Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 391–400
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 391–400
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प्रथमकाण्ड के त्रिना अग्निहोत्र व्यर्थ है । अग्निहोत्र के बिना दर्शपूर्णमास व्यर्थ है । द ० पू ० के बिना चातुर्मास्य व्यर्थ है । चातुर्मास्य के बिना पशुबन्ध व्यर्थ है । बिना पशुबन्ध के ज्योतिष्टोम करना व्यर्थ है । इससे सिद्ध होजाता है कि, स्वर्गकामना सेळू ज्योतिष्टोम करने वाले को अधिकारसमर्पणरूप १ - अग्न्याधान, २- अग्निहोत्र, ३ - दर्श-पूर्णमास, ४ - चातुर्मास्य, ५ - पशुबन्ध, इतनी इष्टियाँ करना नितान्त आवश्यक है । सोमयज्ञ के अनन्तर है – ‘ चयनयज्ञ ' । शतपथब्राह्मण में इन्हीं दो यज्ञों का साङ्गोपाङ्ग विवेचन है । पहिले काण्ड से आरम्भ कर पांचवें पर्य्यन्त सोमयज्ञ है । यद्यपि पाँचवें काण्ड में बतलाए हुए राजसूय, वाजपेय सोमयाग नहीं कहे जाते । तथापि उन्हें हम सोमयाग में हो अन्तर्भूऩ मान सकते हैं । कारण इसका यही है कि, सोम की जा, वाज, ग्रह, हवि, ये चार जातियाँ । हविःसोम से होने वाला सोमयाग ' हविर्यज्ञ ' कहलाता है । ग्रहससम्बन्धी ‘ ग्रहयाग ' कहलाता है । वाजसम्बन्धी ' वाजपेय ' कहलाता है । एवं राजसम्बन्धी ' राजसूय ' कहलाता है | इसप्रकार ' ग्रहयाग ' नाम से प्रसिद्ध सोमयागवत् - हविर्यज्ञ, राजसूय, वाजपेय का हम अवश्य ही सोमयाग में अन्तर्भाव मान सकते हैं । इसप्रकार प्रथम से पञ्चम पर्य्यन्त सोमसत्ता सिद्ध होजाती है । इसके अनन्तर ६ ठे काण्ड से ६. वें काण्ड पर्य्यन्त चयनयज्ञ ( अग्नियज्ञ ) की इतिकर्तव्यता है । एवं १० वें से १३ वें काण्ड पर्य्यन्त यज्ञरहस्य का प्रतिपादन किया गया है । अग्निहोत्र, दर्शपूर्णमास, ग्रह, राजसूय, वाजपेय, चयन,.आदि सम्पूर्ण यज्ञों की उपपत्ति बतलाई गई है । एवं १४ वें काण्ड में आत्मा का स्वरूप बतलाया गया है । अतएव वैदिक महर्षि ज्ञानप्रधान इस चौदहवें काण्ड को ' बृहदारण्यकोपनिषत् ' कहते हैं । यदि यज्ञत्त्वेन सोम - और चयन, इन दोनों को मिला लिया जाता है, तो ६-४-१ इसप्रकार तीन विभाग होजाते हैं । ६ पर्य्यन्त ‘ यज्ञकाण्ड ' है । १: पर्य्यन्त ' विज्ञानकाण्ड " है । चौदहव ' ज्ञानकाण्ड ' है । इसप्रकार इस ‘ वेदग्रन्थ ' में ज्ञानसहित विज्ञान का, और कर्म्मप्रपञ्च का, तीनों का समावेश हो बाता है । इन तीन काण्डों के बाहिर कोई भी विषय नहीं बचता । अतएव हम निःसन्देह इस अद्भुत ग्रन्य के लिए— " यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्न हास्ति न तत् क्वचित् " यह कह सकते हैं | यदि पाठक महाभाग श्रानुपूर्वी से शतपथ को देख जाँयगे, तो उन्हें हमारे कथन की सत्यता भलीभांति विदित हो जायगी । पूर्व के काण्डादि क्रम को बतलाने का अभिप्राय यही है कि, शतपथ के १४ काण्डों में - तीसरे काण्ड से १४ वें पर्य्यन्त तो कोई विप्रतिपत्ति नहीं है । विप्रतिपत्ति है १ और २ काण्ड में । पहिले काण्ड में दर्शपूर्णामासका निरूपण है, एवं दूसरे काण्ड में ' अग्निहोत्र ' तथा चातुर्मास्य का निरूपण है । इस सम्बन्ध में प्रश्न होता है कि, अग्निहोत्र पहिला कर्म्म है, दर्शपूर्णमास अग्निहोत्र के अनन्तर होने वाला कर्म्म है । ऐसी अवस्था में - यायतः पहिले अग्निहोत्र का ही स्वरूप बतलाना चाहिए था । ऐसा न करके जो पहिले दर्शपूर्णमास की इतिकर्तव्यता बतलाई जाती है, इसका क्या कारण है? | इस प्रश्नका उत्तर यज्ञों के ' प्रकृति विकृति ' भेदपर अवलम्बित है । सम्पूर्ण यज्ञ प्रकृति, विकृति भेद से दो भागों में विभक्त हैं । प्रकृतियज्ञ में जो कुछ होता है - विशेष कम्र्मों को छोड़कर ( जिन से कि प्रकृतियज्ञ से इसका भेद होता है ) विकृतियज्ञ में प्रायः सभी कर्म्म प्रकृति के अनुसार ही होते हैं । अतएव ' प्रकृतित्रद्-विकृतिः कर्त्तव्या ' यह कहा जाता है । यही कारण है कि, ब्राह्मग्रन्थों में विकृतियज्ञ में पूरी इति कत्तव्यता नहीं त्रतलाई जाती । अग्निहोत्रादि इष्टियाँ दर्शपूर्णमास की विकृतियाँ हैं । दर्शपूर्णमास इष्टियों की प्रकृति है । चिना प्रकृतिज्ञान के त्रिकृतिज्ञान नहीं होसकता । अतएव क्रम का उल्लंघन करके सब से पहिले प्रकृतिभूत दर्शपूर्णमास का ही निरूपण किया गया है । १२८
