श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मालोक ३
Sanatan Dharamlok Vol.3 Ankur Joshi · 532 पृष्ठ · 54 खण्ड
In English
Sanatan Dharamlok Vol. 3
This is the third volume of a series titled Sanatan Dharamlok, written by Dinanath Sharma Shastri. This specific volume discusses the rights of women and Shudras regarding the Vedas from both scriptural and social perspectives.
This book answers
- Do women and shudras have the right to study the vedas?
- Were historical figures like valmiki and shabari considered brahmins?
- What is the scriptural view on the rights of women and shudras?
- Who are the vedic authorities mentioned in hindu scriptures?
विषय सूची
- 3-2 सनातन धर्मालाड - 3. Photostar aban ' स.ध. प्रालोक ' ग्रन्थमालाका तृतीय सुमन ( ३-२ ) संरक्षक —१. स्व ० श्री पं ० मुरारिलालजी मेहता, कलकत्ता… 1–10
- ( ध ) कराने गया । वहाँ भी मैं धड़ामसे गिर पड़ा; क्योंकि - सिर में लहू जम गय था । पक्षाघात ( लकवे ) का भय भी उपस्थित हो गया । ' बेहोश हो गया… 11–20
- ( द ) भोगलोलुप - समय में श्रीसनातनधर्मोद्धारका महान कार्यका अनवरत -परिश्रम आपके सिवाय कौन कर सकता था… 21–30
- ६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मनुके मतमें वेदका अधिकार सिद्ध न हुआ । यह ' मनुस्मृति ' सृष्टिकी श्रादिमें बनी हुई मानी गई है… 31–40
- २५ २६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) T द्य savitarantee ईश्वर नहीं है । वह ईश्वर उस मन्त्रका ऋषि ( प्रतिपादक ) नहीं; वह तो उस मन्त्रका देवता प्रतिपाद्य है… 41–50
- ४५ ४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) णीका भी ' भुज्यताम, दीयताम् ' कहा जाता, क्योंकि याज्ञिक - भोजनमें शत्रु - मित्र रिणी वा तटस्थकी दृष्टि नहीं रखनी पड़ती… 51–60
- के T:, T. नी ६६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) रूप ब्रह्मचर्यका निरूपण है, तथा एक - आध अन्य मन्त्रमें भी… 61–70
- ८६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न भी शब्दाः यमस्मृतिके ' पुरा - कल्प ' शब्दका भी ' कल्पारम्भ ' अर्थ ही उन सबको वयव- विवक्षित है, ' प्राचीन शास्त्रविधि '… 71–80
- १०५ । १०६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नोपवीत देते । नहीं यह उन्होंने श्रीचन्द्रकान्तका खण्डन नहीं किया, क्योंकि उन्होंने उक्त हो गोभिलसूत्र की वैसी ही तो… 81–90
- १२५ १२६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( ग ) तियानः यज्ञोपवीत - धारण - पूर्वक सन्ध्योपासन भी मिलता है । ) ( सार्वदेशिक जून फैलाती ' १ ९ ४६, मई १ ९ ४७ )… 91–100
- १४५: १४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) विशेषकं भवति... उद्दिश्यमानविशेषणं ह्य ेतत्- ' स्वर्गकामो यजेतेंति '… 101–110
- [ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६५ १६६ / विधीयते । मन्त्रवत् प्राशनं चास्य ' [ मनु. २२६ ] ' नाम-पुंसो जातकर्म द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ' [ मनु. २… 111–120
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६६ / ६० ) पब्लि अर्थं भी कैसे? अतः यहां स्पष्ट ' वेद ' का ' कुशमुष्टि ' अर्थ वेद dearer है… 121–130
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २०६ ] नोच्चारयेत् । तस्य अपवादः - स्वधानिनयनं पितृ [ मृतक ] कर्म, तस्माद् कार्य ‘ विना… 131–140
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ २२५ ) २२६ / नियोगकी हृदयको भेड़िये वा गीदड़के हृदयके समान कहा है । यह भाव स्त्रियोंके में और हैं… 141–150
- श्रीसनातनधर्मालोकः- ( ३-२ ) ays ] विलोक्य न काव्यं समर्पितम् । तृप्तिमन्तः सुराश्चासन् त आर्याणां ई भ्यश्च हव्यं… 151–160
