Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 1–10

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1–10

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1 का मूल पृष्ठ
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ॐ शतपथब्राह्मण - हिन्दी- विज्ञानभाष्य- प्रथमकाण्डान्तर्गत " प्रथम अध्यायात्मक ” प्रथमखण्ड १ निबन्धा - मोतीलालशम्र्मोपाह्रो - यः कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा, आङ्गिरसो भारद्वाजः वेदवीथी- पथिकः, जयपत्तनाभिजनः ( पुनःप्रकाशनाधिकार एकमात्र निबन्धा से ही अनुप्राणित ) ‘ राजस्थानवैदिकतच्वशोधसंस्थानजयपुर ' के द्वारा प्रकाशित एवं श्रीवालचन्द्रयन्त्रालय, मानवाश्रम दुर्गापुरा - जयपुर के द्वारा मुद्रित *** प्रथमवार ५०० प्रति पत्रिका संशोधित मूल्य 400-00 या प्रकाराम पत्रिकाप्राइवेट संशोधित मु जेवपुर ।( राज ) *

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श्रीः संस्थान के द्वारा प्रकाशित - ग्रन्थसूची-( ले ० मोतीलाल शर्मा, आङ्गिरसो भारद्वाजः ) १ – गीताविज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत - ' बुद्धियोगपरीक्षा ' नामक पञ्चम - खण्ड ५ – वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्वम् ( संस्कृत - निबन्ध ) ३० ) २ – उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका द्वितीयखण्ड १५ ) ३ – उपनिषद्विज्ञानमाप्यभूमिका तृतीयखण्ड ५५ ) ४ – भा ० हि ० निबन्धान्तर्गत- ' विश्वस्वरूपमीमांसा ' नामक प्रथमखण्ड १२ ) { ॥ ) :.. १। ) २ ) I २ ॥ ) २५ ) २५ ) ६ ) ६ - भारतीय दृष्टिकोण से ' विज्ञान ' शब्द का समन्वय - विचार... ७ – वेद का स्वरूप -1 -क्या हम मानव हैं? ( सांस्कृतिक - आमन्त्रण ) ह – दिग्दशकालस्वरूपमीमांसा १० – शतपथब्राह्मण हिन्दीविज्ञानभाष्यान्तर्गत - प्रयमखण्ड ११ – राष्ट्रपतिभवनानुगत - व्याख्यानपञ्चक # ( १ ) – सम्वत्सरमूला अग्नीषोमविद्या ( २ ) पञ्चपर्वात्मिका विश्वविद्या ( ३ ) – ' मानव ' का स्वरूप - परिचय ( ४ ) – ' अश्वत्यविद्या का स्वरूप - परिचय ( प्रथमव्याख्यान ) ( द्वितीय " ) " ( तृतीय > " > " > ( चतुर्थ ( ५ ) - वेदशास्त्र के साथ पुराणशास्त्र का समन्वय ( पञ्चम प्राप्तिस्थान-त्र्यत्रस्थापक - राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थान ( दुर्गापुरा जयपुर - राजस्थान ) राष्ट्रपतिभवन के टेपरेकाडों के आधार पर प्रकाशित, एवं महामहिम श्रीराष्ट्रपति महाभाग के प्रास्ताविक से ग्रनुगत

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श्रीः महामहिम राष्ट्रपति श्री डॉ ॰ राजेन्द्रप्रसादजी महाभाग के सचिव - द्वारा प्राप्त ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थान ' मानवाश्रम दुर्गापुरा ( जयपुर ) का ‘ प्रधान संरक्षतानुगत - प्रमाणपत्र ' अत्यन्त सम्मान से यहाँ उद्घृत होरहा है— भारत के राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद राजस्थान - वैदिक तत्वशोध संस्थान - जयपुर · का प्रधान संरक्षक बनने की स्वीकृति प्रदान करते हैं । मिलिट्री सेक्रेट्री ऑफिस राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली भारत के राष्ट्रपति के आदेशानुसार यदुनाथसिंह ( यदुनाथ सिंह ) मेजर जनरल दिनांक 30 अग I १ ९ ५६, मिलिट्री सेक्रेट्री टू दि प्रेसिडेन्ट

