सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 521–530
सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 521–530
पृष्ठ 521
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
८१ ६८२ ] श्रीननातनधर्मालोकः ( ३-२ ) पालन उचित हुआ करता है, और करना भी चाहिये । यज्ञ - यागादि या भी हुआ करते थे । उस समय उनसे अवर्षण, प्रतियर्पण नसे, सूखा, बाढ़े आदि सब ठीक हो जाते थे । इवर सनातनधर्म मुक्तिका पथिक है । इस मुक्तिमें फिर इस लोकमें की वापिस नहीं आना पड़ता, जैसाकि - दयानन्दी लोग भ्रान्तिसे बताते हैं ॥ भी मुक्ति, कर्मके प्रभाव से होती है, और प्रभाव नित्य हुआ करता है; सो मुक्ति भी नित्य होती है । कर्मका अभाव निष्कामतासे हुआ करता है । था सुकमोंसे तो स्वर्ग मिलता है, मुक्ति नहीं । सो मुक्तिके नित्य होनेसे उस फिर उस जनताकेलिए भी अन्न समस्या नहीं रह जाती । हल इधर सनातनधर्म सन्ध्या, पाठ, पूजा, हवन - यज्ञादिका भी शिक्षक है, मक यह पहले कहा जा चुका है । इससे देवपूजा एवं देवताओंकी प्रसन्नता होती र है । इससे देवताओंके रूक्ष न रह जानेसे अवर्षण तथा प्रतिवर्षण न र होनेके कारण खेतीमें कमी नहीं रहती । रह यज्ञका घृत । अग्निद्वारा वह सूक्ष्मीकृत घृत दव की पहुंच जाने से उनकी रूक्षता हट जाती है । साथ देशकी वायुकी भी शुद्धि हो जाती यह क्षित स्वाहा वातेधाः ' ( यजुः माध्यं = २१ ) यी । धारण कहा है । पर आजकल तो दोनों हैं । पत्थरी कोयलेका ही हवन हुआ करता देवताओंका ग्रन्न होता है— प्रकाशमें पहुंचकर देवताओंमें इससे देवताओंकी प्रसन्नताके थी । क्योंकि-- ' इमं देवयज्ञ इस मन्त्र से यज्ञका वायुमें समय ( रोटी पकानेकेलिए ) है । इससे जो विषाक्त गैस पैदा होती है, वह जनताकी बड़ी हानि कर रही होती है । शुद्ध वायु न नसे मिलने से हृदयकी शुद्धि करनेवाले प्राणायामके ठीक न हो सकनेसे श्रथवा प्रातः सायं शुद्ध याज्ञिक - वायु न मिल सकनेसे उल्टा हृदयगति सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ६८३ अवरोधकी बीमारियाँ बढ़ जाती हैं । पर लगातार यज्ञादि होते रहने से अवर्षण तथा प्रतिवर्षणादिमूलक दोष हट जानेसे कृषि अच्छी हो जानेसे सूखा आदि न रहनेके कारण हमें तदर्थं विदेशोंका मुखापेक्षी भी नहीं रहना पड़ता था । इधर वेदानुसार ' वैश्वदेवी ' ( जिसमें ३३ करोड़ देवता रहते हैं ) एवं ' अघ्न्या ' गायकी पूजा होते रहनेसे गोवध हट जानेके कारण भी देवताओं की अप्रसन्नता नहीं रह पाती । तव अवर्षण तथा प्रतिवर्षणादि न होनेसे सूखा नहीं पड़ता, वा खेती नहीं मारी जाती । तब भारतीयों-केलिए वह खेती पर्याप्त हो जाती है । गायसे १०५ रोग हट जाते हैं । शेष है वार्तमानिक परिवार नियोजन न करनेसे जनताकी संख्या-वृद्धि हा जानेसे कृषि पूरी नहीं हो पाती; इसपर हम पहले ही प्रकाश डाल चुके हैं कि - सनातनधर्मसे नियमित व्रत - उपवासादिव्यवहार तथा दो समय भोजनादि करनेसे यह सभी समस्याएं हल हो जा सकती हैं । फिर जब प्रतिशयित वृद्धि हो जाती है; तव प्रकृति स्वयं बाढ़ोंसे, भूकम्पोंसे, नौका - दुर्घटना, सड़क दुर्घटना आदि तया युद्धों - महायुद्धोंसे, हृदयगति निरोध आदि बीमारियोंके फैलानेसे, तथा भूस्खलनादिसे जनसंख्याका बैलेन्स पूरा कर देती है । वल्कि परिवार नियोजनादि प्रकृति - विरुद्ध व्यवहार वर्तनेसे आजकल भी एक गर्भ में तीन - तीन चार - चार बच्चे पैदा हो जाते देखे जानेसे जनसंख्या और बढ़ जाया करती है । इस प्रकार सनातनधर्मविरुद्ध चलनेसे प्रकृति हमें दुष्फल देकर दण्डित करती रहती है । सनातनधर्म जहां अङ्गी परमपिता परमेशानकी सन्ध्या और यज्ञ-
