सनातन धर्मालोक ३ — पृष्ठ 511–520

सनातन धर्मालोक ३ · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

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१ ६६२ ] श्रीसनातन धर्मालोकः ( ३-२ ) I, गुणकर्मविभागशः ' प्रतिपक्षियोंसे दिये जाते हुए इस गीता वचन विचार करके, अन्त में पौराणिक घटनाए समाचारपत्रोंसे पर भी जिज्ञासुओं के लिए अत्यन्त उपकारक दी गई हैं । यह पुस्तक है । इसे जल्दी खरीद लॅ क्योंकि यह संस्करण शीघ्र समाप्त होनेवाला है । सजिल्द; ७ वीं पुष्प — इसमें पौराणिक चरित्र - पर्यालोचन तथा मूल्य १६ ) ' पुराण - परिचय'-का परिचय विस्तीर्ण रूपसे बताकर, एक पूर्वपक्षीके पुराण विषयक श्रंनेकों-प्रश्नों के सर्वाङ्गीण उत्तर देकर फिर अवतार - सम्बन्धी १६ कुतर्कोको ये काटकर, विविध - श्राक्षेपोंके प्रत्युत्तर दिये गये हैं । इसके वाद ' क्या गणेश तथा रुद्र अग्नि हैं; इसपर विचार करके, सत्यनारायणव्रत - कथा पर किये ) जाते हुए आक्षेपोंपर प्रत्युत्तर देकर, श्रीसीता - रामकी वैवाहिक - प्रायु तथा T द्रौपदीका एक पति था, या पांच; श्रीव्यासजीको उत्पत्ति इन पर विस्तीर्ण T- विचार भी दिया गया है । वेदचर्चा में वेदस्वरूपनिरूपण बताते हुए ' वेद-- संज्ञाविमर्श ' की चुनौतीका उत्तर तथा नीरक्षीरविवेक श्रादिपर लिखा गया ल है । इस एक ही पुस्तकसे आपको पुराणोंके सम्बन्धमें पचासों प्रश्नोंका ना. समाधान प्राप्त होगा । अन्तमें पुराणोंको सिद्ध करनेवाली प्रत्यक्ष घटनाएं में भी दिखाई गई हैं । यह १००० पृष्ठोंमें छपी पुस्तक सभी के लिए संग्राह्य र है । इसे भी शीघ्र खरीद लें; क्योंकि यह संस्करण शीघ्र समाप्त f होनेवाला है । मूल्य १६ ) का दम पुष्प - इसमें ' वेदस्वरूपनिरूपण, स्त्री - शूद्रोंका वेदाविकारविचार, से क्या वैदमें केवलं योगिकता है, वेदार्थके साधन, क्या गीता वेदखण्डक है, के वेदमन्त्रार्थ - हत्याका दिग्दर्शन ' आदि विषयोंपर विस्तीर्ण विचार रखकर य वर्णव्यवस्थाके सम्बन्धमें दिये जाने वाले सब प्रमाणोंपर आलोचना या देकर, क्या गुणकर्मानुसार वर्णव्यवस्था चल सकती है - यह दिखलाकर पर आर्यसमाजका श्राद्ध एवं यमराज, नियोगमें मैथुन होता है, या नहीं, क्या ष्टं सायणाचार्य विधवा विवाह मानते थे- यह स्पष्ट करके नियोग वा विधवा-विवाहपर दिये जाते हुए सभी प्रसिद्ध मन्त्रोंपर समाधान करके, यमयमी-ग्रन्थमालाका परिचय { esa सूक्त, ' क्लीवे च पतितपती ' में ' पती ' है या ' अपती ' यह तलाकपर भी विचार दिखलाया गया है । परिशिष्टमें दिखलाकर, तथा ' नमस्ते ' पर विचार करके प्रत्यक्ष घटनाएं अष्टग्रहीयोगपर ८०० से अधिक पृष्ठकी सजिल्द भी दिखलाई गई हैं । एवं सुन्दर, शास्त्राथियोंके लिए उपयोगी उत्तम पुस्तकका मूल्य १२ ) ५० पैसे है । हम पुष्प - इसमें ' इतिहासचर्चा में ' हनुमानादि वानर थे, वा नर? ' श्रीसीतारामकी वैवाहिक अवस्था, प्रकरणवश कन्या विवाहावस्था कर्म गर्भाधानका श्रृङ्ग है, या विवाहका? ' एक वैदिक, चतुर्थी-आदि, कण्टकशोधनमें अनेक विषय - विवाहका रहस्य ' , पुराणेतिहासचर्चा में पुराणोंपर किये जाते हुए प्रक्षेपोंका प्रत्युत्तर, वेदचर्चा में वेदोंकी प्रदक्षरसंख्या, श्रालोचना-स्तम्भमें कई प्रक्षेपक ट्रैक्टोंपर विचार, सैद्धान्तिक चर्चा में साम्यवादपर एक उत्तम हास्यापादक संवाद तथा पर्वतोंके पंख, और परिक्षिष्टमे पौराणिक घटनाएं वर्णित हैं । एक सहस्र पृष्ठके इस पुष्पमें बहुत से सन्देह दूर कर दिये गये हैं । आज ही इसका श्रार्डर भेजिये । बहुत सुन्दर पुस्तक है । १० म पुष्प - यह पुष्प कुछ समय हो चुका, प्रकाशित हुआ मुल्य है । १६ इसमें ) श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीता पर प्रतिपक्षियोंकी ओरसे जो प्राक्षेप किये जाते हैं, इस विषयको चार पुस्तकों पर विचार दिया गया है । वेद-विषयमें निरुक्तके श्राधारसे विचार करके श्रागे वेदका वास्तविकस्वरूप बताया गया है । इसमें ' दयानन्द सिद्धान्त- प्रकाश ' के तर्कों पर भी सम्यक् ' विचार दिया गया है । ' भारतीय नारी ' पर सुधारकों द्वारा किये जाते हुए आक्षेपोंपर विचार करके पुराण- इतिहान में जो असम्भव बातें बताई जाती हैं; उनपर भी विचार किया गया है । एक बीने ' गो ० • तुलसीदासजीकी ' ब्राह्मणशाही ' दिखलाकर उसे प्रक्षिप्त किया था, " उसका भी मुह - तोड़ उत्तर दिया गया है । फिर सामाजिक-चर्चा में स्त्रियोंकी पर्दा प्रथा पर वेदशास्त्रोंका क्या अभिमत है - यह भी.

