साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ — पृष्ठ 1–10

साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ · Chaukhamba Vidya Bhavan Varanasi · पृष्ठ 1–10

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11 $: 11 विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला १५८ गौडपादभाष्यसमन्विता श्रीमदीश्वरकृष्णविरचिता साङ्ख्यकारिका ‘ भाष्यभाववर्णिनी ' संस्कृत - हिन्दीव्याख्योपेता व्याख्याकारः पं ० श्रीज्वालाप्रसाद गौड़ न्यायाचार्यः वाराणसीस्थ श्रीसंन्यासिसंस्कृतमहाविद्यालयप्राध्यापकः चौखम्बा विद्याभवन वाराणसी CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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॥ श्री ॥ ॥ विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला शमी रामा १५८ Sunil sharm सुनील श्रीईश्वरकृष्णविरचिता गौडपादभाष्यसहिता सांख्यकारिका ' भाष्यभाववर्णिनी ' संस्कृत - हिन्दी व्याख्योपेता व्याख्याकारः न्यायाचार्य - पोष्टाचार्य-पं ० श्रीज्वालाप्रसाद गौड़ वाराणसीस्थ — श्रीसंन्यासि संस्कृत महाविद्यालयप्राध्यापकः चौखम्बा Chaukhambha Prakashan hi Pont Box No. 1150 K. 67716 Gopal Mandir Varanasi Lane, - 221001 Tel: 0542-2335929 E - mail: e_prakashan@yahoo.co . in विद्याभवन, वाराणसी -२२१००१ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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THE VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA 158 SAMKHYAKÄRIKI OF ISWARAKRSNA Containing GAUDAPADABHASYA Edited with ' Bhashyabhavavarnini ' Sanskrit & Hindi Commentaris By Pt. Jwala Prasad Gaud Ex Professor, Sanyasi Sanskrit Mahavidyalaya, Varanasi CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN VARANASI CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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भूमिका प्रारंभ से ही दर्शन दो धाराओं में विभाजित हुए देखने में आ रहे हैं । जिनमें एक भारतीय दर्शन - धारा है और दूसरी पाश्चात्त्य दर्शन - धारा है । भार-तीय दर्शन - धारा भी दो धाराओं में विभाजित है, आस्तिक दर्शनधारा तथा नास्तिक दर्शन - धारा । इनमें छः आस्तिक दर्शन हैं और छः ही नास्तिक दर्शन हैं । " नास्तिको वेदनिन्दकः " अर्थात् वेदोक्तमार्ग का समर्थन करने वाले दर्शन आस्तिक दर्शन कहलाते हैं । और जो दर्शन वेदोक्त परलोक एवं ईश्वर आदि का खण्डन करने वाले हैं, उन्हें नास्तिक दर्शन कहते हैं । कहा भी है--' नास्ति वेदोदितो लोक इति येषां मतिः स्थिरा । नास्तिकास्ते तथास्तीति मतिर्येषां त आस्तिकाः ॥ न्याय - वैशेषिक- वेदान्त - मीमांसा - सांख्य और योग ये छः आस्तिक दर्शन हैं । और जैन - चार्वाक - माध्यमिक योगाचार - सौत्रान्तिक तथा वैभाषिक ये छः नास्तिक दर्शन हैं । इसके अतिरिक्त माध्व - रामानुज - निम्बार्क - वल्लभ- शैवागम एवं पूर्णप्रश आदि दर्शनों का इन्हीं दर्शनों में अन्तर्भाव हो जाता है । दर्शन शब्दार्थ " दृश्यते = ज्ञायते = विचार्यते अनेन इति दर्शनम् " अर्थात् जिसके द्वारा देखा जाय, जाना जाय अर्थात् सद् - असद् वस्तु का विचार किया जाय उसे दर्शन कहते हैं । किसी वस्तु के तात्त्विक अर्थात् सच्चे स्वरूप को जान लेना ही दर्शन