Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 861–870
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 861–870
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शतपथब्राह्मण पूर्वकथनानुसार सूर्य्य में इस मनुस्तत्त्व का विकास होता है । सूर्य्य गायत्री मात्रिकवेदाग्नि स्वरूप है । अतएव इस मनु को ' अग्नि ' भी कहा जासकता है । ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा यौरिन्द्रे स गर्भिणी ' ( शत ० १४ | ६ | ४ | २४ ) के अनुसार सूर्योपलक्षित द्युलोक ' मघवा ' नाम से प्रसिद्ध इन्द्रप्राणमय है । इसीलिए मनु. को इन्द्र भी कहा जासकता है । रोदसी - त्रैलोक्य, एवं उसमें प्रतिष्ठित १४ प्रकार के भूतसर्गों का अधिष्ठाता भी यही मनु है । दूसरे शब्दों में - यही सम्पूर्ण प्रजात्रों का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण है । इसीलिए मनु को ' प्रजापति ' भी कहा जासकता है । यह मनु प्राणाग्निस्वरूप है । अतएव इसे ' प्राण ' भी कहा जासकता है । स्वयम्भू, और परमेष्ठी में हमनें षोडशीप्रजापति के अव्ययभाग की प्रधानता बतलाई थी, चन्द्रमा, तथा पृथिवी में क्षरभाग को प्रधान बतलाया था, एवं मध्यस्थ अमृतमृत्युमय इन्द्रप्राणमय सूर्य में अक्षर का विकास बतलाया था । साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि, मध्यस्थ क्रियामय अक्षर अव्यय, और क्षर, इन दोनों का सञ्चालन करने से श्रव्ययसम्पत्ति से भी युक्त है, एवं क्षरसम्पत्ति से भी समन्वित है । अतएव इस अक्षरतत्त्व को ' ब्रह्म ( क्षर ) ' भी कहा जाता है, एवं ' पर ( अव्यय ) ' भी कहा जाता है । इसप्रकार इस इन्द्रप्राण में षोडशीप्रजापति ( परात्पर - पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल क्षर की समप्रिरूप प्रजापत की सत्ता सिद्ध होजाती है । इसी विज्ञान के आधार पर ' इन्द्रो ह वै षोडशी ' यह निगम प्रतिष्ठित है । अतएव ग्रहयाग में इन्द्र के लिए - षोडशीग्रह का ही ग्रहण किया जाता है | इसी इन्द्रप्राणमय सौर ं तत्त्वका नाम मनु है, दूसरे शब्दों में मनुर्म्मय प्राण ही इन्द्र है । ' सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्व - ' तं मां श्रायुर मृतमित्युपास्त्र ' ( कौ ० उ ० ३२ ) के अनुसार यही इन्द्र-प्राणमय मनु आयु का अधिष्ठाता है, अतएव पूर्व में ' आयुर्वै मनुः ' कहा गया है । अक्षर ही ' प्रशास्ता ' कहलाता है । विष्णु ' हृ ' अक्षर है, इन्द्र ' द ' अक्षर है । ब्रह्मा ' यम् ' अक्षर है । तीनों की समष्टि ही ' हृदयम् ' है । यही हृदयस्थ ' अन्तर्यामी ' है I । प्रत्येक वस्तु के केन्द्र में प्रतिष्ठित होकर यह उसका अपने नियतिर्दण्ड से सञ्चालन कर रहा है । अक्षररूप मनुं हीं काल का अधिष्ठाता बनता है, अतएव इस अक्षर-दण्ड को ‘ कालदण्ड ' भी कहा जाता है । ' तस्य वा एतस्य अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतः ' ( बृह ० उपनिषत् ) ‘ भीषास्माद् वातोदेति, भीषोदेति सूर्य्यः ' ( धृ ० उ ० ) इत्यादि श्रुति के अनुसार यही अक्षर सबका प्रशास्ता है । मनुरूप से यही सूर्य में विकसित होता है । इस अक्षरदृष्टि से ननु को हम अवश्य ही सत्र का ' प्रशास्ता ' भी कह सकते है । ‘ परात्पर ' व्यापक तत्त्व है । शाश्वतधर्म्म है । अणु से अणु और महान् से महान्, सबमें इह्रीं दो रूपों से यह व्याप्त है । पोडशीरूप मनु में इस की भी सत्ता है । अतएव परात्परापेक्षया हम इस मनु को ‘ अणोरणीयान् ' भी कह सकते हैं । ' हिरण्ययेन सविता रथेनादेवो याति भुवनानि पश्यन ' ( यजुसं ० ) के अनुसार यह मनु हिरण्मय ( अग्निमय ) है । अतएव मनु को रुक्माभ भी कहा जाता है । सूर्य का दृश्य रुक्म-भाग भौतिक है । ‘ क्षरः सर्वाणि भूतानि ' के अनुसार यह भाग क्षरप्रधान है । सूर्य्यात्मक मृनु में इस क्षरभाग की भी सत्ता है, इसी रहस्य को बतलाने के लिए इसे ' रुक्माभ ' भी कहा जाता है । परात्पर केवल स्वप्नवी-गम्य है! स्वप्न में इन्द्रियव्यापार अभिभूत होजाता है । केवल मनोव्यापार ही अभिव्यक्त रहता है । वही मन मनु का परिचायक है | अतएव मनु स्वप्नधोगम्य भी कहा जासकाता है । इसमें अव्यय का भी विकास है, अतएव मनु को ‘ परपुरुष अव्यय ' भी कहा जासकता है । ५८५
