Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 671–680

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 671–680

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शतपथब्राह्मण वहाँ आपको इस कूर्म्मप्रजापति के भूतात्मक मूर्त्तस्वरूप के साक्षात् दर्शन होजायँगे । उस प्रान्त में खड़े होकर आप देखेंगे कि, चारों ओर का क्षितिज खगोल से मिल रहा है । वह गोल पार्थिव क्षितिज ही कूर्म्म का बुध्न है । ऊपर का वत्तुल खगोल ऊपरि भाग है । दोनों के मध्य में अन्तरिक्ष है । वही इस कूर्म्म का उंदर है । पृथिवी में अग्नि भरा हुआ है । अन्तरिक्ष मे वायु भरा हुआ है । घुंभाग में श्रादित्यप्राण है । पृथिवीरूप बुध्न में घनग्स है, अन्तरिक्ष रूप उदर में तरल रस है । द्युलोकरूप ऊपर के भाग में विरलरस | विरलर स आदित्यमय होने से ' मधु ' है । क्योंकि आदित्य ही मधुरस का अधिष्ठाता है । मध्य का तरलरसं घृत है । नीचे का घनरस दधि है । ये तीनों रस त्रैलोक्य के रस हैं । ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः ' के अनुसार तीनों के अतिरिक्त द्युलोक से ऊपर एक चौथा आपोलोक और बच जाता है । ' आपो ह्य ेतस्य ( सोमस्य ) लोकः ' ( श ० ४, ४.५, २१ ) के अनुसार ` यहीँ सोमलोक है | एवं ‘ अमृतं ह्यापः ' ( ताण्ड्य ० १,६,६,३ ) के अनुसार सोम अमृत है । यह कूर्म्म से बाहिर की वस्तु है । परन्तु त्रैलोक्यसृष्टि का आधार यही है । इसी पारमेष्ठ्य सोम की आहुति से प्रज्ज्वलित होता हुआ सूय्यं रश्मिमय बनता है । वे ही रश्मियाँ पूर्वकथनानुसार आगे जाकर पानी बनकर त्रैलोक्य की उत्पत्ति, एवं स्थिति का कारण बनतीं हैं । इसप्रकार सृष्टि के मूलाधार दधि, घृत, मधु, अमृत, ये चार रस होजाते हैं । ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगमश्रुति के अनुसार सम्पूर्ण त्रैलोक्य, एवं उसमें रहने वाली सम्पूर्ण प्र॒जाएँ इन्हीं चार रसों में अन्तर्भूत हैं । दधिभाग से अस्थि, मांस, त्वक् चर्म्म आदि घन भाग उत्पन्न होते हैं । घृत भाग से कफ, श्लेष्मा, रुधिर, आदि तरल भाग उत्पन्न होते हैं । मधु से शुक्र उत्पन्न होते हैं । अतएव शुक्र को शर्करा कहा जाता है । अमृत से मन बनता है । यही जीवनस्थिति का कारण है । प्रजामात्र दधि, मधु, आदि चारों रसों की समष्टि है । अतएव इनका जीवन इन्हीं से होता है । अन्नमात्र में तारतम्य से चारों रस विद्यमान हैं । जमे ) भाग है, वही दधि है । ' हुए दुग्ध का नाम ही दधि है । नो, गेहूँ, श्रादि में जो ' करण ' ( दाना वह पृथ्वीलोक की वस्तु है । जब गोधूमादि चूर्णों ( चून ) के साथ पानी का सम्बन्ध किया जाता है, तो चून में एक स्निग्धता आजाती है । स्नेहतत्त्व व्यक्त होजाता है । यही घृत है । यह अन्तरिक्ष को वस्तु है । प्रत्येक अन्न में ‘ माधुर्य्य - मिठास ’ होता है | यही मधु है । यह द्युलोक की वस्तु है । इन तीनों के अतिरिक्त अन्न में एक स्वाद ( जायका ) होता है । भिन्न भिन्न अन्न में भिन्न भिन्न स्वाद है | स्वादु अन्न अधिक प्रिय होता है | यह ' स्वाद ' ही अमृत है । यह मधु से सर्वथा पृथक् रस है । यह अमृत इन्द्र का प्रधान अन्न है | जहाँ सोम मिलता है, इन्द्र उसी क्षण उसका पान कर जाते हैं । तत्काल बने भोजन में जो अमृत है, थोड़े समय अनन्तर उस का वह अमृत निकल जाता है । यहीं अमृत मन का प्रधानं अन्न है । अतएव बिना स्वाद की वस्तु मनभावन नहीं बनती । यदि कलाकन्द में अमृत नहीं रहता है, तो मधुर रस रहते हुए भी मन उधर नही झुकता । अस्तु इस अप्राकृत प्रकरण को अधिक नहीं बढ़ाना चाहते । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि, दधि - मधु - वृतात्मक कूर्म्मप्रजापति ही सम्पूर्ण प्रजा का निर्माण करते हैं । सम्पूर्ण जगत् निरुक्त - मर्य्यादानुसार ' पश्यक ' नाम से प्रसिद्ध कश्यप से उत्पन्न ४०६