पृष्ठ 512

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६६४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ )... बताया गया है । ग्रन्तमें द्विज और शूद्रका भेद वैदिक, साम्यवादके प्रमाणों पर विचार तथा शिवलिङ्गके विषयमें भ्रमोच्छेद करके पुस्तक १०४० पृष्ठों में समाप्त कर दी गई है । इस पुस्तक में लोगों की ज्ञानवर्धक-सामग्री प्रचुर मात्रा में आई है । इसे खरीदकर जनताको अपनी ज्ञान-पिपासा शान्त कर लेनी चाहिये । कागज बहुत सुन्दर और पृष्ठ संख्या १०४० से अधिक रखी गई है । मूल्य १६ ) ११ वीं पुष्प – इसमें गोचर्चा ' में ' क्या प्राचीन भारत में गोवध वा गोमांस चालू था- इस विषयपर ११७ पृष्ठों में विचार करके, ' सैद्धान्तिक-चर्चा ' में ' कर्मणा वर्णव्यवस्थामें हानि, क्या सत्यकाम जाबाल वेश्यापुत्र था '? इस विषय में ५० पृष्ठों में पूर्व - पक्षियोंके कुतर्कोौका खण्डन करके उसे ब्राह्मण - पुत्र सिद्ध किया गया है । कवष ऐलूष, मतङ्ग, कक्षीवान्, जानश्रुति, विश्वामित्र, गणिका पुत्र वसिष्ठ, महिदास, सूत आदिकी प्रब्राह्मणताका निराकरण करकें, " क्या वेदादिमें देवोंका अर्थ परमात्मा है, इसपर विचार करके, श्राद्धमें मुख्य शङ्कायोंका उत्तर देकर, ' इतिहास-चर्चा ' में दमयन्ती, दिव्या श्रादिके पुनर्विवाहपर विचार किया गया है । फिर ' पुराणचर्चा ' में बहुत - सी प्राशङ्कानोंका प्रत्युत्तर देकर, देवताओं में बहुरूपताकी शक्ति, ऋषि - मुनियोंका भविष्य - ज्ञान सिद्ध करके, फिर भूत-प्रतादिकी सिद्धि, कण्टक - शोधन, वेदचर्चा श्रादिपर विचार किया गया है । यह शीघ्र छपनेवाला है । मूल्य १६ ) रु ०. याज ही सहायता - द्रव्य ग्रन्थकार ( प ० दीनानाथ शास्त्री ) के नाम एवं पतेसे शीघ्रतासे भेजना शुरू कर दें; जिससे ग्रन्थमाला चलती रहे; क्योंकि ‘ माल । ’ के पास स्थायी कोष नहीं है । इन पुष्पों को शीघ्र मंगाकर अपना सेट पूरा कर लें । आप जो भी चाहें, पुष्प वी. पी. द्वारा मंगा सकते हैं । डाक व्यय पृथक होगा । विदेशों में भारतीय मूल्यसे ४ ) रु ० अधिक मूल्य होगा 1 सभी पुष्प इकट्ठे लेने पर १०० ) में दिये जायेंगे । ग्रन्थमालाका परिचय [ ६६५ डाकव्यय ८ ) का श्राघा ४ ) रु ० लिया जावेगा । पर जो पुस्तकें आलोक दुष्प्राप्य होंगी; उनको भेजना हमारे लिए सम्भव नहीं होगा । उनका मूल्य काट दिया जावेगा । ' आलोक ' के पुष्पोंका महगाई के कारण यही मूल्य लिया जावेगा, पुराना मूल्य नहीं । सहायताद्रव्यं ग्रन्थकार ( पं ० दीनानाथ शास्त्री ) के नामसे फर्स्ट [ बी. १६, लाजपतनगर ( नई दिल्ली -२४ ) के पतेसे मनीआर्डर वा चैक- है; तथ -द्वारा भेजा जा सकता है । चेकमें जो रकम कटेगी; उसे भी बीच में परिशिष जमा कर दें । मनोयोग इस वि [ ध्यान दे ] " - रूपमें य [ यह पुष्प पूरा छप चुका था अचानक वार्तमानिक ' परिवार-आ ' नियोजन ' की आलोचनाकेलिए मुझे बम्बईसे जगुः पुरीपीठाधीश्वर यदि प ' महाराज द्वारा बुलावा आया था । पर मैं दुर्बलतावश श्रव दूर जानेका उसके लि " नहीं रहा हूं, अतः उक्त निबन्ध इसी पुष्पके द्वितीय परिशिष्ट में संलग्न " कर दिया गया है । पाठकोंको इसपर विचारका अवसर प्राप्त हो बतन्दा ' जायगा । " जो इसे पृथक् छपवाना चाहें; वे हमें यदि खर्च भेज दें; तो पुत्रान् • हम इस निबन्धको प्रचारित करनेके विचारसे पृथक् ' आलोक ' ' प्रणेता ] पुस्तकोंके मंगाने वा पत्रव्यवहारका पता मारनेव भी छपवा देंगे । दुर्बल मौज उ पाठ प -श्रीनारायणशर्मा शास्त्री एम. ए., बी. एड, य ( ' आलोक ' ग्रन्थमाला कायालय ) यहाँ व फर्स्ट बी ० १ ९ लाजपतनगर,. ह ( नई दिल्ली -२४ ) वैदिक नहीं है

