Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 841–850

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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परात्परः शतपथब्राह्मण परात्परः— परमेश्वरः— प्रखण्ड: – सर्वपरिग्रहातीत: - विश्वातीतः १- आत्मा त्रिमूर्त्तिख्ययात्मा सोऽयं सनातनषोडशी ईश्वरोऽयम्: २ - पदम् त्रिमूर्त्तिरक्षरात्ना सोऽयं प्रतिमाषोडशी जीवोऽयम् ३- पुनःपदम् ' त्रिमूर्त्तिः क्षरात्मा सोऽयं उपेश्वरषोडशी जगदिदम् blch परात्परः — परमेश्वरः – अखण्ड: – सर्वपरिग्रहातीतः - विश्वातीत: ( १ ) -( १ ) - श्रात्मा ( २ ) -पदम् अमृतात्मा - श्रव्ययः ब्रह्मात्मा - अक्षरः - षोडशीपुरुषः -- सनातनः - ईश्वरः - पुनः पदम् शुक्रात्मा - क्षरः ( २ ) ( १ ) - आत्मा ( २ ) -पदम् अन्तर्यामी - ब्रह्म ेन्द्र विष्णुमूर्तिः ( ३ ) - पुनःपदम् सूत्रात्मा - अग्नि- सोममूर्त्तिः ( ३ ) १- आत्मा- ब्रह्मा वेदात्मा- इन्द्राग्निसोममूर्त्तिः २ - पदम् — स्वयम्भूः प्रतिमाप्रजापतिः-परोरजाः ' > स्वयम्भूः ( १ ) ३ - पुनः पदम् -- परमाकाशः * १ - श्रात्मा— विष्णुः २- पदम् --परमेष्ठी ३- पुनः पदम् - महास ुद्रः १- आत्मा — इन्द्रः २ - पदम् — सूर्य्यः ३ - पुनः पदम् -- सम्वत्सरः १ - श्रात्मा - अग्निः " २ - पदम् पृथिवी ३ - पुनः पदम् - इलान्दम् १ - श्रात्मा - सोमः २- पदम् — }- सूर्य्य: ( ३ ) पृथिवी: ( ४ ) चन्द्रमाः - चन्द्रमा: ( ५ ) ३ - पुनः पदम् -- परिप्लवः ५७१ ( २ ) । - प्रजापतिः - षोडशी उपेश्वर

पृष्ठ 842

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प्रथमकाण्ड अनन्त है अविज्ञेय परात्पर परमेश्वर । अनन्त है दुर्विज्ञेय मायी महेश्वर । श्रतएव इन विज्ञेय, दुर्विज्ञेय -- महिमाभावों के सम्बन्ध में मानवबुद्धि कर्त्तव्यकर्म्मनिष्ठात्मिका आचारनिष्ठा के अनुबन्ध से कुछ भी पुरुषार्थ नहीं कर सकती । इस की पुरुषार्थता का उपक्रम होता है परोरजामूर्त्ति - परमाकाशात्मक--पञ्चपुण्डीराप्राजापत्यन्रल्शाध्यक्ष - उस -- ' प्रतिमाषोडशीप्रजापति ' से ही, जिसे योगमायावच्छिन्न होने से ही महर्षियोंने -- ‘ ज्ञेय - प्रजापति ' मान लिया है । मानवीय जीवाव्यय भी स्वयं उस ' योगमाया ' से समावृत है, जिस से कि सत्यात्मक प्रतिमाप्रजापति अवच्छिन्न है ( १ ) । सत्यमूर्त्ति ये ही परोरजा ' प्रतिमाप्रजापति ' ऋक्-संहिता में - ‘ विश्वकर्म्माभौवन ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं, जो सप्तलोकात्मक, त्रिधामात्मक विश्वभुवनों के अधिपति बनते हुए -- ' विश्वेश्वर ' नाम से प्रसिद्ध हैं, जिन के कि गर्भ में व्यष्ट्यात्मक पाँच उपेश्वरतन्त्र प्रतिष्ठित हैं । पञ्चपुण्डीरा -- प्राजापत्यत्रल्शात्मिका एक शाखा ( मायी महेश्वराश्वत्थ की एक शाखा ) से अपना सर्वस्व स्वरूप अनुप्राणित रखते हुए विश्वकर्मा - परोरजा - प्रतिमाप्रजापति - नामक ये विश्वेश्वर ही स्वमहिमा के गर्भ में ठीक अपने अनुरूप ही स्वयम्भूरादि चन्द्रमान्त पाँच पुण्डीर प्राजापत्यों को दहरोत्तर सम्बन्ध से जन्म देते हैं । ये पाँचों हीं - -'पुत्रं मित्रवदाचरेत् ' न्याय से मानो विश्वकर्मा के ' सखा ' ही हैं, जिन का स्वरूप श्रात्मा - पदं - पुनःपदं - रूपेण ठीक विश्वकर्म्मा जैसा ही है । स्वयम्भू - परमेष्ठी - की समष्टि ही इन विश्वकर्म्मा के ' परमधाम ' हैं । मध्यस्थ सूय्य ही इन का ' मध्यमधाम ' है । एवं पृथिवी - चन्द्रमा की समष्टि ही इन के ‘ अत्रमधाम ' हैं | हमारे ( मानव के ) लिए तो ये ही ज्ञेय हैं, उपास्य हैं, सर्वस्व हैं । यज्ञात्मक विश्व के ये हैं । मूलारम्भक हैं अपने ' सर्वहुतयज्ञ ' के माध्यम से | शब्दात्मक वेदशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले विज्ञान-स्तुति - इतिहास - ज्ञान - कर्म - उपासना नामक ज्ञातव्य कर्त्तव्य भावों की स्वरूप- प्रतिष्ठा ये ही विश्वकर्मा - विश्वे-श्वर हैं, जिन का निम्नलिखिता श्रार्षवाणी के माध्यम से अत्र संस्मरण मात्र ही कर लिया जाता है, एवं आठवें - रेखाचित्र के द्वारा इन की नैदानिकी उपासना को अंशतः मनोऽन्विता बना लिया जाता य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वहषिर्होता न्यसीदत् पिता नः ॥ स श्राशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आविवेश ॥१ ॥

