सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 1–10
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 1–10
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3-2 सनातन धर्मालाड - 3.
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' स.ध. प्रालोक ' ग्रन्थमालाका तृतीय सुमन ( ३-२ ) संरक्षक —१. स्व ० श्री पं ० मुरारिलालजी मेहता, कलकत्ता । २. रायसाहब चौ ० श्रीप्रतापसिंहजी रईस, करनाल । ३. महामण्डलेश्वर स्वा. श्रीगंगेश्वरानन्दजी महाराज । ४. दानवीर श्रीविष्णुहरिजी डालमिया, नई दिल्ली । ५. ज.गु. शङ्कराचार्य स्वा. श्रीनिरञ्जनदेवतीथजी महाराज ६. श्री लोकनाथजी शर्मा, पारामारिवो ( दक्षिण अमेरिका ) ७. श्री रवीन्द्रनाथजी उपाध्याय, पारामारिवो - सूरिनाम ( सनातनधर्मका विश्वकोष एवं महाभारत ) ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ( ३-२ ) [ स्त्री एवं शूद्रोंके वेदाधिकार वा अनधिकार पर विचार ] प्रणेता-श्रीदीनानाथ शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश, विद्यानिधि, विद्यावाचस्पति ( अध्यक्ष स. घ. महाविद्यालय, लाजपतनगर, नई दिल्ली -२४ ) प्रकाशक-श्रीनारायण शर्मा ' राजीव ' सारस्वत, शास्त्री, प्रभाकर, एम.ए., बी.एड्. ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला कार्यालय ( फर्स्ट वी. १६, लाजपत नगर, नई दिल्ली -२४ ) द्वितीयावृत्ति ] सं ० २०२६ [ मू ० १६ ) रु ०, विदेशों में २० ) रु ०
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ग्रन्थमाला मंगानेका स्थायी पता-श्रीकिरणकान्ता शर्मा ' राजीव ' ' ' मालोक ' ग्रन्थमाला कार्यालय फस्टं बी. १६, लाजपतनगर, नई दिल्ली -२४ द्वितीय संस्करण सन् १ ९ मूल्य सोलह रुपये, विदेशों में प्रन्यकारके पूर्वापर पुरुष -श्रीदयाराम शर्मा - श्रीयादेवी श्रीजेसाराम शर्मा - श्रीकालोबाई श्रीशीतललाल शर्मा - श्रीगौरीदेवी दीनानाथ शर्मा ( १ ९ ६० ) ज्ञानदेवी ( १ नारायण शर्मा ( १ ९ ६७ ) किरणकान्ता अनुपम शर्मा ( २०२३ ) } ऋचा शर्मा ( २०२५ ) J ९ ६३ ) ( २००१ ) ७३ ई ० बीस, रुपये पुस्तकालय अखण्डानन्द श्री संख्या.............. विषय लोकहित प्रन्यास मुद्रक-मनोज प्रिंटिंग एजेन्सी द्वारा प्रिंटिंग प्रेस ' बल्लीमारान, दिल्ली -६
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' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला के पंचम संरक्षक-हरिः!! प्राप्ि भावना हो । विर योग हो महादेव ती गंग पुरीपीठाधीश्वर श्री १०८ स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थ जी महाराज दो शब्द ( ' आलोक ' तृतीय- पुष्पके प्रथम - संस्करणसे ) धार्मिक साहित्य ही सनातनधर्मका स्थायी ' यज्ञ ' एवं स्थायी ' मन्दिर ' होता है । अथवा यों कहना चाहिये कि यही सनातनधर्मका ' प्राण ' हुआ करता है । उसीसे सनातनधर्म चिर - स्थिर रहा करता है । सनातनधर्म ग्रांज जीवित भी उसी साहित्यसे है । उसी साहित्यके भिन्न - भिन्न हुए एक - एक विषयको एक ग्रन्थमें सरल तथा नवीन रूपमें रखना, यह ग्राजके साहित्यकी प्रयोजनीयता है । यह विचार कर सनातनधर्मी जनताके आश्रयको लक्ष्य करके हमने ' श्रीसनातनधर्मालोक'-ग्रन्थमालाका प्रकाशन प्रारम्भ किया है । इसका हिन्दुमात्रको उपयोग लेना चाहिये । विशेषतः विद्यालय - महाविद्यालयोंके प्राचार्थी, अध्यापकों एवं स्वतन्त्र संस्कृत - हिन्दी के पण्डितों तथा पुस्तकालयाध्यक्षोंको इस प्रथमालाका प्रत्येक पुष्प अपने पास रखना चाहिये । उसकी सुगन्धको सर्वत्र फैलाकर इधर - उधरकी फैली दुर्गन्धको दूर करना चाहिए । इस ग्रन्थमालाका तृतीय सुमन पाठकोंके कर - कमलोंमें उपहृत है । इसमें स्त्री - शूद्रोंके वेदाधिकारानधिकार पर शास्त्रीय एवं लौकिक-दृष्टिकोणसे विचार किया गया है । यह एक शास्त्राय है, जो ' सिद्धान्त ' में हमारा एक दयानन्दीसे हुआ था । यह वाराणसी के ' सिद्धान्त ' पत्रके चैत्रकृष्ण सं ० २००२ से सं ० २००५ तक हुप्रा । श्रीमहिदास, ऐलूप कवप, जाबाल, वसिष्ठ, व्यास, पराशर, कक्षीवान, पौराणिक - सूत, शबरी, वाल्मीकि, जानश्रुति आदिको जो कि आजकलके सुधारकों द्वारा
