श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 81–90
श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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* बालकाण्ड * ७९ वृषकेतु शिवजीने सतीको चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देनेके लिये सुन्दर कथाएँ कहीं । इस प्रकार मार्गमें विविध प्रकारके इतिहासोंको कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे ॥३ ॥
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन । बैठे बटतर करि कमलासन ॥
संकर सहज सरूपु सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ॥
वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञाको याद करके बड़के पेड़के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये ।
शिवजीने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला । उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी ॥४ ॥
दो० – -सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं ।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं ॥ ५८ ॥
तब सतीजी कैलासपर रहने लगीं । उनके मनमें बड़ा दुःख था । इस रहस्यको कोई कुछ भी नहीं जानता था । उनका एक-एक दिन युगके समान बीत रहा था ॥५८ ॥
नित नव सोचु सती उर भारा । कब जैहउँ दुख सागर पारा ॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना । पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना ॥
सतीजीके हृदयमें नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख- समुद्रके पार कब जाऊँगी । मैंने जो श्रीरघुनाथजीका अपमान किया और फिर पतिके वचनोंको झूठ जाना–॥१ ॥
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा । जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा ॥
अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही । संकर बिमुख जिआवसि मोही ॥
उसका फल विधाताने मुझको दिया, जो उचित था वही किया; परन्तु हे विधाता! अब तुझे यह उचित नहीं है जो शङ्करसे विमुख होनेपर भी मुझे जिला रहा है ॥२ ॥
कहि न जाइ कछु हृदय गलानी । मन महुँ रामहि सुमिर सयानी ॥
जौं प्रभु दीनदयालु कहावा । आरति हरन बेद जसु गावा ॥
सतीजीके हृदयकी ग्लानि कुछ कही नहीं जाती । बुद्धिमती सतीजीने मनमें श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण किया और कहा - हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदोंने आपका यह यश गाया है कि आप दुःखको हरनेवाले हैं, ॥ ३ ॥
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी ॥
जौं मोरें सिव चरन सनेहू । मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू ॥
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय । यदि मेरा शिवजीके चरणोंमें प्रेम है और मेरा यह [प्रेमका ] व्रत मन, वचन और कर्म ( आचरण ) से सत्य है, ॥ ४ ॥
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* * ८० रामचरितमानस
दो० –- तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ ।
होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ ॥ ५ ९ ॥
तो हे सर्वदर्शी प्रभो! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [ पति-परित्यागरूपी ] असह्य विपत्ति दूर हो जाय ॥ ५ ९ ॥
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी । अकथनीय दारुन दुखु भारी ॥
बीतें संबत सहस सतासी । तजी समाधि संभु अबिनासी ॥
दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दु:खित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता । सत्तासी हजार वर्ष बीत जानेपर अविनाशी शिवजीने समाधि खोली ॥१ ॥
राम नाम सिव सुमिरन लागे । जानेउ सतीं जगतपति जागे ॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा । सनमुख संकर आसनु दीन्हा ॥
शिवजी रामनामका स्मरण करने लगे, तब सतीजीने जाना कि अब जगत्के स्वामी ( शिवजी ) जागे I। उन्होंने जाकर शिवजीके चरणोंमें प्रणाम किया । शिवजीने उनको बैठनेके लिये सामने आसन दिया ॥२ ॥
लगे कहन हरिकथा रसाला । दच्छ प्रजेस भए तेहि काला ॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक । दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक ॥
शिवजी भगवान् हरिकी रसमयी कथाएँ कहने लगे । उसी समय दक्ष प्रजापति हुए । ब्रह्माजीने सब प्रकारसे योग्य देख-समझकर दक्षको प्रजापतियोंका नायक बना दिया ॥ ३ ॥
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा । अति अभिमानु हृदयँ तब आवा ॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं । प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं ॥
जब दक्षने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदयमें अत्यन्त अभिमान आ गया । जगत्में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो ॥ ४ ॥
दो० –- दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग ।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग ॥ ६० ॥
दक्षने सब मुनियोंको बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे । जो देवता यज्ञका भाग पाते हैं, दक्षने उन सबको आदरसहित निमन्त्रित किया ॥ ६० ॥
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा । बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा ॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई । चले सकल सुर जान बनाई ॥
