Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 431–440
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 431–440
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प्रथमकाण्ड अतएव ‘ अग्निर्वै प्रजापतिः ' ( मैत्रा ० २।४।६ ) यह कहा जाता है । एवं वही ब्रह्मा विष्णु से युक्त होकर सोम-स्वरूप में परिणत होजाते हैं, अतएव सोमपिण्डभृत चन्द्रमा के लिए ' चन्द्रमा वै ब्रह्मा ' ( १२ | १ | १ | २ ) यह कहा जाता है | शुद्ध सर्वदिग्गति ब्रह्मा है, शुद्ध प्रगति विष्णु है, शुद्धगति इन्द्र है । ब्रह्मयुक्ता आगति सोम है, ब्रह्मयुक्ता गति अग्नि है । अग्नि का इन्द्र के साथ सन्बन्ध है । इन्द्र क्योंकि केन्द्र से बाहिर की ओर अपना रुख रखते हैं, अतएव अग्नि भी प्रधिकी ओर उत्तरोत्तर विकसित रहता है । एवं सोम का विष्णु के साथ सम्बन्ध है । विष्णु परिधि से केन्द्रकी ओर अपना रुख रखते हैं, अतएव सोम भी परिधि से केन्द्र की ओर उत्तरोत्तर संकुचित होता जाता है । अतएव व्रतोपायनकर्म में हमने अग्नि को विकासधर्म्मा बतलाया है, और सोम को संकोचधर्म्मा बतलाया है । इस प्रकरण से यह भलीभांति सिद्ध होजाता है कि, एक ही स्थितितत्त्व के ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, ये पाँच विवर्त्त हैं । ब्रह्मा प्रतिष्ठा है । इन्द्र - विष्णु गति है, यह एक युग्म है, इस युग्म की प्रतिष्ठा ब्रह्मा है । अग्नि - सोम दूसरा युग्म है, इसकी प्रतिष्ठा इन्द्र - विष्णु है । ब्रह्मा - विष्णु-इन्द्र - तीनों ‘ हृद्य ' हैं । अर्थात् हृदय में रहने वाले हैं, अग्नि - सोम वस्तु का स्वरूप बने हुए हैं । तीनों देवता हृदय में प्रतिष्ठित रहते हैं, अतएव उनका प्रत्यक्ष नहीं होता । प्रत्यक्ष अग्नि सोम का ही होता है । श्रतएव जगत् के लिए- ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' यही कह दिया जाता है । ब्रह्मप्रजापति अपने ऊपर प्रतिष्ठित अग्नीषोम से सम्पूर्ण संसार बनाया करते हैं । विष्णु का आश्रय लेकर अपने श्रग्निमुख में सोमाहुति डालकर उसके द्वारा ब्रह्मा संसार का निर्माण किया करते है, एवं इन्द्र की ओर झुककर इस यज्ञक्रम को बन्द कर संसार का विनाश किया करते । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, के पूर्वोक्त स्वरूप को बतलाने के लिए ही वैज्ञानिक मह— र्षियोंनें इन तीनों शक्तियों की समष्टि का नाम ' हृदय ' रक्खा है । हृदय शब्द ही तीनों का स्वरूप बतला रहा है । हृदय में ' हृ, द, य, ' ये तीन अक्षर हैं । तीनों का हरति- ( आह-रति ), द्यति ( खडण्यति ) यच्छति ( नियमयति, इस व्युत्पत्ति के अनुसार लेना, नष्ट करना, संयमन करना, यह अर्थ होता है । आाहरण करना विष्णु का काम है । अतएव उसके लिए ' ह ' अक्षर का प्रयोग किया गया है । विनाश करना, दूसरे शब्दों में वस्तुगत पदार्थों को अन्य वस्तु की पुष्टि के लिए देना इन्द्र का काम है, अतएव उसके लिए ' द ' अक्षर का प्रयोग किया है । एवं दोनों का जिस शक्ति के आधार पर संयमनं होता है, वे ही ब्रह्मा कहलाते हैं । नियमन करने के कारण इनके लिए ' यम् ' अक्षर का प्रयोग किया गया है । ‘ स्वरोऽक्षरम् । सहाद्यैर्व्यञ्जनैः ' ( स्वर को अक्षर कहते हैं, यदि उसके साथ ओर व्यञ्जन रहते हैं, तो उसी एक अक्षर से सम्पूर्ण व्यञ्जनों का भी ग्रहण होजाता है ) कात्यायन के इस कथन के अनुसार ' यम् ' को अवश्य ही एक अक्षर कहा जासकता है । वस्तु की केन्द्रबिन्दु का नाम हृदय है । उस केन्द्रबिन्दु में हृ, द, य, रहते हैं, इसीलिए उस बिन्दु का नाम हृदय है । अक्षर का नाम प्रजापति है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, तीनों की समष्टि प्रजापति है | तीन तत्वों को, दूसरे शब्दों में तीन अक्षरों को ( ब्रह्मा विष्णु इन्द्र को ) एक प्रनापति माना जाता है । प्रजापति त्र्यक्षर है, इसी रहस्य को ध्यान में रखकर अक्षर में ' अ, क्ष, र, ' ये तीन ही अक्षर रक्खे गए हैं । अक्षरशब्द बतलाता है कि, मुझ में अ, क्ष, र, ये तीन समझो । तीनों की समष्टि एक ' अक्षर ' प्रजापति है 1 । इसी अक्षर का नाम अव्यक्त प्रजापति है । जिसप्रकार दहकते हुए अग्नि से धीरे धीरे हजारों अग्नि-विस्फुलिङ्ग ( अग्निकण ) उत्पन्न होते रहते हैं, और क्षणमात्र ठहर कर उसी में विलीन होते रहते हैं, ठीक १६८
