श्रीरामचरितमानस — पृष्ठ 91–100

श्रीरामचरितमानस · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 91–100

पृष्ठ 91

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 91 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * ८९

अस कहि परी चरन धरि सीसा । बोले सहित सनेह गिरीसा ॥

बरु पावक प्रगटै ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं ॥

इस प्रकार कहकर मैना पतिके चरणोंपर मस्तक रखकर गिर पड़ीं । तब हिमवान्ने प्रेमसे कहा— चाहे चन्द्रमामें अग्नि प्रकट हो जाय, पर नारदजीके वचन झूठे नहीं हो सकते ॥ ४ ॥

दो० –प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान ।

पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान ॥ ७१ ॥

हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान्‌का स्मरण करो । जिन्होंने पार्वतीको रचा है, वे ही कल्याण करेंगे ॥ ७१ ॥

अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू । तौ अस जाइ सिखावनु देहू॥

करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू । आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥

अब यदि तुम्हें कन्यापर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिससे शिवजी मिल जायँ । दूसरे उपायसे यह क्लेश नहीं मिटेगा ॥१ ॥

नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू ॥

अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका । सबहि भाँति संकरु अकलंका ॥

नारदजीके वचन रहस्यसे युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुन्दर गुणोंके भण्डार हैं । यह विचारकर तुम [ मिथ्या ] सन्देहको छोड़ दो । शिवजी सभी तरहसे निष्कलङ्क हैं ॥ २ ॥

सुनि पति बचन हरषि मन माहीं । गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं ॥

उमहि बिलोकि नयन भरे बारी । सहित सनेह गोद बैठारी ॥

पतिके वचन सुन मनमें प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वतीके पास गयीं । पार्वतीको देखकर

उनकी आँखोंमें आँसू भर आये । उसे स्नेहके साथ गोदमें बैठा लिया ॥ ३ ॥

बारहिं बार लेति उर लाई । गदगद कंठ न कछु कहि जाई ॥

जगत मातु सर्बग्य भवानी । मातु सुखद बोलीं मृदु बानी ॥

फिर बार- बार उसे हृदयसे लगाने लगीं । प्रेमसे मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता । जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं । [ माताके मनकी दशाको जानकर ] वे माताको सुख देनेवाली कोमल वाणीसे बोलीं– ॥ ४ ॥

दो० - सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि ।

सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि ॥ ७२ ॥

पृष्ठ 92

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 92 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * ९० रामचरितमानस मा! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ; मैंने ऐसा स्वप्न देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणने ऐसा उपदेश दिया है—॥७२ ॥

करहि जाइ तपु सैलकुमारी । नारद कहा सो सत्य बिचारी ॥

मातु पितहि पुनि यह मत भावा । तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा ॥

हे पार्वती! नारदजीने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर । फिर यह बात तेरे माता - पिताको भी अच्छी लगी है । तप सुख देनेवाला और दुःख-दोषका नाश करनेवाला है ॥ १ ॥

तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता ॥

तपबल संभु करहिं संघारा ॥ तपबल सेषु धरइ महिभारा ॥

तपके बलसे ही ब्रह्मा संसारको रचते हैं और तपके बलसे ही विष्णु सारे जगत्का पालन करते हैं । तपके बलसे ही शम्भु [ रुद्ररूपसे जगत्का ] संहार करते हैं और तपके बलसे ही शेषजी पृथ्वीका भार धारण करते हैं ॥२ ॥

तप अधार सब सृष्टि भवानी । करहि जाइ तपु अस जियँ जानी ॥

सुनत बचन सिमित महतारी । सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी ॥

हे भवानी! सारी सृष्टि तपके ही आधारपर है । ऐसा जीमें जानकर तू जाकर तप कर । यह बात सुनकर माताको बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान्‌को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया ॥३ ॥

मातु पितहि बहुबिधि समुझाई । चलीं उमा तप हित हरषाई ॥

प्रिय परिवार पिता अरु माता । भए बिकल मुख आव न बाता ॥

माता- पिताको बहुत तरहसे समझाकर बड़े हर्षके साथ पार्वतीजी तप करनेके लिये चलीं । प्यारे

कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गये । किसीके मुँहसे बात नहीं निकलती ॥४ ॥

दो० - बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ ।

पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ ॥ ७३ ॥

तब वेदशिरा मुनिने आकर सबको समझाकर कहा । पार्वतीजीकी महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया ॥७३ ॥

उर धरि उमा प्रानपति चरना । जाइ बिपिन लागीं तपु करना ॥

अति सुकुमार न तनु तप जोगू । पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू ॥

प्राणपति ( शिवजी ) के चरणोंको हृदयमें धारण करके पार्वतीजी वनमें जाकर तप करने लगीं । पार्वतीजीका अत्यन्त सुकुमार शरीर तपके योग्य नहीं था, तो भी पतिके चरणोंका स्मरण करके उन्होंने सब भोगोंको तज दिया ॥ १ ॥

पृष्ठ 93

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 93 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * ९१

नित नव चरन उपज अनुरागा । बिसरी देह तपहिं मनु लागा ॥

संबत सहस मूल फल खाए । सागु खाइ सत बरष गवाँए ॥

स्वामीके चरणोंमें नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तपमें ऐसा मन लगा कि शरीरकी सारी सुध बिसर गयी । एक हजार वर्षतक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये ॥ २ ॥

कछु दिन भोजनु बारि बतासा । किए कठिन कछु दिन उपबासा ॥

बेल पाती महि परइ सुखाई । तीनि सहस संबत सोइ खाई ॥

कुछ दिन जल और वायुका भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये । जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वीपर गिरते थे, तीन हजार वर्षतक उन्हींको खाया ॥३ ॥

पुनि परिहरे सुखानेउ परना ॥ उमहि नामु तब भयउ अपरना ॥

देखि उमहि तप खीन सरीरा । ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा ॥

फिर सूखे पर्ण ( पत्ते ) भी छोड़ दिये, तभी पार्वतीका नाम ' अपर्णा ' हुआ । तपसे उमाका शरीर क्षीण देखकर आकाशसे गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई— ॥ ४ ॥

दो० - भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि ।

परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि ॥ ७४ ॥

हे पर्वतराजकी कुमारी! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ । तू अब सारे असह्य क्लेशोंको ( कठिन

तपको) त्याग दे । अब तुझे शिवजी मिलेंगे ॥ ७४ ॥

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी । भए अनेक धीर मुनि ग्यानी ॥

अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी । सत्य सदा संतत सुचि जानी ॥

हे भवानी! धीर, मुनि और ज्ञानी बहुत हुए हैं, पर ऐसा ( कठोर ) तप किसीने नहीं किया । अब तू इस श्रेष्ठ ब्रह्माकी वाणीको सदा सत्य और निरन्तर पवित्र जानकर अपने हृदयमें धारण कर ॥ १ ॥

आवै पिता बोलावन जबहीं । हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं ॥

मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा । जानेहु तबतब प्रमान बागीसा ॥

जब तेरे पिता बुलानेको आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणीको ठीक समझना ॥ २ ॥

सुनत गिरा बिधि गगन बखानी । पुलक गात गिरिजा हरषानी ॥

उमा चरित सुंदर मैं गावा । सुनहु संभु कर चरित सुहावा ॥

पृष्ठ 94

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 94 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * ९२ रामचरितमानस [ इस प्रकार ] आकाशसे कही हुई ब्रह्माकी वाणीको सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [ हर्षके मारे ] उनका शरीर पुलकित हो गया । [ याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजीसे बोले कि ] मैंने पार्वतीका सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजीका सुहावना चरित्र सुनो ॥३ ॥

जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा । तब तें सिव मन भयउ बिरागा ॥

जपहिं सदा रघुनायक नामा । जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा ॥

