Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 831–840
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 831–840
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ना नि III 10 भु च ० पृ ० सू ० प ० स्व ० परात्परः मत्य सोमः ग्रमृतसी अ. ० / मर्त्यब्रह्मा व्र भ्रमृत वि. परात्परः मृत . म प्रा. परात्परः वा. अमृतवि मत्यविष्णु• मृतइ श्र मत्यइन्द्रः परात्परः स्व ० स ५० भ ना II Ki भु bu नि ना 6 ( ४ ) -सहस्रवल्शेश्वरमूर्त्तिरश्वत्थो मायीमहेश्वरः षोडशी प्रजापति: - ( चतुर्थ- रेखाचित्र ) - ( १० सं ० ५६
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प- परिलेख: - - ( पञ्चम - रेखाचित्र ) ( ५ ) - आध्यात्मिक - षोडशी - प्रजापति 1- - स स्वरूप-( पृ ० सं ० ५६५ ) १ श्रानन्दः २ श्रव्यात्मा १ ३ महानात्मा १४ विज्ञानात्मा 3 ५ प्रज्ञानात्मा ६ इन्द्रियाणि ५ ७ विषयाः ६
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शतपथब्राह्मण वाक् - प्राण - मनो - विज्ञान - गर्भित, आनन्दघनैकरसमूर्त्ति, क्षराक्षर - प्रकृतिविशिष्ट, अतएव षोडश-फल, अतएव च ‘ षोडशी - प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध, पञ्चकलाव्ययामृतानुबन्धिनी मनोधना- ज्ञानज्योति, ( आत्मज्योति ), पञ्चकलाक्षर ब्रह्मानुबन्धिनी प्राणघना कर्म्मज्योति ( देवज्योति ), एवं पञ्चकलक्षरशुक्रानु-बन्धिनी वाग्वना अर्थज्योति [ भूतज्योति ], इन तीन ज्योतिर्भावों से त्रिज्योर्म्मय बनता हुआ, तथा सर्वाधार-भूत - अखण्ड - परात्परानुबन्धिनी- ज्योतिषांज्योति ' लक्षणा - ‘ परज्योति ' से भिन्न प्रमाणित होता हुआ, और अपने सहस्रधा - महिमानः सहस्रं - रूप- अनन्त - असंख्य - पञ्चपुण्डीरात्मक - रश्मिभावों से सहस्रच शेश्वररूप मे यत्र तत्र उपस्तुत होता हुआ सर्वत्र व्याप्त होरहा है [ १ ] । क्रमप्राप्त चौथा रेखाचित - सहस्रब - शेश्वरमूर्त्ति - ‘ अश्वत्थ ’ नामक इसी मायी महेश्वर का स्वरूप व्यक्त कर रहा है । जैसाकि निवेदन किया गया है, तथोपवर्णित षोडशी - प्रजापति के अमृताव्यय, ब्रह्मात्तर, शुक्रक्षर, नामक ये तीन विवर्त्त ' ही क्रमश: अधिदैवतानुगत - ईश्वर विवर्त्ता ', अध्यात्मानुगत जीव विवर्त्त [ मानव-विवर्त्त ], तथा अधिभूतानुगत जगद्वित्रवर्त्त [ स्थावर - जङ्गमात्मक विश्वविवर्त्त ], इन तीन महिमा-बिवत्त के ' उक्थ - ' ब्रह्म - साम - लक्षण ' प्रभाग - २ प्रतिष्ठा - परायण स्थान [ आत्मस्थान ] बन रहे हैं | चौथे रेखाचित्र के द्वारा हमने ईश्वरविवर्त्तानुगत विवर्त्ता ' को ही लक्ष्य बनाया है । शेष रह जाते हैं दो विवर्त्त ', इनमें से प्रस्तुत - प्रक्रान्त - यज्ञकर्मानुबन्ध से क्योंकि मानवानुबन्ध से दूसरे अध्यात्मविवत्त का ही सम्बन्ध है । अतएव तदनुबन्धी एक रेखाचित्र यहाँ ओर समन्वित कर दिया जाता है । अन्य तो सम्पूर्ण स्थिति ईश्वरीया [ चातुर्थरेखाचित्रानुगता ] स्थिति से सर्वात्मना समतुलित है । अन्तर के ' ल पञ्चविध पुण्डीरों की अभिधा में है । अतः तदनुत्रन्धमात्र से ही यह प्राध्यात्मिक रेखाचित्र व्यक्त होरहा है । सर्वगर्भित आनन्दर सैकमूर्ति अंशी आधिदैविक ईश्वरात्मा [ परमात्मा - ईश्वराव्यय ] का अंशभूत आध्यात्मिक [ मानबीय ] जीवात्मा [ जीवात्मा - जीवा ० यय ] भी तत्स्वरूपाभिन्न ही है । शेष रह जाते हैं — उसके स्वयम्भू - परमेष्ठी सूर्य्य- - चन्द्रमा - भूपिण्ड - नामक पाँच लोकात्मक विवर्त्त ', जिह्नों ' प्राकृतात्म-निवर्त्त ' कहा गया है । उक्त पाँचों ईश्वरीय प्राकृतात्म - विवत्त से ही क्रमशः स्वायम्भुव - अव्यक्तात्मा, पारभेष्ट्य - महानात्मा, सौर विज्ञानात्मा ( बुद्धि ), चान्द्र - प्रज्ञानात्मा [ सर्वेन्द्रिय नामक प्रज्ञानमन ], एवं पार्थिव इन्द्रिय, तथा संस्काररूप भौतिक विषयों से अवच्छिन्न भूतात्मा [ शरीर ], इन नामों से व्यवहृत हुए हैं । यही प्राध्यात्मिक षोडशी - विवर्त्त ' है, जैसाकि पञ्चम- रेखाचित्र से स्पष्ट है । सहस्रभावापन्न – सहस्र - सहस्र - मायी - महेश्वर - प्रजापतियों को अपने अखण्ड - अनन्त - धरातल पर प्रतिष्ठित रखने वाले [ प्रथम – रेखाचित्रानुगत ] परात्पर परमेश्वर के सम्बन्ध में हमने कहा था कि, वह ' माया - ' कला-( १ ) यस्मादन्यो न परो अस्ति जातोय आविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्रजथा संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी ॥ —यजुःसंहिता ५६५,
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प्रथमकाण्ड ' गुण - विकार - " आगरण - ' अञ्जन- नामक सुप्रसिद्ध षड्विध [ बलानुबन्धी ] परिग्रहों से असंस्पृष्ट रहता हुआ अमायी - निष्कल - निर्गुण - निर्विकार - निरावरण - निरञ्जन - अभिधाओं से ही यत्र तत्र [ तटस्थरूपेणैव ] उपवर्णित हुआ है । अत्र प्रसङ्गपात एक रेखाचित्र के माध्यम से इन ६ श्र परिग्रहों से अनुप्राणित परिग्रही प्राजापत्य - विवत्त का भी दिग्दर्शन करा दिया जाता है । अत्यन्त अवधानपूर्वक समन्वयानुग्रह कीजिए इस प्राजापत्यविवर्त्त का | ' माया ' नामक प्रथम परिग्रह से युक्त वही तत्त्व - ‘ मायीमहेश्वर ' नाम से प्रसिद्ध होगा, इसे ही - ' महेश्वरप्रजापति भी कहा जासकेगा, एवं इसे ही कालपुरुष माना जायगा । ' कला ' नामक द्वितीय परिग्रह से संयुक्त वही तत्त्व ' सकलषोडशी ' नाम से प्रसिद्ध होगा, इसे ही ' पोडशी प्रजापति ' भी कहा जासकेगा, एवं इसे ही ' यज्ञपुरुष ' माना जायगा । माया, और कला, इन दोनों परिग्रहो का अमृताव्यय की प्रधानता से एक स्वतन्त्र संस्थान माना जायगा । अतएव द्वयात्मक इस प्रथम- संस्थान को — ' अमृताव्ययसंस्थान ' कहा जायगा, ब्रह्माक्षर, एवं शुक्रक्षर नामक दोनों अश्वत्थविवर्त्त जिसके गर्भ में हीं प्रतिष्ठित माने जायँगे । पञ्चाक्षरों में से अत्र सोम - अग्नि इन्द्र - विष्णु - इन चार अमृतभावापन्न