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प्रथमकाण्ड हुआ है । इसका स्वरूप मरीचि से उत्पन्न हुआ है । अतएव कश्यप के लिए ' कश्यपो वै मारीचः ' यह कहा जाता है | जैसा आकार कूपप्रजापति का है, वैसा ही कश्यप ( कछुए ) का है । अतएव इस प्राणी का कश्यप शब्द उस कूर्म्म से संलग्न हो गया है । एवं वह कुर्म्म शब्द कश्यप प्राणी से संलग्न होगया है । इसी विद्या को समझाने के लिए ऋषियोंनें इसका नाम ' कूर्म्म ' रख दिया है, उसका नाम कश्यप रख दिया है । सूर्य्यप्रजापति कुर्म्मावतार धारण करके ही प्रजानिर्माण में समर्थ होते हैं । वह त्रैलोक्य व्यापक कूर्म्स -प्रजापति दधि, मधु, घृत से नित्य अभिषिक्त रहते हैं । एवं उनके चारों ओर सोममय प्रापः - समुद्र ( अमृतः समुद्र ) व्याप्त रहता है । इसी विज्ञान के आधार पर चयनयज्ञ में उस कूर्म्मप्रजापति की चिति के लिए कछुए का चयन होता है | एवं उस पर दधि, घृत, मधु का लिम्पन किया जाता है । पानी के स्थान में उसके ऊपर, नीचें, दोनों ओर ‘ अवका ' ( आपोमय क्षुद्र शैवाल ) रक्खे जाते हैं । इसी पूर्वोक्त कूम्र्म्मावतार का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-कूर्म्ममुपदधाति । यो चै स एषां लोकानामप्सु प्रविद्धानां पराङ्सोऽत्यक्षरत्, स कूर्म्मः । स एष इमऽएव लोकाः । तस्य यदधरं कपालमयं स लोकः । अथ यदुत्तरं -सा द्यौः । अथ यदन्तरा- तदन्तिरक्षम् । इमानेवैतेल्लोकानुपदधाति । तमभ्यनक्ति - दध्ना, मधुना, घृतेन । दधि हैवास्य लोकस्य रूपम् । घृतमन्तरिक्षस्य । मध्वमुष्य । यत् कूम्र्म्मो - एतद्वै रूपं कृत्वा प्रजापतिः प्रजा असृजत । यदसजूत - अकरोत्तत् । यदकरोत् -तस्मात् कूर्म्मः । कश्यपो वै कूर्म्मः । तस्मादाहुः सर्वाः प्रजाः काश्यप्यः । अवका

अधस्ताद् भवन्ति, अवका उपरिष्टात् । आपो वा अवकाः । अपामेवैनमेतन्मध्यतो दधाति ॥

– श ० ७ कां ० । ४ प्र ० । २ ब्रा ० इति । नाम -सम्पूर्ण प्रजा के प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण - भूत इसी कुर्म्म प्रजापति को ' सम्वत्सर - प्रजापति ' कहते हैं । इस आदित्यात्मक सम्वत्सररूप कूर्म्मप्रजापति के १३ वबय हैं । इसके सम्बन्ध से उस दक्षवृत्त के १३ त्रिभाग होजाते हैं । वे तेरहों हीं देव, दानव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, मनुष्य कृमि, कीट, पशु, पक्षी, ओषधि, वनस्पति, धातु, विष, रस, आदि आदि यच्चयावत् स्थावर जगम - प्रजात्रों की जननियाँ हैं । पिता सूर्य्यरूप कूर्म्म है । इसी आधार पर ' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ' - यह कहा जाता है । यदि पूर्वोक्त सत्र दाक्षायणियों का संकलन किया जाता है, तो ६० विभाग होजाते हैं । ये ही दक्षप्रजापति की ६० कन्याएँ तत्तदेवताओं से उपभुक्त होकर तत्तत् प्रजा - निर्माण का कारण बनती हैं । यह है आधिदैविक - चरित्र । इसी से अध्यात्मसृष्टि होती है | एवं इसी से अधिभूतसृष्टि होती है । अतएव ' यदेवेह तद्मुत्र - यद्मुत्र तदन्विह ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार जो व्यवस्था अधिदैवत में हैं, वही अध्यात्म से समझनी चाहिए, एवं वही अधिभूत में भी । इसी भूमण्डल पर श्रादित्यादि मनुष्यदेवता थे । दक्ष प्रजापति ' थे । उनके ६० कन्याएँ थीं । उनका पूर्वक्रमानुसार तत्तन्मनुष्यदेवताओं के साथ विवाह हुआ था । इसी त्रिपुरीविज्ञान ( अध्यात्म - अधिभूत-अधिदैववत - विज्ञान ) को लक्ष्य में रख कर हमारा पुराणशास्त्र कहता है— * - इसी आधार पर ' जिसका कोई गोत्र नहीं, उसका कश्यप गोत्र ' - यह किंवदन्ती प्रचलित है | ४१०

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शतपथब्राह्मण

दत्तस्तु षष्टि - कन्यास्तु - सप्तविंशति ( २७ ) मिन्दवे ।

ददौ स दश ( १० ) धर्माय, कश्यपाय त्रयोदश ( १३ ) ॥ १ ॥

द्व े ( २ ) चैवाङ्गिरसे प्रादाद्, द्व े ( २ ) कृशाश्वाय धीमते । द्व े ( २ ) चैव भृगुपुत्राय, चतस्रोऽरिष्टनेमिने ( ४ ) ॥२ ॥ इति ।

