Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 11–20

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 11–20

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शतपथ - प्रथमखण्ड एक महती — समस्या बन कर हमारे सम्मुख उपस्थित होजाता है, जिसका निम्न लिखित अक्षरों में आज के आबालवृद्धवनिता – सभी निष्कामकर्म्मयोगियों? के द्वारा उद्घोष तोप त है—

• कर्म्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुभूः मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्म्मणि ॥

गीता भावुक कविगण अर्थ करते हैं कि- “ है अधिकारी कर्म्ममात्र का, फल देना ईश्वर के हाथ ” इत्यादि । ' मानव को फल की आशा छोड़ कर निष्कामभाव से कर्म में हीं प्रवृत्त रहना चाहिए ' ऐसा सा ही अर्थसमन्वय आज के तथाकथित भावुक गीताभक्तों में प्रचलित है । क्या ऐसा सम्भव है?, नहीं । कदापि नहीं । मानव कदापि फलाशा से उन्मुख नहीं हो सकता । कदापि कामनामय- फलोद्दश्य के बिना मानव किसी भी कर्म में प्रवृत्त तो क्या, वैसे निष्फल - निरुद्द श्य - निष्काम कर्म का स्वप्न में भी संस्मरण भी नहीं कर सकता । किन्तु गीता तो कुछ ऐसा ही कह रही है- ' मा फलेषु कदाचन ' इत्यादि अक्षरों से । अत्रैव ज्ञान - विज्ञानात्मक - पारिभाषिक वेदशास्त्र की निष्कारणात्मिका महती उपयोगिता का वह बीज सुनिहित है, जिसे विस्मृत. कर बैठने से ह्रौं आज हमने अपनी दिग्देशकालानुबन्धिनी – गतानुगतिकभावा - तात्कालिक - उप– योगितान्विता मान्यताओं के आवेश में आकर वेदशास्त्र की प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित गीता के अक्षरों का तथा-विध अर्थ समन्वय मान लिया है, एवं तद्द्द्वारा अपना सर्वनाश ही करा लिया है । गीता ठीक कह रही है । दोष है हमारे अर्थ - समन्वय का, जिसका सम्बन्ध है केवल वर्त्तमाना लावाहिकी मान्यता से । पारिभाषिकी वेददृष्टि से थोड़े से भी अवधान से गीता के वे ही अक्षर स्थिति का सर्वात्मना स्पष्टीकरण कर देते हैं । और तद्द्वारा ही - ' निष्कारणं षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च ' का भी स्वत: ही समाधान होजाता है । गीता क्या कहती है १, प्रश्न का गीता के अक्षरों के आधार पर ही अन्वेषण कीजिए । प्रश्न उपस्थित है उस ' अधिकार ' का, जिसे लेकर आज के ' उपयोगिता - बादी ', किन्तु साथ ही -‘ निष्कामकर्म्मयोगी ’ महानुभावों में प्रचण्ड संघर्ष उपक्रान्त है । कर्म्म, और कर्मफल, ये दो मुख्य स्त– म्भ हैं, जिनके सम्बन्ध में प्रश्न यह उपस्थित है कि, ' मानव का अधिकार, किंवा उत्तरदायित्त्व कर्म्म से अनुप्राणित है?, अथवा फल से? ' | सहजभाषा में - ' मानव का अधिकार कर्म्म पर है, किंवा फल पर हैं? ' । क्या मानव स्वयं साक्षाद्रूप से फल उत्पन्न करता है? | यदि ऐसा है, तत्र तो अवश्य ही मानब का फल में भी पूर्णाधिकार मान लिया जायगा । किन्तु वस्तुतः ऐसा है नहीं । मानव स्वयं फल को उत्पन्न नहीं करता, अपितु मानव का कर्म्म हीं फल का उत्पादक बनता है । क्या तात्पर्य्य १। तात्पर्य्य स्पष्ट है । मानव अपने मनोराज्य में यावजीवन फल की कामना, तदनुगता फल की चर्वणा करता हुआ भी तंत्रतक फल को मूर्त रूप प्रदान नहीं कर सकता, जबतक कि वह फलकामनानुगत कर्म्म को साङ्गोपाङ्ग सुसम्पन्न नहीं करता | फल के भोग में अवश्य ही मानव का अधिकार है । किन्तु फल के उत्पादन में तो मानव सर्वथा अनधिकृत ही है । फल के प्रति, फल के स्वरूप - निर्माण के प्रति तो मानव के कर्म्म को ही कारण माना जायगा । अतएव फल के प्रति तो कर्म का ही अधिकार माना जायगा । मानव फल उत्पन्न नहीं ७