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६६ ] : सम्पलाः पाणिपीडनमेव विहितम् ( पृ. १२ ) ( सव ब्राह्मणादि पहले अपने ज्यमाना दे या वर्ण वाली स्त्रीसे विवाह करते थे ) ऐसा… 161–170
- २८५ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २८६ 7 व्यश्च ' ताके प्रकार एक महर्षिकी बहुत पत्नियां होनेसे जैसाकि - श्रीसायणने इस दोनेका प्राख्यायिकामें लिखा है, उनमें… 171–180
- ३०५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३०६ ] वृद २६४५ सें वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितम्मन्यमानाः । जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा हुमा… 181–190
- [ ३२५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३२६ ] नेत्रधारी हो गया, जब सरस्वतीके जलने स्वयं उसके पास आकर उसकी - देखकर प्रतिभात तब ऋपियोंने उसपर देवी- कृपा देखकर कि… 191–200
- [ ३४५ ३४६ ] या सदा. बतानुग्रह म नहीं किया; देवकुमा प्रसिद्ध है, और श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अतः यह अर्थ निर्मूल है… 201–210
- ३६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) क्या पौराणिक वृत सूत जाति के थे [ ३६७ आपको ब्रह्महत्या नहीं लगेगी… 211–220
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' [ ३८५ ३८६ ] प्रतिलोमज । प्रतिलोमज - निषाद तो चाण्डाल एवं प्रस्पृश्य होता है दूसरा ठीक है, पर अनुलोमज वैसा नहीं… 221–230
- श्रीसनातनधर्मालांकः ( ३-२ ) ४०५ ४०६ ] ' अपशूद्राधिकरण ' में भी देखिये । ' जातिनिर्णय ' में पृ. २८८ मागे - काव्यतीर्थ ने भी यही माना है - ' यद्यपि यह (… 231–240
- [ श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ४२५ ४२६ ] इसकी व्याख्या में वादीसे बहुत मान्य प्रसिद्ध टीकाकार ( ११२/१५ ) लिखा है - ' मन्त्ररहिताः क्रिया श्रावृत उच्यन्ते '… 241–250
- I श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४४६ ] = 180 ) उत्तर: ' ( १० ८६ १० ) इसीलिए श्रीसायणाचार्य ने इस वैसे ही विश्वस्माद् इन्द्र प्रकार किया है— व का aer इस ऋतस्य… 251–260
- [ ४६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) III ] नाते हुए शूद्रका विद्या में असामथ्य वा निषेध कहीं नहीं बताया गया… 261–270
- [ ४५ 7 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४८६ चतुर्थ वर्ष तपस्या बताई गई है; तब इसमें कुछ भी विरुद्धता नहीं है; मतङ्गकी फिर वह देवता नहीं बनना चाहता था?? स्वर्ग… 271–280
- [ श्री सनातनधमालोकः ( ३-२ ) ५०१ ] ५०६ पाप्त क ' मां वाचं ' में ' वाचं ' से ' परमात्माकी वाणी ' अर्थ नहीं;; इस नीः वादी में २ से ५५ पृष्ठ तक देखिये… 281–290
- [ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५२५ ५२६ ] दिया गया - नासमझीकी बात लिखी है । ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग दोनों र तो, चाहिये हैं । भक्तिमार्ग तो ' कर्म ' है… 291–300
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५४६ ] रेकमेव वेदोंका सनातन वीज है " इत्यादि वाक्योंसे श्रोंकार सव उपनिषद्रूप नयुक्तोषि वेद निश्चित है… 301–310
- ५६१ श्रीसनातनधर्मालीकः ( ३-२ ) ६२ } हैि सामान्यतया कहा है, जमिनिजीका कैसे हो सकता है? यदि शूद्र वर्फीका होम ही सिद्ध है… 311–320
- श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ] र भी वि लिया जा सकता है, अतः याजन, अध्यापन तथा प्रतिग्रहमें प्रति-भी है… 321–330
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६०२ ] करेंगे । स नाम वेदमें ' अविद्या ' ( यजुः माध्य. ४० । ६-११ ) हे ' वैदिक धर्म ' ? छोटे- काण्डका आरम्भिक वर्षोंमें '… 331–340
- श्रीसनात धर्मालोकः ( ३-२ ) ६२२ ] चारण करने उपनयन तथा उपनयनमूलक वेदाध्ययन स्वा. द. को ( ११ ) श इससे शूद्रोंका लक्षणमें उपनयन तथा वेदाध्ययन नहीं लिखा; यह '… 341–350
