Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 311–320

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 311–320

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शतपथमाध्य भावात्मक विज्ञान के क्षेत्र मानें गए हैं । ज्ञान - ज्ञाता - ज्ञेय - विषय - विज्ञान - आदि आदि सभी शब्द एकलया भौतिक पदार्थों के साथ ही समन्वित रहने वाले सापेक्ष शब्द हैं । विश्वातीत, अचिन्त्य, अतएव स्वानुभवैकगम्य उस विशुद्ध अमृतात्मक निरपेक्ष ज्ञान के साथ इन सापेक्ष ज्ञान - विज्ञान - ज्ञाता - ज्ञेय - आदि शब्दों का कोई सम्बन्ध नहीं है । ग्रास्तां तावत् । देखिए -- उपलालन भावात्मिका इस दार्शनिक दृष्टि से आगे चलकर क्या तथ्य निकलता है? । सर्वथा लोकप्रज्ञामात्र से समन्वित प्रश्नोत्तरविमर्श के लिए आतुर अपन सभी अनुमान ही तो कर रहे हैं इन शब्दार्थों का । शाश्वत, अनन्तभावापन्न जो मूलसत्य है, जिसे कि - ' सत्यस्य सत्यम् ' कहा गया है, जो कि ' ज्योतिषांज्योतिः ' है, वह तो तटस्थ ही रहा है हमारी लोकप्रज्ञा से, एवं तटस्थ ही बना रहेगा तदवधिपर्य्यन्त, यदवधिपर्य्यन्त कि हम इन ज्ञान - विज्ञान के लौकिक - भौतिक विजृम्भणों में आसक्त - व्यासक्त बने रहते हुए तदनुप्राणिता प्रश्नोत्तरविमर्थचर्चा की उपासना करते रहेंगे । सिद्धावस्थानुगता स्वानुभूति के उदयानन्तर तो न प्रश्न ही सम्भव, न उत्तरप्रदान की ही आतुरता । १६ - क्रियात्मक विश्व, और उसका निष्क्रिय धरातल-— उक्त प्रसङ्ग के द्वारा थोड़ी देर के लिए हम अपने आपको इस तथ्य का अनुगामी मान लेते हैं कि, इस विविधभाव - समाक्रान्त महामहिम महाविश्व में वैसे भाव- जो प्रतिक्षरण - विलक्षण - नवीन - नवीन भावों में परिवर्तित होते रहते हैं, पूर्व क्षण में किसी अन्य स्वरूप से संयुक्त रहते हुए उत्तर क्षण में किसी अन्य अवस्था में परिणत हो जाया करते हैं, तदुत्तरक्षण मे पुनः किसी अन्य ही स्वरूप में आते रहते हैं, इसप्रकार अव्यक्त - व्यक्त - पुनः अव्यक्त - फिर व्यक्त - पुनः - अव्यक्त - इस रूप से क्षण क्षण में परिवर्तित बने रहते हुए जो कोई भी दृष्ट -- श्रुत - वर्णित - उपवर्णित - भूत - भौतिक पदार्थ हैं, उन सब क्षणभावापन्न परिवर्त्तनशील पदार्थों को ‘ विज्ञान ' शब्द की सीमा में अन्तर्भुक्त मान सकते हैं । क्योंकि इत्थंभूत सभी पदार्थों में वैविध्य है, नानात्व प्रत्यय है, पार्थक्यबोध है, अनेकत्त्व दर्शन है, भेदानुगमन है, वह सब विज्ञानजगत् की सीमा से सीमित बना हुआ है । तो यों नानात्त्व ही परिवर्तनशील तत्त्व हुआ, जिसे हम इस क्षण - क्षण - भावानुगत परिवर्तन के कारण गतिशील तत्व भी कह सकते हैं, क्रियातत्त्व भी मान सकते हैं । इसी आधार पर हमारे विशेष आग्रह से अब आप यह भी मान ही लीजिए कि, परिवर्तन भावात्मक गतितत्त्व से अभिन्ना बनी रहने वाली क्रिया तबतक स्वगतिरूप व्यापार के सञ्चालन में स्वस्वरूप से सर्वथा असमर्थ ही बनी रहती है, जबतक कि इसे अपना कोई निष्क्रिय धरातल उपलब्ध नहीं हो जाता । ' मुख ' नाम का कोई स्थिर धरातल है, तत्र न आप तदाधार पर गलाधःकरणानुकूलव्यापारलक्षणा भोजनक्रिया में समर्थ बनते हैं । दृश्य भूपिण्डात्मक अमुक भूक्षेत्र एक स्थिर आलम्बन है, तभी तो पादविक्षेपरूपा अपनी गति की अभिक्रम - प्रक्रमरूपा व्यूहनक्रिया में आप सफलता प्राप्त करते हैं । सर्वथा संसिद्ध है कि, प्रत्येक क्रिया के लिए, क्रिया के स्वरूपसञ्चालन के लिए, क्रियास्वरूपव्यवस्था के लिए एक निष्क्रिय स्थिर धरातल नित्य अपेक्षित मानना हीं पड़ेगा । और साथ साथ ही उस निष्क्रिय स्थिर धरातल के सम्बन्ध में आपको यह भी मान हीं लेना पड़ेगा कि, वह आधारभूत आलम्बन – प्रतिष्ठातत्त्व क्रिया का अवारपारीण - ओरछोर- का आधार बनता हुआ एकत्त्वधर्म से ही आाकान्त है, जो कि नानात्त्व से पृथक् ही बना हुआ है । सुप्रसिद्ध वैय्याकरण भगवान् भर्तृहरिने अपने वाक्यपदी नामक ग्रन्थ में एकस्थान पर क्रिया के सम्बन्ध में यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि-४६