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श्रीः - मानवोक्थवैराजिक- ब्रह्मोद्य – मानवाश्रम के द्वारा प्रकाशित - ग्रन्थसूची ( ले ० मोतीलालशम्मो, आङ्गिरसो भारद्वाजः ) १ – ईशोपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य- प्रथमखण्ड १२ ) २ – ईशोपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य - द्वितीयखण्ड १२ ) ३ – गीताविज्ञानभाष्यभूमिकान्तर्गत - ' बहिरङ्गपरीक्षा ' नामक प्रथमखण्ड १३ ) 8-' आत्मपरीक्षा ' नामक द्वितीयखण्ड १३ ) 99 ५– ' ब्रह्मकर्म्मपरीक्षा ' नामक तृतीयखण्ड ## 59 १५ ) " है-" " ६– ' कर्मयोगपरीक्षा ' नामक चतुर्थखण्ड # ७ – उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथमखण्ड ८ - श्राद्ध विज्ञानान्तगत- ' आत्मविज्ञानोपनिषत् ' नामक प्रथमखण्ड १० – संस्कृति, और सभ्यता, शब्दों का चिरन्तन इतिवृत्त, एवं भारतीय-१५ ) १२ ) २० ) ' सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत् ' नामक तृतीयखण्ड १५ ) सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा २५ ) # - चिह्नाङ्कित ग्रन्थ पुनः प्रकाशन - सापेक्ष हैं । प्राप्तिस्थान-व्यवस्थापक- प्रकाशन विभाग-' मानवाश्रम विद्यापीठ ', दुर्गापुरा जयपुर ( राजस्थान )