[ दक्षका निमन्त्रण पाकर ] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी - अपनी स्त्रियोंसहित चले । विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीको छोड़कर सभी देवता अपना- अपना विमान सजाकर चले ॥ १ ॥
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* बालकाण्ड * ८१
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना । जात चले सुंदर बिधि नाना ॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना । सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना ॥
सतीजीने देखा अनेकों प्रकारके सुन्दर विमान आकाशमें चले जा रहे हैं । देव - सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियोंका ध्यान छूट जाता है ॥२ ॥
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी । पिता जग्य सुनि कछु हरषानी ॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं । कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं ॥
सतीजीने [ विमानोंमें देवताओंके जानेका कारण] पूछा, तब शिवजीने सब बातें बतलायीं । पिताके यज्ञकी बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिताके घर जाकर रहूँ॥३ ॥
पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी । कहइ न निज अपराध बिचारी ॥
बोली सती मनोहर बानी । भय संकोच प्रेम रस सानी ॥
क्योंकि उनके हृदयमें पतिद्वारा त्यागी जानेका बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं । आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरसमें सनी हुई मनोहर वाणीसे बोलीं- ॥४ ॥
दो० – पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ ।
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ ॥ ६१ ॥
हे प्रभो! मेरे पिताके घर बहुत बड़ा उत्सव है । यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ ॥ ६१ ॥
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा । यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं । हमरें बयर तुम्हउ बिसराई ॥
शिवजीने कहा--तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मनको भी पसंद आयी । पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है । दक्षने अपनी सब लड़कियोंको बुलाया है; किन्तु हमारे वैरके कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया ॥ १ ॥
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना । तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना ॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी । रहइ न सीलु सनेहु न कानी ॥
एक बार ब्रह्माकी सभामें हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसीसे वे अब भी हमारा अपमान करते हैं । हे भवानी! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील- स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी ॥ २ ॥
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* * ८२ रामचरितमानस
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा ॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई ॥
यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरुके घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जानेसे कल्याण नहीं होता ॥ ३ ॥
भाँति अनेक संभु समुझावा । भावी बस न ग्यानु उर आवा ॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ । नहिं भलि बात हमारे भाएँ ॥
शिवजीने बहुत प्रकारसे समझाया, पर होनहारवश सतीके हृदयमें बोध नहीं हुआ । फिर शिवजीने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझमें अच्छी बात न होगी ॥४ ॥
दो० – कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि ।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि ॥ ६२ ॥
शिवजीने बहुत प्रकारसे कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब त्रिपुरारि महादेवजीने अपने मुख्य गणोंको साथ देकर उनको विदा कर दिया ॥६२ ॥
पिता भवन जब गईं भवानी । दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी ॥
सादर भलेहिं मिली एक माता । भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता ॥
भवानी जब पिता ( दक्ष ) के घर पहुँचीं, तब दक्षके डरके मारे किसीने उनकी आवभगत नहीं
की, केवल एक माता भले ही आदरसे मिली । बहिनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं ॥१ ॥
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता । सतिहि बिलोकि जरे सब गाता ॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा । कतहुँ न दीख संभु कर भागा ॥
दक्षने तो उनकी कुछ कुशलतक नहीं पूछी, सतीजीको देखकर उलटे उनके सारे अङ्ग जल उठे । तब सतीने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजीका भाग दिखायी नहीं दिया ॥२ ॥
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ । प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा । जस यह भयउ महा परितापा ॥
तब शिवजीने जो कहा था वह उनकी समझमें आया । स्वामीका अपमान समझकर सतीका हृदय जल उठा । पिछला ( पतिपरित्यागका) दुःख उनके हृदयमें उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय ( पति-अपमानके कारण ) हुआ ॥३ ॥
जद्यपि जग दारुन दुख नाना । सब तें कठिन जाति अवमाना ॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा । बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा ॥