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पारिभाषिक सूचनाएँ

" गुणभूतैरवयनैः समूहः क्रमजन्मनाम् ।

बुद्धया प्रकल्पिताऽभेदः क्रियेति व्यपदिश्यते " ॥

२०- सांख्यदृष्टि से ज्ञान - विज्ञान - शब्दों का दाशनिक समन्वय-क्रियातत्त्व के सम्बन्ध में हम यह भलीभांति जानते हैं कि, गतिशीला यह क्रिया अपने क्षरधम्मोंनुबन्धी अव्यक्त – व्यक्त – तथा अव्यक्त - भावों के कारण त्रिक्षणस्थायिनी है, अर्थात् मध्यस्थ व्यक्त क्षण की दृष्टि से एक क्षणस्थायिनी है, एवं अन्ततोगत्त्वा प्रतिक्षण विलक्षण भावात्मक क्षणिक परिवर्तन के कारण, व्यक्ता-वस्थापन्न मध्यस्थ क्षण के भी परिवर्तनात्मक ही रहने से एकक्षण भी स्थायिनी नहीं है । जबकि इस क्षणिक परिवर्तन के सुसूक्ष्म परिवर्तन की अपेक्षा से प्रात्यन्तिक कारण, जिस क्षणभाव का भी पर्य्यवसान अन्ततोगत्त्वा अग्राह्य अचिन्त्य - परिवर्त्तनभाव पर ही हो रहा है - तो ऐसी दशा में - “ हम आते हैं, जाते हैं, बैठते हैं, सोते हैं, भोजन करते हैं ” इत्यादि सर्वानुभूत वाग्व्यवहारों से सम्बन्ध रखने समूहालम्बनात्मक अखण्डधारात्मक प्रत्यय हमें किसके द्वारा कैसे उपलब्ध हो रहा है?, जबकि जो क्रिया अपने क्षण भाव के कारण पूर्वक्षण में थी, उसका उत्तर क्षण में, इसका तदुतरक्षण में सर्वथा अव्यक्तात्मक प्रभाव ही प्रमाणित हो रहा है । दूसरे शब्दों में क्रिया-पुञ्जात्मक धारावाहिक इन नानासंस्कारों को किस एक अवारपारीण एक अविच्छिन्न पट ने अपने धरातल पर खचित - सञ्चित- प्रतिष्ठित रक्खा १, इस प्रश्न का समाधानात्मक क्रियासन्तान - संस्कारों का आधारात्मक समूहा-लम्बनज्ञानप्रवर्त्तक जो भी कोई अविच्छिन्न वारपारीण एक पट होगा, उसे अवश्य ही नानाभावों से पृथक ही वस्तुतत्त्व माना जायगा, अवश्य ही उसे विविधभावापन्ना क्रियाओं से पृथक् एकरूप ही कहा जायगा । और क्योंकि वह एकरसात्मक है, अतएव उसे हम अपरिवर्तनीय ही कहेंगे । अपरिवर्तनीय सनातन तत्त्व ही क्योंकि शाश्वत माना गया है । यही शाश्वतता क्योंकि इसका श्रमृतभाव है । अतएव अवश्य ही यहाँ आकर उस क्रियाधार एक तत्त्व को ' अमृत ' शब्द से व्यवहृत कर सकेंगे । एवं इसी समन्वय के माध्यम से अब यह कहा जा सकेगा कि— “ मृत्य का नाम ही विज्ञान है, एवं अमृत का नाम ही ज्ञान है । मृत्युभावात्मक विज्ञान नानाभावापन्न है, एवं अमृतभावात्मक ज्ञान एकत्त्वानुबन्धी है । जो एकत्वनिबन्धन ज्ञान की उपा-सना करते हैं, वे अमृत्तपथ का अनुगमन कर रहे हैं । एवं जो नानात्त्वनिबन्धन विज्ञान में प्रवृत्त हैं, वे मानो मृत्युपथ का ही आह्वान कर रहे हैं । और यही भारतीय विज्ञानशब्द का, एवं तत्-सापेक्ष ज्ञानशब्द का एक प्रकार का समन्धय माना जा सकता है, माना जाता रहा है अव्यक्तोपासक सांख्यनिष्ठ ज्ञानयोगियों की दृष्टि में ऐसा ही कुछ । २१ – अव्यक्तनिष्ठा का अभिनिवेश, और तदनुग्रह से ' विज्ञानदृष्टि ' का अभिभव— निश्चयेन श्रव्यक्तनिष्ठा में अभिनिविष्ट ज्ञानवादियों के तथाकथित अनुग्रह से ही प्राजापत्यशास्त्रसिद्ध ज्ञानसहकृत विज्ञानतत्त्व विगत कई एक शताब्दियों से भारतीय प्रज्ञा से सर्वथा पराङ्मुख ही बना रहा । सृष्टि-बिज्ञानात्मक कम्र्म्मो के त्याग पक्ष को ही प्रधानता दे बैठने वाले सांख्यनिष्ठ ज्ञानवादियों की महती कृपा, किंवा ४७

