Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 351–360

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 351–360

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शतपथमाष्य ८५- ' ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् ' का अनुगमात्मक समन्वय— सैषा समतुलनस्थितिः । स्थितस्य गतिश्चिन्तनीया - ज्ञान - विज्ञान - शब्दार्थसमन्वयदृष्ट्या -एवं - रूपेण । इस अवधेय दृष्टिकोण से पूर्व हमने ' ब्रह्मविज्ञान, यज्ञविज्ञान ' रूप से दो विज्ञानधाराओं का ही स्वरूपदिग्दर्शन कराया था, जबकि इन दोनों धाराओं के आदि में आत्मतत्त्व, एवं अन्त में भूतभाव, ये दो विवर्त्त ' प्रस्तुत दृष्टिकोण के द्वारा और उपस्थित हो जाते हैं । अतएव अब इन चारों की दृष्टि से ही हमें ज्ञान, तथा विज्ञान-शब्दों के समन्वय में प्रवृत्त होना पड़ेगा । ब्रह्मविज्ञान को यज्ञविज्ञान की दृष्टि से पूर्व में ' ज्ञान ' कहा गया है, एवं यज्ञवज्ञान को तदपेक्षया ' विज्ञान ' कहा गया है । और इसी दृष्टिबिन्दु के माध्यम से ' ज्ञान तेऽहं सविज्ञानम् ' इत्यादि श्लोकार्थ का समन्वय किया गया है । अत्र चारों विवर्त्त भावों के माध्यम से हमें इसी अनुगमश्लोक का समन्वय देखना है | = ६ - अन्यदेव विदितात्, अथो विदितादधि-सर्वान्तरतमतम सुसूक्ष्मतम अव्ययब्रह्मप्रधान श्रात्मा विशुद्ध ज्ञानात्मक है, यह पूर्व के ब्रह्मविज्ञान-लरूपनिरूपण प्रसङ्ग स्पष्ट किया जा चुका है । अत: इस प्रथम आत्मपर्व को तो हम सम्पूर्ण विज्ञान सीमाओं । परीक्षणसीमाओं से सर्वथा पृथक् हीं मानेंगे | उस विज्ञाता का विजाननात्मक विज्ञान सर्वथा असम्भव है, श्रतएव वह हमारी ज्ञान - विज्ञानसीमाओं से सर्वथा परे की वस्तु है - ' विज्ञातारमरे वा केन विजानीयात्-यस्मामतं - तस्य मतं, मतं यस्य, न वेद सः । श्रविज्ञातं विजानता, विज्ञातमविजानताम् - संविदन्ति न यं वेदाः, विष्णुर्वेद न वा विधिः, यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ' इत्यादि श्रौत उद्घोष उसकी इस ज्ञान विज्ञानसीमा के पार्थक्य का ही समर्थन कर रहे हैं । जबकि शब्द की वहां गति ही नहीं, तो वेदशास्त्र उसका कैसे विश्लेषण कर सकता है? । केवल समझने - समझाने - मात्र के लिए उसे ' ज्ञान ' नाम से व्यवहृतमात्र कर दिया जा सकता है । इसी आधार पर हम उस श्रात्मदेव के लिए ' ज्ञान ' अभिधा की घृष्टता कर लेते हैं, जबकि तत्त्वतः उसके साथ किसी भी अभिधा का कोई भी सम्बन्ध नहीं है । ' अन्यदेव विदितात, अथो अविदितादृद्धि ' का यही रहस्यात्मक दृष्टिकोण है । ८७ —– ब्रह्म - यज्ञ - भूतरूपा विज्ञानधारात्रयी— अब शेष रह जाते हैं ब्रह्म - यज्ञ - भूत नामक तीन पर्व । ये तीनों पर्व वेदशास्त्र में विस्तार से निरूपित, अतएव ' ज्ञातव्य ' कहे जा सकते हैं । इसी विजाननात्मक - ज्ञातव्यात्मक - विज्ञान भाव के अनुबन्ध से इन तीनों के साथ ' विज्ञान ' शब्द का समन्वय मानते हुए तीनों को ' ब्रह्मविज्ञान - यज्ञविज्ञान - भूतविज्ञान ' इन नाम से व्यवहृत किया जा सकता है । एवं यहाँ आकर अब यह कहा जा सकता है कि, आत्मब्रह्म के आधार पर पूर्व पे जिन दो विज्ञानधाराओं का उपक्रम हुआ था, वस्तुतगत्या उनका विश्राम इन तीन विज्ञानधाराओं पर ही हो रहा है, जो क्रमशः ' अक्षर विज्ञान - क्षरविज्ञान - विश्वविज्ञान ' इन नामों से, तथा ' प्रकृतिविज्ञान-प्रकृतिविकृतिविज्ञान - विकारविज्ञान- इन नामों से भी व्यवहृत की जा सकतीं है । ज्ञानैकघन श्रात्मदेव जहाँ ‘ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इस श्रुति का लक्ष्य है, वहाँ - ' नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म ' इस श्रुति से त्रिधारात्मिका ब्रह्म - यज्ञ - भूत - विज्ञानत्रयी का ही संग्रह हो रहा है । ८६