या ते धामानि परमाणि, याचमा, या मध्यमा विश्वकर्म्मन्न ुतेमा ।

शिक्षा सखिभ्यो हविषि स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः ॥ २ ॥

यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा ॥

यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्न ' भुवना यन्त्यन्या ॥ ३ ॥

परो दिवो पर एना पृथिव्यां परो देवेभिरसुरैर्यदस्ति ॥

कं स्विद्गर्भ आपो यत्र देवा समपश्यन्त विश्वे ॥ ४ ॥

- ऋक्सं ० १० ८१,८२, सूक्तों के मन्त्र ( १ ) - नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमाया - समावृतः । ( गीतायाम् ) वीक्ष्य रन्तु ं मनश्चक्रे योगमायासमावृतः । ( श्रीमद्भागवते ) • ५७२

पृष्ठ 843

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( ८ ) -- सत्यप्रजापतिर्विश्वेश्वरो ज्ञेयो विश्वकर्मा - प्रतिमा प्रजापतिः - ( अष्टम - रेखाचित्र ) -पुण्डीरस्वयम्भूः सत्यप्रजापतिः अक्षरात्मा प्रतिमाषोडशी ( श्रव्यक्तस्वयम्भूः ) पुण्डीरस्वयम्भूः ( पृ ० सं ० ५७२ ) पुण्डीरस्वयम्भूः पुण्डीरस्वयम्भूः

पृष्ठ 844

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शतपथब्राह्मण अत्र एक एक दूसरे नवम रेखाचित्र के माध्यम से - पूर्वोक्त ' ज्ञेय ' विश्वकर्मा प्रजापति के उस ' विज्ञेय'-शाखात्मक स्वरूप की भी आराधना करली जाती है, जो पञ्चमहाभूतों के माध्यम से मानव के लिए सचमुच ही ' विज्ञेय ' बना हुआ है । परोरजा -- सत्य - प्रजापति का यज्ञात्मक स्वरूप ही इस ' विज्ञेय ' का स्वरूस-परिचय है, अतएव इसे ‘ यज्ञ ', किवा - ' अधियज्ञ ' नाम से भी व्यवहृत किया जासकता है । ' ते देवा श्रत्र -वन् - यज्ञं कृत्त्वा सत्यं तनवाम है ' इत्यादि ब्राह्मणश्रुति का ' सत्य ' पूर्वोक्त विश्वकम्मत्मिक ' सत्यप्रजापति ' है, एवं ' यज्ञ ' यही पञ्चपर्वा ' यज्ञप्रजापति ' है, जो पाँच पर्वों से ही -- पाक्त ' ( पञ्चावयव ) कहलाता है । इसी आधार पर - ' पाङक्तो वै यज्ञः ' यह अनुगम प्रसिद्ध है, जिस की हविर्ग्रहण - कर्मानुगत - ' यच्छन्तां पञ्च ' इत्यादि प्रकरण में विस्तार से व्याख्या की जा चुकी है । एक के गर्भ में दूसरे के समाविष्ट होजाने का ही नाम यज्ञ है । इस कर्म्म में - आधारभाव ही ‘ अग्नि ' कहलाया है, एवं तत्र गर्भीभूत आहितभाव ही ' ' सोम ' कहलाया है । आहित शब्द ही परोक्षभाषा में - ‘ आहुति ' नाम से प्रसिद्ध होगया है । फलतः - ' अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' ही यज्ञलक्षण सम्पन्न होजाता है । परमाकाशात्मा स्वयम्भू - ब्रह्म श्राधारात्मक बनता हुआ यदि ' अग्नि ' है, तो इसमें श्राहित - आहुत परमेष्ट्यादि शेष चारों आहुतिद्रव्यात्मक सोम है । ' स्वयं यजस्त्र तन्वं वृधानः ' [ ऋक्सं ०१० | ८१ | ५ | ] के अनु-सार यह स्वयं ही स्वस्वरूपभूत परमेष्ट्यादि की स्व में हीं आहुति देता हुआ अपने स्वायम्भुव शरीर को [ तनु-को ] चन्द्रमा पर्य्यन्त वितत किए हुए है । अर्थात् स्वायम्भुव परमाकाशात्मक पुनः पदलक्षण महिमामण्डल के गर्भ में हीं परमेष्ट्यादि शेष चारों प्रतिमाप्रजापति गर्भीभूत हैं । अतएव इसे ' सर्वहुत ' यज्ञ कहा गया . है, जिसका कि - ' तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ' [ यजुःसहिता ] इत्यादि मन्त्रश्रुति से स्पष्टीकरण हुआ है । भगवान् याज्ञल्क्यने इसी सर्वात्मक - सर्वरूप - विश्वरूप, श्रतएव ' विश्वदानि ' नाम से प्रसिद्ध स्वायम्भुव सर्वहुतयज्ञ को लक्ष्य बना कर कहा है-ब्रह्म वै स्वयम्भु तपोऽतप्यत । तत्सर्वेषु भूतेषु श्रात्मानं हुवा, भूतानि चात्मनि, सर्वेषां भूतानां श्रेष्ठ्य ं स्वाराज्यं - आधिपत्यं पय्यैत् । स वा एष सर्वमेध यज्ञक्रतुर्भ-वति । ( शत ० १३ | ७ | १।१ । ) । ' सर्वहुतं हि जुहोति ' । ( शत ० १३ | ५ | २ | २३ | ) । इसी स्वायम्भुव सर्वहुतयज्ञ के गर्भ में तत्प्रतिमाभूत दूसरे पारमेष्ठ्य - भृग्वङ्गिरोमय ‘ यज्ञ ' का आविर्भाव होता है, जो कि -'अतियज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध है । महासमुद्रात्मक इस पारमेष्ठ्य - ' गोसव ' नामक ' पञ्चद-शाह ' यज्ञ के गर्भ में तदुत्तरस्थ सूर्य्य - पृथिवी - चन्द्र नामक तीनों प्राजापत्य विवर्त्त प्रतिष्ठित हैं । पारमेष्ठ्य महा-समुद्र के गर्भ में बुद्बुद्रूपेणावस्थित तीसरा ' सौरयज्ञ ' है, जिसे - ' नवाहयज्ञात्मक ’ - ‘ ज्योतिष्टोम ' यज्ञ कहा गया है, जिसके श्रृङ्गात्मक यज्ञ ' आयुष्टोम ' ' गोष्टोम ' नाम से प्रसिद्ध हैं । त्रियज्ञात्मक सौरयज्ञ के महिमामण्डलात्मक ' सम्वत्सरमण्डल ' के गर्भ में हीं तदुत्तरस्थ पृथिवी - चन्द्रमा नामक दोनों प्राजापत्य विवर्त्त प्रतिष्ठित हैं । सौरसम्वत्सरमण्डल के गर्भ में बिन्दुमात्रेणावस्थिता पृथिवी में भी यज्ञ होरहा है, जिसके कि आंग्नहोत्र - चातुर्मास्य - श्रयन आदि अनेक विवर्त्त हैं । यही पार्थिवयज्ञ हमारे वैधयज्ञों की मूलप्रतिष्ठा बना ५७३

