Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 871–880

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 871–880

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शतपथब्राह्मण ही पार्थिव प्रज्ञानात्मा ' हिरण्मय ' कहलाता है । अध्यात्म में प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से प्रविष्ट सौर हिरण्मय दिव्य--तेज ' विज्ञानात्मा ' नाम से व्यवहृत होता है, एवं प्रवर्ग्य - सम्बन्ध से प्रपद के द्वारा प्रविष्ट इरारसमय पार्थिव-तत्त्व ‘ प्रज्ञानात्मा ' नाम से व्यवहृत होता है । सौर तेज अग्निमय होने से हिरएमय है, इधर पार्थिव रस इरामय होने से हिरण्मय है । परोक्ष प्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में पार्थिव ' इरामय ' भाग भी ‘ हिरण्मय ' नाम से व्यवहृत होता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि ऐतरेय कहते हैं— " स इरामयः । यद्धीरामयस्तस्माध्दिरण्मयः । हिरण्मयो ह वा मुष्मिलोके

सम्भवति । हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे - य एवं वेद " ।

ऐ ० ० १ ० ३ ख ० इति ॥

इसी इरारस को ‘ इला ' भी कहा जाता है । उपग्रहोत्पत्तिक्रम के अनुसार ' इलारसमयी ' पृथिवी ' सूर्य-पुत्री ' है । पूर्वोक्त मनुर्विज्ञान के अनुसार सूर्य्य मनु है । इसी से ' इलारूपधरा ' पृथिवी उत्पन्न हुई है । अत--एव इसे ' मनुपुत्री ' कहा जाता है, जैसाकि आगे आने वाले ' इडाप्राशन ' प्रकरण में स्पष्ट होने वाला है । यहाँ केवल यही बतलाना है कि, इलारसमयी पृथिवी साक्षात् गौ है । इरारससाहस्री के कारण यह पार्थिव गोतत्त्व भी सहस्र भागों में हीं विभक्त है । सृष्टिकर्त्ता प्रजापति इसी गो के सम्बन्ध से अपना सृष्टय पादानभूत यज्ञ करने में समर्थ होरहे हैं । पुराणों में एतद्विषयक एक वैज्ञानिक श्राख्यान प्रसिद्ध है । प्रसङ्गागत उसे भी जान लेना उचित ही होगा । “ प्रजापति ने अपनी पत्नी सावित्री को साथ लेकर यज्ञ करना चाहा । परन्तु किसी कारण -वश सावित्री प्रजापति से रूठ गई । वह प्रजापति को छोड़कर उनसे बहुत दूर चली गई । यज्ञ बिना पत्नी के हो नहीं सकता था । ऐसी अवस्था में प्रजापति ने यज्ञसिद्ध्यर्थं एक ग्वाले की कन्या मुख प्रविष्ट करा उसे पुच्छ द्वारा निकाल कर उसके साथ विवाह किया । बही द्वितीया पत्नी ' गायत्री ' नाम से प्रसिद्ध हुई । इसीके सहयोग से प्रजापति का यज्ञ सम्पन्न हुआ | एवं इसी यज्ञ से पार्थिवी प्रजा उत्पन्न हुई ” । “ नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः ” - “ सूर्य्य आत्मा जगत-स्तस्थुषश्च ” इत्यादि के अनुसार सूर्य्य ही स्थावर - जङ्गमात्मक विश्व के उपादान हैं । सम्पूर्ण प्रजा के प्रभन— प्रतिष्ठा - परायण सूर्य्य ही हैं । ये पञ्चपुण्डीरात्मक महाविश्व के केन्द्र में प्रतितिष्ठित हैं । ये ही हमारे प्रकरण के प्रजापति हैं । अग्नीषोमात्मक यज्ञ के द्वारा ही इस सूर्य्यप्रजापति से सब कुछ उत्पन्न हुआ है । इस सूर्य्यप्रजापति से चारों ओर निकल कर बड़ी दूर पर्य्यन्त व्याप्त होने वालीं सौरश्मियाँ ह्रीं ' सावित्री ' नाम से प्रसिद्ध हैं । ऋजुमार्ग से आने वाला तेज ही ' सावित्री ' कहलाता है । सावित्रीतेज का प्रवर्त्तक ' सविता ' है । ग्राजदिन सविता शब्द ' सूर्य्य ' का पर्याय माना जाता है । तत्तद्वेदभाष्यकारों की दृष्टि में सूर्य्य ही सविता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । सूर्य्य - चन्द्र- वृहस्पति - पृथिवी - शनि - मङ्गल इत्यादि पिण्डों की भाँति सविता भी एक स्वतन्त्र उपग्रह है । सूर्य्य से ऊपर वाजपेययज्ञ का अधिष्टाता ‘ बृहस्पति ’ है । उससे ऊपर पवित्रसोम की निधिभूत ब्रह्मणस्पति है । इससे ऊपर ' सविता ' है । इसमें से प्र ेरणाभाव निकलता है 1 । प्रत्येक वस्तु में नो एक केन्द्र से प्रेरणाभाव निकलता है, वह इस सविता की ५६५

