाई ॥
भयउ कंत पर बिधि बिपरीता ॥मंदोदरी हृदयँ कर चिंता । रावणने ऐसा कहकर हँसकर उसे हृदयसे लगा लिया और ममता बढ़ाकर ( अधिक स्नेह दर्शाकर ) वह सभामें चला गया । मन्दोदरी हृदयमें चिन्ता करने लगी कि पतिपर विधाता प्रतिकूल हो गये ॥ ३ ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई । सिंधु पार सेना सब आई ॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू । ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥
ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि शत्रुकी सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है । उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि उचित सलाह कहिये [ अब क्या करना चाहिये? ] । तब वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये ( इसमें सलाहकी कौन -सी बात है? ) ॥ ४ ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं । नर बानर केहि लेखे माहीं ॥
आपने देवताओं और राक्षसोंको जीत लिया, तब तो कुछ श्रम ही नहीं हुआ । फिर मनुष्य और वानर किस गिनतीमें हैं? ॥५ ॥
दो० - सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस ।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ॥ ३७ ॥
मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [ अप्रसन्नताके ] भय या [ लाभकी ] आशासे [ हितकी बात न कहकर ] प्रिय बोलते हैं ( ठकुरसुहाती कहने लगते हैं ); तो [ क्रमश: ] राज्य, शरीर और धर्म– इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥ ३७ ॥
सोइ रावन कहुँ बनी सहाई । अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई ॥
अवसर जानि बिभीषनु आवा । भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ॥