- - श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६४१ ६४२ ] गृहीत हो जावेगी; एकसे दूसरीका ग्रहण भी हो जानेसे दोनों के भी मन्त्र स्वतः पढ़नेसे जो ' गौरव ' दोष उपस्थित जाता है,… 351–360
- [ ६६ | श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६२ ] अथवा से प्रयास है । ' सौभाग्यदाऽहं श्रीमते ' मैं पतिकुलमें दृढा होकर श्राप संक्षनिर स्पर्धका के सौभाग्यका कारण… 361–370
- | ६५१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६८२ । बोलना इससे वादीने स्त्रियोंका उपनयन सिद्ध करना चाहा है, पर यह बिल्कुल अपूर्णता निर्मूल है… 371–380
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७०२ ] समुल्लास में अपने स्वामीजीकी ' पठन - पाठन विधि ' देख ले उपन्यस्त उ.प्र. में ३ य बात न माने तो… 381–390
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७२१ ७२२ / ति कराते हुए ' नरके हि पतन्त्येत जुह्वतः स च यस्य तत् ( ११ । ३७ ) होतृत्व ree में गिरानेवाले बने… 391–400
- ७४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ur यही उक्त स्मृतिपद्यों का तात्पर्य है । जिसके तत्त्वको न समझ कर वादी स्मृतियोंसे अपनी नई एवं निर्मूल विधियां ही… 401–410
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६२ ] [ ७६१ श्रागे वादीने म.म. पं. शि. द. जीके ' ' प्राचार्या उपाध्याया १. १८१, ची प्रादिके उदाहरण उद्धृत किये हैं… 411–420
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ 1: 2 ] यज्ञ है । यज्ञ यज धातुसे निष्पन्न है, जिसका अर्थ होता है ४२ दिका विषय तो वेदोंमें देवतावाद है । देवताओंका अग्निद्वारा… 421–430
- [ ८०१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) = ०२ ] चुके हैं । दयानन्दीपना होता है, किसीके आगे चाहे वह कोई निकम्मा - सा का कचन? यह जरा कोई ऐसी बात लिख दे; जिससे कोई… 431–440
- श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६२१ = २२ ] 71 सत्यार्थ प्रकाश संस्कृतभाषामें लिखा - लिखाया था; वा बोला था; पर / दौने मूल? यदि हिन्दी में; तो यह बात गलत है;… 441–450
- ६४१ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४२ ] कभी में पत्नी के प्रभावमें सीताकी प्रतिकृति रखी जाती थी )… 451–460
- ८६१ ८६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मन्त्र- देवता सर्वज्ञ हुआ करते हैं, इस विषयमें यह प्रमाण देखिये- ' इति मनुष्याणां परोक्षम्, तद् देवानां प्रत्यक्षम् '… 461–470
- ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६१ ६८२ भी यही कहती है ' । यही उक्त सूत्रका इष्ट अर्थ है । वया वादीको का • स्मृति परलोक से भी डर नहीं है कि उसकी परलोक जाने… 471–480
- EOR ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शेष रहा वादीका ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका अर्थ; सो वह तो सर्वथा ही प्रशुद्ध है… 481–490
- ] श्रीसनाततधर्मालोकः ( ३-२ ) १२२ ' कल्याण ' के सम्पादक श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार जी एक विश्वविख्यात । सनातनधर्मी नेता थे… 491–500
- ४१ ६४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कोई स्त्री- महाराज, पहले तो मैं भी कट्टर दयानन्दी विचारोंकी थी; ला और में भी इन भूत - प्रेतोंको कभी नहीं मानती थी… 501–510
- १ ६६२ ] श्रीसनातन धर्मालोकः ( ३-२ ) I, गुणकर्मविभागशः ' प्रतिपक्षियोंसे दिये जाते हुए इस गीता वचन विचार करके, अन्त में पौराणिक घटनाए समाचारपत्रोंसे पर भी… 511–520
- ८१ ६८२ ] श्रीननातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पालन उचित हुआ करता है, और करना भी चाहिये । यज्ञ - यागादि या भी हुआ करते थे… 521–530
- 531–532