Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 361–370
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 361–370
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शतपथभाष्य को ऋषप्रज्ञा ने ‘ महाभूत ' नाम से व्यवहृत किया है । बहुत्त्व की प्रात्यन्तिकता ही इन स्थूल भूतों की महत्ता है । इस दृष्टि से स्वयं ' महाभूत ' शब्द ही पृथिव्यादि पञ्च महाभूतों की योगात्मिका यज्ञरूपता अभिव्यक्त कर रहा है । जिन्हें वर्त्तमान विज्ञान मौलिक तत्त्व कहता है, वे तो सम्भवतः हमारे ' भूत ' नामक चतुर्थ उ प्रक्रम में हीं अन्तर्भूत हैं, जो महाभूतों के सर्जक बना करते हैं । एवं जो ऋषिप्रज्ञा की दृष्टि से तो यौगिक ही तत्त्व हैं । इन पुररूप भूतलक्षण भावों के मूलभूत पुरञ्जनात्मक रेणुभूत तथा इनके भी मूलभूत पञ्चञ्जनात्मक अणुभूत भी जत्र यौगिक मर्य्यादा से आक्रान्त हैं, तो अशुभूत की तीसरी पीढो में प्रतिष्ठित महाभूतों के मूलाधार भूतों को कैसे ' तत्त्व ' माना जा सकता है? । अवश्य ही अविकशलनधर्म्मा तत्त्व तो श्रृणुभूतों के भी मूलाधार पञ्चतन्मात्रारूप उन गुणभूतों को ही कहा जायगा, जो अपञ्चीकृत ‘ क्षरब्रह्म ’ ना प्रसिद्ध हैं | तदित्थं - गुण - अणु - रेणु - भूत - भेद से चतुर्द्धा विभक्त विश्वसृट - पञ्चजन - पुरञ्जन-पुर - नामक तत्त्वों के अनन्तर चौथे ' भूत ' नामक यौगिक तत्त्वों से समुत्पन्न पृथिव्यादि महाभूतों की स्पष्टतमा बहु - यौगिकता का यों क्रमसिद्ध जिस वेदशास्त्र में विश्लेषण हुआ हो, उस वैदिक विज्ञान के पञ्चतत्त्वात्मक मौलिक तत्त्वों के सम्बन्ध में तथाकथित आलोचना के द्वारा भारतीय ऋषिप्रज्ञा को केवल आत्मचिन्तनशीला मान बैठना, इसे भूतविज्ञानदृष्ट्या भ्रान्त मान बैठना आज के भूतविज्ञानवादियों के जैसे हेत्त्वाभास इस भारतीय प्रज्ञा को आज सुनने पड़ रहे हैं, उसका एकमात्र कारण वैदिकविज्ञानपरम्पराओंों की विलुप्ति ही माना जायगा | ' अक्षर ' नामक प्रकृति तत्त्व के पञ्चधा विभक्त पञ्चीकरण के अनुग्रह से प्रकृतिस्वरूप महाविश्व की सीमा में अन्तर्भुक्त अव्ययादि महाभूतान्त जो विवर्त्त समष्ट्या - व्यष्ट्या उभयथा पञ्चात्मक बनें हुए हैं । इत्थंभूता पञ्चपर्वा प्रकृति देवी की ब्रह्म - यज्ञ - विज्ञानधाराओं का वेदशास्त्र की परिभाषाओं के माध्यम से जब तक भारतीय प्रज्ञा स्वाध्याय नहीं कर लेती, दूसरे शब्दों में नत्रतक पञ्चपर्वा प्रकृति का.... यह अध्ययन नहीं कर लेती, तबतक इसे इसीप्रकार अपमानित होते ही रहना पड़ेगा । अतएव इस दिशा में आर्धमानव का उद्बोधन कराते हुए ऋषिप्रज्ञा ने हमारे सम्मुख यह उद्बोधन सूत्र रक्खा कि-पञ्चस्रोतोऽम्बु ं
पञ्चयोन्युग्रनक्रां पञ्च प्राणोमि पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम् ।
पञ्चावर्त्ता ' पञ्चदुःखौघवेगां पञ्चाषट्मेदां पञ्चपर्वामधीमः ॥
६८ — रस – बल – स्वरूप परिचय– - श्वेताश्वतरोपनिषत् १ । ५ । गुणभूतगर्भित अणुभूत, तद्गर्भित रेणुभूत, तद्गर्भीभूत भूत एवं तद्गर्भीभूत महाभूतात्मक जिस मौलिक पञ्चतत्त्ववाद पर भारतीय पदार्थविद्यात्मक विकृतिविज्ञानात्मक भौतिक विज्ञान का अवसान हो रहा है, उसके सर्वादिभूत मूलभाव भारतीय विज्ञानभाषा में रस - बल नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । अपरिवर्तनीय मौलिक तत्त्व ही रस कहलाया है, जोकि केवल सत्तासिद्ध पदार्थ है । एवं परिवर्तनीय मौलिक तत्त्व ही बल माना गया है, जोकि केवल भातिसिद्ध पदार्थ है । सत्तासिद्ध रस नामक मौलिक तत्त्व दिक् - देश - काल से अपरि-च्छिन्न रहता हुआ अनन्त है, तो भातिसिद्ध बल नामक मौलिक तत्त्व दिग्- देश - काल से परिच्छिन्म रहता सादि सान्त है । सत्तात्मक रस संख्या से एक है, दिग्देशकालानुबन्ध से अनन्त है, जबकि भात्यात्मक हुआ बल दिग्देशकाल से सादि सान्त बनता हुआ भी संख्या से अनन्त - असंख्य है । रसात्मक रस अपनी अनन्तता ६६
