Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 421–430

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 421–430

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प्रथमकाण्ड पूर्वपर्य्यन्त के सम्पूर्ण कर्म्म अन्तरङ्गकर्म में अन्तर्भूत हैं । दूसरे शब्दों में- वेदिनिर्माण से पहिले के कम्नों की समष्टि एक कर्म्म है, यही बहिरङ्गकर्म है । एवं वेदिनिर्माण से उत्तर के कम्मों की समष्टेि एक कर्म्म है, यही अन्तरङ्ग कर्म्म है । इन दो के अनन्तर प्रधानकर्म्म होता है । इसके अनन्तर एक अन्तरङ्ग, और एक बहिरङ्ग, इसप्रकार दो कर्म्म और होते हैं. इसप्रकार कुल पाँच कर्म हो जाते हैं । इन पाँचों में मध्यक ' इष्टिकर्म्म ‘ पुरुषार्थ ' होने से प्रधानकर्म कहलाता है, एवं आद्यन्त के चारों कर्म्म क्रत्वर्थ होने से ' अङ्ग-कर्म्म ', किवा गौणकर्म्म कहलाते हैं । इन पाँचों कम्मों में से उत्तर के अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग को छोड़ दीजिए । शेष तीन कर्म्म - ( १ बहिरङ्ग, २ अन्तरङ्ग, ३ प्रधान ) बचते हैं | व्रतोपायन के विषय में तीन मत हैं । बहिरङ्गकर्म्म से पहिले व्रतोपायन करना, यह पहिला मत है । अन्तरङ्गकर्म से पहिले करना, यह दूसरा मत है । एवं प्रधानकर्म्म से पहिले करना, यह तीसरा मत है । ' प्रधानकर्म से पहिले ही व्रतोपायन करना चाहिए ' इस तीसरे मत को मानने वाले आचार्य अपने मत की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि, व्रतोपायनक अन्तरङ्ग बहिरङ्गवत् क्रत्त्वर्थ है । अतएव ' गुणानां च परार्थत्त्वादसम्बन्धः समत्त्वात् ' मीमांसा के इंस सिद्धान्त के अनुसार प्रधानकर्म्म के ही अङ्गभूत व्रतोपायन का सम्बन्ध होना उचित है | एवं ‘ अन्तरङ्ग-कर्म से पहिले व्रतोपायन करना चाहिए ' इन मत को मानने वाले सांप्रदायिकों का कहना है कि, अन्तरङ्ग-कर्म का प्रधान कर्म से घनिष्ट सम्बन्ध है । अतः उसे प्रधान कर्म से पृथक नहीं माना जासकता । जबकि अन्तरङ्ग का प्रधान में अन्तर्भाव है, तो ऐसी अवस्था में इससे पहिले. ही व्रतोपायन करना चाहिए । एवं-' बहिरङ्गकर्म से पहिले व्रतोपायन करना चाहिए ' इस सिद्धान्त को मानने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि, यज्ञ में प्रविष्ट होने से पहिले यज्ञसम्बन्धी तत्तन्नियमों के पालन के लिए जो प्रतिज्ञा करनी पड़ती है, बही कर्म्म ‘ व्रज़ोपायन ' कहलाता है । ' पाङ्को वै यज्ञः ' के अनुसार पाँचों की समष्टि से यज्ञ का स्वरूप बनता है | जत्रकि यज्ञस्वरूप पाँचों पर निर्भर है, तो ऐसी अवस्था में बहिरङ्गकर्म से पहिले ही व्रतोपायन करना उचित है । कितने हीं श्राचार्य्यं निम्नलिखित उपपत्ति बतलाते हुए तीनों में कामचार बतलाते हैं । उनका कहना है कि, जो यजमान सबल है, उसे बहिरङ्गकर्म्म से पहिले ही व्रतोपायन करना चाहिए | क्योंकि बह दीर्घसमय पय्यन्त व्रतपालन में समर्थ होसकता है । सामान्यस्थिति के यजमान को अन्तरङ्गकर्म्म से पहिले व्रतोपायन करना चाहिए | एवं अशक्त यजमान को प्रधानकर्म्म से पहिले व्रतोपायन करना चाहिए | ऐसा करने से उसे थोड़े ही समय पर्य्यन्त बन्धन में रहना पड़ेगा । इसप्रकार तीनों विकल्पों के विषय में यद्यपि यह उपपत्ति यथाकथंचित् होसकती है । तथापि ' पाङ्को वै यज्ञः ' - इस विज्ञान के प्रधान होने से प्रथम स्थानीय व्रतोपायन को ही सिद्धान्तपक्ष समझना चाहिए । भला जो निर्बल मनुष्य है, वह यज्ञ ही क्यों करेगा । जो व्रतपालन में हीं असमर्थ है, वह सम्पूर्ण कर्म्म करने में कैसे समर्थ हो सकेगा । अत: इस पूर्वोप-पति को आपातरमणीय ही समझना चाहिए । अतएव भगवान् याज्ञवल्क्यने प्रथमस्थानीय त्रतोपायन को ही अपना मत माना है । यही परम्परा में भी मान्य है । पूर्वप्रदर्शित अन्वारम्भणीयादि चार सहकारी - कम्मों के विषय में दो मत हैं । कितने हीं याज्ञिकों के मतानुसार उपवंसथदिन में हीं ( व्रतोपायन और उपचसथदिन - सम्बन्धी कम्मों से पहिले ) ये चारों कर्म्म होते हैं । एवं कितने हीं याज्ञिकों के मतानुसार इष्टि के दिन हीं ( ब्रह्मवरण से पहिले ही ) ये चारों कर्म्म होते । दोनों में कामचार है । अतएव ' सद्यो वा प्रातः ' ( का ० श्र ० सू ० २ | १ | १६ ) यही कहा जाता है । उप-१५८