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शतपथत्राह्मण इस दर्शपूर्णमास में ' पुरोडाश की आहुति दी जाती है । पुरोडाश को हवि कहते हैं । अतएव यह ' हविर्यज्ञ ' कहलाता है । इस हविर्यज्ञ में सत्र से पहिले ' व्रतोपायन ' कर्म्म होता है । ' मै आज से अमुक कर्म में प्रवृत्त होता हूँ । इस कर्म में जो जो नियम हैं, उन सब का मैं मनसा वाचा कर्म्मरंणा पालन करूँगा ' इसप्रकार से सर्वारम्भ में ग्राहवनीयाग्नि की साक्षी में जो प्रतिज्ञा की जाती है, वह प्रतिज्ञा-कर्म्म ही ‘ व्रतोपायनकर्म्म ' कहलाता है । मिथ्याभाषण से ग्रात्मा सत्यपथ पर नहीं रहता, एवं असत्य-भावोपेत आत्मा से की हुई प्रतिज्ञा विफल होजाती है । अत: इस दोष को हटाने के लिए व्रतोपायन से भी पहिले आचमन किया जाता है । मेध्य, एवं पवित्र -- गुणयुक्त पानी के आचमन से जब आत्मा पवित्र, एवं मेध्य बन जाता है, तो तदनन्तर आहवनीय अग्नि की साक्षी में मन्त्र बोलता हुआ यह यजमान सत्यभावो-पेत आत्मा से व्रतग्रहण करता है । पूर्व में बतला दिया गया है कि, श्राहवनीय अग्नि सूर्य्यस्थानापन्न है, एवं गार्हपत्य पार्थिव अग्नि । ग्राहवनीयाग्नि सौर अग्नि है । यही अग्नि सौर प्रारणदेवताओं के व्रतपति हैं । व्रत कहते हैं अन्न को । चान्द्रसोम ( जो कि परमेष्ठी की वस्तु है ) इन आग्नेय सौर देवताओं का अन्न है, जसा कि श्रुति कहति है--' एष वै सोमो राजा देवानामन्नं -- यच्चन्द्रमाः ' यह सोमराजा देवताओं का अन्न है, जो कि चन्द्रमा है, ( शत ० वा ० १ ६ ३५ इति ) । देवताओं के इस सोमरूप अन्न के अधिपति ये ही सौर अग्न हैं । अग्नि हीं देवताओं के लिए हव्यवहन करते हैं । जिस किसी भी देवता के लिए आहुति दी जायगी, आहवनीय में हीं दी जायगी । अतएव इस अग्नि को ' हत्र्य-वाहन ' कहा जाता है । जैसे प्रकृति में सौर अग्नि हव्य - वहन करने के कारण प्राणदेवताओं के व्रतपति हैं, तथैव तत् - प्रतिकृतिभूत ग्राहवनीय अग्नि वैधयज्ञ में होने वाली अाहुतियों को प्राणदेवताओं में पहुँचाने के कारण देवताओं के व्रतपति हैं । अपिच सौर देवता आग्नेय हैं । अग्नि की अवान्तर ३३ अवस्थाओं का नाम हीं वसुरुद्रादित्यादि ३३ देवता हैं । क्योंकि यज्ञकर्ता यजमान को सम्पूर्ण प्राणदेवताओं को आत्मसात् करना है । अतः सत्र की साक्षी में व्रतग्रहण करना आवश्यक है । सर्वदेवतास्वरूप यह ग्राहवनीय ही है । अतः-हवनीय की साक्षी में हीं व्रतग्रहण किया जाता है । " हे व्रतपते! आाग्ने! मैं व्रतग्रहण करूँगा । आप व्रतपति हैं । अतः ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि, जिस से मैं व्रतग्रहण करने में असमर्थ हो सकूँ । हे अग्ने! आप के अनुग्रह से मेरा यह यज्ञत्रत ( प्रतिज्ञा ) समृद्ध बने । अर्थात् मेरी यज्ञसम्बन्धिनी प्रतिज्ञा पूरी होजाय " । मन्त्र का यही अथ है || २ || ( मूल ) - अथ संस्थिते विसृजते - ' अग्ने व्रजपते व्रतमचारिपं, तदशकं, तन्मे-ऽराधि ' ( २ अ ० २८ मं ० ) इति । अशकद्धय तद्- यो यज्ञस्य संस्थामगन् । अराधि ह्यस्मै - यो यज्ञस्य संस्थामगन् । एतेन न्वेव भूयिष्ठा इव व्रतमुपयन्ति - अनेन त्वेवो-पेयात् || द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति - सत्यं चैवानृतं च । सत्यमेव देवाः, अनृतं मनुष्याः । ' इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि ' ( १ अ ० ५ मं ० ) इति । तन्मनुष्येभ्यो देवानुपैति । स १२६
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प्रथमकाण्ड वै सत्यमेव वदेत् । एतद्ध वे देवा व्रतं चरन्ति यत् सत्यम्, तस्माचे यशः । यशो ह भवति, य एवं विद्वान् सत्यं वदति ॥ अथ संस्थिते विसृजते - ' इदमहं य एवास्मि सोऽस्मि ' ( १ अ ० २८ मं ० ) इति । श्रमानुष इव वा एतद् भवति - यद् व्रतमुपैति । न हि ( तदवकल्पते - यद् ब्रूयाद् - ' इदमहं सत्यादनृतमुपैमि ' इति, तदु खलु पुनर्मानुषो भवनि! तस्मादिदमहं य एवास्मि सोऽस्मीत्येव व्रतं विसृजेत ॥ ३-४-५-६ ॥ [ अनुवाद ] यज्ञ [ हविर्यज्ञ ] समाप्त होजाने पर [ वह यजमान ] ' अग्ने व्रतपते! व्रतम-चारिषं तदशकं तन्मेऽराधे ' यह मन्त्र बोलता हुआ व्रत का विसर्जन करता है । जो यजमान यज्ञ की समाप्ति पर जा पहुँचा, अर्थात् जिसने निर्बिघ्न यज्ञ समाप्त कर लिया, वह यज्ञकर्म्म करने में समर्थ हो गया । यज्ञसमाप्ति ही यजमान के यथाविधि कर्म्म में पूरा प्रमाण है । अपिच जो - यज्ञसंस्था को प्राप्त कर चुका, [ समझलो ] उस यजमान के लिए वह यज्ञकर्म्म सिद्ध होगया । अर्थात्उसे यज्ञफल मिल गया । अधिक मनुष्य ( आगे बतलाए जाने वाले ' इदममहनृतात् सत्यमुपैमि ' ) इस मन्त्र से ही व्रतग्रहणं करते हैं । ( जब कि अधिक याज्ञिकों की सम्मति इसी मन्त्र से व्रतग्रहण करने की ओर है, तो हमारी ( याज्ञवल्क्य की ) दृष्टि से भी इसी से व्रतग्रहण करना चाहिए । | ३ || सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सत्य और अनृत से अन्य कोई तीसरी वस्तु नहीं है । ( इस सत्यानृत के युग्म में ) सत्य हो देवता हैं, अनृत मनुष्य हैं । ' मैं अनृत से सत्य-भाव को प्राप्त होता हूँ ' यह कहता हुआ यजमान मनुष्यों की मण्डली से देवताओं की मण्डली में आता है, देवता बन जाता है || ४ || व्रतग्रहणानन्तर वह यजमान सत्य ही बोले । देवतालोग इसी नियम का पालन करते हैं, जो कि सत्य है । अर्थात् देवता सदा सत्य ही बोलते हैं । इसी लिए वे यशस्वी हैं- ( सम्पूर्ण त्रैलोक्य में सौरप्राणदेवताओं का यश व्याप्त हो रहा है - सम्पूर्ण सम्वत्सरयज्ञमण्डल में इन्हीं की सत्ता है ) । इस प्राकृतिक यशोविज्ञान को जानता हुआ जो मनुष्य देवताओं की भाँति सत्यपथ का अनुसरण करता है, एवं सदा सत्यभाषण करता है, वह भी ( देवताओं की भाँति ) यशस्वी हो जाता है ॥ ॥ ५ ( इसप्रकार ' इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि ' इस मन्त्र व्रतग्रहण ' करके ) यज्ञ समाप्त होने पर ' इदमहं य एवास्मि सोऽस्मि ' यह बोलता हुआ व्रत - विसर्जन करता है | जो यजमान व्रत ग्रहण करता है, वह अमानुष तुल्य ( देवतुब्य ) हो जाता है । ऐसी अवस्था में व्रतविसर्जन करते समय ' इदमहं सत्यादनृतमुपैमि ' ( मैं सत्य से अनृत भाव को प्राप्त होता हूँ ) यह बोल कर व्रतविसर्जन करना उचित प्रतीत नहीं होता | क्योंकि— ' मैं सत्य से अनृतभाव को प्राप्त हो रहा हूँ ' यह बोलने से मिथ्याभाव को प्राप्त होता हुआ १३०
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शतपथब्राह्मण यज्ञकर्त्ता यजमान पुनः मनुष्यभावोपेत हो जाता है । ऐसी अवस्था में यज्ञ करना सर्वथा व्यर्थ होजाता है । ( देवभाव से हट कर हम पुनः साधारण मनुष्य न बन जायँ ) इसलिए ' इदमहं य एवास्मि सोऽस्मि ' यह बोल कर ही व्रतविसर्जन करना चाहिए ॥ ६ ॥
( भाष्य ) – जितने भी कर्म हैं, उन सबके प्राद्यन्त में उपाकर्म, और उत्सर्ग, ये दो कर्म्म करने पड़ते हैं । उन उन कर्मों में नियुक्त होने के लिए, उन उन कम्पों से सम्बन्ध रखने वाले विशेष नियमों के पालन के लिए, उन उन कम्मों के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा करनी पड़ती है । एवं जब वे कर्म्म समाप्त होजाते हैं, तो उनके अन्त में उन नियमों का विसर्जन करना पड़ता है । यही उत्सर्ग कहलाता है । इसी को ' उद्यापन ' कहते हैं | यही आद्यन्त के कर्म्म वैदिक परिभाषा में ' व्रतग्रहण ' ' व्रतविसर्जन ' कहलाते हैं । त्रिना इनके कर्म्म का स्वरूप ही नहीं बनता । यजमान हर्दियज्ञ करने वाला है । अतएव इसे अप उपस्पर्श करके सबसे पहिले व्रतग्रहण करना पड़ता है । एवं यज्ञके समाप्त हो जाने पर मन्त्र बोलते हुए व्रतविसर्जन करना पड़ता है । सम्पूर्ण यज्ञ स्वर्गप्रतिकृतिभूत ग्राहवनीय ग्रग्नि पर प्रतिष्ठित हैं । ग्राहवनीय अग्नि में देवताओं के लिए आहुति दी जाती है । अतएव उसकी साक्षी में मन्त्रपूर्वक व्रतग्रहण होता है, एवं उसी की साक्षी में व्रतविसर्जन होता है । इन ग्रहण - विसर्जन सम्बन्धी मन्त्रों में टो मत हैं । कितने हीं याज्ञिकों के मतानुसार ' अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम् ' इस मन्त्र से व्रतग्रहण होता है, और ' अग्ने -व्रतपते व्रतमचारिषं तदशकं तन्मेऽराधि ' इस मन्त्र से व्रतविसर्जन होता है । एवं कितने हीं याज्ञिक लोग ' इदमहमनृतात् सत्यमुपैमि ' इस मन्त्र से व्रतग्रहण करते है, और ' इदमहं य एवास्मि सोऽस्मि ' इस मन्त्र से व्रतत्रिसर्जन करते हैं । याज्ञिक सम्प्रदाय में प्रायः यह दूसरा ही मत अधिक प्रचलित है । अतएव ' अनेन -` त्त्वेवोपेयात् ' यह कहा है । ' एव ' पद से पूर्व मतका खण्डन नहीं है, केवल द्वितीय मतकी प्रशंसा है । दोनों हीं पक्ष हैं । एवं दोनों में कामचार है, । जैसाकि महर्षि कात्यायन कहते हैं— ' अन्तरेणापराग्नीगत्वा परेणाहवनीयं प्राङ् तिष्ठन्नग्निमीक्षमाणोप उपस्पृश्य व्रत-मुपैत्यग्ने व्रतपते, इदमहमिति वा ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।११ इति ) ॥ जिनके मतमें ‘ इदमहमनृतात् सत्ममुपैमि ', ' इदमहं य एवास्मि सोऽस्मि ' इन मन्त्रों से ग्रहण– विसर्जन होता है, उनके मतको प्रधान मानने का कारण यही है कि, सम्वत्सरप्रजापति सत्यस्वरूप है । एवं आज यह यजमान उसी सत्यप्रजापति की सत्ता में प्रविष्ट होना चाहता है । इसलिए उचित है कि, यह यजमान सत्यका आश्रय लेकर ही ग्रहण - विसर्जन करे । ' मैं आज अनृतभावसे सत्मभावको प्राप्त हो रहाहूँ ', ‘ मैं जोहूँ सोही हूँ ’ यजमान के ग्रहण - विसर्जन सम्बन्धी ये दोनों वाक्य सर्वथा सत्य हैं । वास्तव में यज्ञमण्डल में प्रविष्ट होना सत्यमण्डल में प्रविष्ट होना है । क्योंकि यज्ञही प्रजापति एवं प्रजापति ही सत्य है । ऐसी अवस्था में सत्यवाक के द्वारा ग्रहण - विसर्जन करता हुआ यजमान सत्यरूप यज्ञप्रजापति को अश्यमेव प्राप्त करता है । श्रुतिने देवताओं के लिए ‘ सत्यमेव देवाः ' कहा है, एवं मनुष्यों के लिए ' अनृतं मनुष्याः ' कहा है । देवता सत्यसंहित हैं, मनुष्य श्रनृत्तसंहित हैं । जिस यज्ञप्रजापति से देवमनुष्य - प्रजाका निर्माण होता है, १३१
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प्रथमकाण्ड उस प्रजापति के सत्य, और विश्व दो भाग हैं । सत्य अमृत है, विश्व मृत्यु है । अमृत अविनाशी है, मृत्यु विनाशी है । सत्यतत्व पूर्ण है, शान्त है, नित्य है, आनन्दरूप है । विश्व अपूर्ण है, अशान्त है, अनित्य है, दुःखरूप है । यद्यपिं दोनों तत्व तमःप्रकाशवत् अत्यन्त विरूद्ध हैं, तथापि दोनो सदा साथ रहते हैं । अमृत मृत्यु के बिना नहीं रहता, एवं मृत्यु अमृत के बिना रह नहीं सकता । पानी से घोर शत्रुता रखने वाला अग्नि पानी में प्रविष्ट हो – पानी को गरम करके जैसे अपने शत्रु पानी के साथ मिला रहता है, चन्द्रमा के पृष्ठ भागका ( जोकि हमें नहीं दीखता ) अन्धकार और आगेकी और का ( सूर्य्य की और का प्रकाश भाग-दोनों विरूद्ध होते हुए भी जैसे साथ मिले रहते हैं, सर्वथा शान्त पानी और सर्वथा प्रशान्त लहरें जैसे परस्पर स्रोतप्रोत रहतीं हैं, ठीक इसी प्रकार अमृत और मृत्यु ( सत्य और विश्व ) अन्तरान्तरीभाव सम्बन्ध से ( जोकि सम्बन्ध ' षड् विकल्प ' नाम से प्रसिद्ध है ) परस्पर ओतप्रोत रहते हैं । इसी अभिनय से श्रुति कहती है-' अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यावमृतमाहितम् ' इति ' श ० १० । ३ । ६ । ४ । ) । मृत्यु के उदर में अमृत है, और मृत्यु में अमृत अभिव्याप्त है । उसके भीतर भीतर यह है, और इसके भीतर भीतर वह है । तात्पर्य्य इसका यही है कि, इन दोनों में आधाराधेयभाव नहीं है । जिस प्रकार एक कमरे में रक्खे हुए दीपक के प्रकाश में उसी प्रकाशस्थान में दूसरे दीपक का प्रकाश समा जाता है, जैसे इन दोनों प्रकाशों में आधाराधेयभाव नहीं होता, ठीक इसी प्रकार एकदेशावच्छिन्न होने से अमृत मृत्यु में भी आधाराधेयभाव का निश्चय नहीं हो सकता । और भी स्पष्ट करने के लिए, उदाहरणार्थ अङ्गलि को अमृत समझिए, और अङ्गुलि में जो हिलने की क्रिया है, उसे मृत्यु समझिए । आप अपनी अङ्गुलि हिलाते हैं | हम आपसे पूँछते हैं, बतलाइए आपकी अङ्ग ुलि क्रिया में है, अथवा क्रिया ( हिलाना, अंगुलि में है? | प्रयास करने पर भी आप अंगुलि और क्रिया के आधाराधेयभाव का निश्चय नहीं कर सकते । कारण इसका संत्तैक्य है | अमृत मृत्यु दो होते हुए भी सत्ता के एक होने से दोनों दो नहीं, अपितु एक हैं । अतएव इनके अभेद को भेदसहिष्णु अभेद कहा जाता है । श्रतएव दो मान लेने पर भी ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म नेह नानास्ति किचन ' इस श्रुतिका विरोध नहीं होता । अस्तु, इस विषय को हम अधिक नहीं चढ़ाना चाहते । यहाँ पर केवल यही समझलेना पर्य्याप्त होगा कि, प्रजापति में सत्य और विश्व दो भाग हैं । मर्त्यविश्व प्रजापति का शरीर है, एवं अमृतसत्य उस शरीर का आत्मा है । आत्म - शरीर, सत्य - विश्व, अमृत - मृत्यु, रस-बल, ब्रह्म - कर्म, सब अंशत: पर्य्याय हैं । दोनों की समष्टि ही प्रजापति है । अतएव वेदभगवान् कहते हैं— ' तस्य ह प्रजापतेः- अर्द्धमेव मर्त्यमासीदद्ध ममृतम् ' । - शत ० १० १/३/२ मर्त्यभाग क्षणिक, एवं विनाशी होने से अनृत है, मायारूप है । एवं अमृतभाग नित्य होने से सत्य है | त्रिकालाबाध्य तत्वही सत्य कहलाता है । जो सदा एकरूप रहता है, वही सत्य है ' एवं जो बदलता रहता है, वही अनृत है । अमृततत्व सदा एकरूप रहता है । अतएव हम अवश्य ही इसे ' सत्य ' कहने के लिए सन्नद्ध हैं । एवं क्षणिक क्रिया सन्तान रूप विश्व प्रतिक्षण बदलता रहता है । अतएव यह अवश्य ही नृत कहलाने योग्य है | इसप्रकार सिद्ध होजाता है कि, सृष्टिनिर्माता प्रजापति में सत्य और अनृत दोनों भाग हैं । श्रमृतमृत्युविशिष्ट इसी समीम प्रजापति को दार्शनिक परिभाषा में ' ईश्वर ' कहा जाता है । ईश्वर में सत् ( अमृत् ) असत् ( मृत्यु ) दोनों भाग हैं । अतवए ईश्वरावतार पूर्णकलोपेत भगवान् कृष्ण कहते हैं— १३२ A,