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शतपथभाष्य महान् अभिशाप के ही दुष्परिणामस्वरूप कर्म्माधारभूत समस्त वेदविज्ञान अभिभूत ही बन गया । रह गया शेष सर्वकर्म्मपरित्यागलक्षण, अतएव विज्ञानवञ्चित वैसा सुसूक्ष्म शुष्क ज्ञानवाद, जिसने एक हेलया सम्पूर्ण राष्ट्र को हौ कल्पित - जगन्मिथ्यादवाद जैसे माहामोहसागर में ही निमज्जित कर दिया । यही कारण है कि, भारत-राष्ट्र की ऋषिप्रज्ञा ने अखण्ड ज्ञानप्रतिष्ठा के आधार पर सृष्टिस्वरूप - संरक्षक -लोकाभ्युदय प्रवर्त्तक- समस्त ऐश्वर्य्य-संसाधक सर्वप्रथम जिस विज्ञानसूर्य को अभिव्यक्त कर देने का महान् गौरव प्राप्त किया था, उसी ऋषिप्रज्ञा की दायादभोगकर्त्री वर्त्तमान भारतराष्ट्र की आस्तिक प्रज्ञा ' विज्ञान ' शब्द श्रवणमात्र से भी आज उन्मुग्ध बन जाती है, जिसके परितोष के लिए ही हमें यहाँ ' विज्ञान ' शब्द को भारतीय दृष्टिकोण से समन्वित कर देने की आवश्यकता प्रतीत हुई है । २२- कलिवात्याहिंता वेदान्तनिष्ठा के दुष्परिणाम -' कलौ वेदान्तिनः सर्वे ' का अनुगमन कर बैठने वाला भारतीय जनमानस ज्ञानाभिनिवेश में आकर राष्ट्र की वैज्ञानिक - विभूतियों से कब से, क्यों, कैसे पराङ्मुख बन गया?, कैसे इसकी चिरन्तन विज्ञाननिष्ठा श्राज विज्ञानशब्द के श्रवणमात्र से भी उन्मुग्धवत् बन जाने लगी १, इत्यादि प्रश्नों के समाधान का यहाँ अवसर नहीं है । अन्य निबन्धों में इन सभी समस्याओं का ऐतिहासिक समन्वय किया जा चुका है * । श्रतः प्रकृत में उस ओर न जाकर लक्षीभूत विज्ञानशब्दार्थसमन्वय की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है । अपने प्रकृतिसिद्ध वैविध्य से, नानात्त्व से विज्ञान का स्वरूपलक्षण परिवर्त्तनात्मक मृत्युभाव ही है, इसमें तो कोई सन्देह नहीं । ठीक! तो क्या मृत्युत्तत्त्व भी मानव का कुछ उपकार कर सकता है?, यह एक नवीन प्रश्न इस स्थिति में सहजरूप से ही उन्रुद्ध हो पड़ता है । विज्ञान यदि मृत्यु है, तो वह मानव के लिए सर्वथा हेय ही होना चाहिए भारतीय ज्ञानाभिनिविष्ट भावुक मानवों की भाँति । वह कौन मानव – जो कि शाश्वत अमरता का इच्छुक बना रहता है - इस अशाश्वत मृत्यु के साथ समालिङ्गन करना चाहेगा? | मानना पड़ेगा कि, इस दृष्टि से तो मानव का उपास्य एकमात्र वह अमृततत्त्व ( ज्ञानतत्त्व ) ही हो सकता है, जिसकी प्राप्ति के अनन्तर मानव नानात्त्वनिबन्धन मृत्युपाश से अहिः कञ्चुकिवत् विनिर्मुक्त हो जाया करता है । यही तो मानव का वह दृष्टिकोण था, जिसने - ' मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ' के वैज्ञानिक रहस्यार्थं से अनभिज्ञ भावाविष्ट भावुक भारतीय मानव को पूर्वकथनानुसार उस कर्म्मत्यागलक्षणां ज्ञानात्मिका सांख्यनिष्ठा की ओर बलात् आकर्षित कर लिया, जो कि इत्थंभूत कर्म्मत्यागलक्षण विज्ञानत्यागानुगत अनार्ष दृष्टिकोण इस भारतीय मानव के, किंवा तद्द्वारा सम्पूर्ण भारतराष्ट्र के दुर्भाग्य का ही श्रीगणेश बन बैठा | २३- भारतीय दर्शन का समदर्शनात्मक महान् दृष्टिकोण— तो क्या हम विज्ञानशब्द के विमोहन में आकर जान बूझकर प्रज्ञाशील मानवों को इस मृत्युमुख की ओर आकर्षित कर रहे हैं? | क्या ऐसा करना पौरुषकोटि में अन्तर्भूत मान लिया जायगा? | हम कहेंगे अवश्य । * खण्डचतुष्टयात्मक ‘ भारतीय हिन्दू - मानव, और उसकी भावुकता ' नामक निबन्ध में इन सब ऐतिहासिक तथ्यों का विशद निरूपण किया जा चुका है । ४८

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पारिभाषिक सूचनाएँ क्या ‘ मृत्युमाप्नोति य इह् नानेव पश्यति ' इस वेदसिद्धान्त के ही विरोधी प्रमाणित न हो जायँगे हम इस प्रकार नानालक्षण विज्ञानभाव का अनुगमन करते हुए १ । नहीं । सर्वथा नहीं । क्यों? । इसलिए कि बेद-सिद्धान्त ने मृत्यु के दर्शनमात्र का निषेध किया है, वर्त्तन का नहीं, जैसाकि - ' य इह नानेव पश्यति ' वाक्य स्पष्ट है । समझे नहीं हम इस दर्शन - वर्त्तन का तात्पर्य्य? | इसी बिन्दु पर तो प्राच्य, तथा प्रतीच्य - संस्कृति-सभ्यताओं का वह दृष्टिकोण हमें समन्वित करना है, जिसके अभिभव से प्राच्य भारतराष्ट्र ग्राम प्रतीच्य राष्ट्रों का अन्धानुकरण करता जा रहा है । दर्शन का दृष्टि से सम्बन्ध माना गया है, दृष्टि द्रष्टा पर अवलम्बित है । एवं मानव की अध्यात्मसंस्था में ' समब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध श्रात्मा हीं द्रष्टा माना गया है । द्रष्टा आत्मा की दृष्टि से सम्बन्ध रखने वाला ' समदर्शन ' ही भारतीय परिभाषा में वास्तविक दर्शन माना गया 1 २४ - शरीरमूलक ' विषमवर्त्तन ', एवं आत्ममूलक ' समदर्शन ' की उपादेयता-अत्र ‘ वर्त्तन ' शब्द को लक्ष्य बनाइए । वर्त्तन का वृत्ति - श्राचरण - कर्म से समबन्ध माना गया है । कर्माचरणात्मिका वृत्ति बुद्धिमनःशरीरसमन्वित ' कर्म ' - भाव पर ही अवलम्बित है । श्रात्मसाक्षी में प्रतिष्ठित बुद्धि - मन: - इन्द्रियवर्गानुगत पाञ्चभौतिक शरीर ही वर्तन का आधार माना गया है । श्रात्मयुक्त बुद्धि - मनः-शरीरेन्द्रियधर्म्मा मानव के आधार से - व्यवहार से - कम से - संम्बन्ध रखने वाला विषमवर्तन हीं भारतीय परिभाषा में वास्तविक वर्त्तन माना गया है । बुद्धिमनःशरीरेन्द्रियात्मक वही मानव लौकिक मानव है, एवं श्रात्मनिष्ठ वही मानव अलौकिक मानव है । आत्मनिष्ठ वही मानव समदर्शन का केन्द्रबिन्दु बना रहता है, एवं बुद्धिननःशरीरेन्द्रियानुगत वही मानव विषमवर्त्तन का हृद्य बिन्दु बना रहता है । श्रात्मगर्भित बुद्धिमनः-शरीरेन्द्रियात्मक अपने लौकिक स्वरूप से वही मानव नानाभावापन्न - प्रकृतिभेदभिन्न - विभिन्न व्यवहारों का वर्त्त'न करता है, एवं यही इसका लोकपक्ष है । बुद्धिमनःशरीरेन्द्रियगर्भित अलौकिक आत्मस्वरूप से वही मानव अभिन्नभावापन्न समदर्शन का अनुगामी बना रहता है, एवं यही इसका अलौकिक आत्मपक्ष है । यों आत्म-मूलक समदर्शन, तथा विश्वानुबन्धी शरीरमूलक विषमवर्त्तन, दोनों के समसमन्वयात्मक इत्यंभूत दृष्टिकोण से मानव आत्मानुवन्धी निःश्रेयस् भी प्राप्त कर लेता है, एवं शरीरानुबन्धी अभ्युदय भी उपलब्ध कर लेता हैं । ' समदर्शनानुग़त - विषमवर्त्त'न ' हीं भारतीय जीवन की मूलपरिभाषा है, जिसका लोक - भाषा में यों स्पष्टी करण सम्भव है कि - ' आत्मनिष्ठ - मानव को सर्वत्र समदृष्टि ही रखनी चाहिए, एवं इस समदृष्टि को आधार चना कर ही इसे प्रकृतिभेदभिन्न लौकिक व्यवहारों में देश - काल - पात्र - द्रव्य - श्रद्धादि के तारतम्य से विभन्न-व्यवस्थित रूप से ही कर्म में प्रवृत्त रहना चाहिए | आत्ममूलक इसी समदर्शन को लक्ष्य बना कर नहीं भगवान्ने अपने गीताशास्त्र में-“ विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ ( गीता ५। १८ । ) सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥ ( गीता ६।२६ । ) ४६

