साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ — पृष्ठ 11–20

साङ्ख्य कारिका ईश्वरकृष्ण - गौड़पाद भाष्य, ज्वाला प्रसाद गौड़ · Chaukhamba Vidya Bhavan Varanasi · पृष्ठ 11–20

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[ ५ ] नहीं हो सका । छान्दोग्योपनिषद् में इन तीनों गुणों का वर्णन बहुत ही अच्छे ढंग से किया है । इसके अतिरिक्त गीता में भी इसका महत्त्व वर्णित है । बौद्धदर्शन के महाविद्वान् अश्वघोष ने स्व - रचित ' बुद्धिचरित ' महाकाव्य में भगवान् बुद्ध के गुरु को सांख्यशास्त्र का ज्ञाता बतलाया है । इतना ही नहीं, उन्होंने निष्पक्षभाव की दृष्टि से यह भी बतलाया कि सांख्यशास्त्र के प्रणेता कपिल गौतम बुद्ध से भी प्राचीन थे । महाभारत के शान्तिपर्व में भी सांख्यदर्शन के सिद्धान्तों का बहुत कुछ उल्लेख पाया जाता है । मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में सृष्टि का निरूपण ठीक सांख्यदर्शन की प्रक्रिया से सम्मत है । इसी प्रकार श्वेता-श्वतरोपनिषद् में भी सांख्यदर्शन के मूलभूत सिद्धान्त, उपलब्ध हैं । श्रीमद्भाग-वत में भी जिस स्थल में महामुनि कपिल तथा देवहूति का संवाद आता है उस स्थल में सांख्य के पदार्थों का विवेचन बड़े विस्तार के साथ किया गया है । सांख्यदर्शन की प्राचीनता के विषय में अधिक क्या कहा जाय, पाश्चात्य दार्शनिक विद्वान् श्री याकोबी ने भी स्पष्ट कहा है कि सांख्यदर्शन की प्राचीनता अक्षुण्ण एवं निर्विवाद है । सांख्यदर्शन सब दर्शनों में प्राचीन है इसमें किसी को भी मतभेद खड़ा ही नहीं करना चाहिए, और न किसी भी प्रकार का संशय विपर्यय अथवा विपरीतोद्भाव ही करना चाहिये । देखने से भी इसकी प्राचीनता स्पष्ट है कि उपनिषदों में, पुराणों में, स्मृति-ग्रन्थों में, धर्मग्रन्थों में एवं बौद्धग्रन्थों में सर्वत्र ही सांख्यदर्शन की चर्चा एवं पदार्थों का उल्लेख पाया जाता है । बौद्धआगमों में भी सांख्यदर्शन के कार्यकारणभाव सत्कार्यवाद आदि बहुत - से सिद्धान्तों के निराकरण करने की चेष्टा की गयी । अन्त में, उनका वह प्रयास सर्वथा असफल ही रहा । प्राचीन वस्तु का ही उत्तर-कालीन ग्रन्थों में, शास्त्रों में एवं आख्यायिकाओं में उल्लेख पाया जाता है । इससे इसकी प्राचीनता एवं महत्त्व तथा गौरव स्पष्ट है । सत्कार्यवाद कार्यकारणभाव एक सर्वसाधारण विषय है । कार्य को देखकर प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा में इस प्रकार की विचारधारा