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शतपथब्राह्मण इसीप्रकार इस त्र्यक्षरात्मक अक्षरप्रजापति से क्षरविश्व उत्पन्न होता है, उत्पन्न होकर उसीपर प्रतिष्ठित रहता है, एवं अन्त में उसी में विलीन होजाता है । इसी अभिप्राय से उपनिषत् श्रुति कहती है—
यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाऽक्षराद्विविधाः सौम्य! भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥
—उपानषत् विषय आवश्यकता से अधिक विस्तृत होगया है, अत: विस्तारकम को अत्रैव उपरत कर पुनः प्रकृता-नुगम किया जा रहा है । संसार का स्वरूप अग्नीषोमात्मक यज्ञ पर निर्भर है । अग्नीषोमात्मक यज्ञ का नाम ही संसार । स्थितिरूप ब्रह्मा की अवस्थाविशेत्र का नाम ही अग्नीषोम है, अतएव जन्त्रतक ब्रह्मतत्त्व प्रादुर्भूत नहीं होता, तत्रतक किसी भी वस्तु का स्वरूप नहीं बनता । वस्तु की उत्पत्ति में सबसे पहिले ब्रह्मसत्ता का प्रकट होना आवश्यक है । इसीलिए इस ब्रह्मतत्त्व को प्रथमज ( सत्र से पहिले उत्पन्न होने वाला ) बतलाया जाता है- ( मुण्डकोपनिषत् - १११ ) । हमने बतला दिया है कि, ब्रह्मा की अवस्थाविशेष का नाम ' अग्नि ' है । आधिदैविक मण्डल में यह ब्रह्माग्नि दक्षिणभाग में प्रतिष्ठित रहता है, एवं सोम उत्तरभाग में प्रतिष्ठित रहता है । सोम उत्तर से दक्षिण में आया करता है, एवं अग्नि दक्षिण से उत्तरभाग की ओर जाया करता है । दक्षिण से उत्तर में जाने वाले अग्नि में उत्तर से आने वाला सोम निरन्तर आहुत होता रहता है । इसी अग्नीषोमात्मक यज्ञ से विश्व का स्वरूप सम्पन्न हुआ है । अग्नि साक्षात् ब्रह्म है, इसकी प्रतिष्ठा दक्षिणादिक् है । अग्नि की मात्रा बल बढ़ाती परन्तु साथ ही में अपने ताप से कृष्णवर्ण उत्पन्न कर देती है, अतएव दक्षिण की सम्पूर्ण सृष्टि उत्तर की सृष्टि की अपेक्षा चलवान्, किन्तु कृष्णवर्णा होती है । आप ज्यों ज्यों दक्षिण भारत की ओर बढ़ते जायँगे, त्यों त्यों आपको वहाँ के मनुष्य अधिकाधिक काले मिलेंगे | अपिच इसी अग्नि के प्रभाव से दक्षिण के विन्ध्याद्रि आदि पर्वत ठोस, एवं लौहाकृति के होते हैं । क्योंकि अग्नि के द्वारा इनके भीतर का श्राप्यप्राण अग्नि से खैंच लिया जाता है । परन्तु उत्तर में ठीक इसके विपरीत है । उत्तर में सोम का राज्य है, अतएव वहाँ की सम्पूर्ण सृष्टि गौरवर्णा, एव साथ ही दक्षिण की अपेक्षा निर्बल होती है । अपिच इसीलिए उत्तरभाग के हिमालयादि पर्वत भी उतने ठोस नहीं होते, क्योंकि पानी के कारण उनका उदर विशाल रहता है । अग्नि दक्षिण में हीं प्रतिष्ठित रहता है, एवं दक्षिण में प्रतिष्ठित होकर उत्तरभाग में आया करता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, एक साथ जोए हुए खेत के धान में पहिले दक्षिणभाग के धान का ही परिपाक होता है * । श्राप्यप्राण को ही असुर कहते हैं, दक्षिणस्थ अग्निब्रह्मा आप्यप्राण के घोर शत्रु हैं । यदि दक्षिण में अग्निमय ब्रह्मा प्रतिष्ठित न होते. तो अग्नीमात्मक यज्ञ ही नष्ट होजाता । अतएव दक्षिणस्थ ब्रह्मा को अवश्य ही ' यज्ञगोप्ता ' कहा जासकता है । अग्निवेद का नाम हीं त्रयीवेद है । इसी वेदमय ब्रह्मा से यज्ञ की रक्षा होरही है । इस पूर्वोक्त आधिदैविक यज्ञ की प्रतिकृति पर ही इस वैधयज्ञ का वितान किया जाता है | अतएव इस वैधयज्ञ में भी त्रयीवेद के अधिष्ठाता सान्तपनाग्निमय ब्राह्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए सबसे पहिले यज्ञमण्डल के दक्षिणभाग में प्रतिष्ठित करना आवश्यक होजाता है । प्राकृतिक ब्रह्मा की दृष्टि उत्तर की ओर रहती है | अतएव इस वैधब्रह्मा को भी दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख होकर ही बैठना पड़ता है । * देखिए - ऐतरेय ब्राह्मण २ ० १ खण्ड । १६६.
