Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 301–310
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 301–310
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शतपथ भाष्य पाठ कर्म्मकाण्डानुगतमात्र बना रहता हुआ पारायणपाठी की पार्थिव भोगकामनाएँ हीं पूर्ण करने की क्षमता रखता है । यही निर्भु पाठानुगामी कर्मकाण्डी ' वेदपाठी ', तथा प्रतृरणपाठानुगामी ज्ञानविज्ञानानुगामी ' वेदतत्त्वज्ञ ' के विभिन्न मूलपाठानुगमनों में महान् अन्तर है । उभयफलकामनानुगत गृहमेधी ब्राह्मण ऐहिक ( पार्थिव ), आमुष्मिक ( सौर ) - उभयफलभोगावाप्ति के लिए उभयपाठ का अनुगमन किया करता है करता था पूर्व युगों में ) । शतपथविज्ञानभाष्य का निर्माण आज से अनुमानत: १५ वर्ष पूर्व ही अवभृथस्नानानुगामी बन गया था *. जबकि हम सर्वात्मना गृहस्थाश्रम के ही अनुगामी बने हुए थे । अतएव तत्समय में प्रकाशित शतपथभाष्य के अमुक अंश में हमने दोनों हीं प्रकार के मूलपाठों का सन्निवेश - ( ' अन्तरिक्षायतनमुभयम् ' इस श्रौता देश के अनुसार ) किया । अत्र हमारा वानप्रस्थकाल सन्निहित है । अतएव निर्भुजपाठानुबन्धी पार्थिव अन्नाद्य-कामना का संयम ही अपेक्षित है । अतएव अत्र प्रस्तुत भाष्य में हम केवल प्रनृरणपाठ का ही समावेश सामयिक मान रहे हैं । यही मूलपाठानुगत वह सामयिक दृष्टिकोण है, जिसके अनुबन्ध से हमें ऐतरेयसम्मस उभय पाठों का दिग्दर्शन कराना पड़ा । ११- शतपथब्राह्मण - हिन्दी विज्ञानभाष्य के ' विज्ञान ' शब्द से समन्विता प्रस्तुत भाष्यशैली-कर्म्मकाण्डानुगत पारायणापाठरूप निर्भुजपाठ, एवं ज्ञानविज्ञान काण्डानुगत तत्त्वबोधरूप प्रनृण्णपाठ, इन दोनों प्रकार के मूलपाठों में से प्रस्तुत भाष्य में अर्थावबोधक प्रतृण पाठ का ही समावेश इसलिए साम-यिक मान लिया गया कि, भाष्य का मुख्य उद्देश्य वैदिक - विज्ञान की रहस्यपूर्णा तात्त्विक परिभाषाओं का यथामति स्वरूपविश्लेषणमात्र ही है । यह ठीक है कि, वैज्ञानिक परिभाषाओं की आधारशिला कर्म्मकाण्डानु-गता पद्धतियाँ हीं हैं । स्वयं ब्राह्मणग्रन्थों ने इसी शैली के आधार पर वैज्ञानिक परिभाषाओं का समन्वय किया है 1 । पहिले कर्म्म की श्रावृत् ( पद्धति ) बतलाई जाती है । श्रनन्तर क्यों ऐसा किया जाता है?, इसप्रकार की प्रश्नोत्थानिका कर तत्कर्म्मसम्बिन्धिनी वैज्ञानिकी परिभाषा बतलाई जाती है । उदाहरण के लिए प्रस्तुत शतपथ भाष्य के उपक्रम - वचन को ही लक्ष्य बनाइए । ' ओं व्रतमुपैष्यन्नन्तरेण गार्हपत्यञ्च - श्राहवनीयञ्च प्रातिष्ठन्नप उपस्पृशति ' यहाँ से ग्रन्थ का श्रारम्भ होता है । दर्शपूर्णमासेष्टि का उपक्रम होता है व्रतोपायनकर्म से । इसी क्रत्वर्थभूत प्रथम कर्म्म की इतिकर्त्तव्यता ( विधि - पद्धति ) का सर्वप्रथम स्पष्टीकरण करते हुए वेदभगवान् कह रहे हैं कि- “ व्रतग्रहण के लिए प्रवृत्त यजमान वस्तु ' लवृत्तात्मक गार्हपत्याग्निकुण्ड, तथा चतुः सक्त्यात्मक श्राहवनीयाग्निकुण्ड, दोनों के मध्य में पूर्वाभिमुख खड़ा रहता हुआ श्राचमन करता है " । इस कर्म्मपद्धति का वैज्ञानिक कारण बतलाने के अभिप्राय से उक्त पद्धतिवचन के अनन्तर ही - ' तद्यत् - अप उपस्पृशति ' ( सो जो कि यजमान श्रप का उपस्पर्श - श्राच मन - करता है, उसका कारण बतलाते हैं - तदुच्यते - इति शेषः ) इत्यादिरूप से - श्राचमन क्यों किया जाता है?, * अनुमानतः सन् ३२ से भाष्य निर्माण आरम्भ हुआ था । एवं अन्यान्य निबन्ध – निर्माणों के साथ यह भाष्य फुलिस्केप आकार के अनुमानत १८ हजार पृष्ठों में सन् ४० में समाप्त हो गया था । ३६
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पारिभाषिकसुचनाएँ इस वैज्ञानिक प्रश्न का उत्थान कर श्रुति ने ' अमेध्यो वै पुरुषो यदनृतं वदति, तेन पूतिरन्तरतः । मेध्या वा आपः, मेध्यो भूत्वा व्रतमुपायानि, इति । पत्रित्रं वा श्रापः । पवित्रपूतो व्रतमुपायान, इति । तस्माद्वा अप उपस्पृशति ' इत्यादि रूप से वैज्ञानिक समाधान किया है । कर्मे तकर्त्तव्यताप्रतिपादक ब्राह्मणग्रन्थों में वैज्ञानिक तत्वों के स्वरूपविश्लेषण की यही स्वाभाविक शैली है । पहिले कर्मस्वरूप का उद्घाटन, अनन्तर कारण जिज्ञासा, एवं सर्वान्त में कारणस्वरूप का वैज्ञानिक विश्लेषण । जबकि परिभाषाओं से अनुप्राणित मूलकारणात्मक रहस्यपूर्ण विज्ञानसिद्धान्त कर्म्म के आधार पर ही निरूपित हैं । तो यह स्पष्ट है कि, कर्म्मपद्धति का यथावत् समन्वय किए बिना तदाधारभूत विज्ञानसिद्धान्तों का स्वतन्त्ररूप