Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 881–884

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 881–884

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शतपथब्राह्मण प्रिय नहीं है । यह बात लोकप्रसिद्ध है कि, यदि कोई मनुष्य हमें हमारे घनिष्ठ प्रेमी के आने की सूचना देता है, तो उसके लिए हमारे मुख से ' तुमारे मुंह में घी शक्कर ' ये अक्षर निकल पड़ते हैं । ब्राह्ममुहूर्त्त में कुक्कुट हमारे इसी परम आराध्य दिव्य सौर प्राण के ग्रागमन की सूचना देता है । अतएव उसके लिए हम अवश्य ही ' कुक्कुटोऽसि मधुजिह्वः ' यह कह सकते हैं । यही सौरप्राण सम्पूर्ण अन्नों का परिपाक करता है । इसीसे बलप्रद ‘ ऊक् रेस ' प्राप्त होता है । इस चलप्रदरस, एवं अन्न के अधिष्ठाता सौरप्राण के आग— मन की सूचना कुक्कुट के द्वारा ही उपलब्ध होती है । अतएव इसके लिए ' इषमूर्जमावद ' कहा है | इसी प्राण के बल से हम निद्रा - आलस्य - आदि पामा असुरों को जीतने में समर्थ होते हैं । इसी आधार पर ' लवा वयं संघातं संघातं जेष्म ' यह कहा है । दिव्यप्राण का श्रागमनकाल यही है । ग्रतः यही हमारा उत्थानकाल है, यह भी प्रासङ्गिक उपदेश है ॥ १८ ॥

इसप्रकार हविष्कृदाह्वानकाल में दृषदुपल के समाहन के अनन्तर पत्नी, ग्रथवा श्राग्नीघ्र, दोनों में से कोई एक उलूखलस्थ हविद्रव्य का मुसल के द्वारा ' कण्डन ' करता है । इससे हविद्रव्य के तुष पृथक् होजाते हैं । इसप्रकार हविर्द्रव्य के तुष से पृथक होजाने पर वही आग्नीध, अथवा पत्नी ' वर्षवृद्धमसि ' ( १ | १६ मं ० ) यह मन्त्र बोलता हुआ शूर्प ( छाजला ) ग्रहण करता है । यह शूर्प नड़ - वेगु - इषीक –से बनता है | जॅगल में उत्पन्न होने वाले बृहत्काय तृण ( जिनसे छप्पर बाँधा जाता है । एवं जो राजस्थान में ' फड़ला ' नाम से प्रसिद्ध है, वही यहाँ ' नड़ शब्द से गृहीत हैं ) ही नड़ हैं । वंश ( बांस ) वृन्न ही वेणु है । एवं नड़ के भीतर से निकलने वालीं अति चिक्कण शलाकाएँ हीं ' इपीक ' हैं । शूर्प इह्रीं तीनों से बनाया जाता है । जहाँ जल की अधिकता होती है, वहीं ये तीनों द्रव्य उत्पन्न होते हैं । नड़ हो, वेणु हो, अथवा इषीक हो, तीनों का वर्षा के द्वारा ही होता है । वर्षा का पानी हीं इनको पुष्ट - वृद्ध करता है । अत: हम इह्नों अवश्य ही ' वृद्ध ' कह सकते हैं । शूर्प इसी वर्ष वृद्ध से निष्पन्न होता है । अतएव वह भी इसी नाम से व्यवहृत किया जाता है । शूर्यग्रहणानन्तर ' प्रतिवेति हविरुद्वपति ' ( का ० श्र ० सू ० १६ ० २ कं ० ४ ) के अनुसार ' प्रतित्त्वा वर्षवृद्ध ं वेत्त ( १।१६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ आग्नीध्र उस शूर्प में हविद्रव्य का ' निर्वाप ' करता है । व्रीहि, यन, आदि हविर्द्रव्य वर्षवृद्ध ही हैं । वर्षा ही इनको प्रवृद्ध करती है । उधर शूर्प भी पूर्वकथनानुसार वर्षवृद्ध ही है । शूर्प और हवि, दोनों में विजातीयभाव - मूलक ' हिंसाभान ' का प्रवेश न होजाय, परस्पर एक दूसरे का घात न कर बैठें, इसी आसुरी, यज्ञविनाशिका वृत्ति को दूर करने के लिए ' प्रतित्त्वा ' इत्यादि से आग्नीध्र शूर्प के लिए संज्ञा ही बोलता है । ' संज्ञा ' शब्द का अर्थ है ' परिचय कराना ' । कैसा परिचय? -सजातीयमूलक परिचय | यह आप ही का है, आप हमारे ही हैं, यही ' संज्ञासम्बन्ध ' है । लोक में जिनका ऐसा सम्बन्ध होता है, वे परस्पर ' सगा -सम्बन्धी ' कहलाते हैं । बस्तुतः यह ' संज्ञासम्बन्धी ' का ही विकृत-रूप है । शूर्प, ओर व्रीहि हम स्थूल बुद्धियों के लिए जड़ होते हुए भी सर्वव्यापक सर्वाधिष्ठाता श्वोवसीयस् नाम से प्रसिद्ध अव्ययमन का वास्तविक स्वरूप समझने वाले प्राप्त महर्षियों की दृष्टि में चेतन हैं । अतः व्रीहि के लिए ' प्रतित्वा वर्षवृद्ध ं वेत्तु ' कहना ठीक ही समन्वित होजाता है । यज्ञकर्म की समृद्धि का एक पारिभाषिक नाम है - ' रूपसमृद्धि ' । सजातीयानुबन्धिनी समानता से समन्विता सहसम्बन्धवृत्ति का ही नाम - ' रूपसमृद्धि ' है, जिसका नाम है- ' अनुरूपता ' । वे सभी प्रति— ६०५