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* बालकाण्ड * ८३ यद्यपि जगत्में अनेक प्रकारके दारुण दुःख हैं, तथापि जाति-अपमान सबसे बढ़कर कठिन है । यह समझकर सतीजीको बड़ा क्रोध हो आया । माताने उन्हें बहुत प्रकारसे समझाया- बुझाया ॥ ४ ॥
दो० – सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध ।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध ॥ ६३ ॥
परन्तु उनसे शिवजीका अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदयमें कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ । तब वे सारी सभाको हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं- ॥६३ ॥
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा । कही सुनी जिन्ह संकर निंदा ॥
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ । भली भाँति पछिताब पिताहूँ ॥
हे सभासदो और सब मुनीश्वरो! सुनो । जिन लोगोंने यहाँ शिवजीकी निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भलीभाँति पछतायँगे ॥१ ॥
संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा ॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई ॥
जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान्की निन्दा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस ( निन्दा करनेवाले ) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर
जगदातमावहाँसे भाग जाय ॥२ महेसु॥ पुरारी । जगत जनक सब के हितकारी ॥
पिता मंदमति निंदत तेही । दच्छ सुक्र संभव यह देही ॥
त्रिपुर दैत्यको मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं । मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है; और मेरा यह शरीर दक्षहीके वीर्यसे उत्पन्न है ॥३ ॥
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू । उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा ॥
इसलिये चन्द्रमाको ललाटपर धारण करनेवाले वृषकेतु शिवजीको हृदयमें धारण करके मैं इस शरीरको तुरंत ही त्याग दूँगी । ऐसा कहकर सतीजीने योगाग्निमें अपना शरीर भस्म कर डाला । सारी यज्ञशालामें हाहाकार मच गया ॥४ ॥
दो० - सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस ।
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस ॥ ६४ ॥
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* * ८४ रामचरितमानस सतीका मरण सुनकर शिवजीके गण यज्ञ विध्वंस करने लगे । यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजीने उसकी रक्षा की ॥ ६४ ॥
समाचार सब संकर पाए । बीरभद्रु करि कोप पठाए ॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा । सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा ॥
ये सब समाचार शिवजीको मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्रको भेजा । उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओंको यथोचित फल ( दण्ड ) दिया ॥१ ॥
भै जगबिदित दच्छ गति सोई । जसि कछु संभु बिमुख कै होई ॥
यह इतिहास सकल जग जानी । ताते मैं संछेप बखानी ॥
दक्षकी जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई जो शिवद्रोहीकी हुआ करती है । यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संक्षेपमें वर्णन किया ॥२ ॥
सतीं मरत हरि सन बरु मागा । जनम जनम सिव पद अनुरागा ॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई ॥
सतीने मरते समय भगवान् हरिसे यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्ममें शिवजीके चरणोंमें अनुराग रहे । इसी कारण उन्होंने हिमाचलके घर जाकर पार्वतीके शरीरसे जन्म लिया ॥३ ॥
जब तें उमा सैल गृह जाईं । सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं ॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्हे ॥
जबसे उमाजी हिमाचलके घर जन्मीं तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गयीं । मुनियोंने जहाँ- तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचलने उनको उचित स्थान दिये ॥ ४ ॥
दो० –सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति ।
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति ॥ ६५ ॥
उस सुन्दर पर्वतपर बहुत प्रकारके सब नये- नये वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त हो गये और वहाँ बहुत तरहकी मणियोंकी खानें प्रकट हो गयीं ॥६५ ॥
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं । खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं ॥
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा । गिरि पर सकल करहिं अनुरागा ॥
सारी नदियोंमें पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते हैं । सब जीवोंने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वतपर सभी परस्पर प्रेम करते हैं ॥१ ॥
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ । जिमि जनु रामभगति के पाएँ ।
नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥
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* बालकाण्ड * ८५ पार्वतीजीके घर आ जानेसे पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्तिको पाकर भक्त शोभायमान होता है । उस ( पर्वतराज ) के घर नित्य नये -नये मङ्गलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं ॥ २ ॥
नारद समाचार सब पाए । कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए ॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा । पद पखारि बर आसनु दीन्हा ॥