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पारिवाषिक सूचकाएँ * ज्ञानात्मा – अनन्तं ब्रह्म १ –ब्रह्म ( अक्षरविज्ञानम् - प्रकृतिविज्ञानं वा ) - ब्रह्मविज्ञानधारा २ – यज्ञः ( क्षरविज्ञानम् — प्रकृतिविकृतिविज्ञानं वा ) - यज्ञविज्ञानधारा ३- भूतम् ( विश्वविज्ञानम् - विकारविज्ञानं वा ) - भूतविज्ञानधारा ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इत्याद्दुर्वैज्ञानिका महर्षयः : -त्रिविध विज्ञानधाराओं का आचारात्मक समन्वय— ८८-क्या तात्पर्य है हमारा इन तीन विज्ञानधाराओं से? । एवं क्या उपयोग है इन तीन धाराओं का भारतीय मानव की उपयोगिता की दृष्टि से १ । जब हम पारिभाषिक दृष्टिकोण के आधार पर इन तीन विज्ञान-धाराओं के अर्थसमन्वय में प्रवृत्त होते हैं, तो इन तीनों के आधार पर क्रमशः ज्ञानधारा, उपासनाधारा, कर्म्मधारा, इन तीन अनुगमनीया धाराओं की ओर हमें आकर्षित हो जाना पड़ता है, जिन इन तीनों धाराओं की सीमा में भारतीय श्रास्तिक मानव के ज्ञान - विज्ञान - कर्म्म - उपासना - भक्ति - धर्म्म - श्राचार - यज्ञ - आदि श्रादि यच्चयावत् विभूतिभाव अन्तर्भूत हो रहे हैं । ब्रह्मविज्ञान ही भारतीय ज्ञानकाण्ड का आधार माना गया है, यज्ञविज्ञान ही भारतीय उपासनाकाण्ड का अवलम्ब माना गया है । एवं भूतविज्ञान ह्रीं भारतीय कर्म्मकाण्ड का आश्रय माना गया है । मानव की स्वरूपसंस्था में उसका शरीर - मन - बुद्धि - ये तीन हीं तो पर्व ऐसे हैं, जिनको दृढता - स्थिरता - विकास से मानव अभ्युदय का अधिकारी चना करता है | शरीरानुगता दृढ़ता, तन्मूलक अभ्युदय भूतविज्ञानाधार पर प्रतिष्ठित रहने वाले ' कर्म्मकाण्ड ' पर अवलम्बित है । मनोऽनु-गता स्थिरता, तन्मूलक अभ्युदय यज्ञविद्या के आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाले ' उपासनाकाण्ड ' पर अवलम्बित है । एवं बुद्धयनुगता, स्थिरता, तन्मूलक अभ्युदय ब्रह्मविज्ञान के प्राधार पर प्रतिष्ठित ज्ञानकाण्ड पर अवलम्बित है । यों भारतीय मानव अपनी तथाकथित तीनों विज्ञानधाराओं के अनुग्रह से तदनुप्राणित ज्ञान- उपासनः कर्म्म का अनुगमन करता हुआ । सर्वविध सर्वाङ्गीण अभ्युदय से भी समन्वित हो जाया करता है, एवं तद्द्द्वारा ही इसका स्वतःसिद्ध आत्मनिबन्धन निःश्रेयसभाव भी अक्षुण्ण बना रहता है । और यही भारतीय मानव की ज्ञानविज्ञान निबन्धना अभ्युदय निःश्रेयसमूला सर्व शान्ति - समृद्धि - ऋद्धि- पुष्टि - तुष्टि का वह चिरन्तन इतिहास है, जिसे विस्मृत कर आज यह शरीर से दृढ - मन से अस्थिर बुद्धि से अविकसित, तथा श्रात्मना अशान्त प्रमाणित रहता हुआ ही इत्तस्तत: दन्द्रम्यमाण है, एवं जिस इत्थंभूता इत्तस्ततः दन्द्रम्यमाणा पक्ति में हीं हमारा भी नाम सन्निविष्ट है 1 । ऐसी स्थिति में हम क्या तो समाधान करने की क्षमता रखते हैं इन तीनों धाराओं की उपयोगिता के सम्बन्ध में, एवं क्या क्षमता रखती है श्राज की मादृश ही भारतीय प्रजा इनको सुन कर तदनुपात से कुछ कर सकने की? ।

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शतपथभाष्य ८६- बुद्धिमनःशरीरामुगता निष्टात्रयी के अभिभव से भारतीय आचारत्रयी की विलुप्ति-जिस राष्ट्र की ब्रह्मविज्ञानात्मिका प्राजापत्यशास्त्रसम्मता बुद्धयनुगता मौलिक सहज ज्ञानधारा विविध दर्शनवादात्मिका शून्य - क्षण - स्वलक्षण - भाव- निबन्धना - श्रात्मप्रतिष्ठाशून्या - नास्तिसाग - कल्पित - सत्य-अहिसादि - भावसमन्विता बुद्धिविकासप्रतिबन्धिनी अज्ञानधाराओं से दुर्भाग्यवश सर्वात्मना जिस आज के युग में अभिभूत हो गई हो, जिस राष्ट्र की यज्ञविज्ञाननिबन्धना मनोऽनुगता - संवर - परिमर - पर्य्यङ्क - प्रवर्ग्य-उद्गीथ - चाक्षुषपुरुष - आदि आदि तत्त्वभावसमन्विता शक्तिको प्रवाहशीला सहज उपासनाधारा भावुकतावश विविध मतवाद - सम्प्रदायवाद - सन्तवादात्मिका - झञ्झातालमृदङ्गवाद्यादि -- समाकुलिता - गन्धर्व्वाप्सराप्राणानु-रञ्जिता प्रज्ञास्थिरताप्रतिबन्धिनी भक्तिधाराओं से जिस आज के युग में सर्वात्मना काल्वालीकृता प्रमाणित हो चुकी हो, एवं जिस राष्ट्र की भूतविज्ञाननिबन्धना शरीरानुगता प्रकृतिसिद्ध यज्ञविज्ञानाधारेण व्यवस्थिता सर्वविध लौकिक - इष्टफल - प्रदानसमर्था राष्ट्रीय भौतिक ऐश्वर्य्यप्रदात्री कर्म्मधारा अविद्यास्मिताभिनिवेशरागद्वेषवश विविध कर्म्म - विकर्म्म, विविध - कल्पित - श्रश्रुतपूर्व वादात्मक उत्पथ कर्म्मधाराओं से जिस आज के यग में एकान्ततः अवरुद्ध हो गई हो, इत्थंभूत दुर्भाग्यपूर्ण - भावुकता क्रान्त - श्रभिनिविष्ट युग में भारतीय ज्ञान - उपासना - कर्म्म- धाराओं के चिरन्तन इतिहास के सम्बन्ध में, तथा तन्मूलका ब्रह्म - यज्ञ -भूत-विज्ञानधाराओं के सम्बन्ध में, इनकी उपयोगिता के सम्बन्ध में इन्हीं वर्त्तमान युगभावों से आलोमभ्यः-आनखाग्रेभ्यः आपादमस्तक - आक्रान्त यह जन क्या कहे, कैसे कहे, किन से कहे, जब कि - श्राज को इस विभीषिका में - ‘ किं करोमि, क्व गच्छामि, को वेदानुद्धरिष्यति ' रूपा इसकी इस आर्त्तवाणी के प्रति स्वनामधन्य प्रातःस्मरणीय श्री श्रीकुमारिलभट्टपाद जैसा एक भी तो प्राच्यसंस्कृतिनिष्ठ तद्रूप से ही आत्मोत्सर्ग कर देने वाला श्राश्वासनप्रदाता अद्यावधि भी तो इसे उपलब्ध नहीं हुआ । कालाय तस्मै नमः ‘ किं कस्मै कथनीयं, कस्यः मनः प्रत्ययो भवतु ' । ० - वेदशास्त्र की ' परा ', ' अपरा ', विद्याएँ-I अतएव उचित था कि, इस विज्ञान शब्द- समन्वय - प्रसङ्ग को अत्रैव उपरत कर दिया जाता! किन्तु? आश्वासन की एकमात्र आश्रयभूमि- ' उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा-कालोह्ययं निरवधिर्विपुलचा च पृथिनी ' इस कवि ' क्त की प्रेरणा से अपनी अज्ञता से अभिभूत रहते हुए भी हमें प्रक्रान्त अवधेय समन्वय के सम्बन्ध में किञ्चिदिव निवेदन करना हीं पड़ रहा है । ब्रह्मविज्ञानात्मक प्रकृतितत्त्वविज्ञान वैसा मौलिक तत्त्व है, जिसका श्राचारात्मक कर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है । अतएव इस ब्रह्मविज्ञानात्मक मौलिक विज्ञान का ' ज्ञान ' में हों अन्तर्भाव हो जाता है, जिसे कि उपनिषदों नें- ' अथ परा, यया तदक्षरमधिगम्यते ' इत्यादि रूप से ' पराविद्या ' कहा गया है । ' आत्म ' स्वरूप विशुद्ध - निरपेक्ष-ज्ञानैकघन अव्ययब्रह्म से भिन्न अतएव यत्र तत्र ' अव्यय ' नाम से भी व्यवहृत, ' क्षरब्रह्म ' नामक भूतयोनि का आधार भूत, अतएव एतन्नाम से भी उपस्तुत ब्रह्मविज्ञानात्मक सापेक्षज्ञानमूर्ति पराविद्यामय इस अक्षरब्रह्म की इसी सूक्ष्मतमा स्थिति को परीक्षात्मक विज्ञान से पृथककरण करने के लिए ही श्रुतिने कहा है-यत्तदक्षरं– ( ब्रह्मविज्ञानात्मकं ) - अदृश्यम्, अग्राह्यम्, अगोत्रम्, अवर्णम्, श्रचक्षुःश्रोत्रम्, तदपाणिपादं, नित्यम्, विभुम् सर्वगतम्, सुसूक्ष्मम्, तदव्ययम्, तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीरा: ' ( मुण्डकोपनिषत् )!