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शतपथब्राह्मण “ अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाह मर्जुन! " । —गीता | १६ | इसी सदसत् - प्रजापति से सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है । क्योंकि उत्पादक प्रजापतिमें सत्य और नृत दो ही भाग हैं । अतएव उससे प्रजा भी सत्य और अनृत, दो ही प्रकार की उत्पन्न होती है । सत्यप्रना को देवता कहते हैं, एवं अनृतप्रजा को मनुष्य कहते हैं । प्रजापति में भी सत्य नृत दो भाग हैं । प्रजा में भी सत्य अनृत दो भाग हैं । जहाँ देखो तहाँ ये ही दो भाव हैं भाव सत्य है, प्रभाव अमृत है । दिन सत्य है, रात्रि अनृत है | आनन्द सत्य है, दुःख अनृत । एक सत्य है, अनेक अनृत है । इसप्रकार आप जहाँ कहीं भी जो भी कुछ देखेंगे, वहाँ आपको सिवाय दो तत्त्वों के और कोई तीसरी वस्तु मिल ही नहीं सकती । कारण इसका यही है कि, इनको उत्पन्न करने वाले के कोश में उत्पत्ति के साधनभूत उपादानकारण ये ही दो तत्त्व हैं । जब उसी में तीसरी वस्तु नहीं है, तो फिर उस भावद्वयोपेत प्रजापति से उत्पन्न होने वाली प्रजा में तीसरी वस्तु कैसे मिल सकती है? । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर - " द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति सत्यं -चैवानृतं च ' यह कहा है । हमनें अनुपद में ही देवताओं को सत्यप्रजा बतलाया है, एवं मनुष्यों को अनृत-भावोपेत बतलाया है । जिस प्रजापति का पूर्व में वर्णन किया है, उस प्रजापति शब्द से प्रकृत में सौर प्रजापति ही अभिप्र ेत समझना चाहिए । ईश्वरप्रजापति के उदर में ( महिमामण्डल में ) प्रतिमाभूत परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ये चार प्रजापति हैं । महामायावच्छिन्न विश्वचर नाम से प्रसिद्ध सदसद्रूप ईश्वर ‘ परम प्रजापति ' कहलाता है । एवं ये चारों ईश्वर के समान भुवनसंस्था ( महिमामण्डल ) रखने के कारण, एवं उसके उदर में भुक्त रहने के कारण ' प्रतिमाप्रजापति ' कहलाते हैं । हम पार्थिव मनुष्यों की अपेक्षा उन चारों प्रतिमाःप्रजापतियों में सबसे सन्निकट पृथिवीप्रजापति है, इससे ऊपर चन्द्रप्रजापति हैं, इससे ऊपर सूर्य्य-प्रजापति है, इससे ऊपर परमेष्ठी प्रजापति है । इन सब में परस्पर दहरोत्तर ( एक का दूसरे के उदर में रहना हीं दहरोत्तरभाव कहलाया है ) सम्बन्ध समझाना चाहिए । इन चारों को अपने महिमामण्डल में रखने चाला वही ईश्वरप्रजापति है । उस परमप्रजापतिरूप ईश्वर के ज्ञान के लिए पहिले इन चारों प्रतिमा-प्रजापतियों की उपासना करनी पड़ती है । कहना यही है कि, यद्यपि आदि प्रजापति वही ईश्वर है, किन्तु अवताररूप होने से ये चारों प्रजापति भी ईश्वर कहलाने लगते हैं । इन चारों मण्डलों में वह ईश्वर ही तो अमिव्याप्त हो रहा है । हमारे यज्ञ का सम्बन्ध सूर्य्य से है । श्रतएव प्रकृत में प्रजापति शब्द से हम सूर्य्य - प्रजाति का ' ही ग्रहण करेंगे । हमनें बतला दिया है कि, सूर्य्य में अनवरत अग्नीषोमात्मक यज्ञ होता रहता है । अतएव इसे यज्ञप्रजापति भी कहते हैं । सौर यज्ञप्रजापति के कोश अग्नि, और सोम, ये दो वस्तुतत्त्व हैं । इन्हीं दोनों के सम्मिश्रण से ये प्रजापति रोदसी त्रिलोकी का निर्माण करते हैं । अग्नि सत्य पदार्थ है, सोम ऋत पदार्थ है । सहृदय सशरीर पदार्थ को सत्य कहते हैं, एवं हृदयशून्य [ केन्द्ररहित ] पिण्डा-त्रस्थाशून्य पदार्थ को ऋत कहते हैं । आप जितने भी पिण्ड देख रहे हैं, उन सत्रका एक शरीर है, एवं साथ ही उनका कोई न कोई हृदय ( केन्द्र ) है । अतएव यच्चयावत् पिण्डों को हम सत्य कहने के लिए सन्नद्ध | सम्पूर्ण पिण्ड अग्नि से ही बनते हैं । सोम द्रव पदार्थ है । यही सोम जब अग्नि की पकड़ में आजाता है, तो उसी क्षण अग्नि पिण्डरूप में परिणत हो जाता है । सोमगर्भित श्रग्नि हीं पिण्ड़रूप १३३
