Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 721–730
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 721–730
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शतपथब्राह्मण ताश ( तन्मध्यस्थ यज्ञिय कम्र्मों से अनुप्राणिता मंन्त्रात्मिका दैवीवाक् के अतिरिक्त ) मानुषी ( व्यावहारिकी लौकिकी ) वाक् बोल पड़े, तो उसे निश्चयेन तत्काल ही इस त्रुटि के पुनःसन्धान के लिए ( प्रायारचित्त के रूप में वैष्णवी - विष्णु - देवता सम्बन्धिनी -- ऋचा *, अथवा तो वैष्णत्र यजुः ÷ मन्त्र का जप कर लेना चाहिए | क्योंकि यज्ञ निश्चयेन विष्णुस्वरूप है । तद्देवानुगत मन्त्र बोलता हुआ इस वैष्णववाग्यज्ञ से वह अध्वर्यु - मानुषदोष से व्यवच्छिन्न होजाने वाली यज्ञधारा को पुनः संहित कर लेता है । यही इस दोष का प्रायश्चित्तं है । ( प्रकृत का अनुसरण करती हुइ आगे जा कर श्रुति कहती है कि, ) - इसप्रकार - ' उलूखल में प्रक्षेपार्थ हविर्ग्रहण करता हुआ – ‘ अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनम् ' इस मन्त्र - भागोच्चारण से बाग्-विसर्जन करता हुआ वह अध्वर्यु -- ' देववीतये वा गृह्णामि ' इस शेषांशोच्चारण के साथ ही हवि उलूखल में सर्वात्मना स्थापित कर देता है । यह हवि यज्ञिय - देवताओं का सन्तर्प-णात्मक भक्षण बनती है । इसी उद्देश्य से हविग्रह होता है || || ( उलूखल में हविः प्रक्षेपानंन्तर ) वह अध्वर्यु ' - ' बृहद्ग्रावेति मुसलमादत्त ' ( का ० श्रौ०-२ | ४ | ११ ) के अनुसार – ‘ बृहदग्रावासि वानस्पत्य: ' ( हे मुसल! आप घनता को चूर्णित- -कर देने वाले पाषाणवत् दृढावयव बनते हुए मानो ) काष्ठमय विशाल ग्रावा ( पाषाण ) ही हैं ) यह् मन्त्र बोलता हुआ ‘ मुसल ' का ग्रहण करता है । सचमुच यह मुसल वानस्पत्य- हुआ -होता भी बृहद्ग्रावासम ही है । तदनन्तर - ' स इदमित्यवदधाति ( का ० श्र ० २ | ४ | १२ | ) केअनुसार ‘ स इदं देवेभ्यो हविः शमी व सुशमि शमीव ', ( यह मुसल देवताओं के लिए हविः का ही संस्कार करता है । अतएव हे शोभन संस्कारक! आप देवताओं के लिए सम्यगुरूपेण ह॒विः– का शमनात्मक संस्कार करते हुए यहाँ प्रतिष्ठित बनें ) यह मन्त्र बोलता हुआ वह व मुसल को हविः पूरित उलूखल में प्रतिष्ठित कर देता है । मन्त्रभाग से - हे मुसल! आप भली-माँति सुसंस्कृत इस हवि को ही देवताओं के लिए सुसंस्कृत बना दीजिए, यही कहा गया है ॥१० ॥
( मुसलग्रहण, तथा उलूखले तत्स्थापनानन्तर -6-'हविष्कृदेहीति - त्रिराह्वयति ' ( का ० श्र ० सू ८ | २ ४ | १३ | के अनुसार ) वह अध्वर्यु - ' हविष्कृदेहि, हविष्कृदेहिं ' इस मन्त्र का तीन तीन बार उच्चारण करता हुआ हविष्कृत् का ही आह्वान करता है । ( प्रकृतिसिद्ध नित्ययज्ञ में ) वाक् ही ह॒विष्कृत् है । उक्त मन्त्रवाक् बोलता हुआ अध्वर्यु ' उस हविष्कृत् - वाक् का ही उच्चारणात्मक ** -‘अङ्घ्रिणा विष्णो मा त्वावक्रमिषम् ० ' इत्यादि वैष्णवी -- ऋ । - - ' विष्णो हव्यं रक्ष ० ' इत्यादि वैष्णव -- यजुः । ४५६
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प्रथमकाण्ड संग्रह करता है । वाक् निश्चयेन यज्ञ है । इस वागुच्चारण से वह अध्वर्यु ' वाक् - रूप यज्ञ का ही आह्वान कर रहा हैं ॥ ११ ॥
वाक् - रूप - यज्ञ के ये सुप्रसिद्ध चार महिमा - विवर्त्त हैं - ' एहि ' ( आइए! पधारिए | ) यह ब्राह्मण के आह्वान की साधिका वाक् है । ' आगहि ' ( जाइए 1 ) यह क्षत्रिय के आह्वान की, ' आद्रव ' ( शीघ्र अनुगत होजाइए! ) यह वैश्य के आह्वान की, तथा ' आधाव ' [ शीघ्र ' यो ', दौड़ कर चायो ) यह शूद्र के आह्नान की साधिका वाक् है । सो जोकि ब्राह्मणाह्वान की साधिका - ‘ एहि ' वाक् है, वही यहाँ बोली गई है । ब्राह्मणांनुगता वाक् ही यज्ञियतम तत्त्व है, श्र ेष्ठ यज्ञिय तत्त्व है | यही वाग्विवर्त्त का अनुद्वेगकर - शान्ततम स्वरूप है, जोकि – ' एहि ' है | इसलिए- ' एहि ' ही बोलना चाहिए ॥१२ ॥ X ।