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प्रथमकाण्ड रूपताएँ - प्रतिकूलताएँ - असमानधर्म्मात्मिका बनतीं हुई यज्ञविरोधिनी मानली गई हैं । अतएव समानधर्म्मा सभी भावों, पदार्थों को— ' अयज्ञिय ' ही माना गया है यज्ञकाण्ड में । मन्त्र का - वर्षवृद्ध ' शब्द यज्ञानुबन्धिनी अनुरूपभावात्मिका — समान वर्मात्मिका इसी ' रूपसमृद्धि ' का स्पष्टीकरण कर रहा है । उलूखल भी वनौषधि से ( काठ से ) निर्मित है । मुसल भी वृक्षकाष्ठात्मक ही है । तत्रस्थ हविद्रव्य ( अन्न ) भी पार्थिव -‘ ओषधि ' रूप ही है | और इन सभी के मूलरूप - ' वर्षाजल से अभिवृद्ध होते हुए - ‘ वर्षवृद्ध ' ही हैं । इधर नड – वेणु – तथा इषीका से विनिर्मित शूर्प भी इसी वृष्टिजल से वृद्धिंगत होता हुआ ' वर्षवृद्ध ' ही है । तदित्थं इसका समावेश सर्वात्मना यज्ञ की ' रूपसमृद्धि ' का ही कारण बन रहा है । विजातीयता में सम्बन्ध करने वाले दोनों में हीं एकप्रकार का प्राणविकम्पनात्मक क्षोभ उत्पन्न हो जाता है | यह क्षोभ प्राणों की सहज - स्वस्थता का हिंस्रक है, घातक है । यह स्पष्ट किया ही जाचुका है कि, जिह्न स्थूलदृष्टि ' जड़पदार्थ ' कहती है, वे भी चिन्मय - प्राण समन्वित हैं । अवश्य ही विजातीय भूतों के पारस्परिक संयोग से दोनों के ही प्राण क्षुब्ध होते हुए एक दूसरे के लिए श्राक्रामक - हिंस्रक - बन सकते हैं, बन जाते हैं । यह हिंसाभाव सुरभाव है, अतएव यज्ञिय है । ' वर्षंवृद्धम् ' से अनुप्राणिता सजातीयता के द्वारा यज्ञानुगता इस सुशान्ता - दैवीवृत्ति की ओर ही सङ्कत हुआ हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है कि - ' तत् - संज्ञामेवैतत् - शूर्पाय च वदति, नेदन्योऽन्यं हिनसातै ' - इति ” ॥१ ९, २० ॥ हवि के निवापानन्तर ‘ परापूतमिति निष्पुनाति ' ( का ० श्र ० १ ० २ के ० ४ ) के अनुसार वह आग्नीध्र ‘ परापूतं रक्षः परापूता अरातयः ' ( यजुः १।१६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ हविद्रव्य से तुषभाग को पृथक् कर उसे · स्वच्छ, अतएव पवित्र बनाता है । अनन्तर ' अपहतमितेि तुपान्निरस्यति ' ( का ० श्रौ ० १६।२।४ ) के अनुसार ‘ अपहतं रक्षः ' ( ११७ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु आग्री से सौंपे गए तुषों को उत्कर में प्रक्षिप्त करता है । तुष विजातीय द्रव्य है । यह अन्न का मलभाग । मलभाग ही पाप्मा है | पाप्मा हृीं यज्ञविघातक असुर है । इनको पृथक् करना अपने यज्ञ से असुर - राक्षसों को ही निका-लना है || २१ || वितुषीकरणानन्तर ‘ वायुवे ' इति विविनक्ति ' ( का ० श्रौ ० २।२।४ ) के अनुसार आग्रीघ्र त्रितुषीभूत तण्डूलों को स्वच्छ करता है । वितुत्रीकरण के अनन्तर न कुठे हविद्रव्य को हटाने के लिए जो व्यापार किया जाता है, उसी के लिए यहाँ ' विविनक्ति ' कहा है । यही व्यापार लोकभाषा में ' बीरणना ' नाम से प्रसिद्ध है । तात्पर्य्य यही है कि, जिस समय हवि को उलूखल में कूटा गया था, उस समय कुछ हवि बिना कुटा रह गया था । वितुषीकरण के अनन्तर उन न कुटे हुए तण्डुलों को पृथक् छाँट कर पुनः ऊखल में डाल कर उनका ' कण्डन ' किया जाता है । इसप्रकार न कुटे हुए शूर्पस्थ हविर्भाग को पुनः कण्डन के लिए पृथक करना हीं प्रकृत में ‘ विविनक्ति ' से अभिप्रेत है । छाँट करना वायु का कार्य्य है । न केवल अन्न की ही, अपितु संसार में जो कुछ है, सब की छाँट वायु ही करता | हम अपने हाथ से जो छाँट करते हैं, वह भी वायु का ही कार्य्य है । वायु के सञ्चार से ही, दूसरे शब्दों में वायु के प्रत्याघात से ही रक्त का सञ्चार होता है । रक्त– सञ्चार से ही हाथ इधर उधर होता है । इसी सामान्य नियम के अनुसार यहाँ भी इन कुटे हुए, न और कुटे हुए तण्डुलों की छाँट यह वायु ही ( १ ) करता है | आग्नीध्र के द्वारा जिस समय यह तण्डुल ( १ ) कृषिभूमि में सञ्चित सम्पन्न होता है शूर्पादि से । एशियों से तुषादि का पार्थक्य वायव्यप्रवाह में ही कृषकों के द्वारा ६०६