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श्रात्मनिवेदन करता, अपितु मानव का कर्म ही फल उत्पन्न करता है । जो जिसका उत्पादक है, वही उसका साक्षात अति-कारी है । हाँ, फलोत्पादक कर्म्म में अवश्य ही मानव का पूर्ण स्वत्त्वाधिकार है । क्योंकि मानवीय भूतात्मा प्रज्ञा-प्राण- भूत- मात्राओं से समन्वित रहता हुआ ज्ञान - क्रिया - अर्थशक्ति - मय ही प्रमाणित होरहा है । बौद्धिक ज्ञान, मानसिक तप, तथा शारीरिक श्रम, इन तीनों प्राकृतिक - ज्ञान - त्तपः - श्रम - भावों से नित्य - समन्वित अर्थ-शक्तिंप्रधान – वैश्वानर, क्रियाशक्तिप्रघान तैजस, तथा ज्ञानशक्तिप्रधान प्राज्ञ, इन तीनों पर्वों की समष्टिरूप भूतात्मा ( देही - मानवात्मा ) ह्रीं कर्मसम्पत्ति का प्रमुख अधिष्ठाता, किंवा प्रमुख अधिकारी है, जो इस कर्म्माधिकार से जहाँ – ‘ कर्म्मात्मा ' कहलाया है, वहाँ कर्म्मजनित फल के भोगाधिकार से - ‘ भोक्तात्मा ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है उपनिषदों में * । फल के साथ मानव का कदापि साक्षात् रूपेण अधिकार सम्बन्ध नहीं है । अपितु मानव का एकमात्र अनन्याधिकार है कर्म्म के प्रति, इसी प्राथमिक - प्रकृतिसिद्ध तथ्य को लक्ष्य बना कर भगवान् को कहना पड़ा कि ---" कर्म्मण्येवाधिकारस्ते ” " ते - तव - मानवस्य कर्म्मणि- एव अधिकारः " जबकि फल के प्रति मानव का साक्षात् अधिकार नहीं है, तो क्या इसका यह तात्पर्य्य है कि, मानव त्रिना फलोद्द ेश्य के ही कर्म्म में प्रवृत्त होनाय? | कहीं भी गीताशास्त्र में तो ऐसा संकेत भी नहीं हुआ है कि, फल की उपेक्षा कर, निरुद्द श्य- निरर्थक ही कर्म में मानव प्रवृत्त होजाय । यही नहीं, अपितु गीता में तो विस्पष्ट शब्दों में ऐहलौकिक - लोकसमृद्धिरूप अभ्युदय, तथा पारलौकिक - शान्तिरूप निःश्र यस् — दोनों फर्लो को प्रमुखरूपेण उद्द ेश्य बनाकर ही भगवान् ने अजुन का क्षत्रियोचित, अतएव अधिकारसिद्ध ‘ कर्त्तव्यकर्म्म ’ की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जैसाकि - ' हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग, जित्त्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ' ( गीता २ ( ३७ ) इत्यादि गीतावचन से ही स्पष्ट प्रमाणित है । विवाद केवल ' अधिकार ' शब्द का है । निश्चित फल को उद्द ेश्य बनाकर मानव अपने अधिकारसिद्ध कर्म में प्रवृत्त होजाता है । इसप्रकार कर्म्मारम्भ से पूर्व स्वप्रकृतिसिद्धा योग्यता - क्षमता - पात्रता - वर्णंता आदि अनुबन्धों के अनुरूप मानव कामना पूर्वक अमुक ‘ फल ’ का सङ्कल्प कर तत्फलप्राप्ति के लिए तत्फलस्वरूप - सम्पादक कर्म्म के लिए प्रवृत्त होजाता है । फल के स्वरूपानुपात से कर्म्म की अवधि सुनिश्चिता है । तदवधिपर्य्यन्त अनन्यनिष्ठा से कर्म्म में प्रवृत्त रहने से ही कर्म्म के द्वारा संकल्पित - फल मूर्तरूप में परिणत होता है, एवं वही सिद्धफल इस कर्म्मठ मानव का कालान्तर में भोग्य बनता है । सैषा स्थिति: प्रकृतिसिद्धा । रिथतस्य गतिश्चिन्तनीया । कम्मरम्भ में संकल्पित फुल, मध्य में कर्म्म, कर्म्म समाप्ति पर सिद्ध-फल, इन तीन प्रक्रमों को लक्ष्य बनाकर ही स्थिति का चिन्तनात्मक समन्वय कीजिए । मध्यस्थ काल-' कर्म्मकाल ' हैं, जिसमें -- कर्म्मण्येवाधिकारस्ते ' के अनुसार मानव स्व ( अध्यात्मरूप आत्मा के ) तन्त्र में प्रति-आत्मेन्द्रियमनोयुक्त ' - ' मोक्त ' त्याहर्म्मनीषिणः - कठोपनिषत्

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शतपथ - प्रथमखण्ड ष्ठित रहता हुआ अधिकाररूपेण, कर्तृत्त्वरूपेण अधिष्ठित प्रतिष्ठित + है | कर्तृत्त्वरूप अधिकारबल से फलसाधक कर्म्म में अधिकृत मानव केवल अपने इस ' कर्म ' के प्रति ही उत्तरदायी है । फल के प्रति इसका कोई ' उत्तरदायित्त्व ' नहीं है । अतएव तत्प्रति इसका यत्किञ्चित् भी अधिकार नहीं है । फल के प्रति मानव का नहीं, अपितु मानव के – ' कर्म्म ' का ही उत्तरदायित्त्व लक्षण अधिकार है । यदि मानव का कर्म्म साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न है, तो तज्जन्य फल निश्चयेन सुसम्पन्न है । यदि कर्म्म में शैथिल्य है, किंवा अव्यवस्था है, तो फले छा रखता हुआ भी मानव फल - समृद्धि, तथा तद्भोग से वञ्चित है । इसी स्थिति में यह प्रश्न उपस्थित होता है कि, जब मानव फलोद्दे श्येन कर्म्म आरम्भ करता है, यूथाशक्ति कर्म्म करता है, तो भी इसके कर्म्म से फलसिद्धि सुनिश्चिता क्यों नहीं बनती? । प्रश्न इसलिए उपस्थित होपड़ा कि, हम देखते हैं, सुनते हैं, और अपने भावुकतापूर्ण - क्षणों में स्वयं भी अनुभव करते हैं कि, हमारी इच्छाएँ, किंवा फलोद्द ेश्य भी महान् होते हैं, तत्पूर्ति के लिए हम यथाशक्य कर्म्म- चेष्टा - प्रयत्न-भी करते हैं । किन्तु देखते हैं- अपेक्षित सफलता नहीं मिलती । और उस दशा में - हमें नितान्न भावुकतापूर्ण इस गतानुगतिकता पर ही विश्राम कर लेना पड़ता है कि, – “ हमने तो अपनी ओर से कर्म में कोई त्रुटि नहीं की । अब यदि फल नहीं मिला, तो भाग्य की बात, अथवा तो ईश्वरेच्छा । अथवा तो कलियुग की महिमा " । ऐसा क्यों? | जब कारण है, तो काय्र्योत्पत्ति क्यों नहीं? । भगवान् सूर्य्यनारायण स्वस्वरूप से अभिव्यक्त रहें, और आलोक ( प्रकाश ) न हो, यह जैसे असम्भव है, तथैव कर्म का स्वरूप साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न हो, और फल अभिव्यक्त न हो, यह भी असम्भव ही है । भाग्य - ईश्वर - कलियुग -आदि आदि हेतु तो सर्वथा वैसे भातिसिद्ध काल्पनिक हेत्याभास ही हैं, जिनका सत्तासिद्ध कार्य्यकारणात्मक तथ्यों के समतुलन में यत्किञ्चित् भी महत्त्व नहीं है । कर्मानुष्ठान करने पर भी यदि फलसिद्धि नहीं हुई, तो निश्चयेन कर्म्मानुष्ठान में हीं कहीं न कहीं त्रुटि रह गई है, यह मान ही लेना चाहिए हमें श्रवनतशिरस्कतापूर्वक । संस्कृत – साहित्य में इसी सम्बन्ध में एक महत्त्व - पूर्णा सूक्ति प्रसिद्ध है कि - " अपने भूतात्मा का कर्म्म के साथ ऊध्वं -- योगानुगत अभ्युदयात्मक -- योग कराने वाले पुरुषार्थी उद्योगी -- कर्म्मठ - मानव को अवश्य ही ऐश्वर्य्य उपलब्ध होजाता है । ' भाग्यवश, दैववश, हम ऐश्वर्य्य से वञ्चत रह गए ' यह तो कर्म्मशून्य अकर्मण्य - कापुरुषों को ही भाषा है । यदि कर्म्म करने पर भी, यत्न -- प्रयास -चेष्टा करने पर भी फलसिद्धि नहीं होती, तो हमें तत्काल अपने उस दोष का ही अन्वेषण करना चाहिए, जिससे कर्म्म का स्वरूप- सम्पन्न नहीं हो पाया । तद्दोष के निराकरण पर निश्चयेन फल-सिद्धि हो ही जायगी * ” । + ‘ “ स्वतन्त्रः कर्त्ता ” ( पा ० सू ० ) क्रियायां स्वातन्त्र्येण विवक्षितोऽर्थः कर्त्ता स्यात् ।