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उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री माननीय श्रीसम्पूर्णानन्दजी द्वारा संस्थान के महीयान् प्रकाशन शतपथ ब्राह्मण की प्रस्तावना स्वरूप लिखित ' दो शब्द ' इधर शताब्दियों से वैदिक कर्मकाण्ड पर से लोगों की आस्था उठ गई । जहाँ तक कि मुझे ज्ञात है समुद्रगुप्त का अश्वमेध अन्तिम वैदिक महायज्ञ था । यों तो हिन्दुओं की छोटी सी छोटी पूजा में किसी न किसी देवी देवता का नाम लेकर अग्नि में चार आहुतियाँ डाल दी जाती हैं और. प्रति वर्ष चण्डीयाग और सहस्र चण्डीयाग नाम के कृत्यों के सम्पादन की सूचना मिलती रहती है, परन्तु अब अश्वमेध और वाजपेय जैसे यज्ञ नहीं होते । अश्वमेघ या राजसूय यज्ञ करने के अधि--कारी अब नहीं रह गए । वाजपेययज्ञ करने की किसी ब्राह्मण में श्रद्धा नहीं रहगई । ऐसी अवस्था में कर्मकाण्ड सम्बन्धी वाङमय स्वभावतः नीरस प्रतीत होता है । मुझे स्मरण है कि जब मैं आज़ से कई साल पहले जेल में ऐतरेय ब्राह्मण देख रहा था तो एक आदरणीय मित्र ने जिनको धार्मिक साहित्य से अभिरुचि है पुस्तक के दो एक पृष्ठों को देखने के बाद मुझसे कहा कि आपकी तबियत इन चीजों में कैसे लगती है । वस्तुतः ब्राह्मण ग्रन्थ सूखे कर्मकाण्ड की विधि बतलाने वाली रचना नहीं है । उनमें तत्कालीन भारतीय समाज का कई दृष्टियों से चित्र मिलता है और साथ ही दार्शनिक विचार-विमर्श भी देख पड़ता है । एक बार रुचि उत्पन्न हो जाने पर अध्ययन जारी रखने को जी चाहता है । ब्राह्मण ग्रन्थों में शतपथ ब्राह्मण का स्थान बहुत ऊँचा है । यह शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है | अपने रचनाकाल के विषय में यह पुस्तक स्वयं यह प्रश्न उठाकर संकेत करती है ' क्व हि पारीक्षिताः गताः? ' - पारीक्षित कहाँ गये? इसका तात्पर्य यह हुआ कि पारीक्षित वंश के पीछे समूचे ग्रन्थ की नहीं तो कुछ अंशों की अवश्य ही रचना हुई । इसमें दिये हुए मात्र त्रिदेव की कथा भी यह बतलाती है कि उस समय भार्य लोग मगध तक फैल गये थे और पर्याप्त वाद - विवाद के बाद यह निश्य किया गया कि वैदिक यज्ञ पवित्र सप्तसिन्धव मगध में भी किये जा बाहर सकते हैं । यह स्वयं धार्मिक इतिहास का रोचक अध्याय है । इसी ब्राह्मण की अंगभूत प्रसिद्ध वृहदारण्यकोपनिषत् है । वह स्वयं उस काल की बहुत सी बातों पर अद्भुत प्रकाश डालती है । दृप्त बालाकि की कथा यह बतलाती है कि ब्रह्मविद्या पहले क्षत्रियों के पास थी । ब्राह्मण उसे नहीं जानते थे | बहुत संकोच के बाद ब्राह्मणों को उसका उपदेश दिया गया । श्रीकृष्ण ने भी गीता में इसे राजगुह्य कहा है और इसके ज्ञाताओं में जनक आदि क्षत्रियों का ही नाम लिया है । फिर इससे यह भी प्रतीत होता है कि स्त्रियाँ न केवल ब्रह्मविद्या की पात्र मानी जाती थीं वरन् राजसभा में पुरुषों के साथ बराबरी के स्तर पर शास्त्रार्थ करती थीं । याज्ञवल्क्य ने और कई प्रतियोगियों को तो सुगमता से परास्त कर दिया, परन्तु एक महिला के सामने उनको कठिनाई पड़ी और अन्त में उन्हें योगसिद्धि का सहारा लेना पड़ा | उनको कहना पड़ा कि यदि तू इसके आगे कोई वादविवाद करेगी तो “ सूधा ते त्र्यपतिष्यति ” तेरा सिर गिर जायगा । अस्तु, ब्राह्मणग्रन्थ अनेक दृष्टियों से उपादेय हैं । और इनमें शथपथ का स्थान बहुत ऊँचा है । इसका प्रकाशन करके जयपुर के “ राजस्थान वैदिक-तत्त्व शोधसंस्थान " ने वहुत ही उपयोगी काम किया है । और वह इसके लिए हमारी कृतज्ञता का पात्र है । लखनऊ कार्तिकशुक्ल २, सं ० २०१५ सम्पूर्णानन्द

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श्रीः ' राजस्थानवैदिकतत्त्वशोधसंस्थानजयपुर ' के लिए सत्तातन्त्रानुबन्धेन सर्वप्रथम सहायता प्रदान करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री भारतीय संस्कृति - मज्ञ महामान्य डॉ ० श्रीसम्पूर्णानन्दजी महाभाग के सास्कृतिक- करकमलों में संस्थान की ओर से सम्मानपूर्वक महामान्य मुख्यमन्त्री महाभाग! समर्पित सम्प्रदायवाद - मतवादनिरपेक्षा, ज्ञानविज्ञानात्मिका भारतराष्ट्र की इस प्राच्य -सांस्कृतिक निधि के सम्बन्ध में विगत १५-२० वर्षों से भारतीय सत्तातन्त्रों के ध्याना -कर्पण के लिए जो प्रयास प्रक्रान्त थे, सर्वप्रथम आपके उत्तरप्रदेश - सत्तातन्त्रने हीं उस सुदीर्घ प्रयास को श्रंशतः सफल बनाने का जो निस्सीम अनुग्रह किया, तत्-कृतज्ञता - ज्ञापनार्थ ही प्रस्तुत - " शतपथ ब्राह्मण - हिन्दी - विज्ञान भाष्य- प्रथप्रखण्ड ' " नामक निबन्ध अत्यन्त प्रणतभाव से आपके करकमलों में इस आस्था के साथ समर्पित होरहा है कि, इस शतपथ ' - विज्ञानभाष्य ' के शेष प्रकाशन के सम्बन्ध में भी श्रीमान् उदारतापूर्वक विचारानुग्रह करेंगे । राजस्थानवैदिकतत्त्वशोध संस्थान मानवाश्रम - दुर्गापुरा ( जयपुर ) आश्विन शुक्ल -विजयदशमी श्रीमान् के अभ्युदय निःश्रेयस् की मङ्गलकामना के साथ समपकः-- नम्रः मोतीलाल शर्मोपाह्नः-: -य कश्चिदपि मुक्तरक्तशर्मा, आङ्गिरसो भारद्वाजः ( संस्थानाध्यक्ष: )

