श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 771–780
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 771–780
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* * सुन्दरकाण्ड ७६९ समुद्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजीको यह मत ( उसकी सलाह ) अच्छा लगा । यह चरित्र कलियुगके पापोंको हरनेवाला है, इसे तुलसीदासने अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है । श्रीरघुनाथजीके गुणसमूह सुखके धाम, सन्देहका नाश करनेवाले और विषादका दमन करनेवाले हैं । अरे मूर्ख मन! तू संसारका सब आशा भरोसा त्यागकर निरन्तर इन्हें गा और सुन ।
दो० - सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ॥६० ॥
श्रीरघुनाथजीका गुणगान सम्पूर्ण सुन्दर मङ्गलोंका देनेवाला है । जो इसे आदरसहित सुनेंगे, वे बिना किसी जहाज ( अन्य साधन ) के ही भवसागरको तर जायँगे ॥६० ॥
मासपारायण, चौबीसवाँ विश्राम इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने पञ्चमः सोपानः समाप्तः । कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका यह पाँचवाँ सोपान समाप्त हुआ । ( सुन्दरकाण्ड समाप्त )
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शरणागतवत्सलता M
बिभीषन पाछें मेला । सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला ॥
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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीजानकीवल्लभो विजयते श्रीरामचरितमानस षष्ठ सोपान लङ्काकाण्ड
श्लोक
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम् ॥ १ ॥
कामदेवके शत्रु शिवजीके सेव्य, भव ( जन्म- मृत्यु ) के भयको हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथीके लिये सिंहके समान, योगियोंके स्वामी ( योगीश्वर ), ज्ञानके द्वारा जानने योग्य गुणोंकी निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, मायासे परे, देवताओंके स्वामी, दुष्टोंके वधमें तत्पर, ब्राह्मणवृन्दके एकमात्र देवता ( रक्षक ), जलवाले मेघके समान सुन्दर श्याम, कमलके - से नेत्रवाले, पृथ्वीपति ( राजा ) के रूपमें परमदेव श्रीरामजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥१ ॥
शङ्खेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गङ्गाशशाङ्कप्रियम् । काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम्॥२ ॥
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* *७७२ रामचरितमानस शङ्ख और चन्द्रमाकी -सी कान्तिके अत्यन्त सुन्दर शरीरवाले, व्याघ्रचर्मके वस्त्रवाले, कालके समान [ अथवा काले रंगके ] भयानक सर्पोंका भूषण धारण करनेवाले, गङ्गा और चन्द्रमाके प्रेमी, काशीपति, कलियुगके पाप-समूहका नाश करनेवाले, कल्याणके कल्पवृक्ष, गुणोंके निधान और कामदेवको भस्म करनेवाले पार्वतीपति वन्दनीय श्रीशङ्करजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२ ॥
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम् ।
खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥ ३ ॥
जो सत्पुरुषोंको अत्यन्त दुर्लभ कैवल्यमुक्तितक दे डालते हैं और जो दुष्टोंको दण्ड देनेवाले हैं, वे कल्याणकारी श्रीशम्भु मेरे कल्याणका विस्तार करें ॥ ३ ॥
दो० – लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड ।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥
लव, निमेष, परमाणु, वर्ष, युग और कल्प जिनके प्रचण्ड बाण हैं और काल जिनका धनुष है, हे मन! तू उन श्रीरामजीको क्यों नहीं भजता?