* –उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः, दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।

दैवं निहित्य कुरु पौरुपमात्मशक्त्या, यत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोऽत्र दोषः ॥

' कर्म्मणि – को दोषः: ' - इति विवेचनीयम् । Ε

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आत्मनिवेदन " कर्म्म करने पर भी फल नहीं मिला, तो इसमें हमारा क्या दोष ', यह भाषा जहाँ भावुक मानव की भाषा है, वहाँ - कर्म ‘ करने पर भी फल नहीं मिला, तो अवश्य ही हम से कर्म में हीं कहीं भूल होगई है ' यह भाषा नैष्ठिक की भाषा है, और यही सत्तासिद्धभाषा है । कम्मस्वरूप को सर्वात्मना सफल सम्पन्न बनाने वाला महान् कौशल माना गया है- ' समत्त्वयोग ', जिसे गीता की भाषा में ' योग ' ( बुद्धियोग ) कहा गया है, एवं - जिसका - ' समत्त्वं योग उच्यते, योगः कर्म्मसु कौशलम् ' इन शब्दों में यशोगान हुआ है! प्राकृतिक प्राणों के आधार पर प्रतिष्ठित भौतिक पदार्थों का सम - साम्य ही इस समत्त्व - योग की मौलिक परिभाषा है । प्राण हीं भूत की प्रतिष्ठा है । एवं भूत ही प्राणात्मक कर्मों का माध्यम बना करता है । किस प्राण से किस भूत के द्वारा कौनसा कर्म्म निष्पन्न होता है?, प्रश्न अत्यन्त दुरधिगम्य है, जिसका हम अपनी स्थूल दृष्टि से कदापि समन्वय नहीं करसकते । अतएव कौन हमारे लिए कर्म्म है?, कौन कर्म्म है?, किसे किया जाय?, कैसे किया जाय १, कब किया जाय?, कहाँ किया जाय?, कबतक किया जाय?, इत्यादि सभी प्रश्न इन्द्रियातीत - प्राणों के अनुबन्ध से अरमच्छदृश स्थूलचुद्धि - लोकमानवों के लिए असमाधेय ही बने रह जाते हैं । कदापि हम अपनी तात्कालिकी कल्पना के -.. ब्ल पर कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णय नहीं करसकते । जिस गीताभक्ति के आवेश से आविष्ट आज का मानव-' निष्कामकर्म्म ' की घोषणा करता रहता है, उसे यह कदापि विस्मृत नहीं कर देना चाहिए कि, -कल्पना -प्रसूत ऐच्छिक कर्मों का नाम कदापि गीता की दृष्टि में निष्कामकर्म नहीं है । अपितु गीता की दृष्टि में कर्त्तव्याकर्त्तव्य का एकमात्र निर्णायक शब्दात्मक शास्त्र ही है, जोकि प्राकृतिक - प्राणों के तारतम्यानुपात से ही प्रकृतिभेदभिन्न कर्त्तव्य - कम्मों की व्यवस्था करता है । शास्त्र के द्वारा प्रतिषिद्ध कम्मों को, तथा तटस्थ कम्र्म्मो को तो गीता ने ‘ विकर्म - कर्म्म ' नामों से ही व्यवहृत किया है । जिन कम का शास्त्र निषेध करता है, वे ही शास्त्रविरुद्धत्वात्, तथा मानवप्रकृतिविरुद्धत्त्वात् - ' सिरुद्धं - कर्म्म ' निर्वचन से - विकर्म्म ' हैं । एवं जिन कम्र्मों का न तो शास्त्र विधान ही करता, न निषेध ही करता, वैसे विहिताप्रतिषिद्ध कर्म्म हीं निष्फलवत्त्वेन निरर्थक कर्म्म प्रमाणित होते हुए ' अकर्म्म ' कहलाए हैं । शास्त्रसिद्ध अलौकिक - लौकिक कर्म्म, शास्त्रविरुद्ध विकर्म्म, तथा शास्त्रतटस्थ अक्रम, इन तीन तन्त्रों के माध्यम से ही मानव की कर्त्तव्यनिष्ठा व्यवस्थित हुई है गीताशास्त्र के द्वारा ।

