Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 401–410

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 401–410

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प्रथमकाण्ड ( अनुवाद ) – ( व्रतप्रहरण के अनन्तर - ' अशनानशन ' नाम से प्रसिद्ध श्रारण्य ओषधि, अथबा फलभोजन का विधान है । अतः व्रतग्रहण के अनन्तर ( क्रमप्राप्त ) अशनानशन का ही निरूपण करते हैं । इस अशनानशन के विषय में ' सवयस ' के पुत्र, अतएव ' सावयस ' नाम से प्रसिद्ध ‘ अष।टु ' नाम के महर्षिने अनशन को ही ( न खाने को ही ) व्रत माना है । ( अपने-अनशनपक्ष को विज्ञानसम्मत बतलाते हुए अषाढऋषि कहते हैं कि ) देवगण मनुष्य के मन को ( मन के भावों को ) सब ओर से जानते हैं ( अर्थात् देवताओं से मनुष्यों के मन की कोई भी बात छिपी हुई नहीं है ) । अतएव देवता व्रतग्रहण करते हुए यजमान को ' यह प्रातःकाल हमारा यजन करेगा ' इसप्रकार पहिचान लेते हैं । अर्थात् जिस समय यजमाम व्रतग्रहण करता है, उसी समय देवगण उसके मन की ' मैं कल देवताओं का यजन करूँगा ' इस वृत्ति को पहिचान जाते हैं । जब देवताओं को निश्चय हो जाता है कि, यह कल ( प्रतिपत् को ) हमारा यजन करेगा, तो ये सम्पूर्ण देवता उस दिन ( पहिले दिन ) इस यज्ञकर्त्ता यजमान के घर आजाते हैं | आकर वे देवता इसके समीप बस जाते हैं! ( क्योंकि इस दिन देवता यजमान के समीप बसते हैं, अतएव ) यह दिन ' उपवसथ ' दिन कहलाता है ॥ ७ ॥ ( अतिथिरूप से

घर में श्राए हुए ) मनुष्य के भोजन कराने से पहिले जो गृहस्थ आप खालेता है - यही जब जब सर्वथा अनुचित है, तो भला उस अनौचित्य का तो कहना ही क्या है कि, अतिथिरूप से घर में आए हुए देवताओं के खाने से पहिले ही जो यजमान भोजन कर लेता है । अर्थात् जबकि मनुष्य - अतिथि को ही ( सामान्य अतिथि को ही ) भोजन कराये पहिले स्वयं भोजन करना अनुचित है, तो जिसके घर में सर्वपूज्य देवता अतिथि बनकर आए हों, और उन श्रेष्ठ अतिथियों को भोजन न कराए पहिले जो यजमान स्त्रयं खा लेता हो, इस प्रकार के - ( आतिथ्यविरुद्ध ) अशन के अनौचित्य का तो कहना ही क्या है | अतः अतिथिधर्म का पालन करने के लिए हमारे ( अषाढ के ) मता-नुसार इस दिन कुछ भी नहीं खाना चाहिए ॥ ८ ॥ ( पाढऋषि के इस अनशनपक्ष को दूषित

बतलाते हुए मधुश्रवा नाम के याज्ञवल्क्य के पट्टशिष्य अपने गुरु याज्ञवल्क्य का मत बतलाते हैं ) यदि ( इस दिन ) यजमान कुछ नहीं खाता है, तो ( इसका यज्ञकर्म्म देवदेवत्य न रहकर ) पितृ-देवत्य हो जाता है | यदि खालेता है, तो ( अषाढऋषि के कथनानुसार ) अतिथि बने हुए देवताओं का अतिक्रमण करके खाता है । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने के लिए हमारे ( याज्ञवल्क्य के ) विचार से वह यजमान जो अन्न, अथवा फल ' अशित अनशित ' हो, वही खाय | जिस अन्न की देवता हवि नहीं लेते हैं, वही अशितश्रनशित है । यह अन्न अशित होता हुआ भी अनशितवत् हो जाता है । अतएव इसे ' अशितान शित ' नाम से व्यवहृत किया जाता है, जैसाकि भाष्यमें बतलाने १३८

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शतपथब्राह्मण वाले हैं ) | यह यजमान इस अन्न को खालेता है, इसलिए तो उसका कार्य श्रपितृदेवत्य होजाता है । एवं जिस अन्न को देवता नहीं खाते, उसे खाता है, इसलिए देवताओं का अतिक्रमण करके भी नहीं खाता है । ऐसा करने से अतिथिमय्र्यादा का भी उल्लंघन नहीं होता, एवं देवकर्म्म पितृ-देवत्य भी नही बनता, यही तात्पर्य्य है ॥ ६ ॥ वह यजमान आरण्यक वस्तु ( प्रकृति से परिपक्व

अन्न ) ही खाय । जो जँगली अन्न हैं, एवं फल हैं, उन दोनों में से किसी को भी खाले ( क्योंकि इनकी हवि देवता ग्रहण नहीं करते । अतएव यह अन्न ' अशनानशन ' हो जाता है । ( इस पितृदेवत्य, और देवतातिक्रमण दोष का लक्ष्य में रखकर ही ) वृषा पुत्र, अतएव ‘ वाष्णं ' नाम से प्रसिद्ध ‘ बकु ' ' महर्षि ने ( दर्शेष्टि करने के लिए अमावास्या को व्रतग्रहण करके अपनी पत्नी से कहा था कि ) आज मेरे लिए केवल माष ( उर्द ) पकाओ । क्योंकि देवगण इनकी हवि ग्रहण नहीं करते हैं । ( परन्तु यह मत याज्ञवल्क्य के मतानुसार अशुद्ध है । अतएव इस मत का खण्डन करते हुए वे कहते हैं कि ) ऐसा कभी नहीं करना चाहिए । अर्थात् उपवास के दिन माप कभी नहीं खाना चाहिए । क्योंकि व्रीहि और यत्र का यह ' उपच ' है, जोकि शमीधान्य है । इस माष से ब्रीहि और यत्र को बढ़ाते हैं । अर्थात् माष डाल देने से चावलों की और जौकी उत्पत्ति अच्छी होती है । ( श्रतएव किसान लोग उनकी वृद्धि के लिए माषों को इनके खेत में डाल देते हैं ) ऐसी अवस्था में इन माषों में हविष्यान्नरूप ब्रीहिरस, और यवरस का मिलना अनिवार्य है । अतएव ( माष न खाकर ) आरण्य ओषधि ही खानी चाहिए ॥ १० ॥