उत्पन्न होती है कि इसका कोई कारण अवश्य ही होगा । " अस्य अवश्यं किमपि कारणमस्ति इत्येतादृशानुभूतिबलात् सामान्यतः कारणस्य प्रतीतिर्भवति इदमेव अस्य कारणमिति रीत्या विशेषतः कारणं न प्रतीयते । " CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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[ ६ ] इस कार्यकारणभाव के विषय में वादी लोगों को बहुत - सी विप्रतिपत्तियाँ हैं । जैसे बौद्धविद्वानों का कहना है कि असत् कारण से सत्कार्य उत्पन्न होता है । अर्थात् खेत में जब बीज डाला, उसके बाद जब तक उस बीज का ध्वंस नहीं हो जायगा तब तक उससे अंकुरोत्पत्ति नहीं होती है, अतः बीज का ध्वंस = अभाव ही अंकुरोत्पत्ति में कारण है, स्वयं बीज नहीं । इसलिए विनष्ट बीज अर्थात् असद् बीज ही अंकुरोत्पत्ति करने में समर्थ हो सकता है । इससे स्पष्ट है, असत् कारण से सत्कार्य की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार वेदान्ती लोगों ने एक सब्रह्म का विव ' इस विश्व को माना है । जगत् का कारणीभूत ब्रह्म सत् है और उसका कार्य यह चराचर विश्व असत् है । इस प्रकार इनके मतानुसार सत् से असत् की उत्पत्ति होती है । नैयायिक तथा वैशेषिकों का कहना है कि सत् कारण से ही असत् कार्य की उत्पत्ति होती है । इनके यहाँ परमाणुओं को ही जगत् का कारण माना है । वे नित्य होने के कारण सत् हैं । और उनसे उत्पन्न होने वाले पृथिवी, जल आदि प्रलय में नष्ट हो जाने के नाते असत् हैं । इसलिये इनके यहाँ सत् से असत् की उत्पत्ति होती है यह कहिये, अथवा नित्य से अनित्य की उत्पत्ति होती है, यह भी विनिगमनाविरहप्रयुक्त कह सकते हैं! सांख्यों का कहना है कि कारण भी सत् है, और कार्य भी सत् है । सांख्यमत में भावात्मक नित्य प्रकृति ही जगत् का कारण मानी गयी है । और कार्य अनागत अवस्था से ही कारण के अन्दर पहिले से ही विद्यमान है । कारणसामग्री किसी भी कार्य की उत्पत्ति, नहीं करती है बल्कि वह सामग्री कार्य की अभिव्यक्ति करती है । उत्पत्ति से पहिले भी कार्य अपने कारण के अन्दर अव्यक्तरूप से विद्यमान है । इसलिए कार्य और कारण में वास्तव में अभेद है । कार्य की अव्यक्तावस्था का नाम / कारण है । तथा कारण की व्यक्तावस्था का नाम कार्य है । अवस्थामात्र का भेद है, कार्य और कारण में भेद नहीं है । अतः इससे स्पष्ट सिद्ध है कि जब कारण नित्य होने के नाते सत् है तो उससे अभिन्न कार्य को असत् कैसे कहा जा सकता है । इसके अतिरिक्त सांख्यशास्त्रियों ने कार्य को सत् सिद्ध करने के लिए पाँच हेतुओं वाले अनुमान का भी प्रदर्शन किया है । अर्थात् कारण के व्यापार से पहिले भी कार्य सत् है । इसी अनुमान को सांख्यकारिका के रूप में दिख-लाया है-_असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत् कार्यम् ॥ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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अर्थात्-( १ ) कार्यं ( २ ) कार्यं ३ ) कार्य ( ४ ) कार्यं ( ५ ) कार्यं इनका विशेष [ ७ ] सत् असदकरणात् । सत् उपादानग्रहणात् । सत् सर्वसम्भवाभावात् । सत् शक्तस्य शक्यकरणात् । सत् कारणभावात् ( कारणात्मकत्वात् ) । विवेचन वाचस्पति की कौमुदी टीका में देखा सांख्यदर्शन की उपयोगिता जाय । सांख्यदर्शन के विषय में कुछ विद्वानों का ऐसा कहना है कि सांख्यदर्शन के साथ जब कि योगदर्शन की पूर्णरूप से एकवाक्यता है अर्थात् सांख्यदर्शन में उल्लिखित सभी पदार्थ योगदर्शन में ज्यों के त्यों स्वीकृत हैं तब फिर क्या आवश्यकता है सांख्यदर्शन की? क्यों कि सांख्यदर्शन तो योगदर्शन से ही गतार्थ हो जाता है । इसके कई उत्तर दिये गये हैं जिनमें एक उत्तर यह भी है कि एकवाक्यता पदार्थों अथवा विषय की कुछ ही अंश में है, न कि सर्वांश में । इस प्रकार की एकवाक्यता तो कुछ अंश को लेकर सर्वत्र ही हो सकती है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह सर्वथा इतर से गतार्थ ही हो जायेगा । और गतार्थ हो हो जाने से इतर को वैयर्थ्य की आपत्ति दे दी जाय, इत्यादि । सांख्य में पञ्चविंशतिपदार्थों के ज्ञान को ही एकमात्र मुक्ति - साधन बतलाया है और योगदर्शन में योग क्रियाजन्यज्ञान मोक्ष का साधन है । इस प्रकार सांख्यदर्शन के अन्दर ज्ञान की प्रधानता है और योगदर्शन के अन्दर क्रिया की प्रधानता है, इस प्रकार साधनों में भेद स्पष्ट है । दूसरी बात यह कि सांख्यदर्शन के अन्दर आत्मतत्त्व का विवेचन अवश्य है परन्तु वह आत्म-तत्त्व जीव हैं न कि ईश्वर । ईश्वर का तो सांख्य में उल्लेख ही नहीं मिलता है । इसी लिये यह दर्शन निरीश्वरवादी दर्शन कहलाता है । ईश्वर को लेकर योग-दर्शन में पदार्थों की गणना छब्बीस हो जाती है और सांख्यदर्शन में वही पच्चीस को पच्चीस ही है । इसके अतिरिक्त दोनों दर्शनों में विषय का भी वैषम्य है । योगदर्शन में सर्वप्रथम चित्त की वृत्ति के निरोध को योग बतलाते हुए उन्होंने CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 14

