सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 11–20

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 11–20

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( ध ) कराने गया । वहाँ भी मैं धड़ामसे गिर पड़ा; क्योंकि - सिर में लहू जम गय था । पक्षाघात ( लकवे ) का भय भी उपस्थित हो गया । ' बेहोश हो गया । प्रखकी काली पुतली ( कमीनिका ) भी उस समय मेरे सम्बन्धियों-को नहीं दीख रही थी । मेरा लड़का तथा पत्नी प्रादि सम्बन्धी बहुत घबरा गये । उस समय ' यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव ' ( ऋ. १०।१६१२, अथर्व. २०६६/७ ) ( यदि आयु क्षीण हो गई हो, अथवा यदि मर भी गया हो, अथवा मृत्युके देवता यमराजके पास भी पहुंचाया गया हो । ) यह वेदोक्त मरणासन्न अवस्था मेरी उपस्थित हो गई थी । मुझे बेहोशी में सफदरजङ्ग - हस्पताल नई दिल्ली में पहुंचाया गया । हस्पताल वालोंने मेरे गले में छेद करके गैस मेरे सिर में पहुंचाकर जमी हुई मेरे सिरकी लहूको पिघलाया । कई इन्जेक्शन भी लगाये । मैं होश में आ गया । मेरी घाँसकी काली पुतली भी अब ठीक स्थानपर श्रा गई । पूर्व - लिखे वेदमन्त्र के अवशिष्टभाग - ' तमाहरामि नि तेरुपस्थाद् अस्पार्शमेनं शतशारदाय ' ( ऋ. १०११६१।२ ) ( में इन्द्र ( परमेश्वर ) उस प्रसन्नमृत्यु- पुरुषको यमराजसे खींच लाता हूं; और उसे शतायु-कर दिया करता हूं । ) के अनुसार परमेशानके दयादानसे तथा ' आलोक'-के संरक्षकों, सहायकों एवं तपस्वी पाठकोंके शुभाशीर्वादसे स्वस्थ होकर क्षुब्ध हुए हुए घरवालोंको प्रसन्न करता हुआ चौथे दिन सकुशल घर श्री गया । पर इस अवसर पर किसी नसकी दुर्बलतावश मेरा पेशाब बन्द हो गया । इस कारण मुझे फिर उसी हस्पताल में जाना पड़ा । मेरी मूत्रेन्द्रिय बान्ध दी गई । ट्यूब लगा दी गई । उसीसे पेशाब आने लगा । २० दिनके बाद मेरे मूत्राशयको सलाइयोंसे चौड़ा किया गया । ४-५ दिनोंके बाद मेरी मूत्रेन्द्रियको खोल दिया गया । पेशाब आने लगा । परन्तु अन्दर ज़रूमोंके हो जानेसे पेशाब जलनके साथ श्राता रहा । ( झ ) हस्पतालवालोंकी बताई हुई गोलियोंके प्रयोगसे चार दिनोंमें जलन हट गई । मैं सकुशल करवा चौथवाले दिन २५-१०-७२ को घर या गया । इसमें मेरे सुपुत्र श्रीनारायणशर्मा शास्त्री ' राजीव ' एम.ए. बी.एड. एवं मेरी धर्मपत्नी, ज्ञानदेवी और मेरी पुत्रवधू, बहिन, लड़कियों, जामाताओंों तथा शिष्य मण्डल एवं मित्रों आदि सब सम्बन्धियोंका पूरा सहयोग उपलब्ध हुम्रा । परमात्मा का वहुत धन्यवाद है कि उसने मुझे पुनर्जन्म दिया । मुझे अनुभव हुआ कि - परमात्माने मेरी अपनी तथा अन्य महोदयोंकी पाठ - पूजा तथा शुभाशंसा एवं दानको स्वीकार किया; और मेरी यह ग्रन्थमाला चलती रहे यह मुझे भगवान् का अभिप्राय विदित हुया । क्योंकि - ग्रन्थमालामें मैंने विपक्षियोंकी भांति छल - कपटको थोड़ा भी स्थान नहीं दिया था । इसीसे मुझे भगवान्ने फिर संसारमें भेजा । मैं भी प्रातुरालयले प्राकर छप रहे हुए अपने ग्रन्थकी शेषपूर्ति में लग गया, अभी भी मुझमें पर्याप्त दुर्वलता है । अतः मेरा पहलेकी तरह दिल्ली में आना - जाना रुका हुआ है । पर ग्रन्थमालाका कार्यं यथाशक्ति कर रहा हूं । यह सब परमात्माको अकम्प - अनुकम्पाके अतिरिक्त ग्रन्थमालाके संरक्षकों, सहायकों तथा पाठकोंके शुभाशंसनका फल था । मेरी अनुपस्थितिमें कई निबन्ध खोये गये । प्रूफ-संशोधन भी ठीक न हो सका । क्रममें भी कुछ त्रुटियाँ हो गई । प्रकाशन में विलम्ब भी बहुत हो गया । परमेशान के प्रतिशयित - दयादानसे तथा सेठ श्रीजयदयालजी डालमियाकी सहानुभूति एवं सहयोगसे मुझे नवजीवन प्राप्त हुमा । आगे भी भगवान्की दया अपेक्षित है, कि मैं ' आलोक ' ग्रन्थमालाको यथाशक्ति पूर्ण करता हुआ सनातनधर्मकी सेवा कर सकूं । इस पुष्पके इस द्वितीय सस्करणकी सरक्षकताकी जगद्गुरु - शङ्कराचार्य, पुरीपीठाधीश्वर अनन्त श्री स्वामी निरञ्जनदेव तीर्थजी महाराजने - जो वस्तुतः सनातनधर्मके ही संरक्षक हैं, अपनी स्वीकृति दी है । श्रीचरणोंने