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प्रथमकाण्ड ‘ योः यच्छ्रद्धः स एव सः ’ इस विज्ञान को ग्रागे रख कर श्रद्धा को प्रधान बना कर भावना के द्वारा यथोक्त विधि के अनुसार यदि इस त्रयीवेद के विद्वान् का ' ब्रह्मत्वेन ' वरण किया जाता है, तो उस श्रद्धासूत्र के द्वारा होने वाले बन्धन के प्रभाव से इस मनुष्यब्रह्मा में उसीप्रकार नित्यब्रह्मा के धर्म संक्रान्त होजाते हैं, जैसे कि न्यायासन पर बैठते ही न्यायाधीश में अपने आप शासनबल प्रादुर्भूत हो जाता है । इसी शक्ति को ' अधिकारबल ' कहते हैं । पूर्व में हमने परमेष्ठी में प्रतिष्ठित बृहस्पति को ब्रह्मा बतलाया था, यहाँ.-अग्नि को ब्रह्मा चतलाया है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए | क्योंकि बृहस्पति अङ्गिरा है । एवं ऋत अङ्गिरा की सत्यावस्था का नाम हीं अग्नि है । सम्पूर्ण प्रपञ्च वा निष्कर्ष यही हुआ कि, प्रकृतियज्ञ में सबसे पहिले ब्रह्मप्रतिष्ठा प्रतिष्ठित रहती है, उसका स्थान यज्ञवेदिस्वरूप विश्व है । यह वैधयज्ञ उसी नित्य यज्ञ की प्रतिकृति है । अतएव यहाँ भी सबसे पहिले ब्रह्मा का वरण कर उसे यज्ञवेदि से दक्षिणभाग में प्रतिष्ठित किया जाता है । ब्रह्मवरण क्यों किया जाता है?, इस प्रश्न की यही उपपत्ति है । २ ३- पांप्रणयनम् ( मूल ) – स वै प्रातर एव प्रथमेन कर्मणाभिपद्यते । अपः प्रणयति 1 । यज्ञो आपः - यज्ञमेवैतत् प्रथमेन कर्मणाभिपद्यते । ताः प्रणयति - यज्ञमेवैतद् वितनोति ॥ स प्रण-यति – ‘ ‘ कस्त्वा युनक्ति, स त्वा युनक्ति, कस्मै त्वा युनक्ति, तस्मै त्वा युनक्ति ” ( १ अॅ ० ६ मं ० ) इति – एताभिरनिरुक्ताभिर्व्याहृतिभिः । अनिरुक्तो वै प्रजापतिः, प्रजापतिर्यज्ञः-तत्प्रजापतिमेवैतद् यज्ञं युनक्ति । यद्वे वापः प्रणयति - श्रद्भिर्वा इदं सर्वमाप्तम् । तत्प्रथमे -नैवैतत्कर्म्मणा सर्वमाप्नोति । यद्ववास्यात्र होता वा अध्वर्युर्वा ब्रह्मा वा अग्नीध्रो वा स्वयं वा यजमानो नाभ्यापयति - तदेवास्यैतेन सर्वमाप्तं भवति । यद्ववापः प्रणयति - देवान् ह वै यज्ञेन यजमानांस्तानसुररक्षसानि ररक्षुः - ' न यच्यध्व ' इति । तद् यदरक्षन्, तस्माद्रक्षांसि ॥ ततो देवा एतं वज्र ं ददृशुः - यदपः । वज्रो वा आपः । वज्रो हि वा आपस्तस्माद् येनैता -यन्ति - निम्नं कुर्वन्ति, यत्रोपतिष्ठन्ते - निर्दहन्ति । तत एतं वज्रमुदयच्छन् । तस्याभयेऽनाष्ट्र निवाते यज्ञमतन्वत । तथो एवैष एतं वज्रमुद्यच्छति । तस्याभयेऽनाष्ट्र निवाते यज्ञ ं तनुते । तस्मादपः प्रणयति ॥ ता उत्सिच्योत्तरेण गार्हपत्य ं सादयति । योषा वा आपः, वृषाग्निः । गृहा वैं गार्हपत्यः । तद् गृहेष्वेवैतन्मिथुनं प्रजननं क्रियते । वज्र ं वा एष उद्यच्छति योऽपः प्रणयति 1 । यो वा अप्रतिष्ठितो वज्रमुद्यच्छति नैनं शक्नोत्य ुद्यन्तुम्, सं हैनं शृणाति ॥ स १७०
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शतपथब्राह्मण यद् गार्हपत्ये सादयति । गृहा वै गार्हपत्यः, गृहा वै प्रतिष्ठा, तद् गृहेष्वेवैतत् प्रतिष्ठार्यां प्रतितिष्ठति । तथो हैंनमेष वज्रो न हिनस्ति । तस्माद् गार्हपत्ये सादयति ॥ ता उत्तरेणा-हवनीय ं प्रणयति । योषा वा आपः, वृषाग्निः - मिथुनमेवैत्प्रजननं क्रियते । एवमित्र हि ` मिथुनं क्लृप्तम् - उत्तरंतो हि स्त्री पुमांसमुपशेते । नान्तरेण संचरेयुः । नेन्मिथुनं चर्यमारण-मन्तरेण संचरानिति । ता नातिहृत्य सादयेत्, नो अनाप्ताः सादयेत् । स यदतिहृत्य सादयेत् – अस्ति वा अग्नेचापां च विभ्रातृव्यमिव । स यथेव ह तदग्नेर्भवति यत्रास्याप उपस्पृ-शन्ति, अग्नौ हाधि भ्रातृव्यं वद्ध येत् - यदतिहृत्य सादयेत् । यद्यु अनाप्ताः सादयेत् -नो हाऽऽभिस्तं काममभ्यापयेद् - यस्मै कामाय प्रणीयन्ते । तस्मादु संप्रत्येवोत्तरेणाहवनीयं प्रणयति ॥ १२ से २१ पर्य्यन्त ॥ ( अनुवाद ) – ( ब्रह्मवरणकर्म के अनन्तर ) वह अध्वर्यु ( इष्टि के दिन ) प्रातःकाल पहिले कर्म्म से पानी की ओर हो जाता है, अर्थात् सत्र से पहिले ' अपांयन ' हीं करता है । यज्ञ आप: ( पानी ) स्वरूप है । ( ऐसी अवस्था में सब से पहिले पानी की ओर प्रवृत्त होता हुआ अध्वर्यु ) प्रथम कर्म से यज्ञ की ओर ही प्रवृत्त होता है । जो कि अध्वर्यु उन पानियों का प्रणयन करता है - वह यज्ञ को ही फैलाता है । तात्पर्य्य यह है कि, सत्र से पहिले अपांप्रणयन करना अश्रूरूप यज्ञ को ही अपने अधिकार में करना है || १२ || प्रणयन क्यों करना चाहिए?, इसकी एक उपपत्ति बतला दी गई । श्रव पद्धति बतलाते हैं - वह अध्वर्यु - " कस्त्वा युनक्ति, स त्वायुनक्ति, कम्मै त्वा युनक्ति, तस्मै त्वा युनक्ति, ” ( १ ० ६ मं ० ) इन अनिरुक्त व्या-हृतियों ( मन्त्रों ) से अपप्रणयन करता है । प्रजापति अनिरुक्त है । एवं प्रजापति ही यज्ञ है । ( ऐसी अवस्था में अनिरुक्त व्याहृतियों से अपांप्रणयन करता हुआ अध्वर्यु ) प्रजापतिरूप यज्ञ को ही ( अपने यज्ञ के साथ ) युक्त करता है || १३ || ( अपप्रणयन क्यों करना चाहिए?, इसकी एक उपपत्ति बतला दी गई । अब क्रमशः तीन उपपत्तियाँ और बतलाते हैं ) जिस लिए कि पप्रणयन करता है, · सका ( दूसरा ) कारण बतलाते हैं । पानी से सम्पूर्ण संसार ओत प्रोत होरहा । सम्पूर्ण विश्व में पानी अभिव्याप्त होरहा है । ( इसप्रकार सर्वरूप पानी का प्रणयन करता हुआ अध्वर्यु ) इस पहिले ही कर्म्म से सबकुछ प्राप्त कर लेता है, अर्थात् पानी की भाँति सम्पूर्ण विश्व पर यजमान की आत्मसत्ता प्रतिष्ठित होजाती है || १४ || अपिच जिसलिए कि अपांप्रणयन करते हैं ( उसकी तीसरी उपपत्ति और बतलाते हैं ) -होता, अध्वर्यु, ब्रह्मा, अग्नीध्र, अथवा स्वयं यजमान, मनुष्यसुलभ अज्ञातदोष से इस १७१
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प्रथमकाण्ड यज्ञकर्म्म के जिस भाग को प्राप्त नहीं करते हैं, अर्थात् अज्ञातदोष से यज्ञकर्ताओं से जो यज्ञांश छूट जाता है, वही भाग इस कर्म से पुनः प्राप्त होजाता है । भूल से रहा हुआ! कर्म्म अपांप्रणयन से गृहीत होजाता है || १५ || अपिच जिसलिए अध्वर्यु अपांप्रणयन करता है ( उसका चौथा कारण बतलाते हैं ) - यज्ञ से देवताओं का ( प्राणदेवताओं का ) यजन करते हुए देवताओं को असुर और राक्षसोंनें “ तुम यज्ञ नहीं कर सकते । तुम अपना यज्ञ बन्द करो " यह कह कर यज्ञ करने से रोक दिया । उन दुष्ट असुरोंनें यज्ञ करने से देवताओं को रोक दिया, अतएव तत्र से उनका नाम " राक्षस " पड़ गया || १६ || ( असुर - राक्षसों के द्वारा यज्ञकर्म्म को रुका देखकर ) देवताओंनें ( उनके विनाश के लिए ) इस वज्र को देखा, जोकि पानी है | पानी वज्र है । ( केवल शब्द प्रमाण पर ही पानी की वज्रता निर्भर नहीं है । अपितु पानी की बज्रता सर्वसाधारण के लिए प्रत्यक्ष है, इस भाव को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है- ) पानी वास्तव में बज्र है - अंतएव जिस मार्ग से पानी बह कर जाते हैं, उस मार्ग में ( यह बहते हुए पानी ) गड्ढे कर देते हैं, जहाँ कुछ समय के लिए ठहर जाते हैं, वहाँ की ओषधि वनस्पति आदि को जला डालते हैं । शत्रु की सेना के मर्म्मस्थानों को फाड़ते हुए अपनी आला से सम्पूर्ण सेना को भस्म कर डालना, वज्र का यही काम है । दोनों धर्म्म पानी में प्रतिष्ठित हैं । अतएव पानी को अवश्य ही वज्र कहा जासकता है । देवताओं ( असुरों के लिए ) इसी वज्र को उठाया । ( वज्र उठाते ही सम्पूर्ण शत्रु भाग खड़े हुए ) । इसप्रकार वज्र के प्रभाव से, निर्भय, निरुपद्रव, शान्त बाता-वरण में देवताओंनें यज्ञ का वितान कर लिया । अर्थात् देवताओंनें सबसे पहिले अपां-प्रणयन करके उसके प्रभाव से यज्ञ को बिना किसी विघ्न - बाधा के पूरा कर लिया । ( क्योंकि देवताओंनें अपने यज्ञ में सबसे पहिले इस वज्र को उठाया था, अतएव " यह दवा अकु ंर्वस्तत् करवाणि ” ( इस मर्य्यादा की रक्षा के लिए आज अपने वैध - यज्ञ में ) यह यजमान भी उसीप्रकार रूप वज्र उठाता है । इस वज्र के ( प्रभाव ) से सर्वथा अभय, एवं निरुपद्रब – शान्त वाताबरण में यज्ञवितान करता है । इन्हीं पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए वह प्रणयन करता है ॥ १७ ॥
अपांप्रणयन क्यों करना चाहिए?, किस मन्त्र से करना चाहिए?, इत्यादि विषयों की उपपत्ति बतलादी गई । अब किस प्रकार से प्रणयन करना चाहिए?, किस स्थान पर प्रणयन करना चाहिए एवं उस प्रणीतापात्र को किस स्थान पर रखना चाहिए?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान करने के लिए " पांसादन " कर्म का प्रारम्भ करते हैं— वह अध्वर्यु ' ( दाहिने हाथ में रक्खे हुए चौकोर चमस ( काष्ठमय पात्रविशेष ) में बाँएँ हाथ में रक्खे हुए उदपात्रस्थ ) पानी को डालकर उस चमस को गार्हपत्याग्निकुण्ड के उत्तरभाग १७२