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पारिभाषिकसूचनाएँ ' धीराः परिपश्यन्ति ' यह उपसंहारवाक्य स्पष्ट ही ब्रह्मविज्ञानात्मक अक्षरविज्ञान की दर्शनभाव-निबन्धना ज्ञानपक्षता का ही समर्थक बन रहा है । अतएव इसे हम ' विज्ञान ' न कह कर ' ज्ञान ' ही कहेंगे । एवं इसी दृष्टि से इसे अव्ययब्रह्मात्मक शुद्ध निरपेक्ष श्रात्मज्ञान की कोटि में हीं अन्तर्भुक्त मान लेंगे । अच क्रमप्राप्त प्रकृतिविकृतिरूप क्षरब्रह्मात्मक वह ' यज्ञविज्ञान ' हमारे सम्मुख उपस्थित होता है, जिसके श्राध्यात्मिक - श्राधिदैविक - आधिभौतिक - स्वरूपों का पूर्व में दिग्दर्शन कराया जा चुका है । यही उपनिषदों की ' अपराविद्या ' कहलाई है, यही वैदिक विज्ञान का प्रधान मूलस्तम्भ है । वेदशास्त्र में, विशेषतः वेदशास्त्र के ऋक - यजुः - साम - अथर्व - लक्षण संहिताभाग में अपराविद्यात्मक इसी यज्ञविज्ञान का -जिसे कि ' सृष्टिविज्ञान ' भी कहा जायगा -स्वरूपविश्लेषण हुआ है । वेदाङ्ग भी इसी में अन्तर्भूत हैं । महाशाल महर्षि शौनक के विधिवत् यह प्रश्न करने पर कि, भगवन्! किसे जान लेने से यह सृष्टिप्रपञ्च सर्वात्मना जान लिया जाता है?, उस युग के परम वैज्ञानिक अङ्गिरा महर्षि के पुत्र, अतएव ' आङ्गिरस ' इस उपनाम से प्रसिद्ध महर्षि भारद्वाज ने यही समाधान किया था कि— विवेदितव्ये - इतिह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति - परा चैत्र, अपरा च । तत्र-अपरा - ऋग्वेदो, यजुर्वेदः, सामवेदो, ऽथवेदः । शिक्षा - कल्पो व्याकरणं - निरुक्तौं– छन्दो - ज्योतिषम् ' इति । - मुण्डकोपनिषत् । ६१ – प्राणपरीक्षणात्मक ब्रह्म विज्ञान, एवं भूतपरीक्षणात्मक यज्ञविज्ञान-स्वयम्भू - व्योम - परमेष्ठी - वायु - सूर्य्य - तेज - चन्द्रमा - जल - ग्रह - नक्षत्र - पृथिवी - श्रोषधि - वनस्पति - धातु-अन्तःसंज्ञ - ससंज्ञ जीवसर्ग, ऋषि - पितर - असुर - देव -- गन्धर्व - यक्ष - राक्षस - पिशाच आदि देवयोनिसर्ग, पुरुष -अश्व - गौ - अवि - अज - आदि पार्थिव सर्ग, आदि आदि यच्चयावत् - प्राणविध - प्राणीविध- भूतविध विश्वसर्ग का स्वरूपनिर्माण - स्थिति - अवसान - बिन प्रकृतिसिद्ध नियमों के द्वारा धारावाहिकरूप से सञ्चालित है, उन सृष्टयनुत्रन्धी विधानों की रहस्यपूर्णा विद्या ही ' क्षरब्रह्मविद्या ' है, यही ' यज्ञविज्ञान ' है, जो विज्ञान के द्व।रा ज्ञातव्यमात्र है - मानव के लिए, जिसका कि प्रधानरूप से मूल संहिताओं में विश्लेषण हुआ है । यही यज्ञविज्ञानात्मक प्रकृतिविज्ञान भारतीय ' विज्ञान ' शब्द का प्रथम, तथा मुख्य दृष्टिकोण है । प्रधानरूप से हमनें इसी दृष्टि से प्रकाशित - प्रकाशित ग्रन्थों में यत्रतत्र ' विज्ञान ' शब्द का व्यवहार किया है । ज्ञातव्य-विज्ञानात्मक यही ब्रह्मविज्ञान प्रकृतिसिद्ध वह यज्ञविज्ञान है, जिसका पूर्वोपात - ' सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ' इत्यादि गीतावचन से स्वरूपविश्लेषण हुआ है । यह प्रकृतिसिद्ध यज्ञविज्ञान मानव के लिए केवल उपास्य ही बन सकता है, आचरण का लक्ष्य नहीं । अतएव आचरणात्मक - भूतपरीक्षणात्मक विज्ञान से इस प्राणपरीक्षात्मक नित्य यज्ञविज्ञान को विभक्त ही समझा जायगा । २-- यज्ञविज्ञान के आधार पर भूतविज्ञान का आविष्कार— प्रकृतिमिद्ध - क्षरब्रह्मात्मक - ' यज्ञविज्ञान ' का यहाँ की ऋषिप्रज्ञा ने साक्षात्कार किया । एवं तदाधार पर तत्तत् प्राकृतिक - यज्ञिय - प्राणों के सम्मिश्रण से उत्पन्न तत्तद् - भूतभौतिक पदार्थों के माध्यम से एक नवीन