जबसे सतीने जाकर शरीरत्याग किया, तबसे शिवजीके मनमें वैराग्य हो गया । वे सदा श्रीरघुनाथजीका नाम जपने लगे और जहाँ - तहाँ श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंकी कथाएँ सुनने लगे ॥४ ॥

दो० – चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम ।

बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम ॥ ७५ ॥

चिदानन्द, सुखके धाम, मोह, मद और कामसे रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकोंको आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीहरि ( श्रीरामचन्द्रजी ) को हृदयमें धारण कर ( भगवान्‌के ध्यानमें मस्त हुए ) पृथ्वीपर विचरने लगे ॥७५ ॥।

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना । कतहुँ राम गुन करहिं बखाना ॥

जदपि अकाम तदपि भगवाना । भगत बिरह दुख दुखित सुजाना ॥

वे कहीं मुनियोंको ज्ञानका उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करते थे । यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान् अपने भक्त ( सती ) के वियोग दुःखसे दुःखी हैं ॥१ ॥

एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती । नित नै होइ राम पद प्रीती ॥

नेमु प्रेमु संकर कर देखा । अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा ॥

इस प्रकार बहुत समय बीत गया । श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें नित नयी प्रीति हो रही है । शिवजीके [ कठोर ] नियम, [ अनन्य ] प्रेम और उनके हृदयमें भक्तिकी अटल टेकको [जब श्रीरामचन्द्रजीने ] देखा, ॥२ ॥

प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला । रूप सील निधि तेज बिसाला ॥

बहु प्रकार संकरहि सराहा । तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा ॥

तब कृतज्ञ ( उपकार माननेवाले ), कृपालु, रूप और शीलके भण्डार, महान् तेजपुञ्ज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए । उन्होंने बहुत तरहसे शिवजीकी सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा ( कठिन ) व्रत कौन निबाह सकता है ॥३ ॥

बहुबिधि राम सिवहि समुझावा । पारबती कर जन्मु सुनावा ॥

अति पुनीत गिरिजा कै करनी । बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी ॥

पृष्ठ 95

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 95 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * ९३ श्रीरामचन्द्रजीने बहुत प्रकारसे शिवजीको समझाया और पार्वतीजीका जन्म सुनाया । कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने विस्तारपूर्वक पार्वतीजीकी अत्यन्त पवित्र करनीका वर्णन किया ॥ ४ ॥

दो० – अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु ।

जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु ॥ ७६ ॥

[ फिर उन्होंने शिवजीसे कहा- ] हे शिवजी! यदि मुझपर आपका स्नेह है तो अब आप मेरी विनती सुनिये । मुझे यह माँगे दीजिये कि आप जाकर पार्वतीके साथ विवाह कर लें ॥ ७६ ॥

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं । नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं ॥

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरमु यह नाथ हमारा ॥

शिवजीने कहा-– यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामीकी बात भी मेटी नहीं जा सकती । हे नाथ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञाको सिरपर रखकर उसका पालन करूँ ॥ १ ॥

मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी ॥

तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी ॥

माता, पिता, गुरु और स्वामीकी बातको बिना ही विचारे शुभ समझकर करना ( मानना ) चाहिये । फिर आप तो सब प्रकारसे मेरे परम हितकारी हैं । हे नाथ! आपकी आज्ञा मेरे सिरपर है ॥ २ ॥

प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना । भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना ॥

कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ । अब उर राखेहु जो हम कहेऊ ॥

शिवजीकी भक्ति, ज्ञान और धर्मसे युक्त वचनरचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी सन्तुष्ट हो गये । प्रभुने कहा-हे हर! आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गयी । अब हमने जो कहा है उसे हृदयमें रखना ॥ ३ ॥

अंतरधान भए अस भाषी । संकर सोइ मूरति उर राखी ॥

तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए । बोले प्रभु अति बचन सुहाए ॥

इस प्रकार कहकर श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गये । शिवजीने उनकी वह मूर्ति अपने हृदयमें रख ली । उसी समय सप्तर्षि शिवजीके पास आये । प्रभु महादेवजीने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे—॥४ ॥