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शतपथब्राह्मण में रख देता है | पानी योषा है, अग्नि वृषा है । गार्हपत्य घर है । ( श्रतएव आहवनीय के समीप जाने से पहिले योषा ( स्त्री ) रूप पानी को गार्हपत्यरूप गृहप्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित करता हुआ अध्वर्यु ) घर में ही योषा वृषा के मिथुन से प्रजननक्रिया करता है । ( मिथुनसम्पत्ति के लिए पहिले इस पानी को गार्हपत्य के उत्तरभाग में रखना आवश्यक है, यही तात्पर्य है ) । श्रपिच वह वज्र उठाता है, जोकि अपांप्रणयन करता है । जो मनुष्य प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित न होकर बिना पैर जमाए ही शस्त्र उठाता है, वह मनुष्य इस वज्र को उठाने, एवं प्रहार करने में, दोनों क्रियाओं में ही असमर्थ रहता है । ( यही नहीं, अपितु जो बिना पैर जमाए शस्त्र उठाता है ) यह शस्त्र शत्रु की ओर न जाकर इसी पर चोट कर बैठता है || १८ || यहाँ पर अध्वर्यु जोकि इस वज्र को उठाने से पहिले गार्हपत्य में प्रतिष्ठित कर देता है - ( इस का कारण यही है कि ) गार्हपत्य घर है । घर ही प्रतिष्ठा है । इसी प्रतिष्ठा में उसे प्रतिष्ठित कर देता है । ( इस प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित हो जाने से ) यह वज्र इस प्रयोक्ता को कोई हानि नहीं पहुँचाता । बस ( इसी प्रतिष्ठाभाव के लिए -पहिले ) उस पानी को गार्हपत्य के उत्तरभाग में रक्खा है || १६ || अनन्तर उन पानियों को ( जोकि चमस में रक्खे हुए हैं ) वह अध्वर्यु - आहवनीय के उत्तरभाग में लेजाकर प्रतिष्ठित करता है । पानी योषा ( स्त्री ) है, एवं श्राहवनीयाग्नि वृषा ( पुरुष ) है । ( ऐसी अवस्था में आहवनीयाग्निरूप वृषा की ओर योषारूप पानी को लेजाता हुआ ) अध्वर्यु दोनों के मिथुनभाव से ( यज्ञात्मा का ) प्रजनन ही करता है । क्योंकि मिथुन इसी नियम के अनुसार सम्पन्न होता है । स्त्री पुरुष के उत्तरभाग में ही सोती है । योषारूप पानी स्त्री है, वृषारूप अग्नि पुरुष है । प्राकृतिक मिथुन-भाव स्त्री के उत्तरशयन पर अवलम्बित है । अतएव यहाँ भी स्त्रीरूप पानी को पुरुषरूप आहवनीय के उत्तरमाग में ही प्रतिष्ठित करना आवश्यक है, यही तात्पर्य्य है ॥ २० ॥
अपांप्ररणयन हो चुका । अब एक विशेष नियम बतला कर इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । ( अध्वर्यु के द्वारा जब पानी आहवनीय के उत्तरभाग में रख दिया जाता है, तो - इसके अनन्तरं ) उन दोनों के ( आह ० और पानी के ) बीच में होकर किसी को नहीं जाना चाहिए । ( कारण इसका यही है कि, इस समय इन दानों योषा वृषाओं में मिथुन होरहा है ) मिथुनभाव करते हुए उन दोनों के बीच में हम न चले जाँय, अर्थात् बीच में जाकर दोनों की विद्युत् के विच्छेदक बनते हुए हम उस यज्ञपुरुष को उत्पन्न करने वाली प्रजननक्रिया के बाधक न बन जाँय, इसलिए दोनों के बीच में से किसी को नहीं निकलना चाहिए । पानी को आहवनीय के उत्तर किस नियत स्थान में रखना चाहिए?, इसका निर्णय करते हैं । अध्वर्यु को चाहिए कि, वह उन पानियों को न श्राहवनीय के बिलकुल भिड़ाकर रक्खे, और न सर्वथा दूर रक्खे | यदि बिलकुल समीप रख देगा, तो ( उस अध्वर्यु को स्मरण रखना चाहिए कि ) अग्नि और पानी, दोनों में शत्रुता का सा व्यवहार १७३
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प्रथम काण्ड है । ऐसी अवस्था में उस पानी को आहवनीय के सर्वथा समीप रखता हुआ अध्वर्यु पानी के साथ जिस प्रकार से अग्नि का शत्रुत्त्व बढ़ता है ( वैसा ही करता है ) । अर्थात् आहवनीय के सर्वथा समीप पानी रखना दोनों में शत्रुता का भाव उत्पन्न करना है । ( न केवल दोनों के शत्रुत्त्व पर ही बात समाप्त हो जाती है, अपितु ऐसा करने से एक दोष और भी होता है । उसी दोष का उद्घाटन करते हुए कहते हैं । यदि अध्वर्यु समीप भिड़ाकर रक्खेगा, तो जिस यज्ञकर्म में ऋत्विग् यजमानादि प्रणीतापात्रसम्बन्धी पानियों का उपस्पर्श ( आचमन ) करते हैं, वहाँ का वह उपस्पर्श उस शत्रुत्त्व को और भी अधिक उत्तेजित करेगा । ( इस पानी से उपर्शादि भी करने पड़ते हैं । इस पानी को आहवनीय के समीप रख दिया जाता है, तो इसमें शत्रुभाव प्रविष्ट हो पड़ता है । ऐसी अवस्था में ऋत्विक् गण जब जब इस पानी से काम लेंगे, तब तब ही प्राणाग्नि के द्वारा वैधाग्नि का शत्रुत्त्व उत्तेजित होगा । ऐसा न हो, हमारे यज्ञ में द्वेषभाव प्रविष्ट न होपड़े, ( अतएव सर्वथा समीप रखना सर्वथा अनुचित है ) यदि सर्वथा दूर रक्खेगा, तो ( जिस मिथुनभात्र .1 के लिए प्रणयन किया जाता है ) वह कदापि न होगा । ( अधिक अन्तर होने से दोनों के प्राणों का सम्बन्ध हीन होगा ) अतएव आहवनीय के उत्तर सम्प्रति ( न सर्वथा समीप, न सर्वथा दूर ) ही प्रणयन करते हैं ॥ २१ ॥