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शतपथभाष्य ' यज्ञकर्म्म ' का आविष्कार किया । मानवीया स्थिरप्रज्ञा से प्राकृतिक नित्य देवयज्ञ के नियमों के आधार पर श्राविष्कृत वही ‘ भूतयज्ञ ' भारतीय मानव का आचारात्मक ' कर्म्मकाण्ड ' कहलाया । यही विकारक्षरनिबन्धने वैकारिक जगत् से, तदनुगत वैकारिक पार्थिव भूतों से सम्पन्न होने वाला ' वैधयज्ञ ' कहलाया, जिसके द्वारा भारतीय मानव ने वैसा सामर्थ्य प्राप्त कर लिया, जैसाकि सामर्थ्य प्राकृतिक नित्य यज्ञ में है । ऋषिमानव के द्वारा भूतपरीक्षण के द्वारा श्राविष्कृत, द्विजाति मानव के द्वारा अनुष्ठित वही वैधयज्ञ इसकी सम्पूर्ण लौकिक-दैविक आवश्यकताओं का पूरक बनता हुआ इसके लिए ' इष्टकामधुक् ' बना । एवं यही वैधयज्ञ कर्मकाण्डात्मक ' भूतविज्ञान ' कहलाया, जिसे भारतवर्ष की ' पदार्थविद्या ' कहा जा सकता है, कहा गया है । एवं जिस इत्थंभूत बैध - मानुष - भूतयज्ञ की इतिकर्त्तव्यता का, तथा विज्ञान का वेद के ब्राह्मणभागात्मक विधिभाग में विशेषरूप से, तथा आरण्यक — उपनिषद् भाग में सामान्य रूप से विश्लेषण हुआ । जैसा कुछ प्रकृति में नित्य यश के द्वारा हो रहा है, प्राणशक्तिरूप प्राकृतिक देवताओं के द्वारा जैसा जो कुछ प्रकृतियज्ञ में हो रहा है, ठीक उसी के अनुरूप विधि विधान इस भूताविष्कारात्मक मानुष यज्ञ में व्यवस्थित हुआ, जैसाकि— " प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या देवाननुविधा नै मनुष्याः यद्वै देवा यज्ञेऽकुर्वं स्तत् करवाणि ” इत्यादिं श्रार्षं वचन से संसिद्ध है । यही यहाँ की भूतविज्ञानदिशा का संक्षिप्त स्वरूपनिदर्शन है । इस-प्रकार भूतविज्ञानात्मक वैधयज्ञरूप पदार्थविज्ञान ' विकारविज्ञान ' कहलाया, तदाधारभूत प्रकृति विकृतिविज्ञानात्मक नित्ययज्ञविज्ञान ' देवविज्ञान ' कहलाया, तदाधारभूत अक्षरविज्ञानात्मक विज्ञान ' प्रकृतिविज्ञान ' कहलाया, जो कि परीक्षणदृष्टि से पृथक् रहता हुआ ' ज्ञान ' ही कहलाया । सर्वाधारभूत श्रव्ययब्रह्म निरपेक्ष ' ज्ञान ' मात्र ही कहलाया । इस दृष्टि से पूर्वोक्त चार विवर्त्ती में से आरम्भ के दो विवर्त्त तो ज्ञानप्रधान प्रमाणित हुए । एवं उत्तर के दो त्रिवर्त्त विज्ञानप्रधान प्रमाणित हुए । अव्ययब्रह्मरूप आत्मज्ञान, एवं अक्षरब्रह्मरूप ब्रह्मविज्ञान, दोनों का मगवान् ने ' ज्ञान ' नाम से संग्रह किया । क्षरब्रह्मरूप यज्ञविज्ञान ( नित्ययज्ञ विज्ञानात्मक देवविज्ञानरूप ज्ञात-व्यमात्र सृष्टिविज्ञान ), एवं विकारक्षररूप भूतविज्ञान ( मानुष यज्ञात्मक भूतविज्ञानलक्षण आचरणात्मक कर्म्मविज्ञान ), दोनों का ‘ विज्ञान ' शब्द से संग्रह किया । और इसप्रकार ज्ञान - विज्ञान - शब्दों के द्वारा.चारों पर्वों का संग्रह करते हुये भगवान् ने सभी कुछ स्पष्ट कर दिया, जिस इत्थंभूत ज्ञानविज्ञानात्मक रहस्य का स्पष्टी-करण ' यज्ज्ञात्त्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ' वाक्य से हो रहा है | ज्ञानम् -विज्ञानम् -१- आत्मज्ञानम् ( १ ) - निरपेक्षज्ञानानुगतम् -- मानवात्मप्रतिष्ठाभूमिः २- ब्रह्मविज्ञानम् ( २ ) - ज्ञानकाण्डानुगतम् - - मानव बुद्ध विकास भूमिः ३- यज्ञविज्ञानम् ( १ ) - उपासनाकाण्डानुगतम् - मानव मनः प्रतिष्ठाभूमिः ४ - भुतविज्ञानम् ( २ ) –कर्म्मकाण्डानुगतम् --- मानवशरीरप्रतिष्ठाभूमिः