इनं ६० दक्षकन्याओं में कश्यप के साथ सम्बन्ध रखने वालीं १३ दाक्षायणियों में से ' अदिति ' नाम की स्थिर दाक्षायणी का ही प्रकृत मन्त्र से सम्बन्ध है । सम्वत्सर के १३ विभाग सर्वथा नियत हैं । इनमें एक विभाग दिति है, एवं एक अदिति है । शेष को अप्राकृत होने से छोड़ा जाता है । सम्वत्सर - प्रजापति का दिति के साथ संयोग होने से यज्ञविरोधी दैत्य ( असुर ) उत्पन्न होते हैं, एवं अदिति के संयोग से यज्ञमूलक श्रादित्य ( देवता ) उत्पन्न होते हैं | दोनों हीं प्राजापत्य हैं । परन्तु दोनों में अश्वमाहिष्य है । एक अँधेरा है, तो दूसरा उजाला है । एक तमोमय प्राण है, तो दूसरा ज्योतिर्घन है । एक वर्ग देवेन्द्र से शासित है, तो दूसरा वर्ग वृत्र नाम से प्रसिद्ध असुरेन्द्र के शासन में हैं । एक सत्यानुयायी है, तो दूसरे ग्रनृत के उपासक हैं । एक बलवान् हैं, तो दूसरे बुद्धिमान् हैं । सम्वत्सरप्रजापति से उत्पन्न ये दोनों ही परस्पर निरन्तर स्पर्द्धा करते रहते हैं । · आधे खगोल में देवताओं का राज्य है । जितनी दूर में देवताओं का साम्राज्य है, वह खगोलमण्डल ' यज्ञिय मण्डल ' है । एवं आधे में असुरों का साम्राज्य है । वह ' अयज्ञिय मण्डल ' है । दोनों मण्डल स्थिर हैं | एवं आकल्पान्त स्थिर रहेंगे । इन में हमारा ' देवस्य त्वा सवितुः ' इत्यादि मन्त्र अदितिमय यज्ञ-मण्डल का ही निरूपण करता है । एक ओर स्वाती नक्षत्र है । दूसरी ओर अश्विनी नक्षत्र, और रेवती नक्षत्र, दोनों नक्षत्रों के मध्य की बिन्दु है । आकाश का यह प्रदेश ही अदितिमण्डल है । इस मण्डल के ठीक खस्वस्तिक में ( मध्य में ) अदिति है । इस मध्य स्थान पर ' पुनर्वसु नक्षत्र है । पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण पर ही अदितिबिन्दु है । पूर्व में स्वाती नक्षत्र पर्य्यन्त इस की व्याप्ति है । पश्चिम में अश्विनी -रेवती नक्षत्र की मध्य बिन्दु पर्यन्त व्याप्ति है । इस देवमण्डल में स्वाती से रेवती पन्त १३॥ नक्षत्रों का भोग है । • ठीक इतना हीं मण्डल दिति मण्डल है । पुनर्वसु नक्षत्र के ठीक ९ ८० अंश पर मूलनक्षत्र पड़ता है | यहीं दितिबिन्दु है | खस्वस्तिक पर अदिति है । अधःस्वस्तिक पर दिति है । दोनों दोनों मण्डलों के मध्य में प्रतिष्ठित हैं । दिति दरिद्रा है । निर्ऋति है । एवं यही तन्त्रशास्त्र की ‘ धूमावती ' है, तथा पुराणशास्त्र की — ‘ अलक्ष्मी, एवं नक्षत्रविद्यानुगता ' अवरोहिणी ' ( ' ज्येष्ठा ' नामक नक्षत्र है । ठीक इसके विपरीत अदिति ' ऐश्वर्य्यशालिनी ' है, यही तन्त्रशास्त्र की - ' कमला ' है, तथा पुराणशास्त्र की ' लक्ष्मी, ' एवं नक्षत्रविद्यानुगता - ‘ रोहिणी ’ * हैं । * भारतराष्ट्र के सांस्कृतिक ऐश्वर्य्यं के पुनः संस्थापक भगवान् वासुदेवकृष्ण के आविर्भाव ने अदितिरूप इसी रोहिणी नक्षत्र को धन्य बनाया था । ४११

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प्रथमकाण्ड मूलनक्षत्र की अभिमानिनी देवता यही दिति है । अतएव मूलनक्षत्र में उत्पन्न होने वाला प्राणी महा दरिद्री, अति क्रूरकर्म्मा होता है । पुनर्वसु सम्पत्ति से युक्त है । इन नक्षत्र में खोई हुई वस्तु भी मिल जाती है | ज्योतिःशास्त्र के अनुसार इस का अभिमानिनी देवता अदिति है । इस अदिति का इस पुनर्वसु नक्षत्र के तृतीय चरण से सम्बन्ध है । अतएव इस स्थिर अदिति को हम अवश्य ही नक्षत्रमूला अदिति कह सकते हैं । मन्त्रसम्बन्धी विज्ञान उपरत हुआ । अत्र मन्त्रार्थ की ओर ही आपका ध्यान आक-र्षित किया जाता है । सैषा - नक्षत्रमूला - अदितिः ३ सविता को स्वाती नक्षत्र कहते हैं । यद्यपि सभी नक्षत्र स्थिर हैं । तथापि पृथिवी - परिभ्रमण के कारण इन को दृश्यमण्डल के अनुसार ' चल ' मान लिया जाता है । नक्षत्रों का उदयकाल ही इनका प्रसव-काल है । पूर्वक्षितिज में जिस नक्षत्र का उदय होता है, वही काल उस नक्षत्र का प्रसवकाल माना जाता है । ' सविता देवता के प्रसव में ' इस वाक्य का यही पर्थ है कि, स्वातीन चत्र जिस समय पूर्व क्षितिज पर उदित हुआ हो । जिस समय स्वाती नक्षत्र का पूर्व क्षितिज पर उदय होता है, उस समय पश्चिम क्षितिजस्थ अश्विनीनक्षत्र डूब जाता है । और पूत्रानक्षत्र ( रेवती ) डूबने वाला होता है । उत्तर, दक्षिण - ध्रुव पर्य्यन्त इन नक्षत्रों के प्राण का प्रसार रहता है । दक्षिणध्रुव पर्यंन्त फैला हुआ नक्षत्रिक प्राण उस नक्षत्र की दक्षिणभुजा है । एव उत्तरध्रुव पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला प्राण उस नक्षत्र की बामभुजा है । वह अदितिबिन्दु ठीक इस उत्तर - दक्षिण - ध्रुव के मध्य में पड़ती है । यहाँ तक अश्विनी - पूषा का ‘ करप्रसार ' है । पञ्चाङ्ग ुलियों से युक्त हस्त ' हस्त ' है । शेष सम्पूर्ण भाग बाहू है 1 | बाहू पीछे हैं, हस्त आगे है । ठीक यही स्थिति अश्विनी और पूषा की है । अश्विनीनक्षत्र पीछे हटा हुआ है, एवं पूषा आगे है 1 । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ' अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ' कहा है । यह अदिति ' नारी ' है । नारी से ' मारुती ' अभिप्र ेत है । मरुत्प्राण की शक्ति ही ' मारुती ' है । जिस में ' मारती ' प्रधान होती है, प्रजासृष्टि में वह ' स्त्री ' बनती है । एवं जिस मे ' मरुत् ' प्रधान होता है, वह ' पुरुष ' बनता है । इस विषय में अभी बहुत कुछ वक्तव्य है । परन्तु विस्तारभय से अधिक नहीं लिखा जासकता । प्रकरण का उपसहार करते हुए अन्त में हम यही बतला देना चाहते हैं कि, आज यह यजमान यज्ञ कर रहा है । अतएव इसे यज्ञमण्डल की सम्पत्ति प्राप्त करना नितान्त अपेक्षित है । यद्यपि पूर्वोक्त नक्षत्रमूलक - अदितिरूप यज्ञमण्डल सर्वथा स्थिर है । तथापि ÷ -'हस्त ', ( श्रृङ्ग ु लियुक्त समणिबन्ध हाथ ), एवं ' बाहु ' इन दोनों की आकृति के ज्योतिश्चक्रा-त्मक खगोल में दो नक्षत्रमण्डल हैं । ये दोनों हीं ' हस्त ' नाम से प्रसिद्ध हैं । बाहुयुक्त हस्त का ही उस-' गजच्छाया ' से सम्बन्ध है, जिसकी आश्विन मासीय पितृपक्ष में अभिव्यक्ति मानी गई है । इसकी आकृति ठीक ‘ भुजा ' जैसी ही है । दूसरा पाँच नक्षत्रों की समष्टिरूप - ठीक पञ्चाङ्ग ुलि के आकार से समतुलित सुप्रसिद्ध ' हस्त ' नक्षत्र है, उसी का यहाँ ग्रहण है । ४१२