से क्थमपि विश्लेषण सम्भव नहीं है । कर्मकाण्ड, तदनुगता व्यवस्थिता पद्धति साङ्गोपाङ्ग सर्व-प्रथम समन्वित होगी, तदनन्तर कर्म्मक्रमानुपात से ही तद्विज्ञानसिद्धान्तों का समन्वय सम्भव बन सकेगा । एकमात्र इसी अनुबन्ध से प्रस्तुत भाष्य में हमने माध्यन्दिन - शाखानुगता श्रौत - पद्धतियों में सर्वमृद्ध न्य कात्यायन-श्रौतसूत्रसम्मता चिरन्तना श्रापद्धति के क्रमिक समन्वय के साथ ही वैज्ञानिक तथ्यों के स्वरूपविश्लेषण की चेष्टा की है । “ सर्वप्रथम विज्ञान भावानुप्राणित प्रतृष्णभावात्मक मूलपाठ, अनन्तर मूल का अक्षरार्थ, अनन्तर सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह, एवं सर्वान्त में वैज्ञानिक परिभाषाविश्लेषणात्मक भाष्य " यही क्रम समाविष्ट इस भाष्य हुआ है । क्योंकि कर्म्मकाण्ड के समन्वय से सम्बन्ध रखने वाली विशेषताओं का बड़े समारम्भ के साथ तत्-प्रधान सायणादि भाष्यों में उपबृंहण हो चुका है । अतः इन कर्म्मपद्धतियों से सम्बन्ध रखने वाले प्रासङ्गिक विस्तारभाव यहाँ अनुपयुक्त मान लिए गए हैं । जिन्हें केवल आचारात्मक कर्मकाण्ड का हो अनुगमन श्रभीष्ट है, उनके लिए श्रौतसूत्र, तथा उपलब्ध सायणादि वेदभाष्य ह्रीं पर्य्याप्त हैं । एवं पर्य्याप्त है उनके परितोष के लिए तद्भाष्यानुगत पारायण पाठात्मक निर्भुजपाठ ही । जिन्हें ब्राह्मणोक्त कम्र्मों के मौलिक रहस्य की विशेष जिज्ञासा है, जो पारिभाषिक ज्ञान - विज्ञान सिद्धान्तों से परिचय प्राप्त करना चाहते हैं, प्रस्तुत भाष्य विशेषरूप से उन्हीं का अनुरञ्जन कर सकेगा । इसीलिए हमने इस भाष्य को - ' विज्ञानभाष्य ' नाम से व्यवहृत कर देना समीचीन मान लिया है । क्या यह विज्ञानभाष्य सायादि भाष्यों की व्याख्याओं के पदचिन्हों का अनुसरण कर रहा है?, इस हेतु प्रश्न का समाधान करना व्यर्थ है । स्वयं वेदग्रन्थ आर्षप्रजा के सम्मुख है । तद्भागभूत ब्राह्मणग्रन्थों की ज्ञानविज्ञानात्मिका परिषाभात्रों के समर्थक वचन भी तिरोहित नहीं है । एवं सायणादि माध्य भी उपलब्ध हैं ह्रीं । अत्र यह स्वयं नीरक्षीर विवेकी विद्वानों का कर्त्तव्य है कि, वे स्वयं तत् प्रश्न का समन्वय प्राप्त करलें । सायणादिभाष्य कर्म्मकाण्डात्मिका श्राचारनिष्ठा के संरक्षक बनतेहुए क्योंकि हमारी सनातन - आस्था के केन्द्र बने हुए हैं । अतएव शताब्दियों से विलुप्तप्राया वैज्ञानिक परिभाषाओं के प्रश्न को लेकर हम अपनी आस्था पर प्रहार करना अभीष्ट नहीं मान रहे । जैसा जो कुछ है, श्रार्ष-सनातन - प्रजा के सम्मुख है । एवं यही विज्ञानभाष्य के ' विज्ञान ' शब्द से सम्बन्ध रखने वाली भाष्यशैली की संक्षिप्ता रूपरेखा है । ३७
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शतपथभाष्य ( १२ ) - ' विज्ञान ' शब्द का भारतीय दृष्टिकोण से समन्वयोकक्रम -प्राच्यसंस्कृतिनिष्ठ, विशेषतः प्राजापत्यशास्त्रनिष्ठ विज्ञ - सुविज्ञ महानुभावों के समक्ष आज हम एक वैसे शब्द का भारतीय दृष्टिकोण से समन्वय करने जा रहे हैं, जो शब्द प्रतीच्य ' विज्ञानवाद ' के सम्पर्क में आकर आज विविध भ्रान्तियों का सर्जक प्रमाणित हो रहा है । और वह शब्द हे सुप्रसिद्ध ' विज्ञान ' शब्द | प्राय हमारे सभी प्रकाशित - अप्रकाशित ग्रन्थों के नामकरण में इसी शब्द की प्रधानता रही है । उदाहरण के लिए अबतक प्रकाशित -शतपथविज्ञानभाष्य- प्रथम - द्वितीय तृतीय - चतुर्थखण्ड, एवं प्रथमकाण्ड का शेषांशभूत प्रस्तुत शतपर्थावज्ञानभाष्य, हिन्दी - गीता - विज्ञानभाष्य- प्रथम द्वितीय - तृतीय - चतुर्थ-एवं पञ्चमखण्ड, उपनिषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्यभूमिका प्रथम - द्विर्त य एव तृतीयखण्ड, ईशोप-निषत् - हिन्दी - विज्ञानभाष्य प्रथम, -एव - द्वितीय खण्ड, श्राद्धविज्ञानान्तर्गत सापिण्ड्यविज्ञानोपनिषत्-तृतीय - खण्ड, एवं आत्मविज्ञाने पनिषत् नामक द्वितीय खण्ड, माण्डूक्योपनिषद्विज्ञानभाष्य, यदि निदर्शन हीं पर्य्याप्त मान लिए जायँग । आज से अनुमानतः दो वर्ष पूर्व हमारे इस सांस्कृतिक अनुष्ठान के अन्यतम सहयोगी श्रेष्ठिप्रवर श्रीकुड़ीलालजी सेकसरिया महाभाग ने अपने पितुः - श्री स्व ० श्रेष्ठिप्रवर श्रीगोविन्दरामजी महाभाग की पुण्यस्मृति के उपलक्ष में - खण्डचतुष्टयात्मक ' श्राद्धविज्ञान ' नामक ग्रन्थ के दो खण्ड प्रकाशित कराए थे । एवं श्राप ही के द्वारा दोनों खण्डों की अनुमानतः ५००-५०० प्रतियाँ देश - विदेश के सुप्रसिद्ध मार्मिक तत्त्वज्ञ विद्वानों को उपहारस्वरूप भेजी