* -तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।

ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्मकर्त्ती मिहार्हसि ॥

- गीता

- - किं कर्म्म, किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।

तत्चे कर्म्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥

कर्म्मणो ह्यपि बोद्धव्यं, बोद्धव्यं च विकर्म्मणः ।

कर्म्मणश्च बोद्धव्यं, गहना कर्मणो गतिः ॥

—गीता ४।१६,१७,। १०

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शतपथ - प्रथमखण्ड शास्त्रसिद्ध अलौकिक, तथा लौकिक ' सत्कर्म्म ' नामक ' षट्कर्म्म ' * उसी अवस्था में फलोद्द श्येन सर्वा-त्मना सफल होसकते हैं, जबकि इनके अनुष्ठान में किसी प्रकार का दोष समाविष्ट न हो । अन्यथा तो ये ही शास्त्रीय कर्म्म विकर्म्म, तथा कर्म्म की अपेक्षा भी कहीं अधिक भयानक रूप से इष्टसाधनता के स्थान में घोरघोरतम अनिष्ट के ही कारण बन जाते हैं, जैसे कि आज से हजारों वर्ष पूर्व के वैदिक - युगात्मक देवयुग में भारतीय मानवों के सर्वश्रेष्ठ भी यज्ञकम्म इनके अनिष्ट के ही कारण बन गए थे । फलस्वरूप तयुग के शास्त्रभक्त भी मानव समाजने इन सत्कर्मों के प्रति - " किकाम्या यजेमहि । य उ न यजन्ते, श्रेयांस भवन्ति । य उयजन्ते, ते पापीयांसो भवन्ति ( अर्थात् जो यज्ञ नहीं करते, वे भूतदृष्टि से सुखी प्रतीत होरहे हैं, एवं जो ( हम लोग ) शास्त्रीय - यज्ञादि कर्म्म करते हैं, वे दुःखी बने हुए है. " ( शत ० १ | २ | ५।२४ ) इसप्रकार के श्रद्धात्मक उद्गार अभिव्यक्त करते हुए अपने आपको कुछ समय के लिए उदा-सीन ही बना लिया था । अन्ततोगत्त्वा भौमस्वर्गाधिष्ठाता देवाधिपति इन्द्रदेव की प्रेरणा से आङ्गिरस बृहस्पति का भारतवर्ष आगमन हुआ देवस्वर्ग से, एवं इह्नोंनें कर्मानुगत अमुक दोषों का स्वरूप - विश्लेषण करते हुए तत्कालीन मानवसमाज की अश्रद्धा का निराकरण करते हुए यह उद्बोधनसूत्र प्रदान किया कि, — ' आप लोगोंने शास्त्रीय कम्र्मों का अनुष्ठान तो अवश्य ही किया । किन्तु इन कम्मों में आपने भावुकतावश मध्ये मध्ये अपनी उन कल्पनाओं का भी समावेश कर डाला, जिन मानसिक कल्प-नाओं से आपका वह शास्त्रीय कर्म अपनी प्राणात्मिका मूलप्रतिष्ठा से पराङ्मुख होता हुआ इट के स्थान में अनिष्ट का ही कारण बन गया । इसी काल्पनिक - दोष - समावेश से आपका यह अभ्युदय - साधक भी शास्त्रीय कर्म्म प्रत्यवाय का जनक बन गया । अतएव आपको कदापि इन शास्त्रसिद्ध कर्म्मो में अपनी दिग्देशकालानुबन्धिनी कल्पनाओं का समावेश नहीं कर देना चाहिए " - इत्यादि ( देखिए - शतपथब्राह्मण १।२।५।२६ ) । ' यद्वै देवा अकुर्वं स्तत्करवाणि ' – ' देवाननुविघा वै मनुष्याः ' - ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या ’ इत्यादि शास्त्रीय आदेशों का यही मर्म्म है कि, अलौकिक, तथा लौकिक, दोनों हीं प्रकार के शास्त्रीय कर्मों का दिग्देशकालानुन्धिनी परिवर्तनशीला मानवीय कल्पना से संस्पर्श भी नहीं है । अपितु प्रकृतिरूप प्राणदेवताओं के द्वारा नियमित - छन्दित - मर्य्यादित विशेष नियमों के आधार पर ही तो कम्र्मात्मक विश्व, तथा विश्वप्रजा का स्वरूप उद्भूत हुआ है, एवं उह्नीं विशेष व्यवस्थित नियमों के आधार पर ' ऋषिप्रारण ' के स्वरूपद्रष्टा भारतीय महर्षियों के द्वारा मानव के कर्त्तव्य - कर्म व्यवस्थित हुए हैं । यही इन कम्र्मों की, एव तद्रूप - प्रकृतिसिद्ध धर्म की ' सनातनता ' है, जिसके अनुबन्ध से ही कर्मात्मक- भारतीय श्रार्षधर्मं ' सना-तनधर्म्म ' नाम से व्यवहृत हुआ है | ज्ञान - विज्ञान - सिद्ध यह भारतीय ' धर्म ', अर्थात् ' कर्त्तव्यकर्म्म ' प्राकृतिक - सनातन - प्राणदेवों के छन्दोबद्ध नियमोपनियमों के आधार पर ही प्रतिष्ठित है । अतएव कम्र्मों की जो * -यज्ञ - तपो - दान - लक्षणा अलौकिक - कर्म्मत्रयी, -- इष्ट- आपूर्त - दत्त - लक्षणा लौकिक कर्म्मत्रयी, की समष्टि भी ' षट्कर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसके कि प्रक्रम - भेद से अवान्तर अनेक विवर्त्त होजा हैं । इन यच्चयावत् अलौकिक - लौकिक - कम्र्मों के सोपपत्तिक - स्वरूप - समन्वय के लिए गीताभूमिकान्त-र्गत — ब्रह्मकर्म्मपरीक्षा, कर्म्मयोगपरीक्षा, नामक खकार - कारा - त्मक दोनों खण्ड हीं अवलोक— न हैं । ११