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शतपथब्राह्मण पृथिवी - परिभ्रमण के कारण यह परिवर्तित होजाता है । नियत समय पर ही अदितिमण्डल का श्रागमन होता है । अत: जहाँ तक बन पड़, उसी काल में यज्ञ करना चाहिए । यदि वह काल न हो, तो मन्त्रशक्ति के द्वारा उस काल की भावना कर लेना तो अत्यन्त ही आवश्यक है । आज उसी काल - सम्पत्ति को भावना के द्वारा अपने यज्ञ में प्राप्त करने के अभिप्राय से अध्वर्यु ' ' देवस्य त्वा ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ शकट से हविग्र हुण करता है । प्रकृतियज्ञ के सविता आदि देवता सत्यसंहित हैं । अतः उन की भावना से गृहीत श्रन्न अवश्य ही सत्यसम्पत्ति से युक्त होता हुआ ' यज्ञिय ' बन जाता है । इसी सम्पूर्ण विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा हैं— स ' तत् सत्येनैवैशद् गृह्णाति ॥ १६ ॥

यदितिमण्डलपरिलेखः अश्विनी 00 व उत्तरध्र 5 4 श्चि बाहू बाम हस्त बाम पूषा ( रेवती ) ० ०० पुनर्वसू अदितिः दक्षिण हस्त क्षि ति ज दक्षिणाहू II दक्षिणध्रुव भिन्न भिन्न कर्म्म में भिन्न भिन्न देवता होते हैं । तत्तत् कर्म्म में तत्तद्द ेवसम्बन्धी हविद्रव्य का सम्पा— दन करना पड़ता है । जिस समय अध्वर्यु पुरोडाश - सम्पादन के लिए हविग्रहण करता है, उसी समय तत्-४१३

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प्रथमकाण्ड कर्म्म - सम्बन्धी देवताओं का नाम निर्दोश कर देता है । तात्पर्य यही है कि, कर्म में जिन देवताओं को आहुति दी जाती है, हविग्र ' हणकाल में हीं उन देवताओं का आहुति क्रम से नामनिद्दश कर के ही हविग्रहण करना चाहिए । कारण इस का यही है कि, अध्वर्यु ' ' मैं आज प्राणमय देवताओं के यजन के लिए शकट से हत्रिर्ग्र-हग करता हूँ? यह भावना रखता हुआ ही हविग्रहण करता है । भावना मन का व्यापार है । मन सोममय है । सोम देवताओं का अन्न है । भावना होते ही प्रकृतिमण्डल में व्याप्त आग्नेयप्राण - प्रधान सभी देवता इस की ओर आकृष्ट हो जाते । सभी देवता ' मेरे लिए हविग्रह करता है - मेरे लिये. हर्ग्रहण करता है - यह समझने लगते हैं । नामनिर्देश के बिना जैसे सजातीय ब्राह्मणों में ' नहीं यह मुझे मिलेगा- नहीं यह मुझे मिलेगा ' इसप्रकार समद ( झगड़ा ) होने लगता है, तथैव यहाँ भी देव-तात्रों में समद होने की सम्भावना है । समद क्षोभ का कारण है । क्षोभ अशान्ति का मूल हैं । अशान्ति दुःख की जननी है । यज्ञ किया जाता है सुखरूप स्वर्ग भी प्राप्ति के लिए । तदर्थं यज्ञिय प्राणदेवताओं को आहुति के द्वारा प्रसन्न कर उन से स्वर्ग प्राप्ति के द्वारा साधनभूत दिव्यात्मा उत्पन्न किया जाता है । इधर नामनिर्द्दश के बिना देवताओं में क्षोभमूलक समद सम्भावित है । फलतः सम्पूर्ण यज्ञ व्यर्थ हो जाता है । इस-लिए उचित है कि, हविग्रहणकाल में देवताओं में क्षोभ न हो । इसका उपाय है नामनिर्द्दश । नाम निर्द्देश से ‘ नहीं यह मेरा है - नहीं यह मेरा है ' यह भाव हट जाता है । जिस का नाम लिया जाता है, वही देवता यज्ञ में उपस्थित होजाता है । परस्पर असमद ( शान्ति ) होजाता है । इसलिए नामनिर्दोश करके ही हविग्रहण करना उचित है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है— ' ताभ्य एवैतत् सहमतीभ्यो ऽसमदं करोति ॥ १८ ॥