गई थीं । उन में से सामान्यरूप से एतद्देशीय कुछ एक विद्वानों के, तथा विशेषरूप से जापान - इटली - जर्मनी - आदि के नैष्ठिक विद्वानों के विभिन्न विचारविमर्श हमें सम्मति के रूप से यथान्मय उपलब्ध हुए । एतद्देशीय विद्वानों में से प्रकृत में हम बिहार के राज्यपाल माननीय श्री दिवाकर महोदय के पत्र की ओर अपने पाठकों का ध्यान इसलिए विशेषरूप से आकर्षित करना चाहते हैं कि, आपने सम्भवतः ग्रन्थनामों में उद्धृत ' विज्ञान ' शब्द को ही लक्ष्य बना कर ऐसी जिज्ञासा अभिव्यक्त की थी कि - " बिज्ञान शब्द से हमारा क्या तात्पर्य है " । इसी प्रकार प्रचारानुबन्धिनी अपनी विगत प्रवास - यात्राओं में भी अनेक श्रोताओं के द्वारा ' विज्ञान ' शब्द के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के ऊहापोह श्रुतोपश्रुत होते रहे हैं । इसी प्रसङ्ग में ' राजस्थान वैदिकतत्त्वशोध संस्थानमानवाश्रम ' के मन्त्री सुप्रसिद्ध संस्कृतिनिष्ठ सुहृदर डॉ ० श्री वासुदेवशरण अग्रवाल ने गतवर्ष मानवाश्रम में विघटित होनें वाल वैदेहत्तत्त्वानुगत प्रश्नोत्तरविमर्श के प्रसङ्ग में माननीय राज्यपाल महाभाग के पूर्वनिर्द्दिष्ट पत्र का सङ्केत करते हुए हमारे सम्मुख ' विज्ञान ' शब्द के समन्वय की जिज्ञासा अभिव्यक्त थी । उसी प्रश्नोत्तर विमर्शात्मिका वार्ता का सक्षिप्त स्वरूप यहाँ भी इसलिए उद्धृत कर दिया जाता है कि, अवश्य ही तन्माध्यम से सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः ' विज्ञान ' शब्द से सम्बन्ध रखने वाले भारतीय दृष्टिकोण का समन्वय सम्भव बन 1 ' गतानुगतिको लोकः, न लोक: पारमार्थिकः ' यह सुप्रसिद्ध श्राभाणक वर्त्तमान भारतीय भावुक प्रजा के सम्बन्ध में जैसा जिस रूप से अक्षरशः घटित हुआ है, वैसा अन्य वर्गों के साथ नहीं | प्रत्यक्षप्रभा-वोत्पादक बाह्य चाकचिक्यों से क्षणमात्र में प्रभावित हो पड़ने वाला आज का नितान्त भावुक भारतीय मानव ३८
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पारिभाषिकसूचनाएँ अपनी सनातन - श्रार्षनिष्ठा को क्षणमात्र में हीं विस्मृत कर देने की पूर्व क्षमता? से समन्वित है । स्वनिष्ठा-नुगत स्वस्वरूप के परिज्ञान का अभाव ही इसकी इत्थंभूता भावुकता का एकमात्र प्रमुख कारण है । प्रतीच्य भौतिक विज्ञान क्षेत्र के सम्बन्ध में भी इसने इसी परप्रत्ययनेय - मूला भावुकता का अनुगमन कर लिया है । और तद्द परिणामस्वरूप कुछ समय से इसकी ऐसी धारणा बन चली हैं कि, " जबतक हम अपने प्राच्य-विधि - विधानों को वर्त्तमान प्रतीच्य विज्ञान के विधिविधानों से समतुलित नहीं बना लेंगे, तब तक हमारा प्राच्य गौरव कदापि सुरक्षित न रह सकेगा । " एकमात्र इसी व्यामोहन में आसक्त - व्यासक्तमना बनते हुए याज के कतिपय भारतीय विद्वान् भी ' विज्ञान ' शब्द के माध्यम से अपने प्राच्य शास्त्रों की व्याख्याओं में प्रवृत्त होते जा रहे हैं । वर्तमान भूतविज्ञान की कृपा से समुद्भूत आज के विविध प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कारों के सम्बन्ध में यदा कदा प्राच्य - भारतीय विद्वानों के मुख से भी ऐसा श्रुतोपश्रुत है कि- “ इन सत्र विज्ञानों का मूल तो हमारे शास्त्रों में पहिले से ही विद्यमान है " । कहना न होगा कि, इसी विज्ञानावेश से अभिनि— विष्ट कतिपय भारतीय विद्वान् आज इस दिशा में सर्वथा उपहासास्पद अनर्गल - असम्बद्ध विचार ही अभि-व्यक्त करते रहते हैं । प्राच्यसाहित्य में, विशेषतः वैदिक साहित्य में इस प्रकार के भौतिक - विज्ञान सूत्रों की श्रम्वेषण - प्रवृत्ति का इसलिए कदापि अभिनन्दन नहीं किया जासकता कि, इस अन्वेषण प्रवृत्ति से वेदशास्त्र का प्रातिस्विक गौरव अभिभूत ही प्रमाणित होजाता है । हाइड्रोजन - प्रॉक्सिजन - नाइट्रोजन - कार्बन - आदि श्रादि तत्त्वों के रासायनिक सम्मिश्रण से सम्बन्ध रखने वाले वर्त्तमान भौतिक श्राविष्कारों के माध्यम से वैसे से ही भौतिक - श्राविष्कारों की कल्पना करते हुए कदापि वेदशास्त्र का महत्त्व प्रतिष्ठित नहीं किया कुछ जासकता । तार - टेलिफोन - रेडियो - वायुयान - आदि की कल्पना से तो वेदशास्त्र का गौरव सर्वथा विलीन ही होसकता है, हुआ है । यद्यपि यह ठीक है कि, किसी एक निश्चित सिद्धान्तबिन्दु पर पहुँचने के अनन्तर वर्त्तमान भौतिक विज्ञान के साथ भारतीय वैदिक विज्ञान का कोई विसंवाद शेष नहीं रह जाता । क्योंकि विज्ञान स्वयं अपने आप में एक वैसा निर्भ्रान्त सत्य सिद्धान्त है कि, उसके सम्बन्ध में, उसके सैद्धान्तिक