( भाष्य ) -दर्श और पूर्णमास, दोनों इष्टियां अमोत्तर, एवं पूर्णिमोत्तर होतीं हैं । शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को ‘ दर्शेष्टि ' होती है, एवं कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को पूर्णमासेष्टि होती है । इष्टि होती है प्रतिपत् को, किन्तु दर्शेष्टि में अमावास्या में व्रतोपायनादि यज्ञाङ्गकर्म करने पड़ते हैं, इसलिए यह इष्टि ' दर्शेष्टि ' ( अमावास्येष्टि ) कहलाने लगती हैं । अतएव च कृष्ण प्रतिपत् में होने वाली इष्टि पूर्णिमा में होने वाले यज्ञाङ्गकम्र्मों के सम्बन्ध से पूर्णमासेष्टि कहलाने लगती । इन दोनों इष्टियों में से यद्यपि पहिले दर्शेष्टि का ही होना न्यायप्रा'त था । तथापि किसी कारण विशेष से पहिले पूर्णमासेष्टि का ही निरूपण किया गया है । यद्यपि आजकल लौकिक च्यवहार में पूर्णिमान्त मास माना जाता है । किन्तु वैदिक पद्धति के अनुसार ग्रमान्तमास को ही प्रधान माना जाता है । कारण इसका यही है कि, चन्द्रमा की पूरी परिक्रमा श्रमा पर ही समाप्त होती है । श्रमा से चल कर अमा पर पहुँच कर चन्द्रमा अपने परिभ्रमणवृत्त की ( जोकि वृत्त दक्षवृत्त नाम से प्रसिद्ध है ) एक परिक्रमा लगा लेता है । यही कारण है कि, पञ्चाङ्गों में पूर्णिमा के स्थान में १५ का होता है, और श्रमा के स्थान में ३० का श्रृङ्क होता है । क्योंकि पूर्णिमा महीने की १५ वीं तिथि है, और अमावास्या ३० वीं तिथि । इस श्रमान्तमास में शुक्लपक्ष पूर्वपक्ष कहलाता है, एवं कृष्णपक्ष परपक्ष कहलाता है । इसप्रकार अमरकार का ' पक्षौ पूर्वापरौ शुक्लकृष्णौ मासस्तु तावुभौ ' ( पूर्वपक्ष नाम का शुक्लपक्ष, और अपरपक्ष नाम का कृष्णपक्ष, दोनों की समष्टि ' मास ' कहलाती त्रै - अमर ० ११ १२ इति ) यह कथन हमारे श्रमान्तमास में पूरा १३६

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प्रथमकाण्ड प्रमाण बन जाता है । ऐसी अवस्था में अमोत्तर प्रतिपत् मास का प्रारम्भ दिन माना जाता है, और श्रमा-वास्या मास का अन्तिम दिन माना जाता है । पहिले श्रमा है, अनन्तर पूर्णिमा है । अतएव इन पतेष्टियों को ‘ दर्शपूर्णमासेष्टि ' कहा जाता है । यदि पूर्णिमान्त मास माना जाता, तो ' पूर्णमासदर्शेष्टि ' व्यवहार होता । पक्षाग्नि को, दूसरे शब्दों में मासाग्नि को आत्मसात् करने के लिए दर्शपूर्णमासेष्टि की जाती है । मास का पूर्वभाग मोत्तरप्रतिपत् से प्रारम्भ होता है | अतः - पहिले दर्शेष्टिका ही होना न्यायप्राप्त था । तथापि किसी कारणविशेत्र से ( जो प्रकरण के अन्तमें बतलाया जायगा ) पहिले पूर्णमासेष्टिका ही निरूपण किया गया है । दोनों हीं इष्टियाँ प्रतिपत् में होतीं हैं । उनके पहिले दिनमें उपवास किया जाता है । अतएव उनका यह पहिला दिन ‘ उपवसथदिन ' कहलाता है । इस उपवसथ दिन में १ आचमन, २ व्रतोपायन, ( त्रतग्रहण ) और ३ व्रतपालन ये तीन कर्म्म होते हैं । इन तीनों में तीसरा व्रतपालनकर्म्म है, उसके - १ सत्यभाषण २ आर-एयाशन ( अथवा फलाहार ) ३ अवः शयन, ( गार्हपत्यागार में अथवा श्राहवनीयागार में दम्पती का अधः-शयन ), और ४ ब्रह्मचर्य्यपालन, ये ४ अङ्गकर्म हैं । इन चारों से ' व्रतपालनकर्म्म ' का स्वरूप बनता है । इसप्रकार अमावास्या में होने वाले - आचमन, व्रतोपायन, व्रतपालन, इन तीनों कम्मों को हम ' उपवसथ दिनकर्म्म ' कहेंगे | इन उपवसथदिनकम्मों में से आचमन, व्रतोपायन, और व्रतपालनान्तर्गत सत्यभाषण, इन तीन कर्मों का तो सोपपत्तिक निरूपण कर दिया गया है । अब क्रमप्राप्त ' आरण्याशन ' का निरूपण करते हैं । ऋषि के मतानुसार इस दिन ( श्रमावास्या को ) यज्ञकर्त्ता यजमान को कुछ नहीं खाना चाहिए । कारण इसका यही है कि, यजमान ' अग्ने! व्रतपते ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ सर्वदेवस्वरूप ग्राहवनीय अग्नि की साक्षी में व्रतप्रहण करता है । इसी समय से यजमान अपने मन को देवताओं की और का देता है । व्रतग्रहणकाल से व्रतसमाप्ति - पर्यन्त यह अपने मनः - प्राण - वाङमय आत्मा को देवताओं अर्पण कर देता है । सौरप्राण का नाम हीं देवता है, जैसाकि व्रतोपायनकर्म में बतला आए हैं । एवं चान्द्रसोम ही इन अग्निरूप प्राणदेवताओं का अन्न है । सोम ही अन्नाद अग्नि का अन्न है । सोम को देखते ही आग्नेय प्राण उसे अपनी और उसीप्रकार आकर्षित कर लेता है, जैसे कि चुम्बक लोहे को अपनी ओर खैंचकर उसे श्रात्मसात् कर लेता है । यही चान्द्रसोम पूवप्रतिपादित पञ्चाहुतिविज्ञान के अनुसार हमारा अन्न बना हुआ है । इस अन्नरूप सोम को जब हम खाते हैं, तो सबसे पहिले उस भुक्तान्न के रस और मल, ये दो विभाग होते हैं । रसभाग को आत्मा पकड़ लेता है, और त्रिष्ठारूप मलभाग को धक्का देकर बाहिर निकाल देता है | मल भाग के निकलने के अनन्तर जो ' रस ' भाग बचता है वह भी शुद्ध रस नहीं है । उसमें भी रस मल दो भाग रहते हैं । इस रसभाग का जो ‘ रसभाग ’ है वह, ‘ अस्क् ' ( रुधिर ) कहलाता है, एवं मल भाग ‘ रस ’ ही कहलाता है । रसभाग के रसरूप इस असृक् में भी रस मल दोनों रहते हैं । उनकी जब छाँट होती है, तो दोनों विभाग अलग अलग हो जाते हैं । जो रसभाग है, वह ' मांस ' कहलाता है, एवं मलभाग ' असृक् ' कहलाता है | इस रसरूप मांस में भी रस मल दोनों विद्यमान हैं । इसका रसभाग ' मेद ' कहलाता है । मेद में भी रसमल दोनों । मेद का रसभाग ' अस्थि ' कहलाता है । अस्थि में भी रस मल दोनों हैं । इसका रसभाग ' मज्जा ' ( मींगी नाम से प्रसिद्ध चर्बी ) कहलाता है । मज्जा में भी रस मल दोनों हैं । इसके रसभाग का नाम ही ‘ शुक्र ' है । जिसप्रकार ओषधि को काटकर उसका रस निकाला जाता है, रसका सार खैंचा जाता है, उसीप्रकार वही भुक्त अन्न उत्तरोत्तर होनेवाली क्रमिक छाँट से १ रस, २ असृक्, ३ मांस, मेद, १४.

