Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 331–340

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 331–340

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शतपथमाष्य ५३ – व्यवस्थित, एवं अव्यवस्थित विज्ञानों का तारतम्य— यह सर्वथा संस्मरणीय, किंवा अविस्मरणीय है कि, तीनों विवर्त्तभाव एक ही अव्याकृत तत्त्व के तीन व्याकृत उपबृंहणमात्र हैं । अतएव तीनों विज्ञानदृष्टि से पृथक पृथक होते हुए भी ज्ञानदृष्टि से अपृक ही हैं, एकरूप ही हैं । अतएव - ' एतद्वै तत् एतद्वै तत् ' रूप से ऋषि विभक्त विवर्तभावों के निरूपण के साथ साथ ही सहजसिद्धा अभिन्नता को भी लक्ष्य बनाए रहते हैं । यह इसलिए कि, कहीं आप इन तीन वित्त ' के सम्बंध में अपनीं ऐसी धारण न बनाले कि, ये तीन रूप पृथक् पृथक् रूप से एक दूसरे से विच्छिन्न हो कर— कट - कट – कर तीन पृथक् पृथक सत्ताएँ बन गई । सत्ता एक है, भातिमात्र में त्रैविध्य है । तभी तो सजातीय-विजातीय - एवं स्वगत भेदभिन्न त्रिविध भेदवाद से संस्पृष्ट एकात्मवाद - सिद्धान्त सर्वथा अनुरण है । इसी अभिन्नता को लक्ष्य बना कर ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' सिद्धान्त जागरूक बना है । अव्यय से विकसित अक्षर कभी अव्यय से पृथक् नहीं रह सकता । एवमेव अक्षर से समुद्भुत क्षर कभी अक्षर और अव्यय को छोड़ कर स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । स्पष्ट है कि, उत्तर उत्तर के वित्र पूर्व - पूर्व के विवर्त्तभावों को गर्मीभूत बना कर ही अग्रगामी बनते हैं । श्रतएव हमें यह कहना पड़ता है कि, निकृष्ट से निकृष्ट विज्ञान भी, सामान्यप्रज्ञ बालकों का क्रीडाकौशलात्मक विज्ञान भी अपने मूल में उसी शाश्वत - सनातन-ब्रह्मविज्ञान को आधार बनाए हुए है । अन्तर इन क्षुद्रविज्ञानों, तथा बालविज्ञानों में, एवं उन सनातन शास्त्रीय आर्ष विज्ञानों में केवल यही है कि, वे जहाँ अपनी ब्रह्मानुरूपता - लक्षणा समता से सुव्यवस्थित बने रहते हैं, वहाँ ये विज्ञान उसकी विषमता से अव्यवस्थित बने हुए हैं । इस विषमभावापन्ना अव्यवस्था के दोष से ही ये विज्ञान लाभ के स्थान में, संरक्षण के स्थान में हानि - तथा ध्वंस के ही कारण बन जाया करते हैं | इस व्यञ्जना को लक्ष्य बना कर हो तो हमें विज्ञानशब्दार्थ का समन्वय करना है । ५४ - ब्रह्मविज्ञानानुगत भूतविज्ञान की महती उपयोगिता--सूर्य्य - चन्द्रमा - व्योम - वायु - ग्रग्नि - सलिल - पृथिवी - विद्युत् - ग्रह - नक्षत्र - उल्का - घिष्णा - वज्र - धूमकेतु-आदि आदि पदार्थ यदि विश्वेश्वर के ब्रह्मविज्ञान की सीमा में अन्तमुक्त हैं, तो हाईड्रोजन - नाइट्रोजन -ब्रॉक्सजनादि वर्त्तमान भूतविज्ञान के पदार्थ भी कोई लोकान्तर की तो वस्तु नहीं होंगे । फलतः सूर्य्यादि का यदि विज्ञानत्त्व ब्रह्मविज्ञानत्वेन अनुप्राणित है, तो वर्त्तमानयुग के ऑक्सिजनादि भूतविज्ञान भी हैं तो ब्रह्मविज्ञान की सीमा में हीं अन्तर्भुक्त | इनके सम्बन्ध में भारतीय विज्ञान को समतुलन दृष्ट से यही कहा जा सकता है कि, इन भूतविज्ञानों का मूल क्योंकि स्वप्रतिष्ठात्मक ब्रह्मविज्ञान के आधार पर समत्त्वरूप सम्भवतः व्यवस्थित नहीं है, दूसरे शब्दों में ब्रह्मभाव अभी तक इन भूतभावों के लिए तिरोहित बना हुआ हैं । अतएव इत्थ ंभूत ब्रह्मोपेति यह भूतविज्ञान मनः शरीरानुबन्धिनी लोक - वितैषणाओं का ही समुतेजक बना रहता हुआ लाभ के स्थान में मानव की ब्रह्ममूला सहज शान्ति का विघातक ही प्रमाणित हो सकता है, हुआ है पूर्व के साध्यादि युगों में, एवं हो रहा है आज के ब्रह्मवञ्चित श्रात्मवञ्चित भूतविज्ञानयुग में भी । यही तो समन्वय कर लेना है राष्ट्र को ज्ञान, और विज्ञानधाराओं के सम्बन्ध में । नहीं, तो विज्ञान स्वयं बड़ा ही पवित्र श्राराध्य तत्त्व है मानव के लिए फिर वह भृतविज्ञान हो, अथवा तो ब्रह्मविज्ञान | स्वयं भारतीय महर्षियों नें -' विज्ञानमित्युपास्त्र ' रूप से विज्ञान को उपास्य माना है, एवं इसकी ब्रह्मविज्ञानधारा को नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इस उच्च घोषणा के साथ मानव के शाश्वत श्रानन्द का मुख्य कारण माना है । कौनसा दृष्टिकोण है ६६