समद इटाना नामनिर्दोशपूर्वक हविग्रहण का पहिला प्रयोजन है । देवताओं पर अभीष्ट फल प्रदान का उत्तरदायित्त्व डालना दूसरा प्रयोजन है । जिन देवताओं के लिए अध्वर्यु ' हत्रिग्रहण करता है, वे सभी देवता उस हविर्ग्रहण से अपने आपको उस यजमान का ऋणी समझने लगते हैं । शनि, मंगल, बृहस्पति, आदि तो ग्रह हैं ह्रीं । परन्तु सत्र ग्रहों में प्रधान, एवं बलिष्ठ यह ' अन्नग्रह ' ही माना गया है । अन्न से गृहीत वस्तु अन्नप्रदाता के साथ श्राबद्ध होजाती है । सम्पूर्ण विश्व ६. ग्रहों से श्राद्ध है । एवं विश्व को बन्धन में रखने वाले स्वयं नवग्रह अन्न से आबद्ध हैं । सब ग्रह ही क्या, जड़ चेतनात्मक सम्पूर्ण पदार्थ इस अन्नग्रहदशा से सतत श्राक्रान्त हैं । सत्र सत्र को अन्न प्रदान कर रहे हैं, साथ ही इस प्रदान के प्रतिफल में आदान भी कर रहे हैं । लेने वाले ' अन्नाद कहलाते हैं । जो द्रव्य लिया जाता है, वह ' अन्न ' कहलाता है । सब अन्नाद हैं, सब अन्न हैं । अग्नितत्त्व अन्नाद है | अन्नतत्त्व सोम है । विश्व में अग्नि - सोमरूप अन्नाद, अन्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, इसी आधार पर ' अन्नादश्च वाऽइदं सर्व-मन्न ं च ' ( शत ० २१ का ० १ ० ६ ब्रा ० १६ कं ० ) यह कहा जाता है । ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' इस श्रुति का भी यही रहस्य है । बतलाना इस से यही है कि, अन्न सत्र ग्रहों का ग्रह है । इसी अन्नग्रह से गृहीत वस्तु ' अन्नदाता ' के प्राधीन होजाती है । इसी अन्नग्रहता का निरूपण करती हुई ग्रहोपनिषत् - श्रुति कहती है-‘ एष वै ग्रहः - य एष तपति । वागेव ग्रहः चाचा हीदं सर्वं गृहीतम् । नामैव ग्रहः । नाम्ना हीदं सर्वं गृहीतम् । अन्नमेव ग्रहः । अन्नेन हीदं सर्वं गृहीतम् । तस्माद्यावन्तो नोऽ-४१४

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शतपथब्राह्मण शनमश्नन्ति, ते नः सर्वे गृहीता भवन्ति । एषैव स्थितिः । स य एष सोमग्रहः, अन्न वा एष सः । स यस्यै देवतायाऽएतं गृह्णन्ति, सास्मै देवता एतेन ग्रहेण गृतीता तं कामं सर्मद्धयति, यत् काम्यां गृह्णन्ति ' इति । सचमुच अन्नग्रह ऐसी ही वस्तु है । ' यावद् वित्तं तावदात्मा ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार भूत-सम्पत्ति पर्य्यन्त मनः प्राणवाङमय आत्मा की रश्मियाँ व्याप्त रहतीं हैं । दूसरे शब्दों में अन्न में अन्नस्वामी का आत्मा प्रविष्ट रहता है । इस अन्न के द्वारा अन्नप्रदाता का भूतात्मा अन्नगृहीता में प्रविष्ट होजाता है । अन्न से ही रस - मल – के क्रमिक विशकलन से मन बनता है, जैसा कि पूर्व प्रकरणों में स्पष्ट किया जा चुका है । क्यों कि अन्न में देने वाले का मन बैठा है, अतएव लेने वाले का मन अन्न के प्रभाव से देने वाले के मन से आक्रान्त हो जाता है । इस बन्धन के प्रभाव से उस को उस देने वाले की इच्छा के श्राश्रित होजाना पड़ता है । चाहे न्याय हो, अथवा अन्याय, यदि आपने अन्नग्रह से उसे गृहीत कर लिया है, तो अवश्यमेव उसे वह काम करना हीं पड़ेगा । महाधर्म्मज्ञ कुरुकुलभूषण भीष्म पितामह, परमनीतिज्ञ विदुर, गुरुवर द्रोणा— चार्य्य, श्रादि महापुरुषों को दुर्योधन- प्रदत्त इसी अन्नग्रह से गृहीत होकर अन्नप्रदाता दुर्योधन की अधर्म्ममूला इच्छाओं का भी साथ देना पड़ा था । आज यह यजमान इसी अन्नग्रह से उन प्राणदेवताओं को अपने वश में कर उन से स्वर्गफल लेना चाहता है । ऐसी अवस्था में नामग्रहण करके ही हविग्रहण करना उचित है । यदि नाम ले लिया जाता है, तो देवता अपने ऊपर उस कामना का उत्तरदायित्त्व समझने लगते हैं । यदि नाम नहीं लिया जाता है, तो ‘ न जाने किस के लिये हविर्ग्रहण किया जाता है ' यह सोचते हुए देवता फल की ओर से उदासीन होजाते हैं । देवताओं की इस फल सम्बन्धिनी उदासीनता को हटाने के लिए ही नामग्रहण किया जाता । नामग्रहण की यही दूसरी उपपत्ति है । जिस क्रम से ग्राहुति दी जाती है, उसी क्रम से नाम बोल बोल कर हविग्रहण किया जाता है । इसप्रकार ' यथादेवतमन्यत् ' ( का ० श्र ० २।२ कं ० ) के अनुसार अन्य-देवताओं के लिए यथापूर्व ग्रहण करके - || १६ || T ग्रहण करने से अतिरिक्त बचे हुए शकटस्थ अन्न का ' भूताय त्त्वेति शेषाभिमर्शनम् ' ( का ० श्रौ ० ) के अनुसार ' भूताय त्त्वा नारातये ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु स्पर्श करता है । जितना सा हवि उस शकट में से ले लिया है, वह देवताओं के उपयोग में आवेगा । देवताओं का हवि बन कर वह भाग समृद्ध होगा | परन्तुं जो अन्न शकट में बच गया है, उस का क्या उपयोग? | क्या वह निरर्थक जायगा? । क्या वह यों ही पड़ा रहेगा? | यदि ऐसा होगा, तो वह समृद्धि से बाहिर की वस्तु रहेगी । ' अन्न की समृद्धि वही कहलाती हैं कि, वह प्राणियों के उपयोग में आवें । ' राति, ( दान ) ही अन्न की समृद्धि है । दान, भोग, दो समृद्धियाँ हैं । जो न सम्पत्ति देता है, न स्त्रयं भोगता है, वह नष्ट ही होजाती है * । जितनासा हवि देवताओं के लिए निकाल लिया गया है, वह तो आहुति के द्वारा यजमान का दिव्यात्मा बनेगा । दूसरे शब्दों * - दानं, भोगो, नाश, स्त्रिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य । यो न ददात्ति, न भुङ्क्त े , तस्य तृतीया गतिर्भवति ॥ – प्रसिद्धा सूक्तिः ४१५