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शतपथब्राह्मण इस विविक्त भाव को प्राप्त होते हैं, उस समय जिस इडापात्री में इन तण्डुलों को आग्नीध्र डाल देता है ॥ २२ ॥

उस पात्रीगत हवि का ‘ देवो व इति पात्र्यामोप्याभिमन्त्रयते ' ( का ० श्र ० २।२१।४ ) के अनुसार ' देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णातु - अच्छिद्र ेण पवित्रेण ' ( यजुः १।१६ ) यह मन्त्र बोलता हुआ ं अध्वर्यु अनामिका से स्पर्श करता हुआ उसे मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करता है । ' प्रेरयिता प्राण का ही नाम सविता है । परमेष्ठी के उपग्रहभूत इस सविताग्रह की प्रेरणा का त्रैलोक्य में, सर्वप्रथम सूर्य के ही साथ सम्बन्ध होता 1 अतः सूर्य को ही ' सविता ' मान लिया जाता है । इस सवितासूर्य्य की रश्मियाँ हीं. इसके हाथ हैं । कर्म्मप्रवर्तक अङ्ग ही ' हस्त ' कहलाता है | सम्पूर्ण त्रैलोक्य के कर्म्म का सञ्चालन सविताप्राणात्मक सूर्य्य अपनी रश्मियों से ही करते हैं । अतः इन सौररश्मियों को हम अवश्य ही ' सविता के हाथ ' मान सकते हैं । सौररश्मियाँ सावित्राग्निमयीं हैं । अग्नि हिरण्यरेता हैं । श्रतएव इन हाथों को हम ' सुवर्ण ' के कह सकते हैं । सत्यतत्त्व ' अच्छिद्र ' कहलाता है | सौर अग्नि सत्य है । अत: उसे हम ' अच्छिद्र ' मान सकते हैं । दूषित वारुण सुरभाव को अपनी शक्ति से नष्ट कर पदार्थों को पवित्र बनाना इह्रीं सौररश्मियों का कार्य्य है | यदि आपके वस्त्रों में दुर्गन्ध है, यदि कोई बस्तु भीतर चन्द कमरे में रक्ली हुई सड़ रही हैं, तो आप उसे धूप में रख दीजिए । उसी हिरण्यपाणी सविता के सम्बन्ध से दोष निवृत्त हो जायगा । ऐसी अवस्था में हम अवश्य ही हिरण्यपाणी सविता के रश्मिमय आग्नेय तेज को ' च्छिद्रपवित्र ' कह सकते हैं । संसार के प्राणीमात्र में इसी प्रेरणा का समावेश है । जिसमें इस प्रेरणा का विकास होता है, वही उस कार्य्य को यथावत् सम्पन्न करने में समर्थ होता है । उसका रश्मिरूप पाणि अवश्य ही हिरण्मय है | अतएव वह अच्छिद्रपाणि है । ऐसे हाथ से जो वस्तु उठाई जाय, वही सुप्रतिगृहीत है । तात्पर्य्य यही है कि, ‘ इडापात्री ' में हवि रखते समय यदि हवि का कुछ अंश भी भूमि पर गिर जाता है, तो यज्ञ नष्ट होजाने की सम्भावना है । अत: उसे सुप्रतिष्ठित करने के लिए ही मन्त्र के द्वारा हवि में देवप्राण का समावेश कराया जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' सुप्रतिगृहीता असन् ' यह कहा I वितुषीकरणार्थं शूर्प को हाथ में लेकर जो व्यापार किया जाता है, वहीं फलीकरण ( फटकना ) नाम से प्रसिद्ध है । एकबार के फटकने से ही सम्पूर्ण तुष पृथक् नहीं होते । बार बार फटकना पड़ता