सो० – सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उत्तरै कटकु ॥
समुद्रके वचन सुनकर प्रभु श्रीरामजीने मन्त्रियोंको बुलाकर ऐसा कहा - अब विलम्ब किसलिये हो रहा है? सेतु ( पुल ) तैयार करो, जिसमें सेना उतरे ।
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह ।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरहिं ॥
जाम्बवान्ने हाथ जोड़कर कहा - हे सूर्यकुलके ध्वजा- स्वरूप ( कीर्तिको बढ़ानेवाले ) श्रीरामजी! सुनिये । हे नाथ! [ सबसे बड़ा ] सेतु तो आपका नाम ही है, जिसपर चढ़कर (जिसका आश्रय लेकर ) मनुष्य संसाररूपी समुद्रसे पार हो जाते हैं
यह लघु जलधि तरत कति बारा । अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ॥
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी । सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी ॥
फिर यह छोटा-सा समुद्र पार करनेमें कितनी देर लगेगी? ऐसा सुनकर फिर पवनकुमार श्रीहनुमान्जीने कहा— प्रभुका प्रताप भारी बड़वानल ( समुद्रकी आग ) के समान है । इसने पहले समुद्रके जलको सोख लिया था ॥ १ ॥
तव रिपु नारि रुदन जल धारा । भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा ॥
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी । हरषे कपि रघुपति तन हेरी ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७७३ परन्तु आपके शत्रुओंकी स्त्रियोंके आँसुओंकी धारासे यह फिर भर गया और उसीसे खारा भी हो गया । हनुमान्जीकी यह अत्युक्ति ( अलङ्कारपूर्ण युक्ति) सुनकर वानर श्रीरघुनाथजीकी ओर देखकर हर्षित हो गये ॥ २ ॥
जामवंत बोले दोउ भाई । नल नीलहि सब कथा सुनाई ॥
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ॥
जाम्बवान्ने नल-नील दोनों भाइयोंको बुलाकर उन्हें सारी कथा कह सुनायी [ और कहा— ] मनमें श्रीरामजीके प्रतापको स्मरण करके सेतु तैयार करो, [ रामप्रतापसे ] कुछ भी परिश्रम नहीं होगा ॥३ ॥
बोलि लिए कपि निकर बहोरी । सकल सुनहु बिनती कछु मोरी ॥
राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ॥
फिर वानरोंके समूहको बुला लिया [ और कहा- ] आप सब लोग मेरी कुछ विनती सुनिये । अपने हृदयमें श्रीरामजीके चरण- कमलोंको धारण कर लीजिये और सब भालू और वानर एक खेल कीजिये ॥४ ॥
धावहु मर्कट बिकट बरूथा । आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा ॥
सुनि कपि भालु चले करि हूहा । जय रघुबीर प्रताप समूहा ॥
विकट वानरोंके समूह ( आप) दौड़ जाइये और वृक्षों तथा पर्वतोंके समूहोंको उखाड़ लाइये । यह सुनकर वानर और भालू हूह ( हुंकार ) करके और श्रीरघुनाथजीके प्रतापसमूहकी [ अथवा प्रतापके पुंज श्रीरामजीकी ] जय पुकारते हुए चले ॥५ ॥
दो० – अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ ।
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ ॥१ ॥
बहुत ऊँचे - ऊँचे पर्वतों और वृक्षोंको खेलकी तरह ही [ उखाड़कर] उठा लेते हैं और ला- लाकर नल-ल-नीलको देते हैं । वे अच्छी तरह गढ़कर [ सुन्दर ] सेतु बनाते हैं ॥ १ ॥
सैल बिसाल आनि कपि देहीं । कंदुक इव नल नील ते लेहीं ॥
देखि सेतु अति सुंदर रचना । बिहसि कृपानिधि बोले बचना ॥
वानर बड़े - बड़े पहाड़ ला-लाकर देते हैं और नल-नील उन्हें गेंदकी तरह ले लेते हैं । सेतुकी अत्यन्त सुन्दर रचना देखकर कृपासिन्धु श्रीरामजी हँसकर वचन बोले—॥१ ॥
परम रम्य उत्तम यह धरनी । महिमा अमित जाइ नहिं बरनी ॥
करिहउँ इहाँ संभु थापना ।। मोरे हृदयँ परम कलपना ॥
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७७४ * रामचरितमानस * यह ( यहाँकी ) भूमि परम रमणीय और उत्तम है । इसकी असीम महिमा वर्णन नहीं की जा
सकती । मैं यहाँ शिवजीकी स्थापना करूँगा । मेरे हृदयमें यह महान् संकल्प है ॥२ ॥