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पारिभाषिकसूचनाएँ ६३ - विज्ञानमूलक सनातनधर्म्म की सम्प्रदायवादनिरपेक्षिता— आत्मज्ञान, तथा ब्रह्मविज्ञान, इन दोनों की समष्टि को हम ' ब्रह्मविज्ञान ' शब्द से भी व्यवहृत कर सकते हैं । क्योंकि केवल ईक्षण मर्यादा के अनुबन्ध से दोनों हीं समानधर्म्मा बने हुये हैं । एवमेव यज्ञविज्ञान, तथाभूतविज्ञान, दोनों की समष्टि को ' यज्ञविज्ञान ' शब्द से व्यवहृत किया जा सकता है । क्योंकि परीक्षण-मर्य्यादा से दोनों हीं समानधर्म्मा प्रमाणित हो रहे हैं । और यो अन्ततोगत्त्वा यहाँ आकर इस समानधर्मानुबन्ध से चारों विवर्त्तो का पूर्वोक्त ब्रह्मविज्ञानधारा, तथा यज्ञविज्ञानधारा, इन दो धाराओं पर ही पर्य्यवसान हो जाता है । दोनों क्रमशः आत्मनिबन्धन अलौकिक निःश्रेयस भाव, तथा विश्वनिबन्धन लौकिक अभ्युदयभाव बने रहते हुये मानव के आध्यात्मिक आत्मा - बुद्धि - मनः- शरीर चारों पर्वों के संरक्षक - धारक बनते हुये ' धर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध हो रहे हैं, जिससे मानव कभी अपने आपको निरपेक्ष मानने मनवाने की भ्रान्ति नहीं कर सकता । ज्ञान - विज्ञान - सिद्ध, आत्मिक - लौकिक- शान्ति - समृद्धि - प्रवत ' के संरक्षक इत्थंभूत शाश्वतधर्म्म हीं ' सनातनधर्म्म ' कहलाया है, जो दुर्भाग्यवश गतानुगतिक मतवादों के आवरण से स्वस्वरूप से अभिभूत बनता हुआ आज राष्ट्र की दृष्टि में निरपेक्ष ही प्रमाणित हो रहा है, जिससे बड़ा दुर्भाग्य राष्ट्र का और कुछ भी नहीं माना जा सकता । ‘ यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससद्धिः - सं धर्म्म: ' इस कणादसम्मत धर्म्मलक्षण का न तो किसी मतवाद से सम्बन्ध है, न सम्प्रदायवाद से । यह तो सत्यस्य सत्यं रूप विश्वेश्वर की वह सत्यनियति है, जिससे विश्व, तथा विश्वमानव का स्वरूप प्रतिष्ठित है, जैसाकि - ' धम्र्म्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा ' इत्यादि चिरन्तनसूक्ति से प्रसिद्ध है । ' धारणाद्धर्म्ममित्याहुः - धर्मो धारयते प्रजाः । यत् स्याद्धारण सयक्त - स धर्म्म इति निश्चयः ' ही ज्ञान-विज्ञानात्मक सनातनधर्म की स्वरूपपरिभाषा है । नत्र नत्र भी मानव आत्मबुद्धिधम्मों से पराङ्मुख बन कर मनःशरीरानुगत केवल काम - भोगों में हीं आसक्त व्यासक्त हो जाता है, तत्र तत्र ही प्रकृतिविकम्पन हो पड़ता है, जिसके अतिवृष्टि- अनावृष्टि - स्वल्पवृष्टि - हीनवृष्टि - करकापात - वज्रपात - ऐन्द्र- वारुण- वायव्य - आग्नेय भेद से चतुर्विध भूकम्प - धूमकेतुरुदय - बनपदविध्वंसिनी - महामारी - राष्ट्र कलह - अनैतिकता - उच्छौंखलता – श्रादि आदि परिचर्याचिह्न मानें गए हैं । ऐसा भीषण समय ही ' धर्म्मग्लानियुग ' कहलाया है, जिसमें धर्म्मनिष्ठ श्रेष्ठमानव प्रकृतिविकम्पन के साथ सत्य प्रात्यन्तिकरूप से उत्पीड़ित हो पड़ते हैं । मानवीय प्रज्ञा के अपराध से उत्पन्न श्रधर्म्मभावनाएँ हीं प्राकृतिक क्षोभ का कारण बनती हैं, चरम सीमा पर पहुँचा हुआ यही प्रकृतिक्षोभ कालपरि-वाकावस्था में आकर अपने से भिन्न पुरुषात्मक ब्रह्मविकम्पन का कारण बन जाता है । वही विकम्पित ब्रह्मांश ' धर्म्मग्लानि के उपशम के लिये विशिष्ट मानवविभूति के रूप में धरातल पर अवतीर्ण होता है, जो कि आस्तिक प्रजा में भगवदवतार नाम से उपस्तुत है, जिस इत्थंभूता अवतार विभूति का बड़े ही रहस्यात्मक विज्ञान से सम्बन्ध है । केवल मानवीय तात्कालिक कल्पना से अनुप्राणित अन्यान्य मतवाद जहाँ ज्ञानानुगत विज्ञान, तर्क, हेतु, परीक्षण भावों से विद्वेष करते हैं, वहाँ भारतीय धर्म्म इन सबका इसलिए सहर्ष अभिनन्दन कर रहा है कि, इसकी मूलभित्ति ज्ञान - विज्ञान - जैसे दृढ़तम अधिष्ठान पर प्रतिष्ठित है । अतएव धर्माचार्यों ने परीक्षण बुद्धि का स्वागत करते हुए भारतीय धर्मं के सम्बन्ध में यह उदात्त बोषणा की है कि— यस्तर्केणानुसंधचे, स धर्म्म वेद, नेतरः । - मनु. ६१

