Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 681–690

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 681–690

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शतपथब्राह्मण एषा गतिः । एषा प्रतिष्ठा य एष तपति 1 । तस्य ये रश्मयस्ते सुकृतः । अथ यत् परंभाः, प्रजापतिर्वा स स्वर्गो वा लोक: ' ( श ० ब्रा ० १२६७/४/१० कं ० ) इति । पूर्वोक्त स्वर्ग -परिचय निम्न लिखित तालिका से स्पष्ट होजाता है । २५ – प्रत्ननाकः - इन्द्रविष्टप् - विश्वजिदहः - अविवाक्यमहः– महाव्रतम् । २४ -... २३-२२-२१ २०-१६-१८-७- रोचनः " ( ब्रह्मणः ) ६- प्रद्यौः ( मृत्योः ) ५- अधिद्यौः ( वरुणस्य ) वघ्नस्य विष्टप्– विष्णुविष्टप् - विषुवदहः - नाकः " ( सूर्यस्य ) - ३ - अपराजितः " ( इन्द्रस्य ) 11 * २ - ऋतधामा ( वायोः ) * १ - पोटक स्वर्ग: ( अग्नेः: ) १७ - त्रिनाचिकेतः - ब्रह्मविष्टप् - श्रभिनिदहः स्वरसामानः त्रयः स्वरसामान त्रयः लोकः स्वर्गो एव , स देवस्वर्गाः वै सप्त सूर्य्य में ज्योतिः, गौः, आयुः ये तीन ' मनोता ' हैं । ज्योतिर्भाग से देवसृष्टि होती है, गौर्भाग. से भूतसृष्टि ( पृथिवीसृष्टि ) होती है, एवं आयुर्भाग से आत्मसृष्टि होती है । ऐसी अवस्था में ज्यो-तिर्म्मय सूर्य्य को हम अवश्य ही देव भी कह सकते हैं । यज्ञ, स्वर, स्वर्ग, देवधन यह सूर्य्य पूर्व दिशा में प्रतिष्ठित रहता है । श्रुतः पूर्वदिशा से हम सूर्य्य का ग्रहण करसकते हैं । प्रकृत में यज्ञ का सम्बन्ध है । यज्ञ सूर्य्य है । सूर्य्य स्वर्ग है । दिव्यलोक पाप्मा से रहित है । अध्वर्यु का लक्ष्य यज्ञरूप स्वर्गलोक है, न कि पाप्मा | अतएव हविग्रहणान्तर वह इसी ओर दृष्टि डालता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति

ने कहा है-‘ यज्ञो वै स्वरहर्देवा सूर्य्यः । तत् स्वरेवैतदतोऽभिविपश्यति ' ॥२१ ॥

यथाविधि हविग्रहण कर्म्म उपरत हुआ । अत्र अध्वर्यु ' ' हँ हन्तां दुर्य्याः पृथिव्याम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ शकट से नीचे उतरता है । आज यह अध्वर्यु हवि लेकर शकट से उतर रहा है । सामान्य मनुष्यों की दृष्टि में यज्ञ एक कौतुकमात्र है । परन्तु वैज्ञानिकों की दृष्टि में यज्ञ एक महा अस्त्र है, व्यर्थ अस्त्र है । यज्ञ-कर्म्म में होने वाली यत्किञ्चित् भी भूल यज्ञकर्त्ता का नाश कर डालती है । यज्ञकर्त्ता को श्रधिभूत के द्वारा अपने अध्यात्म को अधिदैवत के साथ मिलाना पड़ता है । इन तीनों का सङ्गतिकरण ही यजन है । इसलिए ४१६

पृष्ठ 682

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प्रथमकाण्ड छोटे से छोटे कर्म में भी सावधानी की आवश्यकता है । सौ पचास मन काष्ठ जला कर १०-२० मन घी का नाश कर देना कदापि यज्ञ नहीं है । यज्ञ एक वह विद्या है, जिसके प्रभाव से प्रकृतिमण्डल को अपने वश में किया जासकता है । इसलिए सोच समझ कर ही यज्ञकर्म में हाथ डालना चाहिए । अध्वर्यु ' उतरता है । मान लीजिए, उतरते समय शकट से उसका पैर फिसल गया । पृथिवी पर आ गिरा । समझ लीजिए, यदि ऐसा होगया, तो यज्ञकर्त्ता यजमान का घर भी नष्ट होगया, एवं वंश भी नष्ट होगया! महाराज ' जान ' एक बार रथ पर आरूढ होकर परिभ्रमणार्थ जारहे थे । मार्ग में किसी कारण से घोड़े बिगड़ पड़े । गाड़ी उलट गई । जान का हाथ टूट गया । उसी समय उन्होंनें अपने पुरोहित से पूँछा कि, व्रत-लाओं! यज्ञ के किस कर्म में त्रुटि हुई, जिससे हमारा हाथ टूट गया? । इस आख्यान से बतलाना हमें यही है कि, यज्ञकर्त्ता की सम्पूर्ण जीवनस्थिति एकमात्र यज्ञस्थिति पर ही निर्भर है । इविर्ग्रहण करके उतरना भी यज्ञ-कर्म्म है | यदि वह चिगड़ गया, तो यजमान की स्थिति बिगड़ गई । पृथिवी प्रतिष्ठा है । उधर यजमान के ' दुर्य्य ( घर ) ' यजमान की प्रतिष्ठा हैं । एवं वे दुर्य्य यजमान के वंश की प्रतिष्ठा हैं । यदि अध्वर्यु पृथिवी-प्रतिष्ठा से च्युत हो गया है, तो विश्वास कीजिये कि, दक्षिणाक्रीत अध्वर्यु की यह च्युति यजमान के प्रतिष्ठा-रूप दुर्यों को, और वंश को भी च्युत करने में समर्थ है । वर्ष के भीतर भीतर यजमान के घर नष्ट भ्रष्ट होजा-यँगे । एवं इसके पुत्र पौत्रादि मार्गभिक्षुक ( दर दर के बिखारी ) बन जायँगे । यदि अध्वर्यु में कम्पन होगा, तो वहाँ भी कम्पन होगा । यदि यह गिर जायगा, तो वहाँ भी च्युति होजायगी । इस च्युति, और क्षोभ को हटाने के लिये ही अध्वर्यु ' पूर्वोक्त मन्त्र बोलता हुआ पृथिवी पर पैर रखता है । मन्त्रशक्ति के प्रभाव से देव-प्राण क्षोभ, एव च्युति से रक्षा करता है । अध्वर्यु निरापदरूप से प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित होजाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य मे रखकर श्रुति ने कहा है— ' तथा नानुप्रच्यवन्ते, न विक्षोभन्ते ॥ २२ ॥