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प्रथमकाण्ड ही महिमा है । ' सविता वै देवानां प्रसविता ' के अनुसार सविता ही सबका ' प्र ' रयिता ' है । रोदसी-त्रिलोकी में रहने वाले अस्मदादि प्रजावर्ग में यह प्रेरणा सविता से सीधी न आकर सूर्य के द्वारा ही आती है | अतएव सूर्य्य को सविता मान लिया जाता है । वस्तुतः जिनमें प्रेरणावृत्ति है, वे सत्र सविता हैं । दीपक सविता है, दीपप्रभा सावित्री है । चन्द्रमा सविता है, चन्द्रिका सावित्री है | गुरु सविता है, गुरुवाणी सावित्री है । सविता से निकलने वाला तेज ही सावित्री है । यह सावित्रतेज उस सत्रिताप्रजापति से निकलकर चला जाता है, उसके साथ प्रजापति का मेल हो ही नहीं सकता । जो सौरतेज सूर्य्य से निकल कर हमारी ओर आरहा है, उसके साथ सूर्य्यप्रजापति का मिथुन-भाव कैसे सम्भव होसकता है । महिमापृथिवीं ( वषट्कारात्मिका पृथिवी ) के रथन्तरसाम की सत्ता २२ वें अहर्गण पर मानी जाती है । पृथिवी के २१ वें अहर्गण पर सूर्य्य है । यही स्थान पृथिवी का पुष्करद्वीप है । यहीं सूर्य्यप्रजापति यज्ञार्थं प्रतिष्ठित हो रहे हैं । इनसे निकलकर पृथिवी की ओर जाती हुई रश्मियाँ इन से सम्बन्ध नहीं करतीं । यही सावित्री का रुठकर पृथक् दूर चला जाना है । गो चराने वाला ही ग्वाला है । सूर्य्यं गो को प्रेरित करता है । गोचारणवृत्तित्त्व सूर्य का स्वाभाविक धर्म है । सौररश्मियाँ इस ग्वाल-सूर्य्य की दुहिता है । गोरूपधरा पृथिवी के साथ इसका सम्बन्ध होता है । आती हुई सौररश्मियाँ भूमण्डल से सम्बन्ध कर प्रतिफलित होतीं हैं । प्रतिफलित यह सौरतेज ही गोरूपधरा पृथिवी के सम्बन्ध से ' गायत्री ' नाम से प्रसिद्ध होता है । पृथिवी से प्रतिफलित होकर ऊपर द्युलोक की ओर जाता हुआ पार्थिवतेज ही ' गायत्री ' है । इसी के समन्वय से सूर्य्यप्रजापति सपत्नीक बनते हुए अपना यज्ञ करने में समर्थ होते हैं । यह गायत्री ज्योति, छाया, भेद से दो प्रकार की है । सौरतेज ऊपर से आया । पृथिवी से टकरा कर उसी मार्ग से पुनः चला गया । यही ज्योतिर्म्मयी गायत्री है । धूप नहीं है, किन्तु प्रकाश होरहा है । इसका कारण यही है कि, जातीं हुई सौररश्मियाँ इधर उधर प्रतिफलित होतीं हैं । इसी से प्रकाश होजाता है । यही छायामयी गायत्री है । धूप में देवता रहते हैं, अन्धकार में असुर रहते हैं, एवं सन्विस्थानीय छायाभाग में पितर रहते हैं । पितरप्राण की प्रतिष्ठा छायामयी गायत्री है । यही कारण है कि, पितृकर्म्म में दोने ओंधे कर दिये जाते हैं । एवं पितृकर्म्म छाया के स्थान में ही किया जाता है । अस्तु इस अप्राकृत प्रकरण को अधिक न बढ़ा कर केवल यही बतला देना चाहते हैं कि, सहस्ररस समष्टिरूपा इलारसमयी पृथिवी ही इस प्रकरण की ‘ इड़ागौ ' है । ४- भोग- गौ: -' एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः ' के अनुसार चन्द्रमा देवताओं का अन्न है । भोक्ता ‘ अन्नाद ' कहलाता है, भोग्य ' अन्न ' कहलाता है । भोग्य ही भोग है | यही ' भोगगौ ' है । पशुतत्त्व ही ‘ भोग ' है । संसार में जितने भी पशु हैं, सब भोग हैं । एवं सब गोरूप हैं । पारमेष्ठ्य सोमरस ही गौ है । यही अन्नाद अग्नि का अन्न है । ऐसी अवस्था में हम अवश्य ही इस भोगतत्त्व को गौ कह सकते हैं । सोम-* त्र्य ं गोपाः - सूर्य्यः । ( शतपथे ) । ५६६

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शतपथब्राह्मण प्रवान होने से ही इस गोपशु में इतर सम्पूर्ण पशुओं का अन्तर्भाव है । इसी सम्पूर्ण विज्ञान के आधार पर निम्नलिखित निगम वचन प्रतिष्ठित हैं— १ – “ स हैष सोमोऽजस्रो यद्गौः " । ( शत ० ७५।२।१६ ) । २- " गौर्वा इदं सर्व विभर्त्ति " ( शत ० ३।१।२।१४ ) । ३– “ नैते सर्वे पशवो यदजावयश्चारण्याश्च । एते वै सर्वे पशवो यद्गव्याः " ( शत ० १३ | ३ | २ | ३ ) । ४ – “ अन्न ं हि गौः ” ( शत ० ४ | ३ | ४ | २५ ) | ५ - " यज्ञो वै गौः " ( तै ० ब्रा ० ३ | ६ | ८ | ३ ) । गोरूप सोम की आहुति से अग्रीषोमात्मक यज्ञ सम्पन्न होता है । ' गौ ' को ' यज्ञ ' कहा गया है । यही हमारे प्रकरण की चौथी ' भौगगौ ' है । ५ - विराड्गौः-— छन्दोविज्ञान के अनुसार दस अक्षर की समष्टि का ही नाम ' विराट ' है, जैसाकि पूर्व के प्रकरणों में ‘ विराड् वै यज्ञः ’ इसका निरूपण करते समय विशदरूप से बतला दिया गया है । प्रकृत में विराट् से सौरमनु से प्रादुर्भूत होने वाला ' दशर्षिप्राण ' ही अभिप्रेत है । इसी दशर्षिप्राणसमष्टिरूप विराट् से सम्पूर्ण प्राणियों का आयु निष्पन्न होता है । ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' के अनुमार ग्रायुःस्वरूप - रक्षकं आत्मा का अधिष्ठाता एकमात्र सूर्य्य ही है । ' सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' के अनुसार आत्माधिष्ठाता सूर्य्य मध्यस्थ ‘ बृहतीछन्दोरूप विष्वद्वृत्त ' पर स्थिररूप से तप रहे हैं । विषुव से उत्तरभाग में ३ अहोरा— वृत्त हैं, एवं तीन अहोरात्रवृत्त ही दक्षिण में हैं । इनमें जो दक्षिण भाग का सबसे अन्त का अहोरात्रवृत्त है, वही ' गायत्री ' छन्द कहलाता है । उसमें ६ अक्षर हैं । आगे का सप्ताक्षर उष्णिक छन्द है । उसके आगे का अष्टाक्षर अनुष्टुप छन्द है । मध्य का बृहतीछन्द नवाक्षर है । इसप्रकार पूरे बृहतीछन्द में ४ चरणों के अनुपात से ३६ अक्षर होजाते हैं । पूरे बृहतीछन्द में ३६० अंश हैं । इसमें ६०-६० अंश के ४ खण्ड हैं । प्रत्येक खण्ड में १० - संख्या के अनुपात से ६-६ - विराट् होजाते हैं । इसप्रकार पूरे वृत्त से ३६ विराट्सम्पत्ति प्राप्त होजाती है । प्रत्येक विराट् के साथ गोसाहसी का सम्बन्ध है । ऐसी अवस्था में ३६ बृहती की ३६००० ( छत्तीस— हजार ) बृहती होजातीं हैं । यही हमारी आयु का प्रमाण है । हम प्रकृति के नियमानुसार ३६००० अहोरात्र ही जीवित रह सकते हैं । ३६००० दिन के कुल १०० वर्ष होते हैं । इसी विज्ञान के आधार पर ' शतायुर्वै पुरुषः ' यह कहा जाता है | प्रकृत में इस प्रपञ्च से केवल यही बतलाना है कि, सप्तर्षिप्राणसमष्टिरूप चिराट्-तत्त्व ही विराड्गौ है | इसका उक्थस्थान ( प्रभवस्थान ) मनु ही है । एक प्रकार से मनु उक्थ है, त विराट् गौ उसके अर्क हैं । अर्क अपने उक्थ के साथ नित्य सम्बन्द्ध हैं । इसी विराड्गौ के साथ, दूसरे शब्दों में विराट् - ऋषेभ ( महावृषभ ) के साथ युक्त होकर भगवान् मनु यज्ञ कर रहे हैं । यही हमारे प्रकृत ५६७