दृष्टिकोण में प्राच्य-प्रतीच्य का कोई विभेद सुरक्षित नहीं रह सकता । अपितु दोनों अन्ततोगत्त्वा एक ही सिद्धान्त पर समन्वित हो जाते हैं । यदि एक पश्चिम का विद्वान् किसी भौतिक विज्ञान - सिद्धान्त के द्वारा किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है, तो उसका यह निष्कर्ष कोई उसके घर की प्रातिस्विक सम्पत्ति नहीं है । अपितु विश्वव्यापक प्राकृतिक भूत - भौतिक पदार्थों के आधार पर ही वह किसी निष्कर्ष पर पहुँचता है । ठीक इसी प्रकार यदि एक भारतीय विद्वान् भी उन्हीं प्राकृतिक पदार्थों के अन्वेषण - माध्यम से यदि उसी निष्कर्ष का अनुगमन कर लेता है, तो यह भी कोई उसका पैत्रिक दायाद नहीं बन जाता । और यों दोनों हीं अन्वेषक निष्कर्षबिन्दु की अपेक्षा से किसी एक ही सनातन - सत्य - विज्ञान के समानोपासक मान लिए जासकते हैं । तथापि यदि केवल गतानुग-तिक - न्याय से प्रतीच्य विज्ञानवाद के तात्कालिक चाकचिक्य से प्रभावित होकर एक प्राच्य विद्वान् उसी पद्धति के माध्यम से भारतीय वैदिक - विज्ञान के अन्वेषण में प्रवृत्त होजाता है, तो वह सम्भवतः ही क्यों, निश्चय ही अपने घर के ' विज्ञान ' शब्द के ठीक ठीक समन्वय करने में सर्वथा समर्थ ही प्रमाणित हो सकता है भारतीय ' विज्ञान ' शब्द के वास्तविक समन्वय के लिए उचित तो यह था कि, भारतवर्ष की कुछ एक विशिष्ट प्रज्ञाएँ सर्वप्रथम तो अनन्यनिष्ठ । से अपने वैदिक साहित्य का अध्ययन करतों, तदनन्तर वर्त्तमान विज्ञान ३६
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शतपथ भाष्य के उच्च क्षेत्र की योग्यता प्राप्त करतीं । एवं इन दोनों प्रकार के दृष्टिकोणों के माध्यम से किसी निष्कर्ष पर पहुँचतीं हुई इस दिशा में प्रयत्नशील बनतीं । तत्र कहीं वे भारतीय ' विज्ञान ' शब्द के तत्त्वार्थ का ठीक ठीक समन्वय कर मकतीं थीं । यह सुनिश्चित है कि, विज्ञान शब्द के सम्बन्ध में वर्तमान भूतदृष्टि की अपेक्षा से हम नो कुछ भी निवेदन करेंगे, वह इसलिए अधिकांश में भ्रान्त होगा कि, वर्त्तमान भूतविज्ञान के वास्तविक परी-क्षण से हम अणुमात्र भी सम्पर्क नहीं रखते । इस सम्बन्ध में हमारी केवल ऐसी मान्यता ही नहीं, अपितु आस्था है कि, जिसे आज भौतिक विज्ञान कहा जाता है, उस के सैद्धान्तिक मूलसूत्र उसी रूप से ज्ञानविज्ञान-प्रधान वेदशास्त्र में भी विद्यमान होनें हीं चाहिएँ । प्रश्न है प्राच्य - प्रीतीच्य - निबन्धन उन सैद्धान्तिक मूल-सूत्रों के समसमन्वय का । किस रूप से, किस पद्धति, किंवा दृष्टि से प्राच्य वैदिक विज्ञानान्तर्गत भूतविज्ञान का प्रतीच्य भूतविज्ञान के साथ निर्विरोध समन्वय सम्भव बने?, सचमुच यह एक बहुत बड़ा कार्य्य है । अपने प्रका-शित- प्रकाशित ग्रन्थों में स्थान स्थान पर निर्व्याजरूप से जिस ' विज्ञान ' शब्द का हमने प्रयोग किया है, उस के साथ कहीं भी वर्त्तमान भूतविज्ञान के प्रति जानकारी रखने का हमारा अणुमात्र भी दम्भ नहीं है । दुर्भाग्य से, अथवा तो महत्सौभाग्य से प्रतीच्य भौतिक विज्ञान के यशः शरीर को अभिव्यक्त करने वाली इंग-लिभाषा का स्वाप्निक सम्पर्क भी हमें प्राप्त नहीं हुआ है । श्रतएव तद्भाषानुप्राणित, एवं तद्भावनिबन्धन भूत विज्ञानात्मक प्रतीच्य ' विज्ञान ' शब्द के सम्बन्ध में हम सर्वथा निरक्षरमूर्द्धन्य ही बने हुए हैं । अतएव वक्तव्य के आरम्भ में हीं हमें यह स्पष्ट कर ही देना चाहिए कि, हमारा ' विज्ञान ' शब्द वर्त्तमान भूतविज्ञान शब्द से सर्वथा ही असंस्पृष्ट है । भारतीय वेदशास्त्रसम्मत विशुद्ध प्राच्य दृष्टिकोण के आधार पर ही हमनें सर्वत्र ' विज्ञान ' शब्द समन्वित माना है । इसी दृष्टि से इष्टदेवानुग्रह से अभिन्ना गुरुकृपामात्र से जो कुछ जानने का प्रयास हुआ है, उस भारतीय वैदिक पारिभाषिक ' विज्ञान ' शब्द के अर्थ समन्वय के सम्बन्ध में ही किञ्चिदिव निवेदन कर दिया जाता है । १३ - शब्दार्थानुगता विशिष्टशैली, एवं ' ' हृदय ' शब्द — हमारे यहाँ एक विशिष्ट शैली, किंवा श्रार्ष चिरन्तनपद्धति यह रही है कि जिस तत्त्वार्थ को अभिव्यक्त करने के लिए जो शब्द नियत हुआ है, स्वयं उस वाचक शब्द में हीं तच्छब्दवाच्य तदर्थ की रहस्यपूर्णा वैज्ञा-निक व्याख्या निहित कर दी गई है । इत्यंभूता विशिष्ट शैली के सम्बन्ध में उदाहरण के लिए सर्वप्रथम ' हृदय ' शब्द को ही हम आपके सम्मुख रख रहे हैं । ' हृदय ' शब्द का क्या अर्थ?, यदि भारतीय प्रज्ञा से कोई यह प्रश्न करेगा, तो तत्समाधान के लिए इस प्रज्ञा