कितने हीं ऋषियों के मतानुसार गार्हपत्याग्नि में हविद्रर्व्य का परिपाक होता है, एवं कितनों ही के मतानुसार आहवनीयाग्नि में हवि का परिपाक होता है । दोनों सम्प्रदाएँ सनातन हैं, जैसाकि अनुवाद में बत-लाया जाचुका है । जैसा सम्प्रदाय हो, तदनुसार गार्हपत्य, किंवा ग्राहवनीय के पश्चिम भाग में ' पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयामि - अदित्या उपस्थे ' यह मन्त्र बोलता अध्वर्यु. अग्नि के पश्चिम भाग में गृहीत हवि द्रव्य रख देता है । केन्द्रबिन्दु शरीर के ठीक मध्य मे पड़ती है । अतएव इसे ' मध्यस्थान ' कहा जाता है । हमारे शरीर में नाभि, हृदय, कण्ठ, ये तीन केन्द्र हैं । इन तीनों के अग्नि, वायु, आदित्य, ये तीन देवता अधिष्ठाता हैं । अग्नि पार्थिव है । वायु आन्तरिक्ष्य है । आदित्य दिव्य हैं । त्रैलोक्य का रस हमारे में याता है । मूलद्वार से नाभि पर्य्यन्त पार्थिव रस का साम्राज्य है । शरीरत्रिलोकी का यही पृथिवीलोक है । नाभि से हृदय पर्य्यन्त ग्रान्तरिक्ष्य रस का साम्राज्य है । यही अन्तरिक्षलोक है । एवं नाभि से कण्ठपर्य्यन्त दिव्य रस का साम्राज्य है । यही तीसरा द्युलोक है, एवं मस्तक चौथा आपोलोक है । इसमें चान्द्ररस का साम्राज्य है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, बौ, आप:, चार लोक हैं, अग्नि - वायु - आदित्य, चन्द्रमा, ये चार चारों लोकों के अतिष्ठावा शवसोनपात् देवता हैं । एवं चारों के क्रमशः वसु, रुद्र, आदित्य, नक्षत्र, ये अधिदेवता ( गण-देवता ) हैं । ४२०

पृष्ठ 683

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शतपथब्राह्मण मस्तक चन्द्रलोक है, इसीलिये ग्राम्यभाषा में मस्तक को ' चाँद ' कहा जाता है । शरीर के ये चारों लोक क्रमशः बस्तिगुहा, उदरगुहा उरोगुहा, शिरोगुहा, नाम से प्रसिद्ध हैं । भिन्न भिन्न गुहाओं का सञ्चालन भिन्न भिन्न देवता कर रहे हैं । बस्तिगुहा की सत्ता अपानदेवता ( पार्थिव अग्नि ) के आधार पर है । उदर-गुहा की सत्ता व्यान के आधार पर है । उरोगुहा की सत्ता प्राण पर प्रतिष्ठित है । इन तीनों का भी केन्द्र हृदय है । दूसरे शब्दों में - सर्वाङ्गशरीर का केन्द्र ' हृदय ' है | इसी पर व्यान प्रतिष्ठित है । नीचे रहने वाले पार्थि-वदेवप्राणमन ‘ अपान ' का, एवं ऊपर रहने वाले सौरदेवप्राणघन ' प्राण ' का, दोनों का शासन यही मध्यस्थ व्यान करता है । प्राण, अपान के कम्पन से तत्रतक शरीर का कुछ भी अनिष्ट नहीं हो सकता, जबतक कि मध्यस्थ व्यान स्वत्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । इसी व्यान - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर उपनिषत् श्रुति कहती है—