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प्रथमकाण्ड प्रकरण का ऋषभ है । इस ऋषभ की जहाँतक व्याप्ति है, वहाँतक आसुरप्राण कदापि प्रविष्ट नहीं होसकता । आधिदैविक मनु मनावी ऋषभ आदि का संक्षिप्त स्वरूप बतला दिया गया । अब आाध्या-त्मिक जगत् की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जारहा है । याध्यात्मिक- विवर्त्तस्वरूप - दिग्दर्शन-हृदय में रहने वाला विज्ञानज्योतिर्म्मय ' अन्तर्य्यामी ' तत्त्व ही आध्यात्मिक मनु है । यही श्राध्यात्मिक प्रपञ्च का मूलाधार है । ' हृत्प्रतिष्ठं यद जिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' ( यजुसं ० ) के अनुसार मन हृदय में प्रतिष्ठित है । यह मन ही मनु है । विषय, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, आत्मा, इन पाँचों में सर्वप्रथम विषय है । इन्द्रियों का सम्बन्ध विषयों के साथ होता है, दूसरे शब्दों में ' अप्राप्यकारित्व– सिद्धान्त ' के अनुसार विषय इन्द्रियों पर आते हैं । इन्द्रियों पर आए हुए विषयों का सम्बन्ध ' प्रज्ञान ' नाम से प्रसिद्ध ' सर्वेन्द्रिय ' ' मन ' से होता है । मन के द्वारा उन विषयों का ' विज्ञानात्मा ' नाम से प्रसिद्ध ' बुद्धि ' से सम्बन्ध होता है । बुद्धि के द्वारा उस विषय का ' महदत्तररूप आत्मा ' के साथ सम्बन्ध होता है । आत्मा आनन्दधन है । उसके प्रतिबिम्ब से विज्ञान ( बुद्धि ) आलोकित | विज्ञानगत आत्मा-नन्द से प्रज्ञानमन आनन्दमय बन रहा है । प्रज्ञानमन का आनन्द रश्मिरूप में परिणत होकर इन्द्रियों के द्वारा विषयों से संलग्न हो कर उह्न आनन्दघन बना देता है । इस क्रमिक धाराप्रवाह से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, जितनी आनन्द की मात्रा स्वयं मन में है, विषयजात में मन की अपेक्षा आनन्द की मात्रा बहुत थोड़ी है । मन के आनन्द से ही विषय ' प्रिय ' लगते हैं । यदि किसी कारणवश मन अशान्त, एवं क्षुब्ध होता हुआ दुःखी बन जाता है, तो कोई विषय अनुरूप ( ग्रच्छा ) नहीं लगता । ऐसी अवस्था में हम यह अवश्य ही मान सकते हैं कि, विषय में जो ' समृद्धानन्द ' आता है, वह इस मन का ही आनन्द है । जो जिस वस्तु को लेकर उत्पन्न होता है, वह उसी को लेकर सन्तुष्ट रहता है ( १ ) । मन की स्वरूपसत्ता पूर्वोक्त क्रम के अनुसार हृदयम्थ सच्चिदानन्दघन आत्मा के आनन्द पर ही निर्भर है । अतएव इस स्वस्वरूसत्ता के लिए मन निरन्तर श्रानन्द की इच्छा किया करता है । नास्तिकदर्शन के अनुसार- यदि आत्मा दुःखमय होता, तो मन को दुःख की भी इच्छा होती । परन्तु हम देखते हैं कि, पिपीलिका से लेकर महायोगीश्वर पर्य्यन्त, सभी श्रानन्द की ही कामना किया करते हैं । दुःख से सत्र प्राणी मुख मोड़ते हैं । इस से यह भी भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, आत्मा आनन्दमय है, एवं दुःख श्रागन्तुक है । मन की वृत्ति है । मन हीं सुखी होता है, एवं मन हीं दुःखी होता है । आत्मा तो एकान्ततः नित्या-नन्दघन ही है । कहना यही है कि, मन सदा आनन्द की ही कामना किया करता है । इसी आनन्द के अन्बेषण के लिए वह इन्द्रियों के द्वारा विषयों पर जाता है । परन्तु वहाँ उसे वास्तविक शान्ति नहीं मिलती । कारण इसका यही है कि, स्वयं मन के कोश में ( आत्मा के सन्निकट होने से ) जितनी आनन्द की मात्रा है, आत्मा से विप्र-( १ ) - ' जो जिस से उत्पन्न होता है । वह उसे खाकर ही जीवित रहता है " सुप्रसिद्ध - लोकनिष्ठासूत्र । ५६८