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( च ) ही गोरक्षाकेलिए अपने प्राणोंकी भी बाज़ी लगा दी थी, यह विश्व-विश्रुत है । इस बातका हमें गौरव है । इस ग्रन्थमालाको उनकी छत्र-च्छाया प्राप्त होती रहे - यह हमारी हार्दिक - भावना है । श्रीलोकनाथजी शर्मा पारामारिबो ( दक्षिण अमेरिका ) तथा उन्हीं के अनुज श्रीरविन्द्र-नाथजी उपाध्याय एक - एक हजार रुपये देकर इस पुष्पके संरक्षक बने हैं । श्रोलोकनाथजी हमारी पुस्तकें भी बेचते हैं । श्रीउपाध्यायजीने तो इसके अतिरिक्त दक्षिणा भी हमें दी है । इन दोनों ही महोदयोंने इस बार अपना चित्र देना स्वीकृत नहीं किया है । इस पुष्पके प्रकाशन में श्रीजयदयालजी डालमिया - महाभागके सुपुत्र दानवीर श्रीविष्णुहरि-डालमिया - महाभागने २००० ) रु ० की प्रार्थिक सहायता दी है । विद्यालयसे मेरे कार्यनिवृत्त हो जानेसे मेरे योगक्षेमके निर्वाहक भी आप ही हैं । जिन महोदयोंके पास ' प्रालोक ' के तृतीय- पुष्पका प्रथम - संस्करण हो; उनको भी यह द्वितीय - संस्करण अवश्य मंगाना चाहिये; क्योंकि इसमें बहुत - सी उपयोगी सामग्री बढ़ाई गई है । एक दयानन्दी-सिद्धान्तालङ्कारने इस विषयकी २३६ पृष्ठकी एक पुस्तक छपवाई थी, उस सम्पूर्ण पुस्तककी भी इसमें समीक्षा कर दी गई है । अन्तमें परमात्माको अतिशयित धन्यवाद देकर - जिसने मुझे फिर श्रीसनातनधर्मकी सेवाका अवसर दिया है, यह पुस्तक पाठकोंकी सेवा में उपस्थित करता हूं । प्राशा है - वे इसके प्रचारक तथा सहायक सिद्ध होंगे, जिससे यह ग्रन्थमाला भविष्यत् में भी जारी रहे । सूचना - ग्रन्थमालाको प्रमूल्य कोई भी न ले; यह प्रत्येक पाठकको स्मरण रख लेना चाहिये । क्योंकि हम कोई सेठ साहूकार तो हैं नहीं । इस ' माला ' का स्थायी कोष भी नहीं है । कोई इस ग्रन्थमालाका सहायक यदि न हो सके; तो इसका मूल्य कमसे कम अवश्य दे । प्राजकल कितनी मंहगाई है - यह तो पाठक जानते ही होंगे । इस पुष्पका मूल्य