पृष्ठ 522
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६८४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ६८५ ६८६ हवनादि द्वारा अङ्गभूत - देवताओं के माध्यम से उपासना करके उसे प्रसन्न रखता है, वहां माता प्रकृतिदेवीको भी मूर्तिपूजा आदि करके उसे प्रसन्न रखता है । इससे जनताको माता - पिता दोनोंका श्राशीर्वाद प्राप्त हो जाता है । बहुत सन्तानों में कारण डाल्डा आदि उष्ण एवं राजस-पदार्थ भी होते हैं, उनके सेवनसे भी बहुत उत्पत्तियां हुआ करती हैं । यदि परमात्मा तथा उनके प्रङ्ग देवताओंको उनके अनिष्ट गोवधको सर्वथा बन्द कर दिया जावे; और गायोंके चारे, बिनौला, खली - भूषा आदिका प्रबन्ध कर दिया जावे, जोकि -सम्भवी हो सकता है, तो भारतमें गो-दुग्धकी नदियां बहें; और गोघृत आदि भी प्रचुरमात्रामें उपलब्ध हा सकेँ । तब इनके प्रयोगसे उत्पत्ति संख्या भी सीमामें रहे; और ' परिवार-नियोजनादि ' भी जो अवैध एवं खर्चीले तथा हिन्दुस्थानकेलिए हानिप्रद व्यवहार चालू रखे जा रहे हैं; इन्हें स्वयं ही बन्द किया जा सके । सो गोवध बन्द करना जिसे सनातनधर्म बहुत समयसे चाहता आ रहा है; जिसकेलिए आज भी प्रबल प्रयत्न किये जा रहे हैं, जिसकेलिए हमारे सनातनधर्मी बड़े नेता अनन्तश्री जगद्गुरु शङ्कराचार्य, पुरी-पीठाधीश्वर स्वामी श्रीनिरञ्जनदेव तीर्थजी महाराजने गोरक्षार्थं प्राण-पणकी बाजी भी लगा दी थी, जोकि आज भी वेदादिमें गोवध आदि माननेवालोंसे, तथा वार्तमानिक परिवार नियोजनादिके पक्षपातियोंसे शास्त्रार्थं केलिए भी सतत सन्नद्ध रहते हैं । पूर्वं कहे हुए गोरक्षणादिके-लिए ही श्रद्धेय श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज तथा जगद्गुरु-शङ्कराचार्य श्रीकृष्णबोघाश्रमजी महाराज एवं शास्त्रार्थ महारथी श्रीमाधवाचार्य शास्त्रीजी महाराज भी तथा अन्य नेता भी बहुत समय से सत्याग्रहमें जुटे हुए हैं । आर्यसमाज तथा जैनसमाज भी इसकेलिए अपने सहयोग दे रहे हैं । राजकीय पुरुषोंको इधर अवश्य ध्यान देना चाहिये । द्वीप इससे उनकी भी देशहितैषिता सुप्रसिद्ध होगी । और उन्हें वार्तमानिक को अ ' परिवार नियोजन ' भी बन्द करने पड़े गे । अपने गोवधमें कारण कुछ हिन्दु - जनता भी है; जो दूसरोंकी देखादेखी स्तथा भैंस के दूध लोभसे गायका दूध नहीं लेती, तब वे गौएं कसाइयोंके साधुन जिसम हाथमें जा पड़ती हैं; और उनका वध हो जाता है । अच्छे केवल हिन्दुयोंमें उक्त परिवार नियोजन लागू करनेसे भारतमें विद्रोही -भारतकी प्राण और भारतीयधर्म में श्रद्धालु - हिन्दु जनता अल्पसंख्यक हो न नीि जावेगी । दूसरी अहिन्दु - जातियां, जो हिन्दुस्थानमें रहकर भी हिन्दुस्थानसे करना ` शत्रुता कर रही हैं; अपने देशोंके यहाँ बननेके स्वप्न देख रही हैं — बढ़ हि जावेंगी और बढ़ती रहेंगी । यह प्राचीन हिन्दुजातिको मारनेका एक ( छलिय गुप्त प्रबल - षड्यन्त्र है । फिर हम अपनी सुरक्षा कभी नहीं कर सकेंगे । होता ) जब अन्य विदेशी