श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 781–790

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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* * लङ्काकाण्ड ७७९

दो०- अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात ।

नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥७ ॥

ऐसा कहकर, नेत्रोंमें [ करुणाका ] जल भरकर और पतिके चरण पकड़कर, काँपते हुए शरीरसे मन्दोदरीने कहा— हे नाथ! श्रीरघुनाथजीका भजन कीजिये, जिससे मेरा सुहाग अचल हो जाय ॥७ ॥

तब रावन मयसुता उठाई । कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥

सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ॥

तब रावणने मन्दोदरीको उठाया और वह दुष्ट उससे अपनी प्रभुता कहने लगा- हे प्रिये! सुन,

तूने व्यर्थ ही भय मान रखा है । बता तो जगत्में मेरे समान योद्धा है कौन? ॥१ ॥

बरुन कुबेर पवन जम काला । भुजबल जितेउँ सकल दिगपाला ॥

देव दनुज नर सब बस मोरें । कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥

वरुण, कुबेर, पवन, यमराज आदि सभी दिक्पालोंको तथा कालको भी मैंने अपनी भुजाओंके बलसे जीत रखा है । देवता, दानव और मनुष्य सभी मेरे वशमें हैं । फिर तुझको यह भय किस कारण उत्पन्न हो गया? ॥२ ॥

नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई । सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥

मंदोदरीं हृदयँ अस जाना । काल बस्य उपजा अभिमाना ॥

मन्दोदरीने उसे बहुत तरहसे समझाकर कहा [किन्तु रावणने उसकी एक भी बात न सुनी ] और वह फिर सभामें जाकर बैठ गया । मन्दोदरीने हृदयमें ऐसा जान लिया कि कालके वश होनेसे पतिको अभिमान हो गया है ॥३ ॥

सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेहिं बूझा । करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा ॥

कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा । बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥

सभामें आकर उसने मन्त्रियोंसे पूछा कि शत्रुके साथ किस प्रकारसे युद्ध करना होगा? मन्त्री कहने लगे — हे राक्षसोंके नाथ! हे प्रभु! सुनिये, आप बार- बार क्या पूछते हैं? ॥४ ॥

कहहु कवन भय करिअ बिचारा । नर कपि भालु अहार हमारा ॥

कहिये तो [ ऐसा ] कौन-सा बड़ा भय है, जिसका विचार किया जाय? ( भयकी बात ही क्या है? ) मनुष्य और वानर-भालू तो हमारे भोजन [की सामग्री ] हैं ॥५ ॥

दो० – सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि ।

नीति बिरोध न करिअ प्रभु मंत्रिन्ह मति अति थोरि ॥ ८ ॥

पृष्ठ 782

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*:*७८० रामचरितमानस कानोंसे सबके वचन सुनकर [ रावणका पुत्र] प्रहस्त हाथ जोड़कर कहने लगा–हे प्रभु! नीतिके विरुद्ध कुछ भी नहीं करना चाहिये, मन्त्रियोंमें बहुत ही थोड़ी बुद्धि है ॥ ८ ॥

कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥

बारिधि नाघि एक कपि आवा । तासु चरित मन महुँ सबु गावा ॥

ये सभी मूर्ख ( खुशामदी ) मन्त्री ठकुरसुहाती ( मुँहदेखी ) कह रहे हैं । हे नाथ! इस प्रकारकी बातोंसे पूरा नहीं पड़ेगा । एक ही बंदर समुद्र लाँघकर आया था । उसका चरित्र सब लोग अब भी मन -ही - मन गाया करते हैं ( स्मरण किया करते हैं ) ॥ १ ॥

छुधा न रही तुम्हहि तब काहू । जारत नगरु कस न धरि खाहू ॥

सुनत नीक आगे दुख पावा । सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ॥

उस समय तुमलोगोंमेंसे किसीको भूख न थी? [ बंदर तो तुम्हारा भोजन ही हैं, फिर] नगर जलाते समय उसे पकड़कर क्यों नहीं खा लिया? इन मन्त्रियोंने स्वामी ( आप ) को ऐसी सम्मति सुनायी है जो सुननेमें अच्छी है पर जिससे आगे चलकर दुःख पाना होगा ॥ २ ॥