पृष्ठ 513

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-६५ तकें आलोक ' ( ३-२ ) का दूसरा परिशिष्ट TIL " सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक " रण ( शुद्ध धार्मिक दृष्टिकोण ) फर्स्ट [ यद्यपि ' आलोक ' के तृतीय पुष्पका द्वितीय संस्करण पूरा छप चुका बैंक- है; तथापि उसमें वर्तमान ' परिवार नियोजन ' निबन्ध भी द्वितीय-चमें परिशिष्टके रूपमें संलग्न किया जा रहा है । ' आलोक ' पाठकगुण इसे मनोयोग से देखें । यद्यपि यह इस पुष्पका विषय तो नहीं है; तथापि इस विषयकी माँग हमारे पास आई थी; अतः इसे द्वितीय परिशिष्ट-- रूपमें यहाँ संलग्न किया जा रहा है । ] बार- आजकल परिवार नियोजन ' की बड़ी चर्चा है, कहा जाता है— वर यदि परिवार नियोजन नहीं होगा; तो जनता बढ़ती चली जाती । नेका उसकेलिए भारतीय गेहूं पूरा नहीं पड़ेगा तब हमें विदेशमुखापेक्षी लग्न बनना पड़ेगा । इसमें सारी गड़बड़ीका मूलकारण वेद है; जो ' दशास्यां हो पुत्रान् आधेहि ' का नाद गुंजाकर जनताको असंयमका तथा भूखों-तो मारनेका पाठ नियमतः पढ़ा रहा है । फिर यह ' गोरक्षा ' बताकर हमें देंगे । दुर्बल करनेवाले, पतले गोदुग्धका प्रचार करके, भैंसका दूध पीकर बलवान बने हुए विदेशियोंसे हमें पिटवाना चाहता है, और फिर ' खाओ, पीवो, मौज उडांवों ' का पाठ भुलवाकर, हमें कष्टप्रद व्रत - उपवासादि रखनेका पाठ पढ़ाकर हमें कुत्सित जीवन विताने को बाध्य करता है । " यह है आजकलके दृष्टिकोणका प्रतिबिम्ब, जिसपुर, आज हमें यहाँ विचार करना है । हमारा सनातनधर्म श्रौत -स्कार्त धर्म होनेसे ' वैदिकधर्म ' भी है । वैदिकधर्म शाश्वत धर्म है । यह कालानुकूल व्यवस्थापित संकुचित - धर्म नहीं है, किन्तु सदाकेलिए नियत - चाहे परमार्थवाद हो, चाहे व्यवहारवाद, सनातनधर्म हो सच्चा परिवार नियोजक [ २६७ उसमें खरा उतरनेवाला यही धर्म है । वेदमें लिखा है- ' दशाऽस्यां पुत्रान् श्रवेहि, पतिमेकादशं कृषि ' ( ऋसं. २०१८५२४५ ) इसमें १ पति तथा अधिक से अधिक J दस पुत्र कहे गये हैं । श्रुति तथा स्मृतिका निष्कर्ष यह है कि - प्राथम चार होते हैं - १. ब्रह्मचर्य, २. गृहस्थ, ३. वानप्रस्थ एवं ४. संन्यास । सनातनधर्म श्रीत - स्मात धर्म माना जाता है । सो वह संयमका उपदेश देता है । अतः चार ग्राश्रमोंमें वेद द्वारा केवल एक आश्रम-गृहस्थकेलिए एक पति तथा अधिक से अधिक १० पुत्रोंका विधान है । शेष तीन आश्रमों के लिए वेद संयम हो अनुशिष्ट करता है । ' शतायुर्वे पुरुषः ' ' जीवेम शरदः शतम् ' आदि वेदके उद्घोषक अनुसार १०० वर्षकी सामान्य आयु होनेसे और उसमें चार आश्रम होनेसे, प्रत्येक आश्रम प्रायः २५ वर्षका सिद्ध होता है । केवल गृहस्थाश्रममें २५ वर्षमें १० पुत्र कहनेसे ढाई - ढाई वर्षमें एक पुत्र सिद्ध होता है । यह कोई अधिक संख्या नहीं कही जा सकती, और न यह असंयम की छूट कही जा सकती है । वल्कि यह वड़ा संयम है । इनमें लड़की भी गृहीत हो सकती है । जैसेकि मनुजीने कहा है – ' ययैवात्मा तथा पुत्रः, पुत्रेण दुहिता - समा ' ( १।१३० ) ( पुत्र पुरुषका आत्मा है । लड़की भी पिताकी आत्मा होने से पुत्रके समान है ) । यद्यपि ' दशपुत्रसमा कन्या ' इस नादके अनुसार कन्याको दस पुत्रोंके समान माना गया है; तथापि इसीलिए उसे अपने घर न रखकर उसे दूसरे घरमें विवाहपूर्वक भेज दिया जाता है, और स्वयं अन्य लड़की दूसरेके घरसे ब्याह करके लाई जाती है । इसमें भी वैज्ञानिक रहस्य है । इसीलिए वैदिक यमयमीसूक्त ( ऋसं १०।१०।१० ) में वहन - यमी -को भ्राता यमने अपनेसे सम्बन्ध निषिद्ध कर दिया था; और दूसरे योग्य - पुरुषसे सम्बन्धार्थं प्रेरणा दी थी ।

पृष्ठ 514

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६६८ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) शेष प्रश्न यह रहा कि — उन दस पुत्रोंको खाना कहाँसे मिलेगा? इसपर उत्तर यह है कि - हिन्दुजातिको परमात्मापर तथा अपने शास्त्रों-पर पूरा विश्वास है । कर्ममीमांसा तथा पूर्वजन्म एवं पुनर्जन्मको, दैव तथा पुरुषार्थ दोनोंको माननेवाली इस पवित्र जातिको शास्त्र यह बताते हैं--पैदा होते हुए बच्चेकेलिए ' मातुः प्रस्रवतः स्तनों ' ( मांके स्तनों में दूध आ जाता है ) ऐसा प्रकृतिका नियम है । फिर समर्थ होनेपर उसें पुरुषार्थं की आज्ञा दी जाती है; और कहा जाता है - ' येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः । मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्ति विधास्यति ( जिसने हंसोंको सफेद बनाया, और तोतोंको हरा कर दिया । " मोको जिसने रंग - विरङ्गा बनाया; वही भगवान् तेरी वृत्ति बनावेगा ) इत्यादि विश्वस्त वचन भी सुप्रसिद्ध हैं । इसके अतिरिक्त भारतवर्षको अपनी रक्षाकेलिए प्रत्येक गृहीके अधिक से अधिक १० पुत्र होना आवश्यक सिद्ध होता है, क्योंकि उन्हीं -लड़कोंने घर के काम - काज भी पूरे करने हैं, घर - भरकी व्यक्तियोंकी रक्षा भी करनी है; और तीन आश्रमोंके व्यक्तियोंकी रक्षा भी करनी हैं ।. इससे देशकी रक्षा भी करनी है । उतना ही अन्न भी पैदा करना है;. ' और उसका उन - अपनों में विनियोग भी करना है । पर जो अपने धर्म से भिन्न धर्मों तथा भिन्न देशोंके व्यक्ति रहते हैं, उनको यदि उपकारकी दृष्टिसे अपने देशमें रखना भी तो उन्हें भारतीय धर्मसे तथा देशसे · विरुद्ध न चलनेकी हिदायत भी करनी चाहिये । पर यदि वे वैसा नहीं करते; और इस देशकी भक्ति भी नहीं करते, बल्कि इस देश वा उसके व्यक्तियोंसे विद्रोह करते हैं; और अपने ही मूल- देशके वे बने रहना चाहते हैं; तो उन्हें उनके अपने ही देशमें भिजवानेका प्रयत्न करना सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ६६ ९ ६७० चाहिये । युगाण्डा आदि देशोंसे भारतीयोंको निकाला हो तो जा लीजिये रहा है । लिए ज इस देशका नाम जबकि ' हिन्दुस्थान ' वा ' इण्डिया ' आदि चला वा आ रहा हैं, यह वे विदेशी लोग भी स्वयं मानते हैं; तथा उसे स्वयं ही देशको प्रयुक्त भी करते हैं । यह है मी ठीक हो; क्योंकि इस समूचे देशका, पहली नाम ' सिन्धु ' देश है; वेदका भी इस पक्ष में अनुग्रह है । तक वे विदेशी भिजवाव इस देशसे विद्रोह न करनेपर यहाँ अतिथि तो बने रह सकते हैं; पर राजनीत भारतीय - धर्मसे विरुद्ध चलकर वा यहांके अधिपति बनकर नहीं रह सकते । यदि क्योंकि जब उनके होनेसे हमारा देश हमारे लिए संकुचित हो जाता है, वैदिक - अ हमारे धर्ममें हानि वा रुकावट पड़ती है; और फिर हमारे देशका अन्न अपने घर हमारे लिए न्यून जा पड़ता है, तथा हमारी बहू - बेटियोंके ग्रूपहरणकाण्ड तब अल्प होकर हमारी भारी हानि हो रही होती है, तब उन विदेशियोंका इस अपने आ देशमें रहनेका क्या अर्थं रह जाता है? क्यों हमने अंग्रेजोंको अपने यहाँ से विदे निकालकर ' स्वराज्य ' लिया? इसी प्रकार अन्य विदेशी जातियोंका भी इस हिन्दुस्थानमें रहनेका कोई अधिकार नहीं रह जाता " हमारे ही देशके कुछ भागको हमारे राजनीतिक ' पाकिस्तान ' बनाकर उन विदेशियोंको दे देना, फिर भी सारे देखकर भ । सनी ज नेताओं द्वारा की स्प विदेशियोंको. की त वहाँ न भिजवाना ' उसी अदूरदर्शिताका परिणाम है; जिसका प्रतिफल देशमें हम भारतीयोंको उनकी प्रोरसे कई युद्धोंके रूपमें भुगतना पड़ रहा है । पत्नी यदि हम अब भी नहीं चेते; तब इस देशके अन्य भी खण्ड - खण्ड हो | आपर जानेकी आशङ्का है । हमारे ही वर्मा आदि प्रान्त भी हमसे अलग हो रहे ह गये हैं । इस तरह कश्मीर आदिके कुछ भागोंकलिए भी स्वयं जान इलाज ... * इसकेलिए. ' आलोक ' - प्रन्थमालाके चतुर्थ- पुष्पमें ' हिन्दु ' शब्दका, कहीं - महाभाष्य ' निबन्ध देखना चाहिये । दिन रहा