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[ < ] वृत्तिनिरोध के साधनों का आमूल उल्लेख किया है जो कि सांख्यदर्शन में सर्वथा अनुपलब्ध है । कुछ दार्शनिकों ने सांख्यदर्शन के विषय में अवैदिकत्व की आशंका की कि इसमें ईश्वर का निरूपण नहीं है इसलिये यह दर्शन भी निरीश्वरवादी दर्शन • होने के नाते चार्वाक आदि दर्शनों के समान नास्तिक दर्शन है, अतः उन दर्शनों के समान यह भी अवैदिक दर्शन है, इत्यादि रूप से बहुत से आक्षेप - विक्षेप इसके ऊपर किये गये । परन्तु इस प्रकार के आक्षेप सर्वथा निर्मूल होने के नाते सर्वथा भ्रान्तिपूर्ण हैं । क्योंकि हमारे यहाँ नास्तिक की परिभाषा " नास्तिको वेदनिन्दकः " इस रूप से वेद की निन्दा करने वाले को लक्ष्य बनाकर ही की गयी है । यह दर्शन न तो स्वयं वेदनिन्दक है और न इसका अध्ययन करने वाले ही वेदनिन्दक हैं । तब फिर इसे नास्तिकदर्शन कहना दूसरे लोगों की आंखों में धूल झोंकना है । इस प्रकार धूल झोंककर उन्हें भ्रमान्धकार में डालना है । दूसरी बात यह भी है कि इस सांख्यदर्शन के आदि जन्मदाता महामुनि कपिल ने स्वयं वेदों के प्रामाण्य का अङ्गीकार किया है । सांख्यसूत्र के प्रथम अध्याय तथा तृतीय अध्याय में स्पष्टरूप से ईश्वर की सत्ता का उल्लेख मिलता है । सांख्यकारिका अथवा सांख्यतत्त्वकौमुदी आदि ग्रन्थों में ईश्वर का उल्लेख नहीं है तो निषेध भी नहीं है । इस प्रकार हो सकता है कि विषयान्तर विषयक अपेक्षा बुद्धि होने के कारण ईश्वर की तरफ से उपेक्षाबुद्धि हो गयी हो, विषयान्तर विषयक अपेक्षाबुद्धि ईश्वरविषयक अपेक्षाबुद्धि की प्रतिबन्धक बन गयी हो, इत्यादि बहुत से कारण हो सकते हैं । " ईश्वरासिद्धेः ” इस सांख्यसूत्र के आधार पर जो ईश्वर के अभाव का अथवा ईश्वर के अस्तित्वाभाव का निश्चय कर बैठते हैं, वे भी सर्वथा भ्रान्त हैं । कारण कि सूत्र में तो ईश्वर की असिद्धि = अनिश्चय का प्रदर्शन किया है न कि उसके अभाव का । असिद्धि तो कारणान्तरप्रयुक्त भी हो सकती है । एक बार मैं अँधेरी कोठरी में सो रहा था, कई लोग मुझे देखने और पूछने को आये । सबको मना कर दिया कि नहीं है । मुझे उस अँधेरी कोठरी में भी देखा परन्तु अन्धकार होने के कारण मैं न दीख़ सका । मेरी चाक्षुषप्रत्यक्षात्मिका सिद्धि उन्हें न हो पायी । इसका एकमात्र कारण आलोकसंयोग का न होना ही हो सकता है: क्यों कि चाक्षुषप्रत्यक्ष के प्रति महत्त्वावच्छिन्न उद्भूतरूपा-CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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[ ९ ] वच्छिन्न- आलोकसंयोगावच्छिन्न चक्षुः संयोग को सिद्धान्ततः कारण माना गया है । प्रकृत में आलोकसंयोगावच्छिन्नत्वरूप विशेषण से विशिष्ट चक्षु अथवा चक्षुः-संयोग नहीं है इसलिये दोष नहीं है । जिस प्रकार यहाँ आलोकसंयोगरूप कारण असिद्धि का हेतु हो रहा है, परन्तु वह मेरे अभाव का अथवा मेरे अस्तित्व के अभाव का कारण नहीं है, उसी प्रकार ' ईश्वरासिद्धेः ' इस सूत्र में भी समझना चाहिये । दर्शनों में वैषम्य क्यों? हमारी मूलभूत संस्कृति के आधार वेद हैं । वेदों के अन्दर आध्यात्मिक विज्ञान का तथा उससे सम्बन्धित विषयों का प्रतिपादन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है । साधारणरूप से वेदों में आत्मज्ञान - ईश्वरज्ञान - तत्त्वज्ञान- ब्रह्मज्ञान एवं अहिंसा - सत्य तप - ब्रह्मचर्य - भक्तिधर्म योग एवं यज्ञ आदि विषयों का वर्णन बड़े ही सुचारु ढंग से किया गया है । उसमें भी सभी विषय तो सबको अभिप्रेत नहीं होते हैं, किन्तु उनसे जो विषय जिसको मुख्यरूप से अभिप्रेत होता है वह व्यक्ति उसी विषय को लक्ष्य कर प्रवृत्तिशील बनता है । और उसी की प्राप्ति तथा उसी की सिद्धि के लिये सर्वथा अपने अन्तःकरण का, बुद्धि का तथा शरीर एवं बाह्य इन्द्रियों का प्रयोग भी करता है । महामुनि कपिल को तत्त्वज्ञान अपेक्षित था, पतञ्जलि को योग, कणाद और गौतम को पदार्थतत्त्व, जैमिनि को योग आदि सत्कार्यकलाप, मनु को धर्म, महर्षि देवव्यास जी को ब्रह्मज्ञान, नारद जी को भक्ति और मनु को धर्म इत्यादि विषय प्रिय एवं अभिप्रेत थे । वे उन्हीं अपने - अपने विषयों में प्रवृत्तिशील भी रहते थे । कारण कि ये सभी विषय मोक्ष के प्रति साक्षात् परम्परया कारण माने गये हैं । हमारे प्राचीन आचार्यों ने इन्हीं विषयों के आधार पर विभिन्न दर्शनों का निर्माण किया है । कणाद गौतम को पदार्थवाद ही प्रिय और अभिप्रेत था इसलिये उन्होंने पदार्थशास्त्र न्याय तथा वैशेषिक का प्रणयन किया । महर्षि व्यास जी को आत्म-ज्ञान ( ब्रह्मज्ञान ) प्रिय था । उन्होंने तदनुकूल ही वेदान्तदर्शन का प्रणयन कर दिया । जैमिनि को यागादिसत् कर्मकलाप अपेक्षित था इसलिये उन्होंने मीमांसा-दर्शन की रचना की । भगवान् मनु को धर्म प्रिय था इसलिये उन्होंने तदनुकूल मनुस्मृति की रचना कर दी । भगवान् पतञ्जलि को योग प्रिय था इसलिये उन्होंने योगदर्शन का ही स्वतन्त्ररूप से निर्माण कर डाला । इसी प्रकार हमारे CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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[ १० ] महामुनि श्री कपिल जी को पचविशति तत्त्वज्ञान अपेक्षित था, तदनुकूल उन्होंने सांख्यदर्शन का निर्माण कर दिया । इस प्रकार अपना - अपना लक्ष्य पूरा करने के लिये भिन्न - भिन्न ऋषि महर्षियों ने यथा शक्ति भिन्न - भिन्न शास्त्रों का, दर्शनों एवं ग्रन्थों का प्रणयन कर डाला । यही दर्शनों के वैषम्य का प्रधान कारण है । और दर्शनों का यह परस्पर का वैषम्य ही उनकी विभिन्नता का कारण है । इसी लिये कहा भी है-श्रुतयो s पि भिन्नाः स्मृतयोऽपि भिन्नाः नको मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् ॥ अन्त में कहा है कि - " महाजनो येन गतः स पन्था । " अपने - अपने द्वारा रचित शास्त्र के प्रामाण्य को स्वीकार करके इन लोगों ने आगे कदम बढ़ाया । और इनके द्वारा रचित इन शास्त्रों का प्रामाण्य समस्त आस्तिक जनताजनार्दन ने स्वीकार किया । भगवान् कृष्ण ने भी उस प्रामाण्य को स्वीकार करते हुये स्वयं कहा है- 1 " तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ " इस प्रकार भिन्न - भिन्न शास्त्रों में भिन्न - भिन्न विषयों के विवेचन के कारण विषयों के वैषम्य प्रयुक्त दर्शनों में विभिन्नता एवं विषमता पायी जाती है । विषयों की परस्पर में विभिन्नता एवं विषमता ही दर्शनों के भेद और वैषम्य का कारण है । - ज्वालाप्रसाद गौड़ CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 17