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पारिभाषिक सूचनाएँ विज्ञान का वैसा, जो मानव के लिए उपास्य, आग बना करता है? । श्रागधना की जाती है अपने से विशेष शक्तिशाली की । मानव की भूतसंस्था में विशेषशक्तिशाली मानव का अलौकिक वह ब्रह्मभात्र है, जिसे ‘ प्रजापति ' कहा गया है । यही तो हमारा उपास्य चना करता है । भूतजगत् तो हमारी इन्द्रियों के सम्मुख विद्यमान रहता हुआ हमारा भोग्य है, अन्नाय है । प्रज्ञापराधवश जब हम इस मर्त्य भूतजगत् को ही ब्रह्मात्मा -पेक्षया विशेष शक्तिशाली, अतएव बड़ा मान बैठने की भूल कर बैठते हैं, तो कालान्तर में यह भूतजगत् हमें अपना ग्रास ही बना डालता है । रक्षण के स्थान में हमारा भक्षण ही कर डालता है । एवं उस भयावह स्थिति में पहुँचने के अनन्तर इस प्रवृद्ध भूतविज्ञान की एषणा का उपशम करने में सर्वथा असमर्थ बने रहते हुए अपना सभी कुछ नष्ट कर लेते हम । इस महाभय से त्राण प्राप्त करने का एकमात्र माध्यम ब्रह्मविज्ञान ही है, जिसे प्रतिष्ठा बना लेने के अनन्तर वही भूतविज्ञान नियन्त्रण में श्राता हुआ हमारे अभ्युदय का ही कारण चन जाता है । एतावन्मात्र दृष्टिकोण को सम्मुख रखते हुए ही हमें ब्रह्मविज्ञान को इस यज्ञ - विज्ञानात्मक भूत-विज्ञान की मूलप्रतिष्ठा बना लेना है । और यही एतद्देशीय प्राच्य प्राध्यात्मिक ब्रह्मविज्ञान का प्रथम, एवं प्रमुख दृष्टिकोण है, जिसके आधार पर भारतीय यज्ञविज्ञान की धारा प्रवाहित हुई है । ५५ - ‘ यज्ञ ' शब्दार्थजिज्ञासा— क्या अर्थ है ' यज्ञ ' शब्द का? इस प्रश्न के समाधान से पहिले ब्रह्मविज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले एक निरूढभाव का स्पष्टीकरण और कर लीजिए । जिस प्रकार ' पङ्कज ' शब्द कालान्तर में कमल में हीं निरूढ हो गया है, एवमेव कालान्तर में विज्ञानशब्द भी ' यज्ञविज्ञान ' में हीं निरूढ बन गया है । इसीलिए आरम्भ में हमनें कहा था कि, ब्राह्मविज्ञान को हम निरूढभावापन्न विज्ञानशब्द से व्यवहृत न कर एकत्त्व-नित्रन्धन ज्ञानशब्द से ही व्यवहृत करेंगे, जैसाकि – ' ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् ' इत्यादि स्मार्त्तवचन से भी प्रमाणित है । इस वचन के ' ज्ञानं ' का अर्थ है - ' ब्रह्मविज्ञानम् ' एवं ' विज्ञानं ' शब्द का अर्थ है - ' यज्ञविज्ञानम् । यहीं कुछ विशेषरूप से समझ लेना है । ५६ - ईक्षणात्मक ‘ ब्रह्मविज्ञान ', एवं परीक्षणात्मक ' यज्ञविज्ञान'-ब्रह्म का विज्ञान ( परीक्षण ) नहीं हुआ करता, अपितु ज्ञान ( निरीक्षण ) हुआ करता । ' दर्शनात्मक निरीक्षण ज्ञानभाव है, एवं आचरणात्मक परीक्षण विज्ञानभाव । भूतातीत सुसूक्ष्म ब्रह्म का सूक्ष्मदृष्टि से ईक्षण ही सम्भव है, निरीक्षण ही सम्भव है, परीक्षण नहीं । श्रतएव ब्रह्मविज्ञान को ईक्षणात्मक ज्ञान हीं कहना समीचीन बनता है | प्रयोगात्मक परीक्षण का, आचरणात्मक व्यवहार का भूतभावों से सम्बन्ध है । अतएव परीक्षणात्मक विज्ञान का भूतात्मक यज्ञविज्ञान से ही सम्बन्ध माना जासकता है । सहज-भाषानुसार ब्रह्मविज्ञान का विज्ञान नहीं हुआ करता, परीक्षण नहीं हुआ करता, अपितु ज्ञान हुआ करता है, ईक्षण हुआ करता है । यही भारतीय ' दर्शनशास्त्र ' की मूलभित्ति है, जिसका श्राचरणात्मिका श्राचारमीमांसा से कोई सम्बन्ध नहीं है । उधर यज्ञविज्ञान का ज्ञान नहीं हुआ करता, ईक्षण नहीं हुआ करता । अपितु विज्ञान हुआ करता है, परीक्षण हुआ करता है । और यही भारतीय ' विज्ञानशास्त्र ' की मूलभित्ति है, जिसका श्राचरणात्मिका यज्ञमीमांसा से ही प्रधान सम्बन्ध रहा है । यहाँ जाकर व हमें ' दर्शन ' और ' विज्ञान ' इन दो दृष्टिबिन्दुओं का अनुगामी बन जाना पड़ा । दर्शन, तथा विज्ञान के समतुलनात्मक समन्वय के लिए वो धन्य प्रश्नोत्तरविमर्श ' ही अपेक्षित है । ६७