सुनि कपीस बहु दूत पठाए । मुनिबर सकल बोलि लै आए ।
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा । सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥
श्रीरामजीके वचन सुनकर वानरराज सुग्रीवने बहुत- से दूत भेजे, जो सब श्रेष्ठ मुनियोंको बुलाकर ले आये । शिवलिङ्गकी स्थापना करके विधिपूर्वक उसका पूजन किया । [ फिर भगवान् बोले– ] शिवजीके समान मुझको दूसरा कोई प्रिय नहीं है ॥३ ॥
सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥
संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥
जो शिवसे द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्नमें भी मुझे नहीं पाता । शङ्करजीसे विमुख होकर ( विरोध करके ) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है ॥ ४ ॥
दो० – संकरप्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महुँ बास ॥२ ॥
जिनको शङ्करजी प्रिय हैं, परन्तु जो मेरे द्रोही हैं; एवं जो शिवजीके द्रोही हैं और मेरे दास [ बनना चाहते ] हैं, वे मनुष्य कल्पभर घोर नरकमें निवास करते हैं ॥ २ ॥
जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं I। ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥
जो मनुष्य [ मेरे स्थापित किये हुए इन ] रामेश्वरजीका दर्शन करेंगे, वे शरीर छोड़कर मेरे लोकको जायँगे । और जो गङ्गाजल लाकर इनपर चढ़ावेगा, वह मनुष्य सायुज्य मुक्ति पावेगा ( अर्थात् मेरे साथ एक हो जायगा) ॥ १ ॥
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देहि ॥
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥
जो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शङ्करजी मेरी भक्ति देंगे । और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा ॥ २ ॥
राम बचन सब के जिय भाए । मुनिबर निज निज आश्रम आए ॥
गिरिजा रघुपति कै यह रीती । संतत करहिं प्रनत पर प्रीती ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७७५ श्रीरामजीके वचन सबके मनको अच्छे लगे । तदनन्तर वे श्रेष्ठ मुनि अपने - अपने आश्रमोंको लौट आये । [ शिवजी कहते हैं - ] हे पार्वती! श्रीरघुनाथजीकी यह रीति है कि वे शरणागतपर सदा प्रीति करते हैं ॥ ३ ॥
बाँधा सेतु नील नल नागर । राम कृपाँ जसु भयउ उजागर ॥
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई । भए उपल बोहित सम तेई ॥
चतुर नल और नीलने सेतु बाँधा । श्रीरामजीकी कृपासे उनका यह [ उज्वल ] यश सर्वत्र फैल गया । जो पत्थर आप डूबते हैं और दूसरोंको डुबा देते हैं, वे ही जहाजके समान [ स्वयं तैरनेवाले और दूसरोंको पार ले जानेवाले ] हो गये ॥ ४ ॥
महिमा यह न जलधि कइ बरनी । पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी ॥
यह न तो समुद्रकी महिमा वर्णन की गयी है, न पत्थरोंका गुण है और न वानरोंकी ही कोई करामात है ॥५ ॥
दो० - श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥ ३ ॥
श्रीरघुवीरके प्रतापसे पत्थर भी समुद्रपर तैर गये । ऐसे श्रीरामजीको छोड़कर जो किसी दूसरे स्वामीको जाकर भजते हैं वे [निश्चय ही ] मन्दबुद्धि हैं ॥ ३ ॥
बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा । देखि कृपानिधि के मन भावा ॥
चली सेन कछु बरनि न जाई । गर्जहिं मर्कट भट समुदाई ॥
नल-नीलने सेतु बाँधकर उसे बहुत मजबूत बनाया । देखनेपर वह कृपानिधान श्रीरामजीके मनको [ बहुत ही ] अच्छा लगा । सेना चली, जिसका कुछ वर्णन नहीं हो सकता | योद्धा वानरोंके समुदाय गरज रहे हैं ॥१ ॥
सेतुबंध ढिगढिग चढ़िचढ़ि रघुराई । चितव कृपाल सिंधु बहुताई ॥
देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा । प्रगट भए सब जलचर बृंदा ॥