जातियोंके अरब - तुर्की, मिस्र आदि देश बने हुए हैं, प्रविश्य इस प्रकार हिन्दुओं का भी अपना देश ' हिन्दुस्थान ' बना हुआ है । तब ( किरात उसमें उसकी विरोधी जातियां क्यों रहें - यह विचारनेकी बात है । सो इस वार्तमानिक ' परिवार नियोजन ' का ' सर्वतोभावेन विरोध ' मायामय समाचरे करना चाहिये । शेष रह जाता है कि हमारी संख्या बढ़ जानेसे और १३०० खेतकी कमी से फिर हमारा क्या बनेगा; यह प्रश्न; सो इस विषय में मलयपर्व हम पहले सम्यक् प्रकाश डाल चुके हैं कि हमें दो बार भोजनका नियम नं. ११ बनाना चाहिये । व्रत - उपवासादि एकादशी यादिमें नियमित करने ` चाहियें । हमारे भारतमें रहनेवाले भारत - विद्रोही सम्प्रदायोंको उन - उनके रवि
पृष्ठ 523
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६८६ ] श्रीसनातनधर्मालोक ६५ ( ३-२ ) अपने देशोंमें पहुंचानेका प्रयत्न करना चाहिये नए द्वीप तथा; जैसे कि --युगांडा और फिजी-1 लङ्का, वर्मा आदि इसमें प्रत्यक्ष उदाहरण को अपने - अपने देशोंसे हैं । यह भारतीयों-नक हटा रहे हैं; फिर हमें भी बलवान् अपने सिद्धान्तमें पक्का रहकर वनकर एवं ' यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यः, तस्मिं--बी स्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्यः साधुना प्रत्युपेय: ' ( महाभारत शान्तिपर्व १०६।३० साध्वाचारः के ) | ( जो मनुष्य जिसमें जैसा व्यवहार करता है; उसमें वैसा व्यवहार करना अच्छे व्यवहारवाले धर्म है । के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिये । मायावी नमें विद्रोही के साथ मायामय व्यवहार करना चाहिये । प्रार्जवं न नीति: ' ( नैषधीयचरित हि कुटिलेषु ५ १०३ ) ( कुटिलोंके साथ सरल व्यवहार
से करना नीति नहीं होती ) । ' निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः ॥
नहि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या, पापमुच्यते ' ( महा: वन. ५२।२२ ) एक ( छलियों को छल से मारना चाहिये । छलीका छलसे मारनेका हमें पाप ΓΙ नहीं होता ) । ' व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः । हैं, प्रविश्य हि घ्नन्ति शठाः तथाविधान् असंवृताङ्गान्निशिता इवेषवः " " नव ( किरातार्जुनीय ११३० ) ( वे मूर्ख हार जाते हैं, जो मायावियों के साथ मायामय व्यवहार नहीं करते ) । ' य: छद्मचारी भवति तेन छद्म र समाचरेत् । अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते ' ( शुक्रनीति, ४ । नमें १३०० ) । ' मायावी मायया वध्यः सत्यमेतद् युधिष्ठिर! ' ( महाभारत नम शल्यपर्व ३१।६ ) ‘ मायाभिरिन्द्र! मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः ' ( ऋ. र - १।११।७ ) ( ऐ इन्द्र! तुमने मायावी शुष्ण - दैत्यको मायासे ही के पार किया, अर्थात् उसे समाप्त किया । ' शठे शाठ्यं समाचरेत् ” सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक दिकी वैदिक - नीति क्यों नहीं अपनानी चाहिये ? भारत केवल भारतीयोंका है, और भारतीय धर्म इसमें आस्था न रखनेवाली, बल्कि इसकी विद्रोही उनके अपने - अपने देशोंका रास्ता दिखलाना चाहिये [ ६८७ माननेवालोंका है । विदेशी जातियों को । जो हमारे देशमें रहेंगी, और पलेंगी, फिर यदि वे ही हमारे इस हिन्दुस्थानके विच्वंसमें तत्पर रहें; और