जब नारदजीने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुकहीसे हिमाचलके घर पधारे । पर्वतराजने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया ॥३ ॥
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा । चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा ॥
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना । सुता बोलि मेली मुनि चरना ॥
फिर अपनी स्त्रीसहित मुनिके चरणोंमें सिर नवाया और उनके चरणोदकको सारे घरमें छिड़काया । हिमाचलने अपने सौभाग्यका बहुत बखान किया और पुत्रीको बुलाकर मुनिके चरणोंपर डाल दिया ॥ ४ ॥
दो० –- त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि ।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि ॥ ६६ ॥
[ और कहा— ] हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है । अतः आप हृदयमें विचारकर कन्याके दोष-गुण कहिये ॥ ६६ ॥
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी । सुता तुम्हारि सकल गुन खानी ॥
सुंदर सहज सुसील सयानी । नाम उमा अंबिका भवानी ॥
नारद मुनिने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणीसे कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणोंकी खान है । यह स्वभावसे ही सुन्दर, सुशील और समझदार है । उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं ॥१ ॥
सब लच्छन संपन्न कुमारी । होइहि संतत पियहि पिआरी ॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता । एहि तें जसु पैहहिं पितु माता ॥
कन्या सब सुलक्षणोंसे सम्पन्न है, यह अपने पतिको सदा प्यारी होगी । इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे ॥ २ ॥
होइहि पूज्य सकल जग माहीं । एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं ॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा । त्रिय चढ़िहहिं पतिव्रत असिधारा ॥
यह सारे जगत्में पूज्य होगी और इसकी सेवा करनेसे कुछ भी दुर्लभ न होगा । संसारमें स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रतरूपी तलवारकी धारपर चढ़ जायँगी ॥ ३ ॥
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी । सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी ॥
अगुन अमान मातु पितु हीना । उदासीन सब संसय छीना ॥
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* * ८६ रामचरितमानस हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है । अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो । गुणहीन, मानहीन, माता- पिता-विहीन, उदासीन, संशयहीन ( लापरवाह ),॥ ४ ॥
दो० –जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष ।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख ॥ ६७ ॥
योगी, जटाधारी, निष्कामहृदय, नंगा और अमङ्गल वेषवाला, ऐसा पति इसको मिलेगा । इसके हाथमें ऐसी ही रेखा पड़ी है ॥६७ ॥
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी । दुख दंपतिहि उमा हरषानी ॥
नारदहूँ यह भेदु न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना ॥
नारद मुनिकी वाणी सुनकर और उसको हृदयमें सत्य जानकर पति-पत्नी ( हिमवान् और मैना ) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं । नारदजीने भी इस रहस्यको नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक-सी होनेपर भी भीतरी समझ भिन्न -भिन्न थी ॥१ ॥
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना । पुलक सरीर भरे जल नैना ॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा । उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा ॥
सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभीके शरीर पुलकित थे और सभीके नेत्रोंमें जल भरा था । देवर्षिके वचन असत्य नहीं हो सकते, [ यह विचारकर ] पार्वतीने उन वचनोंको हृदयमें धारण कर लिया ॥ २ ॥
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू ॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई । सखी उछँग बैठी पुनि जाई ॥
उन्हें शिवजीके चरणकमलोंमें स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मनमें यह सन्देह हुआ कि उनका मिलना कठिन है । अवसर ठीक न जानकर उमाने अपने प्रेमको छिपा लिया और फिर वे सखीकी गोदमें जाकर बैठ गयीं ॥ ३ ॥
झूठ न होइ देवरिषि बानी I। सोचहिं दंपति सखीं सयानी ॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ । कहहु नाथ का करिअ उपाऊ ॥
देवर्षिकी वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं । फिर हृदयमें धीरज धरकर पर्वतराजने कहा- हे नाथ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय? ॥४ ॥
दो० – कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार ।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार ॥ ६८ ॥
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* बालकाण्ड * ८७ मुनीश्वरने कहा— हे हिमवान्! सुनो, विधाताने ललाटपर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते ॥ ६८ ॥
तदपि एक मैं कहउँ उपाई । होड़ करै जौं दैउ सहाई ॥
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं । मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं ॥
तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ । यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है । उमाको वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है ॥१ ॥
जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने ॥
जौं बिबाहु संकर सन होई । दोषउ गुन सम कह सबु कोई ॥
परन्तु मैंने वरके जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमानसे वे सभी शिवजीमें हैं । यदि शिवजीके साथ विवाह हो जाय तो दोषोंको भी सब लोग गुणोंके समान ही कहेंगे ॥ २ ॥
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं । बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं ॥
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं । तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं ॥
जैसे विष्णुभगवान् शेषनागकी शय्यापर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते । सूर्य और अग्निदेव अच्छे - बुरे सभी रसोंका भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता ॥३ ॥
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई । सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई ॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं । रबि पावक सुरसरि की नाईं ॥
गङ्गाजीमें शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता । सूर्य, अग्नि और गङ्गाजीकी भाँति समर्थको कुछ दोष नहीं लगता ॥४ ॥
दो० – जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान ।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान ॥ ६ ९ ॥
यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञानके अभिमानसे इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्पभरके लिये नरकमें पड़ते हैं । भला, कहीं जीव भी ईश्वरके समान ( सर्वथा स्वतन्त्र ) हो सकता है? ॥६ ९ ॥
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना । कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना ॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें । ईस अनीसहि अंतरु तैसें ॥
गङ्गाजलसे भी बनायी हुई मदिराको जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते । पर वही गङ्गाजीमें मिल जानेपर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीवमें भी वैसा ही भेद है ॥१ ॥
संभु सहज समरथ भगवाना । एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना ॥
दुराराध्य पै अहहिं महेसू ॥ आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥
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* * ८८ रामचरितमानस शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं । इसलिये इस विवाहमें सब प्रकार कल्याण है । परन्तु महादेवजीकी आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश ( तप ) करनेसे वे बहुत जल्द सन्तुष्ट हो जाते हैं ॥ २ ॥
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी ॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं ॥
यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहारको मिटा सकते हैं । यद्यपि संसारमें वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिवजीको छोड़कर दूसरा वर नहीं है ॥ ३ ॥
बर दायक प्रनतारति भंजन । कृपासिंधु सेवक मन रंजन ॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें । लहिअ न कोटि जोग जप साधें ॥
शिवजी वर देनेवाले, शरणागतोंके दुःखोंका नाश करनेवाले, कृपाके समुद्र और सेवकोंके मनको प्रसन्न करनेवाले हैं । शिवजीकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करनेपर भी वाञ्छित फल नहीं मिलता ॥ ४ ॥
दो० - अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस ।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस ॥ ७० ॥
ऐसा कहकर भगवान्का स्मरण करके नारदजीने पार्वतीको आशीर्वाद दिया । [ और कहा कि— ] हे पर्वतराज! तुम सन्देहका त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा ॥७० ॥
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ । आगिल चरित सुनहु जस भयऊ ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना । नाथ न मैं समुझे मुनि बैना ॥
यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोकको चले गये । अब आगे जो चरित्र हुआ उसे सुनो । पतिको एकान्तमें पाकर मैनाने कहा-हे नाथ! मैंने मुनिके वचनोंका अर्थ नहीं समझा ॥१ ॥
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा । करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा ॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी । कंत उमा मम प्रानपिआरी ॥
जो हमारी कन्याके अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये । नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वरके साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन्! पार्वती मुझको प्राणोंके समान प्यारी है ॥२ ॥
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू । गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू ॥
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू । जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू ॥
यदि पार्वतीके योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभावसे ही जड ( मूर्ख ) होते हैं । हे स्वामी! इस बातको विचारकर ही विवाह कीजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदयमें सन्ताप न हो ॥३ ॥