( प्रसङ्गोपात्ता परम्परा का स्मरण कराते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ) - पूर्वयुगानुगता परम्परा से निश्चयेन ‘ यजमानपत्नी ' हीं हविष्कृत् - रूप से उपस्थित होती रही है- ( क्योंकि हविः-सम्पादनरूप अन्नविशोधनकर्म प्रधानरूप से गृहिणी से ही अनुप्राणित है ) । और आज भी ( याज्ञवल्क्य के समय में भी ) वही नियम चला आ रहा है । ( यद्वा तद्धास्तु ) - यजमानपत्नी, एवं विकल्पपक्षानुसार आग्नीध्र नामक ऋत्त्विक्, दोनों में से जो भी कोई एक जिस समय हवि-ष्कृत् - कर्म्म के लिए आहूत होते हैं, उस समय जब कि पत्नी, अथवा आग्नीध्र - अध्वर्यु के द्वारा ' हविष्कृदेहीति ' रूप से आहूत हों, उसी समय ( आह्वानमन्त्रोच्चारण के अव्यवहितोत्तर-काल में हीं ) – ‘ आह्वयत्याहन्त्यन्यो दृषदुपले - ' कुक्कुटोऽसि ' इति त्रिः शम्यया, द्विपदं सकृदुपलाम् ' ( का ० श्रौ ० सू ० २।४।१५ ) के अनुसार आग्नीध्र नामक अन्य ऋत्त्विक् ÷ मन्त्रो-च्चारण पूर्वक ' शम्या ' नामक यज्ञास्त्र से दो बार दृपत् ( सिल ) पर, एक बार उपल ( लोढी ) * " हविष्कृदेहीति ब्राह्मणस्य । हविष्कृदागहीति राजन्यस्य । हविष्कुंदाद्रने - ति वैश्व-स्य । हविष्कृदाधानेति शूद्रस्य " । ( आप ० ० १ १६६। ) × यजमानपत्नी, अथवा तो उसकी असमर्थता में ' आग्नीध्र ' नामका ऋत्त्विक, दोनों में से कोई ही मुसल से उलूखलस्था हवि को कूटते हैं । इस हविः सम्पादनकर्म से ही इनकी संज्ञा हविष्कृत है । ' हविष्कृत यहाँ आजाय ' उच्चस्वर से अध्वर्यु ' यही बोलता है । यही - एहि ' ' का ध्वयर्थ हैं । ÷ यदि पत्नी आती है, तत्र तो प्रमुख श्राग्नीघ्र, यदि आग्नीध्र आता है, तो इसका सहायक अन्य आग्नीध्र | ४६०
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शतपथब्राह्मण पर आघात करता है, शब्दध्वनि अभिव्यक्त करता है । सो जिस प्रयोजन के लिए कि, यहाँ शम्या से ऐसा आघात करते हैं, ( उसका कारण बतलाते हैं, अर्थात् वैज्ञानिकी उपपत्ति बत– लाते हैं ) ॥१३ ॥
( पुरायुगे ) मनु के समीप एक बलिष्ठ बलीवई ( बैल ) था । उस बृषभ में असुरों का नाश करने वाली, सपत्न- शत्रुओं का नाश करने वाली वाक् प्रविष्ट थी । अर्थात् उस बलीवद्द ' की नादात्मिका ध्वनिवाक् से राक्षस, शत्रु - गण नष्ट होजाते थे । उसके श्वास – प्रश्वासात्मक - हुङ्कार से असुर - राक्षस मृतवत् ही बन जाते थे । मनु के ऋषभ से सन्त्रस्त असुरोंनें परामर्श किया, ऊहापोह किया कि, यह बड़े ही खेद का विषय है कि, यह ऋषभ अपने को पराजित ही करता रहता है । अपन किस उपाय से इसे मारें? | इस चिन्तात्मिका चर्चा में किलात, और आकुली, नाम के दो सुप्रसिद्ध, वर्णतः ब्राह्मण पुरोहित ही प्रधान थे ॥ १५ ॥
( असुरराक्षसों के पौरोहित्यपद पर समासीन ) उन दोनों ब्राह्मणपुरोहितोंनें असुरमण्डली केसम्मुखअपने ये विचार अभिव्यक्त किए कि, हे असुर राक्षसो! ) हम दोनों ' श्रद्धादेव ' नाम के उस मनु को भलीभाँति जानते हैं ( जिनका बैल अपनी वाकू से तुम लोगों का नाश किया करता है | मनु का यज्ञबल ही इनके ऋषभ की वाकू में प्रविष्ट है । मनु अत्यन्त ही यज्ञप्रिय हैं । श्रतः हम इसी दृष्टि से वहाँ जारहे हैं, और ) - दोनों मनु के समीप पहुँचे, एवं कहने लगे कि, हे मनो! हम आपको ( आपका अत्यन्त प्रिय, और महान्बल ) यज्ञ ही कराना चाहते हैं । ( मनु तत्काल अनुगत होगए यज्ञ के नाम -- श्रवणमात्र से ही । और इसी यज्ञाकर्षण से आकर्षित ) मनु कहने लगे कि, तुम लोग किस हविर्द्रव्य से हमें यज्ञ कराओंगे! ( बस असुरपुरोहितों की लक्ष्यसिद्धि होगई | तत्काल ) उह्नोंनें उत्तर दिया कि, इस ऋषभ से ही हम आपको यज्ञ कराएँगे । यज्ञप्रेमी मनु ने कह दिया - जैसी तुह्मारी इच्छा । ( परिणाम स्वरूप यज्ञ के व्याज से ऋषभ को मार कर उन दोनों पुरोहितोंनें उसकी यज्ञाग्नि में आहुति ही दे दी । किन्तु आश्चर्य्य! ) यज्ञार्थ आलब्ध - मृत-उस ऋषभ की वह दैवीवाक् तत्काल अन्तरिक्ष की ओर उत्क्रान्त होगई || १५ ॥ और तत्सहैव वह उत्क्रान्ता वाक् यज्ञ के यजमान मनु की ' मनावी ' नामकी पत्नी में हीं ` प्रविष्ट होगई । ( पुरोहितोंनें तो सोचा था, संकट टला | किन्तु अब संकट अत्युग्ररूप में परिणत हो गया । इसलिए कि, पशु की वाक् तो फिर भी अव्यवस्थिता थी, और वह तो अमुक समय-विशेषों पर ही बोलता था । किन्तु मनुपत्नी की यह मानुषी - दैवीवाक् तो तदपेक्षया सशक्त भौ थी, एवं अधिकरूपेण व्यक्त भी होनी रहती थी । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है कि ) -जिस जिस ४६१
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प्रथमकाण्ड भी समय मनुपत्नी यह वाकू बोलती थी, और असुर - राक्षस जब जब भी इसे सुन लेते थे, तत्क्षण वे प्रायः शत्रशरीरी, निष्प्राण ही बन जाते थे । ( पूर्वापेक्षया भी अधिक, और इस महान् संकट को सम्मुख देख कर ) असुरोंनें ( उह्नीं पुरोहितों को अग्रणी बना कर ) पुन: विचारविमर्श किया । ( अपम ने तो यह सोचा था कि, ऋषभ के मरने से कष्ट दूर होजायँगे । किन्तु -- आपत्ति का निराकरण तो विदूर रहा ) अपितु यह पत्नी की वाक् तो ऋषभवाक् की अपेक्षा भी कहीं अधिक उत्पीड़न का कारण बन बैठी । यह तो व्यक्तभावापन्ना, श्रतएव सशक्ता, और पुन - पुनः बोलती है अपने - ' मानुषीवाग्धम्र्मानु ' बन्ध से । पुनः किल ताकुली बोल पड़े कि, चिन्ता मत करो । हम निश्चयेन मनु को भलीभाँति जानते हैं ( अर्थात् उनके यज्ञप्रलोभन से हम भलीभाँति परि-चित हैं । अत: वे यज्ञाकर्षण से अपनी पत्नी को भी अग्नि में आहुत कर देने का निषेध न कर सकेंगे । दुष्टबुद्धि ) आसुर पुरोहित ( यही निश्चय कर पुनः मनु के समीप पहुँचे, और पूर्ववत् कहने लगे कि, हे मनो! हम आपको यज्ञ कराना चाहते हैं! । किस हविद्रव्य की आहुति से?, मनु के यह जिज्ञासा करने पर इह्नोंनें कह दिया कि - आपको पत्नी मनावी से ' । मनु ने इसी यज्ञप्रेम से आकर्षित हो स्वीकृति दे दी ( तत्काल उसका भी आलम्भन कर दिया गया ), और . आलब्धा उस मनुपत्नी की वाक् भी ( ऋषभवाग्वत ) उसी अन्तरिक्ष में उत्क्रान्त होगई || १६ || मनुपत्नी मनावी से उत्क्रान्ता वह वाक् यज्ञ की ओर अनुगत होती हुई यज्ञपात्रों में हीं प्रविष्ट होगई । यहाँ आकर असुर - राक्षसों के प्रयास सर्वथा निम्मूल ही प्रमाणित होगए । यज्ञ-पात्रों में प्रविष्टा उस असुरघ्नी - सपत्नघ्नी - दिव्या - यज्ञिया - मानवी की वाक् को नष्ट करने में किलाताकुली समर्थ नहीं होसके ( क्योंकि जिस यज्ञ के प्रलोभन से इह्नोंनें दो बार मनु की प्रतारणा कर दी थी, वाक् के यज्ञरूप में हीं परिणत हो जाने से मनु का वह प्रलोभन सर्वात्मना ही उपशान्त होचुका था । [ आज यहाँ शम्या से हवि कृदाह्वानकाल में आग्नीध्र दृषदुपल पर आघात करता हुआ जिस वाङ्मयी ध्वनि का अनुगमन कर रहा है, वह यही असुरघ्नी, तथा सपत्नव्नी यज्ञिया दैवीवाक् है, जोकि यज्ञपात्रों में प्रविष्ट होगई थी । उसी का यहाँ उच्चारण किया जाता है | इस प्रकृतिसिद्ध रहस्य के वेत्ता के द्वारा जिस यज्ञ में आग्नीध्र इत्यंभूता यज्ञिया वाक् का अनुगमन करने वाले हैं, निश्चयेन तद्यजमान के सपत्न- शत्रु पराभूत, तथा निकृष्ट - गति के ही नुगामी बन जाते हैं ॥ १७ ॥
( हविष्कृदाह्वानकाल में होने वाली वागध्वनि की उपपत्ति बतलाने के अनन्तर अब क्रम-प्राप्ता पद्धति की ओर ध्यान आकर्षित करती हुई श्रुति कहती है कि ) – वह आग्नीघ्र नामक ४६२