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शतपथब्राह्मण वसथान में होने वाले जितने भी कर्म्म हैं, उन का सोपपत्तिक निरूपण कर दिया गया । दूसरे दिन होने वाले कर्मों की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हैं । हमने बतलाया है कि, वितानयज्ञ ( श्रातयज्ञ ) में गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, ये ही तीन अग्नि होते हैं । गार्हपत्य पृथिवीलोक है । दक्षिणाग्नि अन्तरिक्षलोक है । आहवनीय स्वर्गलोक है । तीनों अग्नियों के लिए तीन हीं अग्निकुण्ड बनाए जाते हैं । श्राहवनीयकुण्ड चौकोर होता है । दक्षिणाग्निकुण्ड अर्द्धचन्द्राकार होता है । एवं गार्हपत्यकुण्ड गोल होता है । आहवनीय-कुएड यज्ञपुरुष का मस्तक है । गार्हपत्य अपानप्राण है । दक्षिणाग्नि वैश्वानराग्नि ( जठराग्नि ) है । प्रकृति-सिद्ध नित्यज्ञ में - पार्थिव अग्नि हीं १७ वें स्थान में स्थित ग्राहवनीय में जाता है । अतएव - इस वैधयज्ञ में भी गार्हपत्यकुण्ड से ही आहवनीय में अग्निं ले जाया जाता है । अध्यात्मयज्ञ में मध्यस्थ जठराग्नि में हीं अन्न का पारेपाक होता है । अतएव यहाँ भी मध्यस्थ दक्षिणाग्नि में हीं पुरोडांश पकाया जाता है । अत-एक इस अग्निको ' श्रपणाग्नि ' कहा जाता हे । एवं श्राहवनीय और गार्हपत्य के बीच में पुरुष के घड़ के आकार की वेदि होती है । हवियज्ञ - सम्बन्ध के कारण इस वेदिको हरिर्वेदि कहा जाता है | पूर्वोक्त तीनों अग्नियों में आहुति श्राहवनीय में हीं दी जाती है । क्योंकि ग्राहवनीय मस्तक है । एवं अव्यात्मयज्ञ में आहवनीय रूप शिरस्थ मुख में हीं अन्न की आहुति दी जाती है । इसी की प्रतिकृति पर इस वैध यज्ञका वितान किया जाता है । अतएव मुखरूप श्राहवनीय में हीं आहुति देना उचित है । इष्टि के दिन प्रात: काल नित्याग्निहोत्र होता है । अनन्तर ' ब्रह्मवरण ' कर्म्म होता है । ब्रह्मवरण के अनन्तर ' अपांप्रणयन ' कर्म्म ' होता है । यही कर्म्म यज्ञ का पहिला कर्म्म है । यज्ञ के प्रवर्तक ब्रह्मा हीं हैं । सूर्य्यम-ण्डल के ऊपर परमेष्ठी - मण्डल है । परमेष्ठी के अन्त में, और सूर्य से ऊपर बृहस्पति हैं । बृहस्पति ही ब्रह्म है । पारमेष्ठ्य यज्ञ को रोदसी त्रिलोकी ( जिस में कि हम हैं ) की ओर सविता प्राण की प्र ेरणा से प्रवृत्त करने वाले पारमेष्ठिनी आम्भृणी वाक् के अधिपति होने से बाचस्पति नाम से प्रसिद्ध बृहस्पति ही ब्रह्मा कहलाते हैं । सम्पूर्ण रोदसीयज्ञ की रक्षा का भार इन्ही बृहस्पति पर है । अतएव इन्हें हम ' यज्ञगोप्ता ' कहते हैं । क्योंकि प्रकृतियज्ञ में यज्ञ के प्रभव बृहस्पति ब्रह्मा हैं I । वहीं से प्रापोमय यज्ञ प्रवृत्त होता है । अतएवं अपांप्रणयन से पहिले इस वैधयज्ञ में ब्रह्मा का वरण किया जाता है । ऋग्यजुः - साम, इस वेदत्रयी से ही यज्ञ का स्वरूप बनता है । एवं वेद के प्रभव ब्रह्मा है । अतएव यज्ञ से पहिले यज्ञ के मूलभूत ब्रह्मा को प्रतिष्ठित करना नितान्त आवश्यक है । पप्रणयन के पहिले ' ब्रह्मवरण ' कर्म्म क्यों किया जाता है?, इस का यही उत्तर है । सूर्य्य वेदत्रयीवन हैं: 1 एवं बृहस्पतिब्रह्म वेद - त्रयीरूप क्षत्रसूर्य पर अधिष्ठित हैं । अतएव - वैधयज्ञ में भी ब्रह्मा वही बनाया जाता है, जो कि तीनों वेदों * - सैषा त्रयीविद्या यज्ञः । ( शतपथ ० १ । १ । ४ । ३ । ) । ---- यदेतन्मण्डलं तपति - तन्महदुक्थं, ता ऋचः, स ऋचां लोकः । अथ यदे-तदर्चिर्दीप्यते - त - महात्रतं, तानि सामानि स साम्नां लोकः । अथ य एष एतस्मिन्म-ण्डले पुरुषः - सोऽग्निः, तानि यजूंंसि, स यजुषां लोकः । सैषा त्रय्येव विद्या तपति । - शतपथ ० ( १० | ५ | २।१,२, ) १५६