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गौडपादभाष्यसहिता सांख्यकारिका ' भाष्यभाववर्णिनी ' संस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपेता

दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदभिघातके हेतौ ।

दृष्टे सापार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥ १ ॥

• गौडपादभाष्यम् •

कपिलाय नमस्तस्मै, येनाविद्योदधौ जगति मग्ने ।

कारुण्यात् सांख्यमयी, नौरिव विहिता प्रतरणाय ' ॥ १ ॥

अल्पग्रन्थं स्पष्टं प्रमाणसिद्धान्तहेतुभिर्युक्तम् ।

शास्त्रं शिष्य हिताय समासतोऽहं प्रवक्ष्यामि ॥ २ ॥

दुःखयेति । अस्या आर्याया उपोद्घातः क्रियते । इह भगवान् ब्रह्म-सुतः कपिलो नाम, तत् यथा— सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ।

आसुरिः कपिलश्चैव वोढुः पञ्चशिखस्तथा ।

इत्येते ब्रह्मणः पुत्राः सप्त प्रोक्ता महर्षयः ॥

१. सत्त्वरजस्तमोभिस्त्रिगुणैः प्रतायमानेऽमुष्मिन्मायाप्रपञ्चे निमज्जतां प्राणिनामुद्धरणार्थं ' संख्यां प्रकुर्वते चैवं प्रकृति च प्रचक्षते । चतुर्विंशतितत्त्वानि ते । सांख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ' इत्याद्युक्तदिशाऽन्वर्थसंज्ञा सांख्यदर्शनात्मिका नौरिव येन महर्षिणा विनिर्मिता तस्मै नम इति भावः । २. दृष्टादीनि प्रमाणानि सत्कार्यवादादिरूपाः सांख्य सिद्धान्ताः अव्यक्ता-दिप्रमेयसाधकतवश्च तैर्युक्तमित्यर्थः । ३. प्रासङ्गिकं पीठमारच्यत इत्यर्थः CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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२ सांख्यकारिका कपिलस्य सहोत्पन्नानि ' धर्मो ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यश्व ' इति एवं स ‘ उत्पन्न: ’ सन् अन्धे तमसि मज्जज्जगदालोक्य संसारपारम्पर्येण सत्कारुण्यो जिज्ञासमानाय आसुरिगोत्राय ब्राह्मणाय इदं पञ्चविंशतितत्वानां ज्ञानम्, उक्तवान्, यस्य ज्ञानाद् दुःखक्षयो भवति— पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन् । जटी मुण्डी शिखी वापि मुच्यते नात्र संशयः । तदिदमाह– दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासेति । तत्र दुःखत्रयम् आध्या-त्मिकम् आधिभौतिकम् आधिदैविकं चेति । तत्राध्यात्मिकं द्विविधं - शारीरं मानसं चेति । शारीरं वातपित्तश्लेष्मविपर्ययकृतं ज्वरातीसारादि । मानसं प्रिय-वियोगा प्रियसंयोगादि । आधिभौतिकं चतुविधभूतग्रामनिमित्तं ' मनुष्य पशु-मृगपक्षिसरीसृपदंशमशकयूका मत्कुण मत्स्य मकरग्राहस्थावरेभ्यो जरायुजाण्डजस्त्रे-दजोद्भिज्जेभ्यः सकाश।दुपजायते । आधिदैविकं देवानामिदं दैवम्, दिवः प्रभव-तीति वा दैवं तदधिकृत्यं २ यदुपजायते शीतोष्णवातवर्षाशनिपातादिकम् । एवं यथा दुःखत्रयाभिघाता उज्जिज्ञासा कार्या । क्व? तदभिघातके हेतौ । तस्य दुःखत्रयस्य अभिघातको योऽसौ हेतुस्तत्रेति । ' दुष्टे सापार्था चेत् ' दृष्टे तो दुःखत्रयाभिघातके सा जिज्ञासाऽपार्था चेद् यदि, तत्राध्यात्मिकस्य द्विविधस्यापि आयुर्वेदशास्त्र क्रियया प्रियसमागमा प्रियपरिहारकटुतिक्तकषायक्वा-थादिभिर्दृष्ट एवं आध्यात्मिकोपायः, आधिभौतिकस्य ४ रसादिनाऽभिधातो दृष्टः, दृष्टे साऽपार्था चेदेवं मन्यसे न ऐकान्तात्यन्ततोऽभावात् । यत एकान्ततोऽयमत्यन्ततो नित्यं दृष्टेन हेतुनाऽभिघातो न भवति, तस्मादन्यत्र " एकान्तात्यन्ताभिघातके हेती जिज्ञासा विविदिषा कार्येति ॥ १ ॥