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प्रथमकाण्ड इसप्रकार “ अक्षर से समन्वय के प्रशास्ता, परात्पर के समन्वय से अणोरणीयान्, क्षर के समन्वय से रुक्माभ, मनोमय होने से स्वप्नधीगम्य, अव्यय - युक्त होने से परपुरुष, वेदाग्निरूप होने से अग्निं, सर्वसृष्टिप्रत्रर्तक होने से प्रजापति, सौरप्राणमय होने से इन्द्र, ऋषिप्रा'घन होने से प्रारण, परात्पर - युक्त होने से शाश्वतत्रह्म, अक्षररूप से सौरमण्डल में प्रसिद्व रहने वाला संसारचक्र का प्रवर्त्तक तत्त्व ही ' मनु ' है " यह उपर्युक्त प्रकरण से भलिभांति सिद्ध होजाता है । इसी मनु: स्वरूप को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु ने कहा है—
प्रशासितारं सर्वेषां मणीयांसमणोरपि ।
-स्त्रमाभं स्वप्नधीगम्यं तं विद्यात् पुरुषं परम् ॥
एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्मशाश्वतम् ॥
एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्त्तिभिः ।
जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत् ॥
--- मनुः १२।१२२,२३,२४ । कालाग्निस्वरूप यही मनु उपाधिभेद से सम्वत्सर, अयन, पक्ष, अहोरात्र, मुहूर्त्त, घटिका, होरा, आदि अनेक रूपों में परिणत होता हुआ संसारचक्र का प्रेरक बन रहा है । पुराणपरिभाषा के अनुसार मुहूर्त्त को ही मनु कहा जाता है । मनु ही मम्वतर है | मनु को हमने श्रायुःस्वरूप बतलाया हैं । ' आयुर्म्मम्मलि रक्षति आयुरन्न प्रयच्छति ' के अनुसार आयुःसूत्र ही मुहुर्मुहुः श्रात्मा का त्राण किया करता है । श्रायुःस्वरूप मनु को ' मुहुस्त्रायते ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अवश्य ही ' मुहुर्त्त ' कह सकते हैं | ' अहरागम ' सृष्टिकाल ' कहलाता है । रात्र्यागम प्रलयकाल कहलाता है । ' अव्यक्तोऽक्षर इत्याहुस्तमाहुः परमां गतिम् ' ( गीता ) के अनुसार ' अव्यक्त ' नाम से प्रसिद्ध अक्षर ही ग्रहरागम में व्यक्त होकर ' सृष्टि ' का अधिष्ठाता बन जाता है, एवं रात्र्यागम में वही मनुःस्वरूप अक्षर पुनः अपने अव्यक्तभाव को प्राप्त होता हुआ प्रलय का अधिष्ठाता बन जाता है । ' अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ ' -गीता उक्त गीतावचन इसी सिद्धान्त को पुष्ट करता है । सृष्टि ब्रह्मा का दिन है, प्रलय रात्रि है । मनुप्रजा -पति के इस ग्रहःकाल के भी उपाधिभेद से १५ विभाग हो जाते हैं, एवं रात्रिकाल के भी १५ विभाग हो जाते हैं । पञ्चदश भागों में विभक्त ग्रहः, एवं पञ्चदश भागों में विभक्ता रात्रि, दोनों में श्रात्मरक्षा करना
* आयुमर्माणि रक्षति, आयुरन्न ं प्रयच्छति ।
अर्जुनस्य प्रतिज्ञे हो न दैन्यं न पलायनम् ॥
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शतपथब्राह्मण इसी मनु का कार्य्य है । दिन रात सुखपूर्वक इसी आयुःस्वरूप मनु की कृपा से ( मनुरनुगता केन्द्रप्रतिष्ठासे ) ही व्यतीत होते हैं । अतएव अहोरात्र के ये ३० विभाग ' मूहूर्त्त ' नाम से प्रसिद्ध होजाते हैं । इनका स्वरूप ' लोकम्पृणा ' नाम की इष्टकाओं से सम्पन्न होता है । ये मुहूर्त्त काल के अवान्तर क्षुद्र खण्ड हैं । इह्रीं से लोकं ---च्छिद्र पूर्ण होतें हैं । अतएव मुहूत्तों को अवश्य ही लोकम्पृणा इष्टका कहा जासकता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं— “ लोकम्पृणाभिः ( इष्टकाभिः ) मुहूर्त्तान् आप्नोति । - शत १० | ४ | ३ | १२ | ' अथ यत् क्षुद्राः सन्त इमाँल्लोकानापूरयन्ति, तस्मात् ( मुहूर्त्ताः ) लोकम्पृणाः ” । - शत ० १०.४ | २ | १८ | मानुष अहोरात्र में ६० घड़ियाँ होतीं हैं । एवं ' मूहूर्त्तो घटिकाद्वयम् ' के अनुसार दो घड़ी का एक मुहूर्त्त ' होता है | हमारे अहोरात्र के सम्बन्ध में जो कालाग्निखण्ड ' मुहूर्त्त ' नाम से प्रसिद्ध है, ब्राह्म अहोरात्र के सम्बन्ध में वही मुहूर्त्त ' ' मनु ', किंवा ' मन्वन्तर ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं जिसे हम ' तिथि ' कहते हैं, वही ब्राह्मपक्ष में ' कल्प ' कहलाता है । १५ मन्वन्तर ह: काल है, १५ मन्वन्तर रात्रिकाल है । एक मन्वन्तर प्रातःसंध्या में चला जाता है । एवं एक मन्वन्तर सायंसन्ध्या में भुक्त होजाता है । इसप्रकार १४ मन्वन्तर अहःकाल