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श्रीः “ शतपथब्राह्मणहिन्दी - - विज्ञानभाष्य " के सम्बन्ध में दिग्देशकालानुबन्धी- किञ्चिदिव ' आत्मनिवेदन ' * प्राक्कर्म्मोदयतो हि यस्य मिथिलादेशे शरीरोदयः— श्री विश्वेशदयोदयाच्च समभूत्काश्यां सुविद्योदयः । राज्ञा प्रीत्युदयादभूज्जयपुरे सम्पतिभाग्योदयः -सिद्धस्तन्मधुसूदनाय गुरवे नित्यं प्रणामोदयः ॥ वेदैक्वेद्य, ब्रह्मनिःश्वसितवेदमूर्ति, गायत्रीमात्रिकवेदहृदय, यज्ञमात्रिकवेदशरीरी, वेदात्मिका सत्ता, वेदात्मिका चेतना, तथा वेदात्मक रसोपलब्धि - रूप आनन्द से- नित्य - समन्वित, विश्वेश्वर - विश्वकर्ता-विश्वात्मा, यज्ञानुगत ‘ सत्यप्रजापति ' का माङ्गलिक संस्मरण करते हुए ही शतपथब्राह्मण के प्रथमकाण्ड से अनुगत प्रस्तुत ‘ शतपथब्राह्मण - हिन्दी विज्ञानभाष्य- प्रथमखण्ड ' के सम्बन्ध में - ' दिग्देशकालानुबन्धी किञ्चिदिव " आत्मनिवेदन " उपक्रान्त होरहा है । सुप्रसिद्ध दिग्देशकाल - भावों से अनुप्राणित ' वर्त्तमान ', तथा इत्थंभूत दिग्देशकाल - निबन्धन-वर्त्तमान — मानव की दिग्देशकालानुप्राणिता वर्त्तमाना बुद्धि, और ऐसी दिग्देशकालमर्म्मज्ञा मानवीया बुद्धि से सर्वात्मना सुपरीक्षित कर्त्तव्यकम्र्मात्मक - ' उपयोगितावाद ' की मीमांसा में आलोमभ्यः श्रनखाग्रेभ्यः निमज्जित रहने वाले उपयोगितावादी, दिग्देशकालमर्म्मज्ञ आज के कर्म्मनिष्ठ मानव की ओर से जब प्रस्तुत ‘ वेदव्यासङ्ग ’ के सम्बन्ध में चतुर्द्दिक् से आक्रमण होने लग पड़ते हैं, तो अस्मच्छदृश वेदाभ्यासजड़मतियों की सीमिता बुद्धि सहसा सर्वात्मना कुण्ठित ही तो होजाती है । क्या समाधान करें - हम इस उपयोगिता --वादा-त्मिका समस्या के सम्बन्ध में?, जब कि भारतराष्ट्र की चिरन्तना ऋषिप्रज्ञाने इस समस्या का कोई भी तो समाधान नहीं किया । यही नहीं, अपितु सम्भवतः पुरायुगेषु जब भी किसी दिग्देशकालविमूढ - वर्त्त मानवादी, प्रत्यक्ष से प्रभावित, अतएव नितान्त भावुक ब्राह्मणमानवने ऋषिप्रज्ञा से षडङ्ग - समन्वित वेदशास्त्र की दिग्देशकालानुबन्धिनी उपयोगिता के सम्बन्ध में प्रश्न करने की महती धृष्टता कर ली होगी, तो तत्काल उस की उस कारणता, किंवा - उपयोगितामूला धृष्टता का दृढ़ता से नियन्त्रण ही होगया होगा ऋषिप्रज्ञा के द्वारा । और अन्त में उपयोगिता – वादात्मक कारणतावाद का आमूलचूड़ उन्मूलन करते हुए ऋषि ने यही उद्घोष अभि-व्यक्त कर दिया होगा उस भावुक ब्राह्मण - मानव के सम्मुख कि— ' ब्राह्मणेन निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येयः, ज्ञेयरच ’ —सुप्रसिद्ध आदेश ३

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आत्मनिवेदन अर्थात्- “ ब्राह्मण को बिना हीं कारण के, किसी भी प्रकार के तात्कालिक - उपयोग - फल-लाभ - आदि आदि कारणों से अस्पृष्ट रहते हुए निष्काम भावना से ही षडङ्गवेद क. अध्ययन करना चाहिए, एवं उस के तात्त्विक स्वरूप को जानना चाहिए " । क्या तात्पर्य्य है इस ' निष्कारणता ' का, किंवा तदभिन्ना ' निष्कामता ' का? | क्या दिग्देशकालात्मक - प्राकृत - विश्व के प्राङ्गण में निष्कारणा-त्मिका ऐसी निष्कामता सम्भव है? | स्वयं - ऋषिप्रज्ञाने हीं बड़े ही आटोप से यह तथ्य अभिव्यक्त किया है-कि, प्रत्येक कर्म्म का मूल ' कामना ' हीं बना करती है । बिना कामना के कर्म्मप्रवृत्ति सम्भव ही नहीं है । कामना, किंवा इच्छा अनिवार्य्य - रूपेण फल - उपयोग - लाभ- भावों को मूल बना कर ही प्रवृत्त होती है । अतएव विश्वशङ्गण में ' काम ' - ' निष्काम ' - ' निष्कारण ' जैसा कोई भी कर्म्म स्वरूपतः कदापि व्यवस्थित नहीं माना जासकता । अवश्य ही प्रत्येक कर्म्म सकाम - सकारण ही होना चाहिए | क्योंकि बिना कामना के कर्म्मप्रवृत्ति ही असम्भव है । राजर्षि मनु की निम्न लिखिता श्लोकंचतुष्टयी को लक्ष्य बनाने का अनुग्रह कीजिए, एवं तत्समन्त्रयानन्तर ही - ‘ निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ' आदेश का समन्वय - प्रयास - कीजिए । कामात्मा न प्रशस्ता, न चैवेहास्त्यकामता ॥ काम्यो हि वेदाधिगमः, कर्म्मयोगश्च वैदिकः ॥ १ ॥

संकल्पमूलः कामो वै यज्ञाः संकल्पसम्भवाः ॥ व्रतानियम- धर्माश्च सर्वे संकल्पजाः स्मृताः ॥२ ॥

अकामस्य क्रिया काचित् - दृश्यते नेह कर्हिचित् ॥ यत् - यत् · हि कुरुते किञ्चित्, तत् तत् - कामस्य चेष्टितम् ॥ ३ ॥

तेषु सम्यग् - वर्त्तमानो गच्छत्यमरलोकताम् ॥ यथासंकल्पितांश्चेह सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ४ ॥