को न तो किसी कोश की ही शरण में जाना पड़ेगा, न किसी भाष्य - टीका - किंवा व्याख्या की ही इसे कोई अपेक्षा रहेगी । श्रपितु यह प्रज्ञा स्वयं ' हृदय ' शब्द के आधार पर ही तद्रहस्यस्वरूपान्वेषण में प्रवृत्त हो पड़ेगी । स्वयं ' हृदय ' शब्द ही अपना सुगुप्त अर्थ प्रश्नकर्त्ता के सम्मुख समुपस्थित कर देगा । मूल शब्द है ' हृदयम् ' अर्थात् नपुंसकलिङ्गान्त । ऐसे इस ' हृदयम् ' शब्द में ' हृ - दु - यम् ' इन तीन अक्षरों का सन्निवेश स्पष्ट है । तीनों में आरम्भ का ' ह ' नामक प्रथम अक्षर किसी विशेष तत्त्व की ओर सङ्केत कर रहा है, ' द ' नामक द्वितीय अक्षर किसी अन्य ही तत्त्व का संग्राहक बना हुआ है, एवं - ' सहाय व्र्व्यञ्जनैः पूर्वैश्चावसितैः ० ' इत्यादि प्रातिशाख्य - सिद्धान्तानुसार व्यज्जन से समन्वित ' यम ' नामक तृतीय अक्षर किसी तीसरे ही तत्त्व की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । हरणार्थ, किंवा आहरणार्थक ‘ हृञ् हरणे ' नामक धातु से ऋषिप्रज्ञा ने ' हृ ' इस एकाक्षर का ग्रहण किया । खण्ड-नार्थक, किंवा विसर्गात्मक ‘ दो श्रवखण्डने ' नामक धातु से ' द ' इस एकाक्षर का संग्रह किया । एवं ' यम् ' ४०
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पारिभाषिक सूचनाएँ यह तीसरा एकाक्षर नियमनभाव का, किंवा स्तम्भनभाव का संग्राहक मान लिया आचार्यों नें । इसप्रकार ' हृ ' नामक प्रथमाक्षर का तात्पर्य्य माना गया आहरण किंवा आदान । ' द ' नामक द्वितीयाक्षर का अर्थ हुआ खण्डन, किंवा विसर्ग । एवं ' यम् ' नामक तृतीयाक्षर का तात्पर्य्य हुआ । नियमन -स्तम्भन, किंवा स्थिति-भाव | वस्तु का ग्रहण करने वाली शक्ति ही ' हृ ' का अर्थ हुआ । जिस शक्ति के द्वारा जो वस्तु श्राहृत हुई है, आई है - उसे परावर्तित कर देने वाली लौटा देने वाली शक्ति ही ' द ' का अर्थ हुआ । एवं यह श्राहरणा-स्मक वस्त्वादान, तथा खण्डनात्मक वस्तुविसर्ग, सहन सिद्ध ग्रहण और त्याग लेना और देना दोनों विरुद्ध शक्तियाँ जिस स्थिर बिन्दु पर नियमितरूप से व्यवस्थित बनीं रहतीं हैं, वह नियत बिन्दुसीमा, वह उभयस्त-म्भनसीमा ही तीसरी शक्ति मानी गई, एवं वही साङ्केतिक रूप से ' यम् ' नाम से प्रसिद्ध हुई । और यों ' हृ ' अक्षर आदानरूपा आगति का ' द ' अक्षर विसर्गरूपा ' गति ' का, तथां ' यम् ' अक्षर स्तम्भनरूपा-नियमनरूपा ' स्थिति ' का संग्राहक बन गया । आगति - गति -स्थिति- इन तीन शक्तियों का स्वरूप - विश्लेषण करने वाली ' हृ - द - यम् ' इन तीन अक्षरों की समष्टि ही ' हृदयम् ' शब्द कहलाया, यही तात्पर्य है । क्या तात्पर्य्यं हुआ इस हृदयशब्दवाच्या शक्तित्रयी का?, प्रश्न का महारम्भसाध्य उस अनिरुक्त प्रजापतितत्त्व से सम्बन्ध है, जो प्रजापति प्रत्येक पदार्थ के हृदय में केन्द्र में गर्भ में- किंवा सर्वान्तरतम * ' सान्तर ' स्थान में प्रतिष्ठित रहा करते हैं, जिनका कि-“ प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजायमानो बहुधा विजायते । तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा || " — यजुः संहिता इत्यादि वेदमन्त्र से यशोगान हुआ है । प्रत्येक वस्तु पिण्ड उसका अपना विश्व है, श्रपना संसार । एवं स्वसंसाररूप प्रत्येक वस्तुपिण्ड का - जनन - मरणादि सुप्रसिद्ध षडूभावविकार तद्वस्तु की केन्द्रशक्ति पर ही अवलम्बित है | श्रादानविसर्गनियमन भावात्मिका वह हच्छक्ति ही - ' अन्तस्तिष्ठन् - नियमयति सर्वान् वस्तुभावान् ' निर्वचन से ' अन्तर्यामी ' नाम से प्रसिद्ध हुई है, जिसे भावुक भक्त प्रजा घट-घट - व्यापक माना करती है । आहरण से ही वस्तु का स्वरूपसंरक्षण होता है । अतएव इस आदानशक्ति के अधिष्ठाता विष्णुदेवता को सृष्टिपालक कहा गया है । विसर्गात्मक खण्डन से ही वस्तुस्वरूप का विस्र ंस-नात्मक नाश होता है । अतएव इस विसर्गशक्ति के अधिष्ठाता इन्द्रात्मक रुद्रदेवता को सृष्टिसंहारक मान लिया गया है | एवं नियमनात्मिका स्थिति से ही वस्तुस्वरूप का आविर्भाव होता है । अतएव इस नियमन-शक्ति के अधिष्ठाता प्रतिष्ठात्मक ब्रह्मदेव को सृष्टिकर्ता कह दिया जाता है । विष्णु - रुद्र - ब्रह्मा- इन तीन प्राकृतिक प्राणदेवताओं से अभिन्ना आगति - गति - स्थिति - रूपा शक्तित्रयी ही इसप्रकार वस्तुस्वरूप की भाग्यविधात्री बन रही है । * केन्द्रवाचक भारतीय ' सान्तर ' शब्द, और केन्द्रणाचक प्रतीच्य ' सेन्टर ' शब्द का समतुलन कीजिए । ४१
