Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 281–290
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 281–290
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कर्म्मनाम -१- अग्निपरिस्तरणम् २- अग्निसम्मार्जनम् शतपथभाष्य ७ - प्रथमकाण्डानुगता कर्म्मनामसूची - प्रकारादिक्रमेण -प्रपाठक - ब्राह्मण-- कण्डिका ३० - आतञ्चनदानम् ६ | १ | २८ ३१ - आतञ्चितापिधानम् ३२ - आर्षेयहोतृवरणम् ५ | ४ | १६ ५४ २० ४२ ३ | ६ | १४ ३३- आवाहननिगदानुवचनम् ३ | ४ | १६ ३ - अग्निहोत्रहवण्यादानम् ११२।१ ४ - अग्नीषोमीयेष्टिः ३४ - आश्रावणम् ४ | ३ | ६ ५।२।१४ ३५ - आहवनीयप्रणयनम् १।१।२० ५ - अङ्गाराध्यूहनम् श ३६- आहवनीयोपस्थानम् ७ | ४ | २२ ६ - श्रङ्गाराभ्यूहनम् १।५।१३ ७- श्रङ्गारोदूहनम् ११५२४ ३७ - इडानिगदानुवचनम् ६ | ३ | १६ ८- अङ्ग ुल्यभिनिधानम् १५/१७ ३८- इडाप्राशनम् ६३३६ ६ - अन आक्रमणम् १।२।१३ ३६ - इडावदानम् ६ | ३ | १३ १०- अनसोऽवरोहणम् १।२।२२ ४० - इडो पह्वानम् ६ | ३ | १८ ११- अनुब्रवणम् ५ | ५ | ३ ४१ – ईषाभिमर्शनम् १२/१२ १२- अनुयाजयागाः ६ | ४ | ७४२ - उत्करनिधानम् २।२।१६ १३- अनुवाक्यानुवचनम् ५।५।१७ १४- अनुवाक्यापाठः ५।५।१६ ४३ - उत्तराघारः ३ | ६ | ४ १४- श्रपान्निनयनम् ३ | १ | ३ ४४ - उत्तराधारसमिद्भ्याधानम् ३ | १ | ७ १६ - अप / मुपस्पर्शनम् १।१।१ ४५ - उत्पवनम् | १ | ३ | ६ १७- अभिघारणम् ५/५/१० ४६ - उदीङ्गनम् १।३।७ १८- अवदानम् ५५ | २० ४७ – उपभृत्याज्यग्रहणम् २५ १६ - अवधूननम् १1१1४ ४८ - उपभृत्समञ्जनम् ७ | १ | १३ २०- अवान्तरेडावदानम् ६ | ३ | १७ ४६ - उपभृत्सादनम् ३ | १ | १३ २१- अष्टाकपालपुरोडाशप्रथनम् ५।१।५ ५: - उपभृदादानम् ४ | १ | १ २२ - आग्नेयेष्टिः ५१ – उपलोपधानम् २ | ५ | १४ ५।१।१२ ५२ - उपसर्जन्यासेचनम् १।६।२ २३- आज्यनिर्वापः १ | ५ | २२ ५३ - उपस्तरणम् ५।५।१ २४ - आज्यभागयागः ५ | २ | १ = ५४ - उपांशुयाजः ५२ २८ २५- आज्यविलायिनीग्रहणम् ७ | I | ७ ५५- उपांशुचरणम् ७३८ २६- श्राज्याधिश्रयणम् १ | ६ | ६ २७- श्रज्यावे क्षरणम् २ | ४ | १८ २८ - श्राव्यासादनम् २६ - आज्योत्पवनम् २।४।२१ ५६ - उलूखलाधानम् ५७ - उल्मुकोदृनम् २।४।२३५८ - एकादशकपालपुरोडाशप्रथनम् ५ | २ | १४ १ | ४ | ६ ६ | ४ | १ १६