शब्द का अर्थ = प्रयोजन माना गया है । यह दृश्यमान चराचर विश्व सत्य है कि मिथ्या है, जड़ है कि चेतन है, प्रकाश है कि अन्धकार है, सुख - दुःख आदि के द्वन्द्व से रहित है अथवा सहित है, आधि - व्याधि- जरा और मरण की भीषण कथा की व्यथा से समन्वित है अथवा निरन्वित है, इत्यादि विषयों का विचार भी दर्शनशब्दार्थ के अन्तर्गत ही माना गया है । संसार क्या है? इसका वास्त विक स्वरूप क्या है? यह नित्य अथवा अनित्य है? संसार के अन्दर रहकर सुन्दर एवं सुखपूर्वक जीवन बिताने का क्या साधन है? इत्यादि समस्त विषय भी दर्शनशास्त्रगम्य ही हैं । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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[ २ ] दर्शन भी एक शास्त्र है । जैसे व्याकरण साहित्य एवं ज्यौतिष आदि स्वतंत्र शास्त्र हैं, उसी प्रकार दर्शन को शास्त्र की संज्ञा प्रदान की गयी है-शासनात् शंसनात् शास्त्रं शास्त्रमित्यभिधीयते । यहाँ पर ' शास् ' धातु का अर्थ आदेश प्रदान करना, आज्ञा देना आदि माना गया है । और ' शंस् ' धातु का अर्थ विचार करना, निरूपण करना, प्रतिपादन करना आदि माना गया है । यह ' शासन ' शास्त्र भी विधि - निषेधात्मक दो प्रकार का होता है | " स्वर्गकामो यजेत " यह विधिशास्त्र है । और " न कल भक्ष-येत् " निषेधशास्त्र है । एवं " अग्निषोमीयं पशुमालभेत " यह विधिशास्त्र है, " मां हिस्यात् सर्वभूतानि " यह निषेधशास्त्र है । दर्शन भी शास्त्र है, इसी दृष्टि-कोण के आधार पर कुछ विद्वानों ने व्याकरण एवं साहित्य आदि शास्त्रों को भी ' दर्शन ' की संज्ञा प्रदान की है । जैसे - न्यायदर्शन - मीमांसादर्शन- सांख्यदर्शन आादि दर्शनों को दर्शन संज्ञा प्रदान की गयी है और वह स्वाभाविक है | दर्शन इस चराचर दृश्यमान मिथ्याजगत् के अन्दर सत्य की खोज करता है एवं इस मिथ्या जगत् के ' आधारभूत उस वास्तविक तत्त्व का पता लगाता है । अनेक में एक का असद् में सत् का अन्वेषण करता है । इस दृश्यादृश्य जगत् के अन्तर्यामी परमतत्त्व ईश्वर का अनुसन्धान करता है । सांख्यदर्शन सांख्यदर्शन समस्त भारतीय दर्शनों में एक अत्यन्त ही प्राचीन दर्शन है । इस दर्शन के जन्मदाता महामुनि कपिल हैं । संख्या के प्राधान्य के आधार पर ही इस दर्शन को सांख्यदर्शन की संज्ञा प्रदान की गयी है । संख्या नाम दो का है-( १ ) एकत्व - द्वित्व - त्रित्व- बहुत्व आदि के व्यवहार के कारणीभूत गुणविशेष को संख्या माना है, यह पक्ष तो सार्वजनीन है अर्थात् सभी लोग एक, दो, तीन, चार एवं बहुत आदि का व्यवहार करते हैं । " एकत्वादिव्यवहारहेतुः संख्या " संख्या का दूसरा अर्थ अथवा नाम विवेकज्ञान भी है । यहाँ से दोनों ही अर्थ अथवा नाम संगत हैं । सांख्यदर्शन में ही सर्वप्रथम पञ्चविशति तत्त्वों का परिगणन किया गया है, वह पदार्थपरिगणन भी मोक्ष का प्रापक है और विवेक-ज्ञान भेदज्ञान का नाम है, वह प्रकृति और पुरुष का भेदाज्ञाननिबन्धन यह संसार CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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[ ३ ] है । और जिस समय हम प्रकृति और पुरुष के विषय में भेद को जान लेते हैं कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है उस समय हमारे लिये संसार का कोई अस्तित्व ही नहीं रह जाता है । यह विवेकज्ञानरूप भेदज्ञान भी इसी की विशेषता है । कहा