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पारिभाषिक सूचनाएँ से नहाँ ' सत् ' है, अमृत है, एक है, अविनाशी है, वहाँ भात्यात्मक बल अपनी सादि सान्तता से ' असत् ' है, मृत्यु है, नाना है, विनाशी है । अहोरात्रवत् परस्पर अत्यन्त विरुद्ध इन दोनों सत्ता - भातिरूप रस - चल तत्त्वों की समष्टि ही ‘ अहम् ' नामक वह मौलिक तत्त्व है, जिसे - ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' रूप से श्रुति ने सजातीय--विजातीय – स्वगत भेदशून्य अद्वैतब्रह्म माना है । और यही भारतीय तत्त्ववाद का सर्वाधारभूत वह एकतत्त्ववाद है, जिसके आधार पर ही पूर्वोवर्णित पञ्चपर्वात्मक पञ्चतत्त्ववाद का उपबृंहणात्मक विस्तार हुआ है । ' अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन! ' इत्यादि गीतावचन इसी एकतत्त्ववाद की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । ६६ - रस - लात्मिका विद्या और विद्या-सत्तासिद्ध रसतत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित भातिसिद्ध परिवर्तनशील क्षणभावापन्न, श्रतएव प्रतिक्षण-विलक्षण जो असंख्य बलतत्त्व है, उनके श्राधारभूत जलकोश सोलह मानें गए हैं, जो विज्ञानभाषा में क्रमश: -“ माया, जाया, धारा, आप:, हृदयं भूतिः, यज्ञः, सूत्रं, सत्यं, यक्षं, अभ्त्रं, मोहः, वयः,, यो नाधः वयुनम्, विद्या, ” इन नामों से प्रसिद्ध हैं । मायादि वयुनान्त १५ बलकोश समष्टिरूप से जहाँ ' अविद्या-चलकोश ' कहलाया है, वहाँ एकाकी विद्याबल ' विद्याबलकोश ' कहलाया है । विद्याबलकोश में रस की प्रधानता है, बल की गौणता है । अतएव यह बलकोश ( विद्याचल ) संसारप्रन्थिविमोचक माना गया है । पञ्चदशत्रलकोशात्मक श्रविद्याबलकोश में बल की प्रधानता है, रस की गौणता है । अतएव यह अविद्या-बलकोश संसारग्रन्थिबन्धनप्रवर्तक माना गया । विद्या, विद्या, दोनों का समष्ट्यात्मक स्वरूप एक ही केन्द्रबिन्दु पर प्रतिष्ठित है, जैसाकि ऋषि ने कहा है-विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वयोभयं सह । अविद्यया मृत्यु ं तीर्त्वा विद्ययाऽऽमृतमश्नुते ॥ - ईशोपनिषत् १०० - बलं सत्यादोजीयः---सत्तासिद्धा अमृतरसलक्षणा मूलप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित भातिसिद्ध बलों का पारस्परिक सम्बन्धतारतम्य ही पञ्चपर्वा प्रकृति से अनुप्राणित गुणभूतात्मक क्षत्रालक्षण विश्वसृट्, अशुभतात्मक पञ्चीकृत क्षरलक्षण पञ्चजन, रेणुभतात्मक पञ्च पञ्चीकृत क्षरलक्षण पुरञ्जन, एवं भूत - मतात्मक पञ्च पञ्च पञ्चीकृत क्षर--लक्षण पुर, इन चार प्रक्रमों में परिणत होता हुआ अन्ततोगत्वा सर्वथा निरूढा यौगिकावस्था में श्राकर सर्वात्मक पञ्च महामतों पर विश्रान्त होता । इन सभी प्रक्रमों में, प्रक्रमसमष्टिरूप श्रभिक्रमों में, एवं अभि-कमसमष्टिरूप बलव्यूहों में रसाधार पर प्रतिष्ठित बलों के सम्बन्ध - तारतम्य का ही साम्राज्य है । अतएव भारतीय विज्ञान की मूलाधारभित्ति यह ' बल ' तत्त्व ही मान लिया गया हैं । बल, किंवा बलों का सम्बन्ध– तारतम्य ही सृष्टिविज्ञान का मौलिक रहस्य है । श्रतएव कहा जासकता है कि, पदार्थविज्ञानात्मक भूतविज्ञान के लिए बलविज्ञान ही ज्येष्ठ - श्रेष्ठ है । ' बलं वाव विज्ञानाद्भवः । बलमित्युपास्व ' इत्यादि श्रुतिसिद्ध चलतत्त्व ही भारतीय पदार्थविद्या की उपक्रमबिन्दु बना हुआ है । भूतविज्ञान के मूलाधारभत इस जलतत्त्व ६७
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शतपथभाष्य को लक्ष्य बनाए बिना न तो बलातीत रसलक्षण श्रात्मतत्त्व का ही साक्षात्कार सम्भव, एवं न बलात्मकं सृष्टितत्त्व का ही स्वरूपविश्लेषण सम्भव । इसी आधार पर ' नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः । बलं सत्यादो-जीयः ' इत्यादि श्रौत सिद्धान्त व्यवस्थित हुए हैं । बलात्मिका विज्ञानोपासना की पराङ्मुखता मानव को आत्ममूला रसनिबन्धना शान्ति, तथा विश्वमूला बलनिबन्धना लोकविभति, दोनों से वञ्चित कर दिया है ॥ अतएव इन दोनों हीं पुरुषार्थों की संसिद्धि के लिए बलात्मक विज्ञानकाण्ड को माध्यम बना लेना करती अनिवार्य माना है ऋषिप्रज्ञा ने । १०१ - बल निबन्धन विविध धर्म्म— संसिद्ध है कि, भारतीय पदार्थविद्या का मूलाधार एकमात्र चलतत्त्व ही है, जिसका पञ्चवर्षां प्रकृति के पञ्चीकरण से ‘ गुण - अणु - रेणु - भूत - महाभूत ' रूप से ' विश्वसृद् - पञ्चजन - पुरञ्जन - पुर - विश्व ' भावों में विस्तार हुआ है । विज्ञानविस्तार के आधारभूत इसी बलतत्त्व के तीन प्रमुख विवों के द्वारा भारतीय ' भूतविज्ञान ' व्यवस्थित हुआ है, जोकि तीनों विवर्त्त क्रमशः स्थिरधर्म्म प्रयोजकबल, अस्थिर-धर्म्मप्रयोजकबल, सव्यपेतधर्म्म प्रयोजकवल, इन नामों से प्रसिद्ध हैं | तीनों