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शतपथब्राह्मण ऋत्विक्– ' कुक्कुटोऽसि मधुजिह्व इषमूर्जमावद त्वया वयं संघातं संघातं जेष्म ' ( हे कुक्कुट मुर्गे! आप को जिह्वा में मधु है, आप यजमान के लिए अन्नसम्पत्ति, तथा अन्नरसात्मिका ऊर्क_सम्पत्ति ही बोलिए । आप के द्वारा हम शत्रुओं के समूहों के समूहों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, कर रहें हैं, कर लेगें ) यह मन्त्र बोलता हुआ शम्या से दृपत् पर दो बार, तथा उपल पर एक बार श्रावात के द्वारा ध्वन्यात्मक शब्द करता है । कुक्कुट नामक पक्षी देवताओं के लिए सच-मुच ही तो मधुजिह्व ( मधुरवाक् - दैवीवाक्- बोलने वाला ) थां ( है ) । अतएव यह असुरों के लिए स्वतः ही द्विष्टजिह्न बना हुआ है । सो जो कि, यह देवताओं के लिए जैसा था, उसी समृद्धि से हमारे यज्ञ से समन्वित बने, मन्त्रभाग से यही कहा गया है । शेष मन्त्र भाग कुछ मी तिरो-हित - परोक्ष नहीं है । अर्थात् अर्थ स्पष्ट है || १८ || -[ तथोक्त – ' प्रत्युद्वादनकर्म्म ' ( शब्दध्वन्यात्मककर्म्म ' ) के अनन्तर-- ' वर्पवृद्धमसीति-शूर्पमादत्ते ' ( का ० श्र ० २।३।१६ ) के अनुसार ] यजमानपत्नी, अथवा तो आग्नीध - ' वर्ष -वृद्धमसि ' मन्त्र बोलते हुए – ' शूर्ण ( छाजला ) नामक यज्ञपात्र को । कुटे हुए हविद्रव्य के उत्प— वनरूप वितुषीकरण के लिए ) लेता है । * नड़ों का, अथवा वेणु का, अथवा तो इषीका का, तीनों में से किसी का भी बनने वाला शूर्प वृष्टिजल से ही क्योंकि प्रवृद्ध - स्वरूपतः - सम्पन्न होता है, अत-एव इसे ' वर्षवृद्ध ' कहा गया है || १६ || ( शूर्प ग्रहणानन्तर-- ' प्रतिवेति हविरुपद्वपति ' ( का ० श्र ० २ | ४ | १७ | के अनुसार ] वह यजमानपत्नी, अथवा तो आग्नीध्र मुसल से कूटे हुए हविद्रव्य को निकाल कर गृहीत शूर्प में -' प्रति त्वा वर्षवृद्ध ं वेचु ' [ हे हविद्रव्य! आप को वर्षवृद्धरूप यह शूर्प पहिचाने ) यह मन्त्र बोलता हुआ - निकाल लेता है । ) जिसप्रकार वृष्टि से वृद्धिंगत शूर्प ' वर्षवृद्ध ' है, तथैव यव - त्रीहि ( जौ, आर चाँवल ) रूपेण द्विधा विभक्त हविद्रव्य भी वृष्टि से ही तो प्ररोहित - सम्पन्न-सुसम्पन्न होते हैं । श्रतएव ये भी शूर्पवत् ' वर्षवृद्ध ' ही हैं । इसी अभिप्राय से कहते हैं कि ) – यदि व्रीहि नामक हवि हैं, यदि यव ( जौ ) नामक हवि हैं, तो इन दोनों को वर्ष ( वृष्टिजल ) ही समृद्ध -- प्ररोहित करता है । सो इस ' संज्ञा ' ( संज्ञान - संजानन - रूप -- पारस्परिक सजातीय सम्ब-* १ - नड़ -- कूँचों के त्रिलयुक्त मोटे नाल, जिहें हमारी प्रान्तीय भाषा में - ' फर्डे ' कहा जाता है | २- वेणु - बाँस ३ – इषीका — फर्डों के गर्भ से निकलने बाली ठोस तूलियाँ | हमारे प्रान्त में छाजले आज भी इसी के बनाते हैं । ४६३
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प्रथमकाण्ड न्धापेक्षया ही ) शूर्प के लिए इस हविद्रव्य को वर्षवृद्धरूपेण अभिव्यक्त किया है, इसी प्रयोजन के लिए कि दोनों एक दूसरे को व्यथा न पहुँचायें ॥ २० ॥
[ शू में हविद्रव्य के निवाप - ( आधान ) के अनन्तर - परापूतमिति निष्पुनाति ' ( का ० श्र ० २ | ४ | १८ ) के अनुसार वह आधाता ( यजमानपत्नी, अथवा आग्नीध्र ) ] ' परापूतं रक्षः, परा पूता अरातय: ' ( इस हविद्रव्य से राक्षस और असुर विदूर फैंक दिए गए हैं ) यह मन्त्र बोलता हुआ शूर्पस्थ तुषादि प्रवर्ग्य भाग ( रूप असुर - राक्षसों ) को पहिले हवि-द्रव्य से पृथक् करता है । अनन्तर - अपहतमिति तुषान्निरस्यति ' ( का ० श्र ० २।४।