पृष्ठ 845

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प्रथमकाण्ड हुआ है । इस पार्थिव- इलान्द नामक महिमामण्डल के गर्भ में हीं सर्वान्त का वह चन्द्रमा प्रतिष्ठित है, जो कि पार्थिव यज्ञिय देवताओं का अन्नात्मक आहुतिद्रव्य माना गया है, जैसाकि ' एष वै सोमो राजा देवा-नामन्न ं , यच्चन्द्रमाः ' इत्यादि श्रुति से स्पष्ट है । स्वयं चन्द्रमा में ( विशुद्ध आहुतिद्रव्य के प्राधान्य से ) स्वत-न्त्र यज्ञप्रवृत्ति का अभाव है । अतएव यज्ञमूला प्राजापत्या सृष्टि यहाँ परिसमाप्त हैं । अतएव परिप्लवात्मक चान्द्रमण्डल को - ' निधनसाम ' नाम से व्यवहृत किया गया है । इसप्रकार स्वयम्भ से आरम्भ कर चन्द्रमा-पर्य्यन्त ' अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' मूलक अन्न अन्नादात्मक - धारावाहिक यज्ञक्रम प्रक्रान्त है! स्थितिक्रमानुसार जहाँ चन्द्रमा सर्वान्त में है, वहाँ दृष्टिक्रमानुसार पृथिवी, अर्थात् भूपिण्ड सर्वान्त में मान लिया गया है । सृष्टिस्थित्यनुसार परमेष्ठी स्वयम्भू का उपग्रह है, सूर्य्य परमेष्ठी का उपग्रह है, भूपिण्ड सूर्य्य का उपग्रह है, एवं चन्द्रमा भूपिण्ड का उपग्रह है । मूलग्रह का पारिभाषिक नाम है ' प्रतिपत् ', एवं इस ग्रह से उत्पन्न उपग्रह का नाम है - ' अनुचर ' । इसी आधार पर वेदशास्त्र की ग्रहोपग्रहमूला सुप्रसिद्धा-' प्रतिपद्नुचरविद्या ' अभिव्यक्त हुई है, जिसके स्वरूप - विश्लेषण का श्रत्र अवसर नहीं है । स्व - स्व - कक्षाट-त्तानुगत ग्रहोपग्रह - परिभ्रमण विद्या का ही नाम प्रतिपदनुचरविद्या है । प्रकृत में यही वक्तव्य है कि, पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्या - बल्शात्मक - सप्तभुवन- नामक यज्ञात्मक विश्व में स्वयम्भू केवल ग्रहात्मक ' प्रतिपत् ' ही हैं । अन्य सम्पूर्ण ग्रहोपग्रह इसकी अपेक्षा से इसके ' अनुचर ' ही बने हुए हैं । सत्र स्वयम्भू को केन्द्र मान कर स्व स्व कक्षावृत्तों पर लात - चक्रवत् प्रचण्डवेग से यथानुपात परिभ्रममाण हैं । इसी परिभ्रममाणात्मिका प्राणगति से विश्वपदार्थों का परस्पर अन्नान्नादात्मक, किंवा अग्नी-घोमात्मक श्रादान- विसर्ग- व्यापार प्रक्रान्त है । इसी सहज प्रक्रिया का नाम ' यज्ञ ' है । यही सृष्टि का अन्यतम स्वरूप - रक्षक है । ' यज्ञेन यज्ञयमयजन्त देवाः " " मूलक सिद्धान्त के प्रति किसे सन्देह हो सकता है 1 दूसरा परमेष्ठी स्वयम्भू की अपेक्षा जहाँ उपग्रह बनता हुआ ' अनुचर ' है, वहाँ सूर्य्याद्यपेक्षया ग्रह बनता हुआ प्रतिपत् भी है । तथैव सूर्य्य परमेष्ठ्यपेक्षयां जहाँ अनुचर है, वहाँ पृथिव्याद्यपेक्षया प्रतिपत् भी है । एवमेव भूपिण्ड सूर्य्यापेक्षया अनुचर है, तो चन्द्रमाद्यपेक्षया प्रतिपत् भी है । एवमेव चन्द्रमा भूपिण्डा-पेक्षया अनुचर है, तो स्वानुगता चतुद्दशविधा भूतसर्गप्रजा की अपेक्षा इन का प्रतिपत् भी बना हुआ है, इत्यलमतिपल्लवितेन प्रासङ्गिकेन । असंख्य - अगणित हैं तथोक्त प्रतिपदनुचरात्मक ग्रहोपग्रह इस यज्ञात्मक विश्व के गर्भ में, जिनका पञ्चधा ही वर्गीकरण हुआ है महर्षियों के द्वारा, जिस इस विस्तारक्रम में न जाकर प्रकृत में हम पञ्चपुण्डीरा-. बल्शा से अनुप्राणित प्रतिपदनुचरभाव को ही प्रमुख मान कर तथ्य का समन्वय कर रहे हैं । निष्कैवल प्रति-पद्माव से स्वयम्भू अविचाली है, स्थिर है, अर्थात् ' सर्वतो दिग्गति ' रूप है । शेष चारों हीं उभयभावा-त्मक बने हुए हैं । इन चारों के परिभ्रमणाधारभूत कक्षावृत्त कमशः रजोवृत्त, अयनवृत्त, क्रान्तिवृत्त, दक्षवृत्त, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । जिस वृत्त को आधार बना कर समहिम परमेष्ठीविष्णु स्वयम्भूब्रह्म के चारों ओर, किन्तु ' परमाकाश ' नामक स्वायम्भुव महिमामण्डल के गर्भ में परिभ्रममाण हैं, वही ' रजोवृत्त ' है, जो लोकसामान्य में अप्रसिद्ध है । जिस वृत्त को आधार बना कर समहिम सूर्येन्द्र परमेष्ठी के चारों ओर, किन्तु - ' महासमुद्र ' नामक पारमेष्ठ्य महिमामण्डल के गर्भ में परिभ्रममाण है, वही - अयनवृत्त ' नाम ५७४

पृष्ठ 846

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( ६ ) - पञ्चपुण्डीर प्राजापत्यचल्शात्मकः - यज्ञप्रजापतिलक्षणः -- ( नवम रेखाचित्र ) -आत्मतरमूर्त्तिः सविकारः - उपेश्वरषोडशी - विज्ञेयः ( पृ ० सं ० ५७५ ) परारजा: -बह सत्यम् हंसः यज्ञः विष्ता: सूय इन्द्र पृथिवी अग्निः स्वयम्भूः परमे छान्न: छौः सत्यम् ७ द्यौः पृथिवी बने ५ अन्त ०० महा घारे ५० स्वः ३