( भाष्य ) – इस विषय की उपपत्ति बतलावें, इसके पहिले संक्षिप्तरूप से पद्धति पर हम अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं, जिससे कि उपपत्तिक्रम का भलीभांति समन्वय हो जाय । हमने बतलाया क्रि, अपांप्रणयनकर्म्म के लिए अध्वर्यु के लिए एक आसन गार्हपत्य से उत्तर चिल्लाया जाता है, एवं एक आसन आहवनीय से उत्तर विछाया जाता है । ब्रह्मवरणकर्म के अनन्तर यजमान और ब्रह्मा जब अपने अपने आसन पर बैठ जाते हैं, तो तदनन्तर गार्हपत्य के उत्तरभाग में पहिले से ही नियत आसन पर अध्वर्यु बैठ जाता है । वहाँ बैठ कर चौकोर चमसको अपने बाँए हाथ में ले लेता है । और दाहिने हाथ में उदपात्र ( पानी का पात्र ) ले लेता है । उस दक्षिण हाथ में रक्खे हुए उदपात्र में से वाम हाथ में रक्खे हुए चमस-पात्र में पानी डालता है, पानी डालकर उसी हाथ से उस चमसपात्र ( जिसे कि यज्ञपरिभाषा के अनुसार प्रणीतापात्र कहते हैं ) गार्हपत्य के उत्तरभाग रख देता है, अनन्तर ' भूतस्त्वा भूत करिष्यामि ' ( का ० श्र ० सू ० २२१ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उस पात्र का स्पर्श करता है । इसी अभिप्राय से कात्यायन कहते हैं— ' गाहेपत्यमुत्तरेणोदपात्रं निधायालभते भूतस्त्वा भूत करिष्यामि ' ( २१४६ ) इति । इसी पानी से अव अध्वर्यु ' अपांप्रणयन करने वाला है । काम करना प्राणव्यापार है । चिना मन की इच्छा के प्राण-व्यापार सर्वथा अनुपपन्न है । इस वैधयज्ञ में काम करने के कारण अध्वर्यु प्राणस्थानीय है, ब्रह्मा मनःस्थानीय है । मनकी इच्छा से ( प्रेरणा से ) प्राणव्यापार होता है । अतएव प्राणरूप अध्यय्र्यु जो भी काम करता है, पहिले मनोरूप ब्रह्मा से आज्ञा माँगता है । ब्रह्मा की स्वीकृति के अनन्तर अध्वर्यु ' कर्म में प्रवृत्त होता है । १७४
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शतपथब्राह्मण अतः चमस रखने के अनन्तर पांप्रणयनकर्म के लिए आज्ञा माँगता हुआ अध्वर्यु ' ब्रह्मा की ओर अपनी दृष्टि करके ‘ ब्रह्मन्नपः प्रणेष्यामि ' ( हे ब्रह्मन्! मैं अपांप्रणयन करूँगा, उसके लिए आज्ञा दीजिए ) यह बोलता है । एवं साथ ही यजमान की ओर मुख करके यजमान के प्रति ' यजमान वाचं यच्छ ' ( हे यजमान! अत्र तुम मौनव्रत धारण करो ) यह प्र ( आज्ञा ) करता है । इसी अभिप्राय से कात्यायन कहते हैं—-' ब्रह्मन्नपः प्रणेष्यामि यजमान वाचं यच्छेत्याह ' ( २ | ४ | ७ ) इति । उधर ‘ ब्रह्मन्नप ० ' इत्यादि सुन कर अध्वर्यु को अपांप्रणयन की आज्ञा देते हुए ब्रह्मा— 1 ‘ प्रणय यज्ञं देवता त्रर्धय त्वं, नाकस्य पृठे यजमानोऽस्तु । सप्त ऋषीणां सुकृतां यत्र लोकस्त-त्रेमं यजमानं च घेहि । प्रणय ' यह मन्त्र बोलते हैं । मन्त्रगत ' प्रणय ' शब्द को उच्चस्वर से बोलना चाहिए, जिससे कि अध्वर्यु ' भलीप्रकार से इस आज्ञा को सुनले । इतना काम तो गार्हपत्य के उत्तरभाग में ही होता है । इसके अनन्तर अध्वर्यु ' प्रणीतापात्र लेकर श्राहवनीय के उत्तरभाग में जाता है । वहाँ जाकर ' कस्त्वा युनक्ति, सत्वा युनक्ति ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ न आहवनीय से सर्वथा दूर, और न सर्वथा समीप, किन्तु ठीक स्थान पर उस प्रणीतापात्र को रख देता है, जैसाकि कात्यायन कहते हैं— ' अनुज्ञात उत्तरेणाहवनीयं संप्रति निदधाति कस्त्वेति ' [ का ० ० ० २ । ४८ ] इति । अपांप्रणन का अर्थ है -- गार्हपत्याग्निकुण्ड के उत्तरभाग में रक्खे हुए प्रणीतापात्र को मन्त्र बोलते हुए हवनीयाग्निकुण्ड के उत्तरभाग में रख देना । श्रान यह यजमान यज्ञ प्रारम्भ करने वाला है । यज्ञ से पहिले, एवं यज्ञ के अन्त में क्रमश: अपांप्रणयन, और अपनियन करता हुआ यजमान सौरसम्वत्सर – स्वरूप यज्ञ को अपने अधिकार में कर लेता है । कारण इसका यही है कि, प्राकृतिक यज्ञ के उपक्रम और उपसंहार, दोनों का पानी से ही सम्बन्ध है । आपोमय परमेष्ठी - मण्डल से ही यज्ञ प्रारम्भ होता है, एवं उसी परमेष्ठी-मण्डल पर यज्ञ समाप्त होता है । सौर सम्वत्सरयज्ञ के उस ओर भी पानी है, इस ओर भी पानी है । चारों ओर पानी है । ऋतपानी के उदर में सत्ययज्ञ प्रतिष्ठित है - तएव ' ऋते भूमिरियं श्रिता ' यह कहा जाता है । सम्वत्सरयज्ञमण्डल के चारों ओर व्याप्त रहने वाला पानी भी यज्ञस्वरूप ही है । ऐसी अवस्था में सत्र से पहिले अपांप्रणयन करना यज्ञ को ही अपने अधिकार