न प्राणापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥

ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति ।

मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥

— कठोपनिषत् यही त्र्यानस्थान अभयस्थान कहलाता है । यही सम्पूर्ण शरीर की प्रतिष्ठा है । साधारण दृष्टि से · भी वस्तु का मध्यभाग अभय होता है । उधर इधर के पार्श्वभागों में यदि कोई वस्तु रख दी जाती है, तो उसके पतन का भय बना रहता है । परन्तु मध्य में रखने से पतन का भय जाता रहता है । इसका कारण वही ' नभ्य ' ( केन्द्र ) प्रजापति है | वह स्वयं कम्परहित है । अतएव उस पर प्रतिष्ठित वस्तु भी कम्परहित होजाती है । मन्त्रशक्ति के द्वारा पृथिवी के उस नभ्य - अभय स्थान की ही भावना करता हुआ अध्वयु उस हवि को रखता हुआ उसे भय ही बनता है । पृथिवी में दिति, अदिति, दोनों भाव हैं । दितिभाव यज्ञविरोधी है । अतएव आगे जाकर अध्वर्यु ' कहता है कि, ' मैं अदिति के उपस्थ में ( क्रोड़ में ) हीं तुम्हें प्रतिष्ठित करता हूँ । ' इसके अनन्तर ' अग्ने हव्यं रक्ष ' यह मन्त्र बोलता हुआ उस हत्रि को अग्नि की रक्षा में हीं प्रतिष्ठित करता है । इसी रक्षणकर्म्म पर इस हविग्रण, तथा तत्सादनात्मक ( स्थापनात्मक ) कर्म का उपराम करते हुए याज्ञवल्क्य कहते है-' तस्मादाह - अग्ने! हव्यं रक्षेति || २३ || “ शकट से हविग्रहण, और उसका गार्हपत्य, किंवा आहवनीय के पश्चिमभाग में स्था-पन ” नामक सप्त कर्म्म उपरत प्रथमकाण्डान्तर्गत- प्रथमाध्याय का द्वितीय ब्राह्मण उपरत । प्रथमकाण्डान्तर्गत- - प्रथमप्रपाठक का द्वितीय ब्राह्मण उपरत । २ * —— ४२१

पृष्ठ 684

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प्रथमकाण्ड अथ प्रथमप्रपाठके, प्रथमाध्याये वा तृतीयं ब्राह्मणम् ३ -थ - पां, हविषां यज्ञपात्राणाञ्च प्रोक्षणम् .

( मूल ) – पवित्रे करोति - " पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ " ( १ अ ० १२ मं ० ) इति ।

यज्ञो वै विष्णुः । यज्ञिये स्थ इत्येवैतदाह ॥१ ॥

ते वै द्व े भवतः । अयं नै पवित्रम् - योऽयं पवते । सोऽयमेक इनैव पवते । सोऽयं पुरुषेऽन्तः प्रविष्टः प्राङ् च, प्रत्यङ च । ताविमौ प्राणोदानौ । तदेतस्यैवानुमात्राम् । तस्माद् द्व े भवतः || २ || अथो अपि त्रीणि स्युः । न्यानो हि तृतीयः । द्व े त्वेवं भवतः । ताभ्यामेताः प्रोक्षणी-रुत्पूय ताभिः प्रोक्षति । तद्यदेताम्यामुत्पुनाति || ३ || वृत्रो ह वा इदं सर्वं वृत्वा शिश्ये- यदिदमन्तरेण द्यावापृथिवी । स यदिदं सर्वं वृत्वा शिश्ये- तस्माद् वृत्रो नाम ॥ ४ ॥

तमिन्द्रो जघान । स हतः पूतिः सर्वत एवापोऽभिप्रसुस्राव । सर्वत इव ह्ययं समुद्रः । तस्मादु हैका आपो बीभत्साञ्चक्रिरे । ता उपर्यु पर्यतिप्रत्र विरे । स इमे दर्भाः । ताना-पूताः । अस्ति वा इतरासु संसृष्टमिव - यदेना वृत्रः पूतिरभिप्राववत् । तदेवासामे-ताभ्यां पवित्राभ्यामपहन्ति । अथ मेध्याभिरेवाद्भिः प्रोति । तस्माद्वा एताभ्यामु-त्पुनाति || ५ || स उत्पुनाति – ‘ “ सवितुर्वः प्रसवऽउत्पुनाम्प च्छ्रिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः ” ( १ ० १२ मं ० ) इति । सविता वै देवानां प्रसविता, तत्सवितृप्रसूत एवैतदुत्पुना त अच्छिद्र ेण पवित्रेणेति I । यो वा श्रयं पवते - एषोऽच्छिद्र पवित्रम् । एतेनैतदाह - सूर्यस्य रश्मिभिरिति । एते वा उत्पवितारः -- यत्सूर्यस्य रश्मयः । तस्मादाह – सूर्यस्य रश्मि-भिरिति ॥ ६ ॥

ताः सव्यळे पाणो कृत्वा दक्षिणेनोदिङ्गयति, उपस्तौत्य चैनाः, एतन्महयत्य व - " देवीरा पोऽग्रेगुवोऽग्रेपुवः ” ( १ ० १२ मं ० ) इति । देव्यो ह्यापः । तस्मादाह - देवीराप इति । ग्रेगुव इति । ता यत्समुद्र ं गच्छन्ति, तेनाग्रेगुवः । अग्रेपुव इति । ता यत्प्रथमाः ४२२