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शतपथमाध्य यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि, स च मे न प्रणश्यति ॥ ( गीता ६।३० । ) आत्मौपम्पेन सर्वत्र समं पश्यति योऽजुन! सुखं वा यदि वा दुखं स योगी परमो मतः " ॥ ( गीता ६।३२ । ) इत्यादि रूप से एकत्त्वनिबन्धन श्रात्ममूलक समदर्शन सिद्धान्त स्थापित हुआ है, वहां उसी गीताशास्त्र ने-" ब्राह्मण - क्षत्रिय - विशां, शूद्राणां च परन्तप! ॥ कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभत्रैगुणैः ॥ ( गीता १८।४१ । ) स्वे स्वे कर्म्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ॥ स्वकर्म्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति, तच्छृणु ॥ ( गीता १८।४५ । ) श्रेयान्स्वधर्मो विंगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ॥ स्वभावनियतं कर्म्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् || ( गीता १८ | ४७ | ) सहजं कर्म्म कौन्तेय! सोपमपि न त्यजेत् ॥ सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ( गीता १८४८ । ) स्वभावजेन कौन्तेय! निबद्धः स्वेन कर्म्मणा ॥ कर्तु ं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ( गीता १८।६० । ) स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधम्मों भयावहः ॥ ( गीता ३ । ३५ । ) ” इत्यादि रूप से नानात्त्वनिबन्ध बुद्धिमनः शरीरेन्द्रियमूलक विश्रमवर्त्तन का ही समर्थन किया हैं । नानाभावात्मक, अतएव ‘ मृत्युसंसारवर्त्मनि ' ( गीता ६।३ ) के अनुसार ' मृत्युसंसार ' नाम से प्रसिद्ध इस प्राकृतिक पाञ्चभौतिक विश्व में विभिन्न प्रकृतियुक्त विभिन्न कम्मों का सर्वथा विभिन्न रूप से ही अनुष्ठानात्मक अनुवर्त्तन सम्भव है । प्रकृतिभेद - व्यवहार के आधार पर परस्पर में सर्वथा विभक्त, अतएव एक दूसरे से विषम बने हुए कर्म्म ह्रीं तो तत्तत् पदार्थों की बाह्य प्राकृतिक संस्थाओं के स्वरूपरक्षक मानें गए हैं । ये प्रवृतिवैषम्य, तदनुगत कर्म्मवैषभ्य, एवं तदनुप्राणित विभिन्न भावात्मक विषमवर्तन हीं तो विश्व की स्वरूपव्याख्या हैं, जिस व्याख्या को ही ' विज्ञान ' कहा गया है । यही वह प्राकृतिक विज्ञानसिद्ध धर्म्मभेद है, बो सनातन समभावापन्न श्रात्मब्रह्म के आधार पर प्रतिष्ठित रहता हुआ ' सनातनधर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है, जो कि सर्वथा विज्ञान के सम्बद्ध है, जब कि इतर मतवाद केवल मानसिक कल्पना से प्रसूत बनते हुए इस धर्म्मपरिभाषा से एकान्ततः बहिष्कृत हैं । ' धर्म्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा ' के अनुसार प्रकृतिभेदभिन्न विषमवर्त्तनात्मक यह धर्म ही तो प्राकृतिक विश्व की मूलप्रतिष्ठा माना गया है, बिसे निरपेक्ष मान बैठने से ५०