अक्षरों को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले ' अमृत ब्रह्मा ' नामक प्रथ-माक्षर का, एवं पञ्चक्षरों में से अत्र सोम, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, इन चार मर्त्यभावापन्न क्षरों को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले ‘ मर्त्यब्रह्मा नामक प्रथमक्षर का सम्बन्ध माना जायगा । तदित्थं सर्वमर्त्यक्षरगर्भित-मर्त्यब्रह्मां - क्षर, सर्वं - अमृत - अक्षरगर्भित - अमृत - ब्रह्मा - अक्षर से समन्वित, मायानुबन्धेन कालात्मक, कलानुबन्धेन यज्ञात्मक, अतएव द्वयात्मक इस प्रथम श्रव्ययसंस्थान का पारिभाषिक – उभयसमष्ट्यात्मक - नाम होगा -' सनातनषोडशी, इसे ही कहा जायगा -'महेश्वरषोडशी ', एवं यही होगा पारिभाषिक- आधिदैविक-' ईश्वर ' | अत्र तीसरे परिग्रह को लक्ष्य बनाइए श्रवधानपूर्वक ही । ' गुण ' नामक तृतीय परिग्रह से युक्त वही तत्त्व - ‘ सगुण - सत्य ' नाम से प्रसिद्ध होगा, इसे ही - ' सत्यप्रजापति ' भी कहा जासकेगा । ' विकार ' नामक ' चतुर्थ परिग्रह से युक्त वही तत्त्व - ' सत्रिकार - ज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध होगा, इसे ही - ' यज्ञप्रजापति ' भी कहा कहा जा सकेगा । गुरण, और विकार, इन दोनों परिग्रहों का ब्रह्माक्षर की प्रधानता से एक स्वतन्त्र संस्थान माना जायगा | अतएव द्वयात्मक इस द्वितीय संस्थान को - ' ब्रह्माक्षर संस्थान ' कहा जायगा । अमृताव्ययाधार पर प्रतिष्ठित, किंवा मायी महेश्वराधार पर प्रतिष्ठित, किंवा माया - कलात्मक महेश्वरषोडशी के आधार पर प्रतिष्ठित इस गुण - विकारात्मक ब्रह्माक्षर -संस्थान के गर्भ में शुक्रक्षर को प्रतिष्ठित माना जायगा । पञ्चाक्षरों में से अत्र - सर्वाक्षरगर्भित, सर्वामृताक्षर - गर्भित - अमृतब्रह्माक्षरानुगत, मर्त्य - ब्रह्मा - विष्णु - आदि पाचों क्षरों को स्वगर्भ में रखने वाला अमृताक्षररूप इन्द्राविष्णू द्वन्द्व ही प्रधान बना रहेगा । तदित्थं सर्वमर्त्य - क्षर - गर्भित, अमृतेन्द्राविष्णू से समन्वित, गुणानुबन्धेन गुणात्मक, एवं विकारानुबन्धेन विकारात्मक, अतएव द्वयात्मक इस द्वितीय अक्षर - संस्थान का पारिभाषिक – उभयसमष्ट्यात्मक नाम होगा - ' प्रतिमाषोडशी ', इसे ही कहा जायगा ‘ विश्वेश्वरसत्य, एवं यही होगा पारिभाषिक - आध्यात्मिक - ' जीव ' । अब क्रमप्राप्त तीसरे संस्थान को लक्ष्य बनाइए । ' आवरण ' नामक पञ्चम परिग्रह से युक्त बही तत्त्व - ‘ सावरणविराट् ' नाम से प्रसिद्ध होगा, इसे ही - विराट्प्रजापति ' भी कहा जासकेगा । एवं ५६६