पृष्ठ 13

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' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाके छठे संरक्षक— श्रीपं ० लोकनाथजी शर्मा S / O श्रीपं ० श्यामकिशोर VVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVVAAVAVVAAVAAV पारामारिवो सूरिनाम ( दक्षिण अमेरिका ) इस बार इन्होंने अपना चित्र देना स्वीकृत नहीं किया । ( छ ) जी शर्मा भारतमें १६ ) रखा गया है, और विदेशों में २० ) । इस ग्रन्थमालाको दस हज़ार रुपया देने वाले इसके ' सर्वस्व ' माने जाते हैं । वे इस ग्रन्थमालाके प्राजीवन सदस्य रहेंगे । संरक्षकसे न्यूनसे न्यून एक सहस्र रुपये लिये जाते है । संरक्षकका चित्र भी छापा जाता है । परम - मान्य सहायकसे ५०० ), और मान्य - सहायकसे २५० ), तथा साधारण - सहायकसे १०० ) लिये जाते हैं । कोई प्रदान जितना भी चाहे दे सकता है, परन्तु २० ) से कम न हो । हमने इस ग्रन्थमालामें अपने आर्थिक लाभका विचार सर्वथा नहीं रखा है । जो भी श्रयं राशि हमें इन पुप्पोंके विक्रयसे प्राप्त होती है; तथा जो प्रतिरिक्त - सहायता प्राप्त होती है; वह सब अग्रिम पुष्पोंके प्रकाशन ' में लगाई जाती है । अतः कोई भी महोदय इन पुष्पोंको, बिना मूल्य न लें । जो मूल्यले अधिक भी दे सकें, वे दे सकते हैं । जिन्होंने इस ' माला ' के लिए आर्थिक सहायता दी है, वा दे रहे हैं, वे अपने प्रिय सनातनधर्मकी अर्चना कर रहे हैं । श्रन्य महोदयोंको भी इस ज्ञानयज्ञमें आहुति देकर एतदर्थं स्वयं सहायता करके तथा अन्योंसे सहायता दिलाकर इस ग्रन्थमालाका संरक्षक एवं सहायक आदि बनना चाहिये, जिससे यह शीघ्र प्रकाशित हो सके । यह ग्रन्थमाला सतत जारी रहे, स्थगित न हो, इसकेलिए सव सनातनधर्मी बन्धुको प्रयत्न करना चाहिये । कमसे कम १०० ) रु ० धार्मिक - साहित्य के लिए देना कोई कठिन कार्य नहीं । श्रतः इस ग्रन्थको पा कर सभी धार्मिक वन्धुत्रोंको, हमारे मित्रों तथा शिष्यों को सहायता भेज देनी चाहिये । इसके मुद्रक श्रीरामेश्वरजीका कार्य सराहनीय है । सदाकी भांति इस पुष्पमें भी ज.गु. शंकराचार्य स्वामी श्रीकृष्ण-बोधाश्रमजी महाराजने १०० ) की सहायता दी है । स्वा. गङ्गेश्वरा-नन्दजी महाराज महामण्डलेश्वरजीने मी १०१ ) की तथा स्वामी श्री-वासुदेवानन्दजी महाराज ( हरिद्वार ) ने भी १०१ ), ' अखण्ड - ज्योति ' VVVVVVVVVVV

पृष्ठ 14

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( ज ) ANNNNNNNNNNNAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAAA गायत्री - परिवार शाखाके श्रीनर्मदेश्वर महाराज, धांगघ्राने १०१ ), शास्त्रार्थ -महारथीजीके सुपुत्र शास्त्रार्थ - पञ्चानन श्रीपं. प्रेमाचायंजी शास्त्री दिल्लीने १०० ), श्रीप्रह्लाद संकीर्तन मण्डल C / o श्रीपं. यशोदानन्दजी जयतल गाजियाबादने १०१ ), श्रीपं. लालबिहारीजी शास्त्री मिश्र वाराणसीने १११ ), श्रीपं. लोकनाथजी शर्मा पारासारिवो ( दक्षिण अमेरिका ) ने सरक्षकताकी सहायताके अतिरिक्त १०० ), से श्रीविश्वनाथजी गनेडीवाला कलकत्ताने १०० ), श्रीशिवकुमारजी शर्मा मन्त्री श्रीयुवक समिति पुस्तकालय, सिरसाने १०० ), राजकवि श्रीपं. उदयभानुजी हंस शास्त्री M. A. महोदय हिसार एवं भिवानीने १०१ ) की सहायता दी है । इन सबको धन्यवाद है । इन सबकी सहायता ११ वें पुष्पकेलिए थी; परन्तु हमने ३ य पुष्पके द्वितीय संस्करणके लिए इसे लगाया है । आशा है यह महोदय फिर ११ वें पुष्पमें भी सम्भव होनेपर अपनी सहायता भेज देंगे । माघ पूर्णिमा सं ० २०२६ निवेदक – दीनानाथ शास्त्री सारस्वतः ( ' प्रालोक ' ग्रन्थमाला - प्रणेता ) फर्स्ट बी. १६, लाजपतनगर, ( नई दिल्ली -२४ ) प्रणेताकी पत्नी श्रीज्ञानदेवी तथा पौत्र - पौत्री अनुपम शर्मा ' तथा ऋचा शर्मा |