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शतपथब्राह्मण ५ अस्थि, ६. मज्जा, ७ शुक्र, इन सात अवस्थाओं में परिणत होजाता है । ये सातों शरीर में सातों पार्थिव धातु एक दूसरे के ऊपर चिने हुए हैं । सबसे ऊपर चर्म्म पृथिवी की वस्तु हैं । रस के है । चर्म्म के भीतर रसं है । भीतर असक् है । असृक् के भीतर मांस है । मांस के भीतर मेद है । मेद के भीतर अस्थि के भीतर मज्जा है । मजा के भीतर शुक्र है । इन पार्थिव धातुओं का अस्थि है । अतएव इन सातों घातुओं की ' चिति ' को ' भूतचिति ' कहते हैं । इन सातों धातुओं क्योंकि चिनाव हो रहा है, नामका अन्तिम धातु है, यह वही अन्नगत सोम है | किन्तु यह शुद्ध सोम में जो सातवाँ ' शुक्र ' एवं आन्तरिक्ष्य रस और मिला हुआ है । पूर्वोक्त ७ तों धातु पृथिवी नहीं की है । इसमें अभी पार्थिव रस, कहलाती है । अतएव इन ७ तों की समष्टि को हम ' वाक् ' कहने के लिए सन्नद्ध वस्तु हैं । एवं पृथिवी ‘ वाक् ’ नाम के अन्तिम पार्थिव धातु से जब पार्थिवरस निकल जाता है, तो केवल हैं । इनमें से सातवें शुक्र चच जाता है, शुक्र की इसी अवस्था को ' ओज ' कहते हैं । ओज अन्तरिक्ष अान्तरिक्ष्य और दिव्यरस शेष प्राणस्थानीय है । अन्तरिक्ष में रहने वाला सदागतिधर्म्मा वायु पार्थिव आकर्षण की वस्तु है । यही ओज ग्रोज बनता है । अतएव जिस मनुष्य में ओज की मात्रा जितनी अधिक से विमुक्त रहता है । यही अधिक निर्भार रहता है । एवं जिसमें ओज की मात्रा जितनी कम होती है, होती है, उसका शरीर उतना हीं श्रल्पप्राण रहता है । ओजस्वी के मुखपर दिव्यकान्ति विराजमान वह उतना हीं अधिक शिथिल और मक्खियाँ भिनभिनाया करतीं हैं । अन्तरिक्ष में व्याप्त रहती है । श्रजशून्य मनुष्य के मुखपर इस ओज को हम प्राण कहते हैं । इसमें से जब श्रान्तरिक्ष्य वायु को रस ही निकल प्राण कहते हैं । अतएव रह जाता है | दिव्यलोक में रहने वाला वही सोम संचरक्रम से अन्न बन जाता है, तो शुद्ध सोम वही सोम रसादिरूप में परिणत होता हुआ अपनी शुद्ध अवस्था में जाता है । एवं प्रतिसंचरक्रम से सोम का नाम ‘ मन ' है । संसार में शीघ्र गमन करने वालों में वायु सबसे परिणत अधिक हो जाता है । इसी शुद्ध सोमरूप मन वायु से भी कई हजार गुना अधिक वेग से चलता है । एक तीव्रगामी । परन्तु यह मन जयपुर से कलकत्ते चला जाता है, और पुन: लौट आता है । कलकत्ते निमेष की के तो भीतर कथा भीतर आपका दिव्यभाव तो क्षण मात्र में १४ हों भुवनों में चङक्रमण कर आता है । मनकी इसी शीघ्रगति का वर्णन ही क्या है, यह वेदपुरुष कहते हैं—— करते हुए

यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैनं तदु सुप्तस्य तथैवैति ।

दुरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥

—यजुःसंहिता - ४ | १ | “ जो मन जाग्रदवस्था में अत्यन्त विदूर अनुधावन करता रहता है, विदूरगति का अनुगामी बनता रहता है, जो मन दूरसे दूर दौड़ने वाला है, एवं जो तथैव मन सूर्य्य सुप्तावस्था में भी जो का ज्ञान करवाने के कारण ज्योतियों का भी ज्योति है, ऐसा वह मेरा मन शुभ संकल्पवाला चन्द्रादि ज्योतियों बने ” उपर्युक्त मन्त्र * –यो नै प्राणः, स वातः । अयं वै प्राणः, योऽयं ( अन्तरिक्ष ) पवते । - शतपथना. ५ | २ | ३ | ६ | १० | १४१

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प्रथमकाण्ड का यही अक्षरार्थ है । इसप्रकार ' अन्नमें आया हुआ, रस मल के क्रभिक बिशकलन से शुद्धरूप में ( अणिमाभात्र में ) परिणत होता हुआ वही सोम ' मन ' कहलाने लगता है ' यह तथ्य पूर्व के निदर्शन से भलीभांति सिद्ध होजाता है । अतएव मनको अन्नमय कहा जाता है ( छांदोग्य, ५।४ ) | सातों धातु वाक् है । ओज प्राण है | शुद्ध सोम मन है । सातों धातु पार्थिव है । आज प्रान्तरिक्ष्य है । मन दिव्य है । तीनों की समष्टिका नाम ही क्षर आत्मा है । इसी आत्मा का निरूपण करती हुई बृहदारण्यकश्रुति कहती है— ' स वा एष आत्मा वाङमयः प्राणमयो मनोमयः ' इति । 310 रस, असृक्, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, - पार्थिवधातु ' वाक् ' प्रोज शुद्धसोम आन्तरिक्ष्य - ‘ प्राण ’ दिव्य - ' मन ' पूर्व के निदर्शन से ' मन साक्षात् चान्द्रसोम है ' यह सिद्ध होजाता है । क्योंकि मन साक्षात् सोम है, एवं सोम श्राग्नेय प्राणदेवताओंका अन्न है । अतएव यदि मनका देवताओं की ओर झुकाव होजाता है, तो सम्पूर्ण आग्नेय देवता मनकी ओर अनुगत होजाते हैं । आज यजमानने ' मैं कल देवताओंका यजन करूँगा ' यह संकल्प किया है । अतएव सम्पूर्ण देवताओं की अनुगति यजमान के मनकी ओर होगई है । अपिच त्रैलोक्य - व्यापक प्राणदेवताओं से मनका भाव नहीं छिपाया जासकता । ' वातो देवेभ्य आचष्ट यथा पुरुष ते मनः ' के अनुसार प्राणदेवता, और प्राणदेवताओं को यज्ञ के द्वारा आत्मा में श्राहित करने वाले भौमदेवता यजमान जो कुछ संकल्प करता है, उसे तत्क्षण पहिचान लेते हैं । यजमान की भावना के साथही सवज्ञ चेतनामय प्राणदेवता यजमान के यज्ञमण्डल में प्रविष्ट होजाते हैं । उपवास के दिन व्रतग्रहण के समय से ही प्राणदेवताओं की यजमान की यज्ञशाला की ओर अनुगति होजाती है । क्योंकि इस दिन देवता यजमान के सन्नि-कट आजाते हैं, अतएव ‘ यजमानसमीपे वसन्ति यस्मिन् दिवसे देवता: ' इस व्युत्पत्ति से यह दिन ' उपवसथ ’ कहलाने लगता । यजमान की यज्ञशाला में आज सम्पूर्ण प्राणदेवता अतिथिरूप से व्याप्त होरहे हैं । अतः अतिथिधर्म्म के अनुसार इस दिन यजमान को ' अनशन ' ही करना चाहिए । परन्तु इसमें एक विप्रतिपत्ति उपस्थित होजाती है । यदि यजमान ' अतिथिधर्म ' को प्रधान मान कर अनशन करता है, तो इस का यह देवकार्य्यं पितृदेवत्य ( पितृकार्य्य ) होजाता है । अमावास्या के दिन उपवास करने से देवकार्य्यं पितृदेवत्य कैसे होजाता है?, इस प्रश्न के समाधान के लिए निम्नलिखित सन्दर्भ को ही लक्ष्य बनाना चाहिए । सदसद्रूप ईश्वर प्रजापति के - स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ये पाँच अवयव बतलाए गए हैं । ये पाँचों वेदात्मा - प्रजापति पुरुष के ' वैकारिक ' आत्मा कहलाते हैं । ये ही पाँचों ' अधियज्ञ ' नामसे प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों में पाँच प्रकार के भिन्न भिन्न प्राण हैं । स्वयम्भू मण्डल के प्राण को ' ऋषि ' कहते हैं । पारमेष्ठ्य सौम्यप्राण ‘ पितर ' कहलाता है । आप्यप्राण को ' असुर ' कहते हैं । सौरप्राण - ' देवदेवता ' कहलाता है । चान्द्र प्राण ' गन्धर्व ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं पार्थिव प्राण ' वैश्वानर ' नामसे व्यवहृत होता है । इनमें ऋषि प्राण कुल ७ जातिका है । पितर ८ जातिकें हैं । देवता ३३ हैं । असुर प्राण ६६ नातिका । गन्धर्व २७ हैं । १४२