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परात्परः ( ६ ) -- अमृत - ब्रह्म - शुक्रात्मक - षोडशी - प्रजापति - स्वरूप- परिलेख: - ( षष्ठ - रेखाचित्र ) - ( पृ ० सं ० ५६७ अमृतम् ( अव्ययप्रधानंम् ) परात्परः ब्रह्म शुकम् अक्षरप्रधानम् ) ( क्षर प्रधानम् ) ३ मायी महेश्वरः सकल: षोडशी सगुणः सत्यः सविकारो यज्ञः । सावरण विराट साञ्जनं विश्वम् आत्मन्वी, १ आत्मन्वी २ सात्मन्वी आत्मन्वी ३ ४ श्रात्मन्वी ५ सात्मन्वी महेश्वरप्रजापति षोडशीप्रजापतिः | सत्यप्रजापतिः यज्ञप्रजापतिः विराट्प्रजापतिः विश्व प्रजापतिः ब्रह्मा - श्रव्ययः इन्द्रः - अक्षरः उपेन्द्रः क्षरः सनातन षोडशी ईश्वरः प्रतिमाषोडशी उपेश्वरषोडशी जीवः जगत् महेश्वरः षोडशी विश्वेश्वरो सत्यः उपेश्वरो यज्ञः
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शतपथब्राह्मण ' अञ्जन ' नामक षष्ठ परिग्रह से युक्त वही तत्त्व - साञ्जनविश्व ' नाम से प्रसिद्ध होगा, इसे ही ' विश्व प्रजापति—— भी कहा जा सकेगा | आवरण, और अञ्जन, इन दोनों परिग्रहों का शुक्रक्षर की प्रधानता से एक स्वतन्त्र संस्थान माना जायगा | अतएव द्वयात्मक इस तृतीय संस्थान को -- ' शुक्रक्षर संस्थान ' कहा जायगा । अमृता-व्ययानुगत — ब्रह्माक्षरपञ्चक पर प्रतिष्ठित, किंवा माया - कलात्मक महेश्वरषोडशी से समन्वित - गुण - विकारा-त्मक विश्वेश्वरसत्य के आधार पर प्रतिष्ठित इस आवरण -अञ्जनात्मक तीसरे संस्थान के गर्भ में शुक्र -क्षरात्मक ‘ अग्नीषोम ' द्वन्द्व प्रतिष्ठित माना जायगा, एवं अत्र ब्रह्मन्द्रगर्भित उपेन्द्र ( विष्णु ) क्षर की प्रधा--नता मानी जायगी । श्रावरणानुबन्धेन आवरणात्मक एवं अञ्जनानुबन्धेन अञ्जनात्मक, अतएव द्वया-त्मक इस तृतीय संस्थान को पारिभाषिक उभयसमष्ट्यात्मक नाम होगा - ' उपेश्वरषोडशी ', इसे ही कहा जायगा ' उपेश्वर ', एवं यही होगा पारिभाषिक ' जगत् ’ । अव्ययात्मक - अमृत, अक्षरात्मक ब्रह्म, क्षरात्मक शुक्र, तीनों मनः प्राणवाक् – के त्रिवृद्भाव के कारण क्योंकि त्र्यात्मक हैं । अतएव इन तीनों के ही प्रत्येक के व्यात्मक त्र्यात्मक - विवर्त्त बन जाते हैं । तीनों में एक एक प्रधान रहता है, शेष दोनों तीनों संस्थानों में गौरा । यों एक ही षोडशीप्रजापति के तीन महिमा-विवर्त्त ' होजाते हैं, जो कि तीनों क्रमश: अधिदैवत - अध्यात्म - ग्रभिभूत - विवर्त्तो के सर्वस्व प्रमाणित होरहे हैं । मायाकलादि षट्परिग्रहों के अनुबन्ध से तीनों में क्रमश: दो दो परिग्रह उपग्रह उपभुक्त हैं । निम्नलिखित ' तालिकाओं ', तथा क्रमप्राप्त ६ ठे ' रेखाचित्र ' के माध्यम से ही हम इस दुरधिगम्य, दुर्विज्ञेय षोडशीप्रजापति की उपासना में अंशतः सफलता प्राप्त कर सकते हैं । १ - अमृताव्ययः - माया --- - कला - समन्वितः - सनातनषोडशी २ - ब्रह्माक्षरः -- गुण- - विकार - समन्वितः - प्रतिमाषोडशी - अश्वत्थप्रजापतिः -३- शुक्रक्षरः- -आवरण - प्रञ्जनसमन्वितः - - उपेश्वरषोडशी * १- अमृताव्ययोऽमृतमूर्तिः – मनोमयं - मनः २- ब्रह्मक्षारोऽमृतमूर्तिः- मनोमयः - प्राणः ३ - शुक्रक्षरोऽमृतमूर्त्तिः - मनोमयी - वाक् * १ - ब्रह्माक्षरोऽक्षरमूर्तिः- प्राणमय - प्राणः २ - शुक्रक्षरोऽक्षरमूर्त्तिः - प्राणमयी - वाक् ३ - अमृताव्ययोऽक्षरमूर्त्तिः- प्राणमयं - मनः * १ - शुक्रक्षरः – दरमूर्तिः- वामयी - वाक् २ - ब्रह्माक्षरः - क्षरमूर्त्तिः- वाङमयः- प्राणः ३ - अमृतोऽव्ययः - क्षरमूर्तिः-: - वाङमयं - मनः एव - मन तदेतत्ससर्व एव प्राण तदेतत्सर्वं - वागेव तदेतत्सव - माया - कला - युक्तः - सनातनपोड़शी - अमृताव्ययसंस्थानम्-१ - गुण - विकार - युक्तः - प्रतिमाषोड़शी -ब्रह्माक्षरसंस्थानम्-२ } आवरण – अञ्जनयुक्तः_उपेश्वरषोडशी - शुक्रक्षर संस्थानम्-५६७ ३
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प्रथमकाण्ड ** ( १ ) –परात्पराभिन्नः - श्रात्मपरिग्रहसमन्वितः - माथी महेश्वरः ( महेश्वरप्रजापतिः ) ( २ ) –महेश्वराभिन्नः – कला परिग्रहसमन्वितः - सकलः षोडशी ( षोडशी प्रजापतिः ) * ( ३ ) -सकलाभिन्नः - गुणपरिग्रहसमन्वितः - सगुणः सत्यः ( सत्यप्रजापतिः ( ४ ) -सत्याभिन्नः - विकारपरिग्रहसमन्वितः - सविकारो यज्ञः ( यज्ञप्रजापतिः ) * ( ५ ) -यज्ञाभिन्नः - श्रावरणपरिग्रहसमन्वितः - सावरणो विराट् ( विराट्प्रजापतिः ) - विराड भिन्न: - खुन परिग्रहसमन्वितः - साञ्जनं विश्वम् ( विश्वप्रजापतिः ) - सनातन षोड़शी } -प्रतिमापोडशी # उपेश्वरषोडशी * १ - अव्ययप्रजापतिरेव - सनातन षोडशी - तदिदमधिदैवतम् -- ईश्वर: ( मृतम् ) २ - ग्रक्षरप्रजापतिरेव - प्रतिमाषोडशी - तदिदमध्यात्मम् — -- जीवः ( ब्रह्म ) ३ -क्षरप्रजापतिरेव - उपेश्वरषोडशी - तदिदमधिभूतम् - - जगत् ( शुक्रम् ) * ---अश्वत्थषोडशी अब एक विभिन्न दृष्टिकोण से ' षोडशी - त्रयो ' की ओर तत्त्वनिष्ठ विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । ' आत्मन्त्री ' शब्द प्रकृति - विशिष्ट - पुरुष - प्रजापति में निरूढ है । ६ ठे रेखाचित्र में -माया - कलादि परिग्रह युक्त ६ औं प्रजापति- विवत्तों को ' आत्मन्त्री ' शब्द से भी व्यवहृत किया गया है | सञ्चरभावापन्न विश्व में शुद्ध ' आत्मा ' अनुपलब्ध है । अपितु शरीरविशिष्ट ( प्रकृतिविशिष्ट ) आत्मा ( पुरुष ) ह्रीं अत्र उप-लब्ध होता है, एवं इसी ' विशिष्ट ' मात्र का नाम है - ' आत्मन्त्रो ' । रेखाचित्रानुगत ( ६ ) ' आत्मन्त्री -- विव त्त ' का हमने ं अन्ततोगत्वा सनातन - प्रतिमा - उपेश्वर - इन तीन वित्तों में अन्तर्भाव कर लिया है । उक्त तीनों षोडशी - प्रजापति विवर्त्तो का जो पारस्परिक सम्बन्ध है, उसे ही पारिभाषिकी तत्त्वभाषा में ‘ दहरोत्तरसम्बन्ध ' कहा गया है, जिस का अर्थ है- ' वसुधान कोश ' सम्बन्ध | जिसे लोक - प्रान्त - भाषा में ‘ डिब्बी - डब्बी - डब्बा ’ - आदि कहा जाता है, उसी के लिए वैदिक शब्द है- ' वसुधानकोश ' । बड़े डब्बे में छोटा डब्बा, इस में इस से छोटा डब्बा, इसप्रकार बहुमूल्य ' वासु ' रत्नादि - सम्पत्ति ) के संरक्षण के लिए अनेक वसुधानकोश एकत्र समन्वित रहते हैं । इस में पूर्व पूर्व के डब्बे उत्तरोत्तर के डब्बों से छोटे होते हैं । छोटे का साङ्क ेतिक नाम है ' दहर, ' बड़े का साङ्केतिक नाम है - ' उत्तर ', दोनों के एकत्रामन्न्वय का ही नाम है ‘ दहरोत्तर ' | और उक्त षोडशीत्रयी में परस्पर ऐसा ही सम्बन्ध है, जिस का सहजभाषा में यही अर्थ निकल रहा है कि, सनातनषोडशी सर्वापेक्षया ' उत्तर ' ( बड़ा ) है । तदपेक्षया प्रतिमाषोडशी ' दहर ' ( ' छोटा ) है, एवं सर्वापेक्षया उपेश्वर षोडशी - ' दहर ' है । यों सनातन के गर्भ में प्रतिमा प्रतिष्ठित है, एवं प्रतिमा ५६८
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शतपथब्राह्मण के गर्भ में उपेश्वर प्रतिष्ठित है | अतएव यह सम्बन्ध वसुधानकोशात्मक ' दहरोत्तर ' सम्बन्ध ही मान लिया गया है । क्या तात्पर्य है तथाकथित् - ' गर्भ ' का? | जैसे भूपिण्ड के गर्भ में खनिजद्रव्य समाविष्ट हैं, क्या उसी प्रकार सनातन - घोडशी कोई पिण्ड है, जिस के गर्भ में शेष दोनों समाविष्ट होरहे हैं? । इस समस्या - पूर्ण सम्प्र-श्न के यथात्रत् समन्वय के लिए ही अब हमें एक रेखाचित्र का अनुगमन और करना पड़ेगा, एवं तद्रे खा-चित्र के समन्वय के लिए सर्वप्रथम पूर्वोपात्त - ' आत्मन्वी ' शब्द की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित करना पड़गा । निवेदन किया गया है कि, प्रकृतिविशिष्ट पुरुष का, किंवा शरीर विशिष्ट आत्मा का ही नाम ' श्रात्मन्वी ' है । इसप्रकार आत्मन्वी में आत्मा, और ' शरीर ' ये दो विवर्त्त समन्वित हो रहें हैं । ' आत्मा ' वह प्रजापतितत्त्व है, जो - ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ', ' हृदि अयमात्मा ' इत्यादि मन्त्रोपनिषच्छ्र तियों के ' अनुसार शरीर के केन्द्र में मूलोक्थरूप से प्रतिष्ठित है । मूलोक्थरूप इस हृदयस्थ श्रात्मा की प्रतिष्ठा पर ही ' शरीर ' प्रतिष्ठित है । क्या अर्थ है, इस ' शरीर ' क्या? । तदर्थ पदम् और पुनः पदम् ' इन साङ्केतिक पारिभाषिक शब्दों की ओर ही आप का ध्यान आकर्षित किया जाता है । जहाँ, जिस में हृदयस्थ आत्मा प्रपन्न होता है, व्याप्त होता है, आत्मव्याप्तिरूप वही स्थान - ' पदम् ' कहलाया है । एवं इस ‘ पदम् ' को आधार बना कर पुन: दूसरे भाव से जिसे आधार बना कर आत्मा व्याप्त होता है, वही द्वितीय प्रपत्ति - व्याप्ति - स्थान - ' पुनः पदम् ' कहलाया है । ' पदम् ' रूप प्रथम स्थान हीं श्रात्मा का ‘ अन्तः - शरीर ' है, एवं ' पुनः पदम् ' रूप द्वितीय स्थान हीं आत्मा का - ' बहिः शरीर ' है । इसप्रकार व्याप्ति - स्थान के भेद से एक ही शरीर इन दो प्रक्रमों में विभक्त होरहा है । अन्तःशरीरात्मक प्रथम प्रक्रम जहाँ ' शरीर ' नाम से प्रसिद्ध है, वहाँ बहिःशरीरात्मक द्वितीय प्रक्रम ' शरीरमहिमा ' नाम से प्रसिद्ध है । यों दो के - आत्मा, शरीर, शरीरमहिमा ' ये तीन स्थान होजाते हैं । आत्मा, पदम्, पुनःपुम्, - हृत्पृष्ठ, अन्तः पृष्ठ, वहिपृष्ठ, आत्मा, शरीर - शरीरमहिमा, हृदय-पिण्ड - मण्डल, आदि विभिन्न रूपों से इस त्रित्त्व का समन्वय किया जासकता है । उदाहरण के लिए भूपिण्ड को ही लक्ष्य बनाइए । भूपिण्ड का केन्द्रावच्छिन्न उक्थरूप प्राजापत्याग्नि हीं ' यथाग्निगर्भा पृथिबी ' के अनुसार हृदयस्थित हृदयरूप - ‘ आत्मा ' है, यहो हृतपृष्ठ, किंवा हृदय है । जिस भूपिण्ड का हम स्पर्श करते हैं, वही इस आत्मा का ‘ पदम् ' रूप ' अन्तःपृष्ठ, ' किंवा ' शरीर ', किंवा ' पिण्ड, ' है । भूगर्भस्थ उक्थात्मा से विनिःसृतप्राणार्क ( प्राणरश्मियाँ ) भूपिण्ड को व्याप्त करते हुए तदाकारारित होते हुए, भूपिण्ड को केन्द्र बनाते हुए बड़ी दूर पर्यन्त अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाते हैं । प्राणार्कमण्डलात्मक यह रश्मि-मण्डल ही ‘ दृश्यमण्डल ' कहलाया है, जिस का हमें चतुरिन्द्रिय से रश्मिप्रतिफलनन्यायेन प्रत्यक्ष होता है । पिण्ड सदा स्पृश्य ही होता है, दृश्य नहीं । एवमेव मण्डल सदा दृश्य ही होता है, स्पृश्य नहीं । इसप्रकार पार्थिव त्रिवत्त ' में केन्द्र - पिण्ड - मण्डल - रूप से आत्मा, पदम्, पुनःपदम्, भेद से तीन संस्थान होजाते हैं । और यही त्रिसमन्वयात्मक प्रजापति की स्वरूप - परिभाषा है । ५६६
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प्रथमकाण्ड. उक्त परेभाषा के अनुसार पूर्वोपवर्गित सनातन - प्रतिमा - उपेश्वर - नामक तीनों - षोड़शी प्रजापति-संस्थानों में भी प्रत्येक में तीनों का समन्वय स्वत: सिद्ध बन जाता है, समष्टिरूप से भी, एव व्यष्टिरूप से भी । समष्टि की दृष्टि से सनातन प्रजापति से आरम्भ कर उपेश्वरप्रजापति पर्यन्त एक प्राजापत्य - संस्था मानी जायगी । एतदपेक्षया स्वयं ‘ सनातनपोडशी ' आत्मा ' माना जायगा, तदाधार पर प्रतिष्ठित प्रतिमाशोडशी -' पदम् ' माना जायगा । एवं तदाधार पर ही वितत उपेश्वरषोडशी - पुनः पदम् ' रूप ' महिमा ' मानी नायगी । स्मरण रहे, मागी महेश्वर की एक पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्या बल्शा से ही इस महिमा का सम्बन्ध है | वह महेश्वरपुरुष ऐसी ऐसी सहस्रों महिमाएँ ( बल्शाएँ ) गर्भ में प्रतिष्ठित रखता है । - एतावानस्य महिमा, अतो ज्यायाँश्च पूरुषः ' से इसी तथ्य की ओर सङ्केत हुआ है । अत्र, व्यष्टिदृष्टि से तथोक्त त्रित्त्वधर्म का समन्वय कीजिए । तीनों प्रजापतियों में से तीसरे ' उपेश्वर-प्रजापति ' का क्योंकि पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्य - वल्शा से सम्बन्ध है । अतएव इस के ७ सात व्यष्टिविवत्त सम्पन्न होजाते हैं । सनातनषोडशी एक व्यष्टिसंस्था है, इसी का नाम मुख्यरूप से - ' षोडशी प्रजापति ' है, जिस का अमृताव्ययभाग ही श्रात्मा है, ब्रह्माक्षरभाग ही ' पदम् ' है, एव शुक्रक्षरभाग ही - ' पुनः पदम् ' है । दूसरा व्यष्टिविवर्त्त ' - ' प्रतिमाप्रजापति ' नाम से प्रसद्ध है, जिसे - ' अव्यक्त ' –स्वयम्भू ' कहा