में शेष रह जाते हैं, एवं १४ मन्वन्तर रात्रिकाल में बच रहते हैं । एक सृष्टिकाल की सत्ता १४ मन्वन्तरों तक अपनी व्याप्ति रखती है । अस्तु यह विषय प्राकृत है ( १ ) । इससे प्रकृत में केवल यही व्यक्त करना है कि, पूर्वोक्त मनुस्तत्त्व ही उपाधिमेद से मन्वन्तरस्वरूप में परिणत होता हुआ सृष्टि, प्रलय-समष्टिरूप संसारचक्र का प्रवर्त्तक बनता है । मन्वन्तरों के इह्रीं ३० खण्डों का स्वरूप बतलाती हुई वाजि-श्रुति कहती है- है— “ स ( मनुप्रजापतिः ) पञ्चदशाहो रुपाण्यपश्यत् - श्रात्मनस्तन्वो मुहूर्त्ता लोकम्पृणाः । पञ्चदश वै रात्रेः । तद् यन्मुहुस्त्रायन्ते --तस्मान् मुहूर्त्ताः ' । - शत ० १० | ४ | २ | १८ | उक्त श्रधिदैविक - मनु से सर्वात्मना अभिन्न आध्यात्मिक - मनु ही मानवीय - श्राध्यात्मिक - प्राण-भूतात्मक सर्ग का उसी प्रकार सर्वस्व बना हुआ है, जैसेकि आधिदैविक- मन्वन्तररूप मनु आधिदैविक सर्ग— प्रपञ्च के सर्वस्व बने हुए हैं । मनःप्राणवाङमय सृष्टिसाक्षी श्रात्मप्रजापति का वाक्प्राणगर्भित काममय-श्रव्ययरूप मन ही ‘ मनु ’ है, जैसाकि पूर्व में श्रनेकधा स्पष्ट किया जाचुका है । विज्ञानब्रह्म ( सौरीबुद्धि ) की प्राणात्मिका रश्मियाँ हीं - ' धियः ' है, जैसाकि - ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' से स्पष्ट है । ' स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना सम्परिष्वक्तः ' के अनुसार अव्ययमन का महिमारूप प्रज्ञानमन विज्ञान बुद्धि से नित्य समन्वित है । बुद्धि की धारात्मिका प्रतिष्ठा बनता हुआ मनुरूप यह मन बौद्धिक – ' धियः ' का ( १ ) इस विषय का विशद विवेचन सहस्रपृष्ठात्मक ' दिग्देशकालस्वरूप मीमांसा ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में हीं देखना चाहिए । ५८७
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प्रथमकाण्ड क्योंकि ‘ उक्थ ’ है | अतएव इस दृष्टि से ' पुनन्तु मनसा धियः ' यह कहा जाता है । मन, और मनु अभिन्न हैं । विषयभेद से मनोमय यह मन क्योंकि विविध भावापन्न बन कर ' धी ' से समन्वित होता हुआ -आध्या-त्मिकी सृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । अतएव -- ' पुनन्तु मनवो धिया ' यह कहा जाता है । आगे के आध्या-त्मिक - प्रकरण में हीं मन्त्रार्थ- समन्वय - सम्भवतः सम्भव बन सकेगा । चान्द्र सोममय श्रद्धारस इस मनुरूप मन से समन्वित रहता है । श्रतएव मनु की श्रद्धासोममयी इस सौम्या शक्ति को ' मनावी ' कहा गया है । मनु ' वृषा ' है, श्रद्धा ‘ योषा ’ है | दोनों के दाम्पत्य से ही अध्यात्मसर्ग अभिव्यक्त हुआ है | मनुःस्वरूप - दिग्दर्शन क्योंकि अधिक विस्तृत होगया है, और अभी मनुपत्नी ' मनावी ' के सम्बन्ध में भी हमें दो शब्द निवेदन करने हैं । अतः इस मनुःस्वरूपदिग्दर्शनप्रकरण को यहीं उपरत कर, अत्र क्रमप्राप्त श्रद्धामयी मनुपत्नी की ओर ही श्रद्धालु पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जारहा है । इति मनोस्तात्विकस्वरूप - दिग्दर्शनम् यथ - मनुपत्नी - मनावी ' -स्वरूप - दिग्दर्शनम् — सर्वव्यापक पूर्वोक्त मनु पुरुष हैं । इस पुरुष की सोममयी शक्ति का ही नाम ' मनावी ' है । मनु का हमने मन से सम्बन्ध बतलाया है । श्रद्धातत्त्व ही इस मनुरूप मन की शक्ति है । श्रद्धों के समन्वय से ही मनु के द्वारा सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता है । दूसरे शब्दों में - मनु ' वृषा ' ( ' पुरुषप्राण ' ) है, तो श्रद्धा ‘ योषा ’ ( ‘ स्त्रीप्राण ’ ) है । इह्नीं दोनों के मिथुन से सम्पूर्ण सृष्टियाँ होतीं हैं । छान्दोग्य उपनिषदुक्ता पञ्चाग्नि-विद्या के अनुसार यही श्रद्धातत्त्व क्रमशः सोम - पर्जन्य वृष्टि - ओषधि - रेत- इन रूपों में परिणत होता हुआ ' पुरुषसृष्टि ' का कारण बनता है । इसी आधार पर ' इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति ' ( छा ० उपनिषत् ) यह कहा जाता है । सम्पूर्ण देवता, सम्पूर्ण भूत, स्थावर जङ्गमात्मक सम्पूर्ण विश्व इसी श्रद्धारूपिणी मनःशक्ति, अतएव ' मनावी ' नाम से प्रसिद्धा ' मनुपत्नी ' के समन्वय से अभिव्यक्त हुआ है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है— श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया विन्दते हविः ॥ श्रद्धो भगस्य मूर्द्धनि वचसाऽऽवेदयामसि ॥ १ ॥