पृष्ठ 15

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ALAMAICACIO ZAVIVAVADAVICIVICAVACAVAVAVAVAVAVAADAVALAVIVA ' आलोक ' - पाठकों के हार्दिक - भाव । ( १ ) श्रीगुरुजीका इस ग्रन्थमालाकेलिए हार्दिक भाव और ग्राशीर्वाद । ' मैंने ' सनातनधर्मालोक ' का प्रारम्भसे दशम पुष्प तक परम - सूक्ष्म दृष्टिसे स्वाध्याय किया है । मैं इस परिणाम पर पहुंचा हूं कि श्रीषं ०-अम्बिकादत्त व्यास, पं ० ज्वालाप्रसाद मिश्र यजुर्वेद भाष्यकर्ता मुरादाबाद, तथा श्रीव्रजरत्न भट्टाचायं मुरादाबाद, व्याख्यानवाचस्पति श्रीदीनदयालु-शर्मा झज्जर, श्रीपं ० भीमसेन शर्मा सम्पादक ' ब्राह्मण - सर्वस्व ' इटावा, श्रीरामस्वरूप शर्मा सम्पादक ' स.ध. पताका ' मुरादाबाद, श्रीनिगमागम--चन्द्रिका भारतधर्म- महामण्डल काशी, युक्तिविशारद पं ० कालूराम शास्त्री ' धर्मप्रकाशादिके कर्ता, अमरौधा ( कानपुर ), स्वा ० दयानन्द सरस्वती धर्मकल्पद्र म- धर्मं विज्ञानादिके प्रणेता, काशी, श्रीश्यामलाल शर्मा प्रमृतसर, श्रीपं ० रल्यारामशर्मा सम्पादक स.ध. प्रचारक अमृतसर, स्वा. प्रकाशानन्द--सरस्वती व्याख्यान मार्तण्ड, महोपदेशक सनातनधर्मं प्रतिनिधि सभा लाहौर, इन विद्वानोंने सनातनधर्मकी अयक सेवा की थी । पर उनसे पूर्वपक्षियों-की मनःशान्ति पूर्ण नहीं हुई । अब जितनी सेवा लेखबद्ध महाग्रन्थरूपमें ' सनातनधर्मालोक ' द्वारा श्रीदीनानाथ शास्त्री कर रहे हैं, इतनी सेवा अन्य किसी विद्वान्ने नहीं की । इनके लेखोंका बड़े - बड़े सनातनधर्मी नेताओं, महोपदेशकों, एवं शास्त्रार्थ - महारथियोंने अपने ग्रन्थोंमें बहुतसे विषयों में श्राश्रय लिया है । शास्त्रीजीका देह तो बहुत सूक्ष्म है, परन्तु उनके मनमें इस प्रकार लेखवद्ध - सेवाका विशेष उत्साह प्रतीत होता है; क्योंकि स्वपक्ष मोर परपक्षके ग्रन्थोंका अवगाहन तथा समाचारपत्रों और विपक्षिलिखित-ट्रैक्टों और ईर्ष्यासे लिखित अशुद्ध विचारों द्वारा वितण्डा - रूपसे किये हुए आक्षेपोंका सनातनधर्मशास्त्र तथा विपक्षिलिखित पुस्तकोंका यथावत्

पृष्ठ 16

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) ( ञ - अवगाहन करके स्वप्रमाण तथा परप्रमाण लिखकर विपक्षियोंके मुख पर - ताला लगाना - यह कार्य इन्हीं सारस्वतजीका है । मैंने यह भी अनुभव किया है कि ईर्ष्यालु, पण्डितम्मन्य पूर्वपक्षियोंने सनातनधर्मियोंको अपने सिद्धान्तसे विमुख करनेकेलिए जो - जो प्रश्न किये हैं, उनके यथावत् उत्तर वेदादिशास्त्रोंके आधार पर ' आलोक ' में दिये -हैं । कुतार्किक - विपक्षी उनका कृत्रिम प्रत्युत्तर भी देनेमें असमर्थ देखे जाते हैं । अतः सारस्वतजीकी इस सनातनधर्मकी सेवाकेलिए प्रत्येक शास्त्रज्ञ-विद्वद्गण बहुत - बहुत ही प्रशंसा करते हैं, कर चुके हैं, और भविष्यत् में भी इसका मूल्य प्रांका जावेगा । इस परिश्रमकी जितनी प्रशंसा की जावे, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी, किन्तु अत्यल्प है । अन्तमें मैं परमात्माके भागे प्रतिदिन यही प्रार्थना करता हूं कि -श्रीदीनानाथजीकी आयु सौ वर्षसे भी अधिक होवे, ताकि वे स.