दो० – पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु ।

गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु ॥ ७७ ॥

आपलोग पार्वतीके पास जाकर उनके प्रेमकी परीक्षा लीजिये और हिमाचलको कहकर [ उन्हें पार्वतीको लिवा लानेके लिये भेजिये तथा ] पार्वतीको घर भिजवाइये और उनके सन्देहको दूर कीजिये ॥७७ ॥

पृष्ठ 96

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 96 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * ९४ रामचरितमानस

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी ॥

बोले मुनि सुनु सैलकुमारी । करहु कवन कारन तपु भारी ॥

ऋषियोंने [ वहाँ जाकर ] पार्वतीको कैसी देखा, मानो मूर्तिमान् तपस्या ही हो । मुनि बोले— हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिये इतना कठोर तप कर रही हो? ॥१ ॥

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू । हम सन सत्य मरमु किन कहहू ॥

कहत बचन मनु अति सकुचाई । हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई ॥

तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं? [ पार्वतीने कहा— ] बात कहते मन बहुत सकुचाता है | आपलोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे ॥२ ॥

मनु हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा ॥

नारद कहा सत्य सोड़ जाना । बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना ॥

मनने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जलपर दीवाल उठाना चाहता है ।

नारदजीने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पाँखके उड़ना चाहती हूँ ॥ ३ ॥

देखहु मुनि अबिबेकु हमारा । चाहिअ सदा सिवहि भरतारा ॥

हे मुनियो! आप मेरा अज्ञान तो देखिये कि मैं सदा शिवजीको ही पति बनाना चाहती हूँ ॥४ ॥

दो० - सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह ।

नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह ॥ ७८ ॥

पार्वतीजीकी बात सुनते ही ऋषिलोग हँस पड़े और बोले- तुम्हारा शरीर पर्वतसे ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहो तो नारदका उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है? ॥७८ ॥

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई । तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई ॥

चित्रकेतु कर घरु उन घाला । कनककसिपु कर पुनि अस हाला ॥

उन्होंने जाकर दक्षके पुत्रोंको उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घरका मुँह भी नहीं देखा । चित्रकेतुके घरको नारदने ही चौपट किया । फिर यही हाल हिरण्यकशिपुका हुआ ॥ १ ॥

नारद सिख जे सुनहिं नर नारी । अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी ॥

मन कपटी तन सज्जन चीन्हा । आपु सरिस सबही चह कीन्हा ॥

जो स्त्री- पुरुष नारदकी सीख सुनते हैं, वे घर बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं । उनका मन तो कपटी है, शरीरपर सज्जनोंके चिह्न हैं । वे सभीको अपने समान बनाना चाहते हैं ॥२ ॥

तेहि कें बचन मानि बिस्वासा । तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा ॥

निर्गुन निलज कुबेष कपाली । अकुल अगेह दिगंबर ब्याली ॥

पृष्ठ 97

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 97 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * ९५ उनके वचनोंपर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभावसे ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालोंकी माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर - बारका, नंगा और शरीरपर साँपोंको लपेटे रखनेवाला है ॥ ३ ॥

कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ । भल भूलिहु ठग के बौराएँ ॥

पंच कहें सिवँ सती बिबाही । पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही ॥

ऐसे वरके मिलनेसे कहो, तुम्हें क्या सुख होगा? तुम उस ठग ( नारद ) के बहकावे में आकर खूब भूलीं । पहले पंचोंके कहनेसे शिवने सतीसे विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला ॥ ४ ॥

दो० –- अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं ।

सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥ ७ ९ ॥

अब शिवको कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुखसे सोते हैं । ऐसे स्वभावसे ही अकेले रहनेवालोंके घर भी भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं? ॥ ७९ ॥

अजहूँ मानहु कहा हमारा । हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा ॥

अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला । गावहिं बेद जासु जस लीला ॥

अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिये अच्छा वर विचारा है । वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं ॥१ ॥

दूषन रहित सकल गुन रासी । श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी ॥

अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी । सुनत बिहसि कह बचन भवानी ॥

वह दोषोंसे रहित, सारे सगुणोंकी राशि, लक्ष्मीका स्वामी और वैकुण्ठपुरीका रहनेवाला है ।

हम ऐसे वरको लाकर तुमसे मिला देंगे । यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं- ॥२ ॥

सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छूटै बरु देहा ॥

कनकउ पुनि पषान तें होई । जारेहुँ सहजु न परिहर सोई ॥

आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वतसे उत्पन्न हुआ है । इसलिये हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाय । सोना भी पत्थरसे ही उत्पन्न होता है, सो वह जलाये जानेपर भी अपने स्वभाव ( सुवर्णत्व ) को नहीं छोड़ता ॥३ ॥

नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ॥

गुर के बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही ॥

अतः मैं नारदजीके वचनोंको नहीं छोडूंगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती । जिसको गुरुके वचनोंमें विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्नमें भी सुगम नहीं होती ॥४ ॥

पृष्ठ 98

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 98 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

९६ * रामचरितमानस *

दो० – महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम ।

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम ॥ ८० ॥

माना कि महादेवजी अवगुणोंके भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणोंके धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसीसे काम है ॥८० ॥

जौं तुम्ह मिलते प्रथम मुनीसा । सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा ॥

अब मैं जन्म संभु हित हारा । को गुन दूषन करै बिचारा ॥

हे मुनीश्वरो! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती । परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजीके लिये हार चुकी । फिर गुण-दोषोंका विचार कौन करे? ॥१ ॥

जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी । रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी ॥

तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं । बर कन्या अनेक जग माहीं ॥

यदि आपके हृदयमें बहुत ही हठ है और विवाहकी बातचीत ( बरेखी ) किये बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसारमें वर-कन्या बहुत हैं । खिलवाड़ करनेवालोंको आलस्य तो होता नहीं [और कहीं जाकर कीजिये ] ॥ २ ॥

जन्म कोटि लगि रगर हमारी । बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी ॥

तजउँ न नारद कर उपदेसू । आपु कहहिं सत बार महेसू॥

मेरा तो करोड़ जन्मोंतक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजीको वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी । स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजीके उपदेशको न छोडूंगी ॥३ ॥

मैं पा परउँ कहइ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा ॥

देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी । जय जय जगदंबिके भवानी ॥

जगज्जननी पार्वतीजीने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ । आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी । [शिवजीमें पार्वतीजीका ऐसा ] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले-हे जगज्जननी! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो!! ॥४ ॥

दो० — तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु ।

नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु ॥ ८१ ॥

आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं । आप दोनों समस्त जगत्के माता- पिता हैं । [ यह कहकर ] मुनि पार्वतीजीके चरणोंमें सिर नवाकर चल दिये । उनके शरीर बार- बार पुलकित हो रहे थे ॥८१ ॥

पृष्ठ 99

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 99 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* बालकाण्ड * ९७

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए ॥

बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई । कथा उमा कै सकल सुनाई ॥

मुनियोंने जाकर हिमवान्‌को पार्वतीजीके पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आये; फिर सप्तर्षियोंने शिवजीके पास जाकर उनको पार्वतीजीकी सारी कथा सुनायी ॥१ ॥

भए मगन सिव सुनत सनेहा । हरषि सप्तरिषि गवने गेहा ॥

मनु थिर करि तब संभु सुजाना । लगे करन रघुनायक ध्याना ॥

पार्वतीजीका प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गये । सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने घर ( ब्रह्मलोक ) को चले गये । तब सुजान शिवजी मनको स्थिर करके श्रीरघुनाथजीका ध्यान करने लगे ॥२ ॥

तारकु असुर भयउ तेहि काला । भुज प्रताप बल तेज बिसाला ॥

तेहिं सब लोक लोकपति जीते । भए देव सुख संपति रीते ॥

उसी समय तारक नामका असुर हुआ, जिसकी भुजाओंका बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था ।