पृष्ठ 515

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६६ १७० ] सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) जा लीजिये | अब भी वही ' पाकिस्तान ' हमारे देशको लिए जहाँ - तहां अस्त्र - शस्त्र जमा कर नष्ट - भ्रप्ट करनेके-बाले अन्य भी विदेश रहा है । उसीको थपथपी देने-चला देशको उसके पक्षका पोषण करनेमें लगकर और हमारे हमसे छीननेका कुचक्र करनेमें लगे हुए हैं । यह हमारी टाका. । पहली भूल हुई । फिर उन सभी विदेशियोंको उस पाकिस्तानमें न दिशी भिजवाकर अपने इसी देशमें भी रख देना - यह हमारे उन स्वार्थी पर राजनीतिक नेताओं की दूसरी भारी भूल हुई । ते । यदि ' दशास्यां पुत्रान् श्रवेहि ' इस अपने देशके संरक्षणमूलक - है, वैदिक - आदेशको पूरा न करके हमने अपनी नसबन्दियां सुन्दर अन्न करवा कर, अथवा अपने घरों में हत्याएं वा गर्भपात कराकर हमने अपनी संख्या घटाई; T ण्ड तव अल्पसंख्यक हम अपने देश तथा अपने घरों, अपने धर्म तथा इस अपने आश्रमोंकी रक्षा कैसे कर सकेंगे? हाँसे विदेशी जातियोंको अपने देश तथा अपने धर्म से विरुद्ध चलते का देखकर भी यदि आप उन्हें क्षमा करते हैं; तो यह आप अपने देशके हुए.: तनी जातिके और अपने आश्रमोंके पैरोंमें स्वयं ही कुल्हारी मारकर नारा लकी स्पष्ट हानि कर रहे हैं । फिर आप अपनी स्त्रीकी, अपनी बहिनोंकी, को की तथा माता आदिकी रक्षा कैसे कर सकेंगे? फिर तो आप अपने फल देशमें ' अल्पसंख्यक ' बन जाएंगे । आपकी लड़कियोंका, आपकी बहनों है । पत्नी आदिका अपहरण हो जाया करेगा । यह आजकल प्रत्यक्ष मी हो आपसे कुछ करते - धरते नहीं बन सकेगा । आप अपने देशमें सांपोंको ज रहे हैं, यह पूरा ध्यान रखें । वे आपको ऐसा काटेंगे; फिर उसका, जान इलाज न हो सकेगा । हमें डर है कि आप अपने अवशिष्ट देशको दका, | कहीं ' नया पाकिस्तान ' न बनवा बैठें; क्योंकि उन विदेशी जातियोंकी बा दिनों - दिन बढ़ रही है; उनपर कुछ भी अङ्कुश नहीं लगाया रहा है । यद्यपि आर्यसमाज उनकी शुद्धि करके उन्हें अपनेमें सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ २७१ मिलाकर उनकी संख्या घटानेका कुछ प्रयत्न कर रहा है; पर यह कोई प्रशस्त उपाय नहीं । बल्कि यह उपाय अपनी ही जातिका मी करनेवाला भी सिद्ध हो सकता है, क्योंकि- पयः - पानं भुजङ्गानां केवलं अय विषवर्धनम् ' इन्हीं के देशोंमें हिन्दुयोंकी संख्या प्राटेमें नमक बराबर भी नहीं है । जो वहाँ हैं भी, वे दबे हुए हैं, और उन जैसे बने हुए हैं, उनसे हमारे देशको कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं हो रहा । वेदका आदेश तथा वेदके व्याख्यानभूत स्मृति - सूत्र प्रादि ग्रन्थोंका आदेश हम वैदिक धर्मियोंको अवश्य माननीय है । अपनी स्त्री आदि तथा अपनी रक्षा भी तो हमने अवश्य करनी है । तभी तो ' दवास्यां पुत्रान् प्रवेहि ' यह वेदका आदेश पूरा होगा । इससे जहां गृहस्थ-स्त्री - पुरुषोंकी संयम के साथ अंशतः वासनापूर्ति होगी वहीं घरकी तथा देशकी रक्षा भी होगी । ' एका क्रिया द्वय्र्यकरी ( बल्कि करी ) प्रसिद्धा ' यह एक प्रसिद्ध सूक्ति चरितार्थ होगी । , सनातनधर्म असंयमका पक्षपाती नहीं है, किन्तु संयमका ही पक्षपाती है । अतः वह ऋतुगमनका ही उपदेश देता है; और इसे वह ' ब्रह्मचर्य ' कहता है । वेदके व्याख्याता मनुजी कहते हैं - निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् । ब्रह्मचार्येव भवति ' ( मनु. ३१५० ) यहां ऋतु-गमनकर्ताको ब्रह्मचारी कहा गया है । मनुजीकी वेदविद्वत्ता निम्न - पद्य में देखिये- ' यः कश्चित् कस्यचिद् धर्मो मनुना परिकीर्तितः । स सर्वोभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ' ( मनु. २७ ) ( जो कोई किसीका धर्म मनुजीने कहा है, वह सब वेदमें कहा गया है, क्योंकि मनुजी वेदका सर्वविध ज्ञान रखते हैं ) । यहाँ ' ब्रह्मचर्य ' को भाव वेदानुकूल चलना इष्ट है । ऋतुकालमें १६ रात्रियां होती हैं । उनमें पहली चार तथा ११ वीं, १३ वीं तथा पर्वकी दो - इन आठ रात्रियोंको छोड़कर पुत्रकी कामनामें समरात्रियों तथा कन्याकी कामनामें विषम रात्रियोंमें स्त्रीगमन कहा है,