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प्रथमकाण्ड का विद्वान् होता है । हम यद्यपि शतपथ का अनुवाद कर रहे हैं, अतः हमें ' अनुवाद ' की मर्य्यादा के अनु--सार उन्हीं कम्र्मों के निरूपण का अधिकार है, जो कि शतपथ आए हैं । इतना होने पर भी सम्बन्ध जानने के लिए अनुक्त कम्मों का सूक्ष्मरूप से उल्लेखमात्र कर देना हमने आवश्यक समझा है । व्रतोपायन कर्म्म के अनन्तर ही शतपथ में अपप्रणयक प्रारम्भ हो जाता है । इन दोनों के बीच में होने वाले ' ब्रह्मवरण ' की इतिकर्त्तव्यता नहीं बतलाई गई है । अतः - श्रौतसूत्र के अनुसार इस कर्म की सूक्ष्मरूप से इतिकर्त्त -व्यता बतला देते हैं । इष्टि के दिन प्रातःकाल ही अग्निहोत्र के अनन्तर ' ब्रह्मा ' का वरण किया जाता है । इस दिन गार्हपत्य से उद्धृत जो आहवनीय अग्नि है, उसी में प्रातरग्निहोत्रहोम होता है । इसके लिए नया उद्धरण नहीं किया जाता । इसप्रकार इष्टयर्थ उद्धृत अग्नि में अग्निहोत्रहोम करके —–सूर्योदय के समय ब्रह्मवरण के लिए निम्नलिखित क्रम से ब्रह्मा, श्रध्वर्यु, यजमानादि के लिए आसन बिछाए जाते हैं । ब्रह्मवरण के लिए दो आसन विहार से उत्तरभाग में बिछाए जाते हैं । एक पर यभ्रमान बैठता है, एवं दूसरे पर ब्रह्मा बैठते हैं । इन दो श्रासनों के अतिरिक्त एक आसन श्राहवनीय से दक्षिणभाग की ओर बिछाया जाता है । वरणानन्तर मन्त्र बोलते हुए ब्रह्मा इसी श्रासन पर बैठते हैं । एवं एक आसन ब्रह्मासन से पश्चिम भाग में बिछाया जाता है । इस पर ' वरण ' कम्र्मानन्तर यजमान बैठता है । इसप्रकार चार आसन तो यजमान और ब्रह्मा के लिए बिछाए जाते है, एवं एक आसन गार्हपत्य के उत्तरभाग में बिछाया जाता है । इसपर बैठकर अध्वर्यु ' अपांप्रणयन करता है । एवं एक आसन अध्वर्यु के बैठने लिए आहवनीय के उत्तरभाग में ब्रह्मासन से पूर्व चिछाया जाता है । इसीपर बैठकर अध्वर्यु आहवनीयाग्नि में श्राहुति देता है । इसप्रकार कुछ ६ श्रासन बिछाए जाते हैं । इनमें जो दो आसन विहार के उत्तरभाग में बिछाए जाते हैं, उनपर क्रमश: यजमान और ब्रह्मा बैठ जाते हैं । यजमान उत्तराभिमुख बैठता है, ब्रह्मा पूर्वाभिमुख बैठते हैं । इसप्रकार पूर्वाभिमुख बैठे हुए ब्रह्मा के दक्षिणजानु का स्पर्श करता हुआ यजमान नाम - गोत्र - पूर्वक ' पौर्णमासे पाहं यक्ष्ये । तत्र -‘ ॐ ब्रह्मिष्ठ ं भूपते भुत्रनपते महतो भूतस्य पते ब्रह्माणं त्वा वृणीमहे ' ( अमुक नाम वाला, एवं अमुक गोत्र वाला मैं पौर्णमास इष्टि से देवताओं का यजन करूँगा । इस यजन कर्म्म में - चराचर के अधिपति जो ब्रह्मा हैं, उनके रूप से श्रापका वरण करता हूँ - अर्थात् जैसे प्रकृतियज्ञ के अधिपति ब्रह्मा हैं, तथैव मैं आपको इस वैधयज्ञ का गोप्ता बनाता हूँ ) यह बोलता हुआा वरण करता । इसी अभिप्राय से भगवान् कात्यायन कहते हैं— ' अग्निहोत्रं हुत्व ' ब्रह्माणं वृणीते- ' ब्रह्मिष्ठ ं भूपते भुवनपते महतो भूतस्य पते ब्रह्माणं-त्वा वृणीमहे इति ' ( का ० श्र ० सू ० २।१।१७ इति ) । इसप्रकार यजमान से वृत ब्रह्मा निम्नलिखित मन्त्र बोलते हैं— ‘ अहं भृतपिरहं भुवनपतिरहं महतो भूतस्य पतिभूर्भुवः स्वर्देव सवितरेतं त्वा वृणते बृहस्पतिं ब्रह्माणं तदहं मनसे प्रब्रवीमि, मनो गायत्र्यै, गायत्री त्रिष्टुभे, त्रिष्टुब् जगत्यै, जगत्यनुष्टुभे, अनु-ध्रुप् प्रजापतये, प्रजापतिर्विश्वेभ्यो देवेभ्यः, वृहस्पतिर्देवानां ब्रह्माहं मनुष्याणाम् ' इति ( का ० १६०

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शतपथब्राह्मण श्री ० २ | १ | १८ ) ( जिसप्रकार बृहस्पतिदेवता गाई ० दक्षि ० ग्राह ० रूप पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोक के वसु, रुद्र श्रादित्य देवताओं के ‘ ब्रह्मा ' हैं, तथैव त्रैलोक्यरूप तीनों वैध अग्नियों पर अधिष्ठित होता हुआ मैं इन मनुष्य का ( मनुष्ययजमान क़ा ) ब्रह्मा बन गया हूँ ' मन्त्र ' का यही तात्पर्य है ) । इसके अनन्तर यजमान ब्रह्मा के प्रति ' वाचस्पते यज्ञं गोपाय ' ( हे वाचस्पते । आप यज्ञ की रक्षा कीजिए । ) इस प्रार्थना - वाक् का प्रयोग करता है । - वाक को ही यज्ञ कहते हैं, जैसाकि दूसरे ब्राह्मण में बतलाया जायगा । इस यज्ञरूप वाक् के अधिपति बृहस्पति नाम के ब्रह्मा ही हैं | आज इस मनुष्यब्रह्मा को ही यही पद मिला हुआ है । अतएव ब्रह्मा के प्रति उत्तरदायित्त्व समर्पित करते हुए यजमान कहता है कि, आप वाचस्पति हैं । अर्थात् यज्ञपति हैं, अतएव इस यज्ञ की रक्षा करना आपका आवश्यक कर्त्तव्य है । इससे अनन्तर ब्रह्मा वरणासन से उठ जाते हैं - और ' अपरेण वाहवनीयं दक्षिणातिक्रामति ' ( २१ १२० का ० श्रौ ० सू ० के अनुसार आहवनीय से पूर्वभाग में होकर वेदि से दक्षिणभाग में स्थापित आसन के समीप जाकर आसन से पश्चमोत्तर भाग में प्राङमुख खड़े होकर ' अहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदते सीद योऽस्मत्पाकतर: ' ( का ० श्र ० २१ २१ ) यह मन्त्र बोलता हुआ ब्रह्मसदन की ओर देखता है । अनन्तर ' निरस्तः पाप्मा सह तेन यं द्विष्मः ' यह बोलता हुआ ब्रह्मासन से एक कुशतृण लेकर उसे नैऋतकोण में फेंक देता है । अनन्तर— ‘ इदमहं बृहस्पतेः सदसि सीदामि प्रसूतो देवेन सवित्रा तद्ग्नये प्रब्रवीमि तद्वायवे तत्-पृथिव्यै ' – ( अग्नि - वायु - पृथिवी इन तीनों देवताओं की साक्षी में सवितादेवता की आज्ञा से इस बृहस्पति के आसन पर मैं बैठता हूँ, का ० श्री ० सू ० २ १ १ ) यह मन्त्र बोलते हुए ब्रह्मा अपने आसन पर बैठ जाते हैं । अनन्तर ब्रह्मासन से पश्चिम भाग में स्थापित. आसन पर यजमान बैठ जाता है । ब्रह्मवरणोपपत्ति— ब्रह्मा यज्ञ के दक्षिणभाग में प्रतिष्ठित होकर यज्ञ की रक्षा किया करते हैं । प्राकृतिक यज्ञसत्ता ब्रह्मा पर ही निर्भर है | अतएव इस वैधयज्ञ में भी ( जोकि प्राकृतिक नित्ययज्ञ की प्रतिकृति है ) यज्ञ के दक्षिण भाग में ब्रह्मा को प्रतिष्ठित किया जाता है । प्राकृतिक यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले ब्रह्मा का क्या स्वरूप है?, ब्रह्मा दक्षिण में हीं क्यों रहते हैं?, दक्षिण में रह कर ही वे यज्ञ की रक्षा करने में समर्थं क्यों होते हैं?, इत्यादि प्रश्न जितने हीं सरल है, इनका उत्तर उतना हीं कठिन है । ' इन प्रश्नों का शास्त्रों में उत्तर नहीं है, इसलिए उत्तर कठिन है । अथवा हम इनका उत्तर देने में असमर्थ हैं, इसलिए उत्तर देना कठिन है " हमारी कठिनता का यह कारण नहीं है । शास्त्रों में अति विस्तार के साथ इन प्रश्नों का समाधान किया गया है । एवं गुरुकृपा से हम भी अपनी स्वल्प - बुद्धि के अनुसार शास्त्रों के आधार पर इन प्रश्नों का समाधान कर ही सकते हैं । फिर कठिनता क्यों? । पूर्वं प्रश्नों का उत्तर देना जितना हीं कठिन हैं, इस कठिनता का उत्तर देना - उतना ही सरल है । इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है । प्रत्येक शास्त्र की भिन्न भिन्न परिभाषाएँ हुआ करतीं हैं । जबतक उन परिभाषाओं को नहीं जान लिया जाता, तबतक अत्यन्त सरल होने पर भी वह शास्त्र हमारे लिए अतिदुरूह बना रहता है । चिना परिभाषाज्ञान के क्या कोई विद्वान् व्याकरणशास्त्र की घी, टी, नदी, घु, श्राम्रडित, आदि संज्ञाएँ समझ सकता है? | बिना परिभाषाज्ञान के क्या कोई विद्वान् न्यायशास्त्र के - ' साध्यतावच्छेदकसम्बन्धावच्छित्र ' के अवच्छेदकावच्छिन्न को समझ सकता १ | अद्वैतसिद्धान्त की परिभाषाओं को जाने बिना क्या शुष्कवैय्याकरण अख्याति, असत्ख्याति, १६१