पृष्ठ 685

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शतपथब्राह्मण सोमस्य राज्ञो भक्षयन्ति, तेनाग्रे पुवः । " अग्र इममद्य यज्ञं नयताग्रे यज्ञपतिं सुधातुं यज्ञपतिं देवयुवम् " ( १ ० १२ मं ० ) इति । साधु यज्ञ, साधु यजमानम् - इत्य े-नैतदाह || ७ || " युष्माऽइन्द्रोऽवणीत वृत्रतूर्ये ' ( १ ० १३ मं ० ) इति । एता उ हीन्द्रोऽवृणीत वृत्रेण स्पद्धमानः । एताभिर्ह्येनमहन् । तस्मादाह- ' युष्माऽइन्द्रोऽवृणीत वृत्रतूर्ये ' इति ॥ ८ ॥

' यूयमिन्द्रमवृणीध्वं वृत्रतूर्ये ' इति । एता उ हीन्द्रमवृणत वृत्रेण स्पर्द्धमानम् । एताभिर्होनं - ग्रहन् । तस्मादाह - ' यूयमिन्द्रमवृणीध्व ं वृत्रतूर्ये इति ॥६ ॥

“ प्रोक्षिताः स्थ " - ( १ ० १३ मं ० ) इति । तदेताभ्यो निह्नुते । अथ हविः प्रोक्षति । एको वै प्रोक्षणस्य बन्धुः: - - मेध्यमेवैतत्करोति ॥ १० ॥

प्रोक्षति - " अग्नेये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि " ( १ ० १३ मं ० ) इति । तद् यस्यै

देवतार्यौ हविर्भवति – तस्य मेध्यं करोति । एवमेव यथापूर्वं हवींषि प्रोय ॥११ ॥

अथ यज्ञपात्राणि प्रोक्षति- “ दैव्याय कर्मणे शुन्धध्वं देवयज्या यै ” ( १ श्र ० १३ मं ० ) इति । दैव्याय हि कर्मणे शुन्धति देवयज्यायै - " यद्वोऽशुद्धाः पराजघ्नुरिदं वस्तच्छु-न्धामि ” ( १ अ ० १३ मं ० ) इति । तद्यदेवैषामत्र शुद्धस्तता वा, अन्यो वाऽमेध्यः कश्चित् पराहन्ति – तदेवैषामेतदद्भिर्मेध्यं करोति । तस्मादाह - यद्वोऽशुद्धाः पराजघ्नुरिदं चस्तच्छुन्धामीति ॥१२ ॥

इति प्रथमकाण्डे, प्रथमप्रपाठके, प्रथमाध्याये वा तृतीयं ब्राह्मणम् ( अनुवाद ) -- वह ध्व प्रादेशमात्र अशीर्णाय ( जिन का प्रभाग विशकलित न हो ) दो कुशाओं को अपने वाम हस्त में लेकर दक्षिण हाथ में अन्य तीन कुशा लेकर इन से वाम हस्तमें स्थित उन दोनों कुशाओं के अग्रभाग का - ' कुशौ समावप्रशीर्णाग्रा वनन्तगभ ' ( का ० श्रौ ० · सू ० अ ० २। कं ० २। ३० सू ० ) के अनुसार ' पवित्रेस्थो वैष्णव्यौं ' ( हे पवित्र करनेवाली कुशाओ! श्राप यज्ञसम्बन्धिनी बनिए ) यह मन्त्र बोलता हुआ छेदन करता है । इसप्रकार मन्त्र शक्ति के द्वारा अध्वय्यु ' उन दो कुशाओं में यज्ञ - सम्बन्ध स्थापित करता हुआ उन्हें पवित्र बनाता है । यज्ञ विष्णु है । आप यज्ञिय बनें, मन्त्र से यही कहा गया है ॥ १ ॥

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पृष्ठ 686

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प्रथमकाण्ड पूर्वकथनानुसार वे कुशाएँ दो होती हैं । यह पवित्र है, जो कि ( अन्तरिक्ष में ) वह रहा है । यह पवित्र ( वायु ) ( प्रकृतिमण्डल में ) एकसा बन कर ही बह रहा है । यह एकरूप से बहने वाला पवित्र प्राणवायु पुरुष में प्राङ्, और प्रत्यङ् रूप से प्रविष्ट हो रहा है । ये ही दोनों प्राणोदान हैं । इसी प्राणोदान की ये कुशाएँ प्रतिकृति हैं । अतएव दो होतीं हैं || २ || अथवा ' त्रीन्वा ' ( का ० श्र ० २/२/३१ ) के अनुसार ये कुशाएँ तीन होनी चाहिएँ । क्योंकि ( प्राण, उदान, से अतिरिक्त ) तीसरा व्यान और है । वस्तुतस्तु कुशाएँ दो हीं होती हैं । इन दोनों से प्रोक्षणी- पानियों को पवित्र कर ( पवित्र कुशाओं से पवित्रीकृत ) इन प्रोक्षणी-जलों से ( अध्वर्यु ' यज्ञिय द्रव्यों का प्रोक्षण करता है । सो जो कि अध्वर्यु इन दोनों कुशाओं से प्रोक्षणी - पानी को पवित्र करता है, उस की उपपत्ति बतलाते हैं । अर्थात् कुशाओं से जल को क्यों पत्रित्र ' किया जाता है?, इसका वैज्ञानिक रहस्य बतलाते हैं ॥ ३ ॥