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७२ ] श्रीसना ग्नधर्मालोक ( ३-२ ) शेष रात्रियोंमें जो ऋतुकाल वा गर्भाधानकी नहीं है, उनमें शास्त्र स्त्री-गमन नहीं कहता । शेष = रात्रियोंमें गमन ' ब्रह्मचर्य ' बताया गया है । यह बड़ा भारी संयम है । संयमसे ही हमारी आयु बढ़ती है, और जीवन सुखी रहता है । हमें बुद्धिमान् तथा बलवान् बने रह सकते हैं; और अपना तथा अपने देशका संरक्षण कर सकते हैं । रातमें ऋतुदान इसलिए कहा है, क्योंकि - दिनमें ऋतुदानका निषेध है । जैसेकि - प्रश्नोपनिषद् ' ' में कहा गया है- ' प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति, ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ' ( १।१३ ) यहाँ दिनमें रतिदानको प्राणोंकी हानि करनेवाला बताया गया है । यही बात ' बोधायनगृह्य शेषसूत्र ' में भी कही गई है- ' परस्त्रीषु, दिवा च यावज्जीवम् ' [ ब्रह्मचर्यम् ] ( १ | ११ | १ ) और फिर रातमें भी अन्तिम पहरमें रतिका निषेध है, क्योंकि वह ' दिनका भाग होता है । इसलिए रात्रिका नाम शास्त्रों वा कोषों में ' त्रियाना ' ( तीन महरवाली ) कहा जाता है । सो यही वास्तविक ' परिवार नियोजन ' है । वर्तमान ‘ परिवार - नियोजन ' में तो हमारे लड़कोंको संख्या कम करनेका उद्देश्य रखा जाता है, जिससे हम, बहुत ब्याह करके बहुत सन्तानोंको उत्पन्न करनेवाले भिन्न जातिवालोंसे तथा विदेशियों से सदा पिटते रहें, पर उस वर्तमान परिवार नियोजन ' में संयमका पाठ नहीं पढ़ाया जाता । उसमें परिवारकी संख्या घटानेकी तो शिक्षा है, पर संयमकी शिक्षा उसमें सर्वथा नहीं है, हाँ, उसमें केवलमात्र व्यभिचारके . लिए प्रोत्साहन तो अवश्य है, जिससे हम अल्पायु तथा निर्बल बने रहें ।. उससे विधवाको भी शास्त्र विरुद्ध व्यभिचारकी दीक्षा श्रवश्य प्राप्त होती है । जिससे वे सङ्कर सन्ततियाँ पैदा कराती रहें । युवति-कुमारियोंको मी जिसका दयानन्दी - समाजने शास्त्रविरुद्ध प्रचार किया है— उनको भी इस ' बूमन ' ड ' वा ' परिवार नियोजन ' के तरीके द्वारा सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ९ ७३ ६७४ व्यभिचारका प्रोत्साहन अवश्य मिलता हैं, जिसके उदाहरणस्वरूप स नवजात - लड़कियां कपड़ोंमें लिपटी हुई आज भी सड़कोंपर छोड़ी हुई उपासी दीख रही होती हैं । अन्य युवतियोंको, विशेषकर निःसन्तान भागात्म युवतियोंको भी व्यभिचारका प्रोत्साहन प्राप्त होता है । हमारा दो बार सनातनधर्मं असंयम के पक्षमें नहीं है, व्यभिचारके, सङ्कर तथा प्रबंध अनुशिष सन्तानोंके पक्षमें नहीं है । इसलिए वह नियोग तथा विधवाविवाहादिका वर्धक, निषेध तथा ऋतुकालसे कुछ पूर्वं कुमारियोंका विवाह अनुशिष्ट करतां रहता है । वह कुमारियोंका विवाह के बाद ऋतुकालमें उन द्वारा अधिक से है । पर अधिक १० सन्तानोंकी सीमा रखता है, जिससे घरके काम - काज में भी बना रह सहायता मिलती रहे । घरकी रक्षा भी हो सके । नौकर रखनेकीं राजसिक आवश्यकता भी न पड़े, जो कि घरकी चोरी करके भाग जाते हुए है । इ देखे जाते हैं । देशका, अपनी जातिका, अपने धर्मका संरक्षण भी होता इससे म रहे । इससे घरेलू अन्नदि तथा साग - सब्जी आदिकी कृषि भी होती रहे । पाता । यज्ञ - यागादि भी होते रहें, जिससे देवताओंकी प्रसन्नता की जाती रहे । हम इससे समय पर वर्षण होता रहेगा, सूखा कभी नहीं पड़ेगा । देवताओंको सत्य - प्रा यज्ञ द्वारा उनका अन्न घृतादि न मिलने से उनकी रूक्षता रह जानेसे अवर्षण नहीं । तथा प्रतिवर्षण आदि ईतियाँ हो जानेसे भयङ्कर सूखा वा बाढ़ होती नहीं 1 हैं । यह है यज्ञका वैज्ञानिक - विश्लेषण । गायका स्वा.द.जीने हिन्दुओंकी संख्यावृद्धि के लिए विधवाओंके लिए ' नियोग ' प्रादि ). . का आदेश दिया था, पर वह कलिवर्जित है; क्योंकि उसमें शास्त्रानुसार वहाँ आ मैथुनका विधान नहीं है; अतः वह कलियुगमें नहीं हो सकता । एतदर्थं गायका " नियोग और मैथुन ' निबन्ध ' आलोक ' के अष्टम सुमन में देखें; और वह नीरोग नियोग स्वयं आर्यसमाजमें भी चालू नहीं हो सका । श्रतः श्रार्यसमाजियोने सन्तानक स्वा. द. जीसे भी विरुद्ध ' विधवा - विवाह ' जारी किया; पर यह भी शास्त्र-- पुत्रादिक विरुद्ध है, एतदर्थं ' आलोक ' ( ८ ) देखो । स