१. अनुपदवक्ष्यमाणजरायुजादि चतुर्विधभूतसमुदायोत्थम् । २. नन्निमित्तीकृत्येत्यर्थ ' । ३. इत्युक्तदुःखत्रयाभिसम्बन्धादित्यर्थः । ४. निरत्ययस्थानवास नीतिशास्त्रानुसरणादिरूपरक्षा दिनेत्यर्थः । इद-मुपलक्षणम् - आधिदैविकस्यापि दुःखस्य मणिमन्त्रौषधादिनाऽभिघातो द्रष्टव्यः 1 पूर्वपक्षमुपसंहरति- दृष्ट इति । ५. पूर्वोक्तदृष्टोपायाद्भिन्ने सांख्यशास्त्र जन्यतत्त्वज्ञानरूप इत्यर्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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संस्कृत - हिन्दी- व्याख्योपेता • भाष्यभाववर्णिनी G

यदज्ञानप्रभावेण भासते सकलं जगत् ।

यज्ज्ञानाच्छेय आप्नोति तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥

अन्वयः -- दुःखत्रयाभियातात् तदपघातके, हेती, जिज्ञासा ( भवति ) दृष्टे सा, अपार्था, चेत्, न एकान्ताऽत्यन्ततोऽभावात् । व्याख्या - दुःखानां ' त्र्यं ' दुःखत्रयम्, ' तच्च ' आध्यात्मिकम् - आधिभौतिकम् आधिदैविकश्च तेषाम् ( आत्मनि ) अभिघातात् = सम्बन्धात् । तदपघातके = तस्य दुःस्वत्रयस्य, अपघातके, विनाशके । हैती = कारणे । जिज्ञासा = दुःखत्रयस्य ' विनाशकारणं किमिति ' ज्ञातुमिच्छा ( भवतीति शेष: ) । दृष्टे = दृष्टोपाये अर्थात् ' औपधसेवनात्मके, कामिन्या उपभोगात्मके ' च ' दृष्टकारणे ' सति । सा = जिज्ञासा । अपार्था = निरस्ता । भवेत् ) । चेत् । न । एकान्ताऽत्यन्ततोऽभावात् = एकान्तम् - दुःखनिवृत्तेरवश्यंभावः, अत्यन्तम्- निवृत्तस्य ' दुःखस्य ' पुनरनुत्पत्तिः, तयो अभावात् । अर्थात् ऐकान्तिक - आत्यन्तिकरूपेण दुःखनिवृत्तेरभावादित्यर्थः अर्थात्. ' दृष्टोपायेन ' ऐकान्तिक ( आवश्यक ) रूपेण तथा ' आत्यन्तिकरूपेण ' दुःख-निवृत्तिर्न भवतीति भावः ॥ १ ॥

हिन्दी - संसार के अन्दर आकर प्राणिमात्र जब कि आध्यात्मिक, आधि-भौतिक तथा आधिदैविक इन तीन प्रकार के दुःखों का अनुभव करता है तब उस समय उन तीनों प्रकार के दुःखों के विनाश के कारण में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि उनकी निवृत्ति का कारण कौन है? और यदि वह जिज्ञासा दुःख की निवृत्ति विनाश ) के कारणीभूत औषध सेवन अथवा कामिनी ( सुन्दर स्त्री ) के उपभोग रूप दृष्ट उपाय से ही शान्त हो जाती है तो शास्त्र के आधार पर होने वाले दुरधिगम तत्त्वज्ञान की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर दिया कि पूर्वोक्त तीनों प्रकार के दुःखों की निवृत्ति दृष्ट उपाय से ऐकान्तिक ( आवश्यक ) रूप से तथा आत्यन्तिक ( फिर कभी भी दुःख उत्पन्न न हो! रूप से नहीं होती है । अतः उनकी निवृत्ति के लिये शास्त्र में होनेवाला तत्त्वज्ञान ही श्रेयस्कर है ॥ १ ॥

