सनातन धर्मालोक ३
Sanatan Dharamlok Vol.3 Ankur Joshi · 532 पृष्ठ · 54 खण्ड
विषय सूची
- 3-2 सनातन धर्मालाड - 3. Photostar aban ' स.ध. प्रालोक ' ग्रन्थमालाका तृतीय सुमन ( ३-२ ) संरक्षक —१. स्व ० श्री पं ० मुरारिलालजी मेहता, कलकत्ता… 1–10
- ( ध ) कराने गया । वहाँ भी मैं धड़ामसे गिर पड़ा; क्योंकि - सिर में लहू जम गय था । पक्षाघात ( लकवे ) का भय भी उपस्थित हो गया । ' बेहोश हो गया… 11–20
- ( द ) भोगलोलुप - समय में श्रीसनातनधर्मोद्धारका महान कार्यका अनवरत -परिश्रम आपके सिवाय कौन कर सकता था… 21–30
- ६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मनुके मतमें वेदका अधिकार सिद्ध न हुआ । यह ' मनुस्मृति ' सृष्टिकी श्रादिमें बनी हुई मानी गई है… 31–40
- २५ २६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) T द्य savitarantee ईश्वर नहीं है । वह ईश्वर उस मन्त्रका ऋषि ( प्रतिपादक ) नहीं; वह तो उस मन्त्रका देवता प्रतिपाद्य है… 41–50
- ४५ ४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) णीका भी ' भुज्यताम, दीयताम् ' कहा जाता, क्योंकि याज्ञिक - भोजनमें शत्रु - मित्र रिणी वा तटस्थकी दृष्टि नहीं रखनी पड़ती… 51–60
- के T:, T. नी ६६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) रूप ब्रह्मचर्यका निरूपण है, तथा एक - आध अन्य मन्त्रमें भी… 61–70
- ८६ ] श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) न भी शब्दाः यमस्मृतिके ' पुरा - कल्प ' शब्दका भी ' कल्पारम्भ ' अर्थ ही उन सबको वयव- विवक्षित है, ' प्राचीन शास्त्रविधि '… 71–80
- १०५ । १०६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) नोपवीत देते । नहीं यह उन्होंने श्रीचन्द्रकान्तका खण्डन नहीं किया, क्योंकि उन्होंने उक्त हो गोभिलसूत्र की वैसी ही तो… 81–90
- १२५ १२६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ( ग ) तियानः यज्ञोपवीत - धारण - पूर्वक सन्ध्योपासन भी मिलता है । ) ( सार्वदेशिक जून फैलाती ' १ ९ ४६, मई १ ९ ४७ )… 91–100
- १४५: १४६ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) विशेषकं भवति... उद्दिश्यमानविशेषणं ह्य ेतत्- ' स्वर्गकामो यजेतेंति '… 101–110
- [ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६५ १६६ / विधीयते । मन्त्रवत् प्राशनं चास्य ' [ मनु. २२६ ] ' नाम-पुंसो जातकर्म द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् ' [ मनु. २… 111–120
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) १६६ / ६० ) पब्लि अर्थं भी कैसे? अतः यहां स्पष्ट ' वेद ' का ' कुशमुष्टि ' अर्थ वेद dearer है… 121–130
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २०६ ] नोच्चारयेत् । तस्य अपवादः - स्वधानिनयनं पितृ [ मृतक ] कर्म, तस्माद् कार्य ‘ विना… 131–140
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ २२५ ) २२६ / नियोगकी हृदयको भेड़िये वा गीदड़के हृदयके समान कहा है । यह भाव स्त्रियोंके में और हैं… 141–150
- श्रीसनातनधर्मालोकः- ( ३-२ ) ays ] विलोक्य न काव्यं समर्पितम् । तृप्तिमन्तः सुराश्चासन् त आर्याणां ई भ्यश्च हव्यं… 151–160
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६६ ] : सम्पलाः पाणिपीडनमेव विहितम् ( पृ. १२ ) ( सव ब्राह्मणादि पहले अपने ज्यमाना दे या वर्ण वाली स्त्रीसे विवाह करते थे ) ऐसा… 161–170
- २८५ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २८६ 7 व्यश्च ' ताके प्रकार एक महर्षिकी बहुत पत्नियां होनेसे जैसाकि - श्रीसायणने इस दोनेका प्राख्यायिकामें लिखा है, उनमें… 171–180