—मनुः २ अ ० २,३,४,५ श्लोक सुनते हैं – “ कामत्मता प्रशस्ता नहीं है अर्थात् कामभाव निःश्रेयस् - लक्षण आत्म-सुक्तिभाव का क्योंकि प्रतिबन्धक है । अतएव कामभाष, किंवा कामना को प्रशस्त नहीं माना जाना चाहिए । किन्तु यह भी सुनिश्चित तथ्य है कि, - इस वेदसिद्ध मार्ग में ' श्रकामता ’, किंवा निष्कामता, अथवा तो निष्कारणता का संस्पर्श - भी नहीं है क्योंकि वेदशास्त्र के स्वाध्यायात्मक वेदाधिगम, तत्प्रतिष्ठ वैदिक - कर्मयोग ( यज्ञकर्म्म ), दोनों हीं कामनांमूलक बनते हुए ' काम्य ' हीं माने गए हैं ॥१ ॥ संकल्प - विकल्पात्मक - प्रज्ञानमन हीं कर्मफलकामना से ' इदं मे स्यात्'-' इदं कुर्त्रीय ' इत्यादि रूपेण प्रथम संकल्प का अनुगामी बनता है । इस संकल्प के आधार पर

ही संकल्पात्मक ज्ञानमय मन से कामात्मिका इच्छा का उदय होता है * । और यों यज्ञात्मक

* -ज्ञानजन्या भवेदिच्छा, इच्छाजन्या कृतिर्भवेत् ।

कृतिजन्यं भवेत्कर्म्म तदेतत् कृतमुच्यते ॥

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शतपथ - प्रथमखण्ड सम्पूर्ण वैदिक कर्म्म, सम्पूर्ण व्रतानुष्ठान, सुप्रसिद्ध यमधर्म्म, सभी कुछ संकल्पज बनते हुए कामना - प्रधान हीं प्रमाणित होरहै हैं || २ || प्रकृतिसिद्ध, मनौवैज्ञानिक यह स्वाभाविक, एवं सहज निगम है कि, कामनाशून्य व्यक्ति के सम्बन्ध में किसी भी क्रिया की अभिव्यक्ति सम्भव - ही नहीं है । अर्थात् बिना कामना के किसी भी क्रिया की उपपत्ति सम्भव नहीं है । जो भी कुछ किया जाता है, होरहा है, सब के मूल में कामनामयी इच्छा ही प्रतिष्ठित है । सम्पूर्ण चेष्टाएँ काममुला ह्रीं प्रमाणित होरहीं हैं ॥ ३॥ शास्त्र सिद्ध कम्म, यम - नियमों, एवं तद्रूप धम्मों में यथाविधि ( सम्यक )