पृष्ठ 847

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शतपथब्राह्मण से प्रसिद्ध है, जो कि परिक्रमा २५ सहस्र वर्षों में परिसमाप्त होती है, एवं जिसके साथ ही ध्रुवपरिभ्रमण का सम्बन्ध है । जिस वृत्त को आधार बना कर समहिम भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर, किन्तु ' सम्वत्सर ' नामक सौरमहिमामण्डल के गर्भ में परिक्रमा लगाता रहता है, वही - ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है । यही ' वार्षि-कगति ' की आधारभूमि है । एवं जिस वृत्त को आधार बना कर समहिम चन्द्रमा भूपिण्ड के चारों ओोर, किन्तु ' इलान्द ' नाम के भूमहिमामण्डल के गर्भ में घूमता रहता है, वही - ' दत्तवृत्त ' कहलाया है । उक्त चारों में पत्रमानसोममय परमेष्ठी का, तथा वृत्र सोममय चन्द्रमा का, इन दोनों का जहाँ केवल वृत्तानु-गत परिभ्रमण ही है, वहाँ सूर्य्य, और भूपिण्ड, इन दोनों सत्य, पण्डों का वृत्तपरिभ्रमण के साथ साथ अपने अपने अक्षों पर भी परिभ्रमण होता रहता है । यही ' स्वाक्षपरिभ्रमण ' कहलाया है । यह है पाँचों प्रतिपद-नुचर - भावों के परिभ्रमण की सक्षिप्ता स्वरूपगाथा | आगे का नवम - रेखाचित्र इसी यज्ञप्रजापतिस्वरूप की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है । दृष्ट्यपेक्षया अन्तिम बने हुए अब उस पार्थिव विवर्त्त की ओर ही हम अपने यज्ञप्रेमियों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, जिस पार्थिव - विवर्त्त ' का भूपिण्ड ही शतपथ ब्राह्मण के प्रथमकाण्ड की मूलप्र-तिष्ठा है । कर्मेतिकर्त्तव्यतानिष्ठ याज्ञिकों को यह विदित ही है कि, चौदह - काण्डों की समष्टिरूप शतपथ-ब्राह्मण का प्रक्रान्त ‘ प्रथमकाण्ड ' ' हविर्यज्ञकाण्ड ' नाम से ही प्रसिद्ध है । अग्नि में सोमाहुति ही यज्ञ की स्वरूप - परिभाषा है | जिसप्रकार - ' चतुर्द्धा विहितो ह वा अग्रे अग्निरास ' ( शत ० ) के यज्ञियाग्नि पारमेष्ठ्य - सौम्याग्नि, सौर सावित्राग्नि, पार्थिव गायत्राग्नि, भौम भूताग्नि भेद से चार प्रकार का है, एवमेव सोम भी पारमेष्ठ्य वाजसोम, सौर ग्रहसोम, आन्तरिच्य चान्द्र राजा - सोम, भौम हविः सोम, भेद से चार ही प्रमुख जातियों में विभक्त है, जैसा कि ' राजा - वाजो - ग्रहो - हविः ' इत्यादि से स्पष्ठ है | भौम अन्न ( व्रीहि, और यवादि ) में रहने वाला सोम ही - ' हविः - सोम ' है । इसी का शकट से ग्रहण होता है । इसी का ' पुरोडाश ' रूप आहुतिद्रव्य सम्पन्न होता है | और इसी से यह भौमयज्ञ निष्पन्न होता है । अतएव अवश्य ही इस भौम हविः सोमानुबन्ध से इस यज्ञ को - ' हविर्यज्ञ ' कहा जासकता है । अतएव च तद्यज्ञेतिकर्त्तव्यता - प्रतिपादक प्रक्रान्त प्रथमकाण्ड के साथ पूर्वोक्त पञ्चपर्वा यज्ञेश्वर ( देखिए ६. रेखा चित्र ) के अन्तिम ( दृश्यापेक्षया ही अन्तिम ) पर्वात्मक पृथिवी नामक विवर्त्त ' का ही इस हविर्यज्ञ में प्रमुख सम्बन्ध प्रमाणित होजाता है । और अब इसीलिए सर्वतोभावेन यह आवश्यक ही होजाता है कि, प्रक्रान्त यज्ञ के प्रधान प्रतिष्ठारूप इस पार्थिवत्रिवर्त्त का स्वरूप दो रेखाचित्रों के द्वारा संक्षेप से स्पष्ट कर ही दिया जाय । जैसाकि निवेदन किया गया है, प्राजापत्यबत्शात्मक यज्ञेश्वर के पाँचों हीं पर्व श्रात्मा - पदं - पुनःपदम्-' रूपेण त्रिधा - त्रिधा विभक्त हैं । पार्थिव विवर्त्त ' का केन्द्रस्थ अग्निप्रधान तत्त्व ही श्रात्मा है, स्पृश्य पार्थिवपिण्ड ही ‘ पदम् ' है, एवं प्राणाग्निमण्डलात्मक बहिश्छन्द ' पुनःपदम् ' ही है । व्यवहारभाषा में भूः - महो - सागराम्बरा-पृथिवी - मेदिनी - धरा - धरित्री - धरिणी आदि आदि शब्द समानार्थक माने जा रहे हैं, जबकि विज्ञानभाषा में ये सभी ( प्रत्येक ) विभिन्नार्थों के ही वाचक हैं । उदाहरण के लिए भूः, और पृथिवी शब्द को ही लीजिए । पिण्ड ५.७५