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-प्रथमकाण्ड अन्यथाख्याति, आत्मख्याति, रयि, प्राण, आदि सांकेतिक शब्दों के मर्म समझ सकता है? । ज्यौतिष के त्रिज्या, कुज्या, निरयण, सायन, क्रान्ति, परमक्रान्ति, लम्ब, कदम्ब, अक्षांश, अयनांश, नाड़ीवृत्त, कर्कवृत्त, आदि पारिभाषिक पदार्थों से परिचय प्राप्त किए बिना क्या शुष्कवेदान्ती ज्यौतिषशास्त्र का मर्म समझ सकते हैं? | अनुभव, विभाव, उद्दीपन, बीभत्स, रौद्र, शृङ्कार आदि अलङ्कार, एवं रसों के म समझे बिना क्या अवच्छेदकावच्छिन्नमात्र में हीं अपनी जीवनलीला समाप्त कर देने वाले शुष्क नैय्यायिक साहित्य का मर्म्म समझने के अधिकारी बन सकते हैं? | आयुर्वेदशास्त्र के अतिसुप्रसिद्ध ' परिभाषाग्रन्थ ' को पढ़े बिना क्या कोई साहित्यज्ञ ‘ वैद्य ' कहलाने का अभिमान कर सकता है? | नहीं | कभी नहीं । सर्वथा नहीं । तत्तच्छास्त्रोंकी परिभाषाएँ जाने बिना उन उन शास्त्रों को समझ लेना कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । ऐसी अवस्था में वैदिक परिभाषाओं के जाने बिना - जो कि परिभाषा - ज्ञान पठनपाठन के प्रचार न होने से प्राय: महाभारतकाल के अनन्तर विलुप्तप्राय ही होरहा है यदि इतर शास्त्रों के प्रकाण्ड विद्वान् भी वेद का अर्थ समझने में कुण्ठितबुद्धि होते हैं, तो इसमें वेद का क्या दोष है । श्री पू ० गुरुवर ओझाजी के मतानुसार तो परिभाषाज्ञान के अनन्तर वेदशास्त्र उतना हीं सरल है, जितना कि परिभाषा - ज्ञान के अनन्तर व्याकरणशास्त्र । एवं साहित्यशास्त्र सम्बन्धिनी परिभाषाओं के ज्ञान के अनन्तर घुवंश | वेद सत्यतत्त्व है । सत्य सदा ऋजु ( सरल ) ही होता है । मिथ्याभाव कुटिल - अतएव दुरूह होता है । वैदिकभाषा नत्र्यन्याय की भाँति कृत्रिमता से लाखों कोसों दूर है । वैदिकसाहित्य महर्षियों की स्वाभाविक सरलवाणी है । यह सबकुछ होते हुए भी आज जो वेदशास्त्र विद्वानों की दृष्टि में अतिकठिन बना हुआ है, उसका एकमात्र कारण है - परिभाषाज्ञान का अभाव | इसी कठिनता के कारण पूर्व के प्रश्नों का समाधान करना कठिन है । वेद मौलिकतत्त्व है । यज्ञ योगिकतत्त्व है । वेद ब्रह्म है । कर्म्मकाण्ड ' यज्ञ ' है । ब्रह्म के – ब्रह्म और यज्ञ, ये दो ही विवर्त्त हैं । ब्रह्म कारण है, यज्ञ का है । ब्रह्म पर यज्ञ प्रतिष्ठित है । ग्रतएव यज्ञविज्ञान तबतक समझ में नहीं श्रासकता, जबतक कि ब्रह्म-विज्ञान को भलीभाँति न समझ लिया जाय । ब्रह्मविज्ञान हीं यज्ञविज्ञान की प्रतिष्ठा हे । ' शतपथ-ब्राह्मण ' यज्ञग्रन्थ है | इसमें यज्ञविज्ञानमात्र का निरूपण है । अतएव इसका सम्यग् ज्ञान ब्रह्मविज्ञान पर ही निर्भर है - जोकि ब्रह्मविज्ञान वेदसंहिताओं से सम्बन्ध रखता है । इसी कठिनता के कारण पूर्व के प्रश्नों के समाधान के लिए हमने ' कठिन ' शब्द का प्रयोग किया है । जिस समय शतपथ का दर्शन हुआ था, उस समय भारतवर्ष में ब्रह्मविज्ञान, और यज्ञविज्ञान, दोनों का ही पर्य्या'न्त प्रचार था । श्रतएव शतपथ में— सम्पूर्ण विषयों का सूत्ररूप से ही निदर्शन हुआ है । परन्तु आज परिभाषाओं के लुप्त हो जाने से वधी शतपथ हमारे लिए वज्र बन गया है । शतपथ के आख्यानोपाख्यानों का वैज्ञानिक रहस्य क्या है?, इसका उत्तर शतपथ में हीं है । परन्तु सूत्ररूप से । आप उसे देख लेने मात्र से ही उसका रहस्य नहीं समझ सकते — जत्रतक किं तत्सम्बन्धी ब्रह्मविज्ञान का बोध न हो । श्रतएव अप्राकृत होने पर भी - यज्ञविज्ञान की ग्रन्थियाँ सुलझाने के लिए समय समय पर हमें अपने पाठकों के सामने - ब्रह्मविज्ञान - सम्बन्धिनी एरिभाषाओं का स्वरूप बतलाना पड़ेगा । शतपथ के अनुवाद करने का हमारा एकमात्र उद्देश्य है - वैदिक विज्ञान का प्रचार करना, और तद्द्वारा पाश्चात्यशिक्षाकी चकाचौंध में अपने आपको भूले हुए भारतीयों को उनके स्वरूप का ज्ञान करवाना | इसीलिए हमने ' पुनरुक्ति ' दोष को इस अनुवाद में ' गुण ' माना है । पहिले तो वेद का विषय विद्वानों के लिए भी कठिन है । ऐसी अवस्था में केवल भाषाभिज्ञ मनुष्यों की कठिनता का तो कहना ही क्या है । १६२