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शतपथमाध्य ५७ – दर्शन, और विज्ञानं का पार्थक्य -प्रकृत में केवल ' दर्शन ' शब्द के अनुबन्ध से यह अवश्य निवेदन कर दिया जाता है कि, जिसे आज ' भारतीय दर्शन ' माना जारहा है, वह वस्तुतः वैदिक दर्शन से सर्वथा विभिन्न प्रमाणित होचुका है । वैदिक-दर्शन श्रात्मदृष्टया नहाँ ईक्षणभावप्रधान बनता हुआ ' दर्शन ' है, वहाँ यही अपने विभूतिरूप यज्ञविज्ञान की { मूलभित्ति बनता हुआ ' विज्ञान ' का भीं श्राधारस्तम्भ बना हुआ है । दूसरे शब्दों में दर्शनात्मक वैदिक ज्ञान परीक्षणात्मक वैदिक विज्ञान के साथ समन्वित होकर ही प्रवृत्त हुआ है । ठीक इसके विपरीत वर्त्तमान भारतीय दर्शन विज्ञान पक्ष की प्रात्यन्तिक उपेक्षा कर शुष्क तत्त्ववाद में हीं परिसमाप्त है, जिस इत्थंभूत विज्ञान वञ्चित दर्शनव्यामोहन नें हीं आचारनिष्ठात्मक विज्ञानकाण्ड को अभिभूत किया है । एवं इसी दर्शनभ्रान्ति ने भारतीय व्याख्याताओं को शुष्क ज्ञानविजृम्भणमात्र का पथिक प्रमाणित कर दिया है । वस्तुगत्या एक ही विज्ञान की दो धाराओं का नाम दर्शन, और विज्ञान है, जिनके लिए वेदशास्त्र में ब्रह्म और यज्ञ, ये दो पारिभाषिक शब्द नियत हैं । यदि यज्ञ ब्रह्म पर प्रतिष्ठित है, तो ब्रह्म भी यज्ञ के द्वारा ही विभक्तिभाव में परिणत होता है । बिना यज्ञ के ब्रह्म भी अप्रतिष्ठित है । तभी तो ' तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ' गीता ३।१५ । ) इत्यादिरूप से सर्वाधारभूत ब्रह्म को भगवान् ने यज्ञ में हीं प्रतिष्ठित माना है । ५८- ब्रह्म, और यज्ञं शब्दों का फिजिक्स, और कैमेस्ट्री से समतुलन— प्रतीच्य भाषा में सम्भवतः ' दर्शन ' के लिए ' फिलासकी ' ( Philosophy ) शब्द नियत है, एवं विज्ञान के लिए ‘ सायंस ' ( Science ) शब्द नियत है । किन्तु यह शब्दद्वयी तत्त्वतः प्रतीच्यक्षेत्र में हीं निरूढ है | जिस तत्त्ववाद का परीक्षणात्मक विज्ञान से, तदनुगत आचरण से कोई सम्बन्ध नहीं है, सम्भवतः वही फिलासफी है, शब्द जो तथाकथित विज्ञानाचारशून्य भारतीय वर्त्तमान दर्शन शब्द के साथ अवश्य समन्वित हो सकता है । वैदिक दर्शन तो मौलिकत त्वात्मक वह दर्शन है, जिसके आधार पर यौगिकतत्वात्मक विज्ञान का वितान हुआ करता है । अतएव वैदिक दर्शन तो विज्ञान का, किंवा सायंस का ही मूलभूत आधार है । सायंस जिनके लिए क्रमशः सम्भवत: फिजिक्स ( Physics ), एवं केमेस्ट्री ( Chemistry ) इन दो शब्दों का प्रयोग करता है, जोकि दोनों ह्रीं शब्द सम्भवतः विज्ञानात्मक सायँस के क्षेत्र से ही अनुप्राणित हैं, -इन दोनों के साथ समझने मात्र के लिए ब्रह्म और यज्ञ दोनों शब्द समन्वित कहे जासकते हैं | मूलतत्त्वविज्ञान ही वहाँ फिजिक्स कहलाया है, एवं रासायनिक सम्मिश्रणात्मक यौगिक तत्त्वविज्ञान ही केमेस्ट्री माना गया है | वद्यपि भतविज्ञान के भूलभूत अमुक परिगणित तत्त्वों के साथ वैदिक अव्यय - अक्षर - क्षर - रूप मूलतत्त्वों अंशत: समतुलन नहीं है । वर्तमान विज्ञानसम्मत मूलतत्त्व वैदिकदृष्टि से तो विकारात्मक भूतों की का ही सीमा में अन्तर्भुक्त हैं । तथापि समझने मात्र के लिए ब्रह्म तत्त्व को फिजिक्स, एव ं यज्ञतत्त्व को केमेस्ट्री कहा जासकता है । किन्तु फिलासकी का तो भारतीय वैदिक दर्शन से कोई भी सम्बन्ध नहीं माना जासकता । वैदिक दर्शनरूप ब्रह्मतत्त्व वैदिक विज्ञान का फिजिक्स विभाग है, एवं वैदिक विज्ञानरूप यज्ञतत्त्व वैदिक विज्ञान का केमेष्ट्रीतत्त्व है. इस मान्यता को फिर भी समझने मात्र के लिए लक्ष्य बनाया जासकता है } ५८ - रसमलात्मिका यज्ञप्रक्रिया -जैसा कि पङ्कजशब्द से समतुलित निरूढभाव - प्रसङ्ग में निवेदन किया गया है - ' यज्ञविज्ञान ' हीं वास्तव में ' विज्ञान ' शब्द का प्रमुख अधिकारी प्रमाणित हो रहा है । क्योंकि वैविध्यलक्षण विज्ञान भाव विविधभावापन्न ६ रु