१६ ) के अनुसार -- ‘ अपहृतं रक्षः ' यह मन्त्र बोलता हुआ ( वही आग्नीध्र ) पृथग्भूत उन तुषों को अध्वर्यु को दे देता है । ( यही इन तुषरूप असुर - राक्षसों का निराकरणात्मक पहनन है ) । इन दोनों कर्मों से यह इस हविद्रव्य से असुर राक्षसों को ही मार भगाता है । ( आग्नीध्र के द्वार । गृहीत इन तुषों को अध्वर्यु - प्रवर्ग्यप्रक्षेप के लिए नियत ' उत्कर ' [ गर्त्त ] में फैंक देता है ] || २१ || इसप्रकार निष्पवनात्मक - वितुषीकरण, तथा पृथक्प्रपात्मक पहननकर्म्म, दोनों के अनन्तर ' वायु ' इति विविनक्ति ' [ का ० श्र ० २४ २० ] के अनुसार- ' वायुर्वे विविनक्ति, [ हे हविर्द्रव्य! वायुदेवता ही आप का पृथक्करण - छाँट - करते हैं - बीनते हैं ] यह मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध्र तण्डुलों के अक्षत, तथा कण - भागों को पृथक् पृथक् कर बीनता है | यह जो अन्तरिक्षाकाश में प्रवाहित [ बह रहा ] है, वही वायु है । यहाँ - इस लोक में जो भी कुछ विविक्त-पृथक् - परिष्कृत होता है, वह सब वायुदेवता ही विविक्त करता है । आज आग्नीध्र के ब्याज़ से यह वायु ही इन तण्डुलकणों को विविक्त कर रहा है । जब इस कर्म्म से ये हविद्रव्य बिन कर स्वच्छ होजाते हैं, तो इह जिस पात्री में इह्न रखना होता है, उस में इहें रख देता है ॥२२ ॥
औरतदनन्तर- - ' देवो व इति पात्र्यामोप्याभिमन्त्रयते ' [ का ० श्र ० २/४/२१ ] के अनु-सार वह आग्नीध्र - ‘ देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णावच्छिद्र ेण पाणिना ' ( हे हवि-द्रव्य! सुवर्णहस्तयुक्त सविता देवता ही आप का छिद्ररहित हाथ से ग्रहण करैं ] यह मन्त्र बोलता हुआ इड़ापात्री में स्थित हविर्द्रव्यका अनामिकाग्रभाग से स्पर्श करता है । [ यही ‘ अनुमन्त्रणकर्म्म ' कहलाया है ] हविद्रव्य विशिष्ट हाथों से गृहीत बनते हुए सम्यगुरूपेण गृहीत बनें, मन्त्र का यही तात्पर्य्य है । [ उलूखल में हविष्करण ( हविःस्थापन ), तत्कण्डन ( मुसल से तत्कुट्टन ), उद्वाप ( उसे निकालना ), निष्पवन ( वितुषीकरणादि - तुषादि पृथक् करना ), विवेचन ( कणों ४६४
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J शतपथब्राह्मण को पृथक छाँटना ) कणनिष्काशन, इन सब विशुद्धीकरणात्मकं कर्मों का नाम हीं-- ' फली -करण ' है | इस फलीकरण के सम्बन्ध में प्रत्येक कर्म में एक एक बार मन्त्रपर्वक, तदनन्तर वही वही कर्म्म तूष्णीं - त्रिना मन्त्र के किया जाता है । फलीकरणात्मिका उक्ता कर्म्मचतुष्टयी तीन बार होती है । यही बतलाती हुई श्रति कहती है ] - फलीकरणात्मक उक्त कर्म्म – तीन तीन बार करता है । क्योंकि यज्ञ निश्चयेन त्रिवृत् [ त्रिभावापन्न ] है ॥ २३ ॥
कितने एक याज्ञिक - फलीकरणात्मक उक्त कम्र्मों में से ' कण्डन ' ( कुट्टन ) नामक द्वितीय कर्म्म में ' देवेभ्यः शुन्धध्वम् ' देवेभ्यः शुन्धध्वम् ' ( आप देवताओं के लिए पवित्र बने ) यह मन्त्र बोलते हुए तीनों हीं बार मन्त्र बोल कर फलीकरण करने के पक्ष में हैं । किन्तु ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए । यह हविद्र् व्यात्मिका हवि अमुक - नियत - देवताओं के लिए शकट से हविर्ग्रहण-काल में हीं नियत करदी गई हैं । ऐसी अवस्था में जो ' देवेभ्यः ' यह कहते हैं, वे इस हवि को वैश्वदेव - हवि । ( ज्ञात - अज्ञात गृहीत- अगृहीत सभी देवताओं की हवि ) बनाता है । और ऐसा करता हुआ यह नियत और अनियत सभी देवताओं में परस्पर संघर्ष ही करता है । अतः फलीकरण तूष्णीं ही करना चाहिए ॥ २४ ॥
पुराडाशसम्पादनात्मक - नवम- - कर्म का फलीकरणात्मक वन्तरक उपरत - * -प्रथमकाण्ड प्रथम- अध्याय का चौथा ब्राह्मण उपरत प्रथमकाण्ड प्रथम प्रपाठक का चौथा ब्राह्मण उपरतं इति — शतपथब्राह्मणे - ' ब्राह्मणचतुष्टयात्मकः ’ • प्रथमोऽध्यायः -१-* ( भाष्य ) -- ‘ कृष्णमृगचर्म्म त्रयीविद्या स्वरूप है । उसके कृष्ण लोम ऋग्वेद है, शुक्ल लोम सामवेद है, अथवा कृष्णलोम सामवेद है । शुक्ल लोम ऋक्वेद है, नकुल वर्णवाले लोम यजु-र्वेद है । काले हरिण का चमड़ा वेदमूर्त्ति है यह साक्षात् यज्ञ है । अतः यज्ञप्रतिष्ठा के लिए, यज्ञ की पूर्णता के लिए ‘ यज्ञ में अवश्य ही इसका ग्रहण करना चाहिए ', श्रुति इन साधारण से अक्षरों के माध्यम से हमें वह अपूर्व विज्ञान बतलाती है, जिसके वास्तविक रहस्य को समझ लेने से सम्पूर्ण यज्ञ-रहस्य गतार्थं बन जाता है । कोई भी विद्वान्, फिर वह कितना हीं प्रतिभाशाली क्यों न हो, जबतक ब्रह्म-४६५