प्रत्येक क्रमशः दशविध - अष्टविध - त्रिविध - भेद से दस - आठ और सीन, इस प्रकार २१ इक्कीस अवान्तर विवत्तों में परिणत हो रहे हैं, जिनके प्रकृत में नाममात्र उद्धत कर दिए जाते हैं । स्थिरधर्म्म प्रयोजक प्रथम क्लविवर्त्तक के श्रवान्तर दस बलविवर्त्त क्रमशः - १ " - भारः २ - आयतनम्, ३ - स्थानविरोध, ४ - विभाज्यता, ५ - सान्तरत्त्वम्, ६ - संगठनम्, ७ - स्थितिस्थापकता, 4 - चापनम्,, ६ - जड़त्वम्, १०- अविनश्वरत्वम् " इन नामों से प्रसिद्ध हैं । स्थिरधर्म्मप्रयोजक द्वितीय बलविवर्त्त के अवान्तर बलविवर्त्त क्रमशः १ - " शैत्यम्, २ - आकुचनम्, ३ – कठिनत्त्वम्, ४ - वर्ण.रूपम्, ५ - क्षणभङ्ग ुरत्त्वम् ६- घनत्त्वम्, ७- द्रवत्त्वम्, ८ - विरलत्त्वम् ” इन नामों से प्रसिद्ध हैं । एवं सव्यपेक्षघर्म्मप्रयोजक तृतीय बलविवर्च के अवान्तर बलविवर्त्त क्रमशः १ – नोदनाबलम्, २ – केन्द्रापगबलम् ३ - आकर्षणवलम् ”, इनामों से प्रसिद्ध हैं । इन एकविंशतिधा विभक्त अवान्तर बलविवत्तों के भी आगे जाकर अनेक प्रत्यवान्तर बलविवर्त्त होजाते हैं, जिनका विस्तारभिया उल्लेख भी सम्भव नहीं है । उदाहरण के लिए सत्र्यपेक्षधर्म्म प्रयोजक बलविवर्त्त के प्रथम अवान्तर नोदनाबल को ही लक्ष्य बनाइए, जिसके क्रमशः -पूर्वदेशत्याग - उत्तर देशसंयोगात्मक १ - गतिबल, बलयोनि-बलमात्रानुत्रन्धी २ – बलोपनिषद्बल, सम - विषम - वेग - भावानुबन्धी ३ – समदिग्बल, सरल - वक्रादिभावा– नुबन्धी ४ - नानादिगबल, एवं प्रतिदिग्बलद्वयघातात्मिका स्थिति -- नमनाचलघात - परिवृत्ति - आदि निबन्धनः ५- प्रतिदिग्बल, ये प्रत्यवान्तर बलविवर्त्त ' हो जाते हैं । एवमेव उदाहरणरूप से सव्यपेतधर्म्म प्रयोजक बलविवर्त्त के तीसरे आकर्षण बलविवर्त के अवान्तर एकादश ( ११ ) प्रत्यवान्तर विवर्त होजाते हैं, जो भारतीय विज्ञानपरिमाषा में क्रमशः- “ : - " १ - वस्त्वाकर्षण, २ - व्यषकलिताकर्षण, ३- माध्याकर्षण, ४ - रासायनिका कर्षण, ५ - श्रामविकयोगाकर्षण ६ - सन्निक-६८
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पारिवाषिकसूचनाएँ र्षंबलाकर्षण, ७- अनुलग्नताबलाकर्षण, -- संपक्तबलाकर्षण, ह - कैशिकबलाकर्षण, १० - शोषण-बलाकर्षण, ११ - चोषणबलाकर्षण " इन नामों से प्रसिद्ध हैं | १०२ – चलों की अवस्थात्रयी— रूढ - योगरूढ - एवं यौगिक भेद से त्रिधा विभक्त परमाणु - त्रसरेणु - स्कन्ध - भावानुगत त्रिविध पदार्थों की अवान्तर ‘ ध्रुत्र - धर्त्र - धरुण ' नाम की तीन अवस्थाओं का भी - ' ध्रुवोऽसि घर्त्रर्मास धरुणमसि ' ( यजुःसंहिता ं ं ं ) इत्यादि मन्त्रश्रुति के द्वारा स्वरूपविश्लेषण हुआ है, जो कि क्रमशः संघातता - कठिनता-विनेयता - उद्वर्त्तनीयता - आदि भावानुबन्धिनी घनता से अनुप्राणित निबिडावयव, द्रवभावानुबन्धी तरलावयव, एवं विरलभात्रानुबन्धी बाष्पावयव, इन लोकनामों से प्रसिद्ध हैं । धनावयव, निचिड़ावय पदार्थ ही ' ध्रुव ' हैं, तरलावयव - द्रवावयव पदार्थ ही धर्त्र हैं, एवं विरलावयव - बाष्पावयव पदार्थ हीं धरुण हैं । इन्हीं तीन अवस्था धम्मौं से एक ही आङ्गिरसबल क्रमशः अग्निः - वायुः - श्रादित्यः, इन अवस्थाओं में परिणत हो रहा है । एक ही भार्गवद्दल क्रमशः आपः - वायुः सोमः इन तीन अवस्थाओं में परिणत हो रहा है । १०३ - बलों के १८ सम्बन्ध— बलों का सम्बन्ध तारतम्य ही इस असंख्य - श्रवस्था भेद का कारण बनता है, जिन असंख्य बलसम्बन्धों का प्रधानरूप से अष्टादश ( १८ ) बलसम्बन्धों में हीं अन्तर्भाव मान लिया है वैज्ञानिक महर्षियों नें । ये १८ चलसम्बन्ध क्रमशः १ - प्रवर्त्तकसम्बन्ध, २ - नैमित्तिकसम्बन्ध, ३ - सांघातिकसम्बन्ध, ४ - सांस्कारिक-सम्बन्ध, ५ – उदूभवसम्बन्ध, ६ - प्रभवसम्बन्ध, ७- पपादिकसम्बन्ध, ८- प्राकृतिक सम्बन्ध, ६- पारिणामिकसम्बन्ध, १० - रसानुवृत्तिकसम्बन्ध, ११ - सांयौतिकसमवायी सम्बन्ध, १२ - श्रपादा-निकसम्बन्ध, १३ - सांक्रामिकसम्बन्ध, १४ - आक्रमिकसञ्चारीसम्बन्ध, १५ - प्रातिभासिकविवर्त्त-सम्बन्ध, १६ - भाविकसम्बन्ध, ९ ७ - वैकल्पिक सम्बन्ध, १८ - ऐच्छिक सम्बन्ध, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन्हीं के अवान्तर विवर्त्त - अन्तर्य्याम, बहिर्य्याम, उद्याम, यातयाम, उदूढ, संशर ग्रन्थि, श्रमितवृत्तिता, दहरोत्तर, वसुधानकोश, योग, याग, ओतप्रोत, आदि आदि अनेक भावों में परिणत