भी है-एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् ।

अविपर्ययाद्विशुद्धं केवल मुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ ६४ ॥

इस प्रकार सांख्यशास्त्र के अन्दर निर्दिष्ट पश्वविशति पदार्थतत्त्वों का तथा उनके अवान्तर भेदों का श्रद्धापूर्वक बराबर अभ्यास करते - करते संशय एवं भ्रम सें शून्य होने के नाते विशुद्ध प्रकृति और पुरुष का विवेकज्ञान = भेदज्ञान अर्थात् प्रत्यक्षात्मक कैवल्यज्ञान हो जाता है जिससे जीव सांसारिकबन्धनों से सर्वदा के लिये छुटकारा प्राप्त कर लेता है । इसी प्रकृति और पुरुष के विवेकज्ञान की प्रधानता के कारण इस दर्शन का नाम सांख्यदर्शन पड़ा । सांख्यतत्त्वमीमांसा इस सांख्यदर्शन के अन्दर पच्चीस तत्त्वों का अङ्गीकार किया जाता है । और उनकी मीमांसा भी बड़े ही अच्छे ढंग से इस दर्शन के अन्दर की गयी है । इन्हीं पञ्चविंशति पदार्थों के ज्ञानं ते जीव आध्यात्मिक आधिभौतिक तथा आधि-दैविक इन तीन प्रकार के दुःखों से सर्वथा छुटकारा प्राप्त कर लेता | सांख्य इन तीनों दुःखों के विनाश का कारण इसी विवेकज्ञान को अन्त में स्वीकार किया है । जैसे कि ----दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ । इससे तो केवल दुःखत्रयं के विनाशकारणीभूत वस्तु में जिज्ञासा का प्रदर्शन बतलाया । वह दुःखत्रय से विनाश का कारण कौन है, इसका स्पष्टीकरण ईश्वर-कृष्ण ने आगे की कारिका में किया है— " सद्विपरीत श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञ विज्ञानात् " इस प्रकार व्यक्त - अव्यक्त ( प्रकृति ) और ज्ञ ( पुरुष ) इनके भेदज्ञान से ही दुःखत्रय से छुटकारा प्राप्त होता है । इन पच्चीस प्रकार के पदार्थों का अन्तर्भाव ईश्वरकृष्ण ने केवल चार पदार्थों में ही कर दिया है । जैसे कहा भी है—

मूलप्रकृतिर विकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त ।

पोडषस्तु विकारो न प्रकृतिनं विकृतिः पुरुषः ॥

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[ ४ ] अर्थात् सांख्यदर्शन के अन्दर तात्त्विकदृष्टि से विचार करने पर संक्षेपतः चार प्रकार के पदार्थ ही ठहर पाते हैं-( १ ) सर्वप्रथम पदार्थ प्रकृति ' ही है जो कि इस दृश्यमान जगत् का मूल-कारण होने के नाते जनक है परन्तु जन्य नहीं है, वह नित्य है । सांख्य ने प्रकृति पुरुष और इन दोनों के संयोग को नित्य माना है । इस प्रकार सांख्य-दर्शन के अन्दर ये तीन ही नित्य पदार्थ हैं । : ( २ ) दूसरा पदार्थ " विकृति ” | विकृति नाम है कार्य का । विकृति-भूत पदार्थ का लक्षण है — " जन्यत्वे सति तत्त्वान्तरानारम्भकत्वम् ” अर्थात् जो पदार्थ किसी से उत्पन्न होने वाला तो अवश्य हो परन्तु किसी भी दूसरे पदार्थ का उत्पादक न हो सकता हो । जैसे - सांख्यमतसिद्ध षोडशपदार्थं । पाँच ज्ञाने-न्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच महाभूत, और एक मन । ( ३ ) कोई पदार्थ प्रकृति - विकृति उभयरूप है । इसका लक्षण है— ‘ “ जन्यत्वे सति जनकत्वम् " अर्थात् जो जन्य भी हो और जनक पांच तन्मात्राएँ महत्तत्त्व और अहङ्कारतत्त्व । ये किसी के तो किसी के जनक भी हैं । ( ४ ) और चतुर्थ पदार्थ सांख्यदर्शन में विलक्षण ही है । से जन्य ही है और न किसी का जनक ही है, जैसे – पुरुष । ( जीव ) को पुष्कर पलास के समान निर्लेप माना है । सांख्यदर्शन की प्राचीनता भी हो । जैसे जन्य हैं और जो न तो किसी सांख्य ने पुरुष छः प्रकार के पूर्वोक्त आस्तिकदर्शनों में सांख्यदर्शन बहुत ही प्राचीन दर्शन है । इसी लिये सभी दर्शनों में इसका गौरव और महत्त्व माना जाता है । इसके मूलभूत सिद्धान्त प्रायः उपनिषदों में पाये जाते हैं । सांख्यदर्शन ने कार्य और कारण को त्रिगुणात्मक स्वीकार किया है । सांख्यशास्त्रवेत्ता विद्वानों का कहना है कि हम संसार को अथवा संसार के समस्त पदार्थों को सुख - दुःख - मोहरूप अर्थात् त्रिगुणात्मक पाते हैं इसलिये उसका कारण भी त्रिगुणात्मक ही होना चाहिये । इसीलिये उन्होंने प्रकृति को ही जगत् का कारण माना है, कारण कि वह सत्त्वगुण - रजोगुण - तमोगुण त्रिगुणात्मक है, पुरुष वैसा न होने से कारण १. प्रकृति का लक्षण है अजन्यत्वे सति जनकत्वम् अर्थात् जो किसी का कार्य तो न हो परन्तु कारण अवश्य हो । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA