Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 321–330

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 321–330

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शतपथभाष्य उदाहरण के लिए - प्राण, प्रजापति - षोड़शी - चतुष्टय - त्रिवृत् - पञ्चदश- एकविंश - सप्तदश - आदि आदि शब्द किसी नियत अर्थ ' का संग्रह करते हुए जहाँ जहाँ इन शब्दों के व्यङ्ग्यार्थ - किंवा वाच्यार्थ - किंवा शब्दार्थ समन्वित हो जाते हैं - उन सब स्थलों का समन्वय करते हुए सर्वत्र अनुगत बने रहते हैं, एवं यही इनका अनुंगमभाव है । इसी दृष्टि से प्रजापति शब्द अग्नि - वायु - इन्द्र - वरुण - धाता - श्रादित्यादि भेद से असख्य तत्त्वों का संग्राहक बन रहा है । अग्नि - वरुण - इन्द्र - त्वष्टा आदि आदि शब्द तद्वाच्य नियत अर्थों में हों निरूढ रहते हुए निगमशब्द हैं । प्रकृत का ' ब्रह्म ' शब्द क्योंकि अनुगमभावात्मक है । अतएव एक स्थान पर वही ब्रह्म शब्द यदि ' भूत ' के लिए प्रयुक्त है, तो दूसरे स्थान में भूतातीत आत्मा के लिए भी ब्रह्म शब्द प्रयुक्त हुआ है । कहना न होगा कि, वेदशास्त्र की रहस्यपूर्णा इन निगम - अनुगम परिभाषाओं के अभिभूत हो जाने का ही यह दुष्परिणाम है कि, भारतवर्ष में विगत कुछ एक शताब्दियों में वेद के जितनें भी भाष्यकार, एवं टीकाकार हुए हैं, सभी ने वेदशास्त्र के ज्ञानविज्ञानात्मक सुनिश्चित भी तत्त्ववाद को सन्देह्निवृत्ति के स्थान में सन्देहप्रवृत्ति का ही कारण प्रमाणित कर दिया है । एवं एकमात्र इसी प्रज्ञापराध से सभी युगों के लिए महान् उपयोगी भी ज्ञान विज्ञानात्मक वेदशास्त्र हमारे लिए केवल अर्चनीया ' प्रतिमा ही बना रह गया है, जिस इत्थंभूता दशा, किंवा दुद्दशा के लिए प्रस्तुत ' ब्रह्म ' शब्द का निदर्शन ही पर्य्याप्त होगा । ३५ - ' कलौ वेदान्तिनः सर्वे ' मूलक ब्रह्मव्यामोहन — आज ' ब्रह्म ' शब्द अपने पारिभाषिक अनुगमभावों से वञ्चित रहता हुआ ऐसा भ्रामक बन गया कि, सर्वत्र एकहेलया यह शब्द विश्वातीत - अखण्ड - अनवच्छिन्न- श्रद्वय - निर्गुण - निरञ्जन - निद्धर्भक - किसी व्यापक तत्त्व की ओर ही भारतीय मुग्धप्रज्ञा का ध्यान आकर्षित करने वाला रह गया है । यही कारण है कि-' ब्रह्म ' की उपासना करो, ब्रह्मार्पणभाव प्राप्त करो, ब्रह्म ही सर्वाधार है, इत्यादि वाक्यों का सीधा सा समन्वय विश्वातोत अचिन्त्य - अनुपास्य - निराधार - तत्त्व पर ही परिसमाप्त है । जिस विश्वातीत ब्रह्म का ज्ञान - उपासना-कर्म्म - भक्ति - विज्ञान- अदि से कोई सम्बन्ध नहीं है, जो बुद्धि - मन- इन्द्रिय- व्यापारों से सर्वथा परा: परावत है, जो सर्वथैव निरपेक्ष है, ऐसे ब्रह्म को अग्रणी बना कर ही शास्त्रीय ' ब्रह्म ' शब्द का समन्वय करने के लिए तुर बने रहने वाले अभिनव व्याख्याताओं के इस प्रकार के ब्रह्मव्यामोहन से ही ग्रान भारतीय प्रज्ञा आचारधर्म्मात्मिक समस्त कर्मकलापों से अपने आप को तटस्थ - उन्मुक्त - ही प्रमाणित कर बैठी है, जैसाकि-‘ क़लौ वेदान्तिनः सर्वे ' इत्यादि लोकप्रचलित आभाणक से स्पष्ट है । ३६ - वृद्धास्ते न विचारणीयचरिताः— हमें हो रहा है नितान्त भावुकता - पूर्णा उस भारतीय प्रज्ञा के इत्थंभूत ब्रह्मव्यामोहन को देख-सुनकर, जिसके कि सम्मुख ब्रह्म शब्द की अनुगमात्मिका सहज व्याख्याएँ सर्वथा विस्पष्ट शब्दों में स्वयं मूल-ग्रन्थों में हीं उपलब्ध होतीं रहीं, और फिर भी यह भावुक प्रज्ञा ' ब्रह्म ' शब्द के व्यवस्थित पारिभाषिक - अनु-गमात्मक - समन्वयों में यों गजनिमीलिका का ही अनुगमन करती रही, एवं किसी भी पारिभाषिक- मौलिक-निष्ठादृष्टि से इसने शब्दार्थसमन्वय के लिए कोई प्रयत्न ही नहीं किया । उदाहरण के लिए गीता के ' ब्रह्म ' शब्द को ही माध्यम बना लेना पर्य्याप्त होगा । गीता में एक स्थान पर ब्रह्मशब्द के स्वरूपविश्लेषण से सम्बन्ध ' रखने वाला एक वाक्य आता है - ' ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ', जिसका अक्षरार्थ होता है - ' ब्रह्मतत्त्व अक्षर से ५६ }

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पारिभाषिकसूचनाएँ समुत्पन्न है ' । अक्षर से ‘ उत्पन्न ' होने वाला ( ध्यान दीजिए ' समुद्भूतम् ' - पर ) तत्त्वविशेष ही ‘ ब्रह्म ' नामक पदार्थविशेष, किंवा तत्त्वविशेष है । ' समुद्भवम् ' शब्द ' समुत्पत्ति ' से सम्बन्ध रखता है, उत्पत्ति का क्षरात्मक विनाशी भूत - भौतिक प्रपञ्च से ही सम्बन्ध है । स्पष्टतमरूप से प्रमाणित है कि, उक्त वाक्य में पठित, अक्षर-से उत्पन्न होने वाला ‘ ब्रह्म ' तत्त्व किसी भूतभाव की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । गीता के व्याख्याता भाष्यकर्त्ता - एवं टीकाकार ब्रह्मवादी श्राचार्यों नें प्रस्तुत वाक्य के ' ब्रह्म ' शब्द का कैसा, और क्या समन्वय किया होगा १, इस प्रश्न के सम्बन्ध में - ' वृद्धास्ते न विचारणीयचरिताः, तिष्ठन्नु हुँ वर्त्तताम् ' पक्ष ही हमारे लिए श्रेयः पन्था है । ३७ - श्रौत - स्मार्च ' ब्रह्म ' शब्द का पारिभाषिक दृष्टिकोण – " कर्म्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि, ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ वेदं सर्वम् - गीता ३ | १५ | सर्व खल्विदं ब्रह्म G अथातो ब्रह्मजिज्ञासा, जन्माद्यस्य यतः, तत्त समन्वयात् ॥ ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्म्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ ” —गीता १४।२७ इत्यादि आर्ष - श्रौतस्मार्च वचनों में पठित ' ब्रह्म ' शब्द का किस अनुगमभाव से सम्बन्ध है?, इस प्रश्न का समाधान तत् सहयोगी अन्य शब्दों से सर्वथा स्पष्ट है । ' सर्वम् ' शब्द अङ्गुली - निर्देश से सम्बन्ध रखने चाले भूतप्रपञ्च की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है, न कि किसी अचिन्त्य - विश्वातीत तत्त्व की श्रोर । “ यह सब कुछ ब्रह्म है, एवं ब्रह्म ही सब कुछ बना है ” इत्यादि वाक्यों में पठित ब्रह्म शब्द का यही सहज अर्थ है कि, “ यह सम्पूर्ण भूत - भौतिक प्रपञ्च अक्षर से उत्पन्न होने वाले किसी विशेष तत्त्व का ही उपबृ ंहणभाव है | एवं इस उपबृंहणधर्म से ही वह विशेष तत्त्व ' ब्रह्म ' कहलाया है " । अर्थात् सम्पूर्ण विश्व क्षरात्मक ही है । इसी सहज अर्थ में उक्त वाक्यों के ब्रह्मशब्द का समन्वय हो रहा है । मान लेना चाहिए कि, विज्ञान शब्द के साथ, किंवा विज्ञानात्मक भूतभौतिक - भावापन्न शब्दों के साथ जहाँ जहाँ ‘ ब्रह्म ' शब्द उपात्त होगा, वहाँ वहाँ सर्वत्र ब्रह्म शब्द यज्ञविज्ञानात्मक विश्वविज्ञान के प्रभवभूत ' क्षरत्रह्म ' का ही समर्थक बना रहेगा । इसी तथ्य के आधार पर हमें लक्षीभूत ' ब्रह्मविज्ञान ' शब्द के ब्रह्म शब्द का समन्वय ढूँढना पड़ेगा । इस समन्वयदृष्टि के आधार पर पूर्व स्थलों के ' ब्रह्म ' शब्दों का यही निष्कर्ष निकलेगा कि - ' सोपाधिक- नानाभावप्रवर्त्तक- श्रतएव बीजरूप से नानाभावों को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाला वैकारिक विश्व का आधारभूत - प्रकृतिभूत तत्त्व ही ब्रह्म पदार्थ है, जो कि विश्वविज्ञानदृष्ट्या ' ज्ञान ' ५७

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शतपथ भाष्य उपाधि से व्यवहृत रहता हुआ भी विश्वविज्ञानप्रवृत्ति का मूलाधिष्ठान बनता हुआ स्वयं भी नानाभावनिबन्धन विज्ञानाभाव से हीस मन्वित है ' । तभी तो यज्ञविज्ञानापेक्षया ब्रह्मज्ञानात्मक भी इस तत्त्व को ' ब्रह्मविज्ञान ' नाम से व्यवहृत कर दिया जाता है । ३८ - ‘ क्षरब्रह्म ' का वैशिष्ट्यत्तत्क्षण विज्ञानत्त्व— यह पूर्व में निवेदन किया जा चुका है कि, जो विश्वातीत, श्रतएव निरपेक्ष शुद्ध ज्ञनतत्त्व है, वह ' पदार्थ ' सीमा से एकान्ततः संस्पृष्ट रहता हुआ यत्किञ्चित्पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्न में हीं निरूढा शब्दमर्यादा से भी सर्वथा ही संस्पृष्ट है । अतएव उसके लिए न ज्ञान शब्द है, न ज्ञाता शब्द है, नापि विज्ञान शब्द । प्रकृत में जिस ब्रह्म को हमनें ' ज्ञान ' शब्द से व्यवहृत किया है, वह भी तत्त्वत: विज्ञानात्मक सापेक्ष ज्ञान शब्द से ही सम्बन्ध रख रहा है । अतएव विज्ञानान्क ज्ञान हीं इस ब्रह्मज्ञानात्मक शानशब्द से व्यक्त हुआ है । स्मरण कीजिए - विज्ञान शब्दानुबन्धी ' वि ' उपसर्ग के हमने पूर्व मे विशेष, तथा विविध दो अर्थ किये हैं । इन दो उपसर्गों के कारण विशेष ज्ञान भी विज्ञानक हला सकता है, एवं विविध शान भी विज्ञान कहला सकता है । यहीं कुछ थोड़ा विशेष रूप समझ लेना है | वैशिष्ट्य जहाँ क्षरात्मक मूलब्रह्म का स्वरूपधर्म्म है, वहाँ वैविध्य विकारात्मक तूलविश्व का स्वरूपधर्म्म माना गया है । सम्पूर्ण विशेषभावों को सम्पूर्ण नानाभावों को, किंवा सम्पूर्ण विश्वभूतों को तत्तद्भूतों की प्रातिश्विक विशेषता से अक्षुण्ण बनाए रखने वाला आधारभूत क्षरब्रह्म ही है, और यही इसका विश्वापेक्षया महान् वैशिष्ट्य है । इसी महान् वैशिष्ट्य के कारण यह मूलभूत क्षरब्रह्म ' विशेष ' तत्त्व प्रमाणित हो रहा है । और इसी विशेषता के अनुबन्ध से हम इस ब्रह्म को विशेषभावात्मक ब्रह्म कहेंगे, एवं यही इसका - ' विशेषं ज्ञानं ' लक्षण विज्ञानत्त्व होगा, जो कि विविध ज्ञानात्मक विश्वविज्ञान के समंतुलन में अवश्य ही अपनी एक विशेष विशेषता रख रहा है । ३६ - ' क्षरा ' का नित्य महिमाभाव-क्या है ब्रह्मविज्ञानात्मक ज्ञान की वह विशेष विशेषता? उत्तर उक्तप्राय है । यच्चयावत् नानाभावों को - विशेषभावों को भूतभावों को स्वाधार पर प्रतिष्ठित रख लेना क्या साधारण विशेषता है? | नहीं । पितु यह तो वह असाधारण विशेषता है, जो कि किसी भी भौतिक पदार्थ में उपलब्ध नहीं होती । दूसरी सबसे बड़ी विशेषता है इस क्षरब्रह्म की नित्यकूटस्थता | क्षरब्रह्म विश्व का उपादान माना गया है उसी प्रकार से, जैसेकि दुग्ध - लौह-मिट्टी आदि शर - थर - मलाई - किट्ट - जँग - घटादि के उपादान माने गए हैं । देखते हैं कि दूध मलाई बन कर अपने दुग्धस्वरूप से विलीन हो जाता है । जंगरूप में परिणत लोहा लोहा नहीं रह जाता । घट रूप में परिणत मिट्टी अपने मिट्टी के रूप से तिरोहित हो जाती है । क्या ऐसा ही कार्य्यकारणभाव है इस उपादानभूत ब्रह्म का? | नहीं | एक ही विश्व क्या, ऐसे ऐसे अनन्त विश्वों को विकाररूप से उत्पन्न करता हुआ भी उपादानरूप यह क्षरब्रह्म स्वस्वरूप से वैसा ही अक्षुण्ण बना रहता है, जैसाकि विकारोत्पत्ति से पूर्व । यही तो इस क्षरब्रह्म की वह नित्य महिमा है, जिसके आधार पर एकेदशी ' अविकृत परिणामवाद ' नामक सिद्धान्त जागरूक हो पड़ा है । न यह विश्वोत्पत्ति से क्षीण होता, न विश्वाभाव में इसकी श्रायतनवृद्धि ही होती । इसी महान्

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पारिभाषिक स्वानएँ वैशिष्ट्य को लक्ष्य बनाकर श्रुति ने कहा है- “ एप नित्यो महिमा ब्रह्मणो न कर्म्मणा वर्द्धते, नो कनीयान् ” । ४० - ब्रह्म - यज्ञ - धाराओं का पार्थक्य समन्वय— इस नित्यमहिमा - विकृतमहिमारूप महान् वैशिष्ट्य से ही इसे विशेषरूपेण विशिष्ट मान लिया गया है । इसी नित्यभाव की अपेक्षा से इस मूल ब्रह्मात्मक ज्ञान को ' नित्य - विशिष्ट - ज्ञान ' कहा गया है । इसी मूलब्रह्मज्ञान के साथ विज्ञानशब्द के विशिष्ट्य भावसूचक ' वि ' उपसर्ग का सम्बन्ध माना जायगा । एवं इसी आधार पर इस क्षरब्रह्मात्मक सापेक्ष ज्ञान को - विशिष्टं ज्ञानं विज्ञानम् ' इस प्रथम लक्षण के अनुसार ' विज्ञान ' शब्द से व्यवहृत किया जायगा । कैसा है यह विज्ञान? । अनन्त विश्वविकारों को अनवरत उत्पन्न करता हुआ भी स्वस्वरूप सर्वथा श्रविकृत, अतएव अपने इस स्वमहिमाभाव से सर्वथा नित्य । ' नित्यं विज्ञान-मानन्दं ब्रह्म ' यह श्रुतिवचन इसी नित्यमहिमारूप विशिष्टतम क्षरब्रह्म का ही निरूपण कर रहा है । दूसरा लक्षण है- ' विविधं ज्ञानं विज्ञानम् ', जिसका भौतिक विश्वात्मक ' यज्ञविज्ञान ' से सम्बन्ध माना जायगा । यज्ञात्मक विकारविज्ञान ही वैकारिक निरूढ पदार्थों का स्वरूप- सम्पादक बनता है । श्रतएवय ह कहा जा सकता है कि, यह यज्ञविज्ञानात्मक विविध भावापन्न विकारविज्ञान हीं वैकारिक भूतों का प्रवर्तक है । ' विज्ञानाद्धये व खल्विमानि भूतानि जायन्ते ' इत्यादि श्रुत्तिवचन इस वैविध्यभावापन्न विकार विज्ञानात्मक यज्ञविज्ञान की श्रोर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । ब्रह्मविज्ञानात्मक ज्ञान केवल ' ज्ञातव्य ' है, जिसका न उपासना से सम्बन्ध, एवं न कर्म्माचरण से । अतएव ब्रह्मविज्ञान को जहाँ ' विजिज्ञास्य ' कहा जायगा, वहाँ यज्ञविज्ञान ' उपास्य ' माना जायगा, जैसाकि सम्भवतः आगे चलकर स्पष्ट होगा । इसीलिए श्रुति ने - ‘ विज्ञानाद्धये व ॰ ' इत्यादिरूप से उपक्रान्त यज्ञविज्ञान का - ' विज्ञानमित्युपास्व ' रूप से ही उपसंहार किया है । ' अथातो ब्रह्म जिज्ञासा ' सूत्र का ब्रह्मविज्ञान की जिज्ञासा से ही सम्बन्ध है । क्योंकि यह केवल ज्ञातव्यविज्ञान है, जबकि ब्रह्मविज्ञान ' के आधार पर प्रतिष्ठित यज्ञविज्ञान उपास्य बन रहा है । इसप्रकार इन दोनों विज्ञानधाराओं के साथ क्रमशः विशेषभावापन्न प्रथमलक्षण, एवं विविधभावापन्न द्वितीयलक्षण का यथाव्यवस्थित समन्वय हो रहा है, जिसे विस्मृत कर सचमुच हमने सभी कुछ विस्मृत कर लिया है । ४१ – ' ब्रह्म ' शब्द का विस्पष्टतम वाच्यार्थ — बतलाया गया है कि, ब्रह्मविज्ञानात्मक मौलिक विज्ञान के लिए ही सापेक्ष ' ज्ञान ' शब्द व्यक्त हुआ है । कैसा सापेक्ष विज्ञान १, जो सम्पूर्ण विश्व का, किंवा यज्ञात्मक भूतों का मूलविज्ञान है । समस्त विश्व पाञ्चभौतिक विवर्त्त माना गया है । इस भौतिक जगत् की मौलिक परिभाषाएँ - मौलिक समन्वय जिस मूल आधार पर सुव्यवस्थित हैं, विश्वाधारभूत - क्षरनिबन्धन - वह मौलिक तत्त्व ही यहाँ ' ब्रह्मविज्ञान ' कहलाया है, यही ब्रह्मशब्द का त्रिस्पष्टतम वह वाच्यार्थ है, जिसकी पर्य्यवसानभूमि है- ' क्षरब्रह्म ' | ४२ - ब्रह्मवनात्मिका प्रश्नपरम्परा— तात्पर्य्यं यह हुआ कि - क्षरविज्ञान का ही नाम ' ब्रह्मविज्ञान ' है । ज्ञानसत्त्रानुगता प्रश्नोत्तरविमर्श - चर्चां के प्रसङ्ग से सम्बन्ध रखने वाले प्रस्तुत वक्तव्य के इस उपसंहार - स्थल में हमसे यह प्रश्न हुआ था कि- वेद ५६

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शतपथभाष्य में बो - ' ब्रह्मवनं ब्रह्म स वृक्ष आस ' इत्यादिरूप से ब्रह्म शब्द श्राया है, क्या उसका भी इसी क्षरब्रह्म से सम्बन्ध है? | इस प्रासङ्गिक प्रश्न का उस समय जो समाधान हुआ था, वह भी प्रसङ्गधिया समन्वित कर लेना चाहिए । हमनें प्रश्न का तात्कालिक रूपेण यही उत्तर दिया था कि- नहीं, सर्वथा नहीं | ' ब्रह्मवनं ब्रह्म स वृक्ष ' इत्यादि मन्त्र तो तैत्तिरीय ब्राह्मण का है, जिसकी उत्थानिका हुई है स्वयं ऋग्वेद में - ' किंस्चिद्वनं क उस वृक्ष श्रस ' इत्यादिरूप से । मन्त्र का विकलरूप यह है—

किंस्विद्वनं क उ स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः ।

मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु यदध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥

ऋक्सं १०।८१ | ४ | “ वह ऐसा कौनसा जङ्गल था, उस बङ्गल में वह ऐसा कौन सा वृक्ष था, जिसे काट - छाँट कर यह द्यावापृथिवीरूप लोकभुवन निम्मित हो गया? | मैं ( वेदमहर्षि ) मनीषी - तत्त्वज्ञ - विद्वानों से अपने मन से ( प्रज्ञापूर्वक ) ही यह पूँछ रहा हूँ कि, जिस किसी उस तत्त्व ने -यों उस जङ्गल के वृक्ष से काट छाँट कर बन जाने वाले लोकों को अपने ऊपर धारण कर लिया, उसका क्या स्वरूप है? ११, यह है मन्त्र का अक्षरार्थ । ऋग्वेद नें प्रश्नमात्र का उत्थान किया, किन्तु कोई समाधान नहीं किया इस प्रश्न का । क्यों? | क्या कोई उत्तर नहीं है इस प्रश्न का । श्रवश्य ही उत्तर है । एवं रहस्यगभीर । ऋषिभाषात्मिका मन्त्रभाषा ने उत्तर गर्भित प्रश्न के माध्यम से ही प्रश्न करने के साथ साथ ही उत्तर का भी स्पष्टीकरण कर दिया है । क्या व्यक्तभाषा में ' पृथक्रूप से प्रश्न का उत्तर नहीं दिया जा सकता था? | नहीं । इसलिए ' नहीं ' कि वन - वृक्ष - एवं वृक्ष के तक्षणरूप तीन भावों में से वन तथा वृक्ष, इन दो तत्त्वों का सर्वथा अनिरुक्तभाव से सम्बन्ध है । एवं अनिरुक्त-श्रव्यक्तभाव के स्पष्टीकरण में निरुक्ता व्यक्ता वाक् सर्वथा असमर्थ है, जबकि ऐसी निरुक्ता व्यक्ता वाक् उस तत्त्व के व्यक्तरूप तक्षणभाव का हो स्पष्टीकरण करने की क्षमता रखती है । ४३- वाक् और मन की प्रतिद्वन्द्विता— सुप्रसिद्ध है कि - मन, और वाक् के पारस्परिक अहंश्रेयोरुप विवाद में प्रजापति ने अव्यक्त मन का ही पक्षपात किया । मन कहता था मैं बड़ा हूँ इसलिए वाकू से कि, यदि मैं, किंवा मेरा संकल्प न हो - तो बाकू कुछ भी स्पष्ट करने में असमर्थ है । उधर वाक कह रही थी कि, मैं बड़ी हूँ तुम से इसलिए कि, यदि मैं न रहूँ – तो तुम्हारा संकल्प केवल संकल्प ही बना रह जाय । मैं हीं उसे व्यक्तरूप प्रदान करती हूँ । यही दोनों का अहंश्रेयोभाव था, अहमहमिका - लक्षणा वह प्रतिद्वन्द्विता थी, जिसका ये दोनों हीं परस्पर समन्वय करने में असमर्थ ' थे | दोनों निर्णय की जिज्ञासा से प्रजापति की शरण में जाते हैं । एवं प्रजापति यही निर्णय कर देते हैं कि, ' तुम दोनों में मन ही श्रेष्ठ है ' । इस निर्णय से वाक् रुष्ट हो जाती है । और वह प्रजापति के सम्मुख अपना यह आक्रोश अभिव्यक्त कर डालती है कि ' अहव्यबाट् - एवाहं तुभ्यं भूयासम् ' । अर्थात हे प्रजापते! मैं कभी आपके लिए हव्य का वहन न करूँगी । तात्पर्य्य, मेरे व्यक्त रूप से आपको कभी आहुति नहीं मिलेगी । कहते हैं, इसीलिए यज्ञ में प्रजापति के लिए उपांशुभाव से तूष्णीं भाव से - बिना मन्त्रोच्चारण के ही आहुति दी जाती है ( देखिए शत ० ब्रा ० १२४ | ५ | १२ ) । ६०

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पारिभाषिक सूचनाएँ ४४ - अनिरुक्त प्रजापति की निरुक्ता व्याहृति-बड़ा ही रहस्यपूर्ण है यह श्राख्यान, जिसके इसी श्रंश का हमें प्रयोग करना है कि हृदयस्थ अन्तर्यामी नामकप्रजापति निरुक्त प्रजापति है । " पराचि खानि व्यतृरणत् स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ्पश्यांत “ नान्तरात्मन् " इत्यादि सिद्धान्तानुसार सभी इन्द्रियों की भांति वागिन्द्रिय का प्रवाह भी केन्द्रस्थ अनिरुक्त प्रजापति से बहिर्मुख ही है । अतएव बहिर्मुखा व्यक्ता वाकू केन्द्रस्थ इस हृद्य प्रजापति का स्वरूप ऐसी व्यक्ता वाक् से कदापि स्पष्ट नहीं हो सकता । इसी सहजसिद्ध तत्त्व के आधार पर प्रजापति के स्वरूप - प्रदर्शन के लिए अनिरुक्तभावप्रधान वाग्व्यवहार ही उपयुक्त मानें गए हैं । ' क ' कार अनिरुक्तभाव का ही संग्राहक है । ' कौन ' इस शब्द से अव्यक्तभाव ही प्रतिध्वनित । इसी श्रव्यक्तमाव के अनुबन्ध से अनिरुक्त प्रजापति का साङ्केतिक नाम मान लिया गया है – ' क ' ( ककार ) । कः प्रजापति?, इस प्रश्न का यदि अनिरुक्त भाव से सम्बन्ध है, तो उत्तर भी ' कः प्रजापतिः ' ही होगा । ४५ – उत्तरगर्भित प्रश्नों का रहस्यात्मक समन्वय— हिरण्यगर्भः समवतताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ' - यजुः संहिता २५ | १० | इत्यादि यजुर्म्मन्त्र के ‘ कस्मै देवाय हविषा विधेम ' इस प्रश्न का उत्तर भी यही होगा । प्रश्नदशा में ‘ कस्मै ' का अर्थ होगा ‘ किस के लिए हम आहुति प्रदान करें?, ' एवं उत्तरदशा में ' कस्मै ' का अर्थ होगा-" ककार व्याहृति - युक्त प्रजापति के लिए हम आहुति प्रदान कर रहे हैं " यह । यही उत्तरगर्भिता प्रश्नश्रुति कहलाएगी, जिसका सुप्रसिद्ध केनोपनिषत् में विस्तार से उपबृंहण हुआ है । केनेषितं पतति प्रेषितं मनः- अर्थात् किस से प्रेरित होकर हमारा इन्द्रिय मन विषयानुगत बनता है? इस प्रश्न का उत्तर भी ' केनेषितं पतति प्रेषितं मनः ' - ही है, जिसका अर्थ है - ' ककार ' नाम की अनिरुक्ता व्याहृति से समन्वित हृदयस्थ अनिरुक्त अन्तर्य्यामी प्रजापति की प्रेरणा से ही हमारा मन स्वव्यापार में समर्थ बनता है । ठीक यही स्थिति ' किंस्विद्वनं क उ स वृक्ष आस ' इत्यादि उत्तरगार्मित प्रश्नात्मक मन्त्र के साथ समन्वित है । वह कौन सा वन था?, प्रश्न का उत्तर होगा वह अनिरुक्त, अतएव ' किं ' रूप ही वन था । इसी प्रश्नात्मक मन्त्र का तैत्तिरीय ब्राह्मण में प्रश्नोत्थानपूर्वक जो समाधान हुआ है, वहाँ भी अनिरुक्तात्मक अनुगमभाष का ही प्राधान्य है । लक्ष्य बनाइए उस समाधान मन्त्र को भी । ब्रह्म वनं, ब्रह्म स वृक्ष आस यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । 2! मनीषिणो मनसा विब्रवीमि वो ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥ ४६ – ‘ ब्रह्मवनं ० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ समन्वय— — तै ० ना ० । " ब्रह्म ही वह बङ्गल था, ब्रह्म ही वह वृक्ष था, जिससे काट - छाँट कर यह विश्वभवन बन गया । हे विद्वानो! मैं अपने मन से ही यह स्पष्ट कर रहा हूँ कि, ब्रह्म ने हीं इन भुवनों को अपने आधार पर धारण ६१

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 327 का मूल पृष्ठ
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शतपथभाष्य कर रक्खा है ” | जैसा ‘ क ' वैसा ' ब्रह्म ' | ' मनसा पृच्छतेदु ', एवं ' मनसा विब्रवीभि वः ' दोनों हीं वाक्य मनःप्रधान अनिरुक्त - अव्यक्त - भाव की ओर ही सङ्क ेत कर रहे हैं । यहीं वह प्रश्न उपस्थित हुआ था कि, क्या यहाँ के ब्रह्म शब्द भी क्षरब्रह्मात्मक ब्रह्मविज्ञान के वाचक हैं? । एवं हमनें कहाँ था कि नहीं, सर्वथा नहीं । क्यों १ । इसलिए कि वनब्रह्म भिन्न वस्तुतत्त्व है, वृक्ष ब्रह्म भिन्न वस्तुतत्त्व है, एवं कटा छँटा ब्रह्म पृथक् ही तत्त्व है । यह तीसरा ब्रह्म ही क्षरब्रह्म है, जो वृक्षब्रह्म का एक अल्पतम प्रत्यंश है । एवं स्वयं ' ब्रह्मवृक्ष ' जिस की दृष्टि से अल्पतम प्रत्यंश है, वही पहिला ' किस्विद्वनं ' वाला वनब्रह्म है । अव्यय से विभिन्न विश्वातीत परात्परब्रह्म ही ' वनब्रह्म ' है, जिसे निरपेक्ष शुद्ध ज्ञानघन माना गया है | ' ब्रह्मवनम् ' यह वाक्य जब भी हम बोलते हैं, एक निःसीम भाव की ओर हमारा ध्यान आकर्षित हो जाता है । अनन्त विस्तारात्मक जङ्गल हमारी प्रज्ञा को थका देता है । यही स्थिति परात्पर की है । अतएव उसे ' वन ' कहा जासकता है, जिससे अव्यय भी श्रभिन्न है । एवं इस दृष्टि से समझने मात्र के लिए इसे हम ' वन ' कह सकते हैं । यहाँ मानव की बुद्धि परिसमाप्त है | अतएव ' यो बुद्ध: परतस्तु सः ' रूप से इस वनब्रह्म से समतुलित अव्ययब्रह्म को बुद्धिसीमा से संस्पृष्ट मान लिया गया है 1 ।. इसी प्रकार जब ' ब्रह्म स वृक्ष आस ' का उच्चारण करते हैं, तो हमारा प्रज्ञाक्षेत्र किसी सीमापर्य्यन्त सीमाभाव की थाह पा लेता है । विश्व का मूलप्रकृतिरूप अक्षर ही वह ब्रह्म है, जिसे विश्वसीभानुबन्ध से ‘ बृक्ष ' कह दिया जासकता है । इस अक्षररूप वृक्षब्रह्म का कटा - छँटारूप व्यक्त क्षरब्रह्म ही हो सकता है, जो अपने विस्रस्त - प्रवर्ग्य - भाग से विश्वभुवनों का निर्माण कर - ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' रूप से विश्वाधार बन रहा है । यही - ' ब्रह्माध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ' लक्षण तीसरा व्यक्त क्षरब्रह्म है । तदिस्थं तीनों ब्रह्म-विवर्त्तो का संग्रह करते हुए वेदमहर्षि ने समस्त ब्रह्मवैभव का अवारपारीणस्वरूप आप के सम्मुख रख दिया । आप समन्वय कीजिए इन सर्वथा विभक्त ब्रह्मतत्त्वों का परिभाषाओं के आधार पर कि इन में वन ब्रह्म कौन सा है? अश्वत्थवृक्षरूप वृक्षब्रह्म कौनसा है?, एवं इस वृक्ष का कटा छँटारूप कौन सा है? | यह समन्वयभाव आप की प्रज्ञा पर अवलम्बित है । स्थिति का थोड़ा ओर स्पष्टीकरण कर लिया जाय । स्पष्ट है कि मन्त्र का ' ब्रह्म ' शब्द विभक्तरूप से त्रिसंस्थानुबन्धी ही प्रमाणित हो रहा है । ' ब्रह्मवनम् ' जहाँ ऋषि यह कहेंगे, वहाँ उस विशाल जङ्गल को लक्ष्य बनाते ही आप की बुद्धि थक जायगी । एवं इस थका देने वाले ' वन ' शब्द से बुद्धि से परे रहने वाले विश्वातीत श्रनन्त की ओर स्वतः एव आपका ध्यान आकर्षित हो जायगा । क्योंकि ' वन ' शब्द परात्यराव्यय से समतुलित - सा शब्द है । इधर वृक्ष का सीमित आकार आपके प्रज्ञाक्षेत्र में ऋजुभाव से ही खचित हो पड़ता है | आगे चलिए | किन्तु इस सम्पूर्ण वृक्ष का उपयोग तो सर्वात्मना सम्भव नहीं है । अतएव मान लेना पड़ेगा कि, वन, और वृक्ष दोनों हीं उपयोग की सीमा से बहिर्भूत हैं, संस्पृष्ट हैं । अतएव च श्रश्वम्थमूर्त्ति महामायी विश्वेश्वर है तो सही, उसकी सचा तो हमें स्वीकृत | किन्तु हम अपने व्यवहारात्मक - श्राचारभावा-म - कर्म्मकाण्ड में कैसे इस का ग्रहण करें?, यह समस्या हमारे सम्मुख उपस्थित हो जाती है । उसी का यह समाधान है कि, उप्त अश्वत्थब्रह्म का लक्षण हो कर प्रवर्ग्यात्मक जो उच्छिष्ट भाग हमें उपलब्ध होता है, एकमात्र वही भूतसंस्था का मूलाधार बन पाता है, जो कि उच्छिष्टात्मक तत्त्व ' यज्ञोच्छिष्ट ' कहलाया है, एवं-‘ उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वम् ' रूप से अथर्व ने जिसे भौतिक विश्व का उपादान माना है । एवं जिस प्रवर्ग्यात्मक ‘ यज्ञोच्छिष्ट ' का यशोवर्णन करते हुए भगवान् ने कहा है कि- ' यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ' ( गीता ३ १३। ) । ६२

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पारिभाषिक सूचनाएँ ४७ - तात्त्विक रहस्यार्थगभित वेदशब्द-यह तक्षणभात्र ही क्योंकि हमारी भूतसंस्था का उपयोगी है, एवं ऐसा तत्त्व - ' तरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार ' क्षरब्रह्म ' ही हो सकता । यह समन्वय तो इतना स्पष्ट है कि, यदि मानव अवधानपूर्वक थोड़ा प्रज्ञा से काम ले, तो सम्पूर्ण समन्वय स्वयं उसके सम्मुख उपस्थित हो पड़ता है । क्योंकि वेदपुरुष तो— ' उतो त्वस्मै तन्वं विसत्रे - जायेव पत्ये उशती सुवासा ' रूप से स्वयं ही तत्त्वचिन्तक प्रज्ञाशीलों के लिए व्यक्त कर दिया करते हैं अपना रहस्यात्मक तात्त्विक स्वरूप । इसके लिए कभी भी व्याख्यान्तर के प्रति अनुधावन की कोई आवश्यकता नहीं हैं । स्वयं यही ऐसा ऋजुशास्त्र है, प्रसादगुणयुक्त ऐसा प्राञ्जल शास्त्र है कि, शुद्धबुद्धि से, तत्त्वनिष्ठा विमलबुद्धि से पारिभाषिक समन्वयपूर्वक यदि कोई द्विजातिमानव इसको शरण में जाता है, तो यह स्वयं अपना स्वरूप अभिव्यक्त कर दिया करता है । इसलिए तो हमारी न केवल मान्यता ही है, अपितु ऐसी दृढ़ श्रास्था है कि, वेदशास्त्र के समन्वय के लिए किसी भी भाष्य - व्याख्या - आदि की कोई अपेक्षा नहीं है । वेद स्वयं ही अपनी व्याख्या है | वेदशब्द स्वयं हीं सम्पूर्ण तात्त्विक व्याख्याएँ स्वगर्भ में निहित रख रहे हैं । ४८ - त्रिधारात्मक ' ब्रह्मविज्ञान ' का स्वरूप - समन्वय-अलमतिपल्लवितेन प्रासङ्गिकेतिवृत्तेन । अत्र हमें ब्रह्मविज्ञान, तथा यज्ञविज्ञान, इन दोनों शब्दों को अपनी प्रक्रान्त चर्चा का केन्द्र बना लेना चाहिए, एवं इसी आधार पर विज्ञानशब्द के समन्वय - प्रयास प्रवृत्त हो जाना चाहिए | ' ब्रह्मविज्ञान ' के ' ब्रह्म ' शब्द का अर्थ पूर्व सन्दर्भानुसार, ' क्षरब्रह्म ' हुआ | तो क्या क्षर की यह शक्ति है कि, वह अपने से अभिन्न अक्षर, तथा अव्यय को छोड़ कर स्वयं स्वतन्त्र रूप से रह सके? | क्या मान लेंगे आप ऐसा? | नहीं । जिस प्रकार यज्ञ ब्रह्म को छोड़ कर क्षणमात्र भी स्वस्वरूप से समन्वित नहीं रह सकता, एवमेव क्षरात्मक ब्रह्म भी अक्षर और अव्यय की उपेक्षा कर एक क्षण भी स्वस्वरूप से व्यवस्थित - प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । क्या तात्पर्य्य निकला इस वाक्यसन्दर्भ से १ | केवल ' क्षरविज्ञान ' का ही नाम ' ब्रह्मविज्ञान ' नहीं है । अपितु यह क्षरविज्ञान नित्यसापेक्ष अपने तथा अव्यय, श्रन्क्षर के साथ समन्वित होकर तीन अवान्तर धाराओं में परिणत होकर ही आपके सम्मुख उपस्थित हो सकेगा, जिसका निष्कर्षार्थ यह निकलेगा कि - " अव्ययविज्ञान - अक्षर विज्ञान एवं क्षरविज्ञान, इन तीनों विज्ञानों का समन्वितरूप ही ब्रह्मविज्ञान है " । निष्कल परात्पर से भिन्न पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल क्षर, इन सोलह कलाओं से कृतरूप अव्यय - अक्षर - क्षरात्मक इत्यंभूत सर्वात्मक ब्रह्मविज्ञान को ही ' षोडशीपुरुष ' कहा जायगा. यह षोड़शीपुरुष ही ' प्रजापति ' कहलाएगा, प्रजापतिविज्ञान ही ' ब्रह्मविज्ञान ' कहलाएगा, एवं इस प्रजापतिरूप ब्रह्मविज्ञान को आधार मान कर यज्ञविज्ञान का प्रतिपादन करने वाला शास्त्र ही ‘ प्राजापत्यशास्त्र ' कहलाएगा, और इसी प्राजापत्यशास्त्र को हम ' वेदशास्त्र ' कहेंगे, जिसकी सीमा में त्रिधारात्मक ब्रह्मविज्ञानात्मक ज्ञान, तथा अनेकधारात्मक विज्ञान यथास्वरूप - यथानुरूप सुव्यवस्थित बने हुए हैं । ४६ - ब्रह्मविज्ञानाधार पर प्रतिष्ठित यज्ञविज्ञान — ब्रह्मविज्ञान का संक्षिप्त निदर्शन आपके सम्मुख उपस्थित किया गया । अत्र दो शब्दों में ब्रह्मविज्ञान के श्वाधार पर प्रतिष्ठित विश्वविज्ञानात्मक यज्ञविज्ञान का समन्वय कर लेना भी प्रासनिक ही माना बायगा । ६३

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शतपथभाष्य अव्ययविज्ञान के आधार पर प्रतिष्ठित अक्षरविज्ञान के द्वारा क्षरविज्ञान के माध्यम से जो कोई और नवीन विज्ञान उत्पन्न होगा, उसे ही यहाँ ' यज्ञविज्ञान ' कहा जायगा । वस्तुतत्त्व का समन्वय उतना सरल नहीं है,. जितना कि प्रश्न का स्वरूप सरल है । इसी प्राजापत्यविज्ञान के स्वरूपान्वेषण के लिए महर्षि भरद्वाजादि ने श्रपनी वरप्राप्त श्रायु के चार सौ वर्ष समाप्त किए हैं । तथापि - ' स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ' न्याय से बहुत सम्भव है भारतीय श्रार्षप्रज्ञा आज भी इस दिग्दर्शन के द्वारा अपने उस चिरन्तन शाश्वत सत्य की ओर आकर्षित हो सके, जिस आकर्षण के बिना इसका कोई भी स्वरूप शेष नहीं रह जाता । ५० - स्वाध्याय निष्ठानुगतमात्र प्राजापत्यशास्त्र-— स्म्भवत: इसी उद्देश्य को लक्ष्य में रखते हुए संस्थान के यशस्वी मन्त्री श्रीवासुदेवशरण महाभाग ने संस्थान के षाण्मासिक ज्ञानसत्रों में इसप्रकार के प्रश्नोत्तर- विमर्श के लिए बलपूर्वक हमें प्रवृत्त किया है । स्पष्ट है कि यह पद्धति कोई विशिष्ट पद्धति नहीं है । अपितु इस पद्धति का तो मनःशरीरभावप्रधाना आस्तिकप्रजा के तात्कालिक उपलालनों से सम्बन्ध रखने वाली अनुरञ्जनभावप्रधाना पौराणिकी कथाशैली से ही प्रधान सम्बन्ध है । प्राजापत्यशास्त्र कदापि इत्थंभूता श्रापातरमणीया शैली से गतार्थ नहीं बन सकता । यहाँ तो अनन्य निष्ठानुगत चिरन्तन स्वाध्याय ही एकमात्र शरणीकरणीय है । अजस्र तप, तथा श्रम के द्वारा अध्यवसायपूर्वक जरामर्य्यसत्त्रवत् यावज्जीवन प्रक्रान्त रहने वाली स्वाध्यायनिष्ठा ही इस दिशा में वास्तविक तत्त्वसमन्वयानुगता मानी गई है, जबकि इसके सन्बन्ध में भी इस जन्म में, अथवा तो उत्तरजन्म में - कब समन्वय-संसिद्धि प्राप्त होगी?, प्रश्न अचिन्त्य ही बना रहता है- ' अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ' - ' बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते ' । ५१ - भौम ब्रह्मा के द्वारा ब्रह्मसिद्धान्त की प्रतिष्ठा-जैसाकि स्पष्ट किया गया है - ब्रह्मविज्ञान को मूल में प्रतिष्ठित किए बिना यज्ञविज्ञान, एवं तदनुप्राणित भूतविज्ञान निर्माण तथा संरक्षण के स्थान में ध्वंस - विनाश का ही कारण बन जाता है । ऐसा ही कुछ घटित विघटित हो पड़ा था देवयुगात्मक वेदयुग से भी पूर्व के साध्ययुगों में । भूतविज्ञानकौशल की चरम सीमा पर पहुँच जाने वाली तद्य ग की साध्यजाति ने ब्रह्मविज्ञानप्रतिष्ठा की उपेक्षा कर, किंवा उससे अपरिचित रह कर यज्ञ को ही विश्वस्वरूप का अन्यतम महान् एकमात्र आधार मानते हुए यज्ञ से ही यज्ञ का वितान - विस्तार आरम्भ कर देने की महती भ्रान्ति कर डाली थी, जिसका - ' यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ' इत्यादि से स्पष्टीकरण हुआ है । उसी का वह दुष्परिणाम हुआ था कि, अन्ततोगत्त्वा विशुद्ध भूतविज्ञान में आसक्ता श्रभिनिविष्टा वह जाति इन भूतविज्ञान विजृम्भणों के सर्वस्वसंहारक क्रव्यादाग्नि में ही आहुत हो गई । जो शेष बचे रह गए, उन्हें भगवान् ब्रह्मा के द्वारा यह सहज उद्बोधन सूत्र उपलब्ध हुश्रा कि- “ क्योंकि तुमने यज्ञात्मक क्षणिक क्षरविज्ञान को ही सर्वस्व मानते हुये तदाधारभूत ब्रह्मविज्ञान की उपेक्षा की थी । अतएव ज्ञानप्रतिष्ठाशून्य तुम्हारा यह भूतविज्ञान तुम्हारे सर्वनाश का ही कारण बन गया । इसी ब्यामोहन में आसक्त - व्यासक्त - मना बने रहने के कारण तुम अपने श्राधार - शून्य विज्ञान के द्वारा किसी भी अभ्युदय - निःश्रेयस् - प्रवर्त्तक निश्चित लक्ष्य के अनुगामी न बन सके । अपितु सृष्टिस्वरूप - समन्वय के लिए ६४

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 330 का मूल पृष्ठ
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पारिभाषिक सूचनाएँ अनवरत व्यग्र बने रहने वाले तुम विज्ञानाभिनिविष्टों ने कभी पानी को विश्व का मूल माना, कभी अहोरात्र को मूल माना, कभी आकाश को मूल बतलाया, कभी सत् को, तो कभी असत् को, कभी सदसत् दोनों की घोषणा की । कभी रजोगुण को मूलप्रवर्त्तक मान बैठे । कभी श्रावरणात्मक तम को ही कारण बतलाने लग पड़े | तो कभी सापेक्षवादमूलक अपरभाव ही तुम्हारी दृष्टि में सृष्टि का मूल बन बैठा । इसप्रकार ब्रह्मप्रतिष्ठा से वञ्चित इन अम्भोवाद - अहोरात्रवाद - व्योमवाद - सद्वाद - असद्वाद् - सद्सद्वाद् - रजे वाद - आवरणवाद - अपर-वाद - आदि आदि विविध वादों का अनुगमन करते हुए तुम इतस्तत: दन्द्रम्यमाण ही बने रहे । हम चाहते हैं कि, श्रत्र तुम सर्वाधारभूत ब्रह्मविज्ञानात्मक सिद्धान्तवाद को ही अपने इन विविध विज्ञानवादों की मूलप्रतिष्ठा बनाओ, जिस आधार के द्वारा सम्पूर्ण नानावाद सुसमन्वित बन जाया करते हैं । एव उस दशा में मृत्युमय भी ये विज्ञानवाद अमृतनिप्पत्ति के कारण प्रमाणित हो जाया करते हैं । यही ब्रह्मविज्ञानात्मक सिद्धान्तवाद विज्ञानवाद के अन्त हो जाने पर आगे प्रक्रान्त होने वाले वेदयुगात्मक देवयुग में प्रतिष्ठित हुआ, जिस इस रहस्यपूर्ण भारतीय इतिवृत्त के संस्मरण से भी आजकी भारतीय प्रज्ञा पराङ्मुख बन चुकी है । ५२ - विश्वेश्वर, विश्वकर्त्ता, विश्वात्मा, शब्दों का समन्वय— - यज्ञविज्ञान के आधारभूत ब्रह्मविज्ञान के समन्वय के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा जा चुका । उपबृंहण-मात्र ही ब्रह्म का समन्वयार्थ है । एक ही तत्त्व का तीन धाराओं में विभक्त हो जाना हीं उसका उपबृंहण है । एवं यही उपबृ ंहण ब्रह्म का ' ब्रह्मत्त्व ' है । ' आत्मा उ एकः सन्नेतत् त्र्यम्, -त्रयं सदेकमययात्मा ' इत्यादि श्रौत सिद्धान्तानुसार एक का तीन भाव में परिणत होते हुए भी एक ही भाव में विद्यमान रहना ब्रह्म का ब्रह्मत्त्व है । तात्पर्य यही हुआ कि एक ही मौलिक तत्त्व का साक्षी, निमित्त एवं उपादान, इन तीन रूपों में परिणत हो जाना हीं उस तत्त्व का उपबृंहण है, जिसे दर्शनभाषा में ' विवर्त्त ' ' कहा गया है, पारिभाषिक दृष्टि से जो विवर्त ' - ' विभूति ' - ' महिमा ' -आदि नामों से उपवर्णित है । अव्ययब्रह्म की अपेक्षा से सम्पूर्ण विश्व उस ग्रव्ययब्रह्म की साक्षी में प्रतिष्ठित है । किंतु यह साक्षीभूत अव्ययब्रह्म न तो विश्व का निमित्त है, न कर्त्ता है । अर्थात् न तो यह समवायी कारण ही चनता, एवं न उपादानकारणात्मक समवायीकारण ही बनता, जैसा कि - ‘ न तस्य कार्य्यं करणञ्च विद्यते, न तत् समश्चाभ्यधिकश्च श्रूयते ' - ' न करोति-न लिप्यते ' इत्यादि श्रौत - स्मार्त्त वचनों से प्रमाणित है । अक्षरब्रह्म विश्व का निमित्तकारण बनता है, जैसा कि - ' तथा अक्षराद्विविधाः सौम्य! भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ' से स्पष्ट है । एवं त्तीसरा क्षरब्रह्म विश्व का उपादानकारण बनता है, जैसा कि - ' ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' - ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ’ इत्यादि श्रुति स्मृति से प्रमाणित है । ब्रह्मविज्ञानान्तर्गत विश्वसाक्षी अव्यय, विश्वनिमित्त अक्षर, एवं विश्वोपादान क्षर, तीनों विभिन्न ब्रह्मों के लिए क्रमशः - विश्वेश्वर- विश्वकर्त्ता विश्वात्मा ये तीन पारिभाषिक नाम लक्ष्यारूढ करने पड़ेंगे, जो उपनिषदों में यत्र तत्र समन्वित हैं । ' यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईवश्रः ' के अनुसार साक्षी अव्यय ही ' विश्वेश्वर ' कहलाएगा | ' ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ' के अनुसार निमित्त अक्षर ' विश्वकर्त्ता ' माना जायगा, एवं - ' ब्रह्माध्यतिष्ठद्भुवनानि धारयन् ’ – ‘ विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ' इत्यादि रूप से उपादान क्षर को ' विश्वात्मा ' कहा जायगा । ६५