ध.की सेवामें संलग्न रहें, और उनसे लिखित ' सनातनधर्मालोक ' को पढ़कर और मनन करके दूसरे सम्प्रदायोंके मनुष्य भी लाभ उठावें । हमें दृढ़ प्रशा ' है कि यदि वे पूर्वपक्षी प्रग्रहवाद छोड़ दें, तो इस ' प्रालोक ' ग्रन्थमाला पूर्वपक्षियों को भी अपना मत बदलनेको बाध्य होना पड़ेगा । एवमस्तु । ( जगन्नाथ शास्त्री, ' वेदगीता ' ' वेदभागवत ' ' वैदिक साहित्यालङ्कार-मञ्जूषा ' प्रादिके लेखक ( प्रायु ८३ वर्ष ) झज्जर । ) ( २ ) ग्रापकी वज्रलेखनीसे लिखे ' सनातनधर्मालोक ' नामक ग्रन्थके १० पुष्प आर्यसमाजकेलिए ' ऐटम बम ' के समान हैं । उक्त ग्रन्थ वस्तुतः सनातन धर्मके विश्वकोषके समान है । ( ' लोकालोक ' सम्पादक तथा - सञ्चालक श्रीपं ० माधवाचार्यजी शास्त्री, शास्त्रार्थ महारथी, सनातनधर्म-विजयाय, वसन्त पञ्चमी २०२६ ) । ( ३ ) आदरणीय श्रीसारस्वतजी, मैंने आपके महान् ग्रन्थ ' सनातनधर्मालोक ' का एक खण्ड पढ़ा है, जिसमें आपकी विद्वत्ता, वैदुष्य · तथा प्रतिभा देखकर चमत्कृत होना पड़ता है । इतना घोर परिश्रम कर ( ट ) आपने जो विशाल धार्मिक - साहित्य रचा है, उसके लिए सनातन - धर्मानुयायी-व्यक्ति सदा आपके ऋणी रहेंगे ।... श्रीमान् पुराणविद्या अधिकारी--विद्वान् ही ठहरे ( बलदेव उपाध्याय, प्राप्तावकाश सञ्चालक अनुसन्धान संस्थान वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी ) । ( ४ ) आपकी ओरसे प्रकाशित किये गये ' सनातनधर्मालोक'-ग्रन्थमालाके सुमन पढ़े । बहुत आनन्द हुआ । साथ ही हमारे वैदिकधमंके प्रति जो आस्था थी, उसको बहुत पुष्टि मिली । प्राजके काल में ऐसा शास्त्रीय - अध्ययन ही पाश्चात्य रहन - सहन में डूबे हुए वैदिक धर्मविमुख नवयुवक वर्गको मुह - तोड़ प्रत्युत्तर देनेमें सहायक सिद्ध होगा । इसमें शङ्काको स्थान नहीं है ।... ( नि. शान्तिलाल शास्त्री, कडियादरा संस्कृत पाठशाला, कडियादरा जि ० सांवरकाठा; गुजरात ) । ( ५ ) आपके लेख ' कल्याण ' के परलोकाक, पुनर्जन्माङ्क, तथा अन्यत्र भी पढ़े थे, सिद्धान्तकी पुष्टि आप लाजवाब करते हैं । शायद ही कोई विद्वान् ऐसा करता हो । मेरी बड़ी अभिलाषा थी कि श्रापकी ' श्रीसनातनधर्मालोक ' को सम्पूर्ण ग्रन्थमाला पढ़ डालता, पर दुर्भाग्यवश मोतियाके आपरेशनके कारण आँखें काम नहीं देतीं ।... ( महावीर त्रिवेदी कमिश्नर एण्ड फेनेन्स सैक्रेटरी यू. पी. गवर्नमेण्ट, लखनऊ ) । ( ६ ) आपके ' आलोक ' के पुष्पोंसे सनातनधर्म के सम्बन्धमें मैंने बहुत ज्ञान प्राप्त किया है । यह सव आपकी ही कृपा । ( नारायणसिंह मयाल, मालई पो. एकेश्वर ( गढ़वाल ) 1 ( ७ ) श्रद्धेय - शास्त्रीजीके ' सनातनधर्मालोक ' के सभी प्राप्य भाग प्राप्त हो गये । सनातनधर्मके ऊपर कीचड़ उछालनेवालोंकी अच्छी खबर ली गई है । जिस विषयको उठाया जाता है, उसे बिना समाप्त किये रहा नहीं जाता । सप्रमाण तर्कों द्वारा विषयका स्पष्टीकरण सर्वथा श्लाघ्य तथा स्तुत्य है ।... शेष पुष्प प्रकाशित होते ही सूचित करेंगे ( गोविन्द पाण्डेय प्राचार्य. सं. हि. त्रिद्यापीठ, झारखण्डधाम पो.रा.ध. ) । '