कृपालु श्रीरघुनाथजी सेतुबन्धके तटपर चढ़कर समुद्रका विस्तार देखने लगे । करुणाकन्द ( करुणा मूल) प्रभुके दर्शनके लिये सब जलचरोंके समूह प्रकट हो गये ( जलके ऊपर निकल आये ) ॥ २ ॥
मकर नक्र नाना झष ब्याला । सत जोजन तन परम बिसाला ॥
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं । एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं ॥
बहुत तरहके मगर, नाक ( घड़ियाल ), मच्छ और सर्प थे, जिनके सौ-सौ योजनके बहुत बड़े विशाल शरीर थे । कुछ ऐसे भी जन्तु थे जो उनको भी खा जायँ । किसी -किसीके डरसे तो वे भी डर रहे थे ॥ ३ ॥
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* *७७६ रामचरितमानस
प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे । मन हरषित सब भए सुखारे ॥
तिन्ह कीं ओट न देखिअ बारी । मगन भए हरि रूप निहारी ॥
वे सब [ वैर - विरोध भूलकर] प्रभुके दर्शन कर रहे हैं, हटानेसे भी नहीं हटते । सबके मन हर्षित हैं; सब सुखी हो गये । उनकी आड़के कारण जल नहीं दिखायी पड़ता । वे सब भगवान्का रूप देखकर [ आनन्द और प्रेममें ] मग्न हो गये ॥४ ॥
चला कटकु प्रभु आयसु पाई । को कहि सक कपि दल बिपुलाई ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर सेना चली । वानर सेनाकी विपुलता ( अत्यधिक संख्या ) को कौन कह सकता है? ॥ ५ ॥
दो० – सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं ।
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं ॥ ४ ॥
सेतुबन्धपर बड़ी भीड़ हो गयी, इससे कुछ वानर आकाशमार्गसे उड़ने लगे और दूसरे [ कितने ही ] जलचर जीवोंपर चढ़ चढ़कर पार जा रहे हैं ॥४ ॥
अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई । बिहँसि चले कृपाल रघुराई ॥
सेन सहित उतरे रघुबीरा । कहि न जाइ कपि जूथप भीरा ॥
कृपालु रघुनाथजी [ तथा लक्ष्मणजी ] दोनों भाई ऐसा कौतुक देखकर हँसते हुए चले । श्रीरघुवीर सेनासहित समुद्रके पार हो गये । वानरों और उनके सेनापतियोंकी भीड़ कही नहीं जा सकती ॥१ ॥
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा । सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा ॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाए । सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए ॥
प्रभुने समुद्रके पार डेरा डाला और सब वानरोंको आज्ञादी कि तुम जाकर सुन्दर फल- मूल खाओ । यह सुनते ही रीछ- वानर जहाँ-तहाँ दौड़ पड़े ॥२ ॥
सब तरु फरे राम हित लागी । रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥
खाहिं मधुर फल बिटप हलावहिं । लंका सन्मुख सिखर चलावहिं ॥
श्रीरामजीके हित ( सेवा ) के लिये सब वृक्ष ऋतु-कुऋतु – समयकी गतिको छोड़कर फल उठे । वानर - भालू मीठे - मीठे फल खा रहे हैं, वृक्षोंको हिला रहे हैं और पर्वतोंके शिखरोंको लङ्काकी ओर फेंक रहे हैं ॥ ३ ॥
जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं । घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ॥
दसनन्हि काटि नासिका काना । कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना ॥
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* * लङ्काकाण्ड ७७७ घूमते - फिरते जहाँ कहीं किसी राक्षसको पा जाते हैं तो सब उसे घेरकर खूब नाच नचाते हैं और दाँतोंसे उसके नाक-कान काटकर, प्रभुका सुयश कहकर [ अथवा कहलाकर ] तब उसे जाने देते हैं ॥४ ॥
जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥
सुनत श्रवन बारिधि बंधाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥
जिन राक्षसोंके नाक और कान काट डाले गये, उन्होंने रावणसे सब समाचार कहा । समुद्र [ पर सेतु ] का बाँधा जाना कानोंसे सुनते ही रावण घबड़ाकर दसों मुखोंसे बोल उठा- ॥५ ॥
दो० – बाँध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस ।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥ ५ ॥