जेहिं बारीस बँधायउ हेला ।। उतरेउ सेन समेत सुबेला ॥

सो भनु मनुज खाब हम भाई । बचन कहहिं सब गाल फुलाई ॥

जिसने खेल-ही- खेलमें समुद्र बँधा लिया और जो सेनासहित सुबेल पर्वतपर आ उतरा । हे भाई! कहो वह मनुष्य है, जिसे कहते हो कि हम खा लेंगे? सब गाल फुला- फुलाकर ( पागलोंकी तरह ) वचन कह रहे हैं! ॥ ३ ॥

तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥

प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं । ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥

हे तात! मेरे वचनोंको बहुत आदरसे ( बड़े गौरसे ) सुनिये । मुझे मनमें कायर न समझ लीजियेगा । जगत्में ऐसे मनुष्य झुंड के झुंड ( बहुत अधिक ) हैं, जो प्यारी ( मुँहपर मीठी लगनेवाली ) बात ही सुनते और कहते हैं ॥ ४ ॥

बचन परम हित सुनत कठोरे । सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे ॥

प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देड़ करहु पुनि प्रीती ॥

हे प्रभो! सुननेमें कठोर परन्तु [ परिणाममें ] परम हितकारी वचन जो सुनते और कहते हैं, वे मनुष्य बहुत ही थोड़े हैं । नीति सुनिये, [ उसके अनुसार ] पहले दूत भेजिये, और [फिर ] सीताको देकर श्रीरामजीसे प्रीति [मेल ] कर लीजिये ॥५ ॥

दो० –-नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि ।

नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि॥ ९ ॥

पृष्ठ 783

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* * लङ्काकाण्ड ७८१ यदि वे स्त्री पाकर लौट जायँ, तब तो [ व्यर्थ ] झगड़ा न बढ़ाइये । नहीं तो ( यदि न फिरें तो) हे तात! सम्मुख युद्धभूमिमें उनसे हठपूर्वक ( डटकर ) मार-काट कीजिये॥९ ॥

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा । उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ॥

सुत सन कह दसकंठ रिसाई । असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई ॥

हे प्रभो! यदि आप मेरी यह सम्मति मानेंगे, तो जगत्में दोनों ही प्रकारसे आपका सुयश होगा । रावणने गुस्सेमें भरकर पुत्रसे कहा- अरे मूर्ख! तुझे ऐसी बुद्धि किसने सिखायी? ॥१ ॥

अबहीं ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई ॥

सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा । चला भवन कहि बचन कठोरा ॥

अभीसे हृदयमें सन्देह ( भय ) हो रहा है? हे पुत्र! तू तो बाँसकी जड़में घमोई हुआ ( तू मेरे वंशके अनुकूल या अनुरूप नहीं हुआ) । पिताकी अत्यन्त घोर और कठोर वाणी सुनकर प्रहस्त ये कड़े वचन कहता हुआ घरको चला गया ॥२ ॥

हित मत तोहि न लागत कैसें । काल बिबस कहुँ भेषज जैसें ॥

संध्या समय जानि दससीसा । भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥

हितकी सलाह आपको कैसे नहीं लगती ( आपपर कैसे असर नहीं करती ), जैसे मृत्युके वश हुए [ रोगी ] को दवा नहीं लगती । सन्ध्याका समय जानकर रावण अपनी बीसों भुजाओंको देखता हुआ महलको चला ॥३ ॥