पृष्ठ 426

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शतपथब्राह्मण विद्वान् अपने पथ के अनुयायी हैं । अतएव उनके विषय में हमें कुछ नहीं कहना । जो संस्कृतभाषा से अपरिचित हैं, उन्हें हीं इस ओर आकर्षित करना है । अतः हम एक ही विषय को रूपान्तर में परिणत करके चारत्रार उसका प्रतिपादन करेंगे, जिससे कि सर्वसाधारण मनुष्य भी उसे समझ जाय । इसके लिए यदि विद्वान् हमें दोष देंगे, तो उसे हम सहर्ष स्वीकार कर लेंगे । बहुत हुआ | हमें जो कुछ आवश्यक निवेदन .करना था, कर चुके । आशा है - श्रद्धालु पाठक इन पङक्तियों को ध्यान में रखते हुए विषय के गाम्भीर्य्यं को सामने रखते हुए आगे आने वाले पुनरुक्ति - दोषों को, और आवश्यकता से अधिक विस्तार के दोषों को दोष न समझ कर हमें इस कार्य के लिए प्रोत्साहित ही करेंगे पूर्व में - श्रौतसूत्र के अनुसार ' ब्रह्मवरण ' कर्म्म की इतिकर्त्तव्यता बतलाई गई है । यज्ञदिवस में होने वाले कम्मों में सबसे पहिला कम्मं है ' पांप्ररणयन ' | परन्तु इससे भी पहिले ' ब्रह्मवरण ' कर्म किया जाता । क्योंकि यज्ञ के रक्षक ब्रह्मा हैं । यदेि ब्रह्मा नहीं होंगे, तो यज्ञ ही प्रतिष्ठित न होगा । ब्रह्मा ही यज्ञ की [ यज्ञमय सम्पूर्ण विश्व की ] प्रतिष्ठा हैं । अतएव सबसे पहिले ब्रह्मवरण कर्म्म करना पड़ता । ब्रह्मा यज्ञ की प्रतिष्ठा कैसे है?, इस प्रश्न के समाधान के लिए निम्नलिखित ब्रह्मविज्ञान को ध्यान में रखना आवश्यक है । संसार में स्थिति, और गति, दो तत्त्व हैं । दोनों अविनाभूत हैं । ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसमें गति न हो । ऐसी कोई गति नहीं है, जिसमें स्थिति न हो । जिस दिन स्थिति में से गति निकाल दी जायगी, उस दिन वह स्थिति गतिरूप में परिणत हो जायगी । स्थिति का स्वरूप गति पर निर्भर है, गति का स्वरूप स्थिति पर निर्भर है । आप अपने मकान से रामनिवासबाग जाने का संकल्प करते हैं । संकल्प के साथ ही भीतर ही भीतर प्राणव्यापार [ चेष्टा - कोशिश ] होता है । पैर चल पड़ते हैं । एक पैर उठता है - एक आगे जाकर टिकता है । पैर चल रहे हैं - यही गति है । परन्तु जब आप एक पैर आगे के लिए उठाते हैं, तो दूसरे पैर को भूतल पर स्थित रखना पड़ता है । बिना एक पैर को स्थित किए आप दूसरे पैर को गतिरूप में परिणत कर ही नहीं सकते । चतएव मानना पड़ता है कि, सचमुच - गति बिना स्थिति के नहीं हो सकती । यदि आप गति में से इस स्थिति को निकाल देंगे, तो आपकी गति स्थितिरूप में परिणत हो जायगी । श्रावण का महीना है । आकाश में बद्दल छाए हुऐ हैं । फरमर झरमर मेह बरस रहा है । बड़े ही आनन्द का समय है । मित्रमण्डली गोष्ठी के लिए घर से रवाना होती है । इसे अपने घर से २ कोस की दूरी पर स्थित गालव महर्षि के श्राश्रम में जाना है, जहाँ पर कि पतितपावनी गङ्गा कलकलनाद करती हुई पहाड़ों से गिर कर बहती हुई पापियों के पापों को बहा ले जारही है । मार्ग में उन मित्रों में परस्पर संवा ( श ) लगती है कि देखें लक्ष्यस्थान पर पहिले कौन पहुँचता है । बाजी लगते ही सम्पूर्ण मित्र अपने अपने बल के अनुसार शीघ्रगति से चल पड़ते हैं । एक मित्र १ घन्टे भर में पहुँचता है । दूसरा २ घन्टे में पहुँचता है । तीसरा १५ ही मिनिट में पहुँच जाता है । लीजिए चौथा तो १० ही मिनिट में आपहुँचा | अब आपसे हम प्रश्न करते हैं कि, १० सों मित्र एक समय में एक साथ चले थे । परन्तु एक १० ही मिनिट में पहुँच गया । एक को २ घन्टे लगे । एक को एक घन्टा लगा । इसका क्या कारण है? । उत्तर में आप कहेंगे कि - जिसने जल्दी पैर उठाए, वह जल्दी पहुँच गया । जिसने धीरे धीरे पैर उठाए, वह देर से पहुँचा । आपके इन दो उत्तरों से हमारा समाधान हो जाता है | जल्दी पैर उठाने का अर्थ है -स्थिति कम करना । अतएव मानना पड़ता है कि जो मनुष्य १० ही १६३