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पारिवाषिक सूचनाएँ अनेक तत्त्रों के सम्मिश्रणात्मक ' यज्ञ ' से ही अनुप्राप्ति है । अन्न ऊ - प्राण - इन तीन विविध भावों से समन्वित कर्म्म को इसी दृष्टि से अवश्य ही शारीरिक, किंवा आध्यात्मिक यज्ञ कहा जासकता है । प्रकृत्यनुत्रन्धी अमुक नियत समय पर अशनाया लक्षणा बुभुक्षा, अर्थात् भूख जागरूक हो पड़ी । इस भूख को उपशान्त करने के लिए हमनें अपने उस शारीरिक जाठराग्निरूप वैश्वानर अग्नि में अन्न की आहुति प्रदान की, जो-वैश्वानर अग्नि ‘ आलोमभ्यः श्रनखात्रेभ्यः ' के अनुसार केशलोमों को, तथा नखों के कृन्तनयोग्य अग्रभाग को छोड़ कर सर्वाङ्गशरीर में प्रचण्डरूप से - धगद्धगद्रूप से प्रज्वलित रहता हुआ घोधूमान है । इसी आहुति-कर्म्म के लिए व्यवहार यह हुआ कि, ' हमने रूचिपूर्वक अन्न खा लिया है, भोजन कर लिया है ' । अग्नि में आहुत इस अन्न ने अग्नि के सहजसिद्ध विशकलनधर्म से अपने आपको प्रथम ( १ ) ' रस ' रूप में परिणत कर लिया, एवं विशकलन- प्रक्रिया से पृथक् चन जाने वाले मलात्मक प्रवर्ग्य भाग को अग्नि ने पृथक फेंक दिया । और यों भुक्तान्न आरम्भ में ' रस - और मल ' इन दो भावों में विभक्त होगया । ५६ - भुक्तान्न की सप्तचितियाँ -क्या मलभाग इस पथमा विशकलन- प्रक्रिया से ही निःशेष बन गया इस की सीमा से १, नहीं । अभी रस में सूक्ष्म मल विद्यमान है । पुनः विशलन प्रक्रिया प्रारब्ध बनी । रस में से मल भाग पुनः पृथक हुआ । वही मलभाग ' रस ' माना गया, एवं इस मलात्मक रस का रसभाग ( २ ) ' असृक् ' अर्थात् रुधिर माना गया । पुनः वही प्रक्रिया, असृक् से ( 1 ) ' मांस ' रूप रस की निष्पत्ति, एवं स्वयं असृक् की मलसंज्ञा । पुनः मांस में वही प्रक्रिया, मांस से ( ४ ) ‘ भेद ' रूप रसकी निष्पत्ति, एवं स्वयं माँस की मलसंज्ञा । पुनः भेद में वही प्रक्रिया, भेद से ( ५ ) ' अस्थि ' रूप रस की निष्पत्ति, एवं स्वयं भेद की मलसंज्ञा । पुनः अस्थि में वही प्रक्रिया, अस्थि से ( ६ ) ' मज्जा ' रूप की निष्पत्ति, एवं स्वयं स्थि की मलसंज्ञा । पुनः मजा में वही विशकलन, मज्जा से ( ७ ) ‘ शुक्र ' रूप रस की निष्पत्ति, एवं स्वयं मजा की मलसंज्ञा । इसप्रकार भुक्तान्न से प्रारम्भ कर शुक्र-. पर्यन्त प्रान्त रहने वालो रसमलानुगता विशकलन- प्रक्रिया की क्रमधारा से रस- असुक - मांस - भेद-अस्थि - मज्जा - शुक्र- ' इन सात धातुओं की स्वरूपनिष्पत्ति हो गई, जिन का पार्थिव ध्रुवतस्व से प्रधान सम्ब-न्ध माना गया है । ६० - प्रोज की स्वरूप निष्पत्ति— क्या शुक़ नामक सप्तम पार्थिव धातु में मन्थन प्रक्रिया - सहचारिणी विशकलन प्रक्रिया उपशान्त हो गई १1 नहीं | क्यों? | इसलिए कि अभी तो भुक्त अन्न के पार्थिव ध्रुवरस का ही इन रसादि - शुक्रान्त साठ धातु में विश्लेषण हुआ है । अभी इस पार्थिव अन्न में श्रान्तरिक्ष्य घर्त्रधातु, एवं चान्द्र दिव्य धरुण धातु, अर्थात् अन्तरिक्ष, एवं द्य लोक के रस, जो कि क्रमशः तरल, एवं विरल मानें गए हैं- और प्रतिष्ठित हैं । अन्न के स्वरूप निर्माण – में पृथिवी, अन्तरिक्ष, एवं चन्द्रमा के द्वारा सूर्य्य, तीनों लोकों के पार्थिव घनावयव द्रव्य, आन्तरिक्ष्य तरलावयव द्रव्य, एवं दिव्य विरलावयव द्रव्य, तीनों द्रव्य उपयुक्त हैं । इनमें से अबतक शुक्रान्त जिन सात तत्त्वों का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, वे तो सातों ही धातु पार्थिव ही हैं, जिन इन सातों पार्थिव घातुओं की अन्तिम विश्रामभूमि ' शुक ' नाम का सातवां धातु ही बन रहा है । यद्यपि पार्थिवादि तीनों हीं लोकों के ६६.

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शतपथमाष्य द्रव्य ' धातु ' नाम से व्यवहृत होते हैं । तथापि घनावयव पार्थिव सप्त धातुओं में, तथा श्रान्तरिक्ष्य तरल, एवं दिव्य विरल - धातुओं में पृथिवी का अन्त का शुक्रधातु ही उपसंहारत्वेन प्रमुख बना हुआ है । एकमात्र इसी अनुबन्ध से आगे चल कर तीनों द्रव्यों में सामान्यरूपेण व्याप्त भी ' धातु ' शब्द पार्थिव शुक्रधातु में हीं निरूढ हो गया है । अतएव लोकव्यवहार में, एवं चिकित्साशास्त्र में शुक्र को यत्रतत्र केवल ' धातु ' नाम से मी व्यवहृत कर दिया गया है । ६१ - ओज, और ऊ का समन्वय— उक्त शुक्र नामक पार्थिव अन्तिम धातु में भी पुनः वही विशकलन प्रक्रिया प्रक्रान्त बनी । इस से शुक में प्रतिष्ठित अन्तरिक्ष्य वायु- प्राणरसात्मक धातु पृथक हो गया, एवं यही ' आज ' कहलाया । शुक्र ही इस श्रान्तरिक्ष्य श्रोज धातु का क्योंकि उपक्रम बिन्दु बनता है । अतएव शुक्रसंरक्षण पर ही प्रोज, तथा श्नोजस्विता का संरक्षण सम्भव बना करता है । यही प्रोज वैदिक विज्ञान में- ' ऊ ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जिमे प्रकृत के यज्ञलक्षण में हमनें दूसरा स्थान दिया है । अन्न से आरम्भ कर शुक्रपर्य्यन्त सातों धाओं की समष्टि पृथिव्यत्त्वेन ‘ अन्न ' शब्द से ही परिगृहीत है । तदनन्तर आन्तरिक्ष्य ' श्री ' नामक ' ऊर्क ' ' का स्थान आता है । ६२ - मनस्तन्त्र की स्वरूपनिष्पत्ति-ऊरूप ओज ' रस ' माना गया है, एवं तदपेक्षया स्वयं शुक्र मल मान लिया गया है । इस रसात्मक श्रजधातु में अभी दिव्यरस और समाविष्ट है । वही यह पारमेष्ठ्य प्रवर्ग्यभूत चान्द्र सौम्य रस है, जिसका - ' यो नः शिवतमो रसः ' रूप से स्वरूप - विश्लेषण हुआ हैं । उसी प्रक्रान्ता विशकलनप्रक्रिया से प्रोज का विशकलन होता है । इस से विभक्त शुद्ध दिव्य प्राणात्मक शिवतम सोमरस ही ' रस ' कहलाएगा, एवं स्वयं ओज इस रस की अपेक्षा से ' मल ' मान लिया नायगा । यही शिवतम दिव्य-प्राणात्मक सुसूक्ष्म रस भारतीय विज्ञानपरिभाषा में सर्वेन्द्रियाधिष्टाता ' प्रज्ञान ' नामक अतीन्द्रिय मन कहलाया है । ‘ चन्द्रमा मनसो जातः, मनश्चन्द्रेण लीयते ' इत्यादि विज्ञानश्रुतियाँ जिस मन की उत्पत्ति चन्द्रमा से मान रहीं हैं, जिसके लिये — ' अन्नमयं हि सौम्य! मनः ' यह औपनिषद सिद्धान्त स्थापित हुआ है, वह यही योज की भी सुसूक्ष्मावस्थारूप दिव्य चान्द्र रस ही है, जिसका इत्थंभूत शिवतम- सत्त्वभाव श्रन्नविशुद्धि पर ही श्यवलम्बित है । विज्ञानप्रधान भारत के आबालवृद्धवनिता - मूर्ख विद्वज्जन- सभी इस सूक्ति से परिचित हैं कि - ' जैसा अन्न, वैसा मन ' | सात्त्विक - राजस - तामस - जैसा भी अन्न खाया जायगा, तदनुपात से ही विश-कलन की अन्तिम सीमा में प्रज्ञानमन सत्त्व - रज - स्तमोभावों में परिणत रहेगा | हत्त्वान्नानुगत चान्द्र रस ही मन के गहजसिद्ध शिवतम रसरूप सात्त्विक भाव की मूल प्रतिष्ठा माना जायगा, तभी हमारा मन शिवसंकल्प का अधिष्ठाता बन सकेगा । अपनी सत्त्वगुणान्विता श्राहारादि की व्यवस्था से मनस्तन्त्र की इसी शिवतम-रसात्मिका मङ्गलकामना को अभिव्यक्त करते हुए ऋषि ने कहा है-यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तमृतं प्रजासु । यत्मान्न ऋते किञ्चन कर्म्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥ O –यजुः संहिता ३४।३ ।

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पारिभाषिकसूचनाए ६३ - अन्नदोष से भारतीय प्रज्ञा का पतन -यही कारण है कि, श्रन्यान्य त्राचार धम्म के समतुलन में यहाँ की ऋषिप्रज्ञा ने ‘ अन्न ' के सम्बन्ध में बड़ी ही जागरूकता मानी | राजर्षि मनु ने तो अन्यान्य दोषों के साथ इस अन्नदोष को ही मुख्यरूप से ज्ञाननिष्ठ भारतीय ब्राह्मण की जीवितमृत्यु माना है । देखिए!

अनभ्यासेन वेदानां, आचारस्य च वर्जनात् ।

अनिग्रहाच्चेन्द्रियार्णा मृत्युर्विप्राज्जिघांसति ॥

—मनुः श्रन्नशुद्धि का भारतीय मानव के लिए कितना महत्त्व है १, प्रश्न उक्त विवेचन से सर्वात्मना समाहित है । दुर्भाग्य है यह इस प्रशाशील देश का कि, अपनी मौलिक विज्ञान परम्पराओं को विस्मृत कर वैटने वाला वही भारतीय मानव आज अन्नव्यवहारानुगता खान - पान की मर्य्यादा के प्रति सर्वत्रा ही उच्छृंखल श्रम-दित बन कर ही विश्राम नहीं ले रहा । श्रपितु ऋषिप्रज्ञा के द्वारा निर्द्धारित विज्ञानसिद्ध अन्नव्यवस्थाओं के उपहास में भी सर्वाग्रणी बना हुआ है । इससे अधिक इस राष्ट्रीय मानव का और क्या पतन होगा? | चर्चा श्राध्यात्मिक यज्ञ के स्वरूप लक्षण की चल रही है । पार्थिव धातु के कौशल ने नव को शरीरस्वस्थता प्रदान की, ओज ने ओजस्विता प्रदान की, एवं शिवसंकल्पात्मक मन ने मनस्त्रिता प्रदान की । बलिष्ठ - लोजिष्ठ - मंहिष्ठ इत्थंभूत मानव का यह आध्यात्मिक यज्ञ अन्न - ऊ - प्राणरूप सप्तधातु - ओज - मन-इन तीनों के धारावाहिक जिस चंक्रमण से सुव्यवस्थित बना हुआ है, वही आध्यात्मिक यज्ञ की स्वरूप व्याख्या है । यह तो हुआ इस यज्ञ का तात्त्विक समन्वय । ६४ - आध्यात्मिक यज्ञ की लौकिक स्वरूप - व्याख्या— अत्र दो शब्दों में लौकिक समन्वय का भी विश्लेषण कर लीजिए । भोजनकर्म्म सम्पन्न हुआ । इससे मुक्त श्रन्न रसरूप में परिणत गया । अपनी इस रस्शक्ति से भक्त अन्न ने हमारे उस शारीरिक प्राण को सशक्त बना दिया, जो प्राण अन्नग्रहण से पूर्वावस्था में मूच्छितप्राय बना हुआ था । रसाहुति से मूच्छित प्राण मानोजग पड़ा, विकसित हो पड़ा, प्रज्वलित हो पड़ा, समिद्ध हो पड़ा, वैसे ही जैसे कि घृताहुति से अग्नि प्रज्ज्वलित हो पड़ता है । तालर्थ्य यही हुआ कि, भुक्त अन्न हीं रेस के द्वारा कालान्तर में प्राणरूप में परिणत हो गया | अन्नात्मक यह प्रज्ज्वलित- जागरूक प्रारण ही मानव की जीवनीय शक्ति कहलाया । इस जीवनीय शक्ति में परिणत बलिष्ठ प्राण अपने ऐन्द्रियक व्यापार, तथा शारीरिक ब्राह्य कर्म के लिए, अध्यवसायपूर्वक कर्म्मप्रवृत्ति के लिए प्र ेरणा बल का प्रवर्तक बन गया । प्राण की इसी प्रेरणा से हम कर्म में प्रवृत्त हो पड़े | इस अभ्यवसायात्मिका कर्म्मसन्तानपरम्परा के द्वारा हमारा प्राण पुनः विस्रस्त हो पड़ा, खर्च हो गया । इस विस्र ंसनधर्म्म से प्राण ज्यों ज्यों निर्बल- अशक्त - शिथिल होने लगा, त्यों त्यों हीं हमारी कम्र्म्मप्रवृत्ति मानो शिथिल होने लगी । इस शैथिल्य के साथ साथ ही प्राण मानो मूच्छित होने लगा । प्राण की यही मूच्छा अवस्था ' अशनाया ' नाम से प्रसिद्ध हुई, जिसका अक्षरार्थ है- अशरूप अन्नग्रहण की इच्छा, जिसे कि ७१

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शतपथभाष्य लोकभाषा में ' भूख ' कहा गया है । वही भूख, इसके द्वारा पुनः अन्न का आहरण, आहृत अन्न की पुनः अग्नि में आहुति, आहुत अन्न की पुनः रसद्वारा प्राण रूप में परिणति, सशक्त प्राण की पुनः कर्म्म में प्रवृत्ति, कर्मप्रवृत्ति से पुनः प्राण का शैथिल्य, और तद्द्वारा पुनः प्रशनाया की जागरूकता, पुन: अन्नाहरण-इत्येवंरूपेण अन्न- ऊर्स् - प्राणों का यह धारावाहिक चंक्रमण अनवरत प्रवाहित रहता है, एवं यही श्राध्यात्मिक शारीरिक यज्ञ की एकप्रकार की लौकिक स्वरूप - व्याख्या है! ६५ – पाप्मा अशनाया के द्वारा अन्नाहरण, और ऊ का आविर्भाव-शनाया को वेद में ' पाप्मा ' कहा गया है - ' अशनाया वै पाप्मा ' । श्रन्नाहरण की मूलाधिष्ठात्री यह अशनाया - बुभुक्षा यदि अन्नाहरण में समर्थ हो जाती है, तो मानव के लिए इस से बड़ा पुण्यभाव भी कोई दूसरा नहीं है । साथ ही यदि इसे समय पर अन्न उपलब्ध न हुआ, तो यह सर्वप्रथम शारीरिक रसासृग्मांस— मेदास्थिमज्जादि का ही भक्षण चर्वण श्रारम्भ कर देती है । कालान्तर में यों सर्वस्व का निगरण करती हुई यही शनाया सर्वस्व का | सर्वनाश करती हुई स्वयमपि उत्क्रान्त हो जाती है । एवं इसी दृष्टि से इसे ' महापाप्मा ' कह देना भी अक्षरशः अन्वर्थ बन जाता है । इत्थंभूता शनायारूपा बुभुक्षा ने - भूखने - अन्न का आहरण कर इसे शारीराग्नि में आहुत किया । इस बहुत अन्न की रसात्मिका जो प्रथमावस्था है, वही ऋषिदृष्टि में ‘ उर्क् ’ तत्त्व कहलाया है, जिसे हम अन्न और प्राण की मध्यावस्था कह सकते हैं । पूर्व में हमने रसासृङ्-मांसादि सात पार्थिव धातुओं के अनन्तर अन्तिम शुक्रधातु के विशकलन से सम्बन्ध रखने वाले ' आज ' नामक आान्तरिक्ष्य धातु को ' ऊक् ' कहा था, एवं यहाँ भुक्तान्न की प्रथमा रसावस्था को ही ‘ ऊक् ’ कहा जा रहा है, इसमें कोई विरोध नहीं समझना चाहिये । स्थूल से सूक्ष्म की ओर अभिमुख हो जाना हीं अन्न की उता है, जिसका चरम विकास तो यद्यपि शुक्रानन्तर प्रोज भाव पर ही होता है । तथापि क्योंकि इसका उपकम रसादि सातों पार्थिव धातुत्रों में से प्रथम रसधातु से ही हो जाता है । इसीलिए रमावस्था को भी यहाँ ऊ ' मान लिया जाता है, जिसकी कि अन्त के शिवतम - रसात्मक दिव्यप्राण की अपेक्षा से मध्यस्थता दोनों ह्रीं दृष्टिकोणों में सुसमन्वित है । ६६- अन्न - ऊक्– - प्राण - का चंक्रमणात्मक आध्यात्मिक यज्ञ – अन्न की सूक्ष्मा रणवस्था ही ' ऊ ' है यही निवेदन - निष्कर्ष है, जो कि इत्थंभूत ऊ - रस - जीव नीरस, किंवा जीवनशक्ति कहलाया है । परिभाषानुसार ' ऊ ' शब्द भी अपना स्वरूप स्वयं ही अभिव्यक्त कर रहा है । जिसप्रकार वृष्टिजल के सम्बन्ध होते ही वृक्ष - लता - गुल्माद का पत्ता पत्ता थिरक उठता है, प्रसादगुणान्विता ग्रोजस्वती विकासशक्तिलक्षणा जीयनीयशक्ति से समन्वित हो पड़ता है, ठीक उसी प्रकार प्रचण्ड बुभुक्षा की अवस्था में भोजन करते समय ज्यों ज्यों अन्नग्रास जलाभिषेक के माध्यम से गलाधःकरणानु-कूलव्यापार के द्वारा अन्तःप्रविष्ट होते जाते हैं, त्यों त्यों हमारे नेत्रों में, अन्यान्य श्रृङ्ग - प्रत्यङ्गों में एक प्रकार का उद्दीपनमाव - श्रोजभाव - विकासभाव अभिव्यक्त होता रहता है । भोजनानुगता इस तात्कालिकी उदीप्ति का नो आधारबिन्दु है, वही प्राण का पूर्वरूप माना गया है, एवं वही ' ऊर्क ' नाम पे प्रसिद्ध हुआ है, जिसके विशेषरूपेण समन्वित रहने से ही पयस्वती गौमाता ' ऊर्जस्वती ' कहलाई है । पेय पदार्थों में जीवननीय रसात्मक गोदुग्ध में, वनस्पतियों में उदुम्बर ( गूलर ) नामक वृक्ष के एतन्नामक फलों में, नक्षत्रों में ' लुब्धक ' नामक ७२

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पारिभाषिक सूचनाएँ पशुपतिनक्षत्र में इस ऊर्को रसात्मक सर्वरस का विशेष प्राधान माना गया । उद्दीप्तिप्रवर्तक. स्वयमपि उद्दीप्तिलक्षण यह अन्नरपात्मक ऊग्स ही अन्तर्य्याम सम्बन्ध के द्वारा प्राण के साथ सायुज्यभाव प्राप्त करता हुआ, दूसरे शब्दों में स्थितिमात्र में आता हुआ प्राणरूप में परिणत हो जाता है । निष्कर्षतः प्राण, एवं अन्न की मध्यावस्था ही ' ऊर्को ' है । इसप्रकार पूर्वकथनानुसार अन्न से ऊर्क, ऊ से प्राण, प्राण का विसंौंसन, अशनाया का पुनः जागरण, पुन: अन्नाहरण, इत्येव रूपेण जो धारावाहिक, अन्योऽन्य अनुग्राह्य-अनुग्रहात्मक क्रम प्रक्रान्त चल रहा है, यावदायुर्भोगपर्य्यन्त चलता रहेगा, वही आध्यात्मिक यज्ञं माना गया है । ६७ - अधिदैवत, एवं अधिभूत यज्ञस्वरूपोपक्रम, एवं चन्द्रमा, भूपिण्ड, सूरयं, और परमेष्ठी त्रिम्बों का परिभ्रमण— अत्र दो शब्दों में अधिभूत तथा अधिदैवत यज्ञों के स्वरूप का भी समन्वय कर लीजिए | स्पष्ट है कि ज्योतिष्चक्रात्मक खगोलीय मध्य के ' बृहतोच्छन्द ' नामक विष्वद्वृत्त के केन्द्र में स्थिररूप से सहस्रांशु सूर्य्यं प्रतिष्ठित है, जैसा कि - ' सूर्यो बृहतीमध्यूढस्तपति ' – ' बृहद्ध तस्यौ भुवनेष्वन्तः ’ — ‘ नैवोदेता नास्तमेता मध्ये एकल एव स्थाता ' - इत्यादि श्रुतियों से प्रमाणित है । वैदिक विज्ञान के सम्पर्क से पराङ्मुख वर्त्तमान आसुरज्यौतिषशास्त्र जहाँ भूपिण्ड को स्थिर, एवं सूर्य्य को चल मान रहा है, वर्त्तमान भूतविज्ञान-जहाँ पृथिवी को चल एवं सूर्य को स्थिर मान रहा है, वहां भारतीय वैदिक विज्ञान की दृष्टि से इन स्थिर - चर भावों का अपेक्षाभाव से ही सम्बन्ध माना गया है । दृश्यस्थिति के अनुसार पृथिवी स्थिर है, धरित्री है, एवं सूर्ख गतिमान् है, जैसाकि इस दृश्यस्थिति के ही समर्थक—

आकृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यश्च ।

हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥

- यजुः संहिता ३३,४३ ॥

इत्यादि वेदमन्त्र से प्रमाणित है । किन्तु प्राकृतिकी स्थिति की अपेक्षा से पृथिवी गतिमती है. सूर्य तदपेक्षया स्थिर है । पूर्वोक्त वचन इसी प्राकृतिक स्थिति की दृष्टि से सूर्य को स्थिर मान रहे हैं, पृथिवी को चल । ‘ नैत्रोदेता नास्तमेता, मध्ये एकल एव स्थाता ' इत्यादि छान्दोग्यश्रुति कह रही है कि, सूर्य्य का जो उदय, तथा अस्त माना जाता है, वह पार्थिवपरिभ्रमण निबन्ध ही ही है । वस्तुतः न सूर्य का उदय होता, न अस्त 1 अपितु वह इस रोदसी ब्रह्माण्ड में बृहतीछन्द पर स्थिररूप से ही प्रतिष्ठित है, जिसके चारों ओर अपने क्रान्तिवृत्त के आधार पर भूपिण्ड परिक्रमा लगाता रहता है । एवमवेच चन्द्रमा अपने दक्षवृत्त के द्वारा भूपिण्ड के चारों ओर परिक्रमा लगाता रहता है । चन्द्रमा का एक पारिभाषिक नाम ' सोम ' भी है, जैसाकि - ' एष वै सोमो राजा देवानामग्नं यच्चन्द्रमाः ' इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । एवमेव भूपिण्ड का एक पारिभाषिक नाम ' पूषा ' भी है, जैसाकि - ' इयं वै पृथिवी पूपा ' इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । यह पूषा, और सोम, अर्थात् भूपिण्ड एवं चन्द्रमा दोनों देवरथात्मक अपने अपने क्रान्तिवृत्त तथा दक्षवृत्तों के ऊपर सूर्य्य को केन्द्र बनाते हुए सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगा रहे हैं । इनकी इस परिक्रमा से सौर मधुरस III

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शतपथमाध्य का इन दोनों में आदान होता रहता है, जोकि मधुरस पार्थिव प्रजा के जीवन का आधार माना गया इस प्रकार अपनी परिक्रमा से वे दोनों मानो विश्वप्रजा का क्षेम ही व्यवस्थित कर रहे हैं । इसी रहस्य को

लक्ष्य में रख कर वेदपुरुष ने कहा है-सोमः, पूषा च चेततुर्विश्वासां सुतितीनाम् ।

देवत्रा रथ्योहिता ॥

- सामसंहिता पू ० राश भूपेण्ड परिभ्रममाण है, इस दृष्टि से परिचित भी वर्तमान विज्ञान सम्भवत: इस दृष्टि का कोई निश्चयात्मक समाधान अब तक न कर सका हो कि, भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर घूमता क्यों है? । क्चकि वेदविज्ञान विस्पष्ट शब्दों में इस ' क्यों ' का भी समाधान कर रहा है । देखिए!

यज्ञ इन्द्रमवद्ध यत्, यद् भूमिं व्यवत्त यत् ।

चक्राण पशं दिवि ॥

-ऋक्सं ० ८ | १४ | ५ | मन्त्र का अक्षरार्थ यही है कि, " यज्ञ ने सौर इन्द्रप्राण को बलप्रदान किया । यज्ञचल से बलवान् बने हुए वृषभरूप सौर इन्द्र ने अपने रश्मिरूप शृङ्खों से भूपिण्डं पर प्रचण्ड श्राघात किया, एवं इस आघात से इन्द्र ने भ पिण्ड को घुमा डाला " । मन्त्रानुगत यज्ञ, इन्द्र, ग्रोपश, सीग, आदि का क्या तात्त्विक स्वरूप है?, प्रश्न के समाधान के लिए तो भतविज्ञानवादियों को वैदिक विज्ञान की शरण में हीं खाना चाहिए । तो हमनें देखा कि, दृश्यस्थिति जहाँ भूपिण्ड को स्थिर, एवं सूर्य्य को चल मान रही है, वहां प्राकृतिक स्थिति की अपेक्षा से भूपिण्ड चल है, एवं सूर्य्य स्थिर है । वर्तमान युग के जो वेदाभिमानी भारतीय आर्य्यसर्वस्वरूप पुराणशास्त्र के रहस्यात्मक समन्वय से वञ्चित रहते हुए ' पुराण ' को ' मप्प ' मान बैठने का जघन्य प्रयत्न करते रहते हैं, उन्हें पुराणशास्त्र के— “ वास्तनमर्कस्य नोदयः सर्वदा सतः । उदयास्तमनं चैत्र दर्शनादर्शनं रवेः ॥ " उक्त वचन की ही आराधना करनी चाहिए, जो विस्पष्ट शब्दों में पूर्वोक्त वैदिक पार्थिव परिभ्रमण सिद्धान्त का अक्षरश: अनुगमन करता हुआ - ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ' इस चिरन्तन आस्था को दृढमूल प्रमाणित कर रहा है । क्या यह स्थिर - चर विमर्श सूर्य्य पर ही परिसमाप्त है? 1 नहीं । अभी तो वह तीसरा दृष्टिकोण और शेष है, जिसका सृष्टिमूला विश्वविद्या से सम्बन्ध माना गया है, एवं जिसका वर्त्तमान भौतिक विज्ञान ने वर्तमान क्षण पर्य्यन्त तो संस्पर्श भी नहीं किया है । सृष्टिमूला विश्वविद्या के रहम्यपूर्ण विज्ञान संद्धान्त है ७४

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पारिभाषिक सूचनाएँ अनुसार प्रकृत्या स्थिर बना रहने वाला सूर्य्य भी तत्त्वतः श्रात्यन्तिकरूप से स्थिर नहीं है । श्रपितु परिभ्रम-माणा सचन्द्रा पृथिवी को अपने ज्योतिर्म्मय हिरण्मय मण्डल की महिमा के गर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले सूर्य्यनारायण आपोमूर्त्ति ' परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगा रहे हैं । इन सब विवर्त्तो को बुद्बुद्वत् स्वगर्भ ' में भुक्त रखने वाले परमेष्ठी क्या स्थिर है? | नहीं । ये भी इन सब विवर्त्तो को साथ लिए हुए ' स्वयम्भ ' के चारों ओर परिभ्रममाण हैं । जिन इन दोनों सौर - पारमेष्ठ्य परिभ्रमण - विद्याओं के आधार पर ही विश्व की दशविधा महाविद्याओं का वितान हुआ है, जो अन्य वक्तव्य का विषय है । स्वयम्भ ू सत्य सर्वथा स्थिर है, जिसे ' परमाकाश ' माना गया है, एवं जिसका - ' दोऽस्याध्यक्षः परमे व्योमन् सोऽङ्ग वेद यदि वा न वेद ' इत्यादि मन्त्रश्रुति से स्पष्टीकरण हुआ है । भूपिण्ड से आरम्भ कर पारमेष्ठ्य ब्रह्माण्ड पर्य्यन्त सम्पूर्ण श्रलातचक्र प्रचण्डरूप से परिभ्रममण है । यही गतिरूप परिभ्रमण एक दूसरे मण्डल-पिण्डों में परस्पर आदान - विसर्ग - सम्बन्ध प्रक्रान्त किए हुए है । आदान विसर्गात्मिका यही विश्वप्रक्रिया आधिदैविक नित्य यज्ञ का एक प्रकार का दृष्टिकोण है, जिसका प्रत्यक्षदृष्ट भौतिक सूर्य पिण्ड के माध्यम से निम्न लिखित रूप से समन्वय किया जासकता है । ६८ - भौतिक सूर्य्यपिण्ड के माध्यम से विश्वयज्ञप्रक्रिया का समन्वय— सहस्रांशु सूर्थ्य बृहतीछन्द पर प्रतिष्ठित है, यह निवेदन किया जाचुका है । अत्र प्रतिष्ठित सूर्य्यनारायण अपने सावित्राग्निगर्भित -- गायत्रीमात्रिक तत्त्ववेदावच्छिन्न - इन्द्रज्योतिर्मय -- सहज सिद्ध एति - - प्रतिक्षण, आदानविसर्गभावापन्न, प्राणदपानद्रूप रोचनामय रश्मिभावों से विश्वानुगता रोदसी - त्रिलोकी में भुक्त - गर्भित प्रतिष्ठित पार्थिव श्रान्तरिक्ष्य, दिव्य - पदार्थों के, मानव - पशु - पक्षी - कृमि - कीटा दे जङ्गम बीवों के, श्रोषधि-घनस्पति- लता - गुल्मादि श्रन्तः संज्ञ बीवों के, एवं धातूपधातु - रसोपरस - विषोपविष - लोष्ट - पाषाणादि असंज्ञ-स्थावर जीवों के स्वरूपनिर्माण में प्रतिक्षण विस्रस्त होते रहते हैं । अर्थात् सौर प्राण प्रवर्ग्य बन कर सूर्य के ब्रह्मौदनभाग से पृथक् होकर तथोक्त भूत - भौतिकादि स्थावर - जङ्गम- पदार्थों का स्वरूपनिर्माण किया करता है, जैसाकि — ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसृताः, अयन्नर्थः कृण्वन्नपांसि ' - अस्य प्राणदपानती व्यख्य-न्महिषो दिवम् ' इत्वादि मन्त्रश्रुतियों से प्रमाणित है । अवश्य ही इस सम्बन्ध में यह तो मान ही लेना पड़ेगा कि, सौरमण्डल के सान्निध्य में कोई वैसा अजस्र कोश सुरक्षित है, जिससे अपने प्राणात्मक भूतों को इन पदार्थों के निर्माण में प्रभूतमात्रा से अनवरत वित्रस्त करते हुए भो - खर्च करते हुए भी – सूर्य्यनारायण कभी स्वप्राणभूतस्वरूप से सर्वात्मना क्षीण नहीं हो जाते, निःशेष नहीं बन जाते । प्राणात्मक भूत के ज्योतिर्मय पिण्ड से प्रत्यक्ष दृष्ट सूर्य्यनारायण यदि अपनी प्राणमात्रात्रों, तथा भूतमात्राओं से यों निरन्तर विस्रस्त होते रहते हैं, तो अवश्य ही इन्हें कालान्तर में विनष्ट हो जाना चाहिए था, स्वस्वरूप से विलीन हो जाना चाहिए था | ६ हसूर्य्यनारायण के आविर्भाव का संक्षिप्त इतिवृत्त --और इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि - ' सयोगा विप्रयोगन्ताः, पतानान्ताः समुच्छ ्मयाः, जातस्य हि ध्रुत्रो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृतस्य च ' इत्यादि प्राकृतिक सिद्धान्तानुसार सृष्ट्यवसानात्मक अवसानकाल में सूर्य्यं स्वप्रभव आपोमय उस पारमेष्ठ्य सरस्वान् नामक महासमुद्र में विलीन हो ही जायगा, जिस इस पिण्डात्मक ७५