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पारिभाषिक सूचनाएँ मानव की स्वरूपप्रतिष्ठा का ही उच्छेद हो जाता है । जिसप्रकार वात - पित्त - कफ- इन तीनों धातुओं की समता, -किंवा साम्य स्वास्थ्य की मूलप्रतिष्ठा माना गया है, तथैव सत्त्व - रज- स्तमोगुणमयी विश्वाधारभूता प्रकृति का वैषम्य हीं विश्व की मूलप्रतिष्ठा माना गया है । गुणों की साम्यावस्था तो प्रलय की अधिष्ठात्री बन जाया करती है । दूसरे शब्दों में विभक्त गुण - कर्मानुबन्धी विषमवर्त्तन को जब मानव कल्पित मानवता, कल्पित - साम्यवाद के आवेश में आकर कल्पित समानवर्त्तन - समानाधिकार के व्यामोहन का अनुगामी बन जाता है, तो उसका स्वरूप ही उच्छिन्न हो जाता है । एवं इत्थंभूता समवर्त्तनात्मिका समानाधिकारानुगति अन्ततोगत्त्वा विश्वस्वरूप की ही उच्छेदिका प्रमाणित हो जाती है । और यहाँ आकर हमें यह मान हीं लेना पड़ता है कि - श्रात्ममूलक समदर्शनात्मक एकत्त्व पर स्थित मानव शरीरमूलक विषमवर्त्तनात्मक अनेकत्त्व का अनुगमन करता हुआ ही आत्मिक शान्तिलक्षण निःश्रेयस, एवं भौतिक समृद्धिलक्षण अभ्युदय, दोनों पुरुषार्थों से समन्वित हो सकता है । ' नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ' | ' श्रविभक्त ' विभक्तेषु ' इत्यादि के अनुसार सम्पूर्ण विभक्त भूतभावों में विभक्त रूप से समान रूप से प्रतिष्ठित रहने वाले सर्वव्यापक आत्मब्रह्म से अनुप्राणित अमृतलक्षण एकत्त्व जिस मानव की मूलप्रतिष्ठा बन जाता है, ऐसे समदर्शी मानव का प्रकृति -सिद्ध त्रिभक्त लोकानुवर्त्त'न उसे ' योगी ' पद पर ही समासीन कर देता है । देखिए! सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः! सर्वथा वर्त्तमानोऽपि स योगी मयि वर्त्तते ॥ -गीता ६ | ३१ | २५ – समवर्त्तनात्मक विषमदर्शन से भारतराष्ट्र का पराभव— “ देखिए सबको एकदृष्टि से, आत्मदृष्टि से, समदृष्टि से । किन्तु व्यवहार कीजिए सबसे पृथथ् पृथक् ” यही भारतीय ज्ञानविज्ञानसम्मत तात्त्विक प्राच्य दृष्टिकोण | समदर्शन से ज्ञानसम्पत्ति संसिद्ध है, तो विभिन्न वर्त्तन से विज्ञानसमृद्धि संसिद्ध है । ' आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन '! से स्पष्ट ही समदर्शन श्रात्मभाव पर प्रतिष्ठित है, जिसका - ' आत्मवत सर्वभूतेषु यः पश्यति, स पश्यति ' इत्यादि से भी स्पष्टीकरण हुआ है । ' पण्डिताः समदर्शिनः ' ठीक है । जिसका कदापि यह तात्पर्य्य नहीं है कि-' समवर्त्तिनः ' । ' य इह नानेव पश्यति ' इसप्रकार का विषमदर्शन हीं मृत्युपाशबन्धन का कारण बना करता है, न कि नाना वर्त्तन । यदि वर्त्तन को सम बना लिया जाता है, तो दर्शन स्वतः एव विषम बन जाता है । और ऐसी विपरीत दशा में विषमदर्शन से श्रात्मस्वरूप तो हो जाता है अभिभूत, एवं समवर्त्तन से शरीरस्वरूप हो जाता है उच्छिन्न । ' समवर्त्तनानुगत - विषनदर्शन ' ही मानव के सर्वनाश का प्रधान कारण है । ' दृष्टि पृथक् है, व्यवहार समान है, " यही मानव का दानवीय भाव है, किंवा पशुभाव है । श्राहार - निद्रा - भय - अन्यान्य ऐन्द्रियक व्यासङ्ग आदि में समानाचरणात्मक समवर्त्तन, किन्तु परस्पर सर्वथा विषमदृष्टिनिक्षेप, किंवा उपेक्षा, किंवा जड़ता, यही तो जड़तामूलक पशुभाव है । समानाचरण से प्रकृति का स्वरूप उच्छिन्न, एवं विषमा दृष्टि से श्रात्मनिबन्धना शान्ति का पराभाव न आत्मशान्ति, न लोकाभ्युदय । अभ्युदय - निःश्रेयस से शून्य, इत्थंभूत विषमदर्शनानुगत समवर्त्तन कदापि मानव की शान्ति - समृद्धि का कारण नहीं बन सकता, जिसे कि दुर्भाग्य से संगदोष से अपनाते हुए इस प्राच्य मानव ने अपना सभी कुछ अभिभूत कर लिया है, किंवा करता जा रहा है । ५१