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प्रथमकाण्ड मिनिट में पहुँच गया है, उसके पैरों में स्थिति बहुत ही कम थी । उसने अपना पैर जमीन पर किस समय रक्खा, यह देखना कठिन था । उसके पैर तो चलते ही दिखाई देते थे । मानलीजिए - एक मनुष्य इससे भी अधिक शीघ्र चलने वाला है । यह उससे दुगुना शीघ्र चलता है । अर्थात् इसके पैरों की स्थिति १० मिनिट में पहुँचने वाले की स्थिति से आधी है । अतएव वह पाँच ही मिनिट में लक्ष्य स्थान पर पहुँच जाता है । उससे भी कम स्थिति रखने वाला २ || मिनिट में पहुँच जाता है । उससे भी आधी स्थिति रखने वाला... १। मिनिट में हीं पहुँच जाता है । उनसे भी कम स्थिति रखने वाला पौन मिनिट में हीं पहुँच जाता है । मान लीजिए - एक मनुष्य से स्थिति बिलकुल ही निकल गई - ऐसा मनुष्य जिस क्षण में घर है - उसी क्षण गाल-वाश्रम में है । स्थिति निकल जाने से उसकी गति स्थिति बन जाती है । ऐसा केवल ब्रह्मतत्त्व ही हो सकता है, दूसरा नहीं । प्रतिष्ठातत्त्व का नाम हीं ब्रह्मा है । जिसकी गति में यत्किञ्चित् भी स्थिति नहीं है, अतएव जो सबसे शीघ्र चलता हुआ भी - गति में स्थिति न रहने से स्थितिस्वरूप में परिणत हो रहा है - वही तत्त्व ' ब्रह्म ', किंवा ' ब्रह्मा ' कहलाता है । इसी तत्त्व का निरूपण करते हुए वेदभगवान् कहते हैं—

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद ेवाप्नुवन्पूर्वमर्शत् ।

तद्भावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥

- ईशोपनिषत् यह ब्रह्मतत्त्व - कम्प से सर्वथा रहित है । अर्थात् एकान्ततः स्थिर है, परन्तु मन से भी शीघ्र चलने वाला है । देवगण दौड़ में इसे कभी नहीं पकड़ सकते । यह स्वयं बैठा बैठा ही दौड़ने वालों के आगे जापहुँचता है | इसी अर्थ का ओर भी स्पष्टीकरण करती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है—

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।

तदन्तरस्य सर्वस्य तदुसर्वस्य बाह्यतः ॥

- ईशोपनिषत् कहना हमें केवल यही है कि, यदि गति में से स्थिति निकाल दी जाती है, तो वह गति गति न रहकर स्थितिरूप में परिणत हो जाती है । यदि आप इसका ओर भी स्पष्टीकरण चाहते हैं, तो एक ज ता हुआ उल्मुक पलीता - मूला ] अपने हाथ में ले लीजिए, एवं उसे श्राप जितना शीघ्र घुमा सकते हैं-घुमाइए । आपके हाथ में अतिशीघ्र घूमते हुए उस उल्मुक को - सामने खड़े हुए दर्शक मण्डलकार में परिणत देखेंगे । प्रतिक्षण उस उल्मुक में गति हो रही है । परन्तु दर्शक उसे स्थिर मण्डलाकार में परिणत देख रहे हैं । इसका एकमात्र कारण यही है कि, आपके हाथ की गति में स्थिति बहुत ही कम है । यदि उस गति से आप स्थिति को एकान्तत: निकाल देंगे, तो उसी क्षण वह उल्मुक स्तब्ध हो जायगा । यह तो हुआ गतितत्त्व का निरूपण, अत्र चलिए स्थितितत्त्व की ओर । स्थिति स्थिति स्वरूप में तभीतक है, जबतक कि इसमें गति का समावेश है । यदि स्थिति में से गति निकाल दी जाती है, तो वह स्थिति उसी क्षण गतिरूप में परिणत हो जाती है । आप जितने भी स्थिर दार्थ देखते हैं, विश्वास कीजिए! वे एक समय में चारों ओर जा रहे हैं । जिस क्षण वह वस्तु पूर्व जा १६४