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प्रस्तावना विज्ञान - सम्बन्धिनी चिरकाल से गुहानिहिता वैदिक - परिभाषाओं का परिचय प्राप्त नहीं करलेगा, तबतक पूर्वोक्त पङिक्तयों के यथार्थ रहस्य को वह कदापि गतार्थ नहीं बना सकेगा । ऐसी रहस्यकथाएँ ब्राह्मणग्रन्थों में में भरीं पड़ीं हैं । न केवल ब्राह्मणग्रन्थों में हीं, अपितु संहिताएँ भी इन कथाओं का आगार है । उन सब वैज्ञानिक कथाओं के निगूढ़ रहस्य को बतलाने वाला ' रहस्य - शास्त्र ' कालपुरुष के निग्रह से विलुप्त होगया है । जैसे निदान, गाथा, कुम्ब्या, आदि ग्रन्थों के लुप्त होजाने से आज वेदार्थ- परिज्ञान के सम्बन्ध में कठिनता का साम्मुख्य करना पड़ रहा है, वही कठिनता ' रहस्यशास्त्र ' के लुप्त होजाने से होरही है । पुराण-शास्त्रने यद्यपि इस कठिनता को दूर करने का प्रयास किया है । परन्तु पुराण का जिस दृष्टि से अध्ययन करना चाहिए, वह दृष्टि आान विद्वानों में ही नहीं रही । दोसौ चार सौ श्रद्धालुओं के सम्मुख उच्चासन पर बैठकर अक्षरार्थ कर देने में ही आज दिन पुराण की इतिश्री समझी जारही है । इधर कथावाचक महोदय वेद का नाम भी नहीं जानते । ‘ पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ॥ ' जिन इन शब्दों में पुराण की महत्ता प्रकट की जाती है, वही गम्भीर शास्त्र आज क्रीड़ाकौतुकमात्र का साधन बन रहा है | साधारण शिक्षित कथावाचक ही आज ' पौराणिक ' नाम से अलङकृत किये जारहे हैं । कहना न होगा कि, इत्थंभूत कथावाचकों की कृपा से ही पुराण का वास्तविक स्वरूप अभिभूत होगया है, एवं इसी अनुबन्ध से इस ' आर्य्यसर्गस्व ' पर आज विद्वत् समाज की भी श्रद्धा होगई है । इसप्रकार वेदों के ही उपबृ ंहणात्मक * पुराणशास्त्र को भी आज हमारी रहस्यसम्बन्धिनौ जिज्ञासा के समाधान क्षेत्र में कुण्ठित ही बना दिया गया है । पुराण का प्रतिपाद्य विषय ऐसा गम्भीर है कि, साधारण मनुष्य उसके ब्राह्यस्वरूप से सन्देहनिवृत्ति के स्थान में और भी अधिक उलझन में हीं पड़ जाता है । ऐसी अवस्था में जो दशा ' निगम ' की है, वही इस ' आगम ' की है! निगम का तो केवल डिण्डिमघोष है । पाश्चात्य विद्वानोंनें अपने परिश्रम से वेदों का जो ' अर्थ ' समझा है, उसी उच्छिष्ट को लेकर अपने आपको ' वेदज्ञ ' समझने का गर्व करने वाले भारतीय भी उस मौलिक रहस्यज्ञान से आज वञ्चित हो रहे हैं । यदि किसी पाश्चात्यने कृष्णमृगचर्म्म के पूर्वोक्त स्वरूप को ग्राल-ङ्कारिक बतला दिया, तो इन महानुभावों को भी सर्वत्र अलङ्कार के ही दर्शन होने लगे । हम ऐसे महानुभावों को यह विश्वास दिला देना चाहते हैं कि, वेद ऐसा गहनशास्त्र है कि, जिसमें ' निमज्जित हुए बिना केवल पाश्चात्यों के उच्छिष्टभोगी बनने से काम नहीं चल सकता । इसके लिए तो चिरकालिक तपोयोग ही अपेक्षित है । तभी इसमें चञ्च प्रवेशमात्र का अधिकार प्राप्त होसकता है । वेद के एकदेशी भाग को देख कर उसका मर्म समझ लेना कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव है । वेदतत्वप्रतिपादक ब्रह्मविज्ञान का यथार्थ परि-चय प्राप्त किए त्रिना वेदार्थ समझने की आशा करना दुराशामात्र ही है । प्रकृत में हमें कृष्णमृग-चर्म्म का वेदत्त्व अभिव्यक्त करना है । इसके लिए हमें प्रथम उहीं परिभाषात्रों की शरण में चलना होगा । * - इतिहास - पुराणाभ्यां वेदं समुपबृ ंहयेत् । ४६६