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शतपथत्राह्मण वैश्वानर तीन प्रकारका है । साथ ही में इतना और समझ लेना चाहिए कि, जैसे विदैवत में ये ऋषि, पितर, आदि प्राण हैं, तथैव अधिदैवत से उत्पन्न होने वाले अध्यात्म में भी ये सम्पूर्ण प्राण विद्यमान 1 एवं इतिहाससम्बन्धी मनुष्य, ऋषि, पितर, गन्धर्व आदि भी थे । यहाँ केवल विज्ञान से सम्बन्ध है । अतएव हमने वैज्ञानिक प्रारूप ऋषि पितर आदि का ही स्वरूप बतलाया है । आगे के ब्राह्मणों में समय समय ' पर पाठकों को आध्यात्मिक और आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) ऋषि पितर गन्धर्वादि का भी स्वरूप बतलाते रहेंगे । हम कह रहे थे कि पाँचों में पूर्वोक्त पाँच प्राण हैं । यदि पारमेष्ठ्य श्रन्यप्राण को समन्वित कर लिया जाता है, तो ६ प्राण होजाते हैं । इनमें से - ज्ञानज्योतिस्वरूप ' स्वयम्भू ', और स्वज्योतिस्वरूप स्वज्योतिर्मय सूर्य को छोड़ कर अवशिष्ट - परमेष्ठी, चन्द्रमा, पृथिबी, इन तीनों में ज्योति के अभाव से तमोमय आसुरप्राण रहता है । इन सब प्राणों में मण्डल के क्रमानुसार पहिला प्राण ' ऋषि ' है । यह ऋषिप्राण सर्वथा मौलिक प्राण है । ऐसे ऐसे विजातीय अनेक प्राणों के समन्वय से जो यौगिक प्राण उत्पन्न होते हैं, उन्हें हीं पितर कहते हैं । इन पितरों के कितने हीं अवान्तर भेद होजाते हैं । ऐसे ऐसे कई पितर-प्राणों के संयोग से उत्पन्न होनेवाले प्राण को ' देवता ' कहते हैं । एवं उसी पितरप्राणप्रधान परमेष्ठी से असुरप्राण उत्पन्न होता है । असुर और देवता एक परमेष्ठीप्रजापति की संतान हैं । एक आप्यप्रधान है, एक अग्निप्रधान है । अतएव दोनों में स्वाभाविक वैर है । अतएव ब्राह्मणग्रन्थों में बार बार - ' देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे ' इसका उल्लेख रहता है । परमेष्ठी - प्रजापति के द्वारा इन्हीं देवासुर नाम के दोनों प्राजापत्यों से आगेकी मनुष्यादि सृष्टियाँ होतीं हैं । देवभाग गुणसंपत्ति है, असुर भाग दोषसंपत्ति है । सृष्टि के प्रभव ये ही दोनों हैं । अतएव ' गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा सृजति कौतुकी ' यह कहा जाता है । इसी पूर्व के सृष्टिविज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् मनु कहते हैं—

ऋषिभ्यः पितरो जाता पितृभ्यो देवमानवाः ।

देवेभ्यश्च जगत् सर्वं चरं स्थाण्यनुपूर्वशः ॥

- मनु ० ३/२८१ । ' देवेभ्यश्च ' के चकार को ' श्रसुरेभ्यः ' का उपलक्षण समझना चाहिए । इन सम्पूर्ण प्राणों में से प्रकृत में केवल पितरप्राण ही हमारी लक्ष्यभूमि है । अतएव अन्य प्राणों के विषय में कुछ न कहकर यहाँ हम संक्षेप से केवल पितरमाण की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करेंगे । पितरप्राण क्या है?, इसका उत्तर है - ' सौम्यप्राण ' । सोम ' भूत ' है । भूत बिना प्राण के क्षण-मात्र भी नहीं रह सकता । प्राण ही भूत की प्रतिष्ठा है । सोम में रहने वाला, सोम का आधारभूत जो प्राणविशेष है, उसी का नाम पितर है । यह सोम ' भात्वरसोम ', और ' दिक्सोम ' भेद से दो प्रकार का माना गया है । पिण्डरूप में परिणत चान्द्रसोम सौरप्रकाश से प्रकाशित होकर ' भास्वर सोम ' कहलाने लगता है, एवं सर्वत्र ऋतरूप से व्याप्त सोम दिक्सोम कहलाता है । इसी दिक्सोम के लिए ' त्वमाततन्यो-र्वन्तरिक्षम् ' यह कहा जाता है । चान्द्रसोम भी वही पारमेय सोम है । पारमेष्ठ्य दिक्सोम ही मास्वरसोम १४३