प्रवृत्त रहने वाला मानव निश्चयेन स्वर्गगति का अधिकारी बन जाता है, एवं इस लोक में भी यथासंकल्पित ऐच्छिक सभी काम - फलों का भोक्ता बना रहता है || ४ || " नत्र कि कर्म्ममात्र फलमुखानुगता कामना से समन्वित रहते हुए ' सकाररण ' हीं प्रमाणित होरहे हैं, तो ऐसी स्थिति में उस ' निष्कारणता ' का क्या महत्त्व शेष रह जाता है, जिसे माध्यम बना कर वेदस्वा– ध्याय में प्रवृत्त ब्राह्मण दिग्देशाकालानुबन्धिनी फलानुगता उपयोगिता की प्रात्यन्तिक उपेक्षा ही कर बैठता है । अन्यदपि - ' प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्त्तते ' इस लोकसूक्ति के अनुसार फलानुगत प्रयोजन, किंवा उद्द ेश्य के बिना तो सामान्य - प्रज्ञ प्राकृत - यथाजात - मानव भी किसी लौकिक कर्म में जब प्रवृत्त नहीं होता, तो क्या एक प्रज्ञानिष्ठ ब्राह्मण - मानव विना हीं उपयोगिता के अत्यन्त श्रम - परिश्रम - साध्य वैदिक ज्ञान, तथा वैदिक कर्म्म में बिना हीं कारणोद्द ेश्य के प्रवृत्त होजायगा १ । कदापि नहीं । सम्भवतः ही क्यों, निश्चयेन हेत्त्वाभासात्मक तथोक्त हेतु को अग्रणी बना कर ही दिग्देशकालम-र्म्मज्ञा वर्त्तमानोपयोगितावादाभिनिविष्टा आज की अभिनवप्रज्ञा मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के सम्बन्ध में इसप्रकार के प्रश्नोत्तर - विमर्शो की अनुगमिनी बनती जारही है कि, ' अन्तर्राष्ट्रीय - सम्बन्धानुगत आज के जनजीवन में वैदिक तत्त्ववाद का क्या उपयोग? ' | सचमुच प्रत्यक्ष - भूतदृष्ट्या वेदशास्त्र का उस वर्त्तमान ‘ जन - जीवन ' के साथ कोई भी तो तात्कालिक - उपयोग - प्रतीत नहीं होरहा, जिस के आकर्षण से भारतीय प्रजा वेदस्वाध्याय - चिन्तन - मनन - की अनुगामी बन सके । सायं प्रातः की भोजनचिन्ता, वस्त्र-चिन्ता, ग्रावासनिवास - चिन्ता, गीत- वाद्य - नर्त्तनादि - चिन्ता, उद्घाटन - भाषणादि - चिन्ता, ग्रामोद्योग - ग्राम-विकासादि चिन्ता, सर्वोपरि अन्तर्राष्ट्रीय – ख्याति - चिन्ता, आदि आदि दिग्देशकालानुबन्धिनीं परःशत जन-जीवनीया चिन्ताओं के निराकरण, तथा समन्वय के सम्बन्ध में जब कि पुरायुगीय वेदशास्त्र के ज्ञान - विज्ञा-नात्मक – तत्त्ववाद का प्रत्यक्ष में कोई भी उपयोग प्रतीत नहीं होरहा, तो निःसन्देह ऐसे अनुपयुक्त शास्त्र का वर्त्तमानयुग के जनजीवन के लिए कोई भी समन्वय प्रमाणित नहीं किया जासकता । अतएव श्राल-प्यालमेव? ।