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शतप्रथमाष्य ६४ - सनातनधर्म्म के नाम से मतवादों का विस्तार, और इससे विज्ञान का अभिभव — प्रश्न धर्म्मचर्चा का नहीं है । प्रश्न है ' विज्ञान ' शब्द का, जिसके प्रसङ्ग से पावन धर्म्मचर्चा का भी साङ्केतिक निदर्शन हो पड़ा है । धर्म्मप्रतिष्ठात्मक भारतीय ' विज्ञान ' शब्द की सभी प्रमुख धाराओं के दिग्दर्शन की चेष्टा की गई । जिसके माध्यम से ही अब हमें एक वैसे कटुसत्य का आश्रय लेना पड रहा है, जिसके अवलोकन - श्रवण मात्र से सम्भवतः भारतवर्ष की श्रास्तिक प्रजा हम पर रुष्ट - प्रविष्ट हो सकती है । हमें आज यह निःसंकोचरूप से अवनतशिरस्क बन कर स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि, वर्त्तमान भारतीय प्रजा जिसे ' सनातनधर्म्म ' कह रही है, जिस धर्म्म के व्याज से आज वह अनेक प्रकार के धार्मिक अकाण्ड - ताण्डवों का सर्जन करती हुई नहीं अधा रही, उसकी मान्यता से सम्बन्ध रखने वाला वर्तमान सनातनधर्म्म ' धर्म्म ' के वास्तविक स्वरूप से कुछ भी तो सम्पर्क नहीं रख रहा । यह तो अन्यान्य मतवाद की भांति एक मतवाटमात्र है, मजहव है, रिलीजन् है, जिन इन शब्दों से ' धर्म्म ' का यत्किञ्चित् भी सम्बन्ध नही है । सम्भवतः ही क्यों, निश्चयेन इसीलिए धर्म्मप्राणभूत इस भारतराष्ट्र के प्राङ्गण में आज ' धर्मनिरपेक्षिता ' जैसी अनार्यजुष्टा श्रभिधा आविष्कृत हो पड़ी है, जिसका समस्त उत्तरदायित्त्व यहाँ की उस धार्मिक प्रजा पर ही निर्भर है, जो धर्म्मव्याज से तत्त्वतः कलह - संघर्ष - शान्तिमूलक मतवादों का ही यशोगान कर रही है । धर्माधारभूत ज्ञानपक्ष, एवं तदनुप्राणित ब्रह्मविज्ञान आज केवल विद्वानों के वाक्कलहमात्र पर विश्रान्त है । ब्रह्मविज्ञान पर प्रतिष्ठित . यज्ञविज्ञान याज कर्म्मठों के कल्पित नामयज्ञों पर परिसमाप्त है । यज्ञविज्ञान के आधार पर प्रतिष्ठित भूतविज्ञान का तो आज नामस्मरण भी नहीं हो रहा । इस प्रकार न आज यहाँ अलौकिक ज्ञान है, न लौकिक विज्ञान है । है तो केवल यही है कि, अपनी अपनी साम्प्रदायिक - मतत्रादात्मिका मान्यताओं को सर्वमूर्द्धन्य प्रमाणित करने की अहमहमिका, तत्समर्थन - प्रचार - साफल्य के लिए कल्पित अलौकिक चमत्कारों के प्रदर्शन - छल से भावुक जनता की प्रतारणा । प्रक्रतिविरुद्ध आचरण हीं श्रान इस राष्ट्र में महान् चमत्कार बन रहे हैं । यदि कोई गाली प्रदान करता है, अनर्गल प्रलाप करता है, आडम्बरपूर्ण जीवनपद्धति का प्रदर्शन करता है, तो वही यहाँ की भावक प्रजा के लिए महान् सिद्ध पुरुष बन बैठता है । कोई ज्योति के दर्शन करा रहा है, कोई नाच - गाकर श्रुविमुञ्चन कर भगवान् के सान्निध्य का अभिनय कर रहा है, कोई विडम्बनापूर्णा घोरसाधनाओं के नाटकीय अभिनय से गुप्त सिद्धियों का प्रदर्शन कर रहा है, कोई धा लटक रहा है, तो कहीं प्राणनिरोध जैसी सामान्य प्रक्रिया के व्याज से अन्तस्तल में बैठ कर ' समाधि ' के माध्यम से नवीन आकर्षण उत्पन्न किया जा रहा है । और यों आज इस ज्ञानविज्ञानात्मक पावन भारतवर्ष के क्रोड़ में अलौकिकता के नाम पर प्रकृतिसिद्ध सम्पूर्ण-तत्त्ववाद का उसी के दायादभोक्ता उत्तराधिकारियों के द्वारा मानों उपहास ही किया जा रहा है । इत्थंभूता शोचनीया अवस्था, किंवा निःसीमा दुरवस्था के अनुग्रह से आज यदि धर्म के प्रति, तत्स्वरूपव्याख्याता ज्ञान-विज्ञानात्मक प्रजापतिशास्त्र के प्रति, एवं तदनुयायी वेदनिष्ठों के प्रति तात्कालिकरूप से प्रत्यक्ष फल सर्जक परीक्षणा त्मक प्रतीच्य भौतिक विज्ञान के प्रति ' लाभ ' दृष्टया सहजरूप से ही आकर्षित हो पड़ने वाली भारतीय प्रजा, एवं प्रजासञ्चालक शासकवर्ग भारतीय प्राच्यशास्त्र - धर्म - आचार आदि के प्रति अनुदिन निरपेक्ष- तटस्थ ही बनती बा रही है, तो न इसमें शासित प्रजा का ही कोई दोष, एवं न शासक सत्तावर्ग का ही कोई अपराध । अपराध है प्राच्यसंस्कृतिनिष्ठ उन भारतीय विद्वानों का, जो व्याकरण - साहित्य - न्याय - दर्शनादि के पलोड़न में ही अपने जीवन को त्राहुति देते हुए ज्ञान विज्ञानकोषात्मक उस वेदशास्त्र के पारिभाषिक श्रध्ययनाध्यापन से एकान्ततः ६२