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प्रथमकाण्ड बना हुआ है । श्रतएव हम परमेष्ठी की भाँति चन्द्रमण्डल को भी ' पितृमण्डल ' कहने के लिए सन्नद्ध हैं । चन्द्रमा का जो भाग सूर्य्यं की चोर रहता है, उतने भाग में तो ( जो कि हमें दीखता है ) ज्योतिम्भय सौर-प्राण ( देवता ) की सत्ता रहती है । श्रतएव उस भाग में पितरप्राण नहीं रहने पाता । परन्तु निस चोर सौर प्रकाश नहीं है, उस भाग में ( जो कि भाग हम पृथिवीलोकनिवासियों की अपेक्षा ' ऊर्ध्वभाग ' कहलाता है ) पितरप्राण अपनी सत्ता स्थापित कर लेता है । अतएव विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' ( चन्द्रमा के ऊपर के भाग में पितर निवास करते हैं ) यह कहा जाता है । यह पितरप्राण चन्द्रमण्डल से उसी पूर्वोक्त श्रद्धासूत्र के द्वारा पृथिवीलोक में आया करता है । यद्यपि पितरप्राण सदा ही आया करता है | किन्तु इसकी प्रधानता कृष्णपक्ष में ही रहती है! क्योंकि कृष्णपक्ष में हीं चन्द्रमा के प्रकाशित ऊर्ध्वभाग को दृष्टि पृथिवी की ओर होती है । यहाँतक कि अमावस्या में चान्द्रसोम के द्वारा यह सौम्यप्राणरूप पितरप्राण पूर्णमात्रा से पृथिवीलोक में आजाता है । कल्पना कर लीजिए कि, सामने सूर्य्य है । इस सूर्य्य के चारों ओर ‘ स्वाक्षपरिभ्रमण ’ से अहोरात्र का स्वरूप बनाती हुई पृथिवी घूम रही है, एवं पृथिवी के अग्नि के साथ दर्शपूर्णमास करता हुआ चन्द्रमा पृथिवी के चारों ओर ही परिक्रमा लगा रहा है । घूमते घूमते एकदिन चन्द्रमा सूर्य्य और पृथिवी, इन दोनों के बीच में आजाता है । इस दिन चन्द्रमा पृथिवी से पृथक् रहता है, एवं सूर्य्य से मिला हुआ रहता है । अतएव उसका वह प्रकाशित भाग ही ( जिसेकि हमने ऊर्ध्वभाग बतलाया था ) हमारी ओर रहता है । मर्त्यपिण्डरूप सूर्य्यं में रहने वाले अन्यतम अमृतप्राण को ' इन्द्र ' कहते हैं । श्रतएव सूर्य्य को भी इन्द्र कह दिया जाता है + । क्योंकि इस दिन चन्द्रमा इन्द्र के साथ रहता है, अतएव.. ' यस्मिन् दिवखे चन्द्रमा इन्द्र ेण श्रमा - सह - वसति ' इस व्युत्पत्ति से यह दिन ‘ अमावास्या ' कहलाने लगता है * । इस दिन सूर्य्य चन्द्रमा का योग रहता है, अतएव ' दर्श: सूर्य्ये - दुसंगमः ' के अनुसार इसे दर्श भी कहा जाता है । परन्तु ध्यान रहे – पूर्वविद्धा और अपराविद्धा अमावस्या को ' दर्श ' नहीं कहते । वे अमावास्याएँ दर्श न कहला कर ' सिनीवाली ' और ' कुहू ' नाम से व्यवहृत होतीं हैं । अत्र चलिए पूर्णिमा की ओर । जिस दिन घूमते घूमते पृथिवी सूर्य्य और चन्द्रमा के बीच में आजाती है, उसदिन चन्द्रमा का प्रकाशित भाग हमारी ओर रहता है । यही पूर्णिमा कहलाती है । इसप्रकार पूर्णिमा में प्रकाशित देवप्राण की सत्तासिद्ध होजाती है, और अमा-वास्या में पितरप्राण की सत्ता सिद्ध होजाती है । शुक्लपक्ष की अष्टमी देवताओं का प्रातःकाल है । पूर्णिमा मध्याह्न है । कृष्णाष्टमी सायङ्काल है । अमावास्या श्रद्ध'रात्रि है । ठीक इसके विपरीत कृष्णाष्टमी " तरों का प्रातःकाल है । अमावास्या मध्याह्न है । शुक्लाष्टमी सायङ्काल है, एवं पूर्णिमा श्रद्ध रात्रि है । हमारे अनुपात + एष वै शुक्रः- य एष तपति, एष उ ( सूर्य्यः ) –इन्द्रः । - शतपथ ४ | ५ | ५ | ७ | * स - ( सोमः ) - देवानां वसु, अन्नं ह्येषाम् । तत् यत् - एष एतां रात्रिं - इह-अमा ( सह ) वसति, तस्मात् - ' अमावास्या ' नाम ।. - शतपथ १६ | ४ | ५ | १४४