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प्रथमखण्ड में परिणत रहता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा शरीर है । हमारा शरीर पिण्डरूप में तभीतक परिणत रहता है, जबतक कि हम इस शरीराग्नि में अन्नरूप सोम की आहुति दिए जाते हैं । यदि सोमान्न की आहुति अवरुद्ध करदी जायगी, तो शरीराग्नि पिण्ड को ही खाने लगेगा | अस्थि मांस चत्री आदि को खाने लगेगा । जब ये भी न रहेंगे तो उत्क्रान्त हो जायगा । एवं शरीर की पिण्डावस्था घनावस्था ) नष्ट हो जायगी । · पृथिवी एक पिण्ड है । एवं पार्थिव यच्चयावत् पदार्थ पिण्ड है । पिण्ड अग्नि का बनता है । अतएव ' अग्निः पृथिवी – स्थानः ' - ( यास्क ० निरुक्त दै ० का ० ७५ | २ ) यह कहा जाता है । पिण्ड से चारों और निकलने वाली रश्मियाँ पिण्ड के केन्द्र से बद्ध रह कर नियत मार्ग से ही बाहर की और फैलती हैं । सूर्य्य, चन्द्रमा, दीपक, आदि ज्योतिष्मान् पिण्डों से निकलने वालीं रश्मियों का तो सर्वसाधारण को प्रत्यक्ष है ही । किन्तु जो पृथिवी श्रादि ज्योतिष्मान् पिण्ड नहीं है, उनसे भी चारों और रश्मियाँ निकलतीं हैं, जिनका प्रत्यक्ष विज्ञान-चक्षु से ही किया जासकता है । वस्तुतस्तु श्रपामर - विद्वजन सबको इन रश्मियों का ही प्रत्यक्ष होता है । जिस वस्तुपिण्ड को सर्वसाधारण मनुष्योंनें दृश्य समझ रक्खा है, वह तो सर्वथा अदृश्य ही है । उसका केवल स्पर्श मात्र होता है । प्रत्यक्ष तो वेदमय रश्मिमण्डल का ही होता है । अस्तु, इस विषय का हम आगे विस्तार से निरूपण करने वाले हैं । अतः अप्राकृत-भिया हम इस विषय को यही छोड़कर प्रकृत का अनुसरण करते हैं । यहाँ पर कहना केवन इतना ही है कि, पिण्ड से निकलने वाली रश्मियाँ अपने नियत प्रदेश विचलित नहीं होतीं । उदाहरणार्थ एक दीपक सामने रख लीजिए । उस दीपक से ( दीपशिखा से ) चारों और फैली हुई अनन्त रश्मियाँ निकल रहीं हैं । सत्रका स्थान नियत है । पूर्वदिक् की और जाने वाली रश्मि ( किरण ) कभी पश्चिमदिक में नहीं जासकती । एवमेव पश्चिम भाग की और जाने वाली रश्मि कभी पूर्व की और नहीं आ सकती । पूर्वदिक् की और जाती हुई रश्मि के आगे यदि आप एक तिल भी रख देंगे, तो उस और जाती हुई रश्मि उस तिल से टकराकर प्रतिफलित होती हुई उसी नियत मार्ग से ( जिससे वह गई थी ) पुनः परावर्तित हो जायगी । किन्तु इधर उधर विरुद्ध मार्ग का अनुसरण वह कदापि नहीं करेगी । इसी नियतभाव के कारण हम अग्नि को ( पिण्डरूप सत्य अग्नि को ) सत्य कहने के लिए सन्नद्ध हैं । इस सत्य अग्नि का परम मित्र, अग्नि की स्वरूपरक्षा में अपने आपको न्योछावर करने वाला सोम सर्वथा ' ऋत ' । पानी, वायु ( साम्व सदाशिव नाम से व्यवहृत होने वाला शिववायु ), एवं सोम, तीनों एक जाति की वस्तु हैं । घनावस्था में परिणत रहता हुआ सोम ' पानी ' कहलाता है । तरलावस्था से युक्त सोम ' वायु ' कहलाता है, एवं विरलावस्थायुक्त ( प्राणरूप ) सोम ' सोम ' कहलाता है । तीनों एक वस्तु की तीन अवस्थाएँ हैं, न कि वस्तु तीन हैं | सोम ऋत है, एवं पानी, वायु, सोम, तीनों एक वस्तु है, तो ऐसी अवस्था में सुतरां तीनों का ऋत होना सिद्ध हो जाता है । सोम और वायु का त्रिप्राण के प्रभाव के कारण चक्षुरिन्द्रिय से प्रत्यक्ष नहीं होता । अतएव उनके ऋतभाव का अग्नि की भाँति ग्राम साक्षात्कार नहीं कर सकते । किन्तु त्रिप्राण के अधिक मात्रा में रहने के कारण चतुरिन्द्रिय से प्रत्यक्ष दृष्ट पानी में ( जोकि सोम ही है ) आप उस ऋतुभाव को प्रत्यक्ष देख सकते हैं । आप बहते हुए पानी के आगे अपना हाथ लगा दीजिए, दीपरश्मि की भाँति हाथ टकराकर वह परावर्त्तित नहीं होगा । अपितु हाथ से इधर उधर होके निकल जायगा । कारण इसका यही है कि १३४
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शतपथब्राह्मण अनपडों की भाँति पानी का कोई केन्द्र नहीं है । केन्द्राभाव के कारण पानी में सत्यभाव उत्पन्न नहीं होता यही बात वायु और सोम में समझनी चाहिए । इसप्रकार अग्नि सत्य है, सोम ऋत है, यह भली नाँति सिद्ध हो-जाता है | इसी सत्यानृतरून अग्नि- सोम से देवमनुष्यप्रजा उत्पन्न होती है । सूर्य्य में रहने वाले जो ३३ आग्नेय प्राण हैं, वे देवता कहलाते है । सौरमण्डलस्थ ज्योतिर्म्मय प्राण का नाम ही देवता है । अतएव ' चित्रं देवानामुद्गादनीकम् ' ( यजुःसंहिता ) यह कहा जाता है । ये सम्पूर्ण देवता ( सौरप्राण ) सूर्य्य-पिण्ड से बद्ध रहते हैं । श्रतएव ये सदा सत्यमार्ग का ही अनुसरण करते हैं । उधर सूर्य्यमण्डल में सर्वत्र अभिव्या'त ऋतसोम ऋतभाव के कारण सूर्य्यं के केन्द्र से पृथक् रहता है । हम पार्थिव मनुष्यों की उत्पत्ति का प्रधान कारण यही सोम है । सोम ही को महान् कहते हैं । जिसप्रकार दर्पण पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, तथैव इस महान् सोम के ऊपर ही उस विश्वव्यापक अव्ययपुरुष का ( चित् का ) प्रतिबिम्ब पड़ता है । अव्ययात्मा की योनि यही महान् है । इसी में अव्ययपुरुष गर्भ धारण कर ' जोवात्मा ' कहलाने लगते हैं, जैसा कि भगवान् कृष्ण कहते हैं-मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ॥ सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत! ॥१ ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय! मूर्त्तयः सम्भवन्ति याः ॥ तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ २ ॥
( गीता १४/३, ४ ) सोम की अवस्थाविशेष का ही नाम पानी है, यह हम अनुपद में हीं बतला आए हैं । उसी पानी से, दूसरे शब्दों में सोम से पाँचवीं आहुति में ' पुरुष ' की उत्पत्ति होती है, जैसाकि श्रुति कहती है -' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' । इति - छांदोग्य उपनिषत् ५।६ । १ । सूर्य से ऊपर, सूर्य के चारों और अभिव्याप्त रहने वाला पानी ' अम्भः ' कहलाता है । सौर पानी ' मरीचि ' नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिव पानी म्रियमाण होने से ' मर ' कहलाता है । एवं चान्द्र पानी ' श्रद्धा ' कहलाता है । इसप्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में पानी कुल चार ही जाति का है । इन चारों में से चान्द्र पानी ही ' श्रद्धा ' कहलाता है! इसीलिए ' श्रद्धा वा आपः ' - कहा जाता है । चन्द्रमण्डल का श्रद्धापानी सोम की पहिली अवस्था है । सोम श्रद्धा की द्वितीय श्रवस्था है । श्रद्धा ही सोम में परिणत होती है । अग्नि विश-कलन ( विकास ) धर्म्मा है । सोम नामक श्रद्धा - पानी स्नेह्गुण से युक्त है । यही कारण है कि, मनुष्य का श्रद्धा-भाग ( चान्द्ररस ) जिस और झुक जाता है, वह उसी के साथ आबद्ध हो जाता है । उसका आत्मा उससे सम्परिष्वक्त हो जाता है | गुरु की और शिष्य की श्रद्धा का झुकाव है, श्रद्धा के कारण शिष्य ने गुरु को पकड़ लिया है, १३५
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प्रथमकाण्ड किंवा श्रद्धा के प्रभाव से यह स्वयं गुरुसे बद्ध होगया है । अब गुरुकी चाहे कोई कितनी ही निन्दा करै, किन्तु उस श्रद्धास्त्र के द्वारा होने वाले बन्धन के प्रभाव से शिष्य कभी गुरु के प्रति बुरी भावना नहीं कर सकता | पुरुष का स्वरूप उसी श्रद्धा से बना हुआ है । अतएव वह जिस पर ( अपनी ) श्रद्धा करता है, उसका मन तद्रूप बन जाता है | इसका आत्मा और श्रद्धों का आत्मा श्रभिन्न होजाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-' तं यथायथोपासते, तथैव भवति ' ( छांदोग्य उपनिषत् ) इति । इसी श्रौत अर्थका स्पष्टीकरण करते हुए वेदैकवेद्य श्रव्ययपुरुष कहते हैं— सच्चानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' ( गीता १३।३ । ) । इसी श्रद्धा से सोम उत्पन्न होता है । सोम से वर्षा होती है । अर्थात् वही सोम स्थूलरूप में परिणत हो बरसने लगता है । वर्षारूप में परिणत इस सोम से - जिसे कि हम ' पानी ' कहेंगे - अन्न उत्पन्न होता है । अन्न से रेत बनता है | इस रेतसोम की जब स्त्री की रक्ताग्नि में आहुति होती है, तो इसी ' अग्नीषोमात्मक ' यज्ञ से पुरुष उत्पन्न होता है । इसप्रकार पुरुष की उत्पत्ति श्रद्धा नार्म के चान्द्र सोम से होती है, यह बात भलीभांति सिद्ध हो जाती है । ' पार्थिव आकर्षण से निकले के अनन्तर जो वस्तु जिस स्थान की होती है, अपने प्रभाव के आकर्षण से आकर्षित हो वह उसी में लीन हो जाती है ' इस वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार यच्चयावत् प्र ेतात्मा पार्थिव आकर्षण से निकलते ही प्रतिसंचरक्रम से अपने प्रभव चन्द्रमा में चले जाते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर वेदभगवान् कहते हैं— ‘ ये वै केचास्माल्लोकात् प्रयन्ति, चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' । - कौषीतकिब्राह्मणोपनिषत् १।