श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते ॥ श्रद्धां हृदय्याऽऽ कृत्या श्रद्धया हूयते हविः ॥ २ । श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यन्दिनं परि ॥ श्रद्धां सूर्य्यस्य निम्र चि श्रद्ध े श्रद्धापयेह मा || ३ || श्रद्धा देवानधिवस्ते " श्रद्धा विश्वमिदं जगत् " ॥ श्रद्धा कामस्य मातरं हविषा वर्द्धयामसि ॥ ४ ॥
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शतपथब्राह्मण ' कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ' ( ऋक्संहिता ) के अनुसार ' काम ' ( कामना ) तत्त्व का आविर्भाव मन से ही हुआ है । मन ही मनु है । श्रद्धा के मिथुन से ही मनोरूप मनु से कामतत्त्व अभिव्यक्त होता है । इसी आधार पर मन को ' कामनाओं का पिता ' कहा जासकता है । एवं श्रद्धा को कामनाओं की जननी माना जासकता है । अपनी इसी ' श्रद्धा पत्नी ' के समन्वय से ' यज्ञ ' करते हुए मनु विश्व का सञ्चालन कर रहे हैं । मनु श्रद्धा के अधिष्ठाता हैं, श्रद्धा के देवता है । उसके पति हैं । श्रतएव इह्न् ' ' श्रद्धादेव ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । इस श्रद्धातत्त्व का तेजोरूप से विकास सूर्य्यमण्डल में ही होता है । श्रद्धा सौम्यतत्त्व है । इसका प्रभवस्थान परमेष्ठी है । यही सूर्य्य में ग्राहुत होकर ‘ तेजोरूप ' में परिणत होती हुई विश्व की जननी बनती है । अतएव इसके लिए ' तेज एव श्रद्धा ' ( शत ० ११ | ३ | १ | १ ) यह कहा जाता 1 ' पुरुष ' ही ' प्रकृति ' की आधारभूमि है । प्रकृतिरूपा शक्ति का विकास पुरुष के आधार से ही होता है । दूसरे शब्दों में - शक्ति का उत्पत्तिस्थान पुरुष है । अतएव विज्ञानकोटि में ' श्रद्धा ' को उस पुरुष की ' दुहिता ' भी बतलाया जासकता है! ' अर्द्धन नारी तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ' के अनुसार वह सौर मनुःपुरुष अपने हीं भाग से श्रद्धा का विकास करता हुआ, उसी के साथ ' मिथुनभाव ' को प्राप्त होता हुआ ' विराड्यज्ञ ' को प्रवृत्त करता है । ऐसी अवस्था में हम इस श्रद्धातत्त्व को सौर मनु की ' कन्या ' भी कह सकते हैं, ' पत्नी ' भी बतला सकते हैं । इसी आधार पर ' श्रद्धा वै सूर्यस्य दुहिता ' ( यजुः १६ । ४ - शत ० १२ | ७ | ३ | ११ ) यह निगम प्रचलित है । पदार्थविद्या में पति - पत्नी - दुहिता - पुत्र - पिता - सब व्यवहारों में · साङ्कर्थ्य है | कहीं श्रग्नि पुत्र है, प्रजापति पिता है । कहीं प्रजापति अग्नि का पुत्र है, तो अग्नि प्रजापति का पिता है । कहीं देवता प्रजापति के पुत्र हैं, तो कहीं प्रजापति देवताओं के पुत्र हैं । ' पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति ' के अनुसार पदार्थविद्या में इन सभी सङ्करव्यवस्थाओं का यथास्थान समन्वय होजाता है । इसी व्यवहार का निरूपण करती हुई वाजिश्र ति कहती है -‘ स एष पिता पुत्रः । यदेषोऽग्निमसृजत - तेनैषोऽनः पिता । यदेतमग्निः समदधात्, तेनैतस्य अग्निः पिता । यदेष देवानसृजत, तेनैप देवानां पिता । यदेतं देवाः समदधु-स्तेनैतस्य देवाः पिता । उभयं तद् भवति - पिताच पुत्रश्च ( पि ० ) प्रजापतिश्च ( पु ० ) अग्निश्च । ( पि ० ) अग्निश्च ( पु ० ) प्रजापतिश्च । ( पि ० ) प्रजापतिश्च ( पु ० ) देवाश्च । ( पि ० ) देवाश्च ( ० ) प्रजापतिश्च । - शत ० ६ | १ | २ | २६-२७ इति ऐसीअवस्था में सौर पुरुष के से विकसित होने के कारण हम श्रद्धा को अवश्य ही सूर्य्य की ' दुहिता ' भी मान सकते हैं, एवं मनु के साथ मिथुनभाव को प्राप्त होकर सृष्टि करने के कारण इसे ' मनु-पत्नी ' भी माना जासकता है । पदार्थविद्या - सम्बन्धी विज्ञानकाण्ड में ऐसा मान लेने पर भी कोई आपत्ति नहीं होती । निष्कर्ष यही हुआ कि, सौरमण्डल में तेबोरूप से उद्भूत होने वाला पारमेष्ठ्य सोममय सर्वजगत्--५८६