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शतपथब्राह्मण सम्भव है - इसके रहस्य- प्रतिपादन में विस्तार होजाय । इसके लिए हम पाठकों से पहिले ही यह निवेदन कर देना चाहते हैं कि, विषय की गम्भीरता को ध्यान में रखते वे हुए मूलग्रन्थ - प्रकाशन की ओर अधिक लक्ष्य नहीं देंगे । ' सर्वमु ह्य वेदं प्रजापतिः ' - ' प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा जातानि परिताबमूव ’ - ‘ प्रजापति-स्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किच ' इत्यादि श्रुतियाँ सर्वत्र प्रजापति का ही साम्राज्य बतला रहीं हैं । इस सर्वव्यापक प्रजापति के अनेक रूप हैं | निरुक्त, अनिरुक्त, उद्गीथ, सर्व, सत्य, यज्ञ, इत्यादि अनेक महिमाविवर्त्तो के माध्यम से प्रजापति ' सर्वरूप ' में परिणत हो रहे हैं, एवं सब पर अपना प्रभुत्त्व स्थापित किए हुए हैं । इस ‘ कृष्णमृग ' प्रकरण में हमें आपका ध्यान केवल ' सत्यप्रजापति ', एवं ' यज्ञप्रजापति ', इन दो प्राजा-पत्य- स्वरूपों की ओर ही आकर्षित करना है । ' सत्यप्रजापति ' हमारे विज्ञानशास्त्र में ( वेदशास्त्र में ) ‘ मौलिकतत्त्व ' है, एवं ‘ यज्ञप्रजापति ' ' यौगिकतत्त्व ' है । यौगिकतत्त्व - स्वरूप यज्ञप्रजापति की प्रतिष्ठा मौलिकतत्त्व - स्वरूप सत्यप्रजापति ही है । दूसरे शब्दों में सत्य ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है । बिना सत्य के यज्ञ अप्रतिष्ठित है । अतः प्रत्येक यज्ञ में सत्य का आश्रय लेना परम आवश्यक है । उसी सत्य-प्रजापति के प्रहण के लिए प्रकृत में कृष्णमृग का ग्रहण किया जारहा है । ' निदानविद्या ' के अनुसार कृष्णमृगचर्म्म साक्षात् सत्यप्रजापति की प्रतिकृति हैं । प्रथम हमें वेदत्रयीरूप इसी सत्यप्रजापति की स्वरूपो-पासना में प्रवृत्त होना है । सुप्रसिद्ध ' दशवादा ' न्तर्गत ' अम्भोवाद ' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व पतत्त्व से ही उत्पन्न हुआ है । ' आपो वा इदमग्रे सलिलमेवास ' - ' आप एवेदमग्र आसुः ' इत्यादि श्रुतियों के अनुसार किसी समय सर्वत्र पानी का ही साम्राज्य था, जिसका कि विशद निरूपण पूर्व के प्रणयन प्रकरण में किया जाचुका है । वही आपोमण्डल ‘ ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध है । जबतक सूर्य्य उत्पन्न नहीं होजाता, तबतक तो वह केवल ' आपः ’ नाम से ही व्यवहृत होता है । परन्तु सूर्य्योत्पत्ति के अनन्तर वही ( सूर्य्यादपि परमे स्थाने तिष्ठति ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' परमेष्ठी ' नाम धारण कर लेता है । वह आपः प्रथम ' सलिल ' रूप में रहता है । ' इरा ' रस का नाम है, एवं द्रवणशीला इरा ही ' सरिर ' है । सरिर ही निरुक्त - क्रमानुसार ' सलिल ' है । वह पोरस प्रवृहणशील ( बहता हुआ ) है । अतएव ' सरित् इरा यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उसे श्रवश्य ' सलिल ' कहा जासकता है । जो सलिल होता है, वह अवश्य ही ' ऋत ' होता है । क्योंकि पूर्वप्रकरण में ऋत - सत्य की व्याख्या करते हुए यह बतलाया जाचुका है कि, सहृदय सशरीरी भाव ही ' सत्य ' है, एवं हृदय भाव ही ' ऋत ' है । पानी क्योंकि बहता हुआ है । उसमें कोई केन्द्र नहीं, अतः हम अवश्य ही उसे ' ऋत ' कह सकते हैं । इसी ऋतभाव को प्रकट करने के लिए ऋषि ने ' आपो वा इदमप्रे सलिलमेवास ' कहा है । ऋतात्मक यह अप्-तत्त्व भृगु, और अङ्गिरा की समष्टिमात्र है । भृगु सौम्य तत्त्व है, अङ्गिरा आग्नेय तत्त्व है । भृगु स्नेह-तत्त्व है, अङ्गिरा तेजस्तत्त्व है । स्नेह - तेजोरूप भृग्वङ्गिरोरूप आपः ही सम्पूर्ण विश्व का उपादान बनता है । भृगु की घन - तरल - विरल - इन तीन अवस्थाओं से आप: - वायु- सोम, ये तीन रूप होजाते हैं, एवं अङ्गिरा के अग्नि - यम- आदित्य, ये तीन रूप होजाते हैं । इन छओं में प्रथम के तीन ( आपः - वायु-सोम ) तो सदा ऋत ही रहते हैं । परन्तु उत्तर के तीनों ( अग्नि - यम - आदित्य ) आगे जाकर सत्य-रूप धारण कर लेते हैं । ४६७