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पारिभाषिक सूचनाएँ ही पराङ्मुख हो गए हैं विगत कई एक शताब्दियों से, जिम वेदशास्त्र की पराङ्मुखता राजर्षि मनु के शब्दों में विद्वान् को जीवित मृत्यु का ही कारण बन जाया करती है * । ( ६५ - प्रतीच्य भूतविज्ञानवादियों का आक्षेप, और तन्निराकरण— ब्रह्मविज्ञान की परिभाषाओं के सम्बन्ध में, एवं प्रकृतिविज्ञानात्मक यज्ञविज्ञान की परिभाषाओं के सम्बन्ध में किञ्चिदिवि निवेदन करने की धृष्टता की गई । अत्र शेष रह जाता है परीक्षणात्मक - विकृतिरूप वह भूतविज्ञान, जिसके परीक्षात्मक पारिभाषिक यज्ञिय सूत्र सर्वथा ही यहाँ की प्रज्ञा से पराङ्मुख बन गए हैं, जैसाकि वक्तव्य के आरम्भ में ही अपनी इस असमर्थता का स्पष्टीकरण किया जा चुका है । यह सब कुछ मान लेने पर भी वेदशास्त्र के अक्षरदर्शनमात्र से भी ऐसा कुछ भान हो रहा है कि, अवश्य ही इस प्रजापतिशास्त्र में श्रात्मज्ञान, ब्रह्मविज्ञान, एवं यज्ञविज्ञान के साथ साथ उस भूतविज्ञान का भी क्रमबद्ध पारिभाषिक स्वरूप विस्पष्ट हुआ है, जिस भूतविज्ञान का ऐहलौकिकी पदार्थविद्या से ही सम्बन्ध है । भारतीय पदार्थविद्या के सम्बन्ध में, भूतविज्ञान के सम्बन्ध में इस विशेष दृष्टिकोण को लक्ष्य बना लेना श्रावश्यक होगा कि, जहाँ वर्तमान प्रतीच्य भूतविज्ञान रासायनिक सम्मिश्रणात्मक यौगिक विज्ञान के मूलाधार तत्त्वों की संख्या में क्रम क्रमशः वृद्धि करता हुआ अनेक तत्त्वानुवादी बन रहा है, वहाँ भारतीय भूतविज्ञान के मूलाधार तत्त्व पाँच ही वर्गों में विभक्त है, जो कि क्रमशः आकाश - वायु - तेज- अप् - पृथिवी - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । यही वह भारतीय सुप्रसिद्ध ' पञ्चतत्त्ववाद ' है, जिसे आगे कर प्रतीच्य विज्ञानवादी भारतीयप्रज्ञा के उपहास में प्रवृत्त होते देखे गए हैं । " पृथिवी - जलादि नाम से प्रसिद्ध महाभूतों की यौगिकता जत्र स्पष्ट प्रमाणित है, तो उस दिशा में इन्हें मौलिक तत्त्व कैसे वतलाया गया है । इन भूतों को पञ्चतत्त्व बतलाना हीं इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि, भारतीय प्रज्ञा श्रात्म - परमात्मचर्चा में, अलौकिक भावों के आलोडन - विलोडन - मात्र में भले ही सफल रही हो | किन्तु भूतविज्ञान के स्वरूपज्ञान से तो यह सर्वथा ही वञ्चित है " इस रूप के आक्षेप से सम्बन्ध रखने वाला प्रचण्ड तर्क भारतीय प्रज्ञा को सहसा एक बार तो कुण्ठित ही कर देता है कि, क्या सचमुच यहाँ की ऋषिप्रज्ञा भूतविज्ञान के स्वरूप से अपरिचित थी? । उक्त आक्रमण के साथ साथ ही दूसरा आक्रमण भारतीयों की प्रज्ञा पर यह होता है कि, " जैसे ये भूतविज्ञान से ये अपरिचित हैं, एवमेव शरीरविज्ञान से भी इनका कोई सम्पर्क नहीं रहा । तभी तो शरीरसंस्था में सर्वथा अनुपलब्ध, अतएव काल्पनिक वात्त - पित्त-कफ - जैसे धातुओं के आधार पर इनका आयुर्वेदशास्त्र भी सर्वथा अवैज्ञानिक ही है " । कहना न होगा कि, कतिपय भारतीय वैज्ञानिक बन्धु, एवं डाक्टर महाभाग भी बड़े ही उल्लास के साथ यहाँ की श्रायुर्वेद चिकित्सा -· प्रणाली को इसी हेत्वाभास के माध्यम से उपेक्षित प्रमाणित करते रहने का पुण्यार्जन! करते रहते हैं । धातुत्रयी प्रकृत का विषय नहीं है । इसका विवेचन हमनें ' वेदों का त्रिधातुवाद ' नामक स्वतन्त्र वक्तव्य में किया है । प्रकृत में तो भूतविज्ञानानुचन्वी ' पञ्चतत्त्व ' के ही सम्बन्ध में हमें दो शब्द निवेदन कर देने हैं ।

* —अनभ्यासेन वेदानां, आचारस्य च वर्जनात् ।

आलस्यादन्नदोषाच्च मृत्युविंप्राञ्जिघांसति ॥

- मनुः C

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शतपथभाष्य ६६ - भारतीय पञ्चतत्त्ववाद की मौलिक सोपानपरम्पराएँ-पूर्व की विज्ञानधाराओं का दिग्दर्शन कराते हुए हमनें परात्पर से अभिन्न अव्ययब्रह्म को ' आत्म-ज्ञान ' नाम से व्यवहृत किया है । यहीं से उस पञ्चतत्त्ववाद का उपक्रम हो जाता है, जो पञ्च महाभूतों में विश्रान्त होता है, जबकि इस प्रथम पञ्चक का पारिभाषिक पञ्चतत्त्ववाद से कोई सम्बन्ध नहीं है । आनन्द - विज्ञान - मनः - प्राण- वाक् - इन पाँच पारिभाषिक कलाओं से ज्ञानकैधन निष्कल भी अव्ययब्रह्म सकल, किंवा पञ्चकल बना हुआ है । आत्मा के श्रनन्तर अक्षररूप ब्रह्मविज्ञान का स्थान है 1 । इसकी ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम - नाम की पञ्चकलाएँ हैं, जिनके आधार पर श्रुति ने कहा है—

यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता श्रभियत् संवहन्ति ।

सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते, तत्र देवाः सर्व एकी भवन्ति ॥

अक्षरब्रह्मात्मक ब्रह्मविज्ञान के अनन्तर प्रकृति विकृतिरूप क्षरब्रह्मात्मक यज्ञविज्ञान हमारे सम्मुख उपस्थित होता है, जिसे हमनें ' सृष्टिविज्ञान ' कहा है । यज्ञविज्ञानात्मक इस क्षरब्रह्म की भी पांच हीं कलाएँ हैं - जो क्रमशः - प्राणः - आपः - वाक् - अन्नम् - अन्नाद: ' नामों से प्रसिद्ध हैं । यहाँ आकर आत्मब्रह्म का सूक्ष्मवितान उपरत हो जाता है । अतएव परात्पर, पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल क्षर, इन १६ कलाओं की समष्टि को ' घोडशी प्रजापति ' मान लिया जाता है, जोकि प्रत्येक पदार्थ के केन्द्र में प्रतिष्ठित माना गया है । इसी हृदयस्थ षोडशी - षोडशक्ल - प्रजापति की अपेक्षा से प्रत्येक पदार्थ षोडशकल मान लिया गया है, जैसाकि - ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगमवचन से प्रमाणित है | विज्ञान संस्कारों की प्रतिच्छाया से अद्यावधि भी समन्वित रह जाने का महदुभाग्य प्राप्त करने वाली भारतीय आस्तिक प्रा सम्भवत: इसी आधार पर अपने आराध्य - उपास्य भगवान् को ' सोलह कलापरिपूर्ण भगवान् ' मानती चली आरही है । आत्मानुगत इसी षोडशकलभाव को परात्पररूपा निष्कल भावात्मिका एक कला के, तथा अव्ययाक्षरात्मक्षरनिबन्धना पञ्चदश कलाओं के वर्गीकरण के माध्यम से श्रुति को यों कहना पड़ा है कि—

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठां देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु ।

कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकी भवन्ति ॥

षोडशी प्रजापति की क्षरब्रह्मानुगता विशुद्धा प्राण - आपः - वाक् - अन्न अन्नाद - रूपा यज्ञविज्ञानात्मिका पाँच कलाएँ हीं पञ्चकल अव्यय - पञ्चकल अक्षर को अपनी मूलप्रतिष्ठा बनाती हुई सृष्टि की मौलिक प्रतिष्ठा चनतीं हैं । अतएव भारतीय विज्ञानपरिभाषा में क्षरब्रह्मात्मिका सुसूक्ष्मा विशुद्धा, अर्थात् पञ्चीकृता ये पाँचों कलाएँ हीं ‘ पञ्चतत्त्व ' नाम से प्रसिद्ध हुई हैं, जिनका साङ्केतिक पारिभाषिक वैज्ञानिक नाम है - ' विश्वसृट् । विश्वरूप भूतयज्ञ के सर्जन की मूलप्रवर्तिका ये ही क्षरकलाएँ हैं, अतएव इन्हें ' विश्वसृजः ' कहना अन्वर्थं बनता है । जैसा कि - ' विश्वसृज इदं विश्वमसृजन्त । यद्विश्वमसृजन्त, तस्माद्विश्वसृजः ' ( तै ० ब्रा०-३।१२।६।८ ) इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । दर्शनभाषा में यही ' गुणभूत ' नाम से प्रसिद्ध है, जिसे सांख्य ने ' पञ्चतन्मात्रा ' नाम से व्यवहृत किया है । कदापि इन मौलिक तत्त्वों का विशकलन सम्भव नहीं है, और यही इनकी मौलिकता है । ६४

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पारिभाषिक सूचनाएँ आगे चलकर इन पाँचों गुणभूतात्मक मौलिक तत्त्वों का पञ्चीकरण होता है, जिसका तात्पर्थ्य है प्रत्येक में शेष चारों की आहुति । फलतः श्रद्ध भाग में स्वयं एक तत्त्व शेष श्रद्ध भाग में शेष चारों । इसीलिए ' वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ' इस वैज्ञानिक सिद्धान्तानुसार पञ्चीकृत प्रत्येक इन यौगिक भूतों के नाम वे ही रहते हैं, जो प्राणादि नाम मौलिक क्षर के मानें गए हैं । इस द्वितीय प्रक्रम में, जोकि मूल तर की दृष्टि से प्रथम ही प्रक्रम माना जायगा -पाँच पञ्चजनों को सम्भूय पञ्चविंशति ( २५ ) कलाएँ हो जातीं हैं । दर्शनभाषा में इन्हीं को ‘ अणुभूत ' माना गया है, जिनका यौगिक भाव के कारण विशकलन सम्भव है | ' यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठित: ' इत्यादि श्रुति रेणुभतात्मक इसी प्रक्रम का स्पष्टीकरण कर रही 1 पुनः पाँचों पञ्चजनों का पञ्चीकरण होता है । इस पञ्चीकरण से ये पाँचों पुरञ्जन जिस यौगिक श्रावस्था में परिणत होजाते हैं, वही ' पुरञ्जन ' नाम से व्यवहृत हुई है । इस पुरञ्जनावस्था में पञ्चजनों के स्वरूप में अपूर्वता आजाती है । अतएव इस प्रक्रम में इन पाँचों पुरञ्जनों के नाम परिवर्त्तित हो जाते हैं । पुरञ्जनात्मक प्राण वेद नाम से, पुरञ्जनात्मिका श्रापः लोक नाम से, तदात्मिका वाक् देव नाम से, तदात्मक अन्नाद भूत नाम से, एवं तदात्मक अन्न पशु नाम से व्यवहृत होजाते हैं । ' पुर ' रूप सीमाभाव की प्रभिव्यक्ति के प्रवतक होने से ही इन पञ्च पञ्चीकृत यौगिकभावों को ' पुरञ्जन ' कहा गया है | दर्शनभाषा में इन्हीं को ' रेणभूत ' माना गया है । पुनः रेणुभूतात्मक चेद- लोक - देव भूत - पशु - नामक प्राणात्मक, अर्थात् सुसूक्ष्म पुरञ्जनों का पञ्चीकरण होता है । इस पञ्चीकरण से जो यौगिक भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें ही ' पुर ' कहा जाता है । यहाँ आकर सीमात्मक अण्डवृत्त सम्पन्न होता है । यही सुसूक्ष्म अण्डवृत्त ' पुर ' नामक यौगिक तत्त्व माना गया है, जिन इन पाँच पुरभावों के पारिभाषिक नाम वेदात्मक प्राणपुरानुबन्धी वेदपुरञ्जन से निष्पन्न प्राणात्मक प्रथम पुर ' परमाकाश ' नाम से, लोकपुरञ्जन से निष्पन्न त्रात्मक द्वितीय पुर ' महासमुद्र ' नाम से, देवपुरञ्जन से निष्पन्न वागात्मक तृतीय पुर ' सम्वत्सर ' नाम से, भूतपुरञ्जन से निष्पन्न अन्नादात्मक चतुर्थ पुर ' आन्द ' नाम से, एवं पशुपुरञ्जन से निष्पन्न अन्नात्मक पञ्चम पुर ' नक्षत्र ' नाम से प्रसिद्ध है । परमाकाश - महासमुद्र - सम्वत्सर - आन्द - नक्षत्र - इन पाँच पुरभावों के बहुत्वनिबन्धन यौगिकभावों की अपेक्षा से ही ' बहुत्त्वमेव भूतम् ' निर्वचन से इन्हें ' भूतम् ' इस पारिभाषिक नाम से व्यवहृत किया है, जो कि विश्वस्वरूप की स्थूलभूमिका मान ली गई है । ६७ - पञ्चपर्वा प्रकृति के अध्ययन का आदेश-भूतात्मक परमाकाशादि पाँचों पुरभावों का पुनः पञ्चीकरण होता है । इस अन्तिम पञ्चीकरण से इन पुरभावों के द्वारा जो आत्यन्तिक अपूर्व भाव उत्पन्न होता है, वही सर्वान्त का ' महाभूत ' नामक पञ्चक है, जिसके दर्शनभाषा में क्रमश: आकाश - वायु - तेज- जल - मृत्- ये नाम हैं । एवं पारिभाषिकी विज्ञानभाषा में जो पाँचों क्रमशः स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य- भूपिण्ड - चन्द्रमाः - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । अवश्य ही ये पाँचों श्रात्यन्तिक रूप से यौगिक हैं । अनेक मौलिक भाव से - गुण - अणु - रेणु - भूत - माव से सम्पन्न होने वाले, अतएव निरतिशयरूप से बहुतभावनिबन्धन इन यौगिक प्रत्यक्ष दृष्ट – श्रुतवर्णित धूर्तो ६५