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प्रथमकाण्ड प्रवर्त्तक श्रद्धातत्त्व ही मनुपत्नी ' मनात्री ' है । इसी के समन्वय से सर्वप्रथम भगवान् मनु ' ऋषभ ' नाम से प्रसिद्ध विराड्यज्ञ ही उत्पन्न करते हैं । इति - मनुपत्नी - मनावी - स्वरूपदिग्दर्शनम् ऋषभस्वरूप दिग्दर्शनम्— अब क्रमप्राप्त उस ऋषभ ( वृषभ - साण्ड - ) के स्वरूप को लक्ष्य बनाइए, जिसकी ध्वनि से असुर-राक्षस मूच्छित होते रहते हैं । ' गोतत्त्व ' का ही नाम ' ऋषभ ' है । यह गोतत्त्व ' वाग् - विराड् - गौरिडा भोगा गात्रः पञ्चविधा स्मृताः ” ( ब्रह्मसमन्वय ) सिद्धान्तानुसार वाक्, विराट्, गौ, इडा, भोग, भेद से पाँच भागों में विभक्त है । वषट्कारमण्डल ही वाङ्मयी गौ है । दर्शर्षिप्राण की समष्टि ही विराड् गौ है | सूर्य्य गौरूप गौ है T । पृथिवी ही इडा गौ है, एवं चन्द्रमा हीं भोगरूपा गौ है । आनन्दविज्ञानघन-मनःप्राणगर्भिता अव्ययवाक् ही सम्पूर्ण विश्व का आलम्बन है । इस वाक् का विकास वेदरूप से सर्व-प्रथम स्वयम्भू में हीं होता है, जैसाकि प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतलाया जाचुका है । यही स्वायम्भुव ‘ आकाश ' नाम्नी वेदमयी वाक्- क्रमशः वायु - तेज - जल - पृथिवी - रूपों में परिणत होती हुई सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त होनाती है । अतएव इसके लिए ' अथो वाग़वेदं सर्वम् ' यह कहा जाता है | यही वाक्तत्त्व ‘ गौ ’ नाम से भी व्यवहृत होता है, अतएव ' गौर्चा इदं सर्वम् ' यह भी कहा जासकता है, जैसाकि अनुपद में हीं स्पष्ठ होने वाला हैं । पूर्वप्रकरण में स्वयम्भू को हमने पुरुषापेक्षया ' वाङमय ' बतलाया था । प्रक्रान्त प्रकरण की सङ्गति के लिए आज पुनः उस प्रकरण की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । स्वयम्भू प्राणमय ब्रह्मा है । यह प्राणमय ब्रह्मा, किंवा वेदमूर्त्ति ब्रह्मा उस आनन्दविज्ञानघनमन: प्राणगर्भिता श्रव्ययवाक् का बिकासमात्र है । वही पुरुषवाक् ( जिसका कि आलम्बन हृदयस्थ अव्यय का श्वोवसीयस् मन है ) प्रकृतिरूप प्राणमय ब्रह्मा की अधिष्ठात्री बनती हैं | इसी वाङमय प्राणतत्त्व से, दूसरे शब्दों में- प्राणमय वाक्तत्त्व से ' विराट् ' का जन्म होता है । यही श्रापोमय विष्णु है । १० अक्षर के छन्द का ही नाम ' विराट् ' है, जैसाकि पूर्व में ‘ विराड्वै यज्ञः ' इसका निरूपण करते समय विस्तार से बतलाया जाचुका है । स्वयम्भू की वाक् वेदमयी है । वेदतत्त्व ऋक् यजु: - साम - मेद से तीन भागों में विभक्त है । त्रिधा विभक्त वेद का यजुर्भाग यत् — जू रूप स्थितिगत्यात्मक प्राण - वाक्सम्पत्ति से युक्त है । गतिप्रकृतिक ‘ यत् ’ प्राणतत्त्व है, ' जू ' स्थितिप्रकृतिक वाक्तत्त्व है । प्राण के व्यापार से यही वाक्तत्त्व श्राशरूप से द्रुत होता हुआ ग्रापोरूप में परिणत होजाता है | इसी ग्रास्ततत्त्व का नाम परमेष्ठी है । इसमें तेज, और स्नेह, दोनों तत्त्वों का समन्वय है । तेजस्तत्व अङ्गिरा है, स्नेहतत्व भृगु है । ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ' के अनुसार दोनों की समष्टि ही ‘ आप: ' है । मातरिश्वा नामक पिण्डस्वरूप समर्पक प्राणवायु के द्वारा इस आप: तत्त्व की उसी ब्रह्माग्निरूप यजुरग्नि में आहुति होती है । इसी आहुति से दशाक्षर विराट् का जन्म होजाता है | ५६०
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शतपथब्राह्मस ऋक् - साम, यत् - जू - आपः त्रायु- सोम- अग्नि- यम - आदित्य ही दशं अक्षर हैं । ऋक्साम प्रसिद्ध हैं । यत् ज् यज्जू हैं । यही परोक्ष भाषा के अनुसार ' यजुर्वेद ' है । श्रापः - वायु - सोम भृगु है । अग्नि - यम-आदित्य अङ्गिरा है । दोनों की समष्टि ही आप: है । यही ' अथवा ' है । ' अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गि-रसः श्रिताः, स त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् - तत आण्डं समवर्त्तत ' के अनुसार स्वायम्भुव त्रयीवेद उस घट्कल आपः में अन्तर्लीन होजाता है । सुतरां परमेष्ठी का विराट्त्त्व सिद्ध होजाता है । इसी आधार पर हम कह सकते हैं किं, –वाक् से विराट् गौ उत्पन्न होती है । यही पोमय विष्णु है । इस विराट् से गौरूप-धरा गौ उत्पन्न होती है | सौरी गौ ही गौ है । इसकी उत्पत्ति पारमेष्ठ्य विराट से ही होती है । इस गौ से ( जो कि गौ मनुरूपा है ) ' इडा गौ ' उत्पन्न होती है । इडा से ' भोग गौ ' उत्पन्न होती है । गौ वाङ्मय प्राणतत्त्व का नाम है । स्वयम्भू में इसका विकास वागूरूप से