लंका सिखर उपर आगारा । अति बिचित्र तहँ होइ अखारा ॥

बैठ जाइ तेहिं मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ॥

लंकाकी चोटीपर एक अत्यन्त विचित्र महल था । वहाँ नाच -गानका अखाड़ा जमता था । रावण

उस महलमें जाकर बैठ गया । किन्नर उसके गुणसमूहोंको गाने लगे ॥ ४ ॥

बाजहिं ताल पखाउज बीना । नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ॥

ताल ( करताल ), पखावज ( मृदंग ) और वीणा बज रहे हैं । नृत्यमें प्रवीण अप्सराएँ नाच रही हैं ॥५ ॥

दो० – सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास ।

परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥१० ॥

वह निरन्तर सैकड़ों इन्द्रोंके समान भोग-विलास करता रहता है । यद्यपि [ श्रीरामजी - सरीखा ] अत्यन्त प्रबल शत्रु सिरपर है, फिर भी उसको न तो चिन्ता है और न डर ही है ॥ १० ॥

पृष्ठ 784

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* *७८२ रामचरितमानस

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा । उतरे सेन सहित अति भीरा ॥

सिखर एक उतंग अति देखी । परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी ॥

यहाँ श्रीरघुवीर सुबेल पर्वतपर सेनाकी बड़ी भीड़ ( बड़े समूह ) के साथ उतरे । पर्वतका एक बहुत ऊँचा, परम रमणीय, समतल और विशेषरूपसे उज्ज्वल शिखर देखकर —॥१ ॥

तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए । लछिमन रचि निज हाथ डसाए ॥

ता पर रुचिर मृदुल मृगछाला । तेहि आसन आसीन कृपाला ॥

वहाँ लक्ष्मणजीने वृक्षोंके कोमल पत्ते और सुन्दर फूल अपने हाथोंसे सजाकर बिछा दिये । उसपर सुन्दर और कोमल मृगछाला बिछा दी । उसी आसनपर कृपालु श्रीरामजी विराजमान थे ॥२ ॥

प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा । बाम दहिन दिसि चाप निषंगा ॥

दुहुँ कर कमल सुधारत बाना । कह लंकेस मंत्र लगि काना ॥

प्रभु श्रीरामजी वानरराज सुग्रीवकी गोदमें अपना सिर रखे हैं । उनकी बायीं ओर धनुष तथा दाहिनी ओर तरकस [ रखा ] है । वे अपने दोनों कर - कमलोंसे बाण सुधार रहे हैं । विभीषणजी कानोंसे लगकर सलाह कर रहे हैं ॥ ३ ॥

बड़भागी अंगद हनुमाना । चरन कमल चापत बिधि नाना ॥

प्रभु पाछें लछिमन बीरासन । कटि निषंग कर बान सरासन ॥

परम भाग्यशाली अंगद और हनुमान् अनेकों प्रकारसे प्रभुके चरणकमलोंको दबा रहे हैं । लक्ष्मणजी कमरमें तरकस कसे और हाथोंमें धनुष-बाण लिये वीरासनसे प्रभुके पीछे सुशोभित हैं ॥४ ॥

दो० – एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन ।

धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥ ११ ( क ) ॥

इस प्रकार कृपा, रूप ( सौन्दर्य ) और गुणोंके धाम श्रीरामजी विराजमान हैं । वे मनुष्य धन्य हैं जो सदा इस ध्यानमें लौ लगाये रहते हैं ॥ ११ ( क ) ॥

पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मयंक ।

कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ॥। ११ ( ख ) ॥

पूर्व दिशाकी ओर देखकर प्रभु श्रीरामजीने चन्द्रमाको उदय हुआ देखा । तब वे सबसे कहने

लगे-चन्द्रमाको तो देखो । कैसा सिंहके समान निडर है! ॥ ११ ( ख ) ॥

पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी । परम प्रताप तेज बल रासी ॥

मत्त नाग तम कुंभ बिदारी । ससि केसरी गगन बन चारी ॥

पृष्ठ 785

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* * लङ्काकाण्ड ७८३ पूर्व दिशारूपी पर्वतकी गुफामें रहनेवाला, अत्यन्त प्रताप, तेज और बलकी राशि यह चन्द्रमारूपी सिंह अन्धकाररूपी मतवाले हाथीके मस्तकको विदीर्ण करके आकाशरूपी वनमें निर्भय विचर रहा है ॥१ ॥

बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥

कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई ॥

आकाशमें बिखरे हुए तारे मोतियोंके समान हैं, जो रात्रिरूपी सुन्दर स्त्रीके शृङ्गार हैं । प्रभुने कहा— भाइयो! चन्द्रमामें जो कालापन है वह क्या है? अपनी -अपनी बुद्धिके अनुसार कहो ॥२ ॥

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि महुँ प्रगट भूमि के झाँई ॥

मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महँ परी स्यामता सोई ॥

सुग्रीवने कहा— हे रघुनाथजी! सुनिये । चन्द्रमामें पृथ्वीकी छाया दिखायी दे रही है । किसीने

कहा— चन्द्रमाको राहुने मारा था । वही [ चोटका ] काला दाग हृदयपर पड़ा हुआ है ॥३ ॥

कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा । सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ॥

छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ॥

कोई कहता है — जब ब्रह्माने [ कामदेवकी स्त्री ] रतिका मुख बनाया, तब उसने चन्द्रमाका सार भाग निकाल लिया [ जिससे रतिका मुख तो परम सुन्दर बन गया, परन्तु चन्द्रमाके हृदयमें छेद हो गया] । वही छेद चन्द्रमाके हृदयमें वर्तमान है, जिसकी राहसे आकाशकी काली छाया उसमें दिखायी पड़ती है ॥४ ॥

प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥

बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत बिरहवंत नर नारी ॥

प्रभु श्रीरामजीने कहा- विष चन्द्रमाका बहुत प्यारा भाई है । इसीसे उसने विषको अपने हृदयमें स्थान दे रखा है । विषयुक्त अपने किरणसमूहको फैलाकर वह वियोगी नर- नारियोंको जलाता रहता है ॥ ५ ॥

दो० –- कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास ।

तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास ॥ १२ ( क ) ॥

हनुमान्जीने कहा— हे प्रभो! सुनिये, चन्द्रमा आपका प्रिय दास है । आपकी सुन्दर श्याम मूर्ति चन्द्रमाके हृदयमें बसती है, वही श्यामताकी झलक चन्द्रमामें है ॥ १२ ( क ) ॥ नवाह्नपारायण, सातवाँ विश्राम

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान ।

दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥ १२ ( ख ) ॥

पृष्ठ 786

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* *७८४ रामचरितमानस पवनपुत्र हनुमान्जीके वचन सुनकर सुजान श्रीरामजी हँसे । फिर दक्षिणकी ओर देखकर कृपानिधान प्रभु बोले— ॥ १२ ( ख ) ॥

देखु बिभीषन दच्छिन आसा । घन घमंड दामिनी बिलासा ॥

मधुर मधुर गरजइ घन घोरा । होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा ॥

हे विभीषण! दक्षिण दिशाकी ओर देखो, बादल कैसा घुमड़ रहा है और बिजली चमक रही है । भयानक बादल मीठे - मीठे ( हलके -हलके ) स्वरसे गरज रहा है । कहीं कठोर ओलोंकी वर्षा न हो! ॥१ ॥

कहत बिभीषन सुनहु कृपाला । होइ न तड़ित न बारिद माला ॥

लंका सिखर उपर आगारा । तहँ दसकंधर देख अखारा ॥

विभीषण बोले — हे कृपालु! सुनिये, यह न तो बिजली है, न बादलोंकी घटा । लंकाकी चोटीपर एक महल है । दशग्रीव रावण वहाँ [ नाच- गानका ] अखाड़ा देख रहा है ॥२ ॥

छत्र मेघडंबर सिर धारी । सोइ जनु जलद घटा अति कारी ॥

मंदोदरी श्रवन ताटंका । सोइ प्रभु जनु दामिनी दमका ॥ रावणने सिरपर मेघडंबर ( बादलोंके डंबर-जैसा विशाल और काला ) छत्र धारण कर रखा है । वही मानो बादलोंकी अत्यन्त काली घटा है । मन्दोदरीके कानोंमें जो कर्णफूल हिल रहे हैं, हे प्रभो! वही मानो बिजली चमक रही है ॥३ ॥