- ब्रह्मचर्य्यं, दया, क्षान्ति, र्ध्यानं, सत्य, मकल्कता ।

अहिंसा, ऽस्तेय, माधुर्य्ये, दमश्चेति यमाः स्मृताः ॥

स्नानं मौनोपवासेज्यास्वाध्यायोपस्थनिग्रहः ।

नियमो गुरुशुश्रूषाशौचाक्रोधाप्रमादता ॥

--- याज्ञवल्क्यः ५

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श्रात्मनिवेन इसीलिए तो दिग्देशकालकर्म्मज्ञ वेदशास्त्रभक्त आज के भारतीय - विद्वद्वर्गं ने भी तो ' जनजीवनोप-योगितावाद ' जैसे वर्त्तमानकालानुबन्धी महतो महीयान् यक्ष - अभ्व से आकर्षित होकर अपनी स्वाध्यायनिष्ठा को शिथिल करते हुए वर्त्तमान - शिक्षाप्रणाली से अनुप्राणित बी. ए. एम्. ए. पी. एच्. डी. डी. लिट्. आदि उपाधि -- परम्पराओं की आराधना में हीं अपने आप को मनसा वाचा कर्मणा - समर्पित कर दिया है | यही नहीं, स्वयं वर्त्तमाना प्रतीच्य - शिक्षा का स्तर भी वर्त्तमान - दशवर्षात्मक - स्वतन्त्रता – के युग तथाकथित -‘उपयोगितावाद ' के व्यामोहन से ही अपने धरातल से आज किस सीमापर्य्यन्त स्खलित होगया है? प्रश्न का सम्प्रधान भी परोक्ष नहीं रह गया है । ऐसा कुछ प्रत्तीत होरहा है कि, ' जनजीवनीय- इस उपयोगितावाद ' के प्रचण्ड प्रवाह में मानव की आत्मबोधनिष्ठा, तदनुप्राणिता बुद्धिनिष्ठा, तत्समन्विता सृजन-शक्ति, तद्युक्ता चिन्तन – मनन - निदिध्यासनादि सत्प्रवृत्तियाँ, आदि आदि सभी मानवीय - विभूतियाँ धुल - पूँछ कर उस सीमा में ‘ रिणत होजाने वालीं हैं, जिस सीमाविन्दु के अभिव्यक्त होजाने के अनन्तर मानव मानवेतर पशुसर्गवत् केवल अशन - पानपरायण शरीरधर्म्मा प्राकृत - प्राणी - हीं बन जाया करता है । एवं इस परिणति के अनन्तर तो वेदशास्त्र की शिक्षा ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण लोकशिक्षाएँ भी एवंविध प्रावाहिक ' जन-जीवन ' के लिए तो एकान्ततः अनुपयुक्त हीं बन जाने वाली हैं । ' मल्टीपर्पज ' ( Multipurpose ) जैसे महान् यक्ष के आक्रमणने आज वर्तमान - शिक्षाक्षेत्र को भी सर्वात्मना अभिभूत ही कर लिया है । और यों सृजनशील भी मानव अपने काल्पनिक - उपयोगितावाद के व्यामोहन में सर्वात्मना श्रासक्त व्यासक्त बनता हुआ मानवीय सभी बौद्धिक - श्रात्मिक – स्तरों से पराः परावत ही होता जारहा हैं, किंवा होगया है । परिणाम प्रत्यक्षत है । जनजीवन की उपयोगिता के आकर्षण से आज का मानव जिन - जिन -भौतिक उपायों का अन्धानुकरण करता जारहा है, वे वे ही उपाय समस्या - निराकरण के स्थान में इसके लिए नवीन - नवीन — भयावहा ' समस्याओं के सर्जक ही प्रमाणित होते जारहे हैं । दूसरे शब्दों में- दिग्देशकालानु– बन्धी वर्त्तमान — प्रत्यक्ष – जगत् की भूतमात्रप्रधाना स्थूलदृष्टि के आधार पर यह अपनी उपयोगिताओं के सम-न्वय के लिए जिन जिन भौतिक - उपायों का अनुगमन करता जारहा है, वे वे ही भौतिक उपाय गन्धर्बनगर-लेखावत् क्षणमात्र के लिए उपयोगी प्रतीत होते हुए भी परिणामत: प्रात्यन्तिकरूपेण अनुपयोगी ही प्रमा-णित होते जारहे हैं । और यों निष्कैवल्यरूपेण दिग्देशकालानुबन्धिनी यह उपयोगिता - परम्परा इस की जनजीवनीया सामान्य - समस्याओं को भी उत्तरोत्तर विषमा हीं बनाती जा रहीं है । ऐसा क्यों? । उत्तर एकमात्र है — ‘ तात्कालिक - उपयोगितावाद का महान् व्यामोहन ' । अपनी इस कारणतामूला - फलान्विता – उपयो– गिता को निष्कारणभूत - निष्कामभावात्मक - दिग्देशकालातीत सनातनतत्त्व की प्रतिष्ठा से वश्चित कर देना हीं इस उत्तर का समन्वयार्थ है । कारणातात्मक उपयोगितावाद मानव को उपयोगी - ' फल ' की ओर जहाँ विशेषरूप से आसक्त कर देता है, चहाँ निष्कारणतात्मक - आत्मप्रतिष्ठाभाव मानव को फलचर्व्वणा से असंस्पृष्ट बनाए रखता हुआ इसे अनन्य - निष्ठा से कर्म्म में हीं श्रारूढ बनाए रखता है । बात थोड़ी दुर्बोध्या, अतएव समन्वय - सापेक्षा है । मानव का कर्म्म त्रिना कामना के, कामनामय फलोद्द ेश्य के सम्भव ही नहीं है, यह निवेदन किया जाचुका है । अतएव बिना कामना के, किंवा फलोद्द ेश्य के न तो मानव शास्त्रीय कम्मों में ह्रीं प्रवृत्त होसकता, एवं न इसकी लोककम्मों में हीं प्रवृत्ति सम्भव | इसी सम्बन्ध में गीताशास्त्र का वह सुप्रसिद्ध ' निष्कामकर्म्मयोग ' ६