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शतपत्रभाष्य २६ – मृत्युमय कर्म्मवाद का माध्यम ' ज्ञान ' तत्त्व— प्रसङ्ग चल रहा है — ‘ मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति ' इस श्रुति का । अवश्य ही नानादर्शन मृत्युपाशबन्धन का कारण है, जबकि नानावर्त्तन मृत्युपाश का निवर्त्तके ही बना करता है । स्थिति का सहजभाषा के माध्यम से थोड़ा और भी स्पष्टीकरण कर लिया जाय । क्या कोई ऐसा प्रकार है, ऐसी पद्धति है, जिसके द्वारा मृत्युरूप विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले लाभांशों से तो हम समन्वित होते रहैं, एवं इससे सम्बन्ध रखने वाले हानिकर बन्धनों से, ध्छांस भावों से हम बचे रहें । यदि ऐसा सा कोई माध्यम हमें उपलब्ध हो बाय, तो श्रवश्य ही उस अवस्था में लाभोपयोगिता की दृष्टि से हम मृत्यु की, किंवा तद्रूप विज्ञान की भी उपासना कर सकते हैं । कारण स्पष्ट है । लाभ के लिये बुरी से बुरी उस वस्तु को भी अपनाया जा सकता है उस दशा में, जबकि लाभप्रवर्त्तिका उस वस्तु की बुराइयाँ तो हमारे मनः क्षेत्र से समन्वित हो नहीं, एवं अच्छाइयों से हम वञ्चित रहें नहीं । कौनसा है वैसा शक्तिमान् माध्यम १, इस प्रश्न का समाधान अब आपको - स्वयं ही ढूँढ निकाल लेना है । वही माध्यम प्राच्य भारतीय परिभाषा में ' ज्ञान ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । २७ - ज्ञानविज्ञानात्मिका ऋषिदृष्टि का सनातनच— यदि ‘ ज्ञान ' को आधार बना कर आप विज्ञान में प्रवृत्त होंगे, तो विज्ञानजनित जितनें लाभांश हैं, उनसे तो आपका प्रज्ञाक्षेत्र समन्वित होजायगा, एवं विज्ञानजनित जो भी क्षणिक भाव - मानव को मृत्युपाश की ओर आकर्षित करते रहते हैं, उनमे ज्ञानानुग्रह के द्वारा श्रापका सन्त्राण होता रहेगा । तात्पर्य्य यह निकला कि - आप अपने सम्पूर्ण विज्ञानबाद को, नानात्त्ववाद को, भेदवादों को किसी एक अभिन्न तत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित करते हुए यदि विज्ञानवाद को सुव्यवस्थित कर देंगे, तो वही विज्ञान - जोकि ज्ञानसहयोग से वञ्चित अपने प्रातिविक रूप से मृत्युपाशबन्धन का कारण बना रहता है - आपके लिए अमृतत्त्वप्राप्ति का अन्यतम साधन प्रमाणित हो जायगा, निश्चयेन प्रमाणित हो जायगा, यही इस श्रार्ष - भारतवर्ष की वह ऋषिदृष्टि है, वेददृष्टि है, सनातनधर्मदृष्टि है, जोकि ज्ञात - अज्ञात अनेक कारणपरम्पराओं के निग्रहानुग्रह से शताब्दियों से ही नहीं, अपितु सहस्राब्दियों से विलुप्तप्राय प्रमाणित हो रही है । वैविध्य रूप से जिस ' विज्ञान ' शब्द का अबतक यशोगान हुआ है, उसी के सम्बन्ध में एक सुप्रसिद्ध वेदमन्त्र और उद्धृत हो रहा है, जिसके द्वारा विश्वेश्वर की इस विविधभावापन्ना विज्ञानविभूत्ति का सर्वात्मना

स्पष्ठीकरण हो जाता है-एक एवाग्निव हुधा समिद्धः एकः सूर्यो विश्वमनुप्रभूतः ।

एकैवोषाः सर्वमिदं विभाति, एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ॥

. २८ - ज्ञान - विज्ञान - शब्दों की विविध परिभाषाएँ-—ऋक्संहिता मन्त्र का ' एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' यह अन्तिम चरण हीं विशेषरूप से श्रवधेय है । " इस चराचर पाञ्चभौतिक विश्व में जो विलक्षण प्रकार का वैविध्य देखा - सुना बारहा है, वह सब कुछ किसी एक ५२

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 318 का मूल पृष्ठ
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पारिभाषिकसूचनाएँ ही तत्त्व का वैभव है " इस अक्षरार्थ से सम्बन्ध रखने वाला यह चरण किसी एक ही को अनेक का सर्ज्जक प्रमाणित कर रहा है । उस एक से समुत्पन्न यह अनेकभाव ही उसका विश्वरूप है, महिमारूप है, विभूतिरूप है, जिसके लिए- ' विबभूव सर्वम् ' घोषणा हुई है । इससे हमें इस तथ्य पर पहुँचना पड़ा कि - ' किसी एक को मूल मान कर अनेक की ओर आना हीं ' विज्ञान ' शब्द का सहज पारिभाषिक अर्थ है । इसीके स्वाथ ज्ञान शब्द की परिभाषा भी गतार्थ बन रही है । ' अनेक भावों को आधार बना कर किसी एक की ओर जाना ' हीं ज्ञान शब्द की सहज परिभाषा है । एकत्त्व को उद्देश्य मान कर उसके स्थान में अनेकत्त्व का विधान करना जहाँ विज्ञानपक्ष है, वहाँ अनेकत्त्व को उद्देश्य मानकर तत्स्थान में एकत्त्व का विधान करना हीं ‘ ज्ञानपक्ष ' है । ' उस एक ब्रह्म से इस अनेकभावात्मक विश्व की उत्पत्ति कैसे हुई?, ' इस प्रश्न का समाधान करने वाला पक्ष ही विज्ञानपक्ष है, एवं ' ये सब अनेकभाव अन्ततोगत्त्वा उस एक भाव में कैसे परिणत रहते हैं! ', इस प्रश्न का समाधान करने वाला पक्ष ही ज्ञानपक्ष है । ' वहाँ से यहाँ तक कैसी स्थिति है?, ' यही विज्ञानपक्ष है, एवं ' यहाँ से वहाँ तक कैसी स्थिति है?, यही ज्ञानपक्ष है । एक को अनेक बना डालना हीं विज्ञान है, एवं अनेक को एक समझ लेना हीं ज्ञान है । एक ही श्रीज मूल शाखा - प्रशाखा - पर्ण - मञ्जरी - पुष्प - फल - आदि रूप में जिस पद्धति से परिणत हो रहा है, इस रहस्य का विश्लेषण करना हीं विज्ञान है, एवं ये सत्र अन्ततोगत्वा उस एक बीज की ही विभूतियाँ हैं, यह जान लेना ह्रीं ज्ञान है । एकत्त्व प्रतियोगिक - अनेकत्वानुयोगिक विज्ञान हीं: सृष्टि है, यही सर्ग है यही सचर है, और. यही है विज्ञान - विद्या का स्वरूप निष्कर्ष । अनेकत्त्व प्रतियोगिक - एकत्वानुयोगिक ज्ञान हीं प्रतिसृष्टि है, यही प्रतिसर्ग है, यही प्रतिसञ्चर है, और यहीं है ज्ञानविद्या का स्वरूपनिष्कर्ष । इन दोनों दृष्टिकोणो को जान लेने के अनन्तर मानव के लिए फिर कुछ भी तो जानना शेष नहीं रह जाता । इसी भाव को मूल बना कर भगवान् ने कहा है-—