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शतपथमाध्य क्या तीनों शक्तियाँ परस्पर विभिन्न हैं? | नहीं । अपितु एक ही शक्ति की ये तीन विभिन्न अव-स्थ एँ हैं, जोकि शक्ति ' अव्यक्तप्रकृति ' कहलाई है । एवं जोकि श्रव्यक्तप्रकृति ' अव्यक्तोऽक्षर इत्या-हुम्तमाहुः परमां गतिम् ' इत्यादि गीता सिद्धान्त के अनुसार ' अक्षर ' नाम से प्रसिद्ध है । अक्षरात्मिका इस अव्यक्ता प्रकृतिदेवी के अनुशासन से सम्पूर्ण विश्व, एवं सम्पूर्ण चर - अचर प्रजा - स्थावर - जङ्गम - प्रपञ्च सञ्चालित है, व्यवस्थित है, जैसाकि - ' तस्य वा एतस्य - अक्षरस्य प्रशासने गार्गि! द्यावापृथिवी विधृते तिष्ठते - सूर्याचन्द्रमसौ - अहोरात्राणि - अर्धमासाः - ऋतवः - सम्वःसरा विधृतास्तिष्ठन्ति ' इत्यादि ब्राह्मण-श्रुति से संसिद्ध है । 9 गतिलक्षण, क्रियालक्षण प्राण ही इस अक्षरप्रकृति की मौलिक परिभाषा है । अतएव गतितत्त्व को ही ' अक्षर ' कहा जाता । एवं इसी आधार पर सांख्यदर्शन का ' प्रकृतिः कर्त्री ' पुरुषस्तु पुष्करपलाशवन्नि-प: ' यह सिद्धान्त प्रतिष्ठित है । क्योंकि गतिलक्षणा क्रिया ही कर्त्री बना करती है । विश्वकर्त्री यह गतिल-क्षणा अक्षरप्रकृति अपने ' गति ' भाव से एकरूपा ही है । आगे चल कर गतितत्त्व की विभिन्न अवस्थाओं के कारण हीं यह गति तीन मावी में परिणत हो जाती है । केद्र से परिधि की ओर अनुगत रहने वाली वही गति जहाँ ' गति ' कहलाई है, वहाँ परिधि से केद्र की ओर अनुगत रहने वरली वही गति गति स्वरूप में परिणत होजाती है । ये दोनों हीं गतियां विरुद्ध दो दिशाओं का अनुसरण कर रहीं हैं । विरुद्ध दिशाओं का कानें वालों इन दोनों विरुद्ध गतियों का एक बिन्दु पर निपात होजाना हीं अनुगमन इन की स्थितिभाव में परिणति है, यही स्तम्भन है । तात्पर्य - कमसे कम दो विरुद्ध दिग्द्वय - गतिभावों के, किंवा अनेक विरुद्ध गतिभावों के समन्वय से उत्पन्न हो पड़ने वाला स्तम्भनभाव ही ' स्थिति ' भाव माना गया है । इस प्रकार जिसे लोक में ' स्थिति ' कहा बारहा है, वह भी तत्त्वतः गतियों का ही समुच्चित रूप है । और यों गति - श्रागति - स्थिति- तीनों का एकमात्र गतिभाव पर ही विश्राम हो रहा है । एक ही गतिरूप अव्यक्त अक्षर प्रागतिभाव से विष्णुरक्षर है, गतिभाव से इन्द्राक्षर है, एवं गतिसमष्टिरूप स्थितिभाव से ब्रह्माक्षर है । व्यवहार में तीन तत्त्व हैं । तीन गतियाँ हैं । परमार्थ में तो एक ही तत्त्व के ये तीन विवर्त-भाव हैं । तभी तो यहाँ का ' एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्म - विष्णु - महेश्वराः ' मूलक भेदसहिष्णु श्रभेदवादात्मक वेदान्तसिद्धान्त सर्वमूर्द्धन्य प्रमाणित हुआ है, जिस इत्थंभूत त्रितत्त्वमूर्ति एकमूर्ति - गर्भस्थ प्रजापतितत्त्व का श्रादानविसर्गनियमनात्मक रहस्यपूर्ण तात्त्विक वैज्ञानिक स्वरूप ' हृ -द - यम् ' की समष्टिरूप ' हृदयम् ' शब्द के माध्यम से ही सर्वात्मना विस्पष्ट बना हुआ है । और यही है उस चिरन्तनशैली का प्रत्यक्ष निदर्शन, जिस के माध्यम से ही हमें ' विज्ञान ' शब्दार्थ के समन्वय में प्रवृत्त होना है । १४ -- चिरन्तनशैली के आधार पर ' विज्ञान ' शब्दार्थ का समन्वय— हाँ, तो तच्छैली के आधार पर ही ' विज्ञानम् ' शब्द को लक्ष्य बनाने का अनुग्रह कीजिए, जिस इस शब्द के अक्षरों में हीं भारतीय विज्ञानकाण्ड का रहस्यपूर्ण विश्लेषण सुगुप्त है, सुरक्षित है, विन्द्ध है । ‘ विज्ञानम् ' शब्द के ‘ वि’– ' ज्ञानम्'- ये दो विभाग स्वतः सिद्ध हैं । ' वि ' सुप्रसिद्ध उपसर्ग है, जिसके ' त्रिशेष-विविध, एवं विरुद्ध, तीनों हीं अर्थ हो सकते हैं, जैसे कि ' वि ' उपसर्ग से समन्वित ' विकर्म्म ' शब्द के विशेषकर्म्म - विविधकर्म्म - विरुद्धकर्म्म- तीनों अर्थ यथाप्रकरण शास्त्रों में समन्वित हुए हैं । इस दृष्टि से ‘ विज्ञानम् ' शब्द के भी तीनों हीं अर्थ सम्भव हैं, जिनके आधार पर ये लक्षण किए जासकते हैं कि ~~ ४२
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पारिभाषिकसू ( १ ) - विशेषं ज्ञानं – विज्ञानम् । ( २ ) - विविधं ज्ञानं - विज्ञानम् । ( ३ ) - विरुद्ध ज्ञानं - विज्ञान ( 1 प्रस्तुत विज्ञानशब्दार्थ के समन्वय - प्रसङ्ग में सर्वान्त के तीसरे विरुद्धभावात्मक विज्ञानभाव का तो स्वत: एव निराकरण होरहा है । क्योंकि प्रकृतिविरुद्ध ज्ञानात्मक विज्ञान तो अज्ञानावृत ज्ञानलक्षण वह मोह है, जिसे विद्यात्मक ' अज्ञान ' ही कहा गया हैं, एवं जिसके सम्बन्ध में - ' अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ' “ ह प्रसिद्ध है । शेष रह जाते हैं प्रथम द्वितीय लक्षणानुगत विशेष, तथा विविधभावात्मक विज्ञान शब्द । सामान्यभाव जहाँ एकत्त्व का समर्थक है, वहाँ विशेषभाव अनेकत्व का संग्राहक माना गया है । नानाभावों से, नानाभावात्मिका विशेषताओं से, तन्मूलक भेद भावों से सर्वथा अतीत सामान्य ज्ञान तो केवल वैसा निरपेक्षं ज्ञान है, जिसका प्राकृतिक विश्व में कोई भी उपयोग नहीं है । सामान्य सत्तानिबन्धन - अद्वय - अतएव इन्द्रिया-तीत वैसा निरपेक्ष ज्ञान तो सर्वथा ही तटस्थ है इन विश्वानुबन्धी विशेष ज्ञानभावों के समतुलन में, बोकि—
“ प्रत्यस्ताशेषभेदं यत् – सत्तामात्रमगोचरम् ।
चचसामात्मसंवेद्य ं — तज्ज्ञानं ब्रह्म संज्ञितम् ” ॥
इत्यादि रूप से ‘ ब्रह्मज्ञान ' नाम से व्यवहृत हुआ है । अतः सामान्य ज्ञानात्मक ब्रह्मज्ञान का तो यहाँ प्रसङ्ग ही नहीं है । प्रसङ्ग प्रक्रान्त है विशेषभावात्मक विश्वानुचन्धी प्राकृतिक विज्ञानभाव का । विशेषभाव ही अनेकभावात्मक बना करता है । अतएव विशेषता, तथा विविधता - दोनों अन्ततोगत्वा समानार्थ में ह्रीं परिणत हो जातीं हैं । एवं इस दृष्टि से ' विशेषं ज्ञानं विज्ञानं ' का ' विविधं ज्ञानं विज्ञानम् ' इस लक्षण पर ही पर्यवसानहो जाता । यद्यपि विशेष - और विविध- दोनों शब्दों में भी विज्ञानदृष्ट्या सुसूक्ष्म भेद है । तथापि उस सीमापर्य्यन्त अनुधावन करना अप्रासङ्गिक समझ कर प्रकृत में विशेषभाव का वैविध्य में हीं प्रन्तर्भाव मानते हुए केवल मध्यस्थ लक्षण को ही अभी लक्ष्य बना लिया जाता है । १५ - ' विज्ञान ' शब्द की नित्य सापेक्षता -. ' विशेषभावानुगतं -विशेषभावाभिन्नं - बिविधं ज्ञानमेव विज्ञानम् ' यही लक्षण बनता है विज्ञान-शब्द का | ‘ विविधं ज्ञानं विज्ञानम् ' इस लक्षण के सुनने के साथ ही अनिवार्य्य - रूप से यह जिज्ञासा जागरूक हो ही तो पड़ती है कि- ' क्या कोई वैसा भी ज्ञान है, जो वैविध्य से शून्य है, नानात्त्व से पृथक है, किंवा विश्व-निबन्धन भेदवादों से अस्पृष्ट है? । जिज्ञासात्मिका यही सहज अपेक्षा अपनी सापेक्षता के श्राकर्षण से विज्ञान-शब्द के ही द्वारा ' ज्ञान ' शब्द का भी आकर्षण कर लेती है । सापेन्न विज्ञानशब्द उसी प्रकार अपनी अपेक्षा-पूर्ति के लिए ज्ञानशब्द का आहरण कर ही लेता है, जैसे कि सापेक्ष " शासित " शब्द अपेक्षासमन्वय के ' लिए ' शासक ' शब्द का आहरण कर लिया करता है । यही सापेक्ष शब्दों का परस्परानुबन्धपूरक वह सहज आकर्षण है, जिसके आधार पर विज्ञान का सुप्रसिद्ध वह ' सापेक्षतावाद ' सिद्धान्त प्रतिष्ठित हुआ है, बिस के ४३
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शतपथभाष्य बुनः प्रचार का श्रेय स्वनामन्य स्वर्गीय आईन्स्टीन महाभाग को प्राप्त हुआ है । एक को दूसरे से विभिन्न विभिन्न - पृथक् - चना देने वाला, अतएव ' भेदक ' नाम से प्रसिद्ध ' विशेषभाव ' जिससे अभिन्न है, ऐसा विविध भावात्मक ज्ञान जहाँ ' विज्ञान ' कहलाया है, वहाँ इस विविधरूपा भेदकता से पृथक - एकविध ज्ञान हीं ' ज्ञान ' माना जायगा, एवं इसी से सापेक्ष विज्ञान शब्द की अपेक्षा - वासना उपशान्त होगी । एवं यहाँ आकर अब हमें यह देना पड़ेगा कि— एकं ज्ञानं ज्ञानम् । एवं— विविधं ज्ञानं – विज्ञानम् । १६ - ज्ञान - विज्ञान - निबन्धन अमृत, मृत्यु- भाव — क्या तात्पर्य्य है ‘ एकं ज्ञानं ज्ञानम् ' का?, एवं क्या स्वरूप है ' त्रिविधं ज्ञानं विज्ञानम् ' का? | किंवा क्या अर्थ है ' एकत्त्व ' का १, एवं क्या लक्ष्य है ' अनेकत्त्व ' का? । बस यह मूलप्रश्नात्मक सूत्र जहाँ हमारी प्रज्ञा में नाकरूक हो पडता है, वहाँ तत्त्काल ही एक मन्त्र की ओर हमारा ध्यान आकर्षित हो पड़ता है-देवेह तदमुत्र, यमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ — कठोपनिषत् ११४ ११ । श्रुति ने जहाँ जहाँ नानाभावों का अनेकभावों का, पृथग्भावों का स्वरूप - विश्लेषण किया है, वहाँ वहाँ उन के साथ साथ ही ' मृत्यु ' शब्द का सम्बन्ध समन्वित माना है । अतएव इस श्रौती दृष्टि से यह प्रमाणित है कि, नानात्त्व - भेदत्त्व - पृथक्त्त्व - जहाँ मृत्यु का स्वरूपधर्म है, वहाँ अनेकत्त्व -अमेदत्त्व - अपृथक्त्त्व - अमृत का ही स्वरूपधर्म्म है | हम समझे नहीं, अमृत तो क्या, एवं मृत्यु क्या? | क्या तात्पर्य्य है हमारा इन अमृत— मृत्युशब्दों से? । श्रूयताम्! श्रुत्वा चाप्यवधार्य्यताम्!! १७ - सापेक्ष ज्ञान - विज्ञान शब्दों का दार्शनिक समन्वय— वैसा यः कश्चित् तत्त्व, जो कि स्वस्वरूप से निरपेक्ष स्थितिभावापन्न है, अतएव परिवर्तनीय है, अत-एव नित्यकूटस्थ है, अतएव शाश्वत है, अविचाली है, सनातन है, ध्रुव है, व्यापक है, अत्यनपिनद्धभाव से समन्वित रहा करता है, उसे ही हम - ' अमृत ' कहा करते हैं, और सम्भवतः अमृतात्मक उसी एकत्त्वनिबन्धन तत्त्वविशेष का नाम निरपेक्ष- ' ज्ञान ' है । इस सम्बन्ध में यह सर्वथा अविस्मरणीय है कि - अमृत ब्रह्म का यह तटस्थ लक्षण हीं श्राप के सम्मुख रक्खा जारहा है । क्योंकि वाङ्मनसपथातीत ऐसे निष्कल ज्ञानब्रह्म का स्वरूपलक्षण तो सम्भव ही नहीं है, जैसा कि—