पृष्ठ 875

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शतपथब्राह्मण कृष्ट रसने वाले विषयों में वह आनन्द की मात्रा मन की अपेक्षा कहीं अल्पमात्रा में है । अतएव मन किसी विषय पर चिरकाल पर्य्यन्त नहीं ठहरता । एक विषय को आनन्द की लालसा से मन पकड़ता है, परन्तु वहाँ उसे नन्द की अल्पता के कारण सन्तोष नहीं होता । अतएव थोड़े समय के अनन्तर ही मन उस विषय को छोड़ देता है, एवं पुनः अन्य विषय से संलग्न होजाता है । इसप्रकार एक विषय के अनन्तर दूसरे विषय पर, दूसरे से तीसरे पर, तीसरे से चौथे पर, यो धारावाहिकरूप से मन निरन्तर श्रानन्द की लालसा से इधर उधर भटका करता है । यही वृत्ति ' चञ्चलता ' है । चाञ्चल्य ही ' क्षोभ ' है । क्षोभ ही ' अशान्ति ' का मूल -कारण है | ' अशान्तस्य कुतः सुखम ' । विषयजात में लीन रहने वाले जितने भी मनुष्य हैं, सब इसी दुःखसागर में निमग्न हैं । दुःख से परित्राण प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है, मन को विषयों से पराङमुख कर उसे आत्मानुयोगी बनाना । आत्मप्रतियोगिक, एवं विषयानुयोगिक मन कभी शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता । उस के लिए तो इसे विषयप्रतियोगिक, एवं आत्मानुयोगिक ही बनना पड़ेगा । इसी रहस्य का निरूपण करती हुई उपनिषत् श्रु ति कहती हैं—

" पराश्चि खानि व्यतृगत स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ पश्यति नान्तरात्मन् ।

कश्चिद्धीरः प्रत्युगात्मानमैचदावृत्यचक्षुरमृतच्चमिच्छन् ” ॥

— कठ ० २ ० ० १ मं ० पूर्व के प्रकरण से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, श्रात्मप्रतियोगिक, विषयानुयोगिक मन नाना विषयों के कारण अनेक वृत्तियों से युक्त होजाता है । इन्द्रयों के द्वारा मन पर ' वासना ' - ' भावना ' रूप से आई हुई ज्ञान - कर्मात्मिका ' विषयमात्रा ' मन से सम्परिष्वक्त विज्ञान [ बुद्धि ] पर जाती है । ' स वा एष विज्ञानात्मा प्रज्ञानात्मना सम्परिष्वक्तः ' [ बृहदारण्यक उप ० ] के अनुसार बिज्ञान प्रज्ञान से अभिन्न है । प्रज्ञान विज्ञानज्योति से ही प्रकाशित होरहा है । विज्ञान प्रज्ञान पर प्रतिष्ठित है । विज्ञान के द्वारा वह विषय महदक्षर [ सत्त्वात्मा ] से युक्त आत्मा पर जाता है । जिस ' प्राणसूत्र ' के आधार पर एक ही विषय इन्द्रिय-मन - विज्ञान - महदक्षर से सम्बन्ध करता है, वही प्राणसूत्र मनुस्तत्त्व है । और यही अन्तर्यामी-सत्य है । विज्ञानेन्द्र, प्रज्ञान सोम, भोक्ताग्नि, तीनों के समन्वय से वह अन्तर्य्यामी सत्य, रुक्माभ, प्रशासिता, परपुरुष, अग्नि, शाश्वतत्रह्म, इत्यादि अनेक नामों से व्यवहृत होने लगता है, जैसा कि प्रकरण के प्रारम्भ में ही बतलाया जाचुका है । श्रद्धातत्त्व ही इस अन्तर्यामी मनु की पत्नी है । इसी के समन्वय से मनु ' सबल बन रहा है । श्रद्धायुक्त मनु का संकल्प सर्वथा सत्य ही होता है । यदि हमारा मन इस श्रद्धा-युक्त मनुरूप अन्तर्य्यामी सत्य के आधार पर चलता है, तो कभी वह कुपथगामी नहीं बनता । ‘ स्वस्य च प्रियमात्मनः ' के अनुसार आत्मा की संविन्मूला प्रतिध्वनि हीं - ' सत्धर्म्म ' है । वह ग्रात्मा यही हृदयस्थ विज्ञानघन मनु है । मनुष्य जत्र किसी शुभकार्य में प्रवृत्त होता है, तो आत्मगुहा से सत्या परावाक् [ परोक्षध्वनि ] निकलती है कि, देखो! यह कार्य्य अशुभ है । इसे मत करो । इस परोक्षध्वनि की उपेक्षा कर अशुभ कम्मों की ओर प्रवृत्त होने वाला यही मन है । एवं इस सत् - प्रवृत्ति को अवरुद्ध करते रहने ५६६

पृष्ठ 876

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प्रथमकाण्ड वाला विज्ञानघन मनु है । मनु जो कुछ करता है, उसी में हमारा हित है । इसी आध्यात्मिक मनु - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर महर्षि ताण्ड्य कहते हैं- L " मनुर्वै यत् किञ्चावदत्तद् भेषजं भेषजतायै ” । - ताण्ड्य ब्रा ० २३।१६७ हृदयस्थ इसी मनुस्तत्त्व से त्रयस्त्रिंशत् [ ३३ ] यज्ञिय देवताओं का विकास होता है । इसी पर ३३ यज्ञियदेवता [ ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, २ अश्विनीकुमार ] प्रतिष्ठित हैं । इसी अभिप्राय से ऋषि कहते हैं—

इति स्तुतासो असथा रिशादसो ये स्थ त्र्यश्च त्रिंशच्च । मनोर्देवा यज्ञियासः ॥

—ऋक्सं ० ८ | ३८ | २ | विज्ञानात्मा का ही नाम बुद्धि है । इस विज्ञानोक्थ से विनिर्गता ' अर्क ' रूपा रश्मियाँ हीं ' धी ' नाम से व्यहृत होतीं हैं । आज दिन ' घी ' और ' बुद्धि ' को पर्य्याय समझा जाता है । परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । ' बुद्धि ' भिन्न वस्तु है, एवं ' धी ' पृथक् तत्त्व है । बुद्धि एक है, धी अनन्त हैं । ' बुद्धि ' उक्थ है, ' घी ' पर्क हैं । बुद्धि के अर्क रूप इन ' घी ' भागों को लेकर ही मन तत्तद् विषयोंके साथ युक्त होता हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है-- ~ -पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनसा धियः । पुनन्तु विश्वा भूतानि जातवेदः पुनीहि माम् ॥ - यजुः सं ० १०/३६. प्रकरण के प्रारम्भ में ही हम यह निवेदन कर चुके हैं कि, मन, और मनुं का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । मनु हीं मनोरूप में परिणत होकर अध्यात्मचक्र का सञ्चालन कर रहे हैं । मन, और मनु के इसी अभिन्न भाव का प्रतिपादन करती हुई अथर्वश्रुति कहती है-पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धिया । पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातु मा ॥ - अथर्व ० ३ ० २ मं ० १६ सूत्र १ जो अर्थ यजुःश्रुति का है, वही अर्थ अथर्वश्रुति का है । ' मनसा धियः, एवं ' मनबो धिया ’ - दोनों वाक्य अभिन्नार्थक ही 1 पूर्व में बतलाया गया है कि, ' इड़ागौं ' मनुपुत्री है, एवं वही ' मानवी ' ' इड़ा ' ' इरा ' - ' इला ' इन नामों से भी प्रसिद्ध है । सिंहावलोकन - न्याय से आज पुनः हम उसी की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । इरा भूवाकू सुराप्सु स्यात् ' - ' गौ भूवाचस्त्विड़ा इला ' ( अमरकोश - नानार्थवर्ग ) के ६००

पृष्ठ 877

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शतपथब्राह्मण अनुसार पार्थिव ‘ बाग्रस - गोरस ' का ही नाम ' इरा ' है । निग्ढ़ वैज्ञानिक भाव में यह तत्त्व ‘ इरा ’ कहलाता है, एवं स्थूल वैज्ञानिक भाव में यही तत्त्व ' इड़ा ' कहलाता है । दूसरे शब्दों में- याज्ञिक परिभाषा में यह ' इडा ' नाम से व्यवहृत होता है, एवं ऐतिहासिक दृष्टया यही ' इला ' नाम से प्रसिद्ध है । पूर्व में हमनें ऋक्तत्त्व को ‘ मनु ' कहा है | उपक्रम - प्रस्ता । - प्रगति - बिन्दु ही ऋक् है । जिस त्रिन्दु से सम्पूर्ण भाव प्रस्तुत होते हैं, अर्करूप से उठते हैं, वह नभ्यबिन्दु ही ऋक् है । जिससे सम्पूर्ण पदार्थ उठते हैं, वही ‘ उक्थ ’ कहलाता है | ऐसा ऋक्तत्त्व ही है, अतएव ऋक् को ' महोक्थ ' कहा जाता है । ' यही महोक्थ हमारा मनु ' है । हृदय से उठने वाले भाव जिस स्थान पर उपरत होते हैं, वहीं इस मनुरूपा ऋक् का अवसान है । अवसान ही उस ऋका ' साम ' है । अवसाम ही अवसान है । अवसान ही साम है । इसप्रकार ऋक्, साम दोनों अविनाभूत हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' ऋच्यधूढं साम गीयये ' ( शत ० ८ | १ | ३ | ३ ) यह कहा जाता है । प्रस्तावविन्दु का नाम हीं ऋक् है, एवं निधनबिन्दु का नाम हीं उद्यचसाम है । इन दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित स्थिति गति -तत्त्व ही यजु: है । ऋक् ही मनु है । इधर ऋक् ही अवसानकोटि में प्रविष्ट होता हुआ ' साम ' स्वरूप में परिणत होता है । ऐसी अवस्था में हम ऋक् को ही साम मान सकते हैं । · यजुः इस ऋक् के मध्य में है । अतएव तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते ' इस न्याय के अनुसार ऋक् से यजुः का भी ग्रहण होजाता है । इसी आधार ऋग्रूप मनु को हम वेदमूर्त्ति ( त्रयीमूर्त्ति ) भी मान सकते हैं । परन्तु प्रधानता ऋक् की ही समझनी चाहिए । क्योंकि पूर्व में हमनें हृदयावच्छिन्न मन को ही मनु कहा है । यही उक्थस्थान है । प्रत्येक वस्तु के हृदय से ही सम्पूर्ण वृत्तियों का निर्गमन होता है । संसार में ' वेद्य ' पदार्थ अग्नि - वायु - आदित्य भेद से तीन ही भागों में विभक्त हैं । पार्थिव अग्नि पहिला वेद्य है । श्रान्तरिक्ष्य वायु दूसरा वेद्य है । दिव्य आदित्य तीसरा वेद्य है | तीनों वेद्य क्रमशः ऋङ्मय - राजुर्म्मय - साममय हैं । इस ‘ वेद्यत्रयी ' का निरू-पण करने वाला शास्त्र ही ' वेदत्रयी ' नाम से व्यवहृत होता है । ऋक्, साम से भिन्न जो यजुर्वेद है, वही शुक्ल, कृष्ण भेद से दो भागों में विभक्त है । कारण इसका यही है कि, अन्तरिक्ष में पञ्चदशस्तोम, सप्तदशस्तोम, इन दोनों का अन्तर्भाव है । त्रिवृतस्तोम ( 8 ) पर्य्यन्त पार्थिव अग्नि की सत्ता है । यहीं ऋग्वेद प्रतिष्ठित है । पञ्चदशस्तोम ( १५ । पर्य्यन्त वायु का साम्राज्य है । वायु नीरूप है । श्रतएव इसके आधार पर प्रतिष्ठित रहने वाला यजुः भी कृष्ण ही है । एवं प्रान्तरिक्ष्य सप्तदशस्थान दिव्य सौर अग्निमय होने से आहवनीय कहलाता है । इसी ग्राहवनीय में सोम की आहुति होती है । ' त्वं ज्योतिषा वि तमो बवर्थ ' के अनुसार सोमाहुति से सप्तदशस्तोमात्मक श्रावहवनीयान्तरिक्ष ज्योतिर्मय होजाता है । अन्तरिक्ष में यजुः प्रतिष्ठित है । यह अन्तरिक्ष ज्योतिर्मय है, अश्वस्वरूप है । अतएव तत्सम्बन्धी यजुः को शुक्लयजुर्वेद कहा जाता है । भगवान् याज्ञवल्क्यने प्रकृतिसिद्ध अश्वमूर्त्ति इसी शुक्लयजुस्तत्त्व के आधार पर वेददृष्टि प्राप्त की है । शुक्लाग्नि यजुर्वेद है । यह सौर अग्नि है । इसी से बुद्धि का विकास है । सौराग्निप्रधान शुक्लयजुर्वेद में इस बुद्धि की ही प्रधानता है । सौम्य मन यहाँ गौण है । अतः ' मनसा धियः ' यह कहा है । यहाँ मन विशे-६०१