हो रहे हैं । श्रलमतिविस्तरेण । स्पष्ट है कि भारतीय ऋषिप्रज्ञा ने आत्मा - ब्रह्म - देव भूत- इन चार तत्त्वों के माध्यम से क्रमशः आत्मज्ञान, ब्रह्मविज्ञान, यज्ञविज्ञान, भूतविज्ञान, इन चारों विवतों का विस्पष्टरूप से समन्वय किया है, जिस समन्वयग्रन्थ का ही नाम मन्त्रब्राह्मणात्मक ' वेदशास्त्र ' है । अतएव - ' सर्व वेदात् प्रसिद्धयति ' ( मनुः ) के अनुसार वेदशास्त्र ज्ञान - विज्ञानात्मिका सम्पूर्ण विद्याओं का विश्लेषक शास्त्र मान लिया गया है । तत्त्वदृष्टि से इन चारों विवत्त के समन्वय की चेष्टा की गई । अब दो शब्दों में लोकदृष्टि से भी ' विज्ञान ' का समन्वय कर लीजिए । १०४ - आत्मप्रतिष्ठाशून्य भूतविज्ञान की सर्वसंहारकता -श्राज जिसे भूतविज्ञान कहा जाता है, जो कि पदार्थविज्ञानात्मक मेटिरीयल सायंस- नाम से लोक में विश्रुत है, वह भारतीय विज्ञान की परिभाषा में विकार विज्ञान, किंवा वैकारिक विज्ञान है, जिसे - ' प्रकृतिविज्ञान ' १६
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शतपथभाष्य नाम से व्यवहृत करना सर्वथा भ्रान्ति है । प्रकृतिविज्ञान तो वह ' यज्ञविज्ञान ' है, जो इस प्रत्यक्ष दृष्ट- श्रुत-उपवर्णित भौतिक वैकारिक विज्ञान का आधार माना गया है । जबतक भूतविज्ञान प्रकृतिविज्ञानात्मक यज्ञविज्ञान अनुरूप बना रहता है, तबतक तो यह विश्वशान्ति का कारण प्रमाणित है । यदि यज्ञविज्ञानात्मक प्रकृति-विज्ञान की विपरीत दिशा का यह भूतविज्ञान श्रनुगामी बन जाता है, तो यही भूतविज्ञान विश्वविनाश का कारण प्रमाणित हो जाता है । इस दृष्टि को लक्ष्य बना कर ही मानव को भूतविज्ञान में प्रवृत्त होना चाहिए । भूत-विज्ञान स्वयं अपने रूप से विश्व के लिये वरदान है, यदि यह प्रकृतिविज्ञान के अनुरूप है, तो । नहीं तो इससे बड़ा भयानक अभिशाप भी कोई दूसरा नहीं है । ऋषिदृष्टि ने इसी तथ्य के आधार पर भूतविज्ञान का आधार यज्ञविज्ञान को बनाया, यज्ञविज्ञान को ब्रह्मविज्ञान से नियन्त्रित किया, एवं इन ब्रह्म - यज्ञ - भूत- तीनों विज्ञानों को आत्मसमर्पणबुद्ध्या सर्वाधार आत्मदेवता में प्रतिष्ठित करते हुए विविध- नानारूप - मर्त्यभावों को अमृतभाव में परिणत कर दिया, जबकि श्रात्मा, ब्रह्म, यज्ञ, प्रतिष्ठानों से पराङ्मुख आजका भूतविज्ञान अमृतप्रतिष्ठा से एकान्ततः वञ्चित रहता हुआ केवल एषणावर्द्धक प्रमाणित होता हुआ रक्षण के स्थान में संहार का हौं सन्देशवाहक बनता जा रहा है । १०५ – भूतविज्ञान, और मानव के चार पुरुषार्थ-पुनः यह स्मरण कराया जा रहा है कि, उक्त चारों विवर्त्त समन्वित रूप से मानव की अध्यात्म संस्था से सम्बन्ध रखने वाले ' आत्मा - बुद्धि- मन- शरीर ' इन चार संस्थाओं के उपकारक बने हुए हैं । आत्मज्ञान मानवीय आत्मा का, ब्रह्मविज्ञान मानव के कारणशरीरात्मक बुद्धिपर्व का, यज्ञविज्ञान मानव के सूक्ष्मशरीरात्मक मनः पर्व का " एवं भूतविज्ञान मानव के स्थूलशरीरात्मक शरीरपर्व का उपकारक बना हुआ है । उपकारक चारों साघन क्रमशः प्रपत्तिलक्षणा संवित, विजाननलक्षण ज्ञान, उपासन, कर्म्म, इन नामों से व्यवहृत किए मा सकते हैं । कर्म्म के द्वारा भूतविज्ञान मानवके शरीरको पुष्ट रखता है, उपासना के द्वारा यज्ञविज्ञान मानव के मन को तुष्ट रखता है, ज्ञान के द्वारा ब्रह्मविज्ञान मानव की बुद्धि को तृप्त रखता है, एवं संवित् के द्वारा श्रात्मज्ञान मानव के आत्मा को सुशान्त रखता है । मानव न केवल शरीर ही है, न मन ही है, न बुद्धि ही है, एवं न केवल आत्मा ही है । अपितु चारों के समन्वित रूप का नाम हीं ' मानव ' है । इत्थंभूत मानव तभी सर्वात्मना श्रभ्युदय - निःश्रेयस का पात्र बन सकता है, जबकि यह आत्मना शान्त रहे, बुद्धया तृप्त रहे, मनसा तुष्ट रहे, एवं शरीरेण पुष्ट रहे । चारों मे से यदि एक भी पर्व अव्यवस्थित है, तो मानव कदापि सुखी - शान्त नहीं रह सकता । इसी आधार पर तो भारतीय ऋषिप्रज्ञा ने मानव को चार पुरुषार्थों से समन्वित माना है । १०६ - मानव और पशु के समानधर्म्म— बात नवीन नहीं है, अपितु सब की जानी बूझी हुई है । मोक्ष - धर्म्म - काम - अर्थ - चारों पुरुषार्थं प्रसिद्ध ई । ' अर्थ ' का शरीर से, काम का मन से, धर्म्म का बुद्धि से, एव मोक्ष का आत्मा से क्रमिक सम्बन्ध है । नहीं मानव इन चार पुरुषार्थों से समन्वित है, वहाँ मानवेतर समस्त प्राणी केवल मन, और शरीर से सम्बन्ध रखने वाले काम, एवं अर्थ, इन प्रकृत्यर्थों पर विश्रान्त हैं । शरीर - मनोऽनुबन्धी- आहार - निद्रा - भय-आदि ही प्राकृत पशु - पक्षी - कृमि - कीटादि की जीवनसत्ता के एकमात्र इतिवृत्त हैं । यदि मानव अपने भूत-विज्ञान के माध्यम से, किंवा - शिक्षा - व्यवसाय- शिल्प - कला - शासन -राजनीति - समाजनीति - साम्यवाद - प्रजा-१००