बाजहिं ताल मृदंग अनूपा । सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ॥

प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना । चाप चढ़ाइ बान संधाना ॥

हे देवताओंके सम्राट्! सुनिये, अनुपम ताल और मृदंग बज रहे हैं । वही मधुर [ गर्जन ] ध्वनि है । रावणका अभिमान समझकर प्रभु मुसकराये । उन्होंने धनुष चढ़ाकर उसपर बाणका सन्धान किया; ॥ ४ ॥

दो० - छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान ।

सब कें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥ १३ ( क ) ॥

और एक ही बाणसे [ रावणके ] छत्र- मुकुट और [ मन्दोदरीके ] कर्णफूल काट गिराये । सबके देखते - देखते वे जमीनपर आ पड़े, पर इसका भेद ( कारण ) किसीने नहीं जाना ॥१३ ( क ) ॥

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग ।

रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ॥ १३ ( ख ) ॥

ऐसा चमत्कार करके श्रीरामजीका बाण [ वापस ] आकर [फिर ] तरकसमें जा घुसा । यह महान् रस- भंग ( रंगमें भंग ) देखकर रावणकी सारी सभा भयभीत हो गयी ॥ १३ (ख) ॥

पृष्ठ 787

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* * लङ्काकाण्ड ७८५

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा । अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥

सोचहिं सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयंकर भारी ॥

न भूकम्प हुआ, न बहुत जोरकी हवा ( आँधी ) चली T। न कोई अस्त्र- शस्त्र ही नेत्रोंसे देखे । [ फिर ये छत्र, मुकुट और कर्णफूल कैसे कटकर गिर पड़े? ] सभी अपने -अपने हृदयमें सोच रहे हैं कि यह बड़ा भयङ्कर अपशकुन हुआ! ॥ १ ॥

दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥

सिरउ गिरे संतत सुभ जाही । मुकुट परे कस असगुन ताही ॥

सभाको भयभीत देखकर रावणने हँसकर युक्ति रचकर ये वचन कहे – सिरोंका गिरना भी जिसके लिये निरन्तर शुभ होता रहा है, उसके लिये मुकुटका गिरना अपशकुन कैसा? ॥२ ॥

सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन सकल सिर नाई ॥

जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥मंदोदरी सोच उर बसेऊ ॥

अपने -अपने घर जाकर सो रहो [डरनेकी कोई बात नहीं है ] तब सब लोग सिर नवाकर घर गये । जबसे कर्णफूल पृथ्वीपर गिरा, तबसे मन्दोदरीके हृदयमें सोच बस गया ॥३ ॥

सजल नयन कह जुग कर जोरी । सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ॥

कंत राम बिरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥

नेत्रोंमें जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [ रावणसे ] कहने लगी- हे प्राणनाथ! मेरी विनती सुनिये । हे प्रियतम! श्रीरामसे विरोध छोड़ दीजिये । उन्हें मनुष्य जानकर मनमें हठ न पकड़े रहिये ॥४ ॥

दो० - बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु ।

लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥ १४ ॥

मेरे इन वचनोंपर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुलके शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं— ( यह सारा विश्व उन्हींका रूप है ) वेद जिनके अङ्ग अङ्गमें लोकोंकी कल्पना करते हैं ॥१४ ॥

पद पाताल सीस अज धामा । अपर लोक अँग अँग बिश्रामा ॥

भृकुटि बिलास भयंकर काला । नयन दिवाकर कच घन माला ॥

पाताल [जिन विश्वरूप भगवान्‌का] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य ( बीचके सब ) लोकोंका विश्राम ( स्थिति ) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गोंपर है । भयङ्कर काल जिनका