इस द्यात्रा - पृथिवी के मध्य में जो कुछ है, उस सब को चारों ओर से घेर कर वृत्रासुर सोगया । वह सब का संवरण कर सोगया, अतएव वह ' वृत्र ' नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ४ ॥

उस को इन्द्र ने मार दिया । इन्द्र से मरा हुआ वृत्र ( शत्र बन जाने से ) दुर्गन्धयुक्त हो पिब्द्दमान { काल्वालीकृत - पिलपिला ) होकर चारों ओर पानियों के अभिमुख द्रु न होगया, चूगया । यह समुद्र सर्वत्र व्याप्त है | सब ओर व्याप्त उन जलों से कुछ जलोंनें ( उस दुर्घन्वयुक्त वृत्र से ) घृणा की । घृणा करते हुए वे जल ( उस आपोमय समुद्र के ऊपर ऊपर सन्तरण करने लगे । ( वृत्र से घृणा कर ऊपर ऊपर सन्तरण करने वाले वे ही पानी ) ये दर्भ हैं । दर्भरूप पानी ( वृत्र से पृथक् होजाने के कारण ) अनापूयित ( दुर्गन्ध रहित, अतएव स्वच्छ ) हैं । एवं ( बीभत्सा करने वाले इन पानियों से शेष बचे हुए जो पानी हैं, वे ) इतर दुर्गन्धयुक्त पानियों में संसृष्ट हैं - जिन इतर पानियों की ओर पूतिभावापन्न वृत्र अनुगत होगया था । ( आज जो पानी प्रोक्षणकर्म्म के लिए इस यज्ञ में स्थापित है, वह उन इतर पानियों के संसर्ग से दूषित, अतएव मेध्य होरहा है ) यह अब पवित्र, तथा मेध्य अबूरूप इन कुशाओं से इन पानियों के उसी दूषित भात्र को हटाता है । जब पवित्र -दर्भ का इस प्रोक्षणी पानी से सम्बन्ध करा दिया जाता है, तो यह मध्य बन जाता है । इन मेध्य प्रोक्षणियों से ही अध्वर्यु प्रोक्षण करता है । इसीलिए ( दूषित भाव को हटाने के लिए ही ) इन कुशाओं से प्रोक्षणी - जलों का सम्बन्ध कराया जाता है । दर्भोत्पवन की यही उपपत्ति है ॥ ॥ ( उत्पवन क्यों करना चाहिए?, इस प्रश्न का उत्तर उपरत हुआ । अब उत्पवन की पद्धति बतलाते हैं- ) वद्द अब्बञ्जु ‘ हविग्र हण्यामपः कृत्वा ताभ्यामुत्पुनाति सवितुर्व ० ' ( का ० श्रौ ० ४२४

पृष्ठ 687

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शतपथब्राह्मण २।३।३२ ) के अनुसार अग्निहोत्रहवणी * नाम से प्रसिद्ध हविर्ग्रहणी ( जिस में हविद्रव्य स्थापित किया जाता है, वह पात्री ही ' हविगृह्यते यस्यां ' इस व्युत्पत्ति से हविर्य हरणी कहलाती है ) प्रोक्षणी-पात्रस्थ जल प्रदान कर उस पानी से दोनों हाथों के अंगुष्ठ, और अनामिका से उन दोनों कुशाओं 17 को पकड़ कर उन को ' सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्र ेण पवित्रेण मूर्य्यस्य रश्मिभिः - यह मन्त्र बोलता हुआ समाविष्ट कर देता हैं । सविता देवताओं के प्रसविता है । प्रेरक हैं । ( ऐसी अवस्था में ' सवितुर्व: ० ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ' सविता से प्रसूत ( प्रेरित होकर ही निधान करता है । यह जो प्रवाहित है, वही छिद्ररहित होने से अच्छिद्रपवित्र है, इसी अभिप्राय से ‘ सूर्य्यस्य रश्मिभिः ' कहा है । ' सवितादेवता की अनुज्ञा में अच्छिद्र पवित्र से, और सूर्य की रश्मियों से मैं आप को ( हविग्र हणीस्थ पानी को -- कुशाप्रक्षेप के द्वारा ) पवित्र बना-ता हूँ ” मन्त्र का यही अक्षरार्थ है || ६ || उत्पवनानन्तर‘सव्ये कृत्वा दक्षिणेनोदिङ्गयति देवीरा ' ( का ० ०२ ३।३४ ) के अनुसार वह अध्वर्यु ' पवित्र ( कुश ) युक्त प्रोक्षणी - जल से परिपूर्ण अग्निहोत्रहवणी अपने दाहिने हाथ में रख लेता है। अनन्तर- र- ' ' देवीरापो गुवोऽग्रेपुवोऽग्र इमम यज्ञं नयताग्रे - यज्ञपतिं सुधातु ं यज्ञपतिं देवयुवम् । युष्मा इन्द्रोऽवृणीत वृत्रतूर्ये यूयमिन्द्रमवृणीध्वं वृत्रतूर्ये ( हे दिव्यभावापन्न आपः! आप आगे आगे वस्तुओं को पवित्र करने वाली हैं । अथवा सर्वप्रथम सोमपान के कारण आप अग्रेपू हैं । ऐसे आप इस प्रवर्त्तमान यज्ञ को अप्रगामी बनावें । यज्ञ के साथ ही यजमान को भी अप्रगति ( स्त्रर्गगति ) की ओर ले चलिए, जोकि यज्ञपति यजमान दक्षिणादि से यज्ञ को शोभन प्रकार से सुसंपन्न करने के कारण सुधातु ' है । एवं अधिभूत के द्वारा अपने आध्यात्मिक देव-ताओं को अधिदैवत - मण्डल के साथ संयुक्त करने के कारण देवयुव है । वृत्रासुर के मारने के लिये इन्द्रने आपका वरण किया है । एवं आपने वृत्र के पूतिभाव पर विजय प्राप्त करने के लिये इन्द्र * अग्निहोत्रहवण्यां चतुरो मुष्टीनिर्वपति ( श्राप ० १ | १० | १० ) के अनुसार हविर्ग्रहणी ही ' अग्निहोत्रहवणी ' नाम से प्रसिद्ध है । ÷ पांप्रणयन कर्म्म में ' प्रणीतापात्र ' का उल्लेख किया गया है । आगे जाकर ये दोनों पवित्र ( कुशाएँ ) ' पवित्रे निघाय प्रणीतासु ' ( का ० श्रौ ०२।७।१८ ) के अनुसार उसी प्रणीतापात्र में निहित की जाने वाली है । उससे पहिले पहिले ये कुशाएँ ' ता स्थानं तयो: ' ( का ० श्र ० २,३३४ ) के अनुसार अग्निहोत्रहव -णीस्थ पानी में हीं प्रतिष्ठित रहतीं हैं । आगे जो प्रोक्षणकर्म्म होने वाला है, वह इसी से उठा उठा कर किया जायगा | यहाँ केवल इतना हीं बतलाता है कि, एक पात्र में प्रोक्षण कर्म्म के लिए जल भरा रहता है | वह पात्र ' प्रोक्षणीपात्र ' नाम से प्रसिद्ध है । उससे अग्निहोत्रहवणी में जल लेकर यथाविधि दोनों कुशाएँ उस में निहित कर देनी चाहिएँ । ४२५