दृष्ट उपाय से दुःखनिवृत्ति न हो किन्तु ज्योतिष्टोमादियागात्मक वैदिकः. उपाय से ही दुःखत्रय की निवृत्ति ऐकान्तिक तथा आत्यन्तिक रूप से हो जायगी श्रुति भी कहती है कि - ' स्वर्गकामो यजेत ' अर्थात् याग से स्वर्ग होता है और ' CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

पृष्ठ 20

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४ सांख्यकारिका स्वर्ग उस सुखविशेष का नाम है जो कि न तो दुःख मिश्रित हो और होने के पश्चात् दुःख ग्रस्त न हो तथा जिसके होने के अनन्तर इच्छानुसार वस्तु की प्राप्ति होती रहे । अतः दुःख की निवृत्ति के लिये शास्त्रजन्य ज्ञान की क्या आवश्यकता है? इस शंका को दूर करने के लिये कहते हैं--वृष्टवदानुभविक स ह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः । तद्विपरीतः श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥ २ ॥

गौ ० - ' यदि ' दृष्टादन्यत्र जिज्ञासा कार्या, ततोऽपि नैव, यत आनुश्रविको हेतुः दुःखत्रयाभिघातकः अनुश्रूयत इत्यनुश्रवस्तत्र भवः, आनुभविकः, स च आगमात् सिद्धः ।

यथा -- अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान् ।

किंवा नूनमस्मान् तृणवदरातिः किमु धूर्ति रमृतमर्त्यस्य ॥

२ कदाचिदिन्द्रादीनां देवानां कल्प आसीत् कथं वयममृता अभूमेति विचार्य, यस्माद्वयमपाम सोमं पीतवन्तः सोमं तस्मादमृता अभूम अमरा भूतवन्त इत्यर्थः । किं च, अगन्म: ज्योति. - गतवन्तः लब्धवन्तः ज्योतिः स्वर्गमिति । अविदाम देवान् - दिव्यान् विदितवन्तः । एवं च किं नूनमस्मान् तृणवदरातिः, नूनं निश्चित क्रिमरातिः शत्रुरस्मात् तृणवत् कर्तेति । किमु धूर्तिरमृतमर्त्यस्य धूतिर्जरा हिंसा वा किं करिष्यति अमृतमर्त्यस्य ३ । अन्यच्च वेदे श्रूयते आत्यन्तिकं फलं पशुवधेन -- ' सर्वाल्लोकान् जयति मृर्त्य तरति पाप्मानं तरति ब्रह्महत्यां तरति योऽश्वमेधेन यजते ' इति । एकान्तात्यन्तिके एवं वेदोक्ते ' अपार्थैव जिज्ञासा ' इति, न । उच्यते दृष्टवदानुश्रविक इति । दृष्टेन तुल्यो दृष्टवत्, आनुश्रविकः कस्मात् स दृष्टवत्? यस्मादविशुद्धिक्ष यातिशययुक्तः अविशुद्धियुक्तः पशुघातात् । १. शङ्कते - यदीति । नैवेति । दृष्टोपायातिरिक्ते सांख्यशास्त्र जन्यतत्त्वज्ञान-विषये जिज्ञासा नैव कार्या- इति शेषः । तत्र हेतुमाह -- यत इति । २. सेतिहासम्मन्त्रार्थमाह- कदाचिदिति । कल्पः — न्यायः । ३. दिव्यशरीरस्य मे इत्यर्थः । आनुश्रविककर्मकलापस्यात्यन्तिकदुःखनिवृत्ती प्रमाणान्तरमाहान्यच्चेति । पशुवधेन - तन्निमित्तेन यागादिकर्मणेत्यर्थः । ४. आत्यन्तिकैकान्तिकदुःखपरिहार के वैदिके कर्मणि सुकरे उपाये विद्यमाने सति दुष्करे शास्त्रोक्ततत्वज्ञानरूपे जिज्ञासा व्यर्थेवेत्यर्थः । CC - 0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA