Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 731–740
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 731–740
पृष्ठ 731
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण दबाव डाला जायगा, तत्काल अग्निज्ज्वाला प्रकट होजायगी । कहना प्रकृत में यही है कि, उस आपोमय परमेष्ठी - मण्डल के केन्द्र में यज्ञवराह के द्वारा सर्वप्रथम अग्निमूर्ति भगवान् सूर्य का ही प्रादुर्भाव हुआ । यह अग्नि पिण्डरूप था, सहृदय था, सशरीरी था । अतएव वैज्ञानिकोंने इस रूप को ' सत्य ' नाम से व्यवहृत किया । क्योंकि सत्य की यही परिभाषा है । पतत्त्व ने पहिले इसी सत्य को उत्पन्न कर इसे अपने गर्भ में धारण किया, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं— ' आप एवेदमग्र आसुः - ता श्रापः सत्यमसृजन्त ' । ' तद्यत् तत् सत्यमसौ स आदित्यः '- शत ० १४ का ० ८ ० ६ ब्रा ० श्रादित्यरूप सत्यप्रजापति ही कुम्भवितार है, जिसका कि स्वरूप - दिग्दर्शन पूर्व से गतार्थ है । यह कूर्म्मरूप सूर्य्य उस पानी के केन्द्र में - जहाँ पानी की गहराई की पराकाष्ठा है, प्रतिष्ठित है । यही तथ्य निम्न-लिखित मन्त्रवर्णन से स्पष्ट होरहा है-अपांगम्भन्त्सीद मा त्वा सूर्योऽभिताप्सीन्माग्निर्वैश्वानरः । श्रच्छिन्नपत्राः प्रजा अनुवीक्षस्वासुत्वा दिव्या वृष्टिः सचताम् ॥ - यजुः संहिता १३ | ३० | ' अपां गंभन्त्सीद ' इत्यादि की व्याख्या करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ' एतद्ध अपां गम्भिष्टं, यत्रैष एष तपति ' ( श ० ७ का ० ४ प्र ० ५ ० १ ब्रा ० ) । अर्थात् श्रापः ही, आप का अङ्गिरा-रूप आग्नेय भाग ही सत्यरूप में परिणत हुआ है । इसी आधार पर - ' तद्यत् तत् सत्यमाप एव तत् । आपो वै सत्यम् ' ( ७ | ४ | १ | ६ ) यह कहा जाता है । आपोमय मण्डल के केन्द्र में ' सूर्य्य ' नाम से प्रसिद्ध ‘ सत्य ’ तत्त्व उत्पन्न हुआ । यही सत्यतत्त्व आगे जाकर ' ब्रह्म ' ( वेदत्रयी ) रूप में परिणत होता है । पूर्वप्रकरण से यह भलीभांति सिद्ध होजाता है कि, आपोमय परमेष्ठी - मण्डल के केन्द्र में पिण्डरूप में परिणत सौराग्नि ही ‘ सत्य ' है । इस अग्नि के ( जो कि तापरहित है ) अग्नि वायु - आदित्य, ये तीन रूप होजाते हैं । अग्नि पार्थिवलोक का प्रतिष्ठावा [ अधिष्ठाता ] बनता है, वायु अन्तरिक्ष में अपना प्रभुत्त्व रखता है, एवं द्वादशादित्यात्मक सूर्य्यद्य लोक का अधिष्ठाता है । याज्ञिक - परिभाषा के अनुसार पार्थिव अग्नि ‘ गार्हपत्याग्नि ' कहलाता है, आन्तरिक्ष्याग्नि श्रपणाग्नि, एवं ' धिष्ण्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है | तथा दिव्या-ग्नि को ' आहवनीयाग्नि ' कहा जाता है । तीनों हीं मौलिक प्राण हैं, तापशून्य हैं । तीनों के दार्शनिक परिभाषानुसार प्राण – अपान - व्यान, ये नाम हैं । प्रारण सौर है, व्यान आन्तरिक्ष्य है, एवं अपान पार्थिव है | प्राण उपांशु है, अपान अन्तर्याम है, एवं व्यान उपांशुसवन है । उपांशुसवन - ( शिला ) — रूप व्यान पर उपांशु - अन्तर्यामरूप प्राणापान के घर्षण से नवीन वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, तीन विश्व हैं, तीनों के क्रमश: अग्निवायु - आदित्य, ये तीन नर ( नायक ) हैं । इह्रीं ४६६
पृष्ठ 732
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड के परस्पर के सम्बन्ध से यह तापधर्म्मा अग्नि उत्पन्न होता है । अतएव इसे ' वैश्वानर ' कहा जाता है । ‘ वैश्वानरो यतते सूर्येण’- ' आ यो द्यां भात्यापृथिवीम् ' के अनुसार यह वैश्वानर – अग्नि त्रैलोक्य में व्या'त है । प्रकृत में हमें सत्य से उत्पन्न होने वाले, दूसरे शब्दों में प्रजापति से प्रकट होने वाले ‘ ब्रह्म ' का ही दिग्दर्शनरूप कराना है । अतः उसी की ओर प्रधानरूप से आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है. 1 अग्नि - यम आदित्य, तीनों श्राङ्गिरस हैं । तीनों सत्य हैं । तीन पृथक् पृथक् सत्य नहीं हैं । श्रपितु तीनों मिल कर एक सत्य है । अग्नित्रयी ही सत्य है । इस सत्य से ही ' त्रयीब्रह्म ' का प्रादुर्भाव होता है । अग्नितत्त्व से ऋग्वेद का दोहन होता है, वायुतत्त्व से यजुर्वेद का दोहन होता है, एवं आदित्य से सामवेद का दोहन होता है । ऋग्वेद पार्थिव है, यजुर्वेद आन्तरिक्ष्य है, सामवेद दिव्य है | एवं अग्नित्रयी के बाहिर चारों ओर से व्याप्त पारमेष्ठ्य आपः तत्त्व ही ' अथर्व ' वेद है । प्रकृत में उसका कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है | अतः यहाँ केवल त्रयीब्रह्म का ही निरूपण गतार्थ मान लिया जायगा । यों तो ‘ वेद की पुस्तक ’ में सभी विषय अत्यन्त जटिल हैं, परन्तु ' वेद ' ( शब्दात्मक पौरुषेय शास्त्रवेद ) जब ‘ वेद ' का ( तत्त्वात्मक त्रयीब्रह्म का ) ही स्वरूप बतलाने लगता है, तो यह कठिनता और भी बढ़ जाती है | केवल वेदतत्त्व के परिज्ञान के लिए हमारा यह यज्ञसम्बन्धी सामान्य परिलेख कदापि सन्तोष – जनक नहीं बनसकता । इसके लिए तो वेदतत्त्वनिरूपणात्मक स्वतन्त्र निबन्ध ही देखना चाहिए । यहाँ हम संक्षिप्तरूप से केवल उस का परिचयमात्र ही करा देते हैं । वेदतत्त्व को श्रुतियोंनें ‘ प्रथमजब्रह्म ' - ' प्रतिष्ठाब्रह्म ', आदि अनेक नामों से व्यवहृत किया I प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति के लिए ' वेदसत्ता ' नितान्त अपेक्षित है । पहिले उस वस्तु का वेद उत्पन्न होता है, अनन्तर वस्तु उत्पन्न होती है । जिस वस्तु का वेद नहीं, वह वस्तु ही नहीं । शशशृङ्ग, वपुष्प - वन्ध्यापुत्र हमें उपलब्ध नहीं होते । क्योंकि इन का वेद नहीं । अस्तितत्त्व की ही उपलब्धि होती है । उपलब्धि ही वेद है | त्रिद्यते — विन्दति - वेत्ति रूपेण वेद शब्द का निर्वाचन तीन प्रकार से सम्भव है । जो विद्यमान है, बहु भी वेद है । जो हमें प्राप्त होता है, वह भी वेद है । एवं जो हम जानते हैं, वह भी वेद है । वेद से अतिरिक्त यदि कुछ है, जो वह ' नास्ति ' तत्त्व ही है । इस वेदतत्त्व के सृष्टिक्रम के तारतम्य से मूलवेद, उपलब्धिवेद, सत्यवेद, आत्मप्रतिष्ठावेद, प्राजापत्यवेद, आदि अनेक अवान्तर भेद होजाते हैं । उन सत्र में से प्रकृत में प्रथम ' उपलब्धिवेद ' की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । उपलब्धि का साधारण शब्दार्थ है ' प्राप्ति ' । वह उपलब्धि हमें दो प्रकार से होती है । एक तो उपलब्धि ‘ प्रतिष्ठा ' रूप से होती है, एवं दूसरी उपलब्धि ' ज्योति ' रूप से होती है । ' घटोऽस्ति, पटोऽस्ति ' इत्या-कारक ‘ अस्तिभाव ' ही तद्वस्तु की प्रतिष्ठा है । अस्तित्त्व को ही प्रतिष्ठा कहते हैं । ' इदमस्ति ' इस प्रति-* –खण्डत्रयात्मक –१८०० पृष्ठात्मक - ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' नामक निबन्ध में वेद के तात्त्विक स्वरूप का ही उपबृंहण हुआ है । ४७०
पृष्ठ 733
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण ष्ठातत्त्व का हमें ‘ भान ’ होता है । भान ही भाति है । भाति ही ज्योति है । ' घड़ा है ' यह उपलब्धि का पूर्व अंश है, एवं ' हमें घट का भान हो रहा है ', यह उत्तरांश है । दोनों की समष्टि से ( प्रतिष्ठोपलब्धि - ज्यो-तिरूपलब्धि से ) ही हमें घट का ज्ञान होता है । ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' के अनुसार ब्रह्म ' सच्चिदानन्द ' है । ' सत्य ' शब्द ' सत्ताभाव ' का ही द्योतक है । यही सत्ताश्रयभाव ' सत् ' है । ज्ञान ' ' शब्द ' चित् ' का द्योतक है । एवं ' अनन्त ' शब्द ' आनन्द ' का द्योतक है । तीनों की समष्टि ही ' सच्चिदानन्दब्रह्म ' है । ' ब्रह्म'वेदं सर्वम् ' के अनुसार सम्पूर्णं विश्व समष्टि, और व्यष्टि - रूप से सच्चिदानन्द ही है । दूसरे शब्दों में - ‘ सच्चि-दानन्दब्रह्म ' का विवर्त्त भूत विश्व भी सच्चदानन्द ही है । सत्ताभाव ' अस्ति ' नाम से व्यवहृत होता है! चिद्भाव को ' भाति ' कहा जाता है । एवं आनन्दतत्त्व ' रसो ह्येव सः - रसं ह्येवायं लब्ध्वा - आनन्दी भवति ' के अनुसार ' रस ' नाम से प्रसिद्ध है । ' अस्ति - भाति रस, तीनों की समष्टि ही सच्चिदानन्द है । प्रत्येक वस्तु अस्ति, भाति, रस, रूप है । अतः अवश्य ही सम्पूर्ण पदार्थो को ' सच्चिदानन्द ' कहा जा-सकता है । इन तीनों में प्रथम हम ‘ अस्तिभाव ' का ही निर्वचन करते हैं । ' अस्- भुचि ' धातु से ‘ अस्ति ’ पद निष्पन्न है हुआ । प्रत्येक वस्तु उत्पत्ति से पहिले मनः - प्राण - वाग् - व्यापार की ही अपेक्षा रखती है । प्रत्येक वस्तु की उत्पत्ति के लिए तीनों का व्यापार नितान्त अपेक्षित है । मनोव्यापार को ' कामना ' कहते हैं । सर्वप्रथम - ‘ मैं अमुक वस्तु बनाऊँ ' यह कामना ही होती है । कामना के अनन्तर तदनुकूल ‘ यत्न ’ किया जाता है । यत्न को ही चैष्टा कहते हैं । वैदिकपरिभाषानुसार आभ्यन्तर - व्यापार रूप इस यत्न को ही ' तप ' कहा जाता है । यही ‘ प्रारण व्यापार ' है । अनन्तर ' वागू - व्यापार ' होता है । वाग् व्यापार ' स्व ' - ' पर ' भेद से-दो भागों में विभक्त है । वाक् आकाशतत्त्व है । यह मर्त्याकाश ( जो कि ' इन्द्रपत्नीं ' नाम से प्रसिद्ध है ) उत्तरौत्तर होने वालीं बलग्रन्थियों से वायुरूप में परिणत होता है । वायु अग्नि रूप में, पू- आप: - फेन, मृत्, सिकता, शर्करा, अश्मा, अय:, हिरण्य, इन आठ रूपों में परिणत होता हुत्रा भूपिण्डरूप में परिणत होता है । इसप्रकार एक ही वाक्तत्त्व पञ्चभूतरूप में परिणत होजाता है | पञ्चभूत की समष्टि ही है । इसी आधार पर - ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' - ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' इत्यादि कहा जाता है । यही वाक् - भूतग्राम है । इसीसे हमारा ' स्थूलशरीर ' बना है । इस के गर्भ में प्राण है । इसी को ' प्राणग्राम ', किंवा ' देवग्राम ' कहते हैं । यही ' सूक्ष्मशरीर ' का अधिष्ठाता है । तीसरा मन है । यही ' आत्मग्राम ' है । इसी को ' कारणशरीर ' का अधिष्ठाता माना जाता है । दार्शनिक परिभाषा के अनुसार ये ही तीनों प्रज्ञामात्रा- ( मन ), प्राणमात्रा ( प्राण ), भूतमात्रा ( वाक् ) नाम से प्रसिद्ध हैं | उदाहरण के लिए घटनिर्माता कुम्भकार को ही लीजिए । कुम्भकार मनः, प्राण- वाक् की समष्टि मात्र है । कुम्भकार का शरीर ' वाङमय ' ( पञ्चभूतमय ] है । इसके शरीर में प्राण है । प्राण के गर्भ में प्राणसञ्चालक मन है । ' घड़ा बनाऊँ ' सर्वप्रथम यह इसप्रकार की इच्छा करता है । तदनुकूल यत्न करता है, प्रयास करता हैं, चेष्टा करता है । यह इस का प्राणव्यापार है, इसी को ' कृति ' कहा जाता है । वस्तुतः मूल - वैदिक शब्द है - ‘ क्रतु ' । ' ऋतु ' ही निरुक्त क्रमानुपात से ' कृति ' रूप में परिणत होगया है । क्रतुरूप प्राणव्यापार के अनन्तर वह हस्तरूप वाग्व्यापार करता है । यह व्यापार इसका अपना व्यापार है । इसके साधन दुण्ड-४७१
पृष्ठ 734
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड कुलाल - चीवर - तन्तु -- मृत् आदि हैं । ये सब भी वाङमय ही हैं । इस वाक् पर अपनी वाक् का प्रयोग कर कुछ समय में कुम्भकार घटनिर्माण कर लेता है । इसी वाग्व्यापार को ' श्रम ' कहा जाता है । श्रमा-नन्तर जिस कामना से उस ने तपः - श्रम किया था, उसका वह कर्म्म सम्पन्न होजाता है | इसी वस्तु-स्वरूप - निर्माण- विज्ञान को लक्ष्य में रख कर अभियुक्त कहते हैं-ज्ञानजन्या भवेदिच्छा इच्छाजन्यं क्रतुर्भवेत् क्रतुजन्यं भवेत् कर्म्म तदेतत् कृतमुच्यते । निष्कर्ष यही हुआ कि, मनः-- प्राण - वाङमय आत्मा के कामना, तपः, श्रम, इन तीनों व्यापारों के समुच्चय से उसी प्रकार वस्तु - स्वरूप सिद्ध होजाता है, जैसे कि, - धारणा - ध्यान - समाधि, इन तीनों के एकत्र संयम से योगी को ' योगज सिद्धि ' प्राप्त होजाती है । घटनिर्माण से पहिले कुम्भकार अपने अन्त-जंगत् में घटका निर्माण करता है । पहले अपने ज्ञानीय जगत् में [ मनोधरातल में ] हीं घट का चित्र चत्रित [ संकल्पित ] करता है । अनन्तर उसी मानस घट में बहिर्जगत् की वस्तुओं [ मिट्टी ] का समावेश कर अपने ज्ञानघट को भौतिक जगत् में अभिव्यक्त कर देता है । जो घट अबतक ' नास्ति ' था, वही आज इस के मनः-प्राण - वाग - व्यापार से ' अस्ति ' रूप धारण कर लेता है । घट में शिल्प [ कारीगरी ] है । वह मन का ही स्वरूप हैं । वाक् मिट्टी है । एवं क्षणिक क्रियारूप प्राणव्यापार के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं मनः - प्राण – वाक् -- की समष्टि ही ' घटोऽम्ति ' व्यवहार का आधार है । घट वागुरूंप है, इस में तो सन्देह ही नहीं है | वाक् बिना प्राण के नहीं रहती । प्राण के तारतम्य से ही वस्तु में नाना अवस्थाएँ होतीं हैं । कालान्तर में घट जीर्ण होजाता है । नीर्णता क्षणिक - क्रिया के द्वारा होती है । क्रिया बिना ज्ञान कें सम्भव नहीं । ऐसी अवस्था में प्राण के साथ ही मन की सत्ता भी मान लेनी पड़ती है । जहाँ मनः- प्राण--वाक्, तीनों एक स्थान पर समन्वित होजाते हैं, वहीं ' अस्ति ' रूप ' सत्ता ' तत्त्व प्रादुर्भूत होजाता है । ऐसी अवस्था में हम सत्ता का अवश्य ही - ' मनः- प्राण - वाचां संघातः सत्ता ' यह लक्षण करसकते हैं | ससा के इस वास्तविक स्वरूप को न समझने के कारण हीं दार्शनिकोंनें अपने अपने भिन्न भिन्न लक्षण बना डाले हैँ । आस्तिक मानव ' नास्तिवाद ' के विरोधी हैं । वे अनुपलब्धि में कुछ सार नहीं समझते । ‘ अस्ति ब्रह्म ेति चेद्द्द्वेद सन्तमेनं ततो विदुः ': के अनुसार वे अस्तिरूपा उपलब्धि के ही उपासक हैं । अतएव उह्नोंनें सत्ता का ' उपलब्धिः सत् ' यही लक्षण किया है । उधर क्षणिकविज्ञानवादी बौद्ध महानुभाव ' सर्वं क्षणिकं क्षणिकं ' का उद्घोष करते हुए क्रिया को ही प्रधान मान कर ' अर्थक्रियाकारित्वं सत् ' इस क्रियाप्रधान लक्षण को ही प्रधानता देते । उधर जैनदर्शन ' उत्पाद ययधौव्यं सत् ' का ही निनाद कर रहे हैं हैं । विज्ञ पाठकों को विदित होगया होगा कि तीनों हीं लक्षण दृष्टिकोणभेद से तथ्यपूर्ण हैं । मन ज्ञान है, इसका उपलब्धि से सम्बन्ध है । इस दृष्टि से ' उपलब्धिः सत् ' यह कहा जासकता है । प्राण क्रिया है । प्राण के सम्बन्ध * –कृतिशब्ददृष्ट्या तु– “ इच्छाजन्या कृतिर्भवेत् कृतिजन्यं । मवेत्कर्म्म ” इत्यूह्यम् । सन्नेव स भवति, सद्ब्रह्म ेति वेद चेत् । ' अस्ति त्रह्म''ति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः ॥ ( कठोपनिषत् ) । ४७२
पृष्ठ 735
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण से ‘ अर्थक्रियाकारित्त्वं सत् ' इस लक्षण का भी विरोध नहीं किया जासकता । किन्तु हैं ये तीनों हीं लक्षण अपूर्ण । पूर्णता तो- ' मनः -- प्रारण - वाचां - संघातः सत्ता ' इसी लक्षण से अनुप्राणिता है । पूर्वप्रकरण से यह भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है कि, मनः प्रारण वाक् की समष्टि ही ' अस्ति ' है । यही सत् है | यहो सत्ता है । त्रिकल सत्ता के अतिरिक्त ( व्यवहारमात्र के लिए अतिरिक्त, किन्तु वस्तुतः श्रभिन्न ) चेतना, और आनन्द है । चेतना को ही ' विज्ञान ' कहा जाता है । इसप्रकार मनः - प्राण-वाक् - विज्ञान - आनन्द, भेदं से एक ही ब्रह्म की पाँच कलाएँ होजातीं हैं । पाँचों का ' कोशब्रह्म ' रूप से तैत्तरीय – उपनिषत् में विस्तार से निरूपण हुआ है । वहाँ ' वाग्ब्रह्म ' को ' अन्नब्रह्म ' नाम से व्यवहृत किया गया है । क्योंकि वाक् ही अन्नरूप में परिणत होती है । मनः प्रारण वाक् विज्ञान - आनन्द, कहिए, किंवा ‘ सच्चिदानन्द ’ कहिए, एक ही बात है । प्रत्येक वस्तु सच्चिदानन्दमूर्त्ति है, यह पूर्व में कहा गया है । उस में से ‘ सत्ता ' कला का निर्वचन उपरत हुआ । अत्र क्रमप्राप्त चित्, और आनन्द का भी संक्षिप्त स्वरूप पाठकों के सन्मुख उपस्थित कर दिया जाता है । बट है, और उसका हमें भान होता है । इस ' भान ' का ही नाम ' विज्ञान ' है । विज्ञान ही चित्, एवं दार्शनिक भाषा में ' चेतना ' है । जो वस्तु है, अथवा जिसका भान होता है, दूसरे शब्दों में जिसकी अस्ति, और भाति हैं, वही तीसरा तत्त्व ' रस ' है । वही ' आनन्द ' है । अत्र प्रसङ्गात् एक बात और समझ लेनी चाहिए । जिस मन: - प्राण वाङ्मयी सत्ता का पूर्व में निरूपण किया गया है, वह ब्रह्म का अमृतरूप है । ' अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यामृतमाहितम् - श्रद्धह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदद्ध ममृतम् ' के अनुसार अमृततत्त्व मृत्यु के बिना अनुपपन्न है । अमृतसत्ता-- अमृतविज्ञान - अमृतानन्द के साथ ही मर्त्यभाव भी प्रतिष्ठित रहते हैं । मन अमृत है । रूप इस का मर्त्यभाग है । मन हीं वस्तु के रूप से प्राकारित होता है । हम जिस वस्तु को देखते हैं, मन उसके रूप में परिणत होजाता है । दूसरे शब्दों में - तदाकाराकारित होजाता है । प्राण का मर्त्यरूप कर्म्म है । एवं वाक् का मर्त्यरूप ‘ नाम ' है । मनः - प्राण - वाक्, तीनों क्रमशः रूप - कर्म्म नाम भावों के आत्मा है | ‘ यस्य यदुक्थं सत् - ब्रह्म सत् - साम स्यात्, स तस्यात्मा ' के अनुसार जो जिस वस्तु का उक्थ ब्रह्म- - साम होता है, वही उस वस्तु का श्रात्मा माना जाता है । प्रभव को उक्थ कहते हैं । आधार को ब्रह्म कहते हैं । एवं परायण को साम कहते हैं । मन हीं सम्पूर्ण रूपों का प्रभव है । साथ ही रूपों का आधार भी मन ही है । एवं यच्चयावत् रूपों में मन हीं समानरूप से अनुस्यूत रहता है । दूसरे शब्दों में- मन में ही रूपों का अवसान है । अतः पूर्वलक्षणा-नुसार हम मन को रूपों का आत्मा मान सकते हैं । यही अवस्था कर्म्म के उक्थ- ब्रह्म सामरूप प्राण की है । एवं यही अवस्था नामों की उक्थब्रहासामरूपा वाक् की है । घटनाम- घटरूप - घटकर्म्म, तीनों मृत्यु-भाग घट के ‘ अस्तित्त्व ' पर ही प्रतिष्ठित हैं । जबतक घट का ' अस्ति ' तत्त्व है, तभीतक उसके नाम - रूप - कर्म्म | वह तत्त्व जिस रस का है, वह अनिवर्चनीयभाव ही आनन्द है । ' समृद्धानन्द ' इसी का मृत्युरूप है । परिवर्तनीय भाव ही मृत्यु कहलाता है, एवं न बदलने वाला भाव ही अमृत कहलाता है । अमृत, मृत्यु की यही साधारण परिभाषा है । नाम - रूप - कर्म बदलते हैं, अस्ति नहीं बदलता । घट है, ४७३ 1
पृष्ठ 736
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड तब भी अस्ति है । घटाभावरूप ' नास्ति ' में भी ' अस्ति ' है । ' घट है ' में भी ' है ' है । एवं ' घट नहीं है ' इस ' नहीं है ' के अन्त में भी ' है ' है । अतएव न बदलने वाला यह सत्तातत्त्व अवश्य ही मृत है । शान्तानन्द अमृत है | वह ' निर्विषयानन्द ' -- जोकि क्षोभ - रहित रहता हुआ सदा ‘ एकरस् ' है, शान्तानन्द है, एवं ' विषयानन्द ' प्रतिक्षण बदलने के कारण ' मर्त्य ' है । इसी प्रकार घटपटादि - भेदशून्य अनन्तज्ञान अमृतज्ञान है । भेदभावापन्न ' विविधज्ञान ' मर्त्य है । मृत्युभेद से अस्ति भाति - रस, तीनों पृथक् प्रतीत होते हैं । यदि भेदलक्षण मृत्यु को हटा दिया जाता है, तो तीनों तीन नहीं, अपितु एक हैं । अतएव जहाँ मृत्युनिचन्धन भेदभावका आश्रय लेकर ऋषि ब्रह्म को - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ' इसप्रकार त्रिकल बत-लाते हैं, कहाँ भातिसिद्ध मृत्युभेद के तिरोहित होजाने पर उसी के लिए - ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' इसप्रकार उसे सजातीय, विजातीय- स्वगत भेदशून्य बतलाते हुए ' एक ' बतलाते हैं । यही ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप है । इसी ब्रह्मस्वरूप को लक्ष्य में रखते हुए अभियुक्त कहते हैं—
प्रत्यस्ताशेषभेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम् ।
त्रचसामात्मसवेद्य ं तज्ज्ञानं ब्रह्म संज्ञितम् ॥
- प्रसिद्धा वेदान्तसूक्तिः - बात यथार्थ है । कहने को अस्ति, भाति, रस पृथक् हैं । वास्तव में तीनों एक ही हैं । भातिरूप ज्ञान भी ‘ है ’, रसरूप ग्रानन्द भी ' है ' । दोनों ' अस्ति ' हैं । अस्ति का भी ' ज्ञान ' होता है, रस का भी ' ज्ञान ' होता है । दोनों ' ज्ञान ' हैं । ज्ञान भी ' वस्तु ' है, अस्ति भी ' वस्तु ' है, दोनों ' रस ' हैं । तीनों तीनों हैं, अतएव तीनों एक हैं । प्रकारान्तर से लीजिए । जो ' है ', उसी की तो ' उपलब्धि ' होती है । एवं जो उपलब्धि का विषय है, और जो है वही तो ' उपलब्ध ' होत! है । एवं उपलब्धि ही तो ' ज्ञान ' है, वही तो रस है । इसप्रकार तीनी का ऐक्य भलीभांति सिद्ध होजाता है । ब्रह्म को कहाँ उपलब्ध करैं १, इस प्रश्न का बड़ा सुन्दर समाधान करती हुई उपनिषच्छ ति कहती है-नैव वाचा न मनसा प्राप्तु ं
शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र १ कुतस्तदुपलभ्यते ॥
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्वभावः प्रसीदति ॥
कठोपनिषत् २ ० ६ ० १२।१३ मं ० ‘ उपलब्धिवेद ’ के स्वरूप - परिचय - प्रसङ्ग से तत्प्रवर्त्त ' के ' सच्चिदानन्दना ' के तटस्थ स्वरूप की श्राराधना करनी पड़ी | अब प्रकृत का अनुसरण करते हैं । अस्ति भाति --रस-- के समुच्चय को ही ' सच्चि-( १ ) कथं तदुपलभ्यते - पाठान्तर । ४७४
पृष्ठ 737
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण दानन्दब्रह्म ' बतलाया गया है । इसी की हमें ' उपलब्धि ' होती है । वह उपलब्धि भी अस्ति - भाति - रस--इन तीन भागों में ह्रीं विभक्त हो रही है । अस्ति की उपलब्धि ' विद्यते ' रूप से हो रही है । भाति की उपलब्धि ' वेत्ति ' रूप से होरही है, एवं रस की उपलब्धि विन्दति ' रूप से होरही है । ' विद्यते घटः'-यही ' अस्ति ' का स्वरूप है । ' वेत्ति ' यह ' भाति ' का स्वरूप है । एवं ' विन्दति ' ' रस ' का स्वरूप है । ' है'- ' - ' जानता है ' - ' प्राप्त करता है ' - एक ही विद्धातु इन तीनों से सम्बन्ध रखता है । ' विद्यते इति वेदः ' का अर्थ है ' अस्ति वेद: ' । ' वेत्ति इति वेद: ' - का अर्थ है ' भातिवेदः ' । एवं ' विन्दति इति वेदः ' का अर्थ है - ' रसो वेद: ' । विद्यते में सत्तापूर्वकज्ञान है । ' घटोऽस्ति, अतो ज्ञायते ' में घटसत्ता पहिले है, अनन्तर उसका ज्ञान है । ' वेत्ति ' में ज्ञानपर्बिका सत्ता है । ' घटं वेद्मि, श्रुतः – अस्ति ' ( घड़ा जानता हूँ, इसलिए वह हैं ) में घटज्ञान पहिले है, अनन्तर सत्ता है । ‘ अस्ति, अतः - ज्ञायते ', अथवा ' ज्ञायते अतः अस्ति ' इस विषय का निर्णय करना कठिन है । भित्ति के उस पार घट का अस्तित्त्व है ( घट रक्खा है । ) परन्तु हम उसे नहीं जानते । यदि सत्ता ही ज्ञान का कारण होती, तो हम घट को जान लेते । इसलिए ' सत्ताप र्वक ज्ञान होता है ' यह भी नहीं माना जासकता | साथ ही बिना वस्तु के ज्ञान भी नहीं होता । श्रतः ज्ञान को भी सत्तापूर्वक नहीं माना जा सकता । इसप्रकार सत्ता, और भाति के पौर्वापर्य्यं का निर्णय कर लेना हम जैसे साधारण व्यक्तियों के लिए कठिन ही है । विद्वानोंनें इसका निर्णय भी कर दिया है । किन्तु उस तात्त्विक निर्णय का श्राधारस्तम्भ ' प्रत्ययैकसत्य ' मूलक अन्तर्जगत् - वहिर्जगत् के स्वरूप - विज्ञान पर ही अवलम्बित है, जिसका कि निरूपण करना आव-श्यकता से अधिक विस्तार का आश्रय लेना होगा । अतः फिर किसी आगे के प्रकरण के लिए इस चर्चा को अत्रैव उपरत कर प्रकृत का आश्रय लिया जारहा है । ' नाम, रूप, कर्म्म, ये तीनों सम्मिलित रूप से ही प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्त्व के परिचायक बनते हैं । इन तीनों की अभिव्यक्ति से ही ' व्यक्ति ' के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती है । अतएव नामरूपकर्म्मसमष्टि को ही हम व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का बाह्यस्वरूप कह सकते हैं, जो कि आभ्यन्तर व्यक्तित्त्वरूप मनःप्राणवाङ्मय सत्ताभाव पर ही प्रतिष्ठित माना गया है । ज्ञानशक्तिमय मन, क्रियाशक्तिमय प्राण, एवं अर्थशक्तिमयी वाक्, तीनों की समन्वितावस्थारूपा सत्ता ही व्यक्ति का छन्दोरूप वयोनाधात्मक आभ्यन्तर व्यक्तित्त्व है, जिसके आधार पर ही नामरूपकर्ममय वयोरूप बाह्म व्यक्तित्त्व प्रतिष्ठित रहा करता है । यागे के रेखाचित्र से इस उभयविध-व्यक्तित्त्व का भलीभाँति स्पष्टीकरण होजाता है । ४७५
पृष्ठ 738
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
वयुनम सर्वमिदं वय वय शतपथविज्ञानभाष्य-( १ ) - अभिव्यक्तिचाधारभृत- ' वयुन ' परिलेख: -वय क .............. राः: ---C + म प्रा वा करू ना वय धः सम्मम क ः नः वया ( २ ) - इयमेकैका व्यक्तिरभिव्यक्तिः - प्रजापतिः - वयुनम् रूपम्. ( १ ) प्रजापति व्यक्तिरेव १. मनः २- प्राण: कर्म्म ( २ ) ३- वाक् नाम ( ३ ) अस्ति अयम् अमृतम् मर्त्यम् ३ ३ व छान्दितम् यः यो व धः ना छन्दः Lite . शाः-****** वय वय वव्यक्ति अभिव्यक्तिरे
पृष्ठ 739
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण सत्तापूर्वक ज्ञान हो, अथवा ज्ञानपूर्विका सत्ता हो, यहाँ केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि, ‘ विद्यते ’ – निर्वचन सत्तापूर्वक: - - ज्ञानभाव इ का द्योतक है, एवं ' वेत्ति ' निर्वचन ज्ञानपूर्विका - सत्ताभाव का द्योतक है । इस अस्ति, और भाति से ( विद्यते वेत्ति से ) जो ' रस ' प्राप्त होता है, वही वास्तविक ' उपलब्धि है । सच्चिदानन्दरूप पदार्थ की सच्चिदानन्दरूप जीव में प्राप्ति होजाना हीं उपलब्धि है | पदार्थचैतन्य का सम्बन्ध होजाना हीं उपलब्धि है । वेदान्तदर्शन के अनुसार ' प्रत्ययरूपा ' ' उपल-ब्धि ' का निम्न लिखित लक्षण सुप्रसिद्ध है -‘ अन्त: करणावच्छिन्न ं चैतन्यं - अन्तकरणवृत्यवच्छिन्न ं चैतन्यं - विषयावच्छिन्न ं चैत-न्यम् - त्रयाणामेकत्र संयोगः प्रत्ययः । सम्मुख घट विद्यमान है । यह ' विषय ' है । देवदत्त को उसका ' ज्ञान ' होरहा है । इस ' घटप्रत्यय ' में ज्ञाता - ज्ञान - ज्ञेय, तीनों का समन्वय है । ' ज्ञाता ' अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य है । ' ज्ञेय ' विषया-वच्छिन्न चैतन्य है, एवं ' ज्ञान ' अन्तःकरणवृत्यवच्छिन्न चैतन्य है । ' शरीराकाश ' के मध्य में प्रतिष्ठित ' हृदयाकाशे ' ( केन्द्र ) ' दह्रकाश ' है । उसमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रतिष्ठित है । इन्द्रिय के द्वारा यही ज्ञाता है । इस. चैतन्य की रश्मियाँ इन्द्रियों के द्वारा बाहिर निकलतीं हैं । यही अन्तकरणवृत्यवच्छिन्न चैतन्य है । इसी को पूर्व में ' ज्ञान ' शब्द से व्यवहृत किया गया है । इस नृत्यवच्छिन्न चैतन्य का पुरोऽवस्थित घटचैतन्य के साथ ( विषयरूप ज्ञेय चैतन्य के साथ ) सम्बन्ध होता है । देवदत्त का ज्ञान तदाकाराकारित होजाता है इसप्रकार तीनों के समन्वय से ' घटमहं जानामि ' इस ' प्रत्यय ' का स्वरूप अभिव्यक्त होता है । तीनों के समन्वय से अभिव्यक्त होपड़ने वाले इसी ' ज्ञान ' को दार्शनिक - परिभाषा में ' पार्ष्टिज्ञान ' कहा जाता है । इसप्रकार प्रत्येक ज्ञान का ' त्रिपुटित्त्व ' सिद्ध होजाता है । ' विद्यते घटः - अस्ति घटः ' यही ' सत्तावेद ' है । ' वेत्ति घटम् ' - ' जानाति घटम् ' - यही ' प्रत्ययवेद ' है । ' विन्दति प्राप्नोति घटम् ' यही लाभवेद् है । इसप्रकार विद्यते - वेत्ति - रूप अस्ति, भाति, से जो एक अपूर्व रस उपलब्ध होता है, वह सत्ता, भाति, से श्रमुगृहीता रसरूपा ‘ उपलब्धि ' ही वेद है । पदार्थ की अभिव्यक्ति ही उसकी उपलब्धि है । अभिव्यक्ति को ही ‘ व्यक्ति ' कहा जाता है । अनन्त व्यक्तियाँ हैं, अतः अनन्त ही उपलब्धियाँ हैं । अनन्त वेद हैं । इसी आधार पर तैत्तिरीयोक्त भारद्वाज, और इन्द्र के सम्भाषण में इन्द्रने भरद्वाज के प्रति ' अनन्ता वै वेदाः ' कहा है | नाम - रूप - कर्म्म हीं व्यक्तिभेद के कारण हैं । यदि इनको पृथक् कर दिया जाता है, तो ‘ सामान्यसत्ता ’, तथा ‘ सामान्यज्ञान ' से अनुगृहीत ' सामान्यरसोपलब्धि ' रूप एक ही वेद शेष रह जाता है । आप जितने भी पदार्थ देख रहे हैं, सत्र भौतिक हैं । इन सब का दर्शन, किंवा उपलब्धि अस्ति— भाति से अनुगृहीत रसरूप ही है । यही वेद है । अतएव हम कह सकते हैं कि, नामरूपकर्म्मात्मिक सभी भूत वेदत्रयी के गर्भ में ही प्रतिष्ठित है । इसी – ' उपलब्धिरूप - वेदस्वरूप ' को लक्ष्य में रखकर ऋषि कहते हैं--४७७
पृष्ठ 740
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
- शत ० १ ० 1३।१।२१ इति । रहा I आकाशः = स्थितितत्त्वम् = वाक् - जूः वायुः = गतितत्त्वम् = प्राणः = यत् प्रथमकाण्ड - यज्जू: - तदेव यजुः ४७८ " सामेव विद्यायां सर्वाणि भूतान्यपश्यत् । एतद् वा अस्ति । एतद्ध्य-मृतम् | यद्धयमृतं तद्ध्यस्ति । एतदु तद् - यन्मर्त्यम् | त्रय्यां वा विद्यायां सर्वाणि भूतानि ” त्रयीविद्या के ' सत्ता ' भाग का मर्त्यभाग ही नामरूपकम्र्मात्मक ' भूत ' भाग है । मर्त्यभाग भी उसी का अंश है | इसी अभिप्राय से ' एतदु तद् यन्मर्त्यम् ' यह कहा है । यह है ‘ ज्ञानरूप - उपलब्धि-वेद ' का संक्षि'तं स्वरूप - निदर्शन | अब ' सत्यवेद ' की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जा-अग्नि सत्य है । इसका आविर्भाव परमेष्ठी में होता है, जैसा कि प्रकरण के आरम्भ में हीं बतलाया जाचुका है । मानसी - मैथुनी - याज्ञिकी, आदि भेद से सृष्टिविवर्त्त अनेक धाराओं में विभक्त है । इन में ' मैथुनीसृष्टि ' का आरम्भ आपोमय परमेष्ठी से ही होता है । ' योषाप्राण ' पत्नी है, ' वृषाप्राण ' पति है । अग्नि वृषा है, यह आङ्गिरस है । सोम योषा है, यह भार्गव है । भृग्वङ्गिरोमय योषा – वृषारूप पति पत्नी का प्रादुर्भाव परमेष्ठी में ही सर्वप्रथम होता है । एवं इन दोनों का समन्वय ही ' मिथुन ' है । इस मिथुन से ही आगेके सम्पूर्ण ' मैथुनीमृति ' - विवत ' सम्पन्न होते हैं । अत: हम अवश्य ही भृग्वङ्गिरोमय परमेष्ठी को ‘ मैथुनीसृष्टि ' का प्रथम - प्रवर्तक मान सकते हैं । इस मैथुनी सृष्टि में सबसे पहिले पोमय परमेष्ठी के केन्द्र में ‘ वराह ' वायु के द्वारा अग्निघन सूर्य्यं का ही जन्म होता है । सबसे पहिले उत्पन्न होने के कारण हीं यह सत्यतत्त्व ‘ अग्रि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यह ' अग्रि ' ही परोक्ष भाषा में ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हो गया है । जिस ‘ उपलब्धिवेद ' का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उसे हमने ' ज्ञानमय ' बतलाया है । ज्ञानप्रधान यह बेद ‘ स्वायम्भुववेद ' है । इसे ही ' ब्रह्मनिः श्वसितवेद् ' कहा जाता है । ऋक् – साम– यजुः - भेद से इस में तीन कलाएँ हैं । ऋक्साम वयोनाध हैं - यजुः ' वय ' है । वस्तु को वय कहते हैं, एवं वस्तु जिस छन्द से छन्दित रहती है, वह छन्द ही ' बयोनाथ ' कहलाता है । यजु से सृष्टि होती हैं । एवं ऋक्साम सहकारीमात्र हैं । यजु में - ' यत् - जू ' - दो भाग हैं । यत् गतितत्त्व है, --जू स्थिति है | स्थितिरूप जूतत्त्व ' जूराकाशे सरस्वत्यां पिशाच्यां यवने स्त्रियाम् ' के अनुसार आकाश है । गतितत्त्वरूप यत् वायु है । वायु प्राण है, आकाश वाक् है । आकाश - वायु, वाक् - प्राण, स्थिति - गति, कुछ भी कहिए, एक ही बात है । स्थितिगतिरूप वाय्वाकाश-- स्वरूप वाक्प्रारण की समष्टि ही ' यज्जू ' है । ' यथाकाशगतो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् के अनुसार वाय्वाकाशरूप यत्, और जू अविनाभूत हैं । यही ' यज्जू ' परोक्ष-प्रिय देवताओं की परोक्षप्रियता के कारण ' यजु: ' नाम से प्रसिद्ध है, जैसा कि वाजसनेयश्रुति कहती है—