- ३०५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३०६ ] वृद २६४५ सें वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितम्मन्यमानाः । जंघन्यमानाः परियन्ति मूढा हुमा… 181–190
- [ ३२५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ३२६ ] नेत्रधारी हो गया, जब सरस्वतीके जलने स्वयं उसके पास आकर उसकी - देखकर प्रतिभात तब ऋपियोंने उसपर देवी- कृपा देखकर कि… 191–200
- [ ३४५ ३४६ ] या सदा. बतानुग्रह म नहीं किया; देवकुमा प्रसिद्ध है, और श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) अतः यह अर्थ निर्मूल है… 201–210
- ३६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) क्या पौराणिक वृत सूत जाति के थे [ ३६७ आपको ब्रह्महत्या नहीं लगेगी… 211–220
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ' [ ३८५ ३८६ ] प्रतिलोमज । प्रतिलोमज - निषाद तो चाण्डाल एवं प्रस्पृश्य होता है दूसरा ठीक है, पर अनुलोमज वैसा नहीं… 221–230
- श्रीसनातनधर्मालांकः ( ३-२ ) ४०५ ४०६ ] ' अपशूद्राधिकरण ' में भी देखिये । ' जातिनिर्णय ' में पृ. २८८ मागे - काव्यतीर्थ ने भी यही माना है - ' यद्यपि यह (… 231–240
- [ श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ४२५ ४२६ ] इसकी व्याख्या में वादीसे बहुत मान्य प्रसिद्ध टीकाकार ( ११२/१५ ) लिखा है - ' मन्त्ररहिताः क्रिया श्रावृत उच्यन्ते '… 241–250
- I श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४४६ ] = 180 ) उत्तर: ' ( १० ८६ १० ) इसीलिए श्रीसायणाचार्य ने इस वैसे ही विश्वस्माद् इन्द्र प्रकार किया है— व का aer इस ऋतस्य… 251–260
- [ ४६५ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) III ] नाते हुए शूद्रका विद्या में असामथ्य वा निषेध कहीं नहीं बताया गया… 261–270
- [ ४५ 7 श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४८६ चतुर्थ वर्ष तपस्या बताई गई है; तब इसमें कुछ भी विरुद्धता नहीं है; मतङ्गकी फिर वह देवता नहीं बनना चाहता था?? स्वर्ग… 271–280
- [ श्री सनातनधमालोकः ( ३-२ ) ५०१ ] ५०६ पाप्त क ' मां वाचं ' में ' वाचं ' से ' परमात्माकी वाणी ' अर्थ नहीं;; इस नीः वादी में २ से ५५ पृष्ठ तक देखिये… 281–290
- [ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५२५ ५२६ ] दिया गया - नासमझीकी बात लिखी है । ज्ञानमार्ग तथा भक्तिमार्ग दोनों र तो, चाहिये हैं । भक्तिमार्ग तो ' कर्म ' है… 291–300
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ५४६ ] रेकमेव वेदोंका सनातन वीज है " इत्यादि वाक्योंसे श्रोंकार सव उपनिषद्रूप नयुक्तोषि वेद निश्चित है… 301–310
- ५६१ श्रीसनातनधर्मालीकः ( ३-२ ) ६२ } हैि सामान्यतया कहा है, जमिनिजीका कैसे हो सकता है? यदि शूद्र वर्फीका होम ही सिद्ध है… 311–320
- श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ] र भी वि लिया जा सकता है, अतः याजन, अध्यापन तथा प्रतिग्रहमें प्रति-भी है… 321–330
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६०२ ] करेंगे । स नाम वेदमें ' अविद्या ' ( यजुः माध्य. ४० । ६-११ ) हे ' वैदिक धर्म ' ? छोटे- काण्डका आरम्भिक वर्षोंमें '… 331–340
- श्रीसनात धर्मालोकः ( ३-२ ) ६२२ ] चारण करने उपनयन तथा उपनयनमूलक वेदाध्ययन स्वा. द. को ( ११ ) श इससे शूद्रोंका लक्षणमें उपनयन तथा वेदाध्ययन नहीं लिखा; यह '… 341–350
- - श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६४१ ६४२ ] गृहीत हो जावेगी; एकसे दूसरीका ग्रहण भी हो जानेसे दोनों के भी मन्त्र स्वतः पढ़नेसे जो ' गौरव ' दोष उपस्थित जाता है,… 351–360
- [ ६६ | श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६६२ ] अथवा से प्रयास है । ' सौभाग्यदाऽहं श्रीमते ' मैं पतिकुलमें दृढा होकर श्राप संक्षनिर स्पर्धका के सौभाग्यका कारण… 361–370
- | ६५१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६८२ । बोलना इससे वादीने स्त्रियोंका उपनयन सिद्ध करना चाहा है, पर यह बिल्कुल अपूर्णता निर्मूल है… 371–380
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७०२ ] समुल्लास में अपने स्वामीजीकी ' पठन - पाठन विधि ' देख ले उपन्यस्त उ.प्र. में ३ य बात न माने तो… 381–390
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ७२१ ७२२ / ति कराते हुए ' नरके हि पतन्त्येत जुह्वतः स च यस्य तत् ( ११ । ३७ ) होतृत्व ree में गिरानेवाले बने… 391–400
- ७४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ ur यही उक्त स्मृतिपद्यों का तात्पर्य है । जिसके तत्त्वको न समझ कर वादी स्मृतियोंसे अपनी नई एवं निर्मूल विधियां ही… 401–410
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६२ ] [ ७६१ श्रागे वादीने म.म. पं. शि. द. जीके ' ' प्राचार्या उपाध्याया १. १८१, ची प्रादिके उदाहरण उद्धृत किये हैं… 411–420
- श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) [ 1: 2 ] यज्ञ है । यज्ञ यज धातुसे निष्पन्न है, जिसका अर्थ होता है ४२ दिका विषय तो वेदोंमें देवतावाद है । देवताओंका अग्निद्वारा… 421–430
- [ ८०१ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) = ०२ ] चुके हैं । दयानन्दीपना होता है, किसीके आगे चाहे वह कोई निकम्मा - सा का कचन? यह जरा कोई ऐसी बात लिख दे; जिससे कोई… 431–440
- श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ६२१ = २२ ] 71 सत्यार्थ प्रकाश संस्कृतभाषामें लिखा - लिखाया था; वा बोला था; पर / दौने मूल? यदि हिन्दी में; तो यह बात गलत है;… 441–450
- ६४१ श्री सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) ४२ ] कभी में पत्नी के प्रभावमें सीताकी प्रतिकृति रखी जाती थी )… 451–460
- ८६१ ८६२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) मन्त्र- देवता सर्वज्ञ हुआ करते हैं, इस विषयमें यह प्रमाण देखिये- ' इति मनुष्याणां परोक्षम्, तद् देवानां प्रत्यक्षम् '… 461–470
- ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) २६१ ६८२ भी यही कहती है ' । यही उक्त सूत्रका इष्ट अर्थ है । वया वादीको का • स्मृति परलोक से भी डर नहीं है कि उसकी परलोक जाने… 471–480
- EOR ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शेष रहा वादीका ' यथेमां वाचं ' मन्त्रका अर्थ; सो वह तो सर्वथा ही प्रशुद्ध है… 481–490
- ] श्रीसनाततधर्मालोकः ( ३-२ ) १२२ ' कल्याण ' के सम्पादक श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार जी एक विश्वविख्यात । सनातनधर्मी नेता थे… 491–500
- ४१ ६४२ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) कोई स्त्री- महाराज, पहले तो मैं भी कट्टर दयानन्दी विचारोंकी थी; ला और में भी इन भूत - प्रेतोंको कभी नहीं मानती थी… 501–510
- १ ६६२ ] श्रीसनातन धर्मालोकः ( ३-२ ) I, गुणकर्मविभागशः ' प्रतिपक्षियोंसे दिये जाते हुए इस गीता वचन विचार करके, अन्त में पौराणिक घटनाए समाचारपत्रोंसे पर भी… 511–520
- ८१ ६८२ ] श्रीननातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पालन उचित हुआ करता है, और करना भी चाहिये । यज्ञ - यागादि या भी हुआ करते थे… 521–530
- 531–532