पृष्ठ 16

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आत्मनिवेदन पद्धति, जो अनुष्ठानप्रकार प्रकृतिसिद्ध हैं, उन के यथावत् अनुगमन से ही तत्कर्म्म अभीष्ट फलप्रद बना करता है । अन्यथा तो वही शास्त्रीय कर्म्म हमारे प्रात्यन्तिक पतन के ही कारण बन जाया करते हैं, जिसका प्रत्यक्ष निदर्शन तीन सहस्र वर्षों का भारत ही बना हुआ है । विगत - भुक्त प्रक्रान्त तीन सहस्र वर्षों से भारत-राष्ट्र की शास्त्रभक्ता, शास्त्रकर्म्मभक्ता श्रास्तिक - प्रजा ही सम्भवतः ही क्यों, निश्चयेन सम्पूर्ण विश्व के इतर मानव - समाजों के समतुलन में उत्तरोत्तर अपनी आत्मिक शान्ति से, बौद्धिक तृप्ति से, मानसिक तुष्टि से, तथा शारीरिक पुष्टि से, सभी मानवीय पर्वों से उत्तरोत्तर अभिभूत ही प्रमाणित होती चली आ रही है, जबकि शास्त्रसिद्ध कम्र्मों के नामस्मरण से भी वञ्चित इतर मानववर्ग भूतदृष्ट्या सुखी समृद्ध ही प्रतीत होते जारहे हैं । सम्भवतः इसी आकर्षण से आज हमारा सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र भी भारतराष्ट्र द्रुतगति से भूतप्रधान प्रती-च्य - विधि - विधानों का ही अन्धानुकरण करता जारहा है । और इसीलिए सम्भवतः प्रतीच्य गणतन्त्रात्मक— प्रजातन्त्र के आधार पर ही अपने संविधान का स्वरूप - निर्माण करने वाले हमारे वर्त्तमान सत्तातन्त्रने कर्त्तव्यकर्म्मात्मक भारतीय धर्मं को सर्वथा ' निरपेक्ष ' ही घोषित कर दिया है, जिसके अश्रु पूर्णाकुलेक्षण इति-वृत्त के स्वरूप - विश्लेक्षण के लिए ही हमें चार सहस्र पृष्ठों, चार मूलखण्डों, तथा चार परिशिष्ट खण्डों में-' भारतीय - हिन्दू - मानव, और उसकी भावुकता ' नामक एक स्वतन्त्र निबन्ध ही उपनिबद्ध कर देना पड़ा है । सत्तातन्त्र निरपराध है एक दृष्टि से तथाविधा धर्मनिरपेक्षता के लिए, एवं प्रतीच्य - भूतप्रधान - विधि-विधानों के अन्धानुकरण के लिए इसलिए कि, विगत तीन सहस्रवर्षों से शास्त्र - धर्म - कर्म्म - कत व्य - आदि के नामच्छलों के माध्यम से भारतराष्ट्र के शास्त्र - धर्म - कु - भक्त - आस्तिक मानवों की ओर से दिग्देशका-लानुबन्धिनी काल्पनिक मान्यताओं के आधार पर साम्प्रदायिक - मतवाद ही पुष्पित - पल्लेवित होते आरहे हैं । फलतः शास्त्र की व्यावहारिकी उपयोगिता से सभी अनुबन्ध अभिभूत ही प्रमाणित होचुके हैं । हमारा सम्पूर्ण वाङ ्ममय इनं तथाकथित मतवादों, धर्माभासों से सर्वात्मना उस सीमापर्य्यन्त ' कल्वालीकृत ' ही प्रमाणित हो चुका है कि, आज उसी देवयुग की भाँति हम भी ये ही उद्गार अभिव्यक्त करने लग पड़े हैं कि— ‘ शास्त्र - कर्म्म - धर्म्म - को मानने वाले तो दुःखी ही बने रहते हैं, जबकि इनसे निरपेक्ष बन जाने वाले सुखी - समृद्ध बनते जा रहे हैं ' । प्रत्यक्षमूला इसी प्रभावशक्ति का नाम है - ‘ भावुकता ’, जिसके महा-मोहात्मक वारुण - पाश से बद्धा सुबद्धा भारतीय प्रजा अपनी समस्ता वाङमयी सांस्कृतिक - निधि को एकहेलया जलाञ्जलि समर्पित कर, अपने यच्चयावत् कर्त्तकम्मों को विस्मृत कर प्रत्यक्ष प्रभावमूला मृगमरी-चिका के प्रति ही अनुधावन करती जारही है । अनुधावन नवीन नहीं है, जैसाकि पूर्व के देवयुगात्मक उदाहरण से स्पष्ट है । अतएव निष्ठादृष्ट्या विकम्पन का कोई अवसर नहीं है । जब जब भी भारतराष्ट्र ज्ञान - विज्ञानात्मिका अपनी मौलिक- सांस्कृतिक-निधि से पराङमुख होता रहा है, तत्र तत्र ही तत्तद्युगों की भारतीय - प्रजा अपनी सहजनिष्ठा से पराङ ्ममुखा बनती हुई युगधर्म्मप्रवाहात्मक प्रत्यक्ष - प्रभावों से ग्राकर्षित होती रही है । जिस गीताशास्त्र के ' निष्कामकर्म्म ' * चार खण्डों में से दो खण्ड - ' राजस्थान वैदिकतत्त्वशोधनसंस्थान ' की ओर से प्रकाशित हो-गए हैं । १२