पृष्ठ 17

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( ठ ) ( ८ ) परमादरणीय विद्वत्प्रवर! सादरं सस्नेहं च अभिवादये । - सम्पूर्ण आस्तिक- संसारो भवतां सेवाया ऋणी । कमलाकामुकः परमः पुमान् भवन्तमाकल्पान्तं जीवितं कुर्यात् इति कामये । ( श्रीराजाराम -आचार्य:, प्रधानाचार्यः, श्रीराजकीय ग. सं. महाविद्यालय, दे.न. ( FAT ) I ( e ) माननीय शास्त्रीजी; शत - शत अभिवादन! अप धर्मके - रहस्यका जितनी सुगमता एवं गम्भीरता से प्रकाशन कर रहे हैं, वह सैकड़ों यज्ञोंके समान है ।... ( लालबिहारी मिश्र, ' वैदिकी ' के प्रणेता गो. सं. महाविद्यालयाध्यापक, वाराणसी ) । ( १० ) कई दिनोंसे आपकी कीर्ति सुनता प्राया था, परन्तु आज ' कल्याण ' के ' शमाङ्क ' में आपका ' भगवान् श्रीराम ' लेख पढ़कर पत्र -लिखने के लिए प्रेरित हुआ हूँ. 1... ( श्रीविश्व हितैषी महाराज अ.भा. - कल्याण - प्रतिनिधि सभा, वि.सं. आश्रम जोगी, उज्जैन ( म.प्र. ) । ( ११ )... आपका ' श्रीसनातनधर्मालोक ' जिसके हाथोंमें जाता है, वही आपकी बहुत प्रशंसा करता है । यहां तक कि प्रार्यसमाजी कृष्णशर्मा ( भारतसे आये हुए ) आपका ' नमस्ते ' १-२ पुष्प पढ़कर श्रापकी बहुत - प्रशंसा करते थे । ( लोकनाथ शर्मा, पारामारिबो, सूरिनाम ( दक्षिण-अमेरिका ) । ( १२ ) आपका ' धर्मालोक ' धार्मिक जगत् के लिए अलभ्य, अनूठा, -अमूल्य रत्न है । जितनी प्रशंसा की जाय, वह स्वल्प ही है । इतना बड़ा-" भारी परिश्रम अन्य लोग कम कर पाये होंगे । अधिक क्या लिखा जाय, सूर्यके सामने दीपकके सहरा । ( स्वामी नृसिंहदास विरक्त, श्रीसियाराम-भवन, नागौर ) । ( १३ ) परमश्रद्धय - शास्त्रीजी; नमस्कार! आपके द्वारा रचित “ श्रीसनातनधर्मालोक ' पुस्तक पढ़नेका सौभाग्य प्राप्त हुआ । श्रापने इस ( ड ) पुस्तककी रचना करके वास्तवमें समस्त हिन्दुजातिकी रक्षा, एवं स.. की सेवा की है । वह सेवा चिरस्मरणीय रहेगी । ग्रापने अपनी ज्ञानशक्तिसे एवं गम्भीर - अव्ययनसे जो धर्मको समुन्नत करनेकी कृपा की है, वह प्रशंसनीय है । इससे मुझ जैसे अल्पज्ञोंको सन्मार्ग मिलेगा । प्रभुसे यही निशि - दिन प्रार्थना है कि वे प्रापको दीर्घायु एवं स्वास्थ्य प्रदान करें । वे आपका अपरिमित शक्ति दें, जिससे आप अपने ज्ञानसे जनताको प्रकाशित करें एवं अपनी लेखन - शक्ति एवं तर्कशक्तिसे अनेकों प्रकारकी शङ्काका समाधान करें । यही परमपितासे प्रार्थना है । ( प्रापका दास - प्रम्बिकाप्रसाद पाराशर, शकूर बस्ती, नई दिल्ली ) । ( १४ ) श्रीमताम्, निगमागमपारश्वनाम्, सनातन धर्म संरक्षण-वद्धकक्षाणाम्, ' आलोक ' - मालया निरस्तदुस्तकं - तिमिरा डम्बराणाम्, गुरुवर्याणाम्, अवधीरितशोणसारसयोः चरणयोः विलसन्तुतरां नितरां वशंवद प्रमाचार्य ' - प्रहिताः प्रणामाज्जलयः । मैं भगवान् की कृपा और ग्रापके शुभाशीर्वादसे पुनः धर्मप्रचारार्थं दक्षिण अमेरिकामें आगया हूं । आपके द्वारा विरचित ' सनातनधर्मालोक'-ग्रन्थ ज्योतिः - स्तम्भके समान है, और प्रास्तिकोंकेलिए परम - सम्बल है । आपकी विवेचना - शैली और विषयको प्रमाण एवं युक्ति - प्रत्युक्तियोंके आधारपर साङ्गोपाङ्गरूपसे प्रस्तुत करने की आपकी क्षमता विलक्षण है । यहां इस देश ( पारामारीवो ) में प्रचार करते समय प्रमाणवादकी दृष्टिसे ' आलोक ' ग्रन्थमालाने मुझे सवंदा मार्गदर्शन कराया है । मेरे जैसे सनातनधर्मके सैद्धान्तिक पक्षके प्रचारककेलिए ग्रापके ग्रन्थ एक सम्पूर्ण पुस्तकालयका काम करते हैं ।... ( भवदीय - प्रेमाचार्य शास्त्री पारामारीवो, सूरिनाम, दक्षिण अमेरिका ) । [ श्रोप्रेमाचार्य शास्त्री, शास्त्रार्थ महारथी पं ० श्रीमाधवाचार्यजी शास्त्रीके सुपुत्र हैं । मैं प ० माधवाचार्यजी शास्त्रीको कहा करता था कि मनुष्य-शरीर क्षणभंगुर है; आप कोई अपने जैसा सनातनधर्मका एक प्रचारक