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पारिभाषिकसूचनाएँ समाजवाद -आदि आदि के माध्यम से अपने मनः शरीरमात्रानुबन्धी कामभोगमात्र की व्यवस्था कर लेना हीं, दूसरे शब्दों में योगक्षेमनिबन्धना श्राहार - विहारादि की ( खान - पान की ) चिन्ता निवृत्त कर लेना हीं अपना ' परम पुरुषार्थ मानता है, तो इस दृष्टिबिन्दु से तो मानव और पशु में कोई भी विभेद शेष नहीं रह जाता-‘ सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ' । १०७ - समदर्शनानुगता आत्मप्रतिष्ठा— यदे मानव के जीवन का उद्देश्य केवल योगक्षेम ही है, तो मानव और पशु में वह ऐसी कौनसी मध्यरेखा है, जिसके आधार पर मानव अपने आपको पशु की अपेक्षा श्रेष्ठ मान रहा है? | क्या आज का मानव इस वर्गभेद का भी उच्छेद कर देना चाहता है? । पक्ष तो ठीक है । किन्तु इस दृष्टि से १, समदर्शन की दृष्टि से, जिसके आधार पर ' मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि ' - ' मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् ' इत्यादि सिद्धान्त स्थापित हुए हैं, जिस इत्थंभूत आत्मसमदर्शनमूलक साम्यवाद का - ' शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ' इस रूप से भारतीय आर्षप्रज्ञा ने भी समर्थन किया है । ' गुह्य ं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं ह किचित् ' ( महाभारत ) इस उदात्तघोषणा का क्या खानपान की समस्या के समाधान मात्र पर ही विश्राम है? । श्रालप्यालम्! कथापि खल पापानामलम श्रेयसे मतः । १०८ -- समन्वयात्मिका मानवपर्वचतुष्टयी-स्पष्टतम है कि, आत्मानुगत मोक्ष, तथा बुद्धयनुगत धर्म्म, ये ही दो वे विशेषताएँ हैं, जिन्होंनें मानव को पशु की अपेक्षा श्रेष्ठ प्रमाणित कर रक्खा है । इसी आधार पर - ' तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये े ' ( उपनिषत् ) इस रूप से ऋषि ने मनः शरीरधर्म्मा भी मानव का ध्यान आत्मा, और बुद्धि के प्रति आकर्षित किया है । संसिद्ध है कि, शरीरसंरक्षक वे ही अर्थ मानव के स्वरूपरक्षक मानें जायँगे, जो इसके मनस्तन्त्रानुगत कामभाव को विचलित नहीं कर देंगे । मनः संरक्षक वे ही कामभोग मानव के संरक्षक कहें बायेंगे, जो इसके बुद्धितन्त्रानुगत धर्म्मभाव को विचलित नहीं करेंगे । एवमेव बुद्धि संरक्षक वे हैं | धर्म्मभाव इसके स्वरूप संरक्षक उद्घोषित होगे, जोकि इसके मोक्षभाव को विचलित नहीं करेंगे । इसी आधार पर यह कह दिया जायगा कि, वह भूतविज्ञान हेय है, जो शरीरमात्र को तो पुष्ट करता है, किन्तु जिससे मानवीय मन - बुद्धि- आत्मा तीनों क्रमशः क्लान्त - श्रान्त - अशान्त बने रहते हैं । एवमेव वह यज्ञविज्ञान भी, तदनुप्राणिता उपासना भी उपेक्षणीया ही कही बायगी, जिससे तात्कालिक रूप से मानसिक अनुरञ्जन तो सम्भव बनेगा, किन्तु जो न शारीरिक अर्थ की व्यवस्था कर सकेगी, न बौद्धिक धर्म्माचरण को प्रश्रय देगी, एवं न जो आत्मिक अनुध्यान का ही समर्थन करेगी । तथैव वैसा तत्त्वदर्शनात्मक ब्रह्मविज्ञान भी सर्वथा अनुपयुक्त ही माना जायगा, जो अपनें तत्त्वविजृम्भणों से बुद्धि को सुतीक्ष्ण बनाने की क्षमता रखता हुआ भी न तो शारीरिक व्यवस्था सुरक्षित रक्खेगा, न मनस्तुष्टि का संग्राहक बनेगा, एवं न श्रात्मशान्तिका, उपोद्बलक बनेगा । तथैव वैसा श्रात्मज्ञान भी यहाँ कदापि सम्मानित नहीं होगा, जो अपने क्षीणोदर्क भाव से कहने - सुनने मात्र के लिए, और सम्भवतः वस्तुगत्या भी आत्मस्थिति का कारण बनता हुआ भी न तो शरीरानुवन्धी क का ही समर्थन करेगा, न मनोऽनुबन्धी तुष्टिभावों का ही समादर करेगा, एवं न बुद्धयनुबन्धी धर्म्माचरण को ही लक्ष्य बनाएगा । ऐसा ही तो कुछ घटित विघटित हो रहा है आज हमारे राष्ट्र में । १०१