पृष्ठ 848

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प्रथमकाण्ड का नाम जहाँ ' भूः ' है, वहाँ दृश्यमण्डल को ही ' पृथिवी ' कहा जायगा । एवमेव त्रयस्त्रिंशस्तोमात्मक पार्थिव विवर्त्त ' को जहाँ- ' सागराम्बरा ' कहा जायगा, वहाँ अष्टाचत्वारिंशस्तोमात्मक पार्थिव विवर्त्त को - ' मही माना जायगा । यही स्थिति अन्य शब्दों की समझिए । सर्वप्रथम हम उस पिण्ड की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, जिसे ' अभूद्वा इयं प्रतिष्ठा-तद्भूमिरभवत् ' ( शत ० ) के अनुसार सत्ताधारण के सम्बन्ध से- ' भूमि ', किंवा ' भूः ' कहा गया है । ' अद्भ्यः पृथिवी ' के अनुसार सौर- ' मरीचि ' नामक जलीयतत्त्व ही भूपिण्ड का उपादानकारण बनाता है । सलिल, अतएव ऋतधर्मा पानी में वायु के प्रवेश से बुद्बुदोत्पत्ति, तदुपरि पुनः पुनः अन्य अाक्रमण से बुद्बुदावच्छिन्न अप और वायु का मूर्च्छन, सौरतेज का प्रवेश, उसका क्रमिक - सन्तान - क्रम, इसी सहज ब्रक्रिया से अप् - वायु — तेजः - संयोगपरम्परया हुत्रा, अपनी वही मूल का सलिल क्रम- क्रमशः उत्तरोत्तर घनीभूत होता अवान्तर - आपः - फेन – मृत् - सिकता- शर्करा- अश्मा - अयः हिरण्य- इन आठ अवस्थाओं में परिणत होता हुआ अन्ततोगत्त्वा सत्तात्मक - प्रतिष्ठात्मक पिण्डरूप में परिणत होजाता है, जैसाकि शातपथीय षष्ठकाण्ड के उपक्रम में ही इस तथ्य का विस्तार से स्वरूप - विश्लेषण हुआ है । इन आठ भौतिक पर्वों से भूकेन्द्रस्थ प्राणाग्नि भी भूताधारत्वेन श्रष्टावयव ही बन जाता है । , वही ‘ अष्टाक्षर -- गायत्राग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । यही अष्टाक्षर गायत्रच्छन्द की स्वरू -- दिशा का दिग्-दर्शन है । अष्टाक्षर ही गायत्राग्नि, तदक्षरान्वित ही गायत्रीछन्द, एवं तत्समन्वित ही पार्थिव विवर्त्ती । इसी ग्राधार पर पृथिवी का एक नाम - ' गायत्री ' भी होगया है, जैसा कि - ' या वै सा गायत्री आसीत्, इयं वै सा पृथिवी ' [ शतपथब्राह्मणे - एव ] इत्यादि से स्पष्ट है । भूपिण्डावच्छिन्ना गायत्री ही वह ' प्राणाग्नि ' है, जिस का ऊर्ध्व वितान होता है, विस्तार होता है, प्रथन होता है । प्राणाग्नि के इस प्रथनरूप फैलाव से जो एक प्राणमण्डल बनता है, उसी का नाम - ' यदप्रथयत् ' रूपेण - ' पृथिवी ' है । और यों भूः, -एवं पृथिवी, दोनों के तात्त्विक स्वरूप में महान् अन्तर प्रमाणित होजाता हैं । इस अन्तर को लक्ष्यारूढ बनाइए, एवं तदाधारे— खैव च पार्थिव - विवर्त्त की महिमा के विस्तार का अन्वेषण कीजिए । ‘ त्रिःसत्या वै देवाः ' इस निगम से सभी वेदप्रेमी परिचित होंगे, जिस का अक्षरार्थ स्पष्ट है । ‘ देव ’ नामक देवता [ अर्थात् त्रयस्त्रिंशद्दशता, जिन का कि पूर्व के ऋष्टविध देवता - प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है ] तीन सत्यभावों को प्रतिष्ठा बना कर ही स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहते हैं, जब कि - ' सकृदिव वै पितरः ' के अनुसार ' पितृप्राण ' एकभाव से ही परिगृहीत होनाते हैं । देवप्राणप्रतिष्ठारूप वे तीन ' सत्य ' ही क्रमशः - आत्मसत्य ब्रह्मसत्य, देवसत्य इन नामों से विज्ञानकाण्ड में प्रसिद्ध हैं । ये तीनों हीं सत्य त्रिवृद्भावानुबन्ध से पुन: त्र्यात्मक - त्र्यात्मक हैं, जिस इस प्रसङ्ग का अत्र संस्पर्श भी नहीं है । अभी संक्षेप से यही निवेदन कर देना पर्याप्त मान लिया जायगा कि, जिन तीन षोडशी - प्रजापति- विवत्त का पूर्व में क्रमिक यशोगान हुआ है, उन के साथ आत्मसत्य, ब्रह्मसत्य, नामक दो सत्यविवर्त्तो का सम्बन्ध है । अमृतं-ब्रह्म - शुक्रात्मक - सनातनषोडशी ही ' आत्मसत्य ' है । दूसरा परोरजा नामक - सत्यप्रजापत्ति ही - ' प्रतिमाप्रजापति ' है, तीसरा पञ्चपुण्डीरात्मक यज्ञप्रजापति ही ' उपेश्वरप्रजापति ' है । प्रतिमाप्रजापतिरूप परोरजा- नामक द्वितीय ५७६

पृष्ठ 849

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शतपथब्राह्मण सत्य - विवर्त्त का क्योंकि सजातीयत्त्वेन पुण्डीर प्रजापति के प्रथम पर्वरूप स्वयम्भूपर्व में हीं अन्तर्भाव मान लिया जाता है । अतएव सत्य, और यज्ञ, दोनों समन्वित होकर - एक ही विवर्त्त शेष रह जाता है । एवं ब्रह्माक्षर-मूलक यही द्वितीय विवर्त्त ' [ किंवा द्वितीय प्रतिमाविवर्त्त, तथा तृतीय पञ्चपुण्डीर - विवर्त्त ' ] ‘ ब्रह्मसत्य ' नाम से प्रसिद्ध होजाता १ - सनातन सोडशी - श्रात्मसत्यः [ १ ] २- प्रतिमाषोडशी ३ -- उपेश्वरशोडशी ब्रह्मसत्यः [ २ ] ` शेष रह जाता है - तीसरा क्रमप्राप्त ' देवसत्य ' । हमने पूर्वप्रदर्शित प्राजापत्य - विवत का अथ से इति पर्य्यन्त, वैज्ञेय अखण्ड परात्पर से प्रारम्भ कर पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्यचल्शा के अन्तिम पर्वरूप भूपिण्ड -पर्य्यन्त ‘ देवसत्य ' नामक तीसरे तत्त्व का अन्वेषण किया । किन्तु वह उन पूर्वोक्त विज्ञेय [ परात्पर ], दुर्वि-विज्ञेय [ महेश्वर ] -विज्ञेय आदि -आदि आदि किसी भी विवर्त्त ' में हमें उपलब्ध नहीं हुआ । कहाँ उस ‘ देवसत्य ' का अन्वेषण करें?, इसी तथ्य के समन्वय के लिए पार्थिव विवर्त्त के चिरन्तन इतिवृत्त का अत्र आश्रय लिया गया है । स्वयम्भू से आरम्भ कर भूपिण्ड पर्य्यन्त के पाँचों विवत्तों की समष्टि तो ' ब्रह्मसत्य ' ही हैं । अवश्य ही - ‘ देवसत्य ’ इन पाँचों से पृथक् ही तत्त्वविशेष होना चाहिए, एवं तस्वरूपान्वेषण के लिए ही हमें भूपिण्ड के केन्द्रस्थ ‘ ब्रह्मसत्याग्नि ' की ही शरण में आना चाहिए । भौम गायत्राग्निब्रह्म ही हमें ' देवसत्य ' के साथ समन्वित करा सकेंगे । प्रजापति, और प्राजापत्यं, इन दोनों शब्दों का जो अर्थ है, वही अर्थ उक्थ, और अर्का का है । मूलविम्ब का ही नाम ही ' उक्थ ' है, एवं इस विम्ब को केन्द्र बना कर इसी से निकल कर इसी के चारों ओर वत्तु'ल - मण्डल - रूपेण - परिव्याप्त होने वाले रश्मिभाव ही ' अर्का: ' हैं । उक्थप्रजापतिरूप कारण हैं, तो इस से उत्पन्न, किंवा अभिव्यक्त होने वाले प्राणार्क कार्य्यं हैं । कारण हीं कार्य्यरूप में परिणत होता है भौतिक - पदार्थों में भी । किन्तु प्राणानुबन्धी कार्य्यकारणभाव में, तथा भूतानुबन्धी कार्य्यकारणभाव में महान् अन्तर है | दुग्धरूप कारण हीं ' शर ' [ थर - मलाई ] रूप कार्य्य बनता है । किन्तु यहाँ कारण का उच्छेद है । सम्पूर्ण दुग्ध यदि शर बन जाता है, तो अब दूध अनुपलब्ध है । प्राणजगत् में ऐसा कार्य्य - कारणभाव नहीं है | भूकेन्द्रस्थ उक्थरूप अग्निप्रजापति ही यद्यपि कार्यरूप अर्कमण्डल भावों में परिणत होता है । किन्तु उस का हृद्य - उक्थ - काराणात्मक स्वरूप सदा तद्रूप से सुरक्षित ही रहता है । न तो कार्य्योत्पत्ति से यह घटता, न तद्भाव में बढ़ता । अपितु - ' एष नित्यो महिमा ब्रह्मणो न कर्म्मणा वर्द्धते नो कनीयान् ' इत्यादिरूप से वह सदा स्व - स्वरूप से अक्षुण्ण ही बना रहता है । अतएव प्राणब्रह्मनिबन्धन इस कारर्य्यकारण को श्रु तिने ' अक्षिति ' कहा है, जिस इस शब्द के स्वरूपेतिहास - विश्लेषण का त्र अवसर नहीं है । हाँ, तो ब्रह्मसत्यात्मक भूकेन्द्रस्थ उत्थप्रजापतिलक्षण कारणात्मक गायत्र - प्राणाग्नि - [ ' अमृताग्नि ', यज्ञपरिभाषानुसार - ‘ चितेनिधेयाग्नि ] से प्राणार्क बहिर्विनिर्गत होते हैं । बहिर्विनिर्गत इस प्राणार्काग्नि की क्रमशः - ध्रुव- [ घनात्रय ], धर्त्र [ तरलावयव ], धरुण [ विरलावयव ], इस सुप्रसिद्धा - पदार्थ - धर्म्मानुबन्धिनी अवस्थात्रयी से अवान्तर तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । अवस्थानुगत प्रक्रमस्थानात्मक लोक भी तीन ही होजाते ५७७

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 850 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड हैं । और यह तो केवल उस उक्थधर्मा एक अग्न्यक्षर का वितान है, जिस के गर्भ में अभी सोम--विष्णु -- इन्द्र -- ब्रह्मा - ये चार अक्षर और प्रतिष्ठित हैं । प्राणात्मक इन सभी का प्राणाग्नि के साथ ऊर्ध्व उत्क्रमण होता है । अग्नि अमुक सीमा पर विश्रान्त होजाता है, सोम इस से ऊपर जाता है, विष्णु इस से भी ऊपर जाते हैं, एवं ब्रह्मा इस से भी ऊपर जाते हैं । कहाँ - कहाँ कौन कौन जाते हैं?, प्रश्न का दुरधि-गम्य समाधान - अभिप्लवस्तोम पृष्ठ्यस्तोम विद्यानुगता ' पारावत पृष्ठविद्या ' पर ही अवलम्बित है, जिस का इसी भाष्य में यथास्थान क्रमक्रमशः स्पष्टीकरण होता रहेगा । अभी एतावन्मात्र ही निवेदन कर दिया. जाता है कि, भूकेन्द्र से आरम्भ कर पृथिवीमण्डल पर्य्यन्त, पार्थिवमहिमामण्डल में त्रिवृत् ( ६ ) पञ्चदश-( १५ ) -एकत्रिंश ( २१ ) -त्रिणव ( २७ ) - त्रयस्त्रिंश - ( ३३ ) - चतुश्चत्वारिंश ( ४४ - अष्टाचत्वारिंश ( ४८ ), अहर्गणात्मक ये प्रमुख स्तोम माने गए हैं, जिन में से त्रिवृत् पर्य्यन्त - ' घनाग्नि ' हैं, पञ्चदशपय्र्यन्त ' तरलाग्नि ' है, एकविंशपर्य्यन्त ‘ बिरलाग्नि ' है, त्रिणवपर्य्यन्त ' भास्व सोम ' है, त्रयस्त्रिंशपर्य्यन्त ' दिक्सोम है, ( पञ्चदशा-इयज्ञात्मक गोसव नामक यज्ञ से सम्पन्न - षट्त्रिंशस्तोम पर्य्यन्त ' विष्णु ' है ) । चतुश्चत्वारिंशत्पर्य्यन्त ' इन्द्र ' है, एवं अष्टाचत्वारिंशत्पर्य्यन्त ' ब्रह्मा ' व्याप्त हैं । यों ब्रह्मसत्यानुचन्धी यच्चयावत् विवर्त्ती का प्रवर्ग्य - रूपेण हमारे इस पार्थिव लोक में हीं भोग प्रमाणित होजाता है । और इसी आधार पर - ' पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ' कहा जाता है । उक्ता स्तोमस्थिति को लक्ष्य बनाइए, एवं श्रत्र देवसत्य का अन्वेषण कीजिए । भूकेन्द्र से आरम्भ कर ब्रह्माक्षर से समन्वित अष्टाचत्वारिंश स्तोमपर्य्यन्त, सम्पूर्ण विवर्त्त का नाम है ' मही ' नामक पृथिवी । भूकेन्द्राधार पर वितता - प्रथिता इम ' महीपृथिवी ' में हीं उन सत्र लोकों का भोग होरहा है, जो कि लोक यज्ञ - प्रजापति के पञ्चपर्वा विश्वशरीर में व्यवस्थित हैं । अतएव प्रसङ्गात् पहिले यह भी जान लेना आवश्यक ही होजाता है कि, उस के लोकों का क्या स्वरूप है, एवं वे कितने हैं? । श्रयताम्! श्रुत्वा चाप्यवधा-ताम्!! 6 यज्ञेश्वरप्रजापति की महा - याहृतियाँ क्रमशः भूः भुवः स्वः, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । अभी समझने-मात्र के लिए हम तीनों को क्रमशः पृथिवी अन्तरिक्ष- द्यौः - इन नामों से व्यवहृत कर लेते हैं । इन तीनों लोकों की समष्टि का नाम है - ' त्रैलोक्य ', किंवा ' त्रिलोकी ' । मन्त्र ब्राह्मण प्रतिपादिता यही विद्या ' - रजोविद्या नाम से व्यवहृत होसकती है । क्योंकि - ' इमे वै लोका रजांसि ' के अनुसार ' लोक ' का ही नाम ' रज ' है, जैसा कि -'यः पार्थिवानि निममे रजांसि ' ( यजुः संहिता ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से भी स्पष्ट है । रजो-विद्यात्मिका इस त्रैलोक्यविद्या के अनुपात से यत्र तत्र ाठ [ ८ ] प्रकार के ' त्रैलोक्य ' समन्वित हुए हैं, जो आतिवाहिकत्रिलोकी, उदूढ त्रिलोको, कूर्म्मत्रिलोकी, स्तौम्यत्रिलोकी, भौमत्रिलोकी, आत्मत्रिलोकी, सम्वत्सर त्रिलोकी, एवं त्रैलोक्यत्रिलोकी, इन नामों से उपवर्णित हैं, जिन में से प्रथम हम अन्त की त्रैलोक्य- त्रिलोकी की ओर ही आप का ध्यान आकर्षित करते हैं । पूर्वोक्तभूः भुवः स्वः- नामक तीन स्वतन्त्र लोक हैं । प्रत्येक लोक त्र्यात्मक हैं । फलत: तीन के ६ लोक होजाते हैं | भूः - भुवः - स्वः - रूप भूलोक ही पहिला त्रैलोक्य है । इसे ही कहा जाता है - ‘ रोदसी - त्रिलोकी ' । दूसरे भुवः के भी भूरादि तीन विवत हैं । भुवर्लोक ही दूसरा त्रैलोक्य । इसे ही कहा जाता है - ' क्रन्दसी-त्रिलोकी ' । तीसरे ‘ ख़ः ’ के भी ' भूः भुवः स्वः ', ये तीन विवर्त्त हैं । यह स्वर्लोक ही तीसरा त्रैलोक्य है । इसे ही कहा जाता है - ‘ संयती - त्रिलोकी ' । तदित्थं महाव्याहृतिरूप तीन लोकों के ६ लोक होजाते हैं । ५.७८