वननिधि, नीरनिधि, जलधि, सिंधु, वारीश, तोयनिधि, कंपति, उदधि, पयोधि, नदीशको क्या सचमुच ही बाँध लिया? ॥५ ॥
निज बिकलता बिचारि बहोरी । बिहँसि गयउ गृह करि भय भोरी ॥
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो । कौतुकहीं पाथोधि बँधायो ॥
फिर अपनी व्याकुलताको समझकर [ऊपरसे ] हँसता हुआ, भयको भुलाकर रावण महलको गया । [ जब ] मन्दोदरीने सुना कि प्रभु श्रीरामजी आ गये हैं और उन्होंने खेलमें ही समुद्रको बँधवा लिया है, ॥ १ ॥
कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम मनोहर बानी ॥
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥
[ तब ] वह हाथ पकड़कर, पतिको अपने महलमें लाकर परम मनोहर वाणी बोली । चरणोंमें सिर नवाकर उसने अपना आँचल पसारा और कहा-हे प्रियतम! क्रोध त्यागकर मेरा वचन सुनिये ॥२ ॥
नाथ बयरु कीजे ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥
हे नाथ! वैर उसीके साथ करना चाहिये जिससे बुद्धि और बलके द्वारा जीत सके । आपमें औरअतिश्रीरघुनाथजीमेंबल मधु निश्चयकैटभही जेहिंकैसा अन्तरमारेहै ।, जैसामहाबीरजुगनू और सूर्यमेंदितिसुत! ॥ ३ ॥ संघारे ॥
जेहिं बलि बाँधि सहसभुज मारा । सोइ अवतरेउ हरन महि भारा ॥
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* *७७८ रामचरितमानस जिन्होंने [ विष्णुरूपसे ] अत्यन्त बलवान् मधु और कैटभ [ दैत्य ] मारे और [ वाराह और नृसिंहरूपसे ] महान् शूरवीर दितिके पुत्रों ( हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु ) का संहार किया; जिन्होंने [ वामनरूपसे ] बलिको बाँधा और [ परशुरामरूपसे ] सहस्रबाहुको मारा, वे ही [ भगवान्] पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये [ रामरूपमें ] अवतीर्ण ( प्रकट) हुए हैं! ॥४ ॥
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा । काल करम जिव जाकें हाथा ॥
हे नाथ! उनका विरोध न कीजिये, जिनके हाथमें काल, कर्म और जीव सभी हैं ॥५ ॥
दो० - रामहि सौंपि जानकी नाइ कमल पद माथ ।
सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ॥६ ॥
[ श्रीरामजीके ] चरणकमलोंमें सिर नवाकर (उनकी शरणमें जाकर) उनको जानकीजी सौंप नाथदीजिये और आपदीनदयालपुत्रको राज्य देकररघुराईवनमें जाकर। बाघश्रीरघुनाथजीकासनमुखभजनगएँकीजियेन॥६खाई॥ ॥
चाहिअ करन सो सब करि बीते । तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥
हे नाथ! श्रीरघुनाथजी तो दीनोंपर दया करनेवाले हैं । सम्मुख ( शरण ) जानेपर तो बाघ भी नहीं खाता । आपको जो कुछ करना चाहिये था, वह सब आप कर चुके । आपने देवता, राक्षस तथा चर-अचर सभीको जीत लिया ॥ १ ॥
संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथेंपन जाइहि नृप कानन ॥
तासु भजनु कीजिअ तहँ भर्ता । जो कर्ता पालक संहर्ता ॥
हे दशमुख! संतजन ऐसी नीति कहते हैं कि चौथेपन ( बुढ़ापे ) में राजाको वनमें चला जाना चाहिये । हे स्वामी! वहाँ ( वनमें ) आप उनका भजन कीजिये जो सृष्टिके रचनेवाले, पालनेवाले और संहार करनेवाले हैं ॥ २ ॥
सोइ रघुबीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी । भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥
हे नाथ! आप विषयोंकी सारी ममता छोड़कर उन्हीं शरणागतपर प्रेम करनेवाले भगवान्का भजन कीजिये । जिनके लिये श्रेष्ठ मुनि साधन करते हैं और राजा राज्य छोड़कर वैरागी हो जाते हैं - ॥ ३ ॥
सोइ कोसलाधीस रघुराया । आयउ करन तोहि पर दाया ॥
जौं पिय मानहु मोर सिखावन । सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन ॥
वही कोसलाधीश श्रीरघुनाथजी आपपर दया करने आये हैं । हे प्रियतम! यदि आप मेरी सीख मान लेंगे, तो आपका अत्यन्त पवित्र और सुन्दर यश तीनों लोकोंमें फैल जायगा ॥४ ॥