पृष्ठ 17

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शतपथ - प्रथमखण्ड को माध्यम बनाकर श्रत्र विचार प्रक्रान्त हे, स्वयं गीताशास्त्राने हीं इत्थंभूत युगधर्म्मात्मक परिवर्त्त'नों का इन शब्दों में उद्घोष कर दिया है कि, " देवयुग में शास्त्रीया कर्त्तव्यकर्म्मत्मिका जिस बुद्धियोगनिष्ठा का हमने सर्वप्रथम भारतीय सम्राट् स्वयम्भू के पुत्र विवस्त्रान् के प्रति स्पष्टी-करण किया था, विवस्त्रान् से जो निष्ठा तत्पुत्र वैवस्वत मनु के युग से समन्वित हुई, वह इसी क्रम से राजर्षिवंशपरम्परा में प्रक्रान्त रही एक लम्बी अवधि पर्य्यन्त । अन्ततोगत्त्वा कालव्यवच्छेद से महाभारतयुग में ' वह अभिभूत होगई । आज उसी का हम तुझारे ( अर्जुन के ) अनुबन्ध से पुनःप्रतिष्ठापन कर रहे हैं " ( गीता ४,१,२,३ ) । आज से पाँच सहस्र वर्ष पूर्व के महाभारतयुग में नारायणावतार भगवान् वासुदेव कृष्ण के द्वारा नरावतार इन्द्रपुत्र नितान्त भावुक जिस अर्जुन के प्रति उद्बोधनात्मिका जिस शास्त्रीया कर्म्मनिष्ठा का पुनः संस्कार हुआ था, तदुत्तर अनुमानतः २ सहस्रवर्ष पर्य्यन्त तो वही निष्ठा प्रक्रान्त रही । किन्तु पुनः उसी कालक्रमानुपात से वह निष्ठासूत्र अन्तम्मुख बन गया अमुक कारण - परम्पराओं से, जिनका अत्र स्पष्टीकरण सम्भव नहीं है । निष्ठा का वह अभिभवात्मक युग तीन सहस्र वर्षों से उत्तरोत्तर दृढमूल ही बनता चला आरहा है । और आज तो पुनः महाभारत जैसी ही स्थिति भारतराष्ट्र में पुनः श्राविर्भूत होपड़ी है । भारतीय मानववर्ग श्राज महाभारतयुगवत् दो ही वर्गों में प्रमुखरूप से विभक्त होरहा है, जिनका असंदिग्ध-रूपेण - अर्जु'नवर्ग, एवं दुर्योधनवर्ग, रूपेण नामकरण कर देने में अणुमात्र भी संकोच नहीं किया जा सकता । * भूत, और भविष्यद्रूप महद्ब्रह्मात्मक - अक्षरनिबन्धन - अनन्त - अमूर्त्त - अव्यक्त - पीड़क - महाकाल-पुरुष के परोक्ष - परिणामों से सर्वथा संस्पृष्ट, एवं वर्त्तमानरूप क्षरभूतं निबन्धन - सादिसान्त - मूर्त्त - व्यक्त-पीड़ित - व्यक्त - काल के प्रत्यक्ष प्रभावों से आपादमस्तक समन्वित, अतएव च तात्कालिक - प्रत्यक्ष - प्रभावों से क्षणे क्षणे तुष्ट, एवं रुष्ट होते रहने वाले निरतिशय भावुक - मानव को ही हम अर्जुन, तथा दुर्योधन कहेंगे । परिवर्त्तनशील व्यक्त - मूर्त्त - काल अपने क्षाराभाव से क्योंकि भातिसिद्ध है, शून्यं - शून्यं है, अभा-वात्मक है | अतएव तदनुवर्त्मा भावुक मानव की महती सम्पत्ति बनी रहती है -- ' निषेधभाव ' । सत्तासिद्ध-अक्षर -- कालनिबन्धन– ' अस्तित्रह्म ' कदापि इसकी प्रतिष्ठा नहीं बन पाता । अपितु सदैव निषेध - मूलक--‘ नास्तित्त्व ' हीं इत्थंभूत भावुक का एकमात्र आराध्य मन्त्र बना रहता है । ' क्यों ऐसा करें ' – ‘ नहीं करेंगे'-' नहीं मानेंगे ' - ' नहीं मानना चाहिए ' - ' सब निरर्थक है ' इत्येवंरूपेण निषेधपरम्पराएँ हीं भावुक की भावुकतापूर्णा जीवन - पद्धति के प्रमुख अङ्ग बने रहते हैं । चिरकालिकी इस निषेध - परम्परा के अभ्यास से यही ' नास्ति ' वृत्ति अन्ततोगत्त्वा उस घोरघोरतमा महाभयावहा मनोवृत्ति में परिणत होजाती हैं, जिसे शास्त्र --' अभिनिवेश ' कहा है । दुराग्रहमूला हठधर्मी का नाम हीं वह ' अभिनिवेश ' है, प्रतिक्रियाजनित -- बिस अभिनिवेश के सर्वात्मना अभिव्यक्त होजाने पर अभिनिविष्ट मानव सर्वथा अविचिकित्स्य ही बन जाता है । इस अवस्था में सर्वज्ञानविमूढ बनता हुआ यह अभिनिविष्ट स्वयं भी समूल विनष्ट हो जाता है, एवं अपने अनु--* - भूतं भविष्यत् - प्रस्तौमि महद्ब्रह्म कमतरं, बहु ब्रह्मकमक्षरम् । —श्रुतिः १३

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आत्मनिवेदन गत परिकर का भी सर्वनाश करा बैठता है, जैसाकि -- सर्वज्ञानविमूढाँस्तान् विद्धि नष्टानचेतसः ' ( गीता ३।३२ । ) से स्पष्ट है । नास्तिसारा, निषेधभावान्विता, प्रत्यक्ष प्रभावसमन्विता तथोक्ता भावुकता के ही यों पूर्व, उत्तर, रूपेण दो क्षेत्र बन जाते हैं | पूर्वावस्था में वही भावुकता अंशरूपेण ' भीरुता ' का अनुगमन करती रहती है, एवं परिपक्वात्मिका उत्तरावस्था में आकर वही भावुकता अभिनिवेशरूप में परिणत होती हुई - ' धृष्टता ' के रूप से अभिव्यक्त होपड़ती है । पूर्वा भावुकता में जहाँ आंशिकरूप में श्रद्धान्विता कोमलता भी रहती है, वहाँ उत्तरा भावुकता में सर्वात्मना जड़भावनिबन्धना घृष्टता ही प्रधान बन जाती है । अतएव पूर्वा भावुकता से अनुप्राणित ' निषेध ' में जहाँ ' परदुःखकातरता ' प्रमुख बनी रहती है, वहाँ अभिनिवेशमूला उत्तरा भावुकता से अनुप्राणित ' निषेध ' में ' परपोड़न ' हीं प्रमुख बन जाता है । पूर्वा भावुकता में स्वस्वरूपानुगत स्वार्थ की जहाँ श्रात्यन्तिक विस्मृति है, वहाँ उत्तरा भावुकता में स्वरूपप्रतिबन्धिका जघन्यतमा स्वार्थलिप्सा की प्रभु--खता, एवं परस्वार्थ की आत्यन्तिक उपेक्षा है । और यों एक ही भावुकता के आरम्भ, और उत्तर भेद से सर्वथा विभक्त दो क्षेत्र होजाते हैं, जिन्हें क्रमश: अर्जुन, और दुर्योधन के साथ सर्वात्मना समन्वित माना सकता है । नितान्त भावुक अर्जुन की भावुकता स्वस्वरूपानुगत ( क्षत्रियस्वरूपानुगत ) ' स्वार्थ ' को विस्मृत कर शास्त्रविरुद्धा अहिंसा -- कोमलता - मृदुता - श्रादि से समन्वित थी, तो इससे भी कहीं अधिक भावुक दुर्योधन की भावुकता स्वरूपविघातिनी -- काल्पनिकी -- स्वार्थलिप्सा से समन्वित होती हुई शास्त्रविरुद्धा हिंसा - निष्ठुरता--पड़ता -- आदि से अनुप्राणित थी । अर्जुन अपनी धर्मभीरुता से नहाँ निषेधभाषा का आचाय्य बनता हुआ-- ' न योत्स्ये ' की घोषणा कर रहा था, तो वहाँ दुर्योधन अपनी कर्मभीरुता से निषेध भाषा का परमाचाय्यं बनता हुआ-- ' नैत्र दास्यामि ' का उद्घोष कर रहा था । निषेधमुला भावुकता दोनों में समान थी, अन्तर केवल धर्म्म, और नीति में था । अर्जुन ' धर्म्म ' की घोषणा में उन्मत्त - प्रमत्त था, तो दुर्योधन नीति की घोषणा से धर्म्मनिरपेक्ष बन रहा था । और यों महाभारतयुग का समाज अजुन, तथा दुर्योधन के रूप से भावुकता के तथाकथित दो वर्गों में हीं विभक्त होरहा था । युधिष्ठिरप्रमुख एक वर्ग धर्म - धर्म का ही चीत्कार करता हुआ अश्रु पूर्णाकुलेक्षण बन रहा था, तो शकुनिप्रमुख दूसरा वर्ग नीति - नीति का तुमुल घोष करता हुआ भारतराष्ट्र के सर्वनाश के लिए ही कटिबद्ध बन रहा था । धर्मक्षेत्र, और नीति--रूप कर्म्मक्षेत्रात्मक कुरुक्षेत्र, दोनों हीं क्षेत्र पारस्परिक ग्राधाराधेयभाव -- समन्वय से यों सर्वात्मना वञ्चित होते हुए, दोनों एक दूसरे के प्रति निरपेक्ष बनते हुए भारतवैभव को स्मृतिगर्भ में विलीन करने के लिए ही सन्नद्ध प्रमाणित होरहे थे । तथाबिध भीषणतम सांक्रामिक युग में हीं चिकणात्मक भगवान् वासुदेवकृष्ण का पूर्णावतार हुआ तद्य गानुगता धर्म्मनिरपेक्षता - रूपा धर्म्मग्लानि के उपशम के लिए ही । इस अवतारपुरुष के द्वारा अर्जुन ही माध्यम बना समन्वयात्मिका, समत्त्वयोगलक्षणा बुद्धियोगनिष्ठा के पुनराविर्भाव के लिए । यद्यपि दुर्योधन को ने समय समय पर उद्बोधन प्रदान करते रहने में कोई शिथिलता नहीं की । तथापि भावुकता के भी भगवान् तथोक्त अविचिकित्स्य श्रमिनिवेशात्मक उत्तररूप में प्रविष्ट होजाने वाले असनिष्ठ कुनैष्ठिक दुर्योधन १४.