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५६ - ऐन्द्राग्नष्टिः ६० – कपालोपधानम् ६१- कृष्णाजिनादानम् ६२ - कृष्णाजिनास्तरणम् ६३ – कृष्णाजिनोपस्तरणम् ६४ - गार्हपत्यसादनम् ६५ - गाईपत्योपस्थानम् ६६ - चतुरखदानानि ६७ - जुहूग्रहणम् ६८- जुहू समञ्जनम् ६६ - जुहूसम्मार्जनम् ७० – जुहूसादनम् ७१ - जुह्वादानम् ७२ – जुङ्खाग्यग्रहणम् ७३- तृणनिधानम् ७४- तृण निरसनम् ७५- दृषदुपधानम् ७६ - दृपदुपलोपधानम् ७७ - देवतादेशनम् ७८ - देवहोतृवरणम् ७६ - द्वादशकपालपुरोडाशप्रथनम् ८०- धाय्याप्रक्षेपः ८१ - धूरभिमर्शनम् ८२ - ध्रुवाज्यग्रहणम् ८३- ध्रुवामञ्जनम् ८४ - ध्रुवासादनम् ८५ - निवीताभितपनम् ८६ - पञ्चावदानानि ८७- पत्नीसंयाजः - पत्नी सन्नहनम ८६ - पय आसेचनम् ६० - पय उद्वासनम् पारिभाषिकसूचनाएँ ६१ - परिधिपरिधानम् ५।३।३ ६२ - परिधिसमञ्जनम् १ | ५ | ३ ६३- परिधीनामनुप्रहरणम् १ | ४ | १ ६४ - परिस्तरणम् १ | ५ | १४ ६५ - पवित्रकरणम् १२४ | ५ ६६ - पांश्वादानम् १ | १ | १८ ६७ - पाण्यानेजनम् ७ | ४ | १८६८ - पात्रप्रोक्षणम् ५५ ७ ६६ - पात्रासादनम् ७।३।१६ १०० - पात्रीनिर्णेजनम् ७।१।१३ १०१ - पिष्टसंयवनम् १०२ - पिष्टसंवापः २४ ६ ३ | १ | १३ १०३- पुत्रनामग्रहणम् ४।१।१. १०४ - पुरोडाशपर्यग्निकरणम् २५ १०५ -पुर. डाशप्रथनम् - पुरोडाशश्रपणम १०६ ३।१।१० १०७- पुरोडाशाभिमर्शनम् १।२।१५ १०८ - पुरोडाशाभिवासनम् १।५।१४ - पुरोऽनुवाक्यापाठः १०६ १/५/१ ११०- पूर्णपात्रनिनयनम् १।२।१८ १११- पूर्वाधारः ४ | १1४ ११२- पूर्वाधारसमिद्भ्याधानम् ५।३।३ ३।३।३७ ११३ - प्रजाजननम् १,२६११४- प्रणीताप्रणयनम् २ | ५ | १० ११५ - प्रणीतानिनयनम् ४ | ५ | ५ ११६- प्रत्याश्रावणम् ११७ - प्रतिप्रैषः ३ | १ | १४ ११८ - प्रयाजयागाः २ | २ | ५ ११६- प्रयाजानुमन्त्रणम् १२० - प्रवर निगदानुवचनम् १२१ - प्रवराश्रावणम् ७/३५ २ | ४ | १२ १२२- प्रस्तरस्तरणम् ५ | ४ | १६ १२३ - प्रस्तरादानम् ५।४।१८ १२४ - प्रस्तरावयवानुप्रहरणम् १७H
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१२५ - प्राङ्प्रेक्षणम् १२६ - प्राशित्रहरण सम्मार्जनम् १२७- प्राशित्रावदानम् १२८- प्रैषः १२६ - प्रोक्षण्यादानम् १३०- प्रोक्षण्यासादनम् १३१- प्रोक्षण्युत्पवनम् १३२ - फलीकरणम् १३३ - फलीकरणोपासनम १३४ - बर्हिस्तरणम् १३५ - बर्हिर्यागः १३६ - ब्राह्मणसन्तर्पणम् १३७ - भागप्राशनम् १३८- मानुषहोतृवरणम् १३६ - मुखोपस्पर्शनम् १४० - मुसलादानम् १४ - यजनम् १४२ - याज्यानुद्रवरणम १४३ - याज्यापाठः १४५ - ररम्युदीत्तणम् १४५ - वत्सापाकरणम् १४६ - वषट्करणम् १४७ - वफ्ट्कारः १४ = -वाग्विसर्गः १४१ - वासनाशनदाने १५० - विष्णुक्रमक्रमणम्ः १५१ - वेद्ग्रहणम् १५२ – वेदविस्रंसनम् १५३ - वेदाहरणम् १५४ – वेदानुप्रहरणम् १५५ - वेदिकरणम् १५६ - वेदिपस्ग्रिहः शतपथभाष्य ७ | ४ | १३ १५७ - वेदिपूर्वपरिग्रहः २।४।६ १५८ - वेदिप्र ेक्षणम् ६।२।६ १५६ - वेद्यु त्तरपरिग्रहः ४।३।१६ १६० - वेदिसंस्तरणम् २।६।१ १६१ - व्रतविसर्जनम् २।३।२० १६२ - व्रतोपायनम् २। २४ १६३ - ब्रीह्यवेक्षणम् १।४।२४ १६४ - शंयुवाक्प्रैषः ७।३।३४ १६५ - शयुवाकहौत्रम् २।६।७ १६६ - शंयुवाकानुवचनम् ७ | ३।२६. १६७ – शम्योपधानम् ६।१।२८ ९ ६८ - शाखागूहनम् ६।२।१५ १६६ - शूर्वादानम् १७० - शेषाभिमर्शनम् ४२।१३ १७१ - संस्रवभागहरणम् ७४/७ १ | ४ | १० १७२ - सन्ननवित्र सनम् ५।५।२ १७३ - सन्नहनाभिच्छादनम् १७४- समिदभ्याधानम् ५।५।१२ १७५ - समिषुयजुर्होमः ३ | ४ | १६ १७६ - सम्प्रॆषाः ७ | ४ | १६ १७७ – सान्नाय्यकरणम् ५ | ४ | १ १७८ - सामिधेनीसम्प्रषः ५५२१ १७६ - सूक्तवाक्प्रैषः ४ | ३ | ११ १८०- सूक्तवाकहौत्रम् ११४१६ १८१ - सूक्तवाकानुवचनम् ५२५५ १८२- सूर्याभिवीक्षणम् ७४८ १८३ - सूर्यावर्त्तनम् ७ | ३ | १६ १८४ – स्कन्नाभिमर्शनम् ७।३।२१ १८५ - स्तम्बयजुर्हरणम् २ | ४ | ११ १८६ - स्थाल्यादानम् ७७३।१७ १८७ - स्फ्यप्रहरणम् २ | ३ | १४ १८८ - स्फ्यादानम् २।३।१ १८६ - स्रु प्रतपनम् १८
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पारिभाषिक सूचनाए १६०- स्रुक्सम्मार्जनम् १६१ - स्रु ग्याघारः २ | ४ | १ २०४ - इविः प्रोक्षणम् III ४ | १ | १ २०५ - हविरनुमन्त्रणम् १।४।२३ १६२ - स्रु ग्व्युहनम् ७१।१ २०६ - हविरभिमर्शनम् ३ | १ | १६ १६३ - स्रुगादानम् २ | ४ | ८ २०७ - हविरावपनम् | १ | ४ | ८ १६४ - स्रु गादापनानुवचन न् ४ | ३ | १ २० = -इविर्निधानम् १ | ४ | २० १६५ - स्रुवग्रहणम् ७।३।१६ २०६- हविर्निष्पवनम् १ | ४ | २१ १६६ - स्रुवप्रतपनम् २४१४ २१० - हविर्निर्वापः ११२।१ १६७ - स्रु वसम्मार्जनम् २ | ४ | ६ २११ - हविर्विवेचनम् | ५ | २२ १६८- स्र वादानम् २ | ४ | ४ २१२ - हृषिप्रश्रवणम् २ | ४ | २० १६६- स्वःप्रेक्षणम् २०० - स्वाहाकारः ७ | ४ | १४ २१३ - हविस्समाहननम् ४२११३ ४।४।२३ २ ९ ४ - हविस्सादनम् १।२।