पृष्ठ 688

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प्रथमकाण्ड का वरण किया है ), यह मन्त्र बोलता हुआ प्रोक्षणीपात्र से युक्त अपने उस दक्षिण हस्त को ऊँचा उठाता है । ऐसा करता हुवा अध्वर्यु उन पानियों की स्तुति ही करता है । ' आप ऐसे हैं- ऐसे हैं ' इत्यादि रूप से उनकी महिमा का ही यशोवर्ण ( बखान ) करता है । इन्द्रप्राण के सम्बन्ध से, किंवा ऐन्द्रपानी के योग से उत्पन्न, अतएव दिव्यभावापत्र दर्भ के सम्बन्ध से ये पानी दिव्य बन गये हैं । अतएव इनके लिये ' देवीरापः ' कहा है । ये पानी आगे आगे चल कर समुद्र में मिल जाते हैं, अतएव इन्हें ' अग्रेगू: ' कहा है । सोमराजा के भाग को सबसे पहिले ये ही लेते हैं । श्रतएव इन्हें ‘ अग्रेपू ’: कहा है । ‘ अग्रममद्य ० ' इत्यादि से यज्ञ सुसंपन्न हो, यज्ञकर्ता यजमान भी स्वर्गादि संपत्ति से युक्त होकर सुसम्पन्न हो, यही कहा गया है ॥ ७ ॥

वृत्र स्पर्द्धा करते हुये इन्द्र इन्हीं की सहायता ली थी । इन्हीं की सहायता से इन्द्रने वृत्रासुर को मारा था । इसी अभिप्राय से ' युष्मा इन्द्रो ० ' इत्यादि कहा है || ८ || वृत्र के साथ स्पर्द्धा करते हुए इन्द्र का इन्होंने वरण किया था, इन्हीं के वरण से इन्द्र वृत्र को मारने में समर्थ हुए थे । इसी अभिप्राय से ' यूर्यामन्द्रमवृणीध्वं ' यह कहा है || ६ || इसके अनन्तर वह अध्वर्यु ' प्रोक्षिता स्थेति तासां प्रोक्षणम् ' ( का ० श्र ० २।३।३५ ) के श्र वणी के एकदेश से पानी लेकर इससे, अथवा पृथक् रक्खे प्रणीता-हुए अनुसार त्र पात्र से प्रणीता - जल ले कर उसे ' प्रोक्षिता स्थ ' ( आप से आगे का प्रोक्षण कर्म्म होने वाला है, अत: उससे पहिले आप प्रोक्षित होजाइए ) यह मन्त्र बोलता हुआ अग्निहोत्रहवणीस्थ पानियों का प्रोक्षण करता है । इस प्रकार सब का प्रोक्षण करने वाले इन प्रोक्षणियों का प्रोक्षण करता हुआ इनसे वही करता है । जो स्वयं संस्कृत होते हैं, वे अन्य का संस्कार करने में श्रसमर्थ हैं | प्रोक्षण के द्वारा आज अध्वर्यु इन प्रोक्षणी - पानियों से इसी भाव को तिरोहित करता है । प्रोक्षण से वास्तव में इस पूर्व भाव का निह्नत्र ( विलयन ) होजाता है । इसके अनन्तर वह अध्वर्यु ' हविश्वाऽग्नयेत्वाऽग्नीषोभ्यां त्वा ' ( का ० श्र ० २।३! ३३ ) के अनुसार यथाविधि हवि का प्रोक्षण करता है । ( आगे स्थान स्थान पर प्रोक्षणक * ब्रह्मा की ओर दृष्टि कर ' ब्रह्मन्! हविः प्रोक्षिष्यामि ', बोलता हुआ प्रोक्षण के लिये श्राज्ञा माँगता है । उत्तर में ब्रह्मा- ' प्रोक्ष यज्ञं देवता वर्द्धय त्वं नाकस्य पृष्ठ यजमानोऽस्तु । सप्तऋषीणां सुकृतां यत्र लोकस्तत्रेमं यज्ञं यजमानं च घेहि ' यह धीरे से बोलकर ' प्रोक्ष ' यह श्राज्ञावचन बोलता है । आज्ञानुसार अध्वर्यु ' ' अग्नये त्वा जुषं प्रोक्षामि, अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्ट प्रोतामि ' इत्यादि रूप से यथादैवत हविद्रव्य का प्रोक्षण करता है । ४२६