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शतपथब्राह्मण रही है, उसी क्षण पश्चिम जारही है । एवं उसी क्षण दक्षिणोत्तर जा रही है । उसी क्षण नीचे, ऊपर जारही है | एक क्षण में सत्र ओर के समान आकर्षण के कारण वह पदार्थ किसी नियत गति की पकड़ में न आकर सब ओर जाने लगता है । इस गतिसमष्टि का नाम हीं स्थिति है । यदि किसी एक ओर की गति का बल शिथिल हो जाता है, तो ठीक उसके विरुद्ध भाग में वह स्थित वस्तु चल पड़ती है । हम इस समय बैठे हैं । इसका अर्थ यही है कि, हम चारों ओर जा रहे हैं । भीतर से बल लगता है । पश्चिम भाग का आकर्षण शिथिल पड़ जाता है । उसी क्षण हम पूर्व की ओर चल पड़ते हैं । विरुद्धगति ही स्थिति का कारण है | उदाहरणार्थ - एक रस्से पर दृष्टि डालिए, जिसे कि समानबल वाले दो पहलवान दोनों ओर से खैंच रहे हैं 1 एक पहलवान पूर्ण बल का प्रयोग करता हुआ उसे पूर्व की ओर खैंच रहा है, एवं दूसरा उतने हीं चल से पश्चिम की ओर उसे खैंच रहा है । सचमुच रस्सा दोनों ओर जा रहा है । दोनों के गतिबल का उस रस्से पर प्रयोग हो रहा है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, थोड़ी देर के अनन्तर दोनों हीं पहलवान थक जाते हैं । यदि गन्तिचल खर्च न होता, तो वे कभी न थकते । इसप्रकार गति होते हुए भी रस्सा स्थिर प्रतीत हो रहा है । इसका कारण यही है कि रस्सा जिस क्षण में जितनी दूर पूर्व जा रहा है, उसी क्षण में उतनी हीं दूर पश्चिम जा रहा है । अतएव वह किसी ओर चलता नहीं दिखलाई देता । पूर्व की गति ने पश्चिम गति को दबा रक्खा है, पश्चिमगति ने पूर्वगति को दबा रक्खा है । इन्हीं दोनों विरुद्धगतियोंनें सर्वथा गतिमान् रस्से को स्थितिमान् बना रक्खा है । यदि दोनों गतियों में से किसी एक ओर की गति शिथिल हो जाती है, तो उसी क्षण वह स्थित रस्सा विरुद्धभाग की ओर चल पड़ता है । अतएव मानना पड़ता है कि, स्थिति में जबतक गति ( सर्वतोदिग्गति, अथवा कम से कम विरुद्धदिग्द्वयगति ) है, तभीतक स्थिति स्थिति है । जिस समय स्थिति में से गति निकल जाती है, उस समय वह स्थिति गतिस्वरूप में परिणत हो जाती है । इसी विज्ञान के आधार पर हमने ' ऐसी कोई भी स्थिति नहीं - जिसमें गति न हो, एवं ऐसी कोई गति नहीं जिसमें स्थिति न हो ' यह कहा है । तमः प्रकाशवत् ( अधेरे उजाले की भांति ) दोनों ( स्थिति और गति ) परस्पर अत्यन्त विरुद्ध | परन्तु परस्पर में अत्यन्त विरुद्ध प्रकाश और अन्धकार जैसे एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते, दूसरे शब्दों में तम ( अनुपाख्यतम ) रूप कृष्ण और प्रकाशरूप गौरवर्णा राधा जैसे अविनाभूत हैं, ठीक इसीप्रकार सर्वथा विरुद्ध स्थिति - गति का जोड़ा है । स्थितितत्त्व गतितत्त्व की प्रतिष्ठा है । एवं गतितत्त्व ( वैष्णवगतितत्व ) स्थितितत्त्व की प्रतिष्ठा है, जैसा कि अनुपद में ही बतलाने वाले हैं । सम्पूर्ण प्रपञ्च से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, पूर्वोक्त दोनों तत्त्वों में से स्थितितत्त्व का नाम हीं ‘ ब्रह्म ' है T | अक्षरपुरुष के अभिप्राय से वही ब्रह्म ' ब्रह्मा ' कहलाने लगता है । यही ब्रह्मतत्त्व, किंवा ब्रह्मा सम्पूर्ण विश्व की प्रतिष्ठा है । अतएव इसके लिए - ' ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' - यह कहा जाता है | संसार संसरणभाव के कारण संसार है, गतिशील है । गति बिना स्थितिस्वरूप आधार के सर्वथा अनुपन्न है । गतिस्वरूप विश्व का आधार यही स्थितिरूप ब्रह्मतत्व है । अतएव हम अवश्य ही इसे विश्व की प्रतिष्ठा कहने के लिए सन्नद्ध हैं | स्थिति के विषय में हम अधिक कुछ नहीं कहना चाहते । स्थितिप्रकरण को यहीं समा'त कर हम अपने पाठकों का ध्यान पुनः गतितत्व की ओर आकर्षित करते हैं । गति संसार में — पराक्, प्रत्यग्भेद से कुल दो प्रकार की होती है । एक गति उस ( जड़चेतनोभयविध ) धस्तु की ओर न रहकर वस्तु के विमुख होती है । यही ' पराग्गति ' कहलाती है । एवं एक गति वस्तु की ओर झुकी रहती है, इसीको ' प्रत्यग्गति ' कहते हैं । इस उभर्याविध गतितत्त्व का नाम हीं ' इन्द्र ' है । ' सर्वा-१६५

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प्रथमकाण्ड गतिर्याजुषी हैव शश्वत् / गतिमात्र का यजु से सम्बन्ध है - यजु के यद्भाग का नाम हीं गति है – ते ० ब्रा ० ३,१२,६,१ इति ) के अनुसार ऋग्, यजु:, साम, इन तीनों में से यजुर्भाग का नाम हीं गति है । वस्तु-तस्तु - यजु के यद्भाग का नाम हीं ' गति ' है । यह यद्भाग प्राणात्मक वायु है, इसी को इन्द्र कहते हैं, जैसाकि श्रुति कहती है— ' अयं वाव इन्द्रो योऽयं यवते ' ( इसी प्राणरूप वायु का नाम इन्द्र है, जो कि इस विशाल अन्त— रिक्ष में बह रहा है - शत ० १४ | २ | ११६ इति ) । इस गतिइन्द्र की ही पराक्, और प्रत्यक्. होजातीं हैं । पराग्गति ' परागिन्द्र ' है, एवं प्रत्यग्गति ' प्रत्यगिन्द्र ' है । पराग्गति को केवल ‘ इन्द्र ’ शब्द से ही व्यवहृत करते हैं, एवं प्रत्यग्गति वस्तु की ओर रहती है । उसके उप ( समीप ) रहती हैं । अतएव इस प्रत्यगिन्द्र को ' उपेन्द्र ' कहा जाता है । इसी का नाम ' इन्द्रावरज ' है । येही चतुर्भुज ' विष्णु ' हैं । इन की चार भुजा कौनसी है? इसका उत्तर आगे के किसी प्रकरण में दिया जायगा । साथ ही हम इतना ओर कह देना चाहते हैं कि - विज्ञान, कर्म्म, उपासना, तीनों में से प्रकृत में हम विज्ञान - मर्य्यादा के आधीन हैं । अतएव वैज्ञानिक ब्रह्मा, विष्ण, इन्द्र, का ही स्वरूप बतलाया है । उपासनाकाण्ड के पासनिक ब्रह्मादि देवताओं का स्वरूप भिन्न हैं, जिनका कि स्वरूप प्रसङ्गानुसार समय समय पर बतलाते रहेंगे । यहाँ केवल वैज्ञानिक ब्रह्मादि का ही निरूपण किया गया है । हम कह रहे थे कि गति इन्द्र और उपेन्द्र के भेद से दो प्रकार की होजाती है । उपेन्द्र को ही ' विष्णु ' कहते हैं । गति का हो नाम इन्द्र है, एवं गतितत्त्व का ही नाम विष्णु है । ग्रानेवाली गति विष्णु है, गति इन्द्र है । वस्तु के मण्डल की ( जो कि मण्डल वैज्ञानिक परिभाषानुसार ' साम ’ नाम से व्यवहृत होता है ) एक परिधि ( अन्तिम सीमा ) होती है । इस परिधि से वस्तु के केन्द्र की ओर अपना रुख रखने वाली गति ' विष्णु ' है । एवं केन्द्र से परिधि की ओर अपना रुख रखने वाली गति ‘ इन्द्र ’ है । विष्णुगति शनायासूत्र के द्वारा बाहिर से वस्तु लाकर उन्हें केन्द्र में प्रतिष्ठित करती रहती है, एवं इन्द्र-गतिं केन्द्र में आए हुए पदार्थों को अपनी विज्ञेपणशक्ति के द्वारा बाहिर फैंका करती है | आदानक्रिया के अधि-ष्ठाता विष्णु हैं, अतएव विष्णु को संसार का पालनकर्त्ता कहा जाता है । विसर्गक्रिया के अधिष्ठाता इन्द्र हैं । पुराणभात्रा में यही इन्द्र ' महादेव ' कहलाते हैं । क्यों कि आई हुई वस्तुओं को विक्षेपणशक्ति के द्वारा नष्ट करना इनका काम है । अतएव महादेवापरर्थ्यायक इन्द्र को संहारकर्त्ता बतलाया जाता है । एवं वस्तु का स्वरूप बना कर उस को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रखना प्रतिष्ठारूप ब्रह्मतत्त्व का काम है । अतएव ब्रह्मा को सृष्टिकर्त्ता कहा जाता है । यद्यपि वस्तुमात्र में तीनों शक्तियाँ काम करतीं हैं, परन्तु अवस्थाविशेष के कारण तीनों में तारम्य होता रहता है । यदि श्रादानविसर्ग समान होता, तो प्रतिष्ठा कभी न उखड़ती । परन्तु हम प्रत्येक ' पदार्थ में बाल, युवा, वृद्ध, नाशादि अवस्थाओं का प्रत्यक्ष करते हैं । अतएव तीनों में अवश्य ही तारम्य मानना पड़ता है । प्रजापति के अग्नीषोमात्मक यज्ञ से सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है । यज्ञ में प्रातः सतन, माध्यन्दिनसवन, सायंसवन ये तीन सवन होते हैं । अतएव सवनत्रयोपेत यज्ञजन्य पदार्थमात्र में तीनों सवनों की सत्ता सिद्ध होजाती है । प्रातःकाल प्रातःसवन है, मध्याह्न माध्यन्दिनसवन है, सायङ्काकल सायंसवन है । बाल्यावस्था प्रातःसवन है, युवावस्था माध्यन्दिनसवन है, वृद्धावस्था सायंसवन है । जड़चेतन उभय-विध पदार्थों में तीनों की समानरूप से स्थिति समझनी चाहिए । प्राः सवन में ( बाल्यावस्था में ) विष्णु १६६