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।

यज्ज्ञात्त्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥

गीता | २६ – श्रुतिद्वारा ज्ञान -- विज्ञान — पक्षों का समर्थन-' ब्रह्म वेदं सर्वम् ' - अर्थात् ' वह ब्रह्म ही यह सब कुछ है, सबकुछ बन रहा है ' यह श्रुति ' ब्रह्म ' को उद्देश्य मान कर जहाँ ‘ इदं सर्व ' रूप विश्व का विधान करती हुई विज्ञानपक्ष का समर्थन कर रही है, वर्हां-‘ सर्वं खल्विदं ब्रह्म ’ - अर्थात् ' यह सब कुछ अन्ततोगत्वा ब्रह्म ही है ' यह श्रुति ' विश्व ' को उद्देश्य मान कर ' ब्रह्म ' का विधान करती हुई ज्ञानपक्ष का समर्थन कर रही है । इसी प्रकार ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्व - यदिदं किञ्च ' प्रजापति ही यह सब कुछ बना है, जोकि तुम देख रहे हो, इत्यादि श्रुति नहीं विज्ञानपक्ष का अनु-गमन कर रही है, वहाँ ‘ सर्वमु ह्येवेदं प्रजापतिः ' - यह सबकुछ अन्ततोगत्त्वा प्रजापति ही है, इत्यादि श्र ति ज्ञानपक्ष का ही अनुगमन कर रही है । एवमेव ' सत्य ' ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' श्रुति स्पष्ट शब्दों में जहां ' ज्ञान ' स्वरूप को लक्ष्य बना रही है, वहां- ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' श्रुति विस्पष्ट शब्दों में ब्रह्म के श्रानन्दमय विज्ञानस्वरूप का यशोवर्णन कर रही है, जिस वर्णन का उपनिषच्छ त्ति ने महता समारम्भेण इन शब्दों में उद्घोष किया है कि— ५३

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 319 का मूल पृष्ठ
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शतपथ भाष्य “ विद्यानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, विज्ञानेन जातानि जीवन्ति, विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, विज्ञानमित्युपास्व " । —तैतिरीयोपनिषत् । ३०- एक ज्ञानात्मक ' विज्ञान ' का आधारच्ण, एवं अनेक ज्ञानात्मक विज्ञान का आधेयत्त्व, जिस ज्ञानानुगत भारतीय ' विज्ञान ' शब्द का अबतक यशोगान हुआ है, एवं जिसका - विविधं ज्ञानं -विज्ञानम् ' रूप से तटस्थ लक्षण व्यवस्थित हुआ है, अब उसके स्वरूप लक्षण के सन्बन्ध में भी दो शब्द निवेदन कर दिए जाते हैं । नानाभावनिबन्धन इस भारतीय विज्ञान की दो स्वतन्त्रधाराएँ वैदिक - विज्ञानार्णव से प्रचण्डवेग से प्रवाहित हो रहीं हैं । सर्वप्रथम उन्हीं दोनों धाराओं को लक्ष्य बनाने का अनुग्रह कीजिए । नानाभावात्मक स्वयं भूतविज्ञान प्रतिष्ठात्मक जिस ज्ञानतत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित रहता है, क्या वह प्रतिष्ठातत्त्व शुद्ध निरपेक्ष ज्ञानरूप है?, यह एक प्रासङ्गिक नूतन प्रश्न समुपस्थित हो पड़ा इसी प्रसङ्ग में हमारे सम्मुख | ऋषिदृष्टि ने इस प्रश्न का समाधान किया कि नहीं । यद्यपि भूतविज्ञान की अपेक्षा से इसका आधारतत्त्व ज्ञानात्मक ही माना जायगा, एवं इसी दृष्टि से इसे - ' ज्ञान ' शब्द से व्यवहृत भी कर दिया जायगा । तथापि स्वयं अपने रूप से इस आधारभूत ज्ञानतत्त्व को भी तत्त्वतः माना जायगा विज्ञानात्मक ही । यदि आधारभूत ज्ञान में विज्ञानधर्म्म न रहता, तो यह कदापि कथमपि विज्ञान का आधार बन ही नहीं सकता था । क्योंकि भूतविज्ञान - सिद्धान्त के अनुसार एक सजातीय वस्तु ही अन्य सजातीय वस्तु की आधार-भूमि बना करती है, बन सकती है । यही विज्ञानशास्त्र का सजातीयाकर्षणात्मक सहज सिद्धान्त है । केवल आ-धार, तथा आधेयभावों के पार्थक्य - बोध की दृष्टि से ही हमें पूर्व में वह कह देना पड़ा था कि - ' आधारभूत-ज्ञानतत्त्व वैविध्य से पृथक् है, एवं विज्ञानतत्त्व वैविध्य से समन्वित है ' । वस्तुतत्त्व तो वास्तव में यही है कि,. एक ही तत्त्व के, दूसरे शब्दों में एक ही विज्ञान के दो विभिन्न दृष्टिकोण हैं - एक ज्ञानात्मक विज्ञान, एवं एक विज्ञानात्मक विज्ञान । ३१ - पुराणी- प्रज्ञा से अनुप्राणित ' ब्रह्म ' और ' यज्ञ ' शब्द--क्या तात्पर्य्यं निकला इस दृष्टिकोण से १ । सुनिए! ज्ञानात्मक जो विज्ञान है, अब उसके लिए हमें अपने शास्ज्ञ में नवीन पारिभाषिक शब्द की खोज करनी पड़ेगी । एवं विज्ञानात्मक जो विज्ञान है, उसके लिए भी एक नवीन हीं पारिभाषिक शब्द का अन्वेषण करना पड़ेगा | खोज का काम कोई श्रापकी, अथवा तो हमारी यथाजाता मानवप्रज्ञा से सुलभ न बन सकेगा । अपितु इसके लिए भी ऋषिप्रज्ञा की ही शरण में जाना पड़ेगा, जहाँ से यच्चयावत् श्रार्ष पारिभाषिक शब्द सुलभतया प्राप्त हैं । निर्भ्रान्ता प्रज्ञापुराणी के अन्वेषण – स्वरूप ऋषियों नें इन दोनों विज्ञानभावों के लिए क्रमशः दो शब्द व्यवस्थित किए हैं । ज्ञानात्मक विज्ञान के लिए नियत शब्द है - ' ब्रह्म ', एवं विज्ञानात्मक विज्ञान के लिए नियत शब्द है- ' यज्ञ ' । ये ही वे स्वतन्त्र दो विज्ञानधाराएँ हैं, जिनका पूर्व में उपक्रम हुआ है । ३२- ब्रह्मविज्ञानधारा, और विज्ञानधारा– तो अब दो प्रकार के विज्ञान आपके सम्मुख उपस्थित हुए - ब्रह्मविज्ञानधारा, एवं यज्ञविज्ञानधारा के रूप से | आपने यह अनुभव किया होगा कि, आरम्भ में सापेक्ष विज्ञानशब्द की अपेक्षा की उपशान्ति के ५४