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प्रथमकाण्ड में वह तो यजमान का भोग्य बनेगा । परन्तु शेष भाग का क्या प्रबन्ध? | क्या वह ' अराति ' के लिए है १ । यों ही पड़ा रहेगा? । यादें ऐसा ही होगा, तो समृद्धिरूप आप्यायनधर्म से वह शकटस्थ अन्न रहित होता हुआ क्षोभ उत्पन्न कर देगा । क्षोभजनिता अशान्ति का सम्बन्ध यज्ञ में होगा । इसी क्षोभ को हटाने के लिए ' भूताय ० ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ' उस का स्पर्श करता है । शकटस्थ अन्न भी व्यर्थ नहीं है । गृहीत द्रव्य यदि प्राणाग्नि में हुत होने से समृद्ध है, तो शेष अन्न भूत-स्वरूप सान्तपनाग्नि ( ब्राह्मण ) में हुत होने के लिए है । उस का भी विशेष उपयोग है । बतलाना इससे यही है कि, शकटस्थ शेष अन्न को ब्राह्मणभोजनादि, यज्ञदानादि उत्तम कार्यों में हीं लगाना चाहिये । शास्त्र-विरुद्ध अधर्म्मकार्य्य में उसका कदापि उपयोग नहीं करना चाहिये! एक बात और । ' भूताय त्वा ० ' यह साकांक्ष शब्द है । अतः ‘ परिशेषयामि ' इस का अध्याहार कर ' भूताय त्वा नारातये परिशेषयामि ' यह बोलना चाहिये । इसप्रकार ऐसा बोलता हुआ अध्वर्यु ' जहाँ से ( शकट से ) हविग्रहण करता है, उसी स्थान पर स्थित उस अन्न को दानरूप आप्यायनधर्म से युक्त कर देता है ॥ २० ॥

इसप्रकार यथापूर्वं हविग्र हणानन्तर शकटस्थ अन्न का स्पर्श करने के अनन्तर वह अध्वर्यु ' वहीं खड़ा ‘ स्वरभिविख्यषेम् ’ यह मन्त्र बोलता हुआ पूर्वदिशा की ओर देखता है । विश्वसृष्टि ज्योति, पाप्मा, भेद से दो भागों में विभक्त है । ज्योतिर्म्मयी सृष्टि देवसृष्टि है, एवं पात्मासृष्टि असुरसृष्टि है । प्रत्येक सृष्टि में दोनों भाव हैं | देवता, असुर, दोनों के समन्वय से ही प्रत्येक पदार्थ का निर्माण होता है | पाप्मा भूत है, ज्योति देवता है । देवता प्राण है, भूत वाक् है । भूत उस वस्तु का स्थूलशरीर बनता है, देवता सूक्ष्मशरीर बनता है । दोनों से कारणशरीररूप भूतात्मा वेष्टित रहता है । देवप्राण ज्ञानमय हैं, भूत अविद्यामय है, आवरणरूप है । देवता सत्यसंहित हैं, भूत बलसंहित हैं । एक बलवान् है, दूसरा ज्ञानवान् है । बलरूप भौतिक प्रपन्न आत्मा का विरोधी धर्म है । ज्ञानरूप देवप्रपञ्च आत्मा का स्वरूपधर्म है । देवप्राण ' प्राण ' है । इसका उक्थ ( प्रभव ) सूर्य्य है । इसी आधार पर सूर्य्यं के लिए ' चित्रं देवानामुद्गात् ' – ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः ’ इत्यादि कहा जाता है | असुरप्राणप्रधान भूतों का उक्थ पृथिवी है । सौर देवता बृहत्साम से युक्त हैं । श्रुत-एव उनकी व्याप्ति सम्पूर्ण त्रैलोक्य में है । एवं पाप्पारूप असुर परिच्छिन्न हैं । ससीम हैं । ससीमता पाप्मा का पहिला रूप है । ज्योति में विकास है, संकोच नहीं । पाप्मा में संकोच है, विकास नहीं । जिस शकट से अध्वर्यु ' ने हविग्रहण किया है, वह सीमित है । स्वयं शकट भी सीमाभावापन्न है । एवं शकटस्थ अन्न भी शकट, और वस्त्र से वेष्टित होने के कारण परिवृत है । अतएव हम अवश्य ही इस शकट को पाप्मा से युक्त मानसकते हैं । वह ग्रध्वर्यु अन्नग्रहण करता हुआ इस पाप्मा से युक्त होजाता है, अन्न ग्रहण करता हुआ परिच्छेदरूप पाप्मा को भी ले लेता है । इसे इस हत्रि के द्वारा ज्योतिम्य देवताओं का यजन करना है । पाप्मा उन का विरोधी है । ऐसी अवस्था में यदि यह पाप्मा - भाव अध्वर्यु में रह जायगा, तो आहुति देते समय भावना में प्रविष्ट यह पाष्मा भी आहुति के द्वारा देवताओं से निष्पन्न होने वाले उस यज्ञरूप दैवात्मा में प्रविष्ट हो जायगा | अतएव उचित है कि, अध्वर्यु हविग्रहण करते ही उस धामा को अपनी भावना से निकाल दे । इसका उपाय है - पूर्वदिशो-४१६