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शतपथब्राह्मण बलवान् रहते हैं, इन्द्र निर्बल रहते हैं । इस अवस्था में शरीरगत पदार्थों के निकलने के द्वारभूत रोमकूप छोटे रहते हैं । अतएव इस अवस्था में ' व्यय ' कम होता है । एवं नूतन रुधिर के वेग की अधिकता से पाचन-शक्ति प्रबल रहती है । अत: भूख अधिक लगती है । अतएव ' आय ' अधिक होती है । इसलिए इस अवस्था में उत्तरोत्तर शरीर की वृद्धि होती रहती है । इसके अनन्तर माध्यन्दिनसवन ( युवावस्था ) आता है । इस में इन्द्र विष्णु का समान बल रहता है! जितनी श्राय है, उतना ही व्यय है । इन्द्र जितनी वस्तु चाहिर फैंकते हैं, विष्णु परिधि की ओर से वस्तु लाकर उस कमी को पूरी कर देते हैं । इसप्रकार इन्द्र और विष्णु, दोनों में परस्पर घोर स्पर्द्धा चलती रहती है । इस अवस्था में न इन्द्र विष्णु से पराजित हैं, एवं न विष्णु इन्द्र से पराजित हैं । इसी माध्यन्दिन - सवन - सम्बन्धी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे न परा जिज्ञे कतरश्च नैनोः । इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्र ं वि तदैरयेथाम् ॥ —ऋक्संहिता ६।६६।८ ] हे इन्द्र! हे विष्णो! आप दोनों सदा जीतते ही हो । आप दोनों किसी भी असुर से परास्त नहीं होते । ( इतना ही नहीं ) जब इन दोनों में स्पर्द्धा चलती है, तो तत्समय दोनों में से एक भी नहीं हारता । इस स्पर्द्धा से ही आपने लोक, वेद, वाक्, इन तीन साहस्त्रियों को प्रेरित किया है । स्पर्द्धा समान बलपर ही निर्भर है, यह समानता माध्यन्दिनसवन में ही रहती है । वाक्, वेद, लोक, इन तीनों साहस्रियों का स्वरूप आगे आने वाले वषट्कारस्वरूप - निरूपण में में बतलाया जायगा | माध्यन्दिनसवन के अनन्तर है - सायंसवन । सायंसवन में ( वृद्धावस्था में ) रोम-क्रूपों के बड़े होजाने से इन्द्र बलवान् होजाता है, विष्णु निर्बल होजाते हैं । व्यय अधिक होता है, य कम होती है । भूख कम लगती है | शरीरप्राण अधिकमात्रा से खर्च होता है । अन्ततोगत्त्वा जत्र विष्णु सर्वथा निकल जाते हैं, तो विष्णुगति के आधार पर प्रतिष्ठित हृदयस्थ प्रजापतिब्रह्म ( प्रतिष्ठा ) उच्छिन्न होजाता है । इसीका नाम ‘ ' मृत्यु ' है । जबतक विष्णु है, तभीतक पालन है । ब्रह्मप्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित रखने वाली यही विष्णुगत है, अतएव विष्णु को ' प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा ' कहाजाता है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, ( पुराणभावानुसार महादेव ) तीनों की साम्यावस्था में जीवन है, विश्रमावस्था में वृद्धि, एवं विनाश है । प्रातःसवन वर्द्धिष्णु है, सायसवन क्षयिष्णु है । आप जितनी भी मूर्तियाँ ( जडचेतनोभयविध ) देख रहे हैं, सबमें यह स्थिति और उभयात्मिका गति विद्यमान है । जितना अंश ठहराव का है, वही ब्रह्मा है । श्रादानशक्ति विष्णु है, विसर्गशक्ति इन्द्र है | वस्तुतः गति भी स्थिति ही है । गति में से स्थिति निकाल दी जाती है, तो गति ही स्थिति बन जाती है, जैसाकि पूर्व में बतला दिया गया है । कहने को गति- स्थिति, दो तत्त्व हैं, वस्तुतः एक ही तत्व की गतिभेद से तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं | सर्वतोदिग्गति ब्रह्मा है, परागुगति इन्द्र है, प्रत्यग्गति विष्णु है | तीनों शक्तियाँ सर्वथा अविनाभूत हैं । जिसे आप मूर्ति ( वस्तुपिण्ड ) कहते हैं, वह मूर्ति इन तीनों देवताओं की समष्टिमात्र है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्राप्तपुरुष कहते हैं— ‘ एका मूर्त्तिस्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ' ( ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तीनों देवताओं की समष्टि एक मूर्ति है । ) इन तीनों में आधारभूत ब्रह्मा हीं इन्द्र से युक्त होकर अग्नि कहलाने लगते हैं, १६७