२३ २०१ - स्विष्टकृद्यागः २०२ - स्विषुकृन्निगदानुवचनम् २०३ – हविःपेषणम् ६ | १ | २१५ - हविष्कृदाह्वानम् १।४।११ ६।१।१० ११६ - हिङ्करणम् ३।३।९ ४१३१७ १।५।१ = २१७ - होतृप्रैषः सैषा प्रथमकाण्डानुगता कर्म्मनामसूची-अकारादिक्रमेण - उपरता ८ - प्रथमकाण्डानुगता - ऋष्यादिनामसूची-नाम --अकारादिक्रमेण— प्रपाठक - ब्राह्मण कण्डिका १३ - गोतमः ३।३।१०।१४-१८ १- अषाढः १1१1७. १४ - त्रितः २।१।१ २- आङ्गिरसः भृगवः ( ) १।५।१३ १५- त्वष्टा ५ | २ | ६ ३- श्रङ्गिरसः ( बृहस्पतिः ) २।३।२५-२६ १६- त्वाः ( त्रिशीर्षा, षडक्षः ) ५।२।१ ४- श्राप्त्याः २ | १ | १ ९ ७ - दनुः २ ५- आरुणिः १।११ १८ - दनायूः ५२ ६- आसुरिः ५।२।२६ १६- दानवः ५ | २ | ७- इडा ६६३८-११ २० - द्वितः २ | १११ ६- एकतः २ | ४ | १ २१- पाञ्चालाः ५५२८ ६- श्रपोदितेयः ७ | ४ | १६ २२- पान्निः ३।३।६ १०- कुरवः ५ | ५ | ६ २३ – बर्कुः १।१।१० ११- कोसलाः ३।३।१७ २४ - बार्हस्पत्यः ७।२।२४-२५-२६ १२ – गन्धर्वः ३।१।२ २५ - बृहस्पतिः २।३।२५-२६ १६
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शतपथभाष्य २६ - भालवेयः २७ - भृगवः ६।१।१६ ३४ - विदेषः | १ | ५ | १३ ३५ - विदेहाः ३।३।२०- १४-१७ ३ | ३ | १७ २८ - मनावी १ | ४ | १६ ३६ - विश्वरूपः २ | १ | २ २६ - मनुः १।४।१४-१६।३।३, ११-६-८-६-१११, ३ | ४ | ३७ - विश्ववसुः ३ | १ | २ ५।४।२७ ३८- शयुः ७।२।२४-२५-२६ ३० - माथवः . ३।३।१०-१४ - १७ ३६ - सदानीरा ३।३।१४-१७ ३१- याज्ञवल्क्यः १।१।६।२।४।२६ । - ७ | ३ | १२ ४० - सरस्वती ३।३।१४-१७ ३१- हुगणः ३३- वार्ष्णः ३।३।१०।- १४-१८ ४१ - सावयसः १ | १ | ७ ११११० ४२ - हिरण्यस्तूपः ५।३।२ सैषा प्रथमकाण्डानुगता ऋष्यादिनामसूची-अकारादिक्रमेण - उपरता ह – शाखाभेदभिन्न यजुन ह्मानुगत शतपथब्राह्मण— संहितावेद मौलिकतत्त्वात्मक ऋषिप्राण की प्रधानता से जहाँ ' ब्रह्मवेद ' कहलाया है, वहाँ, इस ब्रह्मवेद ( संहितावेद ) का व्याख्याभूत वेदभाग ' ब्राह्मणवेद ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । मूलवेद ब्रह्मवेद है, यही मन्त्रवेद है । एवं तलवेद ब्राह्मणवेद है, यही व्याख्यावेद है । दोनों वेदभागों के सिद्ध - साध्य - रूप से दो ढं विवर्त्त हैं । तत्त्वात्मक मौलिक ब्रह्म - ब्राह्मणवेद ' सिद्धवेद ' है, यही सनातननिष्ठानुबन्धी नित्यकूटस्थ अपौरुषेय ऋषिदृष्ट वेद है, जिसके लिए - ' ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात्कृतधर्माण: ' इत्यादि प्रसिद्ध है । इत्थंभूत तत्त्वात्मक त्रपौरुषेय मन्त्र - ब्राह्मणात्मक नित्यकूटस्थ वेद की प्रतिकृति के माध्यम से सर्वथा तत्समतुलित ऋषि-कृत बुद्धिपूर्विका कृति से अनुप्राणित * शब्दात्मक मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेद ' साध्यवेद ' है । यही ऋषिदृष्टि से-समतुलित, अतएव शब्दार्थानुबन्धी औत्पत्तिकसम्बन्धापेक्षया अपौरुषेयवत् - अलौकिक - शब्दात्मक मन्त्रब्राह्मणा त्मक वेदशास्त्र है | जैसा जो शाखाविभाग ऋषिदृष्ट अपौरुषेयवेद में है, वैसा वही शाखाविभाग ऋषिकृत वेदशास्त्र में है । एवं इस सर्वथा विभक्त दृष्टिकोण के समन्वय के अनन्तर उन सब विवादों का सर्वथा ही अभि-भव हो जाता है, जिन विवादों को लेकर विगत कतिपय शताब्दियों से वेदनिष्ठ सनातन प्रजा में वेद की पौ-रुषेयता के माध्यम से अनेक प्रकार के कटु विसंवाद प्रचलित हैं ÷ । मौलिक अपौरुषेय वेद से अभिन्न, अतएव लौकिक शब्दप्रपञ्च के समतुलन की दृष्टि से सर्वथैव अलौकिक, ऋषिप्रज्ञा के द्वारा संकलित वेदशास्त्र की १०१ शाखाओं में विभक्ता यजुः संहिता के व्याख्याभूत वेदग्रन्थ हीं ' यजुर्ब्राह्मण ' कहलाए हैं, जिनके शाखाभेद से १०१ ही विभाग माने गए हैं । इनमें १५ ( पन्द्रह ) यजु: -- बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ( वै ० दर्शन ) * -÷ — वेद के इस तात्त्विक स्वरूप का उपनिषद्विज्ञान भाष्यभूमिका - १-२-३ - खण्डों में ( अनुमानस: १५०० पृष्ठों में ) विशद विश्लेषण हुआ है । २०
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पारिभाषिकसूचनाएँ शाखाएँ ' शुक्लयजुर्वेद ' नाम से प्रसिद्ध हैं, एवं शेष ८६ ( छियासी ) यजुःशाखाएँ ' कृष्णयजुर्वेद ' नाम से व्यवहृत कीं जा सकतीं हैं । इन १०१ यजुः शाखात्मक संहितात्मक मन्त्रग्रन्थों के १०१ ही व्याख्यात्मक ब्राह्मणग्रन्थ अभीष्ट हैं, बिनमें से दुर्भाग्यवश शुक्लयजुर्वेद की उपलब्धा माध्यन्दिनशाखा, तथा काण्वशाखा के ब्याख्याभूत एतन्नामक दो ही ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध हैं । काण्व - माध्यन्दिन - जाबाल - बुधेय - शाफेय-तापनीय- कपोल -- पांडवत्स - आवटिक -- परमावटिक -- पाराशरीय - वैनेय- वैधेय - औधेय-- गालव - इन पन्द्रह शुक्लयजुःशाखाओं के एतन्नामक ही १५ ब्राह्मण ' शतपथब्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध रहे होंगे, इत्यनु– मीयते । भगवान् भास्कर, के अनुग्रह से प्राप्त शुक्लयजुर्वेद के तत्त्वज्ञ भगवान् याज्ञवल्क्य ही उक्त पन्द्रह शाखाओं, तथा तद्द्व्याख्याभूत १५ ब्राह्मणों के सम्प्रदायप्रवर्त्तक मुख्य श्राचार्य माने ना सकते हैं । अतएव बे सभी शाखाध्यायी ‘ वाजसनेयी ' कहलाए हैं । त्रैलोक्यव्यापक सौरप्राणात्मक आधिदैविक वाजी ( अश्व ) के स्वरूपचिन्तन के माध्यम से ही भगवान् याज्ञवल्क्य ने तथोपवर्णित यजुः का साक्षात्कार किया था । इत्थंभूत शुक्लयजुर्वेद की १५ शाखाओं में से प्रथमा, तथा द्वितीया, इन दो शाखाओंों के व्याख्याभूत माध्यन्दिन, तथा काव नामक शतपथब्राह्मणद्वय ही आज वेदनिष्ठ प्रज्ञा को उपलब्ध हैं । शत - शत - श्रध्याय के सम्बन्ध से ही ये ब्राह्मणग्रन्थ ' शतपथब्राह्मण ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं, जैसाकि श्रारम्भ में निवेदन किया बा चुका है । प्रस्तुत भाष्य यद्यपि ' माध्यन्दिनीय शतपथब्राह्मण ' से ही अनुप्राणित है । तथापि प्रसङ्गधिया काण्वशाखानुगत शतपथब्राह्मणं से सम्बन्ध रखने वाले विषयेतिवृत्त का भी दो शब्दों में दिग्दर्शन करा दिया माता है | अध्याय संख्या - संकलन जहाँ दोनों ब्राह्मणों का समतुलित है, वहां काण्ड संख्या दोनों की विषमा है । काण्वशतपथ में नहीं १० काण्ड हैं, वहीं प्रस्तुत भाष्यानुगत माध्यन्दिनीय - शतपथ में १४ ( चौदह ) हो काण्ड है । निरूपणीय विषयों की दृष्टि से भी दोनों में थोड़ा विभेद है । नीचे लिखी तालिका - चतुष्टयी से दोनों का यह अन्तर सर्वात्मना विस्पष्ट हो रहा है । काण्वशतपथब्राह्मण में निरूपित सामान्यविषय - दिग्दर्शन — ( १ ) - प्रथमकाण्ड – आधान, पुनराधान, अग्निहोत्र, आग्रयण, पिण्डपितृयज्ञ, दाक्षायणयज्ञ, उपस्थानादिकर्म्म, चातुर्मास्यया । ( २ ) - द्वितीयकाण्ड – दर्शपूर्णमासेष्टि । ( ३ ) - तृतीयकाण्ड -अग्निहोत्रानुबन्धी अर्थवाद, दर्शपूर्णमासानुबन्धी अर्थवाद । ( ४ ) -चतुर्थकाण्ड— सोमयागदीक्षा, अभिषवादि कर्म्म । * —वाजसनेयेन - याज्ञवल्क्येन - ( बृहदारण्यक - ६ | ५ | ३ ) प्रोक्त - अधीयते, ते वाजसनेयिनः । २१