उसने सब लोक और लोकपालोंको जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्तिसे रहित हो गये ॥३ ॥

अजर अमर सो जीति न जाई । हारे सुर करि बिबिध लराई ॥

तब बिरंचि सन जाइ पुकारे । देखे बिधि सब देव दुखारे ॥

वह अजर- अमर था, इसलिये किसीसे जीता नहीं जाता था । देवता उसके साथ बहुत तरहकी लड़ाइयाँ लड़कर हार गये । तब उन्होंने ब्रह्माजीके पास जाकर पुकार मचायी । ब्रह्माजीने सब देवताओंको दुःखी देखा ॥४ ॥

दो० – सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ ॥

संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ ॥ ८२ ॥

ब्रह्माजीने सबको समझाकर कहा - इस दैत्यकी मृत्यु तब होगी जब शिवजीके वीर्यसे पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्धमें वही जीतेगा ॥ ८२ ॥

मोर कहा सुनि करहु उपाई । होइहि ईस्वर करिहि सहाई ॥

सतीं जो तजी दच्छ मख देहा । जनमी जाइ हिमाचल गेहा ॥

मेरी बात सुनकर उपाय करो । ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जायगा । सतीजीने जो दक्षके यज्ञमें देहका त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचलके घर जाकर जन्म लिया है ॥ १ ॥

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी । सिव समाधि बैठे सबु त्यागी ॥

जदपि अहइ असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनहु हमारी ॥

पृष्ठ 100

श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 100 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* * ९८ रामचरितमानस उन्होंने शिवजीको पति बनानेके लिये तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं । यद्यपि है तो बड़े असमंजसकी बात; तथापि मेरी एक बात सुनो ॥ २ ॥

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं । करै छोभु संकर मन माहीं ॥

तब हम जाइ सिवहि सिर नाई । करवाउब बिबाहु बरिआई ॥

तुम जाकर कामदेवको शिवजीके पास भेजो, वह शिवजीके मनमें क्षोभ उत्पन्न करे ( उनकी समाधि भङ्ग करे ) । तब हम जाकर शिवजीके चरणोंमें सिर रख देंगे और जबरदस्ती ( उन्हें राजी करके ) विवाह करा देंगे ॥३ ॥

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई । मत अति नीक कहइ सबु कोई ॥

अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू । प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥

इस प्रकारसे भले ही देवताओंका हित हो [और तो कोई उपाय नहीं है ] सबने कहा — यह सम्मति बहुत अच्छी है । फिर देवताओंने बड़े प्रेमसे स्तुति की, तब विषम ( पाँच ) बाण धारण करनेवाला और मछलीके चिह्नयुक्त ध्वजावाला कामदेव प्रकट हुआ ॥ ४ ॥

दो० - सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार ।

संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार ॥ ८३ ॥

देवताओंने कामदेवसे अपनी सारी विपत्ति कही । सुनकर कामदेवने मनमें विचार किया और हँसकर देवताओंसे यों कहा कि शिवजीके साथ विरोध करनेमें मेरी कुशल नहीं है ॥ ८३ ॥

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा ॥

पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही ॥

तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरेके उपकारको परम धर्म कहते हैं । जो दूसरेके हितके लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं ॥१ ॥

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई । सुमन धनुष कर सहित सहाई ॥

चलत मार अस हृदयँ बिचारा । सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा ॥

यों कह और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्पके धनुषको हाथमें लेकर [ वसन्तादि ] सहायकोंके साथ चला । चलते समय कामदेवने हृदयमें ऐसा विचार किया कि शिवजीके साथ विरोध करनेसे मेरा मरण निश्चित है ॥ २ ॥

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा । निज बस कीन्ह सकल संसारा ॥

कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू । छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू ॥

तब उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसारको अपने वशमें कर लिया । जिस समय उस मछलीके चिह्नकी ध्वजावाले कामदेवने कोप किया, उस समय क्षणभरमें ही वेदोंकी सारी मर्यादा मिट गयी ॥ ३ ॥