होता है । परमेष्ठी में बिराट्रूप से होता है | सूर्य्य में गौ [ रश्मि ] रूप से होता है । पृथिवी में इडारूप से होता है । एवं चन्द्रमा में भोगरूप से होता है । सृष्टिमूला स्वयम्भू - मूला सृष्टिधारा - क्रम के अनुसार स्वयम्भू से परमेष्ठी उत्पन्न होता है । परमेष्ठी से सूर्य का प्रादुर्भाव हुआ है । सूर्य्य से तदुपग्रहभूता पृथिवी उत्पन्न हुई है । पृथिवी से तदुपग्रहभूत चन्द्रमा उत्पन्न हुआ है । यही क्रम गौ की उत्पत्ति का है । स्वयम्भू की गौ नाम की सर्वव्यापिनी वाक् पहली ' गौ ' है । इससे पारमेष्ठिनी ' विराड्गौ ' उत्पन्न होती है । इससे सूर्य्य-मण्डलस्था ‘ गौ ’ उत्पन्न हुई है । इससे पृथिव्युपादानभूता ' इडागौ ' उत्पन्न हुई है । एवं इससे चान्द्रमसी ' भोगरूपा गौ ' उत्पन्न हुई है । इसप्रकार क्षराक्षरविशिष्ट अव्ययप्रजापति के श्वोवसीयस् मन से प्रादुर्भूता ' वाग् गौ ही क्रमशः विराट् - गौ - इडा - भोग - इन चार रूपों में परिणत होजाती है । दूसरे शब्दों में एक ही गोतत्त्व पाँच स्थानों में विभक्त होकर भिन्न भिन्न नाम - रूप- कम्मों से सम्बन्ध कर लेता है । इसी गौविज्ञान को लक्ष्य में रखकर कृष्णश्रुति कहती है— प्रजापतिर्वा एक एजासीत् । सोऽकामयत- बहुमनुस्यां, प्रजायेयेति । स श्रात्मानमैट्ट | स मनोऽसृजत । तन्मन एकधासीत् । तदात्मानमैट्ट - तद्वाचमसृजत । सा वागेकधासीत् । तदात्मानमैट्ट - सा विराजमसृजत । सा विराडेकधासीत् । सात्मानमैट्ट - सा गामसृजत । सा गौरेकधासीत् । सात्मानमैट्ट - सेडामसृजत । सेडैकधासीत् । सात्मानमैट्ट - सेमान् भोगा-नसृजत - यदस्यां इदं मनुष्या भुज्ञ्जन्ते । एवमेत्राम्य भोगाः । गौर्वै वाक्, गौर्विराट्, गौगौंः, गौरिडा, गौर्भोगाः । गौरिदं सर्वम् । १- वाक् गौः - -तैत्तिरीयसंहिता -गौनामिकाध्याय २ 1३1३1३ वाक्, गौं, इडा, भोग, पशु, इन पाँचों गोतत्त्वों का निरूपण यद्यपि प्राकृत है । तथापि प्रकर-णसङ्गति के अनुबन्ध से इनका संक्षिप्त स्वरूप बतला देना अनुचित न होगा । देवपात्ररूप सुप्रसिद्ध ५६१
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प्रथमकाण्ड ‘ चपट्कार ' मण्डल ही ‘ बागगौ ' है । वषटकार - मण्डल वाङमय है । मनःप्राणगर्भित वाक्तत्त्व ही ' वाकू ' है | मन ‘ अकार ' है | प्राण ' उकार ' है, एवं वाक् मकार ' है । मन अर्थसृष्टि में संसृष्ट है, निर्लिप्त है, सुसूक्ष्म है । वाक्तत्त्व संसृष्ट है, सलेप है, स्थूल है । मध्यस्थ प्राणतत्त्व संसृष्टासंसृष्ट है, सलेप निर्लेप है, स्थूल सूक्ष्म है । इसी रहस्य को बतलाने के लिए इन तीनों को ' अ ' - ' उ ' - ' म् ' - इन वर्णों से व्यवहृत किया जाता है | शब्दसृष्टि में ' अ ' असंसृष्ट है । इसमें कण्ठताल्वादि का मेल नहीं होता । जो स्थिति अर्थ-मन की है, शब्दसृष्टि में वही स्थिति ' अकार ' की है । ' म् ' स्पृष्ट वर्ण है । ' कादयो मावसानाः स्पर्शाः ' के अनुसार ‘ मकार ' अन्तिम स्पृष्ट वर्ण है । सृष्टि में अन्तिम विकारभूत जो स्थिति वाक्तत्त्व की है, शब्दसृष्टि में वही स्थिति ' मकार ' की है । मध्यस्थ ' उ ' में प्रोष्ठ सिकुड़ जाते हैं, परन्तु संसृष्ट नहीं होते । यही स्थिति मध्यस्थ प्राण की है । अतएव इसे ' उकार ' कहा जाता है । ' अ ' विष्णु है, इसी आधार पर ' अकारो वासुदेवः स्यात् ' कहा जाता है । ' उ ' शिव है, अतएव ‘ उकारस्तु महेश्वरः ’ कहा जाता है । वाग्ब्रह्म ब्रह्मा है । स्वयम्भू वाङमय है । यही ब्रह्मा है । जैसे वैष्णवी सृष्टि में विष्णु की प्रधानता है, इसीप्रकार शैवीसृष्टि में उकाररूप प्राणात्मक शिवतत्त्व की प्रधानता है । इसी रहस्य को बतलाने के लिए ' अ - उ - म् ' - इस क्रम को उलट कर उकाररूप शिवतत्त्व की प्रधानता के कारण उकार का प्रथम समावेश कर दिया जाता है । ' उ - अ - म् ' – यह स्थिति होजाती है । ' उकार ' को ' वकार ' होजाता है । चकार का प्रकार के साथ सम्बन्ध होनाता है । ' वम् ' बन जाता है । शिव की आराधना में जो ‘ बम्शंकर ’ बोला जाता है, इसका यही रहस्य है । बतलाना यही है कि, अ - उ - मू - की समष्टि ही मनः, प्राण, वाक्, की समष्टि है । यही आत्मा है । यही ' अ - उ - म् ' ओम् है । इसी आधार पर ‘ तस्य वाचकः प्रणवः ’ ' श्रोमित्येवं ध्यायथ - आत्मानम् ' यह कहा जाता है । मकार वाक्तत्त्व है, यह पूर्वकथन से भलीभाँति सिद्ध होजाता है । मकाररूप वाक्तत्त्व चिना मन:, प्राण के सर्वथा अनुपपन्न है । अतएव यह मनःप्राणगर्भिता वाक् ' वौक् ' कहलाती है । अ - उ - मिल कर ' ओ ' है । यह ‘ ओ ' वाक् के मध्य में है, ऐसी स्थिति में ' वा - ओ - क् ' से ' बौक् ' शब्द निष्पन्न होजाता है । स्वयं ‘ वाक् ’ शब्द भी इसी रहस्य को प्रकट करता है । जो तत्त्व मनः, और प्राण की अपेक्षा रखता है, वही ‘ मनश्च प्राणञ्च अन्नति ' इस व्युत्पत्ति से ' वाक् ' कहलाता है । ' उ – अ ' – से ‘ व ’ बना, ‘ अच् ’ के अकार के साथ सम्बन्ध होने से ' वाक् ' शब्द निष्पन्न हुआ । . यह वाक्तत्त्व प्रत्येक वस्तु पिण्ड से निकल कर अपनी १००० किरणों को वितत करता हुआ एक महामण्डल बनाता है । यही महामण्डल पुन: पद, विश्वरूप, साहस्री, महिमा, आदि अनेक नामों से व्यवहृत हुआ है । यही मण्डल ' वषट्कार ' नाम से प्रसिद्ध है । १००० त्राग्गौ हैं । इनमें ३० - ३० गौ की एक एक राशि का नाम एक एक ' अहर्गण ' है । इसप्रकार ६६६. में रश्मियों के ३३ अहर्गण हो— जाते हैं । १० शेष बच जाते हैं । यही चौतीसवाँ न्यून अहर्गण शेष रह जाता है । इसी के लिए ' चतुस्त्रिंशः प्रजापतिः ' यह कहा जाता है । ३३ अहर्गर्णो में ३ को मूलाधार मान कर उसमें ६ अहर्गण और मिला देने से ' त्रिवृत्स्तोम् ( ६ ) का स्वरूप बनता है । ओर ६ अहर्गणों के मिला देने से ' पञ्चदशस्तोम ( १५ ) ' का स्वरूप बनता है । ५६२
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शतपथब्राह्मण इसमें ओर ६ अहर्गणों के समावेश करने से ' एकविंशस्तोम ( २१ ) ' की स्वरूपनिष्पत्ति होती है ॥ इसमें ओर ६ अहर्गण मिला दिए जाते हैं, तो ' त्रिणवस्तोम ( २७ ) ' की स्वरूपनिष्पत्ति होती है । एवं ओर ६ अहर्गणों के सम्बन्ध से ' अयस्त्रिशस्तोम ( ३३ ) ' का स्वरूप निष्पन्न होता है । इसप्रकार त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविंश, त्रिरणव, त्रयस्त्रिंश, भेद से ५ स्तोम होजाते हैं । ३३ अहर्गणात्मक पूरे मण्डल का केन्द्र १७ वां स्थान है | यही ' उद्गीथप्रजापति ' है । इसी के लिए ' सप्तदशो वै प्रजापतिः ' यह कहा जाता है । यही ६ ठा स्तोम है । इसप्रकार १ त्रिवृत्, २ पञ्चदश, ३ सप्तदश, ४ एकविंश, ५ त्रिरणव, ६ त्रयस्त्रिंश भेद से एक ही सहस्रगोमय वाक्तत्त्व ६ भागों में विभक्त होजाता है । वाक् के इस पट्कार का नाम हीं वषट्कार है । वाक् इन्द्रप्रधान है । इन्द्र के ही द्वारा वाक् का व्याकरण होता है । एक ही वाक् तत्त्व वायुमय इन्द्र के सम्बन्ध से खण्ड - खण्डरूप में परिणत होता हुआ व्याकरण का अधिष्ठाता बनता । एक का विविधाकारकरण ही व्याकरण है । यह बाक्तत्व इन्द्रमय हैं, यज्ञपरिभाषा के अनुसार ‘ ऐन्द्रवायवग्रह ' मय हैं । अतएव इन्द्र के लिए ' वौषट् ' बोलते हुए ही आहुति दी जाती है । यही हमारे प्रकरण की प्रथमा ' वाग्गौ ' है । २ गोर्गौ: -‘ आयङ्गौः पृष्णिरक्रमीऩ c ' ( यजुःसं ३।६ ) के अनुसार ज्योतिः, गौ: - आयु - भेद से सूर्य्यमें तीन ‘ मनोता ’ माने जाते हैं । ज्योति से चतुष्टोमा परपर्य्यापक ' ज्योतिष्टोम ' का स्वरूप बनता है । ज्योतिस्तत्त्व सात भागों में विभक्त है । इसी आधार पर ‘ सप्तसंस्थो वै ज्योतिष्टोमः ' यह कहा जाता है । वे सातों ज्योतिःसंस्थाएँ १ अग्निष्टोम, २ अत्यग्निष्टोम ३ उक्थ्यस्तोम, ४ षोडशीस्तोम, ५ अतिरात्रस्तोम, ६ बाजपेयस्तोम, ७ आप्तोर्या-मस्तोम, इन नामों से प्रसिद्ध हैं 1 । दूसरा गौतत्त्व है । इसी से ' गोष्टोम ' का स्वरूप निष्पन्न होता है । तीसरा आयुस्तत्त्व है । इसीसे ‘ आयुष्टोम ' का सम्बन्ध है । अङ्गिरारूप अग्नितत्त्व आयु ही है । जबतक शरीर में गर्मी है, तभी तक है । इसी श्रायुरूप अङ्गिरा पर ' अङ्गिरसामयन ' नाम का सत्त्रयज्ञ प्रतिष्ठित है । गोतत्त्व पर ( जो कि वायुप्रधान है ) ' गवामयन ' नाम का सत्त्र प्रतिष्ठित है, एवं ज्योतिःस्वरूप आदित्य ' आदित्या -नामयन ' नाम के सत्त्र की प्रतिष्ठा है । इन तीनों में गोतत्त्व सहस्र हैं । इनमें से ३३३ गो का भोग तो सूर्य्य में होता है, ३३३ गो का भोग अन्तरिक्ष में होता है, एवं ३३३ गौ का भोग पृथिवी में होता है । पृथिवी में ' वसुदेवता ' की प्रधा-नता है, अन्तरिक्ष में ' रुद्रदेवता की प्रधानता है, एवं सूर्य्यं ' आदित्यमय ' ह । वसु - रुद्र - आदित्य, तीनों में क्रमश: ३३३, ३३३, ३३३ गौतत्त्व विभक्त हैं । परमेष्ठी में भृगु, और अङ्गिरा हैं । वहीं ' गोसव ' नाम से प्रसिद्ध ' पञ्चदशाहयज्ञ ' होता है । गोतत्त्व की उत्पत्ति इसी सोममय परमेष्ठी में होती है । गो का पिता परमेष्ठी है | इधर सूर्य्यरूप आदित्य अङ्गिरा है । अग्नि - यम - आदित्य तीनों अङ्गिरा हैं । ' आपो वै सत्यमसृज्यन्त । कंस्त्रिद् गर्भ दूध आप: ' इत्यादि श्रुतियाँ आपोमय परमेष्ठी को ही सूर्य्य का प्रभवस्थान मानतीं हैं । इसप्रकार गोबत् सूर्य्यरूप आदित्य भी उसी परमेष्ठीप्रजापति का पुत्र है । गौ, और आदित्य बहिन भाई हैं । रूद्र अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता हैं । अन्तरिक्ष में वायु का साम्राज्य है । यही वायु रुद्र का आत्मा हैं 1 यहाँ का वायुतत्त्व गोमय है । ३३३ गो इसमें प्रतिष्ठित हैं । यह गोमय वायु ही रुद्र का प्रभव है । अतएव ५६३
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प्रथमकाण्ड इस आन्तरिक्ष्य गोतत्त्व को हम ' रुद्रमाता ' मान सकते । पृथिवी में बसु की सत्ता है । व्यग्नि की आठ अवस्था ही आठ वसु हैं । यहाँ भी ३३३ गो का सम्बन्ध है । इन गोत्र का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण यह वसुरूप अग्नितत्त्व ही है । अतएव पार्थिव गोतत्त्व को हम अवश्य ही वसु की कन्या मान सकते हैं । इसप्रकार एक ही पारमेष्ठ्य गोतत्त्व स्थानभेद से आदित्य - रुद्र - वसु देवताओं से सम्बन्ध करता हुआ तीन स्वरूपों में परिणत होजाता है । परमेष्ठी सोममय है । सोम ही ' अमृत ' है । गोतत्त्व ही ' सोमरस ' का प्रवर्तक है । अतएव हम इसे अवश्य ही ' अमृत की नाभि ' कह सकते हैं । पृथिवी और सूर्य्य के मध्य का स्थान सौरतत्त्व के अवि-च्छिन्नरूप से आने से ' अदिति ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी त्रैलोक्य में गोतत्त्व व्याप्त है । अतएव हम इसे भी अवश्य ही ' अदिति ' कह सकते हैं । इसी त्रैलोक्य - व्यापक, अमृतापरपर्य्यायक सोमप्रवर्त्तक, अतएव अमृतनाभिस्वरूप, वसु - रुद्र - आदित्य, अदिति नाम से प्रसिद्ध, ' गोतत्त्व ' से ' गोपशु ' का आत्मा बना है । उस गो की यह उसी प्रकार प्रतिमूर्ति है, जैसे कि ' सम्वत्सरयज्ञपुरुष ' की प्रतिकृति ' मनुष्य ' है । गोपशु में सम्पूर्णं प्राणदेबता विकसित हैं । इसके दुग्ध में सोमरस आपूर्य्यमाण ( भरा ) है ।
स्वादु पाकरसं स्निग्धमोजस्यं धातुवदनम् ।
प्रायः पयः " तत्र गव्यं तु जीवनीय रसायनम् ” ॥
- वाग्भट - श्रष्टाङ्गहृदय उक्त आयुर्वेद - सिद्धान्त के अनुसार गोदुग्ध साक्षात् ' रसायन ' है । गोवल ही देश का प्राण है । यह अदितिमूर्ति है । जिस देश का गोधन नरराक्षसों के अत्याचार से नष्ट होजाता है, उस देश की ' श्री ' का नाश अवश्यंभावी है । इसी पूर्वोक्त गोतत्त्व का प्राणगो के साथ अभेद बताते हुए, साथ ही गोबल को सुरक्षित रखने का आदेश करते हुए वेदभगवान् कहते हैं—
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानां, अमृतस्य नाभिः ।
प्र नु वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट ॥
-ऋग् सं ० ६।७८ वसुप्राण - प्रधान गोतत्त्व पार्थिव होने से ' कृष्ण ' है । जिस गोपशु में इस प्राण की प्रधानता होती है, वह गो ‘ कृष्णा ’ होती है । रुद्रप्राण - प्रधान गोतत्त्व श्रान्तरिक्ष्य होने से शुक्ल है । आदित्य – प्रधान गोतत्त्व हिरण्मय वर्ण से युक्त हे | दर्शन में यही गौ श्रेष्ठ है । दान में शुक्ला गो उत्तम है । एवं दुग्ध में कृष्णा गो श्रेष्ठ मानी जाती है । पूर्व में बतलाया गया है कि, गोतत्त्व ६६६ में है । हमारवीं गौ ' कामधेनु'-कामगवी -आदि नामों से प्रसिद्ध है । इन सब की प्रतिष्ठा सौररश्मियाँ हैं । अतएव ' रश्मि ' को भी गौ कहा जाता है । यही हमारे प्रकरण का दूसरा गोतत्त्व है । ३ ३- - इड़ा गौ: -: -पार्थिवरस का ही नाम ' इड़ा ' है । यह रस सहस्र प्रकार के हैं । यह ' रससाहती ' ही ' इड़ागौ ' है । इसी इड़ा को ' इरा ' भी कहा जाता है । ' इरारस ' ही भूपिण्ड का उपादानकारण है । इरारसमय होने से ५६४