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( ख ) शूद्र वा शूद्र - पुत्र बताया जाता है, उसपर भी प्रमाणोपपत्ति सहित विचार करके उन्हें जन्म से ब्राह्मण दरशाया गया है । विद्वान् पाठकगण इस पुष्पके एक - एक अक्षरका ध्यानसे तथा क्रमसे अध्ययन करें, फिर इसके गुण - दोष हमें बतायें । इस पुस्तकमें कठिनता कुछ भी नहीं, केवल इसमें एकाग्रता अपेक्षितः है, कमसे अध्ययन भी । जिन महाशयोंके मतको इसमें हमने आलोचितं-किया है, उनमें कई तो हमारे पूज्य हैं, और कई मित्र और कई तटस्थ हैं । उनके मतपर लेखनी चलानेका कारण न तो ईष्य - द्वेष है न उनका पमान करना लक्ष्य है । किन्तु वहाँ शास्त्रीय वास्तविक अभिप्रायका प्रकाशन ही लक्ष्य है, जिससे साधारण जनताका भ्रम दूर हो । इससे यदि किसी महाशयको सोभ हुषा हो; तो वे हमारे हृदयको जानते हुए हमें क्षमा करेंगे । इस ग्रन्थमालाके प्रकाशनमें आर्थिक सहायता देनेवाले बन्धुनोंको धन्यवाद । अन्य भी धार्मिक वन्धु, सब सनातनधर्म सभाएं, मन्दिर तथा मठ एवं आचार्यपीठोंके अध्यक्ष, पुस्तकालयाध्यक्ष, इस ग्रन्थमाला के प्रकाशनार्थ धार्थिक सहायता देकर तथा इसका प्रचार कर सनातनधर्मकी सेवामें उद्यत होवें - यह हमारा उनसे सप्रेम निवेदन है । निवेदक-वैशाल संक्रान्ति:? दीनानाथ शर्मा शास्त्री सारस्वत . चन्द्र विद्यावागीश सं ० २०१० वि ० प्रिसिपल रामदल संस्कृत महाविद्यालय दरीबा कलां, दिल्ली- ६. ' आलोक ' - तृतीय पुष्पके द्वितीय - संस्करणका आमुख ' प्रालोक ' - पाठकोंको मालूम हो कि यह ' आलोक ' - प्रन्थमालाके तृतीय- पुष्पका द्वितीय- संस्करण है । प्रथम संस्करणमें ३३७ पृष्ठ थे । कागज़ भी उसमें साधारण लगा था । मुझे प्रेसका अनुभव भी उस समय नहीं था, क्योंकि ग्रन्थमालाका प्रायः यह प्रारम्भ था मेरे लेख तो बहुतसे संस्कृत एवं हिन्दी - पत्रोंमें संवत् १६८० से शुरू करके बहुत से नगरोंमें कई सहस्र पृष्ठोंमें भिन्न - भिन्न प्रसोंमें छप चुके थे; जिनसे मैं भारतवर्ष - भरमें विद्वन्मण्डलमें सुप्रसिद्ध तथा सुसम्मानित हो चुका था; पर स्वयं प्रसोंमें पुस्तकें छपवानेका यह प्रथम अवसर था जब मैंने दिल्ली में संवत् २०१० में ग्रन्थमालाका स्वयं प्रारम्भ किया था । परमेशान की परम कृपासे इस ग्रन्थमालाके अब तक दस पुष्प उपकर . प्रकाशित हो चुके जो प्रायः एक - एक सहस्र पृष्ठोंके हैं । ग्यारहवें पुष्पके ५२८ पृष्ठ छप चुके हैं । परन्तु अभी वह पूर्ण नहीं हुआ । बीचमें तृतीय-पुष्पका द्वितीय संस्करण दानवीर श्रीजयदयालजी डालमियाकी प्रेरणा से निकालना पड़ गया; क्योंकि उसके प्रथम - संस्करणकी कोई भो सचिका शेष नहीं बची थी । तृतीय- पुष्पके इस द्वितीय संस्करणमें पृष्ठ एक सहस्रके लगभग हैं । कागज भी प्राय: अच्छा लगाया गया है । उपयोगी सामग्री भी बढ़ाई गई है । प्रकाशनमें देरीका कारण एक कम्पोजीटर होने का भी है । इसके अतिरिक्त इसके मन्तिम पृष्ठ जब छप रहे थे, मैं दिल्ली में एक स्थानपर चक्कर थानेसे गिर पड़ा । सिरमें भारी चोट आई । एक स्कूटरवालेने अपनी रकमसे मेरी पट्टी कराई । उसीने मुझे पर पहुंचाया । उसने बहुत कहने पर भी कुछ भी नहीं लिया । तीसरे दिन फिर अपने एक वैद्य शिष्यके पास अपने लड़के के साथ पट्टी