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शतपथभाष्य यदि कोई शरीरचिन्तातुर है, तो उसे मन - बुद्धि- आत्मा का ध्यान नहीं है । यदि कोई उपासना के द्वारा मनःसन्तोष में प्रवृत्त है, तो उसे शरीर - बुद्धि- आत्मा का कोई ध्यान नहीं है । यदि कोई तत्त्वचिन्तन रूप बुद्धिवाद से ग्रस्त है, तो न उसे शरीरचिन्ता है, न मनोविनोद है, न आत्मानुगता श्रद्धा - श्रास्था है । और यदि कोई वीतराग आत्मचिन्तन पथ का पथिक है, तो उसके बुद्धि - मन- शरीर तीनों पर्वों के उत्तरदायित्त्व के भार से राष्ट्र उत्पीड़ित हो रहा है । इसप्रकार भगवान् व्यास के - ' तत्तु समन्वयात् ' सिद्धान्त की उपेक्षा कर देने वाले आज के भारतीय मानव का न शरीर स्वस्थ है, न मन तुष्ट है, न बुद्धि तृप्त है, न आत्मा शान्त है । घोषणाओं में सब कुछ प्राप्त कर लिया है आज के राष्ट्रीय मानव नें । किन्तु आत्मा - ब्रह्म - यज्ञ -भूत - विज्ञानों की वेदशास्त्रसिद्धा मौलिक परिभाषाओं से अपरिचित रहता हुआ वस्तुगत्या है ये चारों हीं क्षेत्रों में केवल क्षणिकं - क्षणिकं, अतएव शून्यं शून्यं, अतएव दुःखं दुःखं - रूपा उस नास्तिसारा अनार्ष -भावना का ही लक्ष्य, जिन इत्थंभूत अनार्ष लक्ष्यों के साथ यहाँ की आर्षप्रज्ञा की नित्यं - नित्यं, -अतएव पूर्णं - पूर्णं, श्रतएव श्रानन्दः - श्रानन्दः, इस भावनात्रयी के माध्यम से सदा से प्रतिद्वन्द्विता ही रही है । ६. प्रार्षनिष्ठानुगता विज्ञानधारा– १०६.. ' प्रकृतित्र द्विकृतिः कर्त्तव्या ', देवाननुविधा वै मनुष्याः ' यही है यहाँ की आर्धनिष्ठा, जिसका तात्पर्य्यं यही है कि, यज्ञविज्ञानसंस्था के आधार पर ही मानव को अपनी भूतविज्ञान - संस्थात्मिका श्रध्यात्म-संस्था का समन्वय करना चाहिए, यही इसकी यज्ञोच्छिष्टानुगति मानी गई है, जिसका निष्कर्ष यही है कि, यह दृश्य प्रपञ्चात्मक भूतविज्ञान विवर्त्त प्राणात्मक, अतएव दृश्य यज्ञविज्ञान पर प्रतिष्ठित रहने वाला उसी का प्रवर्ग्यरूप शेषांश है । ' उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वम् ' - ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथाः ' इत्यादि श्रौत सिद्धान्त इसी विज्ञान का स्पष्टीकरण कर रहे हैं । नीचे लिखे परिलेखों से भारतीय ज्ञानविज्ञानधाराओं का भलीभाँति स्पष्टीकरण हो जाता है । १ - श्रात्मा - ज्ञानययः -- आत्मज्ञानम् — पुरुषज्ञानम् २ - ब्रह्म --– विज्ञानमयम् - ब्रह्मविज्ञानाम् - प्रकृतिविज्ञानम् ३ - यज्ञः -— विज्ञानमयः-- यज्ञविज्ञानम् - प्रकृतिविकृतिविज्ञानम् ४- भूतम् - विज्ञानमयम् - भूतविज्ञानम् - विकारविज्ञानाम् १ – पुरुषज्ञानांशः- -- आत्मा - आत्मा-- * · --लोकातीतः २ - प्रकृतिविज्ञानांशः -- बुद्धिः - कार णशरीरम् - सौरम् ( अव्यय प्रधानम् ) ( अक्षरप्रधानम् ) ( आत्मक्षर प्रधानम् ) ( विकारक्षर प्रधानम् ) - स एष मानवः ३ - प्र ० वि ० विज्ञानांशः - मनः सूक्ष्मशरीरम् - चान्द्रम् ४ - विकारांशः -- -- शरीरम् स्थूलशरीरम् -- पार्थिवम् १०२
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पारिभाषिकसूचनाएँ १- आत्मना – शान्तिमर्जयति – मानवः ( सैषा श्रात्मस्वरूप निष्पत्ति:) २ - बुद्धधा--- तृप्तिमर्ज यति- -- मानवः ( सैपा कारणशरार निष्पत्तिः ) ३ - मनसा -- तुष्टिमर्जयति- -- मानवः ( सैषा सूक्ष्मशरीरनिष्पत्तिः ) ४- शरीरेण - पुष्टिमर्जयति-- --- मानव: ( सैषा स्थूलशरीर निष्पत्तिः ) १- शान्तात्मना - मोक्षसाधनम् - ततः - आत्मसंविदवाप्तिः २ - तृप्तबुद्धया - धर्म्मसाधनम् -- ततः - व्यवसायनिष्ठावाप्तिः ३ – तुष्टुमनसा – कामसाधनम् - - ततः स्थितप्रज्ञतावाप्तिः ४ - पुष्टशरीरेण - अर्थसाधनम् -- ततः - लोकवैभवाप्तिः - निःश्रेयससिद्धिः - अभ्युदयसिद्धिः ११० -- प्रतीच्य विद्वानों के प्रति कृतज्ञतार्पण-“ काल्वालीकृता स्मृति के अनुग्रह से " कृतज्ञता रूप से इत्थंभूत दृष्टिकोण सधन्यवाद समर्पिस करता हुआ भारतवर्ष उनके सम्मुख प्रणत्तभाव से इतना भर निवेदन कर देने का परम्परासिद्ध श्राध्यात्मिक उत्तरदायित्त्व सुरक्षित रखने में आज भी अपने श्रापको समर्थ अनुभूत कर ही रहा है । भारतीय ' विज्ञान ' शब्दार्थ समन्वय के सम्बन्ध में अब हम श्रोर क्या विशेष निवेदन करें, जब कि आन शरीरशुद्धि के प्रकार भी हम से पगः परावत बन गए हैं । स्नान - भोजन - गमन - शयन - शिष्टाचार - भाषणा-लेखन श्रादि आदि सभी क्षेत्रों में श्राज हम भारतीय सर्वथा ही शून्यं शून्यं प्रमाणित हो रहे हैं, जब कि