पृष्ठ 517

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१७४ ] श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) सनातनधर्म दो वार भोजनका आदेश देता है- ' अथैनं मनुष्या... प उपासीदन् । तान् अब्रवीत् - साथ प्रातर्वोऽशनम् ' ( २२४१२३ ) ब्राह्मण-न भागात्मक वेद- शतपय ब्राह्मणके इसः वचनमें सायं और प्रातः इस प्रकार रा दो बार भोजन करना कहा है । और फिर इस धर्ममें सात्त्विक - भोजन ध अनुशिष्ट किया गया है, जिसमें प्याज, लहसुन तथा गृज्जन आदि काम-का वर्धक, भारी तथा उष्ण सब्जियोंका निषेध है । इससे संयम भी बना तां रहता है, और सन्तानें सीमित होनेसे दूसरोंके लिए अन्न भी बच जाता कसे है । पर आजका युग वार्तमानिक परिवार नियोजनके कारण असंयमी मी बना रहता है, इससे उसे बहुत भूख लगनेसे वह पांच बार और फिर कीं राजसिक एवं तामसिक भोजन करता है; जिससे असंयम और बढ़ता है । इससे कोई आयु नहीं बढ़ती, बल्कि घटती तो श्रवश्य ही है । हुए ता । इससे मीतरी निर्बलता बढ़ती ही है । दूसरोंकेलिए अन्न भी नहीं बच पाता । संयमसे ही आयु तथा सबलता बढ़ती है । 1 हमारा सनातनधर्म गोरक्षाकेलिए भी बल देता है, और उसकेलिए को सत्य- आग्रह करता है । इसलिए इसमें ' गोपाष्टमी ' तो है, ' भैंसाष्टमी ' र्षण नहीं । ' गोकुल ' तो है, ' भैंस - कुल ' नहीं । ' गोवर्धन ' तो है, ' भैंसवर्धन ' ती 1 ' गोमय ' तो है, ' समय ' नहीं । ' गोत्र ' तो है, ' मंत्र ' नहीं । गायका दूध, सात्त्विक होता है, उसे यदि पौष्टिक आहार ( विनौला, खली-गं प्रादि ) दिया जावे, इससे जहां भैंसके मुकाबलेका दूध होता है, उससे सार वहां आयु बढ़ती है, वहां संयम भी बढ़ता है । खर्च भी कम होता है । दर्थ गायका वैसा दूध, तथा गायका माखन, छाछ, गायका घृत- यह सब वह नीरोंग करते हैं, पुरुषको पुष्ट करते हैं, मस्तिष्कको उज्ज्वल करते हैं, योने बन्तानको सीमित करते हैं । सहनशीलता एवं फुरती बढ़ाते हैं । इससे स्त्र- पुत्रादिकी संख्या अधिक नहीं बढ़ पाती । प्राचीन साहित्यमें रुचि बढ़ती है । सत् - साहित्यकी सृष्टि होती है । इसके गोवरका खाद सात्त्विक सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ २७५ अन्न पैदा करता है । इससे ट्रैक्टरों तथा उसके ड्राइवर विना ही व्ययके खेती बढ़ाता है । ट्रैक्टरों द्वारा, पेट्रोल आदिके उर्वरा शक्ति मारी जाती है भूमि फाड़नेसे पृथिवीकी सब मसले । व्यर्थका खर्च बढ़ता है । गोरक्षासे यह हल हो जाते हैं । कीमिया खाद तो उष्ण होनेसे कामज-सन्तति पैदा करता है, और भारतकी मुद्राको विदेशमं श्रन्य कई कृषिमें कृमि लग जाना आदि हानियोंको निजवाता है । भी पहुंचाता है । गायको छोड़कर भैंसका दूध तो असंयमकी भूख बढ़ाता अश्लील साहित्यकी सृष्टि कराता है । मस्तिष्कमें गर्मी बढ़ाता है " । असहनशीलता उत्पन्न होती है । विद्वेष भड़काता है । रोगोंको पैदा कराता है । निद्रा, तन्द्रा, आलस्य, विकार तथा कामवासना बढ़ाता है । प्रमाद बढ़ाता है । विवाद, युद्ध तथा महायुद्धों की सृष्टि करता है । सन्तानें बढ़ जाती हैं, जिनको कम करवेकेलिए आजकलके परिवार-नियोजन ' का उदय हुआ है । असंयम बढ़ता है । गायका दूध रोगोंको हटाता है । भैंसका दूध पैदा हुए रोगोंको क्षीण न करके उन रोगोंका बढ़ाता हैं । दुग्धादिमें सब विटामिन होनेसे जीवनको स्वस्थ रखते हैं । • मस्तिष्क में शीतलता रखते हैं । इधर सनातनधर्मं व्रत - उपवास प्रादिका आदेश भी देता है । इससे संयम बढ़ता है । सन्तानें स्वयं अधिक नहीं होतीं । जो होती हैं, वे सात्त्विक होती हैं । बलवान् होती हैं । फुर्तीली होती हैं । पहले कहा जा चुका है कि सनातनधर्मं गृहस्थके सिवाय व आश्रमोंको संयम करना सिखाता है, स्त्रीसे सम्बन्ध नहीं रखने देता । तव ' न रही बांस न बजी बांसुरी ' । तब उन तीन आश्रमोंमें सन्तान ही कैसे पैदा हो? स्वयं विना दवाइयोंमे तथा बिना नसवन्दियोंके