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शतपथ - प्रथमखण्ड भगवान् की इस सन्निष्ठा से आकर्षित न होसका । उधर अर्जुन भी सर्वात्मना आकर्षित होगया, यह तो नहीं कहा जासकता । तथापि उसकी अभिनिवेशशून्या, अतएव श्रद्धान्विता पूर्वावस्थोवेता भावुकता के कारण इसकी भगवादादेशों श्रर श्रद्धा निरन्तर ही बनी रही । और एकमात्र - ' करिष्ये वचनं तव ' रूप इस प्रणत-भाव के अनुग्रह से यथासमय यह अपने नाश क्षेत्रों से अपना परित्राण करता रहा । यह असंदिग्धरूपेण हमें मान हीं लेना चाहिए कि, यदि अर्जुन को भगवान् का सानिध्य उपलब्ध न होता, तो इसकी यह पूर्वा भावुकता उत्तरावस्था में आकर दुर्योधनापेक्षया भी कहीं भयावहा प्रमाणित होजाती, ओर उस अवस्था में अर्जुन दुर्योधन की अपेक्षा भी कहीं अधिक विश्व - विनाशक ही प्रमाणित होजाता । एवमेव राष्ट्रभाग्य से दुर्य्यो-धन की अभिनिवेशमूला सन्निष्ठा भगवान् के उद्बोधन - सूत्रों से यदि सन्निष्ठारूप में परिणत होजाती, तो निश्चयेन आज भारतराष्ट्र का इतिहास कुछ और ही होता । हाँ, तो प्रस्तुत प्रसङ्ग से निवेदनीय यही है कि, अर्जुन, और दुर्योधन, दोनों हीं भावुकतामूला निषे-धवृत्ति की दृष्टि से समान धरातल पर ही प्रतिष्ठित थे । वस्तुगत्या न तो अर्जुन ही धर्म्मनिष्ठ थे, एवं न दुर्य्यो-धन ही नीतिनिष्ठ, किंवा कर्मनिष्ठ थे । अर्जुन भी प्रत्यक्ष से प्रभावित होते हुए दिग्देशकालमूढ बने हुए थे, तो दुर्योधन की प्रत्यक्ष के तात्कालिक लाभों में आसक्त होते हुए दिग्देशकाल विमूढ ही बने हुए थे । अर्जुन का धर्म्म । किंवा धर्म्मभावुकता ) नीति के समन्वय से वञ्चित होरहा था, तो दुर्योधन की नीति धर्म्म को निरपेक्ष मान बैठी थे । एक नीतिनिरपेक्ष बन रहा था, तो दूसरा धर्मनिरपेक्ष बन गया था । दोनों में अन्तर केवल यही था कि, नीतिनिरपेक्ष अर्जुन जहाँ विचिकिःस्य था, वहाँ धर्मनिरपेक्ष दुर्योधन का नाश सुनिश्चित बन गया था । और निश्चयेन तथाविध दो वर्ग ही आज भी भारतराष्ट्र में महाभारतयुग से भी कहीं प्रचण्डरूपेण पुनः अभिव्यक्त होपड़े हैं, जिस इस भीषण स्थिति का यदि उसी भगवदुपदेश के माध्यम के द्वारा शीघ्र ही संवरण नहीं कर लिया गया, तो धर्म्म, और नीति का यह पार्थक्य भारतराष्ट्र के भविष्य को पुनः अनेक - शताब्दियों के लिए ' घोर तमोभाव ' से ही अभिभूत कर देगा । धर्मभावुक अर्जुनवर्ग नीति पथ को अग्रणी बना ले, एवं नीतिभावुक दुर्योधनवर्ग धम्र्म्मपथ को अग्रणी बनाले, यही आज की समस्या का एकमात्र वह समन्वय है, जिससे विगत तीन सहस्र वर्षों से भारतराष्ट्र के सभी वर्ग उत्तरोत्तर वंञ्चित ही होते आरहे हैं । क्यों वञ्चित होते आ रहे हैं?, ऐसा वह कौन सा दोष है, जिसके अनुबन्ध से धर्म्म, तथा नीति के समन्वय - प्रवर्त्तक उत्कृष्टतम यच्चयावत् बौद्धिक, तथा भौतिक साधन - परिग्रहों के विद्यमान रहते भी भारतराष्ट्र धर्म्म, और नीति की समन्वयनिष्ठा से उत्तरोत्तर पराङमुख ही होता आरहा है?, इसी प्रश्न के समाधान के लिए हमें उसी गीताशास्त्र के - - ' कर्म्मण्येवाधिकारस्ते ० ' इत्यादि उद्बोधनसूत्र का आश्रय लेना पड़ा है । ' अधिकार ' शब्द के व्यामोहनने हीं तो अर्जुन को धर्म्मभीरु बनाया, एवं इसी व्यामोहनसे दुर्योधन असन्निष्ठ बना । जहाँ दोनों के ही अधिकार केवल ' कर्म्मतन्त्र ' पर्य्यन्त ही सीमित थे, वहाँ दोनों नें हीं फलांशों को ही अपने अधिकार का क्षेत्र बना डाला । “ इस युद्धकर्म से अपने स्वजन ही मारे जायँगे, परि-णामतः फलांश में हमें पाप ही लगेगा " इस पापफलात्मक काल्पनिक युद्धकर्म्मफलने जहां अर्जुन को शास्त्रसिद्ध आधिकारिक — क से पराङमुख कर दिया, वहाँ दिग्देशकालानुबन्धिनी साम्राज्यसुखलि'सात्मिका फलैषणा ने दुर्योधन को अधिकारसिद्ध कर्म्म से पराङमुख कर दिया । दोनों हीं अपने अपने काल्पनिक १५