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शतपथब्राह्मण से जो ३० दिन हैं, वह सौम्यप्राणरूप पितरों का एक दिन है । परिभ्रमणवृत्त से ' अहः ' का स्वरूप बनता है | हमारा स्वरूप पृथिवी के स्वाक्षपरिभ्रमण से सम्बन्ध रखता है । यह स्वाक्षपरिभ्रमण २४ घन्टों में हो जाता है । अतएव हमारा ' अहः ' - २४ घन्टों का ही होता है । १२ घन्टे की रात्रि है, १२ घन्टे का दिन है, एवं पितर चन्द्रमा की वस्तु है । चन्द्रमा अपने दक्षवृत्त की परिक्रमा ' एकमास ' में लगाता है । अतएव परिभ्रमणकाल से सम्बन्ध रखने वाला पितरों का अहोरात्र ३० दिन का होजाता । हमारे अनुपात से तीस दिन हैं । पितरों के अनुपात से तो वह एक ही अहोरात्र है । अतएव - ' मासेन स्यादहोरात्रः पैत्रः ' ( अमर ० प्र ० कां ० कालवर्ग २१ श्लो ० ) यह कहा जाता है । अतएव इनके लिए ' मासि मासि वोऽशनम् ' ( ' महीने महीने में तुम्हें भोजन मिलेगा ' शत ० २/४ | २ | १ ) यह कहा जाता है | वेदतत्त्व से कोसों दूर जो मनचले - ‘ पितृश्राद्ध ' का ' जीवित पितादि को भोजन कराना ' यह अर्थ करते है, उन्हें, - पूर्व-श्रुति से शिक्षा लेनी चाहिए | कहना प्रकृत में हमें यही है कि, अमावास्या में पितरप्राण पूर्णरूप से पृथिवी में अभिव्याप्त होजाता है । इस दिन सम्पूर्ण सोम ओषधि - वनस्पतियों में व्याप्त होनाता है, जैसा कि श्रुति श्रु कहती है-' एष वै सोमो राजा देवानामन्न ं यच्चन्द्रमाः । स यत्रैष एतां रात्रिं न पुरुस्तान पश्चाद्ददृशे, तदिमं लोकमागच्छति । सइ हैवापचोषधीश्च प्रविशति ' । - शतपथ सोमराजा देवताओं का अन्न है, जोकि चन्द्रमा है । जिस दिन ( अमावस्या में ) यह किसी र से नहीं दिखलाई देता, ( समझलो ) उस दिन यह इस पृथिवीलोक में आजाता है, एवं आकार ओषधि वनस्पतियों में प्रविष्ट होजाता है - ( शत ० १२६ । ४ । ५ इति ) । इसप्रकार पूर्व के निदर्शन से यह भली-भाँति सिद्ध होजाता है कि, अमावास्या में पृथिवोलोक में पितरप्राण ( सौम्यप्राण ) पूर्णरूप से अभिव्याप्त रहता है । इसी अवस्था में यदि यजमान अनशनत्रत करेगा, तो अशनायासूत्र से आकर्षित पितरप्राण इसके आत्मा में प्रविष्ट होजायगा । यदि कुछ भी नहीं खाया जाता है, तो शरीर का वैश्वानराग्नि मन्द होनाता है । क्योंकि अग्निसत्ता अन्नसोम की आहुति पर ही अवलम्बित है । अग्नि के मन्द होते ही हृदय से अशनायात्रल ( बुभुक्षा- भूख ) प्रादुर्भूत होजाता । एकप्रकार की ' खांऊ खांऊ " रूपा जो वृत्ति है, जिसका कि बुभुक्षितावस्था में पूर्णरूप से अनुभव होता है - उसी को अशनाया कहते हैं । इसी बल के द्वारा अन्न लाया जाता है, भूख ही अन्न को पकड़ कर शरीराग्नि में आहुत करती है, अतएव इसे अशनाया कहा जाता है । जिस समय यह अशनायाचल नाग्रत होता है, उस समय यदि इसे अन्नादि नहीं मिलता है, तो उस समय प्रकृतिमण्डल में जो भी प्राण व्याप्त रहता है, उसे । यह अपनी ओर खैंच लेती है, एवं उसी प्रकृतिमण्डल के प्राण का इसके आत्मा से सम्बन्ध होजाता है । शिवरात्रि में साम्बसदाशिव नाम का जीवनप्रद पारशेठ्यप्राण भूमण्डल पर श्रभिव्याप्त रहता है । एकादशी के दिन विष्णुप्राण अभिव्याप्त रहता है । शरत्पूर्णिमा में चक्षुरिन्द्रिय के सम्पूर्ण रोग दूर करने वाला अश्विनीनक्षत्र का रस पूर्णरूप से हमारे लोक में व्याप्त रहता है । गणपतिचतुर्थी में विघ्नविनाशक रुद्रपुत्र की सत्ता रहती है । इन प्राणों को आत्मसात् करने के लि इन इन दिनों में उपवास किया जाता है । वे वे प्राण देवता अशनायाचल ' के द्वारा आकर्षित हो आत्मा में बस जाते हैं । अतएव पौराणिकभाषा में वह दिन ' उपवास ' नाम से व्यवहृत १४५

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प्रथमकाण्ड हुआ है! हमारा निर्माण आधिदैविक अग्नि, रुद्र, विष्णु, आदित्य, अश्विनीकुमार, मित्रावरुण, इन्द्र, त्वष्टा, पूषा, आदि आदि प्राणदेवताओं से होता है । हमारे ही नहीं, अपितु उत्पन्न होने वाले चेतन अचेतनोभयविध यच्चयावत् पदार्थों के उपादान और निमित्तकारण ये ही आधिदैविक प्राणदेवता हैं, अतएव श्रुति कहती है-' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' । सब में देवता रहते हैं । केवल मात्रा और सन्निवेशक्रम में भेद है । जिस में जिस देवता की अधिक मात्रा रहती है, वहाँ वही प्रधान बन जाता है । इसी तारतम्य के कारण उन्हीं देवताओं से उत्पन्न होने वाले पदार्थों में परस्पर वैजात्य हो जाता है । प्रत्येक के लिए देवताओं की मात्रा नियत है । यदि उससे अधिक मात्रा हो जाती है, तब भी रोग है, एवं न्यूनमात्रा है, तत्र भी रोग है । समीक्रिया ही शान्ति का कारण है, एवं हीनयोग, और प्रतियोग ही रोग के कारण हैं । शरीर का जो देवता कम हो जाता है, जिस श्रधि में वह देवता अधिक मात्रा से रहता है, उसके द्वारा वह कमी पूरी कर दी जाती है । यदि बढ़ जाता है, तो प्रतिद्वन्द्विनी श्रौषधि देकर उसे समभाव पर प्रतिष्ठित कर दिया जाता है । उदाहरणार्थ-जिन प्राणदेवताओं का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उन दिनों में वे अधिक मात्रा से पृथिवी पर व्याप्त रहते हैं । उन्हें लेने का उपाय है- ' उपवास ' । उपवास से वह प्राण सीधा आत्मा में प्रविष्ट हो जाता है । एवं श्रात्मस्थित देवताओं की कमी पूरा करता हुआ यह प्राण सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा इस में एकप्रकार का अतिशय उत्पन्न कर देता है । कमी पूरी करने के लिए, और अतिशयाधान के लिए ही उपवास किया जाता है । उपवास का यही वैज्ञानिक रहस्य है । उपवास की मर्य्यादा के अनुसार यदि यह यजमान अमावास्या में कुछ नहीं खाता है, तो सर्वत्र व्यापक पितरप्राण का इस के आत्मा से सम्बन्ध होना अनिवार्य्य है । ऐसी अवस्था में इस का देवकार्य्य पितृदैवत्य हो जाता है । अत: इस दिन ‘ अनशन ' नहीं करना चाहिए । यजमान जत्र भोजन कर लेता है, तो शरीर में रहने वाले आग्नेय देवता उल्वण होजाते हैं । इन के उल्वण होजाने से सौम्यप्राणरूप पितरों की सत्ता नहीं होने पाती । इसप्रकार भोजन करने से देव-कर्म्म पितृदेवत्य तो नहीं होता, किन्तु अतिथिधर्म का उल्लंघन हो जाता । तात्पर्य यही है कि, अन्न खाने से पार्थिवदेवता तृप्त हो कर शरीरनिर्माणक्रिया में सन्निविष्ट हो जाते हैं । जिस काम के लिए उन का चिनाव किया जाता, है वह काम नहीं होने पाता, जैसा कि हम आगे बतलाने वाले हैं । इस विप्रतिपत्ति को दूर करने का एकमात्र उपाय है ' अशनानशन ' अन्न खाना । मान लीजिए - आप के कोई अतिथि अाया है । वह अतिथि ओर तो सब कुछ खाता है, किन्तु फल और आरण्य प्रोपधि ( त्रिनाखेती किए जो अन्न अपने आप सौरताप से उत्पन्न होता है, वही श्रारण्य श्रोषधि नाम से व्यवहृत होता है ) नहीं खाता । ऐसी अवस्था में यदि अतिथि को भोजन कराने से पहिले उन दोनों में से कोई वस्तु आप वालेंगे, तो वह अप्रसन्न न होगा । आज यजमान को भी वही वस्तु खानी चाहिए, जिसे कि देवता ( पार्थिव देवता ) न खाते हों । जिस को देवता नहीं खाते, उसे यदि यजमान खा लेता है, तो देवता प्रसन्न भी नहीं होते, और खा लेने से अग्नि के प्रचल होजाने से यह कर्म्म पितृदेवत्य भी नहीं होने पाता । जिस अन्न की आहुति पार्थिवदेवता ग्रहण नहीं करते, ऐसा अन्न है - आरण्य ओषधि और वृक्ष्य ( फल ) । फलों में सोम नहीं रहता । यद्यपि सोमका सर्वथा अभाव नहीं होता । किन्तु वह इन वनस्पतियों में इतनी अल्पमात्रा से रहता है कि, उसका रहना १४६