पृष्ठ 679

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 679 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण पलक्षित सूर्य की ओर देखना । सूर्य्य ज्योतिर्धन है । पात्मा तम है । तम का सूर्य्य घोरशत्रु है । जहाँ सौर प्रकाश रहता है, वहाँ तम कदापि नहीं रह सकता । शकटस्थ अन्न, और शकट, दोनों हीं भौतिक पदार्थ हैं । अतएव दोनों हीं पाप्मा से संसृष्ट है । परन्तु स्वर्गलोक ज्योतिर्मय होने से पाप्मा - शून्य है । आज सूर्य्य-रूप पूर्वदिशोपलक्षित स्वर्ग की ओर दृष्टि निक्षेप करता हुआ अध्वर्यु अपने संकोचरूप तमोमय पाष्मा - भाव को ही हटाता है । स्वर्ग, अहः, सूर्य्य, स्वर, देव, यज्ञ, ये छत्रों कहने को भिन्न पदार्थ हैं । वस्तुतः —६ नों एक ही ज्योतिस्तत्त्व है । सूर्य्य ही स्वर्ग है । यही अहः है । यही देव है । यही यज्ञ है | आग्न में सोम की हुति होने का नाम हीं यज्ञ है । सूर्य्याग्नि में निरन्तर पारमेष्ठ्य ' ब्रह्मणस्पति ' नाम से प्रसिद्ध ' पत्र -त्रसोम ' की * आहुति होती रहती है । इस सोमाहुति के प्रभाव से ही सूर्य्य ज्योतिर्म्मय बन रहा है । इसी हुति के कारण हम सूर्य को यज्ञ कह सकते हैं । प्रकाश का नाम अहः है । तम का नाम रात्रि है । अहः-प्रकाश सूर्य्य का प्रकाश है । वही अहो - रूप परिणत हो रहा है । अतएव हम सूर्य्यं को ' ह ' भी कहसकते हैं । पृथिवी की वाक् जैसे ' अनुष्टुप् ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव सौरीवाक् ‘ स्वर ' नाम से प्रसिद्ध है । अनुष्टुप वर्णों की अधिष्ठात्री है । सूर्य्यपिण्ड स्वरवाङमय है । इसलिए भी हम सूर्य को ' ' स्वर ' कह सकते हैं, एवं तीन स्वरसामों के ' सम्बन्ध से भी सूर्य्य को स्वर कहा जासकता है । पृथिवी के २१ वें ऋर्गर्हण पर सूर्य्य प्रतिष्ठित है । इसी आधार पर ' एकविंशो वा इत आदित्य ः ' - यह कहा जाता है । प्राकृ-तिक यज्ञों में एक यज्ञ- ' नवाह यज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध यज्ञ हैं । इस यज्ञ में अहर्गण होते हैं । एक एक अह— र्गण एक एक ग्रहः कहलाता है । अवएव यह यज्ञ ' नवाइयज्ञ ' कहलाता है । पृथिवी के १७ वें अहर्गण से श्रारम्भ कर २५ वें अहर्गण पर्य्यन्त इस यज्ञ की व्याप्ति है । इस नवाहयज्ञ का केन्द्र इक्कीसवाँ अहर्गण है । १७–१८-१६–२० ये चार ग्रहगण नीचे हैं, २२-२३-२४-२५ ये चार अहर्गण ऊपर हैं, मध्य में २१ वाँ है, इसी पर सूर्य्य प्रतिष्ठित है, यही आहवनीयाग्नि है, इसी में निरन्तर सोमाहुति होती रहती है । इसी का नाम नवाह यज्ञ है | इतनी दूर में कभी तम का प्रवेश नहीं होपाता । श्रतएव पौराणिक परिभाषा में · यह यज्ञमण्डल ' श्वेतद्वीप ' नाम से प्रसिद्ध है । इस द्वीप के चारों ओर पानी ( वायुरूप पानी ) भरा हुआ है । इस आपोमय मण्डल के मध्य में श्वेतद्वीप में यज़मूर्त्ति सत्यनारयण भगवान् प्रतिष्ठित हैं । चातुर्मास्य के कारण पार्थिव त्रिविक्रम विष्णु ८ मास जागते हैं, ४ मास सोते हैं । पारमेष्ठ्य x गोलोकवासी गोविन्दविष्णु सदा ही पोमण्डल में प्रविष्ट रहने के