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शतपथब्राह्मण श्रावेगा ) इस प्रोक्षण का एकमात्र तात्पर्य यही है किं, प्रोक्षण से अध्वर्यु उस द्रव्य को मेध्य ( संस्काराधान के योग्य ) ही करता है ॥ १० ॥

. क्यों प्रोक्षण किया जाता है?, इसकी उपपत्ति बतला दीगई । अब पद्धति बतलाते हैं । ' अग्नये जुष्टं प्रोक्षामि ' ( अग्नि के लिए प्रियतम हवि का प्रोक्षण करता हूँ ) यह मन्त्र बोलता हुआ हविका प्रोक्षण करता है । ( अग्नये ) इत्यादि बोलता हुआ अध्वर्यु - जिस देवता के लिए वह हत्रि होती है - उसीके लिये उसे मेध्य करता है । एवमेव यथापूर्व ( जिस देवक्रम से हवि-ग्रहण किया था, उसी क्रम से ) हवियों का प्रोक्षण * कर ॥११ ॥

अनन्तर - ‘ पात्राणि दैव्याय ' ( का. श्री. २ | ३ | ३७ ) के अनुसार - ' दैव्याय कर्मणे शुन्ध-ध्वं देवयज्यायै, यद्वोऽशुद्धाः पराजघ्नुरिदंस्तच्छुन्धामि ' यह मन्त्र बोलता हुआ यज्ञपात्रों का ( उलूखल मूसलादि १० यज्ञायुधों का ) प्रोक्षण करता है । ये बज्ञपात्र देवयजनरूप दैव्यकर्म्म के लिए ही शुद्ध किये जाते हैं । अतएव ' दैव्याय ' इत्यादि कहा है । पात्रनिर्माण करते समय पात्रनिर्माता तक्षा के दोष से इनमें जो कुछ अपवित्रता आजाती है, एवं वायु श्रादि के द्वारा, श्रथवा अन्य मनुष्यों के दोष से, तथा अशुद्ध हस्तादि के संसर्ग से जो श्रमेध्यभाव इन पात्रों में प्रविष्ट हो जाता है, वही इस प्रोत्क्षणकर्म्म से हटाया जाता है । इसी अभिप्राय से- ' यद्वोऽशुद्धा ' इत्यादि कहा है || १२ || प्रथमकाण्डान्तर्गत प्रथमाध्याय का तृतीय ब्राह्मण उपरत प्रथमक ( ण्डान्तर्गत प्रथमप्रपाठक का तृतीय ब्राह्मण उपरत * ( भाष्य ) ' देवाननुविधा वै मनुष्याः ' यद्वै देवा अकुर्वं स्तत् करवाणि ' - इत्यादि निगम हमारे इस वैध यज्ञ को उन नित्य प्राण देवताओं से सम्पन्न होने वाले नित्ययज्ञ की प्रतिकृति बतलाते हैं । प्राणदेवता अग्नीषोमीय यज्ञ के द्वारा जैसे हमारा निर्माण किया करते हैं, वैसे ही उन्हीं नियमों के द्वारा उन उन पदार्थो के संयोग से ऋत्त्विजों की सहायता से अपने अध्यात्मयज्ञ का उस अधिदवतयज्ञ के साथ सम्बन्ध कर देते हैं । दूसरे शब्दों में - हम अपना नवीन ' दैवात्मा ' बना कर उसे १७ हवें स्वर्ग में प्रतिष्ठित कर देते हैं | ‘ त्रिणा-चिकेतस्वर्ग ' नाम से प्रसिद्ध ' सप्तदशस्वर्ग ' में प्रतिष्ठित यज्ञकर्त्ता इस यजमान का दैवात्मा भूलोकस्थ यजमान के मानुषात्मा से श्राद्ध रहता है । दोनों के प्राण उसी यज्ञातिशय से परस्पर श्राद्ध रहते हैं । श्रायुर्भोगपर्य्यन्त इसी भूमण्डल पर विद्यमान रहने के अनन्तर उसी दैवात्मा के आकर्षण से यजमान का यह ' मानुषात्मा ' उसी त्रिणाचिकेतस्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है । * प्रोक्षणानन्तर - ‘ असनारे प्रोक्षणीर्निघाय ' ( का. श्री. २३/३६ ) के अनुसार सञ्चर प्रदेश में-( प्रणीतापात्र, और ग्राहनीय के मध्य में - वेदि के ऊपर ) वह प्रोक्षणीपात्र रख दिया जाता है । ४२७