गया है! ' अन्तर्य्यामीसत्य ' इस विवर्त्त ' का ' आत्मा ' है, ' वेदात्मा ' इस का - ' पदम् ' एवं ' सूत्रात्मा ' ही ' पुनः पदम् ' है । ब्रह्म ेन्द्रविष्ण्त्रक्षरत्रयी का नाम हीं अन्तर्यामी है, इन्द्राग्निसोमत्रयी का नाम हीं वेदात्मा है, एवं अग्नीषोमौ का नाम हीं सूत्रात्मा है । श्रत्र उस तीसरे ‘ उपेश्वरप्रजापति ' को लक्ष्य बनाइए, जिसके स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य्य - भूपिण्ड, चन्द्रमा, ये पाँच पुण्डीर विवर्त ' हैं । इसप्रकार एक की पाँच अवान्तर व्यष्टियाँ होजातीं हैं । इन पाँचों में प्रत्येक में भी वही त्रित्त्व - व्यवस्था समानरूपेण समन्वित होरही है । आकाशात्मा प्रथम पुण्डीर का आत्मा- ' ब्रह्मा ' है, ' पदम् ' ' स्वयम्भू ' है, पुनः पदम् ' परमाकाशः ' है । बाय्वात्मा द्वितीय पुण्डीर के तीनों क्रमशः विष्णुः-परमेष्ठी -महासमुद्रः हैं 1 । तेजोरूप तृतीय पुण्डीर के तीनों क्रमशः इन्द्रः - सूर्य्यः- सम्वत्सरः है । मृद्रूप चौथे पुण्डीर के तीनों क्रमशः अग्निः- भूः - इलान्दम् है । एवं आपोरूप पञ्चम पुण्डीर के तीनों क्रमशः सोमः - चन्द्रमाः - ‘ परिप्लव: ' है । तदित्थं एक सनातन षोडशी, एक प्रतिमाषोडशी, एवं पाँच व्यष्ट्या-त्मक - उपेश्वर षोडशी - रूप - पुण्डीर, इन सातों में प्रत्येक में एक हृदयमण्डल, एक पिण्डमण्डल, एक महिमामण्डल - भेद से श्रात्मा - पदम् - पुनः पदम् - रूपेण तीन तीन अवान्तर - संस्थान होजाते हैं, और यही-अवारपारीण षोडशीप्रजापति का, किंवा तदनुगता पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्या एक बल्शा का विस्तारात्मक संक्षि-' ततम · निदर्शन है, जिस का निम्न लिखित तालिका से, एवं सातवें रेखाचित्र से अंशत: स्पष्टीकरण होजाता है । * यह संस्मरणीय है किं, प्रतिमाप्रजापतिरूप अव्यक्त स्वयम्भू लोकातीत बनता हुआ नहाँ ' परोरजा ' है, वहाँ यह उपेश्वरप्रजापतिरूप पुण्डीर स्वयम्भू ' सत्यलोक ' नामक सप्तम लोकात्मक बनता हुआ ' रजो-मूर्त्ति है । इमे वैलोका रजांसि के अनुसार लोक का ही नाम ' रज ' है । ५७०
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( ७ ) - समष्टि व्यष्टिरूपेण - ध्यात्मकविवर्त्तपरिलेख: - - ( सप्तम - रेखाचित्र ) -( पृ ० सं ० ५७० ) सकलः षोडशीप्रजापतिः आत्मा ( श्रव्ययात्मा ) सनातन षोडशी अव्यक्तस्वयम्भूः ( सगुण: सत्यप्रजापति:) ( अक्षरात्मा ) पुण्डीरस्वयम्भूः ( सविकारो यज्ञप्रजापति ( आत्मक्षरात्मा ) | पुण्डीर परमेष्ठी श्रात्मा पदम् कादम् प्रतिमाषोडशी ( भूप्रजापतिः ) प्रतिमाषोडशी स्वयम्भूः श्रात्मा पदम् तपदम् परमेष्ठी उपेश्वरप्रोडशी ( परमप्रजापति: ) आत्मा पदम् तापदम् प्रतिमाप्रजापतिः पु ० सूर्य: ग्रात्मा पदम् पदम् पुण्डीरपृथिवी पुण्डीर चन्द्रमा पृथिवी म ० प्रजापतिः ग्रात्मा पदम् पुन पदम चन्द्रमाः प्रतिमाप्रजापतिः प्रतिमाप्रजापतिः आत्मा पदम् पद्म