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प्रथमकाण्ड इसप्रकार वह एक ही अप्तत्त्व ऋत - सत्य - रूप में परिणत होकर सम्पूर्ण विश्व का प्रभव बन जाता है । इतना श्रवश्य ध्यान रखना चाहिए कि, जबतक अङ्गिराभाग सत्यरूप में परिणत नहीं होजाता, तबतक वह् ' आपः' नाम से व्यवहृत होता है । साथ ही सम्पूर्ण ही अङ्गिरा सत्य वन भी नहीं जाता । अङ्गिस का कुछ अंश ही सत्यरूप धारण करता है! एवं शेष पोरूप से [ ऋतरूप से ] ज्यों का यो सुरक्षित रहता है । सलिलरूप ( ऋतरूप ) आप: का जो भाग सत्यरूप में परिणत होजाता है, वही ' वेदत्रयी ' है । ये ही हमारे ‘ सत्यप्रजापति ’ हैं । इस सत्य का उपादान भृगु - श्रङ्गिरा - रूप वही आपः -तत्त्व है । वेदत्रयीरूप सत्यप्रज्ञा– पति इसी आपोमण्डल के केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ठ होजायगा । इसी पूर्व विज्ञान को लक्ष्य ' में रखकर अथर्वश्रुति कहती है—
आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोयम् ।
अन्तरैते त्रयो वेदा मृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥
गोपथे आपोमय समुद्र में अङ्गिरोऽग्नि परमाणुरूप से सर्वत्र व्याप्त होरहा है । ' एकोऽहं बहु स्याम् प्रजायेय ' प्रजापति की इस सत्यकामना से होने वाले तपः ( प्राणव्यापार ), और श्रम ( वाग्व्यापार ) से उन आग्नेय परमाणुओं का संघात होने लगता है । विशीर्ण ( बिखरे हुए ) आग्नेय परमाणुत्रों को चारों ओर से संक-लित कर ( सिमेट - सिमेट कर ) उहें केन्द्र में प्रतिष्टित करने वाला ' यज्ञवराह ' है । वायु को ही ' वराह ' कहते हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूर्य्य - चन्द्रमा - पृथिवी, आदि जितने भी पिण्ड हैं, उन सबका निर्माण इसी वराह के द्वारा होता है । पाँचों मण्डलों के भिन्न भिन्न वराह हैं । स्वयम्भू के स्वरूप- सम्पादक वराह ' आदि-वराह ' नाम से प्रसिद्ध हैं । परमेष्ठी के स्वरूप - सम्पादक वराह ' यज्ञवराह ' नाम से प्रसिद्ध हैं । सूर्य्य स्वरूप – सम्पादक वराह ‘ श्वेतवराह ' नाम से व्यवहृत होते हैं । पृथिवी के स्वरूप - सम्पादक वराह ' एमूष-वराह ' नाम से पुकारे जाते हैं । एवं चान्द्रवराह ' ब्रह्मवराह ' कहलाते हैं । पाँचों वायुरूप हैं । भार्गववायु ही यज्ञवराह है । वायु के द्वारा श्राग्नेय परमाणुओं का सम्रात होता है । ' वृणुते इति वरः श्रह्नोतीति श्रहः ' ' वरश्चासौ अहश्च ' के अनुसार परमाणुत्रों का चारों ओर से संवरण कर उन पर चारों ओर से व्याप्त हो उन परमाणुत्रों को पिण्डरूप में परिणत कर देने वाला वह वायुतत्त्व ही ' वराह ' नाम से प्रसिद्ध होजाता हैं । यज्ञवराहरूप पारमेष्ठ्य वायुने चारों ओर परिव्याप्त आग्नेय परमाणुओं को एक स्थान में संकलित करना प्रारम्भ किया । जत्र वायु का चारों ओर से अन्य-न्त चापन ( दबाव ) हुआ, तो मध्य में संघातभावापन्न वे आग्नेय परमाणु प्रज्ज्वलित होपड़े । वही पर-माणुसंघ ' सूर्य्य ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यह सौराग्नि - दबाब से - घर्षण से - उत्पन्न हुआ, तभी से अग्नि ' सहोजा ' नाम से व्यवहृत होने लगा । ' सहसो जात ओजस: ' ( यजुर्वेद ) के अनुसार अग्नि सहोबल ( दबाव - घर्षण ) से ही उत्पन्न होता है । प्रत्येक पदार्थ में अग्नि सुप्त है । घर्षण के द्वारा उस पर जैसे ही * जलौघमग्ना सचराचरा धरा विषाणकोट्या खिलविश्वमूर्त्तिना! ता येन वराहरूपिणा स मे स्वयम्भूर्भगवान् प्रसीदताम् ॥ समुद्धता ४६८