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प्रथमकाण्ड इससे बतलाना हमें यही है कि, यज्ञ प्रजोत्पति का ही साधन है । यज्ञ से प्रकृतिवत् नवीनं आत्मा उत्पन्न किया जाता है | अतएव प्राकृतिक यज्ञ में प्राणोदानादि जिन प्राणों का सम्बन्ध होता है, उनका इस यज्ञ में भी आधिभौतिक पदार्थों के द्वारा सम्बन्ध कराया जाता है । यज्ञ में दर्भ - पुरोडाश आदि जितने पदार्थ पदार्थ लिए जाते हैं, सत्रका प्रकृतियज्ञ के साथ समतुलन देखा जाता है, किया जाता है । यदि इन पदार्थों में वैषम्य होजाता है, तो इन पदार्थों से उत्पन्न होने वाले दैवात्मा के अवयवों में भी उसी प्रकार वैषम्य होजाता है, —जैसे कि शुक्र — शोणित के अन्तर्य्याम - सम्बन्ध होने वाले प्रजायज्ञ के वैषम्य से उत्पन्न होने वाली सन्तान के अवयवों में वैषम्य होनाता है । इसलिए यज्ञिय पदार्थों में अत्यन्त ही जागरूकता रखने की आवश्यकता है । याज्ञिक पदार्थों में प्रविष्ट श्रसुरभाव को दूर करने के लिए ही ' पवित्रीकरण ' होता है । ' कुशा को मध्य में से छेदकर उसके दो भाग कर लिए जाते हैं । मूल एक रहता है । अग्रभाग के दो खण्ड कर दिए जाते हैं । अनन्तर प्रोक्षणीपानी में उस कुशा को निहित कर दिया जाता है । समय समय पर इसी पानी से इस कुश के द्वारा ' प्रोक्षणकर्म्म ' किया जाता है । संसार में कितने हीं पदार्थ यज्ञिय हैं, एवं कितने हीं अयज्ञिय हैं । यद्यपि ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार सभी पदार्थ यज्ञिय हैं । तथापि जिन पदार्थों में आंसुर प्राण की प्रधानता रहती है, वे पदार्थ यज्ञिय कहलाते हैं । एवं जिनमें देवप्राण की प्रधा-नता रहती है, वे यज्ञिय कहलाते हैं । इसप्रकार देव, और असुर, भेद से सर्ग दो भागों में विभक्त होजाता है । दैवी सृष्टि यज्ञिया है । एवं आसुरी सृष्टि यज्ञिया है । आसुरी सृष्टि के प्रयज्ञिय पदार्थ यदि यज्ञ में प्रविष्ट होजाते हैं, तो सुरभावापन्न होता हुआ यज्ञ नष्ट हो जाता है । . इसलिए यज्ञ में देवप्राण - प्रधान याज्ञिक पदार्थ ही लिए जाते हैं । विष्णु सोममय है । सोम यज्ञ का अन्यतम पदार्थ है । उसी सोमात्मक विष्णु का नाम यज्ञ है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । उसी विष्णुरूप पारमेष्ठ्य सोमभाग से दर्भ उत्पन्न हुए हैं, जैसा कि अनुपद में ही बतलाया जाने वाला है । ऐसी अवस्था में हम दर्भ को अवश्य ही यज्ञिय पदार्थ मानसकते हैं । यज्ञिय होते हुए ये पवित्र 1 ' पवित्र ' नाम से प्रसिद्ध ' ब्राह्मणस्पत्य ' सोम ही इनका प्रभव है । पारमेष्ठ्य विष्णु सोमवंशी है । इधर दर्भ भी यज्ञिय पदार्थों में श्रेष्ठतम है । पवित्रतम है । यज्ञिय पदार्थों में जो दोष जाते हैं, उह्न निकालने की शक्ति भी इसमें है । इस पवित्रकर्म्म के लिए ही पवित्रतम इन यज्ञिय - दर्भों का यज्ञ में ग्रहण किया जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है कि—

“ यज्ञो वै विष्णुः । ‘ यज्ञिये स्थ ' -- इत्येवैतदाह ” ॥१ ॥

हमारे शरीर में निरन्तर श्रासुरप्राण का आक्रमण होता रहता है । श्रात्मविरोधी धर्म्म का नाम हीं आसुरप्राण है । हमारे उपयोग में आनेवाले जितने भी पदार्थ हैं, उन सत्र में आत्मा के अनुकूल भी सामग्री है, प्रतिकूल भी सामग्री है । जिनमें प्रतिकूल - सामग्री अधिक मात्रा से रहती है, उह्नों हम अपने उपयोग में नहीं लेसकते | जिनमें प्रतिकूल - सामग्री कम होती है, वे ही हमारे भोग्य बनते हैं । विद्यमान हैं प्रत्येक में दोनों । इसी आधार पर ‘ गुणदोषमयं सर्वं स्रष्टा सृजति कौतुकी ' यह कहा जाता है । रूप, रस, गन्ध, स्पर्शं, शब्द, ये पाँचों इन्द्रियार्थं हैं । पाँचों में दोनों भाव हैं । रूप अच्छा भी होता है, बुरा भी होता है | रस ४२८