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शतपथमाष्य ) - पञ्चमकाण्ड -सोमयाग, सबनत्रयानुगत कर्म्म, उक्थ्य, षोडशी - अतिरात्रादि सोमसंस्था - स्वरूपनिरूपण, द्वादशाह्याग, त्रिरात्राद्दोनदक्षिणा, चतुस्त्रिराद्धोम, सत्रधर्म्म । ( ६ ) - षष्ठकाण्ड--वाजपेययागेतिकर्त्तव्यता ( बृहस्पतिसवात्मिका ) । ( ७ ) - सप्तमकाण्ड – राजसूयगेतिकर्त्तव्यता ( इन्द्रसवात्मिका ) । -:) - अष्टमकाण्ड -उषासम्भरणेतिकर्त्तव्यता । ( ६ से १२ ) - नवमकाण्ड से द्वादशकाण्ड पर्य्यन्त ( चार काण्डों में ) — श्रमप्रधान - चयनयागेतिकर्त्तव्यता । ( १३ ) - त्रयोदशकाण्ड -आधानकाल, पथिकृदिष्टि, प्रयाजानुमन्त्रण, शंयुवाक, पत्नीसंयाज, ब्रह्मचर्य्य, दर्शपूर्ण -मास, तथा पशुबन्ध । ( १४ ) - चतुद्द ' शकाण्ड-दीक्षाक्रम, पृष्ठ्य- श्रभिप्लदि, सौत्रामणीयाग, श्रग्निहोत्रप्रायश्चित्त, मृतकाग्निहोत्रेति-कर्त्तव्यता । ( १५ ) - पञ्चदशकाण्ड – अश्वमेधयागेतिकर्त्तव्यता । ( १६ ) - षोडशकाण्ड— प्रवर्ग्ययागेतिकर्त्तव्यता ( महावीरोपासनात्मिका ) । ( १७ ) - सप्तदशकाण्ड-ब्रह्मविद्यास्वरूपनिरूपण । सैषा सप्तदशकोण्डानुगता काण्वशतपथब्राह्मणान्तर्गता संक्षिप्ता विषयतालिका २२
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काण्ड संख्या २ ३ I ५ ६ ७ ८ ε १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १७ काण्डनाम एकपात्काण्ड हविर्यज्ञका ड उद्धारिकाण्ड श्रध्वरकाण्ड ग्रहकाण्ड वाजपेय काण्ड राजसूय काण्ड उषासंभरण काण्ड हस्तिघटकाण्ड चितिकाण्ड सप्तचितिकाण्ड अग्निरहस्यकाण्ड अष्टाध्यायीकाण्ड मध्यमकाण्ड श्रश्वमेधकाण्ड as उपनिषत्काण्ड पारिभाषिक सूचनाएँ ब्राह्मण संख्या अध्यायसंख्या ६ २२ ८ ३२ २ २२ ३६ Ε ३८ ८ २ ७ ५ १६ २७ ८ धू १६ ५ २० ७ २० ६ २८ ३१ ८ ६ २८ ८ ४४ २ ६ ४७ १०४ ४३५ २३ कण्डिका संख्या ३७६ ५३२ १२४ III ६७४ ७०० २८६ ५११ २५७ २४३ ४३७ २८६ २४१ ३६२ ३०८ १६२ २६५ ६८०६ काण्वशतपथब्राह्मणानुगता काण्डाध्यायादितालिका-
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शतपथमाध्य माध्यन्दिन - शतपथब्राह्मण में निरूपित सामान्य विषयदिग्दर्शन-शतपथे शतमध्यायाः - एवं रूपेण १ यज्ञविभागः ब्राह्मणे ३५ श्र ० संहितायां १० शतपये का • ५ २ चयन विभागः २५ अ • द ४ 17 " ५ ३ परिशिष्ट - खिलविभागः ४० अ ० २२ 23 99 35 स एष ध्यायादिविभागः— ४० १४ माध्यन्दिनीयशतपथब्राह्मणानुगता संक्षिप्ता विषयतालिका— ( १ ) - प्रथमकाण्ड -दर्शपूर्णमासेष्टीतिकर्त्तव्यता । ( २ ) - द्वितीय काण्ड --आधान, पुनराधान, अग्निहोत्र, उपस्थान, प्रवत्स्यदुपस्थान, भगतोपस्थान, पिण्डपितृयज्ञ, श्राग्रयण, दाक्षायण्यज्ञ, चातुर्मास्ययाग । ( ३ ) - तृतीयकाण्ड-दीक्षाभिषवकर्म्मपर्यन्ता सोमयागेतिकर्त्तव्यता । ( ४ ) -चतुर्थकाण्ड-ग्रइयाग. सोमयागानुबन्धी सवनत्रयानुगत कर्म्म, षोडश्यादि सोमसंस्थास्वरूप, द्वादशाहयाग, त्रिरात्राद्दीन - दक्षिणा, सत्रधर्म्म । ( ५ ) पञ्चमकाण्ड --वाजपेय - राजसूय - यागेतिकर्त्तव्यता । ( ६ ) - षष्ठकाण्ड-उपासम्भरण, विष्णुक्रम, वात्सप्रोपस्थान, वनी वाहनक । ( ७ ) - सप्तमकाण्ड --श्चयनयाग, गाईपत्यचयन, निर्ऋतिचयन, श्रग्निक्षेत्रसंस्कार, अपस्यासादनान्त - दुर्भस्तम्बादि-कम्म । २४
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पारिभाषिकसूचनाएँ ( ८ ) - अष्टमकाण्ड -शेषभूता- चयनयागेतिकर्त्तव्यता । : -( ६ ) - नवमकाण्ड -शतरुद्रियहोमादि, धिष्ण्य चयन, पुनश्चिति, चित्युपस्थान । ( १० ) - दशमकाण्ड --चितिसम्पत्ति, चयनयागस्तुति, चित्यपक्षपुच्छमीमांसा, चित्याग्निवेदिमान, तत्सम्पत्ति, चयनकाज़मीमांसा, छन्दःसम्पत्, सम्वत्सरसम्पत्, इष्टकासम्पत, अमितत्त्वोपासन, मानसी-सृष्टि, लोक - भूताग्नि – उपासना, अग्निस्वरूपविश्लेषण, ऋषिवंशसंस्मरण, आदि - समन्वत अग्निरहस्यपविद्यास्वरूपविश्लेषण 1 ( १ ) - - एकादशकाण्ड-आधानकाल, दर्शपूर्णमासदाक्षायणयज्ञावधिमीमांसा, दाक्षायणयज्ञ, पथिकृदिष्टि, अभ्यु-दितेष्टि, हविः समृद्धि, चातुर्मास्यार्थवाद, पञ्चमहायज्ञ, स्वाध्यायमीमांसा, प्रायश्चित्त, अंशु-अदाभ्यग्रह - मीमांसा, अध्यात्मविद्या, पशुबन्धस्तुति, हविर्यज्ञ - सर्वविधयक्षलक्षण, बढ्दो -होम | ( १२ ) - द्वादशकाण्ड -सत्रानुगत दीक्षाक्रम, सत्रस्वरूप, पृष्ठ्य - अभिप्लव - स्वरसाम - विषुवत् - महाव्रत - आदि स्व-रूपमीमांसा, गवामयन, अग्निहोत्र प्रायश्चित्त, सौत्रामणीयाग, सृतकाग्रिहोत्र, मृतकदाह-मीमांसा । ( १३ ) -त्रयोदशकाएड-अश्वमेध, तदनुगत प्रायश्चित्तविधान, पुरुषमेध, नरमेध, दशरात्र, पितृमेध - स्वरूपेति कर्त्तव्यता | ( १४ ) - चतुद्द ' शकाण्ड-प्रवर्ग्यकर्म्म, धर्म्मयाग, प्रवर्योत्सादन, प्रवर्ग्यकर्तृ नियम, ब्रह्मविद्या, श्रीमन्य- पुत्रमन्थादिक, वँश - संस्मरण । सैषा चतुर्दशकाण्डानुगता माध्यन्दिनशतपथब्राह्मणान्तर्गता संक्षिप्ता - विषयतालिका ----२४