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६७६ ] श्रीसनातनधर्मालाकः ( ३-२ ) ' परिवार नियोजन ' हो जाता है । यह आज भी प्रत्यक्ष है । प्रत्येक श्राश्रम प्रायः २५-२५ वर्षोंके होते हैं । सो ७५ वर्ष तो संयमके हुए । केवल बीचके दूसरी संख्याबाले २५ वर्ष विलासके हुए । सो ' परिवार-नियोजन ' यही तो होता है । आजकल का ' परिवार नियोजन ' तो व्यभिचार सिखाता है । केवल सन्तानें घटवाता है । पर व्यभिचारकी वृद्धि होनेसे पारस्परिक कलह विवादादि बढ़वरकर हत्याओंका अवसर देता है । इससे हमारे देशकी रक्षामें रोड़े अटकता है । ' संयम ' ही वास्तविक ' परिवार नियोजन ' है । दबाइयोंसे ' परिवार नियोजन ' तो ' व्यमिचारमात्रका प्रवर्धन ' है । इधर हमारा सनातनधर्मं गोरक्षापर बल देता है- वह कहा जा चुका है । तब गोदुग्धादिसे फुर्ती, हलकापन, उज्ज्वल मस्तिष्कका ज्ञानादि प्राप्त होता है । भैंसकी अपेक्षा गाय में खर्च भी कम होता है, परिश्रम भी कम होता है । गाय - बैलादिसे तथा उनके गोवरकी खादसे हमारेलिए सात्त्विक अन्न पैदा होता है । ट्रैक्टर आदिका और पेट्रोल आदि तथा ड्राइवर आदिका व्यय बच जाता है, गोबर द्वारा घरके लीपनेसे उसमें सात्त्विक - वायुमण्डल रहता है । मँसके गोबर (? ) से छिपकलियाँ पैदा होती हैं । गोबरकी भस्मसे हमारे उच्छिष्ट पात्रोंकी शुद्धि तथा स्वच्छता होती ऐ । पत्थरी कोयलेकी आवश्यकता नहीं रहती; जो प्रात: और सायंमें जबकि शुद्ध वायुकी आवश्यकता रहती है, विषैला धुआँ पैदा करके हमारे सन्ध्यावन्दनादिकेलिए अपेक्षित शुद्ध वायु - मण्डल-को हटवाकर वायुमण्डलको विषाक्त करता है, जिससे हृदयरोग आदि रोग पैदा होनेसे मृत्यु - संख्या बढ़नेमें सहायता होती है । यही दुष्परिणाम पेट्रोलके धुएंका भी होता है । सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ६७७ ६७८ उसके मुकाबलेमें यज्ञ - यागादि प्रचुर संख्या में न होनेसे, इधर बढ़ानेव देवताओंकी प्रसन्नता नहीं होती; उधर वायुमण्डल शुद्ध नहीं रहता । सी अ एक प्रसिद्ध मन्त्र है — ‘ देवा गातुविदो गातु... मनसस्पत इमं देव यज्ञ ", सन्तति स्वाहा वातेघाः ' ( यजुःमाध्यं. ८।२१ ) ( इससे देवताओं द्वारा यज्ञका वायुमें धारण करना कहनेसे वायुकी शुद्धि भी अवान्तररूपसे हो जाती है । एवं क वायु शुद्ध न होनेपर, मस्तिष्क शुद्ध न रहने से बहुत - सी बीमारियाँ और हो बहुतसे रोग पैदा हो जाते हैं, जिससे डाक्टरोंकी बहुतायत होती है । बाहुल्य उसमें भी फिर उनकी दवाइयों वा गोलियोंका परिणाम विषैला होनेसे उत्पाद परिव ' जलेपर नमक ' न्यायसे हम लोग बहुत - सी हानियोंके शिकार हो जाते हैं । स्वयं हमारे शरीर तथा मस्तिष्कमें उष्णता बढ़ जाती है, जिससे हमारे ही स शारीरिक तथा मानसिक सन्तुलनके ठीक न रहने से अस्वास्थ्य उत्पन्न लोग हो जाता है, जिससे बहुत - सी अव्यवस्थाएं वा गडबड़ियां पैदा हो वृषलत जाती हैं । फिर इन्हीं पैट्रोलों आदिसे मोटरोंकी संख्या बढ़ जाने से बड़े नगरों- साहित में प्रतिदिन सड़क दुर्घटनाएं होती रहती हैं, यह समाचार - पत्रोंके पाठकोंसे पर्दा - प्र परपुर छिपा हुआ नहीं है । पहले कहा जा चुका है कि- गाय - बैलकी रक्षासे जहां हमारेलिए ' न रह शुद्ध कृषि होती है, हमारे निकम्मे खचं नहीं बढ़ पाते, उससे दो बार भोजनकी तथा संयमकी उपलब्धि होती हैं । इसीसे सच्चा ' परिवार- नियम नियोजन ' हो जाता है । निर्बलता उत्पन्न करनेवाला तथा विवादादि- श्रवस मङ्ग स ० ध ० ६२ हैं ।

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३७ श्रीसनातनधर्मालोकः ( ३ ~ २ ) घर बढ़ानेवाला, सन्तानोंकी बाढ़ बढ़ानेवाला, रोग तथा अल्पायु एवं बहुत-II सी श्रव्यवस्थाएं उत्पन्न करनेवाला व्यभिचार दूर हो जाता है । सङ्कर-सन्तति के मूल विधवा - विवाह श्रादिके शास्त्र निषिद्ध होनेसे तथा व्रतादि एवं कन्दमूलादि - फलोंके सेवनके आदेश से स्त्री जाति संयत एवं सुरक्षित है । हो जाती है; और ' परिवार नियोजन ' भी हो जाता है । जनसंख्याका और बाहुल्य भी नहीं रहता । ' न रहा बाँस न वजी बांसुरी ' इस न्यायसे है । उत्पादन वृद्धि पर अंकुश लग जाता है । यही तो सनातनधर्मका सच्चा से ' परिवार नियोजन ' हो जाता है । सनातनधर्म में ब्राह्मणका सम्मान केवल इसलिए होता है कि वह स्वयं भी संयमी रहता है, और दूसरोंको भी संयम सिखलाता है । साथ मारे ही सत्साहित्यकी सृष्टि करता है । स्मृतिमें कहा है- ' ब्राह्मणोंके प्रदर्शनसे पन्न लोग वृषल हो जाते हैं— ' शनकैस्तु क्रियालोपाद् इमाः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणानामदर्शनात् ' ( मनु. १०१४३ ) प्राचीन-रों- साहित्यकी रक्षा करता एवं कराता है । इसी धर्मके कारण स्त्री - जातिमें कोंसे पर्दा - प्रथा तथा गृहक्षेत्रमें रहनेकी शिक्षा मिलती है, जिससे उसका परपुरुषों से मिलने का अवसर ही नहीं होता । उत्तेजना नहीं मिलती । - लिए ' न रहा बांस न वजी बांसुरी ' यह बात चरितार्थ हो जाती है । वार आजकलकी स्कूली शिक्षासे वा बड़ी प्रायुमें विवाह दयानन्दी वार- नियमसे बड़ी आयुकी कुमारियोंको बाहर पुरुषोंके क्षेत्रमें जानेका दि- अवसर प्राप्त होता है । तब स्त्री - पुरुषों का संयमभङ्ग होनेसे शील-मङ्ग होते हैं; बलात्कारकाण्ड वा अपहरणकाण्ड आदि भी हुआ करते हैं । इस प्रकार अवैध उत्पत्तियां बढ़ती हैं कि इसके प्रयोगसे हम-सनातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ex कुमारियोंकी कोई सन्तति तो होगी नहीं, फिर स्वराचार करनेमें हमें क्या आत है, सो प्राजकलका ' परिवार नियोजन ' ऐसे व्यभिचारोंको प्रोत्साहन देता है, केवल सन्तानोंको कम कराता है, पर भ्रूण-हत्याओं को बढ़ावा देता है । पर इससे पुरुषों तथा विशेष स्त्रियोंकी कई हानियां भी हो जाती हैं । यह प्रत्यक्ष है-सनातनधर्म स्त्री - शिक्षा तो चाहता है, पर उस शिक्षाका माव सदाचार - शिक्षा सिखलाना है । वह आजकलकी स्त्रियोंके पढ़ने - पढ़ानेवाली परीक्षा - सिस्टमकी शिक्षा नहीं स्त्री - जातिको भोगने पड़ रहे हैं बढ़ रही है; क्योंकि - वृत्तिके जाते हैं । पुरुष बेचारा देखता पुरुषोंकी बेकारी बढ़ जाती है । शिक्षा प्राप्त पुरुषोंका सम्बन्ध ' ममेयमस्तु पोष्या ' ( अथर्वसं. चाहता, जिसके दुष्परिणाम आये दिन । उसीके परिणाममें पुरुषोंकी मी बेकारी स्थान उन पढ़ी - लिखी स्त्रियोंको दे दिये ही रह जाता है । वृत्तिसे हीन होनेपर इसलिए आजकलकी डकैतियोंमें उच्च-मी देखा - सुना जाता है । कहाँ तो वेद १४१ ११५२ ) स्त्रीको पुरुषसे ' पोषणीय ' बताता है । कहां आज वे ' पोष्या ' न होकर ' पोषक ' एवं स्वतन्त्र हो रही हैं । इन कारणोंसे विवाहोच्छेद और अन्य हानियां हो रही हैं । तब अवैध सन्ततियां भी बढ़ रही होती हैं । सनातनधर्मं व्रत - उपवास श्रादिकी शिक्षा भी देता है-- यह पहले कहा ही जा चुका है । उसमें गेहूं आदि पौष्टिक अन्नका निषेध होनेसे काफी गेहूं दूसरोंकेलिए बच जाता है । गेहूंमे पौष्टिकता होनेसे उसके निषेधसे अपना संयम भी बना रहता है; और व्रतादिमें कामवासनाका निषेध भी है; इससे व्रतादि न करनेवालोंकेलिए अन्न भी बच जाता है,