भृकुटिसंचालन ( भौंहोंका चलना ) है । सूर्य नेत्र है, बादलोंका समूह बाल है ॥१ ॥

पृष्ठ 788

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*:*७८६ रामचरितमानस

जासु घ्रान अस्विनीकुमारा । निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥

श्रवन दिसा दस बेद बखानी । मारुत स्वास निगम निज बानी ॥

अश्विनीकुमार जिनकी नासिका हैं, रात और दिन जिनके अपार निमेष ( पलक मारना और खोलना ) हैं । दसों दिशाएँ कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं । वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणी है ॥ २ ॥

अधर लोभ जम दसन कराला । माया हास बाहु दिगपाला ॥

आनन अनल अंबुपति जीहा । उतपति पालन प्रलय समीहा ॥

लोभ जिनका अधर ( होठ ) है, यमराज भयानक दाँत है । माया हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं । अग्नि मुख है, वरुण जीभ है । उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा ( क्रिया ) है ॥ ३ ॥

रोम राजि अष्टादस भारा । अस्थि सैल सरिता नस जारा ॥

उदर उदधि अधगो जातना । जगमय प्रभु का बहु कलपना ॥

अठारह प्रकारकी असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसोंका जाल हैं, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचेकी इन्द्रियाँ हैं । इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना ( ऊहापोह ) क्या की जाय? ॥४ ॥

दो० - अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान ।

मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान ॥ १५ ( क ) ॥

शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन हैं और महान् ( विष्णु ) ही चित्त हैं । उन्हीं चराचररूप भगवान् श्रीरामजीने मनुष्यरूपमें निवास किया है ॥ १५ ( क ) ॥

अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बरु बिहाइ ।

प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ ॥ १५ ( ख ) ॥

हे प्राणपति! सुनिये, ऐसा विचारकर प्रभुसे वैर छोड़कर श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय ॥ १५ ( ख ) ॥

बिहँसा नारि बचन सुनि काना । अहो मोह महिमा बलवाना ॥

नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं । अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥

पत्नीके वचन कानोंसे सुनकर रावण खूब हँसा [ और बोला– ] अहो! मोह ( अज्ञान ) की महिमा बड़ी बलवान् है! स्त्रीका स्वभाव सब सत्य ही कहते हैं कि उसके हृदयमें आठ अवगुण सदा रहते हैं - ॥ १ ॥

साहस अनृत चपलता माया । भय अबिबेक असौच अदाया ॥

रिपु कर रूप सकल तैं गावा । अति बिसाल भय मोहि सुनावा ॥

पृष्ठ 789

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* * लङ्काकाण्ड ७८७ साहस, झूठ, चञ्चलता, माया ( छल ), भय ( डरपोकपन ), अविवेक ( मूर्खता ), अपवित्रता और निर्दयता । तूने शत्रुका समग्र ( विराट्) रूप गाया और मुझे उसका बड़ा भारी भय सुनाया ॥२ ॥

सो सब प्रिया सहज बस मोरें । समुझि परा प्रसाद अब तोरें ॥

जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई । एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई ॥

हे प्रिये! वह सब ( यह चराचर विश्व तो ) स्वभावसे ही मेरे वशमें है । तेरी कृपासे मुझे यह अब समझ पड़ा । हे प्रिये! तेरी चतुराई मैं जान गया । तू इस प्रकार ( इसी बहाने ) मेरी प्रभुताका बखान कर रही है ॥ ३ ॥

तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि । समुझत सुखद सुनत भय मोचनि ॥

मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ । पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ ॥

हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ ( रहस्यभरी ) हैं, समझनेपर सुख देनेवाली और सुननेसे भय छुड़ानेवाली हैं । मन्दोदरीने मनमें ऐसा निश्चय कर लिया कि पतिको कालवश मतिभ्रम हो गया है ॥ ४ ॥

दो० – एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध ।

सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध ॥ १६ ( क ) ॥

इस प्रकार [ अज्ञानवश ] बहुत-से विनोद करते हुए रावणको सबेरा हो गया । तब स्वभावसे ही निडर और घमण्डमें अंधा लंकापति सभामें गया ॥ १६ ( क ) ॥