पृष्ठ 878

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 878 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड पण है, एवं ' घी ' विशेष्य है । अग्नितत्व से बुद्धि का विकास होता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' धी ' प्रधान पूर्वोक्त यजुर्मंन्त्र के उपसंहार में ' जातवेदः पुनीहि माम् ' वह कहा है । पदार्थ का स्वरूपज्ञान कराने वाले वेदमूर्त्ति सौर अग्नि हीं ' जातवेदा ' नाम से व्यवहृत हुए हैं । अथर्ववेद सोममय है । इधर हमारा मन सौम्य है | अतत्र सोमप्रधान अथर्ववेदने- ' पुनन्तु मनवो विया ' इत्यादि रूप से मन को प्रधान माना है, एवं धी को गौण माना है | यहाँ का ' मनवः ' - ' मनांसि ' अर्थ में हीं प्रयुक्त हुआ है । इसी ग्राधार पर हमनें और मन, मनु, दोनों को अभिन्न तत्त्व माना है । अपिच, मन सौम्य है । सोम पवित्र होने से, एवं पदार्थों को पत्रित्र करने के कारण ' पत्रमान ' नाम से प्रसिद्ध है 1 । अथर्व में इसी की प्रधानता है । अतएव पूर्वोक्त अथर्वमन्त्र के उपसंहार में ' जातवेदः पुनीहि माम् ' न कह कर ' पवमानः पुनातु माम् ' यही कहा है । मनःप्राणवाङ्मय सृष्टिसाक्षी अव्यय का हृदयभार ही मन है, एवं यही मनु सम्पूर्ण विश्व का उक्थ है । इसी को ' श्वोवसीस्ब्रह्म ' कहा जाता है । ' कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ' ( ऋक ८।७।१७ ) के अनुसार अपने ' कामरेत ' ( इच्छाशक्ति ) से यही मनोब्रह्म सत्र का प्रवर्त्तक बनता है । ईश्वरा व्यय रसबलात्मक है । विश्वापेक्षया सर्वव्यापक है । यह अव्ययेश्वर सहस्र-वल्शायुक्त अश्वत्थमूर्त्ति है । इस का ब्रह्माग्निमय रस- बलात्मक मनोवच्छिन्न केन्द्रस्थ अन्तर्यामी सत्य ही ' मनु ' तत्त्व है । इसी मनोऽवच्छिन्न मनु से सृष्टिं होती है, एवं यही प्रलय का अधिष्ठाता है । यह केन्द्रभाव ( इच्छाबिन्दु ) स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, भेद से पाँच स्थानों में अपने महिमारूष से विभक्त होरहा है । सूर्य्यमूला रोदसीसृष्टि के सम्बन्ध में अहोरात्रविभाग से यह केन्द्रबिन्दु ३० भागों में विभक्त होजाती है । १५ चिन्दु ग्रहः कल्प है, १५ चिन्दु रात्रिकल्प है । १ बिन्दु का प्रातः संध्या में भोग है, एक का सायंसन्ध्या में अन्तर्भाव है । इसप्रकार अहःकाल, और रात्रिकाल, दोनों में १४ - १४ हृदयभाव शेष बच जाते हैं । ये ही हृदयभाव उस अन्तर्य्यामी मनु से अभिन्न होने के कारण ' मन्वन्तर ' नाम से व्यवहृत होते हैं । इसप्रकार सृष्टिप्रवर्त्त क वेदमूर्ति, अतएव ब्रह्माग्निरूप सम्पूर्ण प्राणों का उक्थ, सत्र का प्रशास्ता, सब का प्रस्तावरूप, सृष्टि - भेद से विचाली, मनोवच्छिन्न, हृदयस्थ, अन्तर्यामी, तत्त्व ही ' मनु ' है । सृष्टिविद्या-सूचक इसके अवान्तर विभूति - विवर्त्त ' ही मन्वन्तर हैं I । ईश्वराव्ययरूप मन हीं मनुरूप में परिणत होकर ( वेदाग्निमय बन कर ) सृष्टि करता है । इस मनु की जो प्रथमा सृष्टि है, वह इड़ा, ऊ, गौ, इन तीन भागों में विभक्त है । इड़ा अन्नरस है । गौ रसप्रवर्त्त के प्राण है । इसी गौ के आधार पर प्राकृतिक नित्य ' अग्नि होत्रयज्ञ ' प्रतिष्ठित है, जैसा कि द्वितीयकाण्डस्थ ' अग्निहोत्रब्राह्मण ' में विस्तार से स्पष्ट होने वाला है । सम्पूर्ण प्रपञ्च से प्रकृत में हमें केवल यही बतलान्ग है कि, विज्ञान ( बुद्धि ), प्रज्ञान ( मन ), सत्त्व ( महानात्मा ), अग्नि ( भोक्तात्मा ), इन सब श्रात्मखण्डों में व्याप्त रहने वाला, हृदयस्थ अन्तर्ज्योतिर्म्मय अन्तर्यामी सत्वतत्त्व ही मनु है । प्राज्ञसोममयी सत्यत्त्वधारणमूला मनुः सम्बन्धाधिष्ठात्री श्रद्धा ही मनुपत्नी है । एवं २ श्रोत्रत्राण, २ चक्षुः प्रारण, २ नासाप्राण १ मुखप्राण, इसप्रकार ' साकञ्ज ’ नाम से प्रसिद्ध सात शीर्षण्यप्राण, १ उपस्थप्राण, १ मूलाधारप्राण, इसप्रकार २ अवान्नप्राण, एवं एक नाभिप्राण, कुल १० आध्यात्मिक शारीरप्राणों की समष्टि ही ' विराडगौ ' है । यही आध्यात्मिक मनु का ६०२

पृष्ठ 879

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 879 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण आध्यात्मिक ऋषभ है । ये १० प्राण अर्क ( रश्मि ) रूप हैं | हृदयस्थ सत्यज्योर्तिर्मय मनुप्राण इन अर्को का उक्थ है । यही मुख्य आत्मा है । यह आत्मतत्त्व ज्योतिर्म्मय है । अतएव इस से सम्बन्ध रखने वाले १० सो प्राण भी ज्योतिर्मय ही हैं । इन दसौं प्राणों से अतिरिक्त ' आसुर ' प्राण भी इसी अध्यात्मसंथा में प्रतिष्ठित हैं । ३३ दिव्यप्राश, ६६ आसुरप्राण, २७ गन्धर्वप्राण, १० ऋषिप्राण, ५ पशुत्राण, सब कुछ इस पिण्डब्रह्माण्ड में भी श्रृण्डब्रह्माण्डवत् श्रवस्थित हैं । इन में से आसुरप्राण दिव्यप्राण के विरोधी हैं । त्रैतन, वृत्र, नमुचि, किलात, आकुली, आदि नवतीर्नव ( ६६ ) विध आसुर प्राण इस अध्यात्मजगत् में प्रतिष्ठित हैं । इन में जो प्राण तमोमय हैं, दूसरे शब्दों में- अविद्यामय हैं, उह्नीं का नाम ' किला ' और ' कुली ' हैं । मनु-मानवी - ऋषभ तीनों ज्योतिर्म्मय होने से असुरन हैं | किलात, और आकुली, दोनों कि - ( मल - पाप्मा ) उत्पन्न करते हुए सत्र से पहिले दशर्षिप्राणरूप विराड I गौ पर ही प्रहार करते हैं । इस तम के श्रावरण से इस मनु - ऋषभ का ज्योतिर्भाग अभिभूत होजाता है । यही इस का आलम्भन है । ऋषभ की अभिभूति से श्रद्धा-तत्त्व का अभिभव होजाता है । इसप्रकार प्राणज्योति के मलिन होने से धर्म्मप्रतिष्ठारूप ऋषभ, और ' श्रद्धा ' दोनों का ही स्वरूप अन्तर्मुख होजाता है । विद्वान् भी इन आसुर - प्राणों की प्रबलता से श्रद्धायुक्त, कल्मषयुक्त एवं ग्रात्मबल से हीन होजाते हैं । श्रद्धा को हमने सौम्यप्राणमयी बतलाया है । ऐन्द्र - धौव, सौम्य, भेद से विद्युत् तीन प्रकार की है । आत्मविद्युत् ही ' सौम्यविद्यत् ' कहलाती है । एवं यह विद्युत् साक्षात् इन्द्र है । इन्द्र वाक् है । इधर दशप्राणसमष्टिरूपा गौ प्राणविद्युत् ( सौरविद्युत् ) है | किलाताकुली से रहित दिव्यतेजोमय ब्राहाण के मुख से निकली हुई, एवं स्वयं भी विद्युन्मूर्त्ति रूपा ' मन्त्रवाक् ' असुरों का नाश करने वाली है । इस के सम्बन्ध से यज्ञपात्र विद्युन्मय बनते हुए असुरविनाशक बन जाते हैं । अन्तरिक्ष में यज्ञविनाशक पाप्माभाव - सम्भा-दक आतुरप्राण व्याप्त रहते हैं । उह्नीं के विनाश के लिए यहाँ ' ध्वनि ' की जाती है । अपिच सिल, लोढी पाषाणमयी है । पाषाण ' अश्मास्रोम ' से बनता है । अतः इन में स्वयं भी वह ‘ इन्द्रविद्युत् ’ प्रतिष्ठित है । किलाताकुली के प्रत्याघात से प्रकृतिमण्डल में जो श्रद्धामय अश्मासोम प्रवृक्त होता है, वही यज्ञिय पदार्थों का उपादान बनता है । जिन में यह विद्युत् रहती है, उह्नीं के यज्ञपात्र बनाए जाते नाते हैं । ऐसी अवस्था में इन पात्रों से निकलने वाली ध्वनि को हम अवश्य ही असुरों का नाश करने वाली मान सकते हैं । यह तो हुआ प्रकृत कथा का प्राधिदैविकपक्ष, और आध्यात्मिक पक्ष के साथ समन्वय । अत्र सक्षेप से ग्राधिभौतिक - चरित्र की ओर भी आप का ध्यान श्राकर्षित कर लिया जाता है । जो कुछ आधिदैविक में हैं, वही चरित्र अभिभूत में भी है । वैज्ञानिकोंनें उसी प्रकृति के चरित्र के आधार पर सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ व्यव-स्थित कीं हैं । भगवान् मनु भारतवर्ष के सम्राट् थे । प्राकृतिक मनुःप्राण की आराधना कर उस के द्वारा वही ' मनुशक्ति ' प्राप्त कर ये महापुरुष ' मनु ' नाम से ही प्रसिद्ध हुए । इन की पत्नी ' श्रद्धादेवी थी । इन के समीप बैल था । ऋषभं सौर पशु है । इस के आत्मा में ३३ देवप्राण प्रतिष्ठित रहते हैं । अतएव इस की ध्वनि वास्तव में असुरों को दुःख पहुँचाती है । बात यथार्थ है । ६०३