१ । सूक्ष्मशरीर धारण कर जो पुरुष चन्द्रलोक में चला जाता है, उसका अपने पुत्र से सम्बन्ध बना रहता है । क्योंकि पुत्र में पिता का ही श्रद्धारस जाया है । इसी श्रद्धासूत्र के द्वारा चन्द्रलोक में जाते हुए. प्राणी को उसका पुत्र सोममय तण्डुलों से निर्मित पिण्डदान से उसके समीप श्रन्न पहुँचा देता है । इस अन्न के पहुँचने का द्वार यही श्रद्धासूत्र है । अतएव ' श्रद्धया श्रद्धासूत्रेण दीयते यस्मिन्कर्मणि ' इस व्युत्पत्ति से यह कर्म ' श्राद्ध ' नाम से व्यवहृत होता है, जिसका कि विस्तृत विवेचन हम आगे के ' पिण्डपितृयज्ञब्राह्मण ' में करने वाले हैं । प्रकृत में इस प्रपञ्च से हमें यही बतलाना है कि, मनुष्य का श्रात्मा सोमप्रधान होने से निसर्गतः सत्यभाव से च्युत रहता है । एवं भुवनस्वर्गवासी भौम मनुष्यदेवताओं का आत्मा यज्ञ के द्वारा आत्मा में आहित सत्य अग्नि की उल्वणता के कारण सत्यभावोपेत रहता था । आधिदैविक, तथा आधि-भौतिक, इस उभयविध प्रजा के सत्यानृतविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ही ' सत्यमेव देवाः, अनृतं मनुष्याः ' यह कहा गया है । यज्ञ के द्वारा आज यह यजमान उन सत्यस्वरूप देवताओं में जाने वाला है, सत्यप्राणदेवताओं का आत्मा से सम्बन्ध जोड़ने वाला है, अतएव श्राज से यह यज्ञसमाप्तिपर्यन्त सत्य बोलने की प्रतिज्ञा करता १३६
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' शतपथब्राह्मण है | यज्ञ के समाप्त होने पर व्रतविसर्जन करता हुआ यह यजमान यदि - ‘ मैं सत्य से अनृतभाव को प्राप्त हो रहा हूँ ' यह बोलेगा तो वाग्बल के प्रभाव से सचमुच यह पुनः साधारण मनुष्य ही रह जायगा | यज्ञ-द्वारा प्राप्त देवभाव नष्ट न हो, अत: ' इदमहं य एवास्मि ' इसी मन्त्र को बोलते हुए व्रतविसर्जन करना चाहिए । यद्यपि मनुष्य कभी सत्य नहीं बोल सकता । क्योंकि इसके आत्मा में निसर्गतः सोम भाग उल्वरण रहता है । तथापि ‘ चक्षुर्वै सत्यम् ' इस सिद्धान्त को आगे रखकर ही श्रौत सत्यादेश की संगति लगानी चाहिए । ऐत-रेय श्रुति में भी अन्त में यही निर्णय किया गया है । वहाँ पर ' स वै सत्यमेत्र वदेत् ' इस आज्ञा का विरोध करते हुए पूर्णपक्ष किया है कि, जबकि ( सोमभाव के कारण ) मनुष्य जब सत्य बोल ही नहीं सकता, तो ऐसी अवस्था में उसे सर्वथा असम्भव सत्य बोलने की आज्ञा कैसे दी गई है? । इस पूर्वपक्षका ' एतद्ध बै मनुष्येषु सत्यं निहितं यच्चक्षुः ' यह समाधान किया गया है । यही कारण है कि, ' मैंने आखों से देखा है ' - ' मैंने सुना है ' यह कहने वाले मनुष्यों में से जो ' मैंने आखों से देखा है ' यह कहता है, उसी की बात सत्य मानी जाती है । कारण इसका यही है कि, चक्षुरिन्द्रिय का निर्माण सूर्य्यं से होता है, जैसाकि श्रुति कहती है - ‘ आदित्यश्चक्षु-भूत्वा यक्षिणी प्राविशत् ' ( आदित्यरस चक्षुरिन्द्रिय - स्वरूप में परिणत हो अक्षिगोल में प्रविष्ट होगया - ऐ ० उप ॰ २।४ । इति ) । सूर्य्य अग्निमय है । अग्नि को हमने सत्य बतलाया है । इसी से चक्षुरिन्द्रिय बनती है । अतएव चक्षुको सत्य बतलाया गया है । सम्पूर्ण प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि, प्राणरूप सत्यसंहित देवताओं में मिथ्याभावोपेत मनुष्य का प्रवेश करना इसकी अनधिकारचेष्टा है, अतएव यह यजमान ' देवो भूत्वा देवं भावयेत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार सत्य बोलने की प्रतिज्ञा करता हुआ ही व्रतग्रहण करता है । ३,४,५,६ ॥ अथातोऽशनानशनस्यैव । तदु हाषाढः सावयसोऽनशनमेव व्रतं मेने । मनो ह वै देवा मनुष्यस्याऽऽजानन्ति त एनमेतद् व्रतमुपयन्तं विदुः - ' प्रातन्नों यच्यते ' इति । तेऽस्य विश्वेदेवा गृहानागच्छन्ति तेऽस्य गृहेषूपवसन्ति- - स उपवसथः । तन्वेवानव-क्लृप्तम्- यो मनुष्येष्वनश्नत्सु पूर्वोऽश्नीयात्, अथ किमु - यो देवेश्वनश्नत्सु पूर्वोऽश्नी-यात् । तम्मादु नैवाश्नीयात् । तदु होवाच याज्ञवल्क्यः । यदि नाश्नाति - पितृदेवत्यो भवति, यद्य, अश्नाति – देवानत्यश्नाति इति । स यदेवाशित मनशितं, तदश्नीयात् - इति । यस्य वै हविर्न गृह्णन्ति, तदशितम् - अनशितम् । स यदश्नाति - तेनापितृदेवो भवति, यद्य तदश्नाति -यस्य हविर्न गृह्णन्ति तेनो देवान् नात्यश्नाति ॥ स वा आरण्य -मेवाश्नीयात् । या वा आरण्या ओषधयः, यद्वा वृक्ष्यम् । तदुह स्माऽऽहापि चकुर्वाणः-‘ माषान्मे पचत, न वा एतेषां विगृह्णन्तीति ' । तदु तथा न कुर्यात् । ब्रीहियवयोर्वा एतदुपचम् - यच्छमीधान्यम्, तद् ब्रीहियवावेवैतेन भूयांसौ करोति । तस्मादारण्यमेवा-श्नीयात् || ७ | ८ | ६ | १० || १३७