इस देश वा देशके धर्मसे विद्रोह करें; और हम केवल अपने वोटोंकी खातिर उन्हें पाल - पोसें, और उन्हें यहां रखें और बसावें ; तो यह बड़ी मारी आत्म - विघातक आत्म - विडम्बना होगी । फिर यही विधर्मी जातियां आप लोगोंको वोट न देकर अपने ही जात - माइयोंको बोट दिया करेंगी, यह हमारी बात राजकीय - पुरुषोंको कभी नहीं भुलाती चाहिये; आजकल कभी - कभी समाचार - पत्रोंमें भी ऐसी खबरें दीखनी रहती हैं । तव भी हानि हमारे देशकी ही होगी । ' हिन्दुस्थान हिन्दुओंका है यह नारा हमें कभी नही भुलाना चाहिये । उन जातियोंको हम अपने भारतका कुछ अङ्ग काटकर और स्वयं वहाँसे निकल कर उन्हें एक ' स्तान ' दे चुके; तब उनका यहाँ रखना और उनकी संख्यावृद्धिमें योगदान देना युक्तियुक्त नहीं लगता । उन्हीके कारण हिन्दुयोंकी वृत्तिमें भी हानि पड़ रही है । अतएव अभारतीय जातियोंको उसी हमसे पृथक् दिये हुए ' स्तान ' में वा अपने मूल देशमें भेज दिया जाना ही न्याय्य तया श्रेयस्कर होगा । यह विश्ववित है कि यह सारा जम्बुद्वीप ( एशिया ) कभी सारा भारतवर्ष ही था । सारा हिन्दुस्थान ही था । धीरे - धीरे सनातनधर्म लोप होते जानेसे वे लोग हमसे पृथक् होते चले गये; और हम चुप्पी
पृष्ठ 524
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
== ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) धारण करते चले गये; वे लोग फिर अपनी संख्या बढ़ाकर अपने पृथक् देश खड़े करते गये; और हम उसका उपाय न करके स्वयं पीछे हटते चले गये; और स्वयं सीमित होते गये । पर यदि हम न संभले; तो हम इस बचे - खुचे देशसे भी हाथ धो बैठेंगे; और अपनी बची - खुची अपनी संख्यासे भी हाथ धो बैठेंगे । प्राशा है— भारतीय जनता अपनी दूदशिता से अपनी विचार - दृष्टि बढ़ायेगी, पहले ' हिन्दुकोड ' हिन्दुग्रोंकेलिए कोढ़ था ही; अब इस ' परिवार नियोजन ' ने भी हिन्दु जनतापर प्रच्छन्न आक्रमण कर रखा है । आशा है - हिन्दु - जनता अब इस ' परिवार नियोजन ' को विध्वस्त करेगी, जिससे हम इस देशमें स्वयम् ' अल्प संख्यक होकर कहीं इस देशके विध्वंसमें स्वयं ही सहयोगी न वनें । एवमस्तु । ध्यान देने योग्य बातें गोदुग्धसे राजयक्ष्मा आदि १०५ रोग शान्त हो जाते हैं । आजकल की पंचवर्षीय योजनाओंसे यान्त्रिकता बढ़ी है । परिणाममें गोवध बढ़ा, और कल्पनातीत मूल्यवृद्धि एवं मंहगाई, बेकारी आदि आपत्तियां जनताके सिरपर सवार हो गई । लोहा, फौलाद, सीमेंट आदिको बढ़ाकर देशके आर्थिक ढांचेके स्थान देशको जर्जर स्थितिमें पहुंचाया गया है । गोबरकी खादसे, पहले १०० मन प्रति एकड़ फसल काटी जाती थी । अबकी दशा सबके सामने है । हड्डी- चमड़ा आदि प्राप्त करनेकेलिए गोवध तो अनावश्यक ही है । वह तो स्वाभाविक मृत्युसे मरनेवाले पशुप्रोंसे भी प्राप्त हो सकते हैं । गोवधसे तो उल्टा उन गायोंका गोवर मिलना बन्द हो जानेसे कृषिकी कमी जनताको हानिप्रद सिद्ध हो जाती है । यदि गोवध न हो; तो वार्तमानिक ' परिवार नियोजन ' की श्रावश्यकता भी नहीं रह जाती । जितनी कृषि वड़ेगी; गायका चारा भी उतनी मात्रामें बढ़ेगा । क्या जनताकी वृद्धि पहले नहीं होती थी, क्या वह केवल आजकल ही हो रही है? अतः व्यर्थकी बातें छोड़कर पहलेका युग लाना होगा । पंचदेव - स्तवनम् I εse ६६० ' मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते ' थोड़े से ( जिन शास्त्रोंकी आदिमें भी मङ्गल हो, मध्यमें भी मङ्गल हो, अन्तमें भी मङ्गल हो; वे शास्त्र विस्तीर्ण अथवा सुप्रसिद्ध हो जाते हैं ) ( आबन महाभाष्यकारके इस वचन के अनुसार हम अन्तमें भी मङ्गलाचरण नमस्कार करते हैं । सनातनधर्ममें पांच देव सुप्रसिद्ध हैं - १. श्रीगणेश, २. श्री-महादेव, ३. श्रीकृष्ण, ४. श्रीदेवी, ५. श्रीसूर्य । इनमें अन्य सभी देवोंका भी समावेश हो जाता है । उनके स्तुतिपद्य पाठकों के लाभार्थ हम अर्थ समेत उद्धृत करते हैं--पञ्चदेव - स्तवनम् ( १ ) श्रीगणेशः श्रानन्दमात्र मकरन्दमनन्तगन्धं योगीन्द्रसुस्थिर मिलिन्दमपास्तन्धम् वेदान्तसूर्यकिरणैक - विकासशीलं पाद शरदम्बुजमानतोऽस्मि जिसका निरन्तर । प्रदान क ॥ ( आनन्दमात्र रसवाले, अनन्त गन्धसे युक्त, योगीन्द्ररूप सुस्थिर-भ्रमरोंसे युक्त, बन्धन से रहित, वेदान्तरूप सूर्थकी किरणोंसे विकासशील, गजानन श्रीगणेशजी के चरणकमलोंको नमस्कार करता हूं ) । ( २ ) श्रीमहादेवः यस्याहुरागमविदः परिपूर्णशक्ते-रंगे कियत्यपि निविष्टममुं प्रपञ्चम् । पञ्चानन तस्मै तमाल रुचि भासुरकन्घराय भूषण, श्रीपार्वती सहचराय नमः शिवाय ॥ दिया ), ( वेदादिशास्त्र के ज्ञाता, परिपूर्ण शक्तिवाले जिस भगवान् करे ) 1
पृष्ठ 525
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६० ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) थोड़ेसे श्रंशमें इस समस्त प्रपञ्चको संनिविष्ट मानते हैं, उस तमाल-हो, ( आबनूस ) की तरह नीले गले वाले, श्रीपार्वतीके सहचर श्रीशङ्करको हैं ) नमस्कार हो ) । चरण - श्री-( ३ ) श्रीकृष्णः सभी भार्थ उद्घाटय योगकलया हृदयान्जकोशं धन्यश्चिरादपि यथारुचि गृह्यमाणः । यः प्रस्फुरत्यविरतं परिपूर्णरूप: श्रेयः स मे दिशतु शाश्वतिकं मुकुन्दः ॥ ( योगकी कलासे हृदय - कमलके कोशका विकाश करके धन्य लोग जिसका चिरकाल तक यथारुचि चिन्तन करते हैं, जो परिपूर्ण रूपसे निरन्तर प्रस्फुरित होते हैं, वे मुकुन्द श्रीकृष्ण मुझे नित्य सुख ( मुक्ति ) -प्रदान करें ) । स्थिर-शील, ( छः ( ४ ) श्रीदेवी श्रुत्वा षडाननजनुमुदितान्तरेण पञ्चाननेन सहसा चतुराननाय । शालचर्म - भुजगाभरणं समस्य दत्तं निशम्य गिरिजाहसितं पुनातु ॥ मुखवाले - श्रीकार्तिकेयका जन्म- समाचार सुन प्रसन्न - चित्तवाले पञ्चानन - महादेवजीने, चतुर्मुख ब्रह्माजीको सिंहचर्मरूप वस्त्र, सर्परूप भूषण, भस्मरूप - पाउडरका दान कर दिया ( अर्थात् अपना सर्वस्व दे दिया ), यह सुनकर हुआ हुआ श्रीदुर्गाका हास्य आप लोगोंकी रक्षा वाके करे ) 1 पञ्चदेव - स्तवनम् [ eet ( ५ ) श्रीसूर्यः ब्रह्माण्डसम्पुटकलेवरमव्यत चैतन्यपिण्डमिव मण्डलमस्ति यस्य । आलोकितोपि दुरितानि निहन्ति यस्तं मार्तण्डमादिपुरुषं प्रणमामि नित्यम् ॥ ( ब्रह्माण्डके मध्य में रहनेवाला, चेतनपिण्डरूप जिसका मण्डल है । जो दर्शनमात्र से ही हमारे पापों को दूर करता है, ऐसे आदिदेव, हमारी सन्ध्यामें उपास्य भगवान् - सूर्यनारायणको में नमस्कार करता हूं ) । अथ नेत्रोपनिषद् | ॐ चक्षुश्चक्षुस्तेजः स्थिरीभव २ । मां पाहि २ । चक्षूरोगान्मे शमय २ । मम जातरूपं तेजी दर्शय २ । यथाहमन्धो न स्यां तथा कृपय २ । कल्याणं कुरु २ । यानि मम पूर्वजन्मो पार्जितानि चक्षुष्प्रति-रोघकानि दुष्कृतानि तानि सर्वाणि निर्मूलय २ । नमश्चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय मास्करायादित्याय । नमः करुणाकराय दिव्यायामृताय । ॐ नमो भगवते सूर्यालायतेजसे नमः । खेचराव नमः । महते नमः, रजसे नमः, तमसे नमः । असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्माममृतं गमय । यो भगवान् शुचिरूपः, हंसो भगवान्हंसरूपः । य इमां चक्षुष्मत विद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते, न तस्याक्षिरोगो भवति, न च तस्य कुलेन्वो भवति । प्रष्टो ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भविष्यति । ओं नमो विश्वरूपं घृणिनं जातवेदसं हिरण्मयं ज्योतीरूपं तपन्तं । महत्त्ररश्मिभिः चतथा वर्तमानः प्राणाः पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः स्वाहा । ॐ नमे भगवते आदित्यायाहोवाहनाय स्वाहा । इति । ( इसके नत्यिक पाठसे दृष्टि ठीक रहती है । )
पृष्ठ 526
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आवश्यक सूचना ' आलोक ' पाठकोंको ज्ञात होना चाहिये कि आजकलके ' लार्ड-थ भकाले ' के मानसिक दास वेदमन्त्रोंका अर्थ तोड़ - मोड़कर नये जमानेका किया करते हैं । परन्तु कोई भी भाषा हो; उसके शब्दोंका अर्थं उसीमें न सन्निविष्ट रहता है । उन शब्दों में गलत अध्याहार करके, और उन-शब्दोंका अर्दन - विमर्दन करके उन्हें अर्वाचीन अपने सम्प्रदायके तथा वर्तमान युग के अनुकूल बनाना कथमपि युक्त नहीं हो सकता । हमने ' आलोक ' के भ्रष्टग- पुष्पमें इन अर्वाचीनोंसे की जाती हुई ' वेदमन्त्रार्थं -हत्या ' का दिग्दर्शन कराया है । जनताके संस्कृत - शिक्षित न होनेका यह लोग अनुचित लाभ उठा रहे होते हैं । इससे अर्थका अनर्थ हो जाता है, जिसमें वे शुर होते हैं । ' शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्मृतिहेतवः ' ( शब्दके अर्थमें संशय उपस्थित होनेपर ' संयोगो विप्रयोगश्च ' यह संयोगादि f जिनका वर्णन हमने ' आलोक ' के अष्टम सुमनमें किया है - अर्थके f निर्णायक हुआ करते हैं । यदि इनका प्रयोग न किया जावे; तो ' संस्कृत मोमकी नाक है ' यह लोक प्रवाद उपस्थित जाया करता है । हमने भरसक यत्न किया है कि- प्रतिपक्षियोंकी यह दुष्प्रकृति वा दुश्चेष्टा सफल न हो । यह लोग उन शब्दोंको जिनसे इनके पक्षकी हानि हो रही होती है, छिपा लिया करते हैं, वा उनका अर्थ ही नहीं करते । इन अर्वाचीन लोगोंका यथासम्भव पर्दाफाश करनेकेलिए ही हमने ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला जारी कर रखी है । आशा है- जनता इधर अवहित होगी; और इन लोगोंके गलत हथकण्डों में न फंसकर हमसे दिखाई हुई वास्तविक दिशामें चलनेकी सही प्रवृत्ति करेगी । उसकेलिए यह आवश्यक है कि हमारी ' आलोक ' ग्रन्थमाला ले; और उसका एक - एक अक्षर ध्यानसे पढ़े । और उसकी सहायता करनेमें २ सहयोग दे । श्रव उसका ११ वाँ पुष्प छप रहा है । f निवेदक-' श्रीसनातनधर्मालोक ' प्रणेता ' सारस्वत '
पृष्ठ 527
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 528
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 529
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।
पृष्ठ 530
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।