* –पवित्र ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्येषि विश्वतः ।

अतप्ततनूर्न तदामो समश्नुते शृतास इद्वहन्तस्तत्समाशत ॥

- ऋक्संहिता X इस विषय का विषद विवेचन गीताभाष्यान्तर्गत आचार्य्यरहस्य के ' परमेष्टीकृष्णरहस्य ' नामक प्रकरण में देखना चाहिये । ४१७

पृष्ठ 680

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 680 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड कारण सदा ही सोते रहते हैं । परन्तु श्वेतद्वीपनिवासी सूर्यनारायण भगवान् सदा ही जागते रहते हैं । ' श्रीच ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ के अनुसार इनके ' श्री ' और ' लक्ष्मी ', दो पत्नियाँ हैं । इस मण्डल में कभी पानी का प्रवेश नहीं होता, इसी आधार इन्हें सदा जाग्रत कहा जाता है । इस नंवाहयज्ञमण्डल का ही नाम ' स्वर्ग ' है । इसमें १७ वाँ स्वर्ग ' त्रिणाचिकेतस्त्रर्ग ' कहलात हैं, २१ वाँ स्वर्ग ' ब्रध्नस्य विष्टुप् ' कहलाता है, इसी को ' नाकस्वर्ग ' भी कहते हैं, एवं २५ वाँ स्वर्ग ‘ प्रत्ननाक ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रत्ननाक में इन्द्रविद्य तु है । यही अहर्गण ' अविवाक्यमहः – महाव्रत'-अदि नामों से भी प्रसिद्ध है । पुरोणों में यही स्वर्ग ' पुनर्मार ' ( यत्र गत्वा न पुनम्रियन्ते ) ' अशोक-महिम ', आदि नामों से प्रसिद्ध है । यही पहिला ' इन्द्रविप ' किंवा इन्द्रस्वर्ग है । यही इन्द्रपद है । मध्य का ' एकविंश स्वर्ग ' विष्णुविष्प ' कहलाता है | उपक्रम - स्थानीय मध्य का १७ वाँ स्वर्ग अग्निप्रधान होने से ‘ ब्रह्मविष्टुप् ’ कहलाता है । * कठोपनिषत् में नचिकेता के प्रश्न करने पर यमराज ने इसी ‘ स्वर्ग्याग्नि ’ का निरूपण किया है । इन पूर्वोक्त तीनों स्वर्गों की समष्टि ही ' त्रिविष्टप ' नाम से प्रसिद्ध है । इनमें प्रारम्भ का १७ वाँ नचिकेतस्वर्ग सामवेद में ' अभिजित् ' कहलाता है । एवं २५ वाँ प्रत्ननाक ' विश्वजित् ' कहलाता है | इन्हीं दोनों का स्पर्श करता हुआ भूपिण्ड बृहती - केन्द्रस्थ सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाता रहता है । उस श्रोर विश्वजित् है, इस ओर अभिजित् है । दोनों के मध्य में ७ अहर्गण है । ' सप्त वै देवस्वर्गाः ' - ( व्याससूत्र ) वाले प्रसिद्ध सात देवस्वर्ग ये ही सात ग्रहर्गण हैं 1 । वे सातों देवस्वर्ग अग्नि, वायु, इन्द्र, सूर्य्य, वरुण, मृत्यु, ब्रह्मा, इन ७ देवताओं के भेद से क्रमश: अपोदक, ऋतधामा, अपराजित, ब्रध्नस्यविष्टप ू, अधिद्यौ, प्रद्यौ, रोचन, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । तैतिरीय संहिता में ( १७ | ५ | ) ब्राह्म स्वग को ' विभात् ' नाम से भी व्यवहृत किया हैं । साम का स्वरूप बतलाते हुए ताण्डथब्राह्मण में ( तां ० १६ - १०, १८ - २ ) पूर्वोक्त स्वर्गों का -विशद निरूपण किया गया है । अधिक जिज्ञासा रखने वालों को वही प्रकरण देखना चाहिए । यहाँ इस सम्पूर्ण प्रपञ्च से केवल यही बतलाना है कि, पूर्वोक्त सातों देवस्वर्गों में से मध्य के २१ वें ब्रघ्नस्य विठुप में सूर्य्यं प्रतिष्ठित है । तीन देवस्वर्ग इसके ऊपर हैं, तीन नीचे हैं । इनमें सूर्य्य की स्वरवाक् अभिव्याप्त रहती है । श्रुतएव ये ऊपर नीचे के ६ ओं साम सामवेद में ' स्वरसाम ' नाम से प्रसिद्ध हैं | तीन स्वरसाम सूर्य्य के नीचे है, तीन स्वरसाम सूर्य के ऊपर हैं । प्रसङ्गागत इतना और समझ लेना चाहिए कि, सूर्य्यप्रतिष्ठारूप २१ वाँ अहर्गण ‘ विषुवदहः ' नाम से प्रसिद्ध है ÷ । स्वरसामावच्छिन्न इसी सौरमण्डल का नाम स्वर्ग है । श्रुत-एव हम अबश्य ही सूर्य्य को स्वर्ग कह सकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है — * इस विषय का निरूपण कटभाष्य में देखना चाहिए । ÷ ‘ स्वभानुर्ह वा श्रादित्यं तमसाविध्यत् ' इत्यादि का इसी स्वरसाम से सम्बन्ध है | स्वरसाम ही ग्रहण का जनक है, जिसका कि विशद निरूपण ' ग्रहणविज्ञान ' नाम के स्वतन्त्र निबन्ध में द्रष्टव्य है । ४१८