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( ढ ) तैयार करें, जो आपके नामको भी चार चांद लगानेवाला बने; तथा सम्पू सनातनधर्मका प्रचारक भी बने । महारथीजीको मेरी बात समझमें प्रा-• पुमा गई; उन्होंने अपने सुपुत्र श्रीप्रमाचार्य शास्त्रीको प्रचारार्थं अपने साथ रखा । उसका परिणाम यह निकला कि वह उनका दूसरा रूप निकला-( पर्व इससे हमें बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई । अब श्रीप्रमाचार्यजीने दूसरी बार दक्षिण अमेरिका में स.ध. के प्रचारककी हैसियतसे सफल यात्रा की है । रहत यह ऊपरके शब्द उक्त शास्त्रीजीके हैं । ] सेक ( १५ ) पूज्यपाद श्रीशास्त्रीजी; सादर प्रणाम । मुझे अत्यन्त हर्ष गो. है कि ऐसे कलिकाल में जबकि सनातनधर्मकी नैया नास्तिक रूप-महार्णवमें डूब रही है । प्राप - सदृश महाविभूतियाँ अवतीर्ण होकर दक्ष माझीके रूपमें उसे कूल तक ले जानेके हेतु कसर कसकर सन्नद्ध गई लिये हैं । वैदिकधर्मका नारा लगानेवाले दयानन्दियों द्वारा भी जिस प्रकार कल पुरातन संस्कृतिको मिटानेका प्रयास किया गया; उसे देखकर एवं पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं । इधर हमारी कर्णधार सर्वकार तथा उत्कोच - ग्रहण करनेवाले अधिकारी तथा शिक्षाधिकारी मनमानी करनेमें लगे हैं । ऐसे दुष्कालमें प्रापने ' सनातनधर्मालोक ' की रचना करके प्रर प्राध्यात्मिक जगत्का ' महान् उपकार किया है ।... ( प्रापका प्रार्थी-शिवकुमार पाण्डेय, इन्दौर ) । ( १६ ) आदरणीय परम श्रद्धेय पण्डितजी! आपकी तथा अर श्रादरणीय श्रीमाधवाचार्यजी महाराजकी पुस्तकोंसे मुझे बड़ी सहायता भा मिली है । वस्तुतः प्राप दोनों महानुभाव भारतकी महान विभूति सूर तथा स.घ के महास्तम्भ हैं । प्रापकी तथा महारथीजीकी बनाई पुस्तकें भा बेमिसाल हैं । तथा विपक्षियोंकेलिए वज्रपात हैं, जिनका कोई जवाब हो नहीं । प्रापकी प्रश्नोंकी हल करनेकी विधि बड़ी अच्छी है । कोई ह पहलू आप नहीं छोड़ते । प्रश्नकी गहराई तक चले जाते हैं । पुस्तकें ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला के सप्तम संरक्षक -श्रीपं ० रविन्द्रनाथ जी शर्मा उपाध्याय S / o पं ० श्यामकिशोर जी शर्मा पारामारिवो सूरिनाम ( दक्षिण अमेरिका ) ZAAAAAYAYAYAYAYAYAYAANNNN इन्होंने इस बार अपना चित्र देना स्वीकृत नहीं किया । AVAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYA

पृष्ठ 19

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ZAVAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYAYNNNNNNNNNNNNNNYAYAYAYAY ( ण ) पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे प्राप पास ही बैठे हों । श्रापकी पुस्तकों वा पं ० जीकी पुस्तकोंकी सहायतासे वा अन्यान्य लेखकों की सहायता से ही स.ध. की जय हुई है । ईश्वर आपको चिरायु प्रदान करे ( ख ) याप भविष्यत् श्रौर वर्तमान दोनों समयकेलिए एक महान कार्य पूर्ण कर रहे हैं, जो भविष्य के लिए सनातनधर्म- जगत् के लिए ' महान-निधि ' होगा । आगामी पीढ़ी उससे महान् लाभ प्राप्त करेगी । हर एक इतना लेखनकार्य नहीं कर सकता; क्योंकि – ' कवि केवल मल मूल मलीना । पापपयोनिधि जनमन मीना । श्राजकल संसारमें प्राप - जैसे महान लेखक एक - दो ही हैं; अन्यथा अभाव ही है 1... वस्तुतः प्राप प्रश्नके किसी पहलू को नहीं छोड़ते, इसी कारण विपक्षीको दुबारा प्रश्न करनेका मौका ही नहीं मिलता ।... आपके तर्कों, प्रमाणों वा युक्तियोंका कोई जवाब नहीं आता । ( कृपाभिलाषी - रविकान्त शर्मा, हापुड़, जि ० मेरठ ) । ( १७ ) श्रीशास्त्रीजी महाराज, ' आलोक ' ( १० ) प्राप्त हुआ । पढ़ने में बड़ा ही आनन्द आता है । वेद - सम्वन्धी कठिन विषयोंको हृदयङ्गम करानेको आपकी लेखनशैली अनुपम है । ' सनातनधर्मालोक ' " शीघ्र पूर्ण हो – यह भगवान्से प्रार्थना है ।... पुस्तकालयाध्यक्ष पो ० सहसवान ( वदायू ं ) । ( १८ ) निखिलकल्याणगुणगणमण्डितानां विद्याबागीशादिविरुदावली-वलयितानां तत्रभवतां पं ० दीनानाथशास्त्रिमहोदयानां सन्निधौ मेदिनी-दोलायमानमौलिः, निजनिटिलतटचुम्बदञ्जलिपुटो विज्ञापयति -श्रीमद्भिः वी. पी. द्वारा प्रेषितानि ' आलोक ' ग्रन्थमाला - पुष्पाणि अष्टसंख्याकानि प्रष्टदिग्विभूषणानि मया अवतंसीकृतानि सन्ति । स्थालीपुलाक - न्यायेन तत्र तत्र समाघ्रातानि । भवन्तो नूनं निखिल-शास्त्राटवीसञ्चरणपञ्चानना एव । लेखनी तावत् पूर्वाचार्योपदिष्ट-