में करना है । आपोमय परमेष्ठीमण्डल यज्ञस्वरूप कैसे है?, पानी के लिए ' यज्ञो वा पः ' यह किस आधार पर कहा जाता है?, इसके लिए हम अपने पाठकों का ध्यान पूर्व में प्रतिपादित पुरुषस्वरूप की ओर आकर्षित करना चाहते हैं । अक्षरब्रह्मा का स्वरूप त्रतलाते हुए हमने कहा था कि, पराप्रकृति नाम से प्रसिद्ध पञ्चकल अक्षरपुरुष, एवं अपराप्रकृति नाम से प्रसिद्ध पंचकल क्षरपुरुषविशिष्ट जो पञ्चकल अव्ययपुरुष है, उसे ही ' षोडशीपुरुष ' कहते हैं । मायापुर में रहने के कारण, दूसरे शब्दों में मायाबल से परिच्छिन्न होने के कारण इसे ' पुरि शेते ' इस व्युत्पत्ति से ' पुरुष ' कहा जाता है । महामायावच्छिन्न इस बोडशीपुरुष का अव्ययभाग सृष्टि का आलम्बन है, अक्षरभाग निमित्त कारण है, क्षरभाग उपादान कारण है । तीनों की समष्टि का नाम आत्मा है । क्षरात्मा, अक्षरात्मा, अव्ययात्मा, दूसरे शब्दों में क्षरपुरुष, अक्षरपुरुष, अव्ययपुरुष, तीनों को मिलाकर एक आत्मा का स्वरूप बनता है । एक १७५
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प्रथमकाण्ड ही आत्मा के अव्यय, अक्षर, क्षर, ये तीन धातु हैं । तीनों धातु तीन ग्रात्मा हैं । कहने को तीन आत्मा है | वस्तुतस्तु एक ही के तीन विवर्त्त हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-‘ तदेतत् त्रय ं सदेकमयमात्मा । आत्मोऽएकः सन्नेतत्त्रयम् । तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नम् ' । - शत ० १४।३।४।३ इति । आत्मत्रयी की समष्टि - स्वरूप षोडशी आत्मा का क्षरभाग क्योंकि विश्व का उपादान है, अतएव इस क्षरात्मा के अभिप्राय से ' आत्मा ही विश्व बना हुआ है ' यह कहा जा सकता है | अक्षर के अभिप्राय से ‘ आत्माने हीँ सम्पूर्ण संसार को बनाया है ' यह कहा जासकता 1 के अभि-अव्ययात्मा प्राय से ‘ न वह आत्मा संसार को बनाता है, न स्वयं विश्वरूप में परिणत होता है, अपितु वह केवल आलम्बनमात्र है - साक्षीमात्र है ' यह कहा जासकता है । एवं समष्टि के अभिप्राय से ‘ आत्मा अक्षर ), आत्मा पर ( अव्ययक्त पर ), आत्मा से ( क्षर से ) सम्पूर्ण संसार को बनाया करता है ' यह कहा जासकता है | आत्मा पर ही विश्व बनता है । श्रात्मा से ही बनता है । आत्मा ही बनता है । अत-एव ‘ श्रात्मैवेदं सर्वम् ' ( सच कुछ आत्मा ही आत्मा है ), ' सर्व हीदं ब्रह्मणा हैव सृषुम् ' ( स कुछ ब्रह्म ने हीं उत्पन्न किया है ), ‘ सांक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ', ' न करोति न लिप्यते ' इत्यादि श्रौतस्मार्त्त वचनों में कोई विरोध नहीं होता है । अव्यय, अक्षर, दर के भेद से तीनों दृष्टिकोण सत्य हैं । किसी एक वचन को प्रधान मानना, एवं अन्यों को गौण मानना सर्वथा अवैज्ञानिक है । विज्ञान के न जानने से ही श्रुतियों में परम्पर गौण मुख्य भाव का समावेश होता है । वस्तुतः सम्पूर्ण श्रुतिवचन अपने अपने व्यवस्थित विषयों में सर्वथा प्रधान हैं । अक्षर और क्षर का पुरुषपना ' तात्स्थ्यात्ताच्छन्द्यम् ' इस न्याय पर निर्भर है । वस्तुतः अक्षर धौर क्षर दोनों अव्ययपुरुष की अन्तरङ्गप्रकृति है, स्वभाव है । कहना इससे यही है कि, प्रकृति-विशिष्ट पुरुष के क्षरभाग से ही सम्पूर्ण संसार उत्पन्न होता है, अतएव ' ब्रह्माक्ष ( समुद्भवनम् ' के अनुसार अक्षर की विकृति होने पर भी क्षर को विश्व की उपादनकारणता की अपेक्षा से प्रकृति कह दिया जाता है । विश्व के प्रकृतिभूत इस क्षरभाग की प्रारण, आपः, बाक्, अन्न, अन्नाद्, ये पाँच कलाएँ हैं । इन पाँचों में से अन्न अन्नाद एक वस्तु है, जैसाकि पूर्व के प्रकरणों में बतला दिया गया है । ये ही चारों कलाएँ अक्षर-ब्रह्मा के चार मुख हैं । अक्षरब्रह्मा क्षररूप इन्हीं चारों मुखों से संसार का निर्माण किया करते हैं । क्योंकि सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा के चार मुख हैं । प्राणमुख से वेदसृष्टि होती है । पोमुख से लोकसृष्टि होती है । वाङ – मुख से देवसृष्टि होती है | एवं अन्नान्नादमुख से भूतसृष्टि होती है । महाभारत के मतानुसार वाङमुख से प्रजासृष्टि होती है । देवता, भृत, भौतिक ( श्रस्मदादि ) भेद से प्रजा तीन प्रकार की है । तीनों का वाङ– मुख में अन्तर्भाव है । गोत्रसृष्टि का भी इसी प्रजासृष्टि में अन्तर्भाव है, एवं अन्नान्नाद से धर्म्मसृष्टि होती है! इसप्रकार प्राण, आाप:, वाक्, अन्नान्नाद, इन चारों से क्रमशः वेद, लोक, प्रजा, ( देवता - भूत - भौतिक ), धर्म्म, ये चार प्रकार की सृष्टियाँ होतीं हैं । इन चारों में प्राण से सम्बन्ध रखने वाली वेदसृष्टि स्वयम्भू की सृष्टि है । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श शब्द - रहित प्रधामच्छद नीरूप तत्त्वविशेष का नाम हीं प्राप्त है । यह प्राण अनन्त प्रकार के हैं । इन प्राणों को ही ' ऋषि ' कहा जाता है । जिस वस्तु में प्राण रहता है, वह वस्तु ‘ सत् ’ ( विद्यमान ) कहलाती है | जब उस वस्तु से प्राण ( दम ) निकल जाता है, तो उस वस्तु का सद्भाव नष्ट १७६