पृष्ठ 880

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 880 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड आसुर - प्राण - प्रधान नरराक्षस तो आज भी इस गौपशु से विरोध ही कर रहे हैं । इसी विरोध से हमारा दिव्यत्रल प्रतिक्षण क्षीण होता जारहा है । वही स्थिति उस समय थी । मनु के ऋषभ की ध्वनि इन असुरों को दुःख पहुँचाया करती थी । फलतः किलाताकुली के कुचक्र में पड़ कर वृषभ का आाल-म्भन होगया । ग्रालब्ध ऋषभ की वाक् उत्क्रान्त होकर मनुपत्नी में प्रविष्ट होगई । इस में आश्चर्य की कोई बात नहीं है । यदि हमारा कोई प्रिय व्यक्ति दुःख से कातर होकर चीत्कार करने लगता है, तो उस की वह करुणैध्वनि हमारे अन्त: करण में प्रतिष्ठित होजाती है । एवं उस दुष्ट के प्रति हमारे बुरे भाव होजाते हैं । यही अवस्था मनुपत्नी की हुई । उह्न ऋषभ से बड़ा प्रेम था । अतएव वह ध्वनितत्त्व उन के आत्मा में प्रतिष्ठित होगया । एवं असुरों के प्रति मनुपत्नी ने बड़ा क्रोध प्रकट किया । असुर ओर भी घबराए । विश्वास रहै, यदि इस कथा का ऐतिहासिक मनुष्यमनु के साथ सम्बन्ध नहीं माना जाता है, तो ' भूयो हि मानुषी वाग् वदतीति ' श्रुति का यह वचन सर्वथा व्यर्थ ही प्रमाणित होजाता है । आगे जाकर इसका भी आलम्भन कर दिया गया । यही वाक्तत्त्व सजातीय - सम्बन्ध के कारण यज्ञ— पात्रों में प्रविष्ट होगई । आज निदान के द्वारा उसी चरित्र का स्मरण करते हुए ' समाह्नन ' व्यापार किया जाता है । वस्तुतस्तु यह श्राख्यान हमारे विचार से केवल आधिदैविक, एवं आध्यात्मिक चरित्र से सम्बन्ध रखता है | ‘ ये ये अदन्तास्ते ते सान्ताः ' के अनुसार ' मन ' शब्द सकारान्त भी है । मनस् से ही मानुष है, मनु ही मानुष है । इसकी शक्ति ही मानुपी है । इसी के अभिप्राय से ' भूयो हि मानुषी वाग् वदति ’ कहा प्रतीत होता है । क्या कहें, वैदिक - विज्ञान आज इस सीमापर्य्यन्त हम से तिरोहित होगया है कि, उसके विषय में ‘ इदमित्थमेव ' कहना कठिन है । ' विभाषा ' की अनुवृत्ति के विषय में भाष्यकार पतञ्जलिने कहा है कि, ‘ तदेतदत्यन्तं संदिग्धमाचाय्र्याणां विभाषानुवर्त्तते न वा ' । इस ‘ मानुषी ' शब्द के विषय में हमारी भी यही दशा है । पुरुषादि पशुओं का आलम्भन होता था, यह तो ध्रुवसत्य है । हमनें जो पूर्वकथा का केवल आध्यात्मिक, और आधिदैविक चरित्र के साथ सम्बन्ध बतलाया है, उसका यह अर्थ नहीं है कि-पुरुष का आलम्भन सम्भव नहीं । परन्तु मनुसम्राट् की पत्नी की आहुति दी जाय, यह समझ में नहीं आता । अतः इस विवादग्रस्त विषय का निर्णयभार जिज्ञासारूप से विज्ञ पाठकों के ऊपर ही छोड़ते हुए हम प्रकृत का ही अनुसरण करते हैं || १४,१५,१६,१७ ॥ ब्राह्मण ( विज्ञान ) का निरूपण उपरत हुआ । अत्र श्रावृत् बतलाते हैं 1 । ' हे कुक्कुट! आप मधुजिह्व हैं | आप हमारे लिए अन्न और रस की बाणी बोलिए! आपके आश्रय से ही हम अपने शत्रुओं झुण्ड झुण्ड जीतने में समर्थ बनें ' मन्त्र का यही अक्षरार्थ है, जैसाकि अनुवाद में बतला दिया गया है | तमोमय प्राण का नाम हीं असुर है, एवं ज्योतिर्म्मय प्राण ही देवता कहलाते हैं । रात्रि में आसुर प्राण का साम्राज्य है, दिन में ज्योतिर्मय प्राण का साम्राज्य है । सौर रश्मियाँ दिव्यप्राणमयीं हैं । तमोमय रात्रिगत आसुर प्राण का विनाश करना इनका मुख्य कार्य्यं है । बाह्ममुहूर्त में इस दिव्य सौर मधु प्राण का आगमन होता है । सर्वत्र व्याप्त होता हुआ यह ' मधुप्रारण ' सबसे पहिले कुक्कुटग्रीवा में हीं प्रविष्ट होता है । इस प्राण के आघात से कुक्कुटग्रीवा में कण्डू ( खाज ) उत्पन्न होती है । इसीसे वह बोल पड़ता है । इसी विज्ञान के आधार पर कुक्कुट को ' मधुजिह्व ' कहा जाता । अपि च दिव्यप्राण की आराधना करने वाले महर्षियों के लिए इस गायत्रीछन्दा ब्राह्ममुहूर्त्तस्थ सौर दिव्यप्रारण के अतिरिक्त और कोई भी तो अधिक ६०४