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सनातन धर्मालोक ३, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
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( त ) वैदिकमार्गान्न कुत्रापि परिस्खलिता भासते । आर्यसमाजी भवद्भिराजी ( युद्ध ) सुतरां शकलीकृतः, कुत्र वा स पलायित इति न ज्ञायते । अवश्य-श्लाघ्योऽयं श्रीमतां कृतिसमुदयो जगतः । सति धनाभावे, जागरूके जन्म भूमिपरिहाणपराभवे, समुल्लसति-शरीरदाढ्यंसङ्कोचे, उन्मिषति कार्यकलापकृतसमयाऽभावे, श्रीमन्तो वेद-मार्गप्रतिष्ठानकृते अकृतविलम्बा बद्धदीक्षा विराजन्ते । ' क्रियासिद्धिः सत्त्वे वसति महतां नोपकरणे '... कलिकल्मषविदूषितेषु एषु दिवसेषु धर्मप्रवाहः श्रुतिशिखराद्रमसाद् अधः प्रस्रवन् परिभासते, तथापि सर्वथा भगवान् करुणावरुणालयः श्रीजानकी - जानिर्भवद् - यत्नं सफलीकृत्य भवद्भयः सर्वविघशुमपरम्परां तनोतु इति तत्सन्निधौ प्रार्थये ।... तृतीयं पुष्पं समाप्तमिति कृत्वा श्रीमद्भिर्न प्रेषितमिति, परन्तु तदवेक्षणे नितरामुत्कण्ठा जागति ।

अन्ते निवेदयते-' निखिलमनोज्वरनिकरप्रशमन - हेतुस्तथाविधप्रसरः ।

श्रुतिशिखरिशिखरकोकिल - दीनानाथस्य जयतु यत्नोऽयम् ॥१ ॥

दीना श्रुतिरघुनेयं दीनानाथोसि रक्षणात् तस्याः ।

अभिधानं ते सार्थकमित्येवं घुष्यते विधानज्ञः ॥२ ॥

रत्नत्रयमिदमघुना कण्ठे भवतां समर्पितं जीयात् ।

सम्पत्कुमारविदुषा प्रीतिजुषा चामराजपुरजनुषा ॥३ ॥

भवदीय - सम्पत्कुमाराचार्यः । मैसूर [ आचार्यवर्यंने जो इसमें अपना संस्कृत - वैदुष्य सुप्रदर्शित किया है-हम चाहते थे कि इसकी हिन्दी कर दी जाती, परन्तु चाहते हुए भी समयाभाववश हम वैसा न कर सके । ] ( १ ९ ) ' थालोक ' ( १० ) देखकर बड़ी ही प्रसन्नता हुई । प तो सनातनधर्मके सूर्य हैं । अतः अज्ञानरूप अन्धकार भी दूर भाग जाता ( थं ) है । ' आलोक ' के पठनसे कोई भी शङ्का रह ही नहीं सकती । प्राप जिस प्रकार मन्त्रोंकी व्याख्या करते हैं, नास्तिकोंके पास कोई उत्तर देनेका आधार रह ही नहीं सकता । प्रभु आपको दीर्घायु प्रदान करें । ' सनातनधर्मी आपके सदा ही ऋणी रहेंगे । ( श्रीरामेश्वर शास्त्री प्रिंसिपल स. ध. महाविद्यालय, मारवाड़ - मूंडवा ) । . ( २० ) अयि विद्वत्तल्लजाः । श्रहं श्रीमल्लेखनी - प्रसूतविचारजात तर्कबलं, पाण्डित्यप्रकाण्डत्वं च वीक्ष्य नितान्तं प्रसीदामि, । भवादृशा विद्वांसोऽद्यत्वे अत्यर्थमपेक्ष्यन्ते । ( भवदीय - भगवतीप्रसाद देवशङ्कर-` पण्ड्या, गोपालकुञ्ज सोसायटी, अहमदाबाद ) 1 ( २१ ) ' आलोक ' के दशम - पुष्पको प्रतिदिन समय पाकर देखा ' करते हैं । उसकी प्रशंसामें कुछ कहना सूर्यको दीपक दिखाना केवल आकाँक्षा करते हैं कि- " आत्मस्वरूप प्रभु आपको है । समस्त विघ्न-दारणपूर्वक समस्त - सामग्री व्यवस्थाकी सुविधा दें । ( स्वामी ज्ञानानन्द-सरस्वती, संस्कृत कालेज, रायपुर ) । ( २२ ) ' इदं ' आलोक ' - दशमपुष्पमपि बहूपयोगित्वं दर्शयति विषयकाणामनेकेषां । गीता-प्रश्नानाँ समाधानं जातम् । बहुप्रशंसनीयो वर्तते भवदीय - प्रयासः ।... ( म. श्यामलालमिश्रः अ, टेन्सा हाईस्कूल ( सुन्दरगढ़ ) उड़ीसा | टेन्सा ( २३ ) श्रीमान् आदरणीय शास्त्री जी, ' आलोक ' ( १० ) देखा । मैं आरम्भ से ही स्थायी - ग्राहक हूं । इसलिए सभी ' अवलोकनका सौभाग्य प्राप्त हैं । परमात्मा पुष्पोंकें यथावत् ' आप सनातनधर्मकी आपको चिरायु करे, ताकि सेवा चिरकाल तक ऐसे पतनकाल में भी अधिक कर सकें । प्रश्नोंके सप्रमाण उत्तरोंको पढ़कर ऐसा विदितः परमात्माने आपको कुर्ताकियों होता है कि-- घराधामपर वा नास्तिकोंके मानमर्दन के लिए ही इस अपनी विभूतिरूपसे अवतीर्ण किया है । नहीं तो ऐसे