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शतपथब्राह्मण न रहने के समान है । एवमेव आरण्य ओषधियों में भी सोम अल्पमात्रा में ही रहता है । जिस में सोम अत्यल्पमात्रा में रहता है, देवताओं का ( पार्थिवदेवताओं का ) उससे सम्बन्ध नहीं होता । फल और आरण्य ऐसे ही हैं । अतएव इन दोनों को हम ' अशनानशन ' कहने के लिए सन्नद्ध हैं । देवता कई प्रकार के होते हैं । प्रकृत में ' देवता ' शब्द से आध्यात्मिक पार्थिव आग्नेय देवता ही अभि-हैं । पृथिवी से जो प्राणदेवता हमारे में आते हैं, उन से ' प्रज्ञानात्मा ' बनता | एवं सौरप्राणदेव-ताओं से ‘ विज्ञानात्मा ' बनता है । वैदिक विज्ञान से बहुत दूर चले जाने के कारण आपको यह सुन कर आश्चर्य होगा कि, हमारे में एक आत्मा नहीं है, अपितु कई श्रात्मा | श्रात्मसमष्टिका नाम ' हम ' हैं । ' एक-मेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन ' वाले अखण्ड श्रात्मा के श्रद्वैतभावका हम विरोध नहीं करते । वह आत्मा चास्तव में सत्र का एक आत्मा है । उस में भेद नहीं हैं । वेदान्ताभिमत इस व्यापक, अतएव अखण्ड ‘ परात्पर ' ब्रह्म का न जन्म होता है, न मृत्यु होती है । इस अखण्डात्माका कैसा स्वरूप है?, यह क्या काम करता है?, इन सत्र का एकमात्र उत्तर है - ' नेति नेति ' । क्योंकि शास्त्रों में इस के लिए अन्ततोगत्वा ' नेति नेति ' यही निर्णय किया गया है । हमारा धर्म्मशास्त्र हेयोपादेयका उपदेश देता है । कुछ लेना, श्रौर कुछ देना । श्रच्छी बातों को लेना, और बुरी बातकों छोड़ना, त्रस सम्पूर्ण धर्म्मशास्त्र में इन्हीं दो विषयों का निरूपण है । जिन से आत्मा के स्वरूप की हानि होती है - वे कर्म्म, एवं पदार्थ ' हेय ' कहलाते हैं । एवं जिनसे आत्मा का अभ्युदय होता है, वे ' उपादेय ' कहलाते हैं । धर्म्मशास्त्र हेयको छोड़ने का उपदेश देता है, और उपादेय को ग्रहण करने का उपदेश देता है । ‘ यान्यनवद्यानि कर्माणि, तानि त्वया सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि, तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि ' । - उपनिषत् धर्म्मशास्त्र के यच्चयावत् उपदेशों का यही निष्कर्ष है । बतलाना इससे हमें यही है कि, धर्म्मशास्त्र जिस आत्मा की रक्षा के लिए हेयोपादेयकी व्यवस्था करते हैं, वह आत्मा ' परात्पर ' नाम का अखण्ड श्रात्मा कथमपि नहीं हो सकता । क्योंकि परात्पर से अच्छे बुरे की व्यावृत्ति नहीं की जा सकती । वह तो ग्राह्य अग्राह्य ( उपादेय - हेय ) दोनों का आधार है । परात्पर में अच्छा बुरा सत्र है । दूसरे शब्दों में वह अच्छे बुरे सत्र में । जत्रकि उससे अच्छा और बुरा, दोनों हीं पृथक् नहीं हो सकते, तो ऐसी अवस्था में धर्म्मशास्त्र - प्रतिपाद्य आत्मा को हम अवश्य ही परात्पर ब्रह्म से पृथक मानने के लिए सन्नद्ध हैं । धर्मशास्त्र का क्षर - श्रात्मा से ही सम्बन्ध है | क्षर - आत्मा का जन्म होता है । इसी की मृत्युहोती है । इसीकी लोकान्तर में गति होती है । यही सुख - दुःख - भोक्ता है । परात्पर तो नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त है । इसका शास्त्रों से कोई सम्बन्घ नहीं है । इसीकी अविज्ञेयता बतलाते हुए वेदमहर्षि कहते हैं—

' संविदन्ति न य वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः ।

यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ' ॥

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