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 320 का मूल पृष्ठ
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पारिभाषिकसूचनाएँ लिए जो ज्ञान शब्द आपके सम्मुख रखा गया था, उसे शनैः शनैः स्मृतिगर्भ में विलीन करते हुए यहाँ श्राकर उस ज्ञानशब्द का पर्य्यवसान भी हमनें यों विज्ञानशब्द पर ही मान लिया । ब्रह्मशब्दानुगत ब्रह्मविज्ञान, एवं यज्ञशब्दानुगत यज्ञविज्ञान, इन दोनों नवीन पारिभाषिक शब्दों के द्वारा अब हमें इस निष्कर्ष पर पहुँच जाना पड़ा कि सम्पूर्ण विश्व का जो प्राकृतिक स्वरूप है, वह यज्ञविज्ञानात्मक है । इस विज्ञानात्मक प्राकृतिक विश्व की जो मूल प्रतिष्ठा है, वह ब्रह्मविज्ञानात्मिका है । ब्रह्मविज्ञान को प्रतिष्ठा बनाए बिना यज्ञविज्ञान जहाँ अपने स्वतन्त्र रूप से प्रवृत्युन्मुख बन जाता है, वहाँ एकाकी यज्ञविज्ञान कामासक्तिमूला लौकैषणाओं का समुत्तेजक बनता हुआ विश्वस्वरूपसंरक्षण के स्थान में विश्वस्वरूपविनाश काही कारण बन जाता है । ऋषिदृष्टि न तो विश्वविज्ञानात्मक यज्ञविज्ञान का ही विरोध करती । एवं न यज्ञविज्ञान के द्वारा सञ्चालित भूतविज्ञान के साथ ही ऋषिप्रज्ञा का कोई अश्वमाहिष्य । वह तो विरोध करती केवल प्रतिष्ठा-चञ्चना का । ऋषिदृष्टि मानो हमें यह कह रही है कि, " तुह्मारा यह यज्ञविज्ञान, तदाधारेण प्रतिष्ठित भूतविज्ञान ब्रह्मविज्ञानात्मिका प्रतिष्ठा से वञ्चित हो कर अपने प्रातिविक मृत्युरूप में परिणत न हो नाय, ऐसा मृत्युप्रधान तुम्हारा यह प्रतिष्ठाशून्य विज्ञान कहीं तुम्हारा संहार ही न कर डाले । अतएव प्रत्येक दशा में तुम्हें ब्रह्मविज्ञान के आधार पर ही भूतविज्ञान का आतान - वितान करना चाहिए " । ३३ - ' शब्देतिहासविज्ञान ' की विलुप्ति के दुष्परिणाम -तदित्थं, हमें यह मान लेना पड़ा कि, ब्रह्मविज्ञान, तथा यज्ञविज्ञान, ये दो विवर्त्त भारतीय विज्ञान-काण्ड के स्वतन्त्र दो मूल स्तम्भ प्रमाणित हो रहे हैं । पुन: इस सम्बन्ध में हमें आप से यह आवेदन कर देना पड़ेगा कि, जिस प्रकार विज्ञान शब्द के अर्थसमन्वय के लिए स्वयं ' विज्ञान ' शब्द ही लक्ष्य बना था, ठीक इसी प्रकार ब्रह्म, तथा यज्ञ, इन दोनों विज्ञानधाराओं के स्वरूपपरिचय के लिए भी अन्यत्र अनुधावन न कर स्वयं ब्रह्म - यज्ञ - शब्दों को ही लक्ष्य बनाना पड़ेगा । कदापि इस दृष्टिकोण को विस्मृत न किया जा सकेगा कि, प्रत्येक तत्त्व का वाचक स्वयं शब्द ही उस वाच्य अर्थ का मौलिक चिरन्तन इतिहास अपने गर्भ में अन्तर्भुक्त रखता है, जो कि ' शब्देतिहासविज्ञान ' भी अन्यान्य विज्ञानविलुप्तियों के साथ श्राज दुर्भाग्यवश विलुप्त हो चला है । हाँ, तो क्या अर्थ है ' ब्रह्म ' शब्द का?, एवं क्या अर्थ है ' यज्ञ ’ शब्द का? | अन्वेषण कीजिए! ३४ - पारिभाषिक – ' निगम ', ' अनुगम ' - शब्द -यह बहुत सम्भव है कि, यज्ञ शब्द का चिरन्तन इतिहासात्मक अर्थ भारतीय प्रज्ञा में आजतक निर्भ्रान्तरूप से येन केन रूपेण प्रतिष्ठित बना रह गया हो । किन्तु ब्रह्म शब्द के ऐतिहासिक तथ्यपूर्ण पारिभाषिक अर्थ ' से तो आज की भारतीय प्रज्ञा सर्वथा ही पराङ्मुख प्रमाणित हो रही है कारण इस पराङ्मुखता का यही है कि, वेदशास्त्र का ' ब्रह्म ' शब्द निगमभाव से श्रणुमात्र भी सम्बन्ध न रखता केवल अनुगमभाव से ही प्रधान सम्बन्ध रख रहा है । अब आप यह प्रश्न कर बैठगे कि, ये हुआ निगम - अनुगम - नाम के दो नवीन शब्द क्या अर्थ रखते हैं? । प्रश्न समाधान के लिए यहाँ यही कह देना पर्य्याप्त होगा कि- ' जो शब्द किसी नियत अर्थ का प्रतिपादन करता है, वह शब्द ' निगमशब्द ' कहलाया है । एवं जो शब्द अपने वाच्यार्थ को अनेक स्थलों में समन्वित करने की क्षमता रखता है, वह शब्द ' अनुगमशब्द ' कहलाया है ' । ५५