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आत्मनिवेदन फलों की चर्व्वणा में हीं श्रासक्त - व्यासक्त - मना प्रमाणित होगए, जिन दोनों में से धर्म्मभीरु अर्जुन का तो भगवदनुग्रह कालान्तर में उद्बोधन होगया, किन्तु वम्मभीरु - धर्मनिरपेक्ष- सन्निष्ठ - के ल वर्त्तमान स्वार्थ-साधन - परायण कुनैष्ठिक दुर्योधन का परित्राण न हो सका, न हो सका । क्या था वह संशोधन, जिसके अनुग्रह से फलाधिकारव्यामुग्ध अर्जुन कम्र्म्माधिकार से पराङमुख होता जा रहा था?, प्रश्न का उत्तर है प्रति-ज्ञातश्लोक का निम्न लिखित उत्तरवाक्य – " मा फलेषु कदाचन ". “ अर्जुन! तुह्मारा अधिकारबल केवल कर्म्म पर्य्यन्त ही सीमित है । अतएव तुझें कभी फलों के प्रति अधिकारबुद्धि नहीं रखनी चाहिए " । ' फलेषु कदाचिदपि अधिकारबुद्धिः-: -न कर्त्तव्या! यतो हि ते मानवस्य कर्म्मण्येवाधिकारः, न फलेषु ' ही पूर्वश्लोककाद्ध का प्राकृतिक समन्वय है । कर्म्मकाल में, किंवा कर्म्म से पूर्व ही फल की चर्व्वणा में प्रवृत्त होजाने वाले भावुक मानव को अनेक दोषों का अनुगामी बन जाना पड़ता है, जिनमें प्रमुख दोष है ' फल के प्रति आसक्ति, और कर्म के प्रति उदासीनता ' | निश्चित तथ्य है कि, जो मानव कर्म्म के फलों की कल्पना में हीं सतत मनोविभोर बना रहता है, वह मानव कदापि कर्म्मस्वरूप सम्पन्न नहीं कर सकता । यही नहीं, कर्म्मशून्यता में अभीष्ट फल से वञ्चित बना रह जाने वाला यह फलमुखापेक्षी कर्म्मण्य, किंवा विकर्म्मण्य मानव शास्त्रसिद्ध सत्कर्मों के प्रति श्रद्धा करता हुग्रा अर्जुनवत् उनके काल्पनिक असत्फलों का भी सर्जन करने लग पड़ता है । फलतः सत्कर्म्मो से यह सर्वात्मना वञ्चित होता हुआ सभी फलों से शून्यं - शून्यं हीं बना रह जाता है । यही आरम्भ की शून्यता इस अकर्म्म - विकर्म्मस्थ को कालान्तर में प्रतिक्रियावादी बना देती है, जिसके अनुग्रह से इसे सर्वत्र सभी क्षेत्रों में दोष ही दोष प्रतीत होने लगते हैं । इन मानसिक, काल्पनिक दोषों से मूल - तूलत: उभयथा रिक्त बनता हुआ यह आवेशाविष्ट ही बन जाता है सभी क्षेत्रों में । और ऐसा आष्टि कुनैष्ठिक मानव ही ' दानत्र ' कोट में आता हुआ परिवार, समाज, राष्ट्र, एवं विश्व के लिए क्षोभकर ही प्रमाणित होजाता है । यों एकमात्र अधिकारविरुद्धा फल की चर्व्वणा से ही इसे इस अधमगति का अनुगामी त्रन जाना पड़ता है । कर्म्म से पूर्व, एवं कर्म्मकाल में जो मानव फल की चर्व्वणा में अधिकारशक्ति का उपयोग करने लग पड़ता है, उस मानव का कर्म्म कदापि साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न नहीं होने पाता । क्योंकि भूतात्मा की जो शक्ति कर्म्मस्वरूप – सम्पादन में अनन्यनिष्ठा से समर्पित होनी चाहिए थी, वह शक्ति फलचर्व्वणा में विभक्त होजाती है । इसके दो भयानक परिणाम होते हैं । कर्म्म का शैथिल्य पहिला भयानक परिणाम है । एवं अपूर्ण कर्म्म से उत्पन्न अप र्ण फल के साथ मन का ग्रन्थिबन्धन ( आसक्ति ) होजाना दूरा भयानक परिणाम है । कर्म्म का फल निःसन्देह ' कर्म ' है, जिसमें गत्यात्मक कर्म्म का अभाव है । अतएव कर्म्मफल को ' जड़ ' माना गया है । इस जड़ की उपयोगिता अन्य पक्ष है, एवं इसके साथ मन का ग्रन्थिबन्धन सम्बन्ध “ से बद्ध - आसक्त होजाना विभिन्न पक्ष है । उपयोगितात्मक पक्ष जहाँ शास्त्रदृष्ट्या उपादेय है, वहाँ श्रासक्ति-बन्धन न केवल अनुपादेय ही है, अपितु मानव के सहज आत्मस्वरूप का विधातक भी है । इस जड़ासक्ति से मानव की सहज आत्मशक्ति, आत्मविकास उत्तगेत्तर कुण्ठित ही होता जाता है । क्योंकि कम्र्म्मापेक्षया कर्म्म-१६