है । जिनका कण्डन नहीं होता, उीँ फिर उलूखल में डाला जाता है । यह फलीकरणव्यापार " यज्ञकर्म में तीन बार ही किया जाता है । इनमें से पहिली बार तो सम्पूर्ण कर्म्म पूर्वोक्त मन्त्र से किया जाता है । दूसरी बार, एवं तीसरी बार सम्पूर्ण कर्म्म तूथ्णों हीं किया जाता है | अन्न- ऊर्क - प्राण - भेद से भी यज्ञ है । ग्रार्हपत्य, आह-वनीय - दक्षिणाग्नि भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । यज्ञमूर्ति ऋक् --यजुः -- सा भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । त्रिवृत् - पञ्चदश – एकविंशस्तोम भेद से भी वितानयज्ञ त्रिवृत् है । अग्नि वायु -- आदित्य भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । गायत्री - त्रिष्टुप् जगती भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । प्रातःसवन, माध्यन्दिनसत्रन, सायंसवन भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है | स्तोत्र - शस्त्र - ग्रह - भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । पृथिवी - अन्तरिक्ष - द्यौ - भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । लोक – वेद - वाक् -- भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । इष्टि -- पशु - सोम - भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् ६०७

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प्रथमकाण्ड तीन पर उपरत होजाती है । है । ज्योतिः -- गौः - आयुः भेद से भी यज्ञ त्रिवृत् है । क्योंकि ही यज्ञसीमा फलीकरण करना उचित है ॥२३ ॥

अतः ' त्रिवृद्धि यज्ञः ' इस अनुगम श्रुति के अनुसार तीन बार है । केवल प्रथम बार हवि को शुद्ध करने वाला यह फलीकरणव्यापार तूष्णीं ही का किया कहना जाता है कि, प्रथम बार तो पूर्वोक्त पूर्वोक्त मन्त्रों का प्रयोग किया जाता है । इस पर कितने हीं याज्ञिकों और तृतीय बार- नूष्णीं न कर - —देवेभ्यः ' शुन्धध्वं-मन्त्रों से हौ फलीकरण करना चाहिए | परन्तु द्वितीय चाहिए । इस पर भगवान् याज्ञव-दे॒वेभ्यः शुन्धध्वम् ' यह मन्त्र बोलते हुए । फलीकरण यह हविद्रव्य करना शकट से ग्रहणकाल में ही तत्तद्द ेवताओंों के ल्क्य कहते हैं कि, ऐसा कभी नहीं करना चाहिए ' देवेभ्यः ' कहना इस हविको वैश्वदेव [ सम्पूर्ण-लिए नामपूर्वक नियत होगया है । ऐसी अवस्था में यहाँ - जिन देवताओं के लिए यह यह हावि नियत हो देवताओं की सम्पत्ति ] बनाना है । ऐसा करना करना है । इसलिए तूष्णीं हीं फलीकरण करना चुका है, उनके साथ अन्य देवताओं का कलह उत्पन्न चाहिऐ ॥२४ ॥

इति प्रथमकाण्डे प्रथमपाठके प्रथमाध्याये वा चतुर्थं ब्राह्मणम् । प्रथमोऽध्यायश्च - अत्र - उपरतः १ ६०८ शक्षायतन पुस्तकालय *, शंकर दिल्ली श्री