सं विदन्ति न यं वेदाः, विष्णुर्वेद न वा विधिः ।
यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ॥
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पारिभाषिक सूचनाएँ इत्यादरूप से उसकी अनिर्वचनीयता स्वतः सिद्ध है । एवमेव सापेक्ष अमृत - भावात्मक ज्ञान, तथा सापेक्ष मृत्युभावात्मक विज्ञान का स्वरूप भी अभी आरम्भ में तो इसी तटस्थभाव का अमुगमन कर रहा है | इसी तटस्थ स्वरूप के माध्यम से आगे चल कर सम्भव है हम इन सापेक्ष - ज्ञान विज्ञान - भावों के स्वरूपलक्षण निष्कर्ष पर भी पहुँच सके । दूसरे शब्दों में अभी तो केवल दार्शनिक दृष्टिकोण से ही यहाँ ज्ञान - विज्ञान- शब्दों का लक्षण किया जारहा है । भारतीय वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो इस से सर्वथा पृथक ही माना जायगा । किन्तु दर्शन भी अपने स्थान में ' दर्शन ' तो है ही । वस्तु के बाह्यस्वरूप के दर्शनमात्र करा देने की क्षमता तो इस दार्शनिक दृष्टि में भी विद्यामान है ही । फिर वस्तुगत्या प्रारम्भदशा में दर्शन ही तो विज्ञान की मूल - भूमिका, किंवा आरम्भदिशा मानी गई है । दार्शनिक सोपानपरम्परा के माध्यम से ही मानवीय मनः क्रम क्रमशः विक-सित बनता हुआ कालान्तर में तदभिन्ना बुद्धि के विज्ञानभाव से समन्वित होता हुआ विज्ञानरूप का विश्ले-षक बना करता है । यही कारण है कि, मननात्मक, एवं निदिध्यासनात्मक विज्ञान के इन दोनों पर्वों का आरम्भ सर्वप्रथम दृष्टिमूलक दर्शनपर्व ही बना करता है, जैसा कि श्रुति के - ' आत्माऽऽरेवायं द्रष्टव्य: ' इस वचन से प्रमाणित है । श्रात्मदर्शन हीं मन का प्राथमिक व्यवसाय माना गया है । तदनन्तर ही ' कथं द्रष्टव्यः '? यह जिज्ञासा जागरूक होती है, जिस जिज्ञासा का समाधान उसी श्रुति के द्वारा यों हुआ है कि— प्रथमं - श्रोतव्यः, अनन्तरं मन्तव्यः, एवं सर्वान्ते च निदिध्यासितव्यः । एवं श्रवण - मनन-निदिध्यासनरूपेण आत्मायं द्रष्टव्यः ' । दर्शन, तन्मूलक श्रवण, तन्मूलक मनन, एवं तन्मूलक निदिध्यासन का जब उदय होगा, तभी विज्ञान का पूर्ण स्वरूप जागरूक बन पाएगा । अभी तो हमारे लिए ' द्रष्टव्यः ' निबन्धन दार्शनिक दृष्टिकोण ही एकमात्र प्राथमिक अवलम्ब बना हुआ है । ' तो क्या देखा हमनें ज्ञान, और विज्ञान शब्दों के द्वारा! | देखा हमनें यह, और देख कर सुना हमनें यह कि - अवश्य ही कोई वैसा ध्रुत्र - शाश्वत - व्यापक - अजर - अमर - तत्त्व है, जिसे व्यवहार की सुविधा के लिए अभी हम ‘ ज्ञान ' शब्द से व्यवहृत किए लेते हैं । दूसरे शब्दों में तथाभूत एकत्त्वनिबन्ध ' अमृत ' तत्त्व को ही ' ज्ञान ’ कह सकते हैं । थोड़ा और स्पष्टीकरण अपेक्षित है अभी । यह सर्वात्मना अवधेय है कि, प्रक्रान्त प्रकरण के ज्ञान और विज्ञान, दोनों हीं शब्द सापेक्ष बने रहते हुए प्राकृतिक शब्द हैं, विश्वानुबन्धी शब्द हैं । ज्ञानशब्द भी कहने सुनने मात्र के लिए एकत्त्व भावनिबन्धनत्त्वेन अमृत बनता हुआ भी तत्त्वतः मृत्यु से ही आक्रान्त बना रहता हुआ मृत्युभाव ही है । जो विश्वातीत- मायातीत - निरपेक्ष- शुद्ध ज्ञान है, वह तो सर्वथा ही तटस्थ है । कोई सम्बन्ध नहीं है उस विशुद्ध - निरपेक्ष- अमृतभावात्मक तटस्थ विश्वातीत ज्ञान का इन सापेक्ष ज्ञान - विज्ञान-भावों के साथ | इसीलिए तो हमें कहना पड़ा कि, यह तो दृष्टिमात्र है, जिसके माध्यम से सर्वथा तटस्थरूप से उस तटस्थ का इस ज्ञानविज्ञानात्मक तट पर प्रतिष्ठित रहते हुए हम उसका अनुमानमात्र ही लगा सकते हैं, सो भी अपने अन्तर्जगत् में हीं सर्वथा परोक्षरूप से ही — ' को अद्धा वेद, क इह प्रवोचत् ' । १८ - सापेक्ष - निरपेक्ष- दृष्टियों का विवेक— जिस ज्ञान का अमृतरूप से महता समारम्मेण बखान किया जा रहा है, वह तो ज्ञाता की अपेक्षा रखता है । ज्ञाता स्वयं ज्ञेय भूत- भौतिक विषयों की अपेक्षा में निमग्न है, जो कि नानाविध ज्ञेय विषय ही विविध ४५