उन विज्ञाननिष्ठों की जीवनपद्धतियाँ उनके अपने देश - कालानुबन्ध से आज सर्वथा सुव्यवस्थित हैं । सचमुच वे तो श्राज के युग के मानवश्रेष्ठ ही मानें जानें चाहिएँ, जो जिज्ञासापूर्वक तत्त्वान्वेषण - कम्मों में अनन्य अध्यवसाय से तल्लीन हैं, जब कि हमारे यहाँ का विद्वद्वर्ग भी अपने आपको सब दिशाओं से कृतकृत्ष मान रहा है । उन अध्यवसायनिष्ठों पर श्रवश्य ही प्रकृतिदेवी कभी न कभी अनुग्रह कर ही देगी । ' कर देगी ' कहने मात्र से ही प्रकृति अनुग्रह कर नहीं दिया करती । उस अनुग्रह के प्रकार तो उन्हें आज भी इस प्राच्यदेश की पुराणी प्रज्ञा में ही अन्तर्निहित उपलब्ध होंगे । अतएव यहाँ के मानवों को पराया न समझ कर आत्मीयभाव से ही इन्हें अपने वक्षस्थल से शुद्ध बुद्धिपूर्वक समालिङ्गित करते हुए समन्वयबुद्धिमाध्यम से हो उन्हें वैसा उपाय खोज निकालना है, जिसके द्वारा सम्पूर्ण मानव एक दूसरे को परस्पर ग्रात्मबन्धु मानते हुए स्वस्तिमाव प्राप्त कर सकें । क्योंकि विज्ञान किसी का प्रांतिस्विक दायाद नहीं है । जब कि मानवात्र विश्वमानवता के श्रङ्ग हैं, तो सभी मानव विश्वविज्ञान के प्रति समानरूप से दायादभोक्ता माने जा सकते हैं । अतएव जिन निरर्थक ग्लानिकर मनोमालिन्यजनक हेत्वाभासों से प्राच्य-१०३
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शतपथभाष्य प्रतीच्य में अन्तराय उत्पन्न हो जाता है, उन्हें सर्वात्मना निःशेष करते हुए सभी को इस विज्ञानसत्त्रात्मक ज्ञानसत्त्र में समाविष्ट होते हुए विज्ञानसमन्वय में निर्विरोध समन्वित होने का हो प्रयास करना चाहिए । १११ - विश्वशान्ति, एवं लोकवैभव प्रवर्त्तक भारतीय विज्ञान-स्पष्ट है कि, भारतीय ऋषिप्रज्ञा ने एक ओर यदि श्रात्म - परमात्म जैसे सुसूक्ष्म तत्त्वों के ईक्षण में पारदर्शिता प्राप्त की है, तो परीक्षणात्मक भूतविज्ञान भी इसकी दृष्टि से परोक्ष नहीं रहा है । अवश्य ही बेदयुगात्मक देवयुग में विविध प्रकार के वैसे वैज्ञानिक आविष्कार भी हुए हैं भारतराष्ट्र में, जिनका यत्रतत्र स्वयं वेदशास्त्र में यशोवणन उपलब्ध है । हमारी इच्छा थी कि, ‘ भतविज्ञान ' से सम्बन्ध रखने वाले जिन भौतिक श्राविष्कारों का वेदशास्त्र में साटोप उपबृंहण हुआ है, उनमें से कुछ एक के निदर्शन प्रस्तुत वक्तव्य में समाविष्ट किए जाते । किन्तु वक्तव्य आवश्यकता से अधिक विस्तृत हो गया है । इसके अतिरिक्त सर्वात्मना सम्पूर्ण विज्ञानपरम्पराओं को विस्मृत कर देने वाले आज के भारतीय मानव के लिए ऐसे निदर्शनों का यशोगान करना केवल अपना उपहास ही कराना है, जबकि आज ' विज्ञान ' शब्द के उच्चारण का भी इसे अधिकार नहीं रह गया है । इन्हीं सब कारणों से यह निदर्शनप्रसङ्ग अनावश्यक मान लिया गया है । ' वेदस्य सर्वविद्यानिधानत्त्वम् ' नामक स्वतन्त्र संस्कृत वक्तव्य में इन निदर्शनों के कतिपय संस्मरण संगृहीत हैं । जिनका मुख्य उद्देश्य एकमात्र यही है कि, आजके भारतीय विद्वान् अपनी वर्त्तमान दर्शनभक्ति का परित्याग कर वेदशास्त्रसिद्ध विज्ञानोपसना में जागरूक बनें, तद्द्द्वारा अपने विलुप्त विज्ञानगौरव को प्रतीच्य विज्ञान के साहाय्य से पुनः प्रतिष्ठित करें । इसीलिए शतपथब्राह्मण का भाग्य राष्ट्रभाषा हिन्दी में उनके सम्मुख प्रणतभाव से प्रस्तुत हो रहा है, जिसमें प्रधान रूप से भारतीय वैज्ञानिक परिभाषाच्चों के समन्वय की ही चेष्टा हुई है । वर्तमान भूतविज्ञान के व्यामोहन से सर्वथा असंस्पृष्ट रहते हुए केवल भारतीय यज्ञविज्ञान, तथा तन्मूलक ब्रह्मविज्ञान की परिभाषाओं का यथाशक्य स्पष्टीकरणर करने का प्रयास करना हीं हमारे यत्रतत्र उद्धत ' विज्ञान ' शब्द का समन्वयार्थ है । ब्रह्मविज्ञान के आधार प्रतिष्ठित यज्ञविज्ञान हीं भारतीय विज्ञान शब्द की मौलिक अर्थसङ्गति है, जिसके द्वारा भूतविज्ञान के समन्वय का भी उपक्रम सम्भव है । और इसके लिए प्राच्य - प्रतीच्य विज्ञानों का उभयनिष्ठ मेघाषी वैज्ञानिकों के द्वारा समन्वय अपेक्षित है । अवश्य ही इस समन्वय से विश्वमानव विज्ञान के उस सिद्धान्त बिन्दु को लक्ष्य बना में समर्थ बन सकेगा, जिस समन्वयविन्दु को प्रतिष्ठा बनाने के अनन्तर यही विज्ञान विश्वशान्ति, तथा लोकवैभव, दोनों महान् फलों का सर्जक प्रमाणित हो सकता है । ११२ - ईश्वरीय विज्ञान के साथ मानव स्वरूप का समतुलन-भारतीय ' विज्ञान ' शब्द के समन्वय से सम्बन्ध रखने वाले प्रस्तुत वक्तव्य के आधार पर अब सर्वान्त में एक विशेष आर्ष - प्राच्य दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण और कर लेना है । निवेदन किया गया है कि, भारतीय ज्ञान - विज्ञान - धाराएँ क्रमशः आत्मज्ञान, ब्रह्मविज्ञान, यज्ञविज्ञान, तथा भूतविज्ञान, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । ये चारों ज्ञान - विज्ञान - धाराएँ क्रमशः मानव के प्रकृति - विकृति भावों से सर्वथा प्रतीत अव्ययपुरुषनिबन्धन आत्मतन्त्र से, ‘ पराप्रकृति ' नामक ' मूलप्रकृति ' रूप अक्षरनिबन्धन बुद्धितन्त्र से, ' प्रकृतिविकृति ' नामक १०४
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पारिभाषिकसूचनाएँ ‘ तूलप्रकृति ' रूप आत्मक्षरनिबन्धन मनस्तन्त्र से, एवं ' विकृति ' नामक विकारजगद्रूप विकारक्षरनिबन्धन शरीरतन्त्र से क्रमश: समन्वित हैं, जिस इस समन्वय से हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, मानव का श्रात्मा अव्ययज्ञान से उपकृत है, मानव की बुद्धि अक्षर विज्ञान से, मानव का मन क्षरविज्ञान से, तथा मानव का शरीर विकारविज्ञान से उपकृत है । “ आत्मा - बुद्धि - मन- शरीर, ये चारों मानवीय पर्व विश्वेश्वर के श्रव्ययज्ञान - अक्षरविज्ञान-क्षविज्ञान - विकारविज्ञान से उपकृत हैं " क्या तात्पर्य हुआ इस वाक्यसन्दर्भ का? | व्यवहारदृष्टि से, किवा उपयोगिता की दृष्टि से क्या समझें, और क्या करें इन ज्ञान - विज्ञानधारों के समन्वय से १ । क्या भारतीय प्रज्ञा भी ' विज्ञान ' के तृतीय संस्थानरूप ' भूतविज्ञान ' को आधार बना कर वर्त्तमान भौतिक विज्ञान की ही भाँति कुछ एक वैसे भूत - भौतिक श्राविष्कार करने लग पड़े १, जिनसे मानवीय लौकिक व्यवहार सर्वथा सुगम बन जाया करते हैं । एवं जिन इत्थंभूत अनुकूलताप्रवर्त्तक भौतिक आविष्कारों से मानव अत्यधिक श्रम - परिश्रमों के संघर्ष से अपन । परित्राण कर लेता है । सर्वथा सुविधाजनक ऐसे भौतिक आविष्कारों का सर्ज्जन कर इनके माध्यम से श्रम- परिश्रमात्मक संघर्षजीवन को जलाञ्जलि समर्पित करते हुए अनुकूलता - सुख - सुविधा - पूर्वक अपने स्थूलशरीर को कुसुमसदृश बनाए रखना, ऐले सघर्षशून्य शरीर को केवल आहार - निद्रा - काम - भोग-परायण बनाए रखना हीं यदि भौतिक विज्ञान के नूतन आविष्कारों का एकमात्र महान् फल है, तो प्रणम्य हैं विदूर से ही ऐसे भूताविष्कार, एवं नमस्य हैं दूर से ही इसप्रकार के शारीरिक काम - भोग समर्थकमात्र भौतिक विज्ञानों का अमानवीय, किंवा दानवीय, किंवा तो पशव्य विजृम्भण । ११३ - अनुकूलताप्रवर्त्तक भूतविज्ञान के प्रकाण्ड ताण्डव नृत्य-तात्कालिकी प्रत्यक्ष दृष्टि अवश्य ही कामोपभोगसाधक - अनुकूलताप्रवर्त्तक इन भूतविज्ञानों, तथा तदनुबन्धी भौतिक श्राविष्कारों का महतो महीयान् ही उपयोग प्रतीत हो रहा है । सम्भवत: इसी तात्कालिक श्राकर्षण के अनुग्रह से ही आज ज्ञानविज्ञाननिष्ठा भारतीय श्रार्षप्रज्ञा भी इसी उपयोगितावाद के तात्कालिक व्यामोहन से व्यामुग्ध बनती हुई अपने ज्ञानविज्ञानसिद्ध शास्त्रीय विधि विधानों के प्रति - " क्यों ऐसा करें?, क्या उपयोग है इनका १, क्या उपयोगिता है आडम्बरपूर्ण विज्ञानशून्य इन शास्त्रीय विधि - विधानों की? " इसप्रकार के अनेक तर्कनालों का सर्जन करती हुई वर्त्तमान प्रतीच्य भूतविज्ञानाकर्षण मात्र के पथ का ही प्रचण्डवेग से अनुधावन करती नारही है, मानों इसके अपने शास्त्रीय विधि - विधानों का ' सत्यविज्ञान ' से कोई सम्बन्ध ही न हो । फलतः इनका मानवीय जीवन की उपयोगिता से सम्पर्क ही न हो । किन्तु स्पष्ट है कि, प्रत्यक्ष में महान् भी उपयोगी प्रतीत होते रहने वाले भौतिक आविष्कार ज्ञानप्रतिष्ठा लक्षणा ग्रात्मप्रतिष्ठा से वञ्चित रहते हुए केवल मानव के मनःशरीर - निबन्धन काम - भोगों के ही समुत्तेजक बने हुए हैं । इनसे न लोकसंग्रह सुरक्षित, न लोककामना ही पुष्पित - पल्लवित । श्रपितु लोकविनाश, तथा तन्मूला वह लोकैषणा, जिसके द्वारा साम्राज्यलिप्सा - शासन लिप्सा - भोगलालसा - ही प्रतिक्षण प्रवृद्ध बनती रहती है - ही उदीप्त बनती रहती है, बन रही है श्रात्मप्रतिष्ठा व श्चित, अतएव श्रात्ममूलक समदर्शन से पराङ्मुख इन भौतिक वैज्ञानिक महारम्भों के प्रकाण्ड - ताण्डव नृत्यों से । १०५