सो० – फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद ।

मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥ १६ ( ख ) ॥

यद्यपि बादल अमृत -सा जल बरसाते हैं, तो भी बेत फूलता- फलता नहीं । इसी प्रकार चाहे ब्रह्माके समान भी ज्ञानी गुरु मिलें, तो भी मूर्खके हृदयमें चेत ( ज्ञान ) नहीं होता ॥ १६ ( ख) ॥

इहाँ प्रात जागे रघुराई । पूछा मत सब सचिव बोलाई ॥

कहहु बेग का करिअ उपाई । जामवंत कह पद सिरु नाई ॥

यहाँ ( सुबेल पर्वतपर ) प्रातः काल श्रीरघुनाथजी जागे और उन्होंने सब मन्त्रियोंको बुलाकर सलाह पूछी कि शीघ्र बताइये, अब क्या उपाय करना चाहिये? जाम्बवान्ने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाकर कहा-॥१ ॥

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी । बुधि बल तेज धर्म गुन रासी ॥

मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा । दूत पठाइअ बालिकुमारा ॥

हे सर्वज्ञ ( सब कुछ जाननेवाले )! हे सबके हृदयमें बसनेवाले ( अन्तर्यामी )! हे बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणोंकी राशि! सुनिये! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार अंगदको दूत बनाकर भेजा जाय! ॥२ ॥

पृष्ठ 790

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* *७८८ रामचरितमानस

नीक मंत्र सब के मन माना । अंगद सन कह कृपानिधाना ॥

बालितनय बुधि बल गुन धामा । लंका जाहु तात मम कामा ॥

यह अच्छी सलाह सबके मनमें जँच गयी । कृपाके निधान श्रीरामजीने अंगदसे कहा - हे बल, बुद्धि और गुणोंके धाम बालिपुत्र! हे तात! तुम मेरे कामके लिये लङ्का जाओ ॥३ ॥

बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ । परम चतुर मैं जानत अहऊँ ॥

काजु हमार तासु हित होई । रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥

तुमको बहुत समझाकर क्या कहूँ! मैं जानता हूँ, तुम परम चतुर हो । शत्रुसे वही बातचीत करना जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो ॥४ ॥

सो० - प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ ।

सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु ॥ १७ ( क) ॥

प्रभुकी आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंकी वन्दना करके अंगदजी उठे [ और बोले– ] हे भगवान् श्रीरामजी! आप जिसपर कृपा करें, वही गुणोंका समुद्र हो जाता है ॥ १७ ( क ) ॥

स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ ।

अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ ॥ १७ ( ख ) ॥

स्वामीके सब कार्य अपने- आप सिद्ध हैं; यह तो प्रभुने मुझको आदर दिया है [ जो मुझे अपने कार्यपर भेज रहे हैं ] । ऐसा विचारकर युवराज अंगदका हृदय हर्षित और शरीर पुलकित हो गया ॥ १७ ( ख ) ॥

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई । अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई ॥

प्रभु प्रताप उर सहज असंका । रन बाँकुरा बालिसुत बंका ॥

चरणोंकी वन्दना करके और भगवान्‌की प्रभुता हृदयमें धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले । प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण किये हुए रणबांकुरे वीर बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं ॥ १ ॥

पुर पैठत रावन कर बेटा । खेलत रहा सो होइ गै भेटा ॥

बातहिं बात करष बढ़ि आई । जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई ॥

लङ्कामें प्रवेश करते ही रावणके पुत्रसे भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था । बातों - ही - बातोंमें दोनोंमें झगड़ा बढ़ गया । [ क्योंकि] दोनों ही अतुलनीय बलवान् थे और फिर दोनोंकी युवावस्था थी ॥२ ॥

तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई । गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई ॥

निसिचर निकर देखि भट भारी । जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी ॥