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शतपथब्राह्मण हो जाता है । ' सामान्ये सामान्याभाव: ' इस नियम के अनुसार प्राण में प्राण नहीं रहता । अतएव इस प्राण को ' असत् ' कहा जाता है । प्राण स्वयं असत् है, अतएव अप्रत्यक्ष है । प्रातिस्त्रिकरूप से कभी भी प्राण का प्रत्यक्ष नहीं होसकता । अपितु भूत के द्वारा प्राण का अनुमान लगाया जासकता है । मैथुनी, और याज्ञिकी सृष्टि I के पूर्व इसी सत्प्राण की सत्ता रहती है, जैसाकि वाजिति कहती ' असद्वाऽइदमग्रऽग्रासीत् । तदाहुः, किं तदमदासीदिति १, ऋषयो वाव तदग्रे अस-दासीत् । तदाहुः- के ते ऋषय इति?, प्राणा वा ऋषयः ' । ( मैथुनी और याज्ञिकी नाम से प्रसिद्ध प्रत्यक्ष दृष्ट इस सृष्टि के पहिले असत् ही था । वह असत् क्या था?, इस प्रश्न का उत्तर ' ऋषि ही असत् थे ' यह है । वे ऋषि क्या वस्तु है?, इसका उत्तर ' प्राण का ही नाम ऋषि था ' यह है; - शत ० ६ | १ | १ | १ | इति ) । प्राण असंग है । सृष्टि संसर्गभाव पर निर्भर है । संसृष्टि को, दूसरे शब्दों में ग्रन्थिबन्धनयुक्त संसर्ग को सृष्टि कहते हैं । प्राणों में ग्रन्थिबन्धन नहीं है, अपितु सहचर सम्बन्ध है | अतएव प्राणसृष्टि को नाममात्र के लिए सृष्टि होने पर भी सृष्टि के बाहिर की ही वस्तु माना जाता है । वेद प्राणसृष्टि है । इस में बन्धन नहीं है । अतएव इस स्वयम्भू के ' ब्रह्मनिःश्वसितवेद ' को अपौरुषेय, नित्य, एवं विश्वातीत कहा जाता है । अतएव च इस प्राणसृष्टि ( वेद ) को ईश्वर की मानसीसृष्टि कहा गया है । स्वयम्भू - मण्डलस्थ इस प्राण का नाम हीं ' यत् ' है । स्वयम्भू में हीं ऋग्, यजुः साम, इस वेदत्रयी की सत्ता है । इस वेदत्रयी के यजुर्भाग का जो यद्भाग है, उसी का नाम प्राण है, एवं जूभाग का नाम वाक् है । इसी वाक्, और प्राण को आकाश वायु भी कहा जाता है । दोनों अविनाभूत हैं । प्रतिसंचरक्रम में ये ब्रह्म-रूप ( वेदरूप ) आकाश वायु ज्यों के त्यों बच जाते हैं । इनका नाश नहीं होने पाता । इन्हीं का नाम यजु: है, अतएव इस प्रतिसंचरक्रम में शेष बचे हुए यजुः के लिए ' शेषे यजुः शब्दः ' यह कहा जाता है । आकाश-वायु, अर्थात् प्राणवाक् बिना मन के सर्वथा अनुपपन्न हैं । मनकी इच्छा से आकाशालम्बन पर ब्रह्माग्निरूप वायु में क्षोभ उत्पन्न होता है । क्षोभ से उस वायु में घर्षण होते ही उस प्राणाग्नि से पानी उत्पन्न हो जाता है, अर्थात् वही प्राणाग्नि अप्तत्त्व के रूप में परिणत होजाता है । अग्नि के घर्षण से उसी क्षण पानी उत्पन्न होजाता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, दुःखवेग से शरीर में जब अधिक सन्ताप होता है, तो उसी समय आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं । प्रमाश्र का भी कारण अग्नि का घर्षण ही है । प्र ेम से शरीराग्नि की वृद्धि होती है । जितनी मात्रा में अग्नि चाहिए, उससे अधिक मात्रा होजाने से संघर्ष हो पड़ता है । उसी समय बढ़ा हुआ अग्नि पानी के रूप में परिणत हो चक्षुर्द्वार से बाहिर निकल पड़ता है । अपिच जब गर्मी पराका-ष्ठा पर पहुँच जाती है, तो मेह बरसने लगता है । जबतक ऊष्मा ( जिसे कि आजकल व्यवहारभाषा में ' ऊमस ' कहा करते हैं ) नहीं होती, तत्रतक पानी नहीं बरसता । अपिच यदि एक ही वस्तु को अधिक समय पर्य्यन्त एकटक देखा जाता है, तो अग्नि की मात्रा के बढ जाने से उसी क्षण आँखों से पानी निकलने लगता है । अतएव वर्षाऋतु का आगमन ग्रीष्मऋतु के अनन्तर ही होता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अग्ने-रापः ' यह कहा जाता है । अस्तु इस विषय को हम अधिक नहीं बढ़ाना चाहते । इससे बतलाना हमें केवल इतना हीं है कि, स्वयम्भू के प्राण से ( जोकि प्राण ब्रह्माग्निस्वरूप है ) सत्र से पहिले पानी ही उत्पन्न होता है | अतएव ‘ अप एत्र ससज्जदौ ' ( मनुः ) यह कहा जाता है । अतक केवल संगप्राण की सत्ता थी 1 अत्र १७७