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850 1 सनातनधर्मालोकः ( ३-२ ) और सन्तानकी अधिकतापर प्रतिबन्ध भी लग जाता है । अन्न बचनेमें एक अर्थवाद भी है, वह भी सुनने योग्य है । किसीने किसी से पूछा कि तुम्हें कितनी मासिक पैनशन मिलती है? उत्तर मिला- मासिक पांच रुपये । पूछा गया कि इससे तुम्हारी गुज़र कैसे होती है? उत्तर मिला- मैं रविवारको सूर्यका व्रत करता हूं । चन्द्रवारको एक समय चावल खाता हूं । मंगलवारको गेहूं न खाकर एक बार मीठा खाता हूं । बुधवारको चने खाता हूं । उससे पेटमें इतना दर्द हो जाता है कि बृहस्पति और शुक्रवारको कुछ नहीं खा सकता । शनिवार गेहूं का प्रयोग करता हूं । इस प्रकार मेरा गुजर थोड़े ही हो जाता है । इस अर्थवादमें यथार्थता न देखकर तात्पर्यमात्र लेना चाहिये । वह यह है कि – सनातनधर्म में व्रत - उपवास बहुत हैं । ३६० दिनोंमें ३०० के लगभग ऐसे पर्व निकल आते हैं, जिनमें हमारे द्वारा दूसरोंकेलिए गेहूं आदि अन्न बच जाता है; तथा संयम भी बना रहता है । गृहस्थके अतिरिक्त शेष तीन प्राश्रमवालोंको तो व्रत आदि पर्याप्त करने ही पड़ते हैं । गृहस्थ - आश्रमियोंको भी कुछ व्रत करने ही पड़ते हैं । इससे संयम - वृद्धिसे अन्न भी हमारा पर्याप्त मात्रामें बच जाता है, हमारे लिए उस अन्नका थोड़े हो जानेका प्रश्न ही नहीं रहता । सन्तान भी स्वतः सीमित मात्रामें होती है । इससे, विना हानिप्रद - प्रौषधियोंके प्रयोगके और बिना भारतीय मुद्राके खर्च के सुन्दर - शैलीसे ' परिवार नियोजन ' हो जाता है । संयमका पाठ एक ऐसा पाठ है कि स्त्री - पुरुष दान्त एवं शान्त और नातनधर्म ही सच्चा परिवार नियोजक [ ६८१ ६८२ कान्त रहते हैं । यह प्रसिद्ध है कि - ' ग्राहारो मैथुनं निद्रा सेवनात्तु विवर्धते ' ( खाना, मैथुन तथा नीन्द श्रादिका जितना अधिक सेवन किया पालन जावे; यह वस्तुएं उतनी ही बढ़ती हैं । सो सनातनधर्मके अवलम्बनसे भी ह ' देशकी समस्याएं काफी हल हो जाती हैं । आदि पहले केवल यदुवंशी ही ५६ करोड़ थे । भगवान् श्रीकृष्ण की ' पटरानियाँ ही आठ थीं लड़के भी प्रत्येक स्त्रीके तो अन्न समस्या रही सन्तति - समस्या एवं समय प्राचीन हमारे हो जाया करती थीं वैदेशिक - यवन भी थे; वापि , अन्य रानियोंकी संख्या सोलह हजार एक सौ थी । मुक्ति दस - दस और लड़की एक - एक थी । उस समय भी होगी । मकान - समस्या तथा वृत्ति - समस्या तथा मुक्ति सन्तति निग्रहसमस्या भी रही होगी । पर उस सुकम फिर सनातनधर्मके अवलम्वन से यह सब समस्याएं हल । उस समय कई करोड़ कालयवनादि श्राक्रामक यह प जिनका दमन और शमन गोपाल - श्रीकृष्ण और है । श्रीवलराम आदि कहीं शूर - वीरतासे, कहीं कहीं अस्त्र - शस्त्रादिसे और कहीं नीति- रीति से कर डालते थे । कौरव पाण्डवोंकी अठारह होनेक -अक्षौहिणी सेनाएं भी फिर प्रकृतिके नियमसे कट गई थीं । यादव यज्ञक भी प्रायः समाप्त हो गये थे । सो सब कामोंमें प्रकृति भी देशकी पहुंच सहायक बन जाती है, पालनमें भी, और संहरणमें भी । उस समय यह साथ ' परिवार नियोजन ' आदि वर्तमान नियम नहीं थे । फिर भी देश सुरक्षित स्वाह रहता था । कृषि की कमी भी इस देशवासियोंके लिए नहीं रहती थी । धारण पत्थरी सो परमात्मा और प्रकृति स्वयं देशका संरक्षण कर दिया करते हैं । पैदा ह यदि सर्जक ब्रह्मा हैं, और पालक विष्णु हैं; तो संहारक रुद्र भी हैं । मिलन